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अपराधिक केस फर्जी होने पर प्रतिरक्षा करना ही उपाय है।

समस्या-

जितेन्द्र ने शैखपुरा बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे विरुद्ध एक सरकारी कर्मचारी द्वारा धारा 341, 323, 353, 379, 504, 506/34 में एक फर्जी केस दर्ज करवा दिया है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

जितेन्द्र जी,

प के विरुद्ध मुकदमा हुआ है। केवल आप जानते हैं कि वह फर्जी है। बाकी पुलिस ने तो गवाही और सबूतों के आधार पर ही आरोप पत्र प्रस्तुत किया होगा। इस का एक ही इलाज है कि आप इस मुकदमे में अच्छा वकील करें और अपनी प्रतिरक्षा करें। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि यह एक फर्जी मुकदमा है तो आप न्यायालय से यह निवेदन कर सकते हैं कि उक्त मामले में फर्जी मुकदमा दर्ज कराने वाले कर्मचारी के विरुदध कार्यवाही की जा कर उसे सजा दी जाए।

यदि आप इस मुकदमे में बरी हो जाते हैं तो आप दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए हर्जाना प्राप्त करने के लिए उक्त सरकारी कर्मचारी के विरुदध दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

किसी के विरुद्ध मुकदमा प्रस्तुत हो जाने पर प्रतिरक्षा ही एक मात्र विकल्प है।

divorceसमस्या-

सौरभ ने प्रतापगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

कृपया मुझे बतायें कि. 1. धारा 125 दं.प्र.संहिता का केस पत्नी मायके में कर सकती है या पतिगृह? अगर पतिगृह नहीं करे और मायके कर दे तो क्या किया जाये? 2. धारा 498 ए का केस कहाँ कर सकती है पति गृह या मायके? और अगर मायके नहीं कर सकती हो फिर भी कर दे तो क्या करें जब पुलिस परेशान कर रही हो? मैं ने पहले आप को अपनी समस्या भेजी थी जिसका समाधान आप ने 25-११-१४ को दिया था आप के कहे अनुसार मैं ने किया परन्तु सफलता नहीं मिली। ना ही अभी तक पत्नी से उसके घर वालों ने मेरी बात होने दी। 4 बार मैं जा कर आया हूँ। मैं अपना घर किसी भी हालात में बिगाड़ना नहीं चाहता हूँ। जब कि मेरे ससुर मुझ से बडी रकम लेने के चक्कर में हैं। उन के मित्र का फोन आया था बोला 10 लाख देदो और तलाक ले लो।

समाधान-

धारा 125 दं.प्र.संहिता का केस पत्नी वर्तमान में जहाँ निवास कर रही है वहाँ कर सकती है। यदि आप के विरुद्ध मुकदमा कर दिया गया है तो आप के पास एक ही विकल्प है कि आप के विरुद्ध जिस अदालत में मुकदमा किया गया है वहाँ जा कर अपना प्रतिवाद प्रस्तुत करें और मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा करें।

धारा 498 ए आईपीसी का मुकदमा वास्तव में एक अपराधिक मुकदमा है। यह मुकदमा ऐसे किसी भी स्थान पर हो सकता है जहाँ वह अपराधिक परिघटना घटित हुई है जिस की शिकायत की जा रही है, या उस का कोई अंश घटित हुआ है। जब भी कोई पत्नी अपने मायके में ऐसी शिकायत प्रस्तुत करती है तो उस के विवरण में घटना का कोई एक अंश मायके के पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार में घटित हुआ बताया जाता है।

दि आप के विरुद्ध धारा 498 ए आईपीसी का मुकदमा दर्ज हुआ है और पुलिस परेशान कर रही है तो सब से अच्छा उपाय यही है कि आप अपनी गिरफ्तारी पूर्व जमानत करवा लें। जिस से आप गिरफ्तारी से बच सकें। यदि पुलिस ऐसे मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो फिर से आप के लिए यही विकल्प शेष रह जाता है कि आप अपने विरुद्ध मुकदमे में प्रतिरक्षा करें।

दि पत्नी आप के साथ रहना ही नहीं चाहती है तो आप उसे जबरन तो अपने साथ रख नहीं सकते। वैसी स्थिति में विवाह विच्छेद ही एक मात्र मार्ग शेष रह जाता है। आप घर बिगाड़ना नहीं चाहते तो आप जिला विधिक सहायता समिति में मुकदमा पूर्व समझौता कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत करें। वे आप की पत्नी को बुला कर आप से बातचीत करवा देंगे। यदि कोई हल निकलता है तो ठीक है वर्ना आप को समझौता कर के आपसी सहमति से विवाह विच्छेद कर लेना चाहिए। 10 लाख की तो मांग है इस से आधी या उस से कम राशि पर भी समझौता हो सकता है।

कोई अपनी पत्नी को उस की इच्छा के विरुद्ध रहने को बाध्य नहीं कर सकता।

husband wifeसमस्या-
छत्तीसगढ़ से बिजय कुमार ने पूछा है-

मेरी बहिन की शादी 11.03.2011 को हुई थी। शादी के 6 माह बाद पता चला कि लड़का काम पर आज तक नहीं जाता है और अगर मेरी बहिन सिलाई क्लास जाती है तो उसे भी काम पर नहीं जाने देता है। जिस के कारण घर का खर्चा चल नहीं पा रहा है। सिस्टर को मम्मी पापा से, भाई, बहिन से मिलने नहीं जाने देता है। जीजा धमकी देता है कि अगर तुम घर से बाहर निकलोगी तो मैं अपना एक्सिडेंट करवा कर तुम्हें और तुम्हारे परिवार को झूठे इल्ज़ाम मे फसा दूंगा। जीजा थोड़ा हाफ मेंटल लगता है। बहिन के साथ बहुत ही बुरा व्यहारा किया जाता है। अब मेरी बहिन माँ और पापा के पास जाना चाहती है। वापस फिर कभी नहीं आना चाहती है। क्या करें? हमारा आर्थिक हालत अच्छी नहीं है कि हम कोर्ट जाकर मुक़दमा लड़ें।

समाधान-

प की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है तो भी कोई बात नहीं है। आप की बहिन जब चाहे अपने पति को छोड़  कर अपने  माता पिता के घर आ सकती है। यदि संभव हो तो वह अपने ससुराल के थाने में यह रिपोर्ट दर्ज करवा कर आए कि वह अपने पति के परेशान करने और घर खर्च नहीं देने के कारण तंग आ कर अपने मायके जा रही है और अपने खुद के सामान के अतिरिक्त कुछ नहीं ले जा रही है।

प के जीजा की जो स्थिति आप ने बताई है वह बिलकुल सही है तो ऐसे व्यक्ति के साथ किसी भी स्त्री का जीवन बिता सकना दुष्कर है। कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी को जबरन अपने पास रोक कर नहीं रख सकता।

दि आप का जीजा पुलिस की कोई कार्यवाही करता है तो आप की बहिन बयान दे सकती है कि उस की हालत उस के पति ने खराब कर दी है इस कारण वह उस के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती है। यदि उस का पति चाहे तो उस से तलाक ले सकता है। यदि कोई अदालती कार्यवाही आप की बहिन के विरुद्ध होती है तो आप की बहिन अदालत को कह सकती है कि उस के पास मुकदमा लड़ने के लिए पैसा नहीं है। इस कारण उसे सरकारी खर्च पर वकील दिलाया जाए और अदालत आने जाने तथा अदालत का अन्य खर्च उस के पति से दिलाया जाए। आप की बहिन चाहे तो अपने भरण पोषण की मांग भी कर सकती है। यदि उस का पति किसी भी प्रकार का मुकदमा करता है तो उसी मुकदमे में वह यह आवेदन दे सकती है कि उसे उस के पति से अदालत का खर्च, आने जाने का खर्च और भरण पोषण दिलाया जाए।

फिसल कर बाइक का स्लिप होना बाइक चालक की खुद की गलती है . . .

motor accidentसमस्या-

आगरा उत्तर प्रदेश से वरुण गुप्ता ने पूछा है –

मेरा भाई कुछ दिन पहले रोडं पर जा रहा था कि अचानक उस की बाइक स्लिप हो गयी और वह रोड़ के रोंग साइड में बाइक के साथ गिर पड़ा।  उसी साइड से एक लड़की अपनी बाइक से तेज गति से बिना हेलमट के आ रही थी, वह ब्रेक नहीं लगा सकी और गिरे हुए लड़के से टकरा कर गिर गयी लेकिन उसके ज़्यादा चोट आई थी। पुलिस दोनों को उठा कर थाने ले आई। तब मेरे भाई ने घर फोन किया और मैं और मेरे घर वाले थाने पहुँच गये। वहाँ पुलिस लड़की की तरफ दा पोलाइट थे और मेरे भाई के लिए ज़्यादा एग्रेसिव थे। जब कि गलती लड़की की थी। हम ने लड़की को हॉस्पिटल ले जा कर अपनी तरफ से इलाज कराया। जिस में हमारे 7000 रुपये खर्च हो गये। कुछ देर बाद मेरे भाई को पसलियों मे दर्द उठा और हम ने भाई को भी हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया। भाई की बाइक और हमारी आई.डी. पुलिस थाने में जमा करा ली गयी। फिर अगले दिन लड़की के घर वालों का फोन आया और वो हम से लड़की की बाइक की कीमत के बराबर पैसा मांगने लगे। लेकिन हम ने  मना कर दिया। क्यूँकि हमारा भी बराबर का ही नुकसान हुआ था। इस के अलावा हम ने लड़की के लिए खर्च किया। तब लड़की के घर वालों ने मेरे भाई के खिलाफ थाने में रिपोर्ट कर दी और कोर्ट में मुक़दमा कर दिया। हमें क्या करना चाहिए? क्या मेरे भाई को सज़ा होगी?

समाधान –

प ने दुर्घटना का पूरा विवरण नहीं दिया है। फिर भी जो विवरण दिया गया है उस से लगता है कि या तो यह एक संयोगवश घटी घटना है या फिर आप के भाई की गलती है। एक लड़की अपने मार्ग पर अपनी गति से चली आ रही थी। अचानक उस के सामने एक मोटर सायकिल स्लिप हो कर गिर गई। वह चाह कर भी अपनी बाइक को रोक नहीं सकती थी। आप के भाई की मोटरसाइकिल किस कारण से स्लिप हुई है यह पता नहीं है। यदि वहाँ कोई भौतिक कारण नहीं हुआ तो यही माना जाएगा कि आप के भाई मोटरसाइकिल लापरवाही से चला रहे थे।

पुलिस वालों की लड़की से सहानुभूति होना अस्वाभाविक नहीं है। क्यों कि आप के भाई की गलती स्पष्ट दिखाई दे रही है। उन्हों ने रिपोर्ट भी तब तक नहीं लिखी जब तक कि लड़की ने खुद रिपोर्ट नहीं लिखा दी। अब फौजदारी मुकदमा तो आप के भाई के विरुद्ध चलेगा। उन्हें सजा होगी या नहीं होगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अभियोजन के साक्षियों की साक्ष्य से दुर्घटना में आप के भाई की लापरवाही साबित होती है या नहीं। आप के भाई को अपने बचाव के लिए अच्छा वकील करना चाहिए।

ह लड़की अभी आप के विरुद्ध मोटर यान दुर्घटना दावा अधिकरण में भी हर्जाने का दावा कर सकती है। यदि आप के भाई के पास वैध एवं प्रभावी ड्राइविंग लायसेंस था और बीमा कराया हुआ था तो आप के भाई को दुर्घटना से हर्जाने के दावे के बारे में बीमा कंपनी को सूचित करना चाहिए। बीमा कंपनी मुकदमा लड़ेगी और हर्जाना भी बीमा कंपनी ही अदा करेगी। लेकिन यदि आप के भाई के पास वैध एवं प्रभावी ड्राइविंग लायसेंस न हुआ या बीमा कराया हुआ नहीं था तो हर्जाने के दावे में अदालत जो भी हर्जाना लड़की को दिलाएगी वह आप के भाई को देना होगा। यदि ऐसा है तो आप ने लड़की के इलाज में जो खर्चा किया है उस के बिल आदि आप के पास होने चाहिए। वह खर्च उस में से कम हो जाएगा।

किसी गलत अपराधिक मामले से बचने के लिए सारे तथ्य अंकित करते हुए कानूनी नोटिस दिलवाएँ …

justiceसमस्या-

अजमेर, राजस्थान से सुरेश कुमार ने पूछा है –

मेरे एक दोस्त की माँ को उस की नानी की मृत्यु के बाद नानी की नॉमिनी होने के कारण सावधि जमा का धन मिल गया। माँ उसे दुबारा सावधि जमा करना चाहती थी, मगर पिता जी उस धन को खेत मे खर्च करना चाहते थे। माँ ने एक अकाउंट पेयी चैक से अपना धन मेरे दोस्त यानी अपने बेटे के बैंक अकाउंट में हस्तान्तरित करवा दिया। माँ के कहने पर बेटे ने अपने नामे से सावधि जमा करली। इस पर पिता ने अपने पुत्र की पत्नी के जेवरात अपने पास रख लिए। जब पुत्रवधु ने अपने जेवरात माँगे तो पिता ने कहा कि मैं ने तो अपने काम के लिए उन जेवरात को बेच दिया। अब माँ अपनी सावधि जमा का धन वापस लेना चाहती है। मेरा दोस्त अपनी पत्नी के जेवरात सावधि जमा का धन वापस लौटाने को सहमत है लेकिन मगर पिता जी जेवरात देने को सहमत नहीं हैं। अब माँ और पिता जी दोनों एक हो कर कहते है कि अगर सावधि जमा का पैसा नहीं दिया तो वे पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे कि उस ने धोखा देकर माँ के खाते से पैसा अपने खाते में हस्तान्तरित करवा कर सावधि जमा अपने नाम बनवा ली। दोस्त के पास किसी प्रकार की कोई लिखा-पढ़ी नहीं है। सावधि जमा की राशि और जेवरात की कीमत करीब बराबर ही है।  चैक माँ के खाते का था लेकिन चैक में विवरण दोस्त के हाथ से लिखा गया था। क्या माँ ओर पिता जी उस के नाम रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और क्या उस के खिलाफ कोई क़ानूनी धारा लग सकती है? उसे क्या करना चाहिए?

समाधान-

कोई भी व्यक्ति पुलिस में रिपोर्ट कराना चाहे तो कर सकता है उस पर किसी तरह की कोरई रोक नहीं है। यदि पुलिस समझती है कि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण कर सकती है और पर्याप्त सबूत होने पर अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकती है और न्यायालय में उस के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती है।

जिस तरह यह मामला माता-पिता और पुत्र-पुत्रवधु के बीच है, उस से नहीं लगता है कि कोई रिपोर्ट माता-पिता द्वारा दर्ज कराई जाएगी। लेकिन फिर भी सावधानी रखना जरूरी है। जिस तरह आप के दोस्त को डर लग रहा है कि माता-पिता रिपोर्ट दर्ज करवा देंगे जब कि कोई अपराध आप के दोस्त ने किया ही नहीं है।  उधर पिता द्वारा पुत्रवधु के जेवर रख लेना या उन्हें बेच देना तो गंभीर अपराध है। पुत्रवधु के जेवर उस का स्त्री-धन हैं। यदि ससुर उस के जेवर देने से इन्कार करता है या उन्हें बेच देता है तो यह धारा 406 आईपीसी के अन्तर्गत अमानत में खयानत का अपराध है। मेरे विचार में आप के दोस्त की पत्नी यदि रिपोर्ट दर्ज करवा दे तो दोस्त के माता-पिता दोनों ही मुकदमे में बुरी तरह से फँस जाएंगे। पुत्रवधु के प्रति मानसिक क्रूरता का बर्ताव करने के कारण धारा 498-ए के अपराध में भी उन के विरुद्ध मुकदमा बनेगा।

स स्थिति में आप के दोस्त के पास सब से अच्छा उपाय ये है कि वे किसी स्थानीय वकील से संपर्क कर के अपनी और अपनी पत्नी की ओर से एक संयुक्त विधिक नोटिस अपने माता-पिता को भिजवाएँ जिस में ऊपर वर्णित समूची स्थिति का उल्लेख करते हुए यह कहें कि वह अपनी माता को सावधि जमा का धन लौटाने को सदैव तैयार रहा है और अब भी है। लेकिन माता-पिता अपनी पुत्रवधु के जेवर नहीं लौटा रहे हैं जिस से पुत्रवधु को गहरा मानसिक संताप हुआ है जो कि क्रूरता की श्रेणी में आता है तथा माता-पिता दोनों धारा 406 तथा 498-ए के अपराध के दोषी हैं। यदि वे नोटिस मिलने के बाद एक निश्चित अवधि 15 या 30 दिनों में जेवर लौटा दें तो आप का मित्र उसी समय सावधि जमा की जो राशि उसे चैक द्वारा दी गई थी उसे लौटा देगा, यदि माता-पिता उक्त जेवरात नहीं लौटाते हैं तो वे दोनों कानूनी कार्यवाही करने को बाध्य होंगे।

स नोटिस से सारी बात स्पष्ट हो जाएगी तथा माता-पिता घर में बैठ कर ही सारे मामले को निपटा लेंगे। यदि फिर भी वे मामले को नहीं निपटाते हैं तो सारे तथ्य अंकित करते हुए आप का मित्र व उस की पत्नी एक संयुक्त रिपोर्ट पुलिस थाना को प्रस्तुत कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। इस तरह के मामलों में पुलिस भी पहले मामले को आपस में निपटाने को प्राथमिकता देती है। पुलिस के हस्तक्षेप से मामला निपट सकता है। इस नोटिस से कम से कम इतना तो होगा कि यदि माता-पिता कोई मामला दर्ज कराएंगे तो उस में आप के दोस्त व उस की पत्नी के पास पर्याप्त प्रतिरक्षा उपलब्ध रहेगी।

एक में सफलता पर अन्य मुकदमों में प्रतिरक्षा के मामले में अगंभीर न हों।

sexual-assault1समस्या-

रायपुर, छत्तीसगढ़ से गौतम ने पूछा है-

तीसरा खंबा को बहुत बहुत धन्यवाद कि आप की सलाह के अनुसार मेरे मित्र ने वकील के दबाव में लगाया गया आवेदन वापस ले लिया और विवाह को चुनौती देकर विजय प्राप्त की उस महिला का धारा 125 दं.प्र.संहिता का आवेदन निरस्त कर दिया गया।  उसने 498-ए व 294,323,506 भा.दं.सं. का  मिथ्या मामला भी 125 के आवेदन के तुरंत बाद लगाया था जिसमे अब उसकी गवाही होनी है। इस मामले में भी उसने स्वयं को पत्नी बताया है। क्या धारा 125 में जो आदेश हुआ है उस का इस मामले पर क्या असर होगा? क्या मेरा मित्र अब विवाह करने हेतु पूरी तरह स्वतंत्र है?

समाधान-

प को व आप के मित्र को बधाई कि उन्हों ने एक मुकदमे में सफलता प्राप्त की। किन्तु इस सफलता से आप को व आप के मित्र को निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। धारा 498-ए व 294,323,506 भा.दं.सं. में से केवल 498-ए ही एक धारा है जो विवाह पर आधारित है। यह एक अपराधिक मुकदमा है और इस में अपराध व उस से जुड़े तथ्यों को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की है। वे यह साबित नहीं कर सकते कि विवाह हुआ था। इस कारण से धारा 498-ए का अपराध तो आप के मित्र के विरुद्ध साबित नहीं होगा। लेकिन गवाहों के बयानों के समय गंभीरतापूर्वक और सावधानी से गवाहों का प्रतिपरीक्षण किया जाना आवश्यक है।

न्य धाराओं 294,323,506 भा.दं.सं. में वर्णित अपराध विवाह से संबंधित नहीं हैं। यदि गवाही में ये सब साबित हुए तो आप के मित्र को दंडित किया जा सकता है। इस कारण से इस मुकदमे को भी पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए और सभी आरोपों को मिथ्या साबित करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

अपराधिक मामले में आवश्यक होने पर न्यायालय कोई भी दस्तावेज मंगवा सकता है।

समस्या-

बनारस, उत्तर प्रदेश से अशोक तिवारी ने पूछा है-

किसी भी अपराधिक मुकदमे में जिरह के दौरान गवाह किसी ऐसी घटना से इन्कार करे जिस के दस्तावेज सरकारी रेकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं तो क्या उस सरकारी विभाग से जिरह पूर्ण होने के पहले दस्तावेज मंगाए जा सकते हैं?

समाधान-

दि किसी अपराधिक मामले में जिरह के दौरान गवाह किसी ऐसी घटना से इन्कार करे जिस के दस्तावेज सरकारी रेकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं तो क्या उस सरकारी विभाग से संबंधित दस्तावेज मंगाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 के अंतर्गत आवेदन किया जा सकता है। यदि मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश उचित समझता है तो ऐसा दस्तावेज जिरह पूरी होने के पहले मंगवा सकता है। लेकिन यदि आवश्यक न हुआ तो दस्तावेज मंगाए जाने की प्रार्थना को अभियोजन की साक्ष्य पूर्ण होने तक मुल्तवी कर सकता है। लेकिन ऐसी अवस्था में न्यायाधीश से आप यह प्रार्थना कर सकते हैं कि आप उस गवाह को पुनः जिरह के लिए बुलाने का अधिकार सुरक्षित रखना चाहते हैं। यदि इस संबंध में भी आप अपने आवेदन में या अन्य आवेदन प्रस्तुत कर उल्लेख कर दें तो उचित रहेगा।

दि न्यायालय आप के आवेदन को अभियोजन साक्ष्य पूर्ण होने तक मुल्तवी करता है और आप के गवाह को पुनः जिरह हेतु बुलाए जाने का अधिकार सुरक्षित नहीं रखता है तो आप इस आदेश को पुनरीक्षण याचिका द्वारा चुनौती दे सकते हैं।  इस बीच आप गवाह से वे सारे प्रश्न पूछ लें जो कि उस दस्तावेज के संबंध में हैं।  शेष तथ्य आप दस्तावेज से साबित कर सकते हैं। यदि दस्तावेज के रिकार्ड पर आने के उपरान्त आप को लगता है कि गवाह को जिरह के लिए बुलाना आवश्यक है तो आप उसे जिरह हेतु पुनः बुलाए जाने हेतु आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

घरेलू हिंसा के मुकदमा हो जाने पर पति क्या करे?

समस्या-

मेरी पत्नी ने मेरे ऊपर घरेलू हिंसा अधिनियम का केस करीब 18 महिना पहले किया था। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि मेरी पत्नी ने मुझे ही करीब 4 साल पहले मेरे ही घर से निकाल दिया था और इस केस के सम्मन उसने मेरे उसी घर के पते पर भिजवाए थे, जहाँ आज केवल वो रह रही है।  उस पते पर मैं था ही नहीं इसलिए उस पते पर मेरे द्वारा सम्मन लिया ही नहीं जा सकता था। इस केस में मेरे अलावा मेरी माँ ,बहिन और जीजा जी को भी शामिल किया था। उन तीनों ने मुझे पहले ही बेदखल किया हुआ है इसलिए वो लोग अब केस में जाते नहीं हैं। मेरी परेशानी ये है कि इस केस में उसके वकील  ने मेरे से 5000, रूपए महिना से आज तक का अंतरिम खर्चा और कुछ नगद पैसे मांगे हैं जिसका टोटल 1 ,70 ,000 है, जबकि मैं कोई नोकरी भी नहीं कर रहा हूँ और मेरे पास तो खुद खाने को भी पैसे नहीं हैं। क्योकि मैं जब घर से निकला था तो अपना सब कुछ रुपया पैसा आदि घर पर ही छोड़ आया था। जिस में से मेरी पत्नी ने 1,00000 , रूपए 2008 में ही अपने नाम बैंक में करवा लिए थे जिसकी मेरे पास रसीद भी है और मेरी पत्नी पढ़ी लिखी होने के कारण एक प्राइवेट फार्मेसी में नोकरी भी कर रही है। उसकी सेलरी करीब 10 ,000 रूपए महिना है जो उसके बैंक खाते में जमा होते हैं।  लेकिन उसने अपनी नोकरी का जिक्र कोर्ट में नहीं किया है और न ही उन 1 लाख रुपयों का।  अब आप मुझे बतायें की मैं इस समस्या से कैसे निकलूँ। क्यों कि मेरे पास रूपए बिलकुल नहीं है और मुझे अगर जेल जाना पड़ा तो कितने टाइम के लिए जाना होगा।  कृपया मेरा मार्ग दर्शन करें।

-कमल हिन्दुस्तानी, हिसार, हरियाणा

समाधान-

प का सवाल अधूरा है। आप ने यह नहीं बताया कि आप को उक्त मुकदमे का समन मिला है या नहीं? यदि मिल गया है तो तय तिथि पर न्यायालय में उपस्थित होइए, वकील कीजिए और उसे अपने मुकदमे की जिम्मेदारी दीजिए। वह आप की ओर से उत्तर प्रस्तुत करेगा।  आप ने जो तथ्य तथा परिस्थितियाँ इस प्रश्न में बताई हैं उन के आधार पर प्रतिरक्षा करना संभव है।  इन तथ्यों को  साबित करने वाले दस्तावेज प्रस्तुत कीजिए और अपने कथनों का शपथ पत्र प्रस्तुत कीजिए। न्यायालय को निर्णय लेने दीजिए कि आपकी पत्नी की मांग उचित है या नहीं? यदि किसी कारण से न्यायालय का निर्णय आप को उचित न लगे तो आप उस की अपील कर सकते हैं।

दि आप को समन नहीं मिला है और मुकदमे की जानकारी हो गई है तो भी आप न्यायालय में उपस्थित हो कर आप की पत्नी के आवेदन में अपनी ओर से प्रतिरक्षा कर सकते हैं। लेकिन यदि आप ने न्यायालय से बचने का मन  बना रखा हो तो यह बिलकुल गलत होगा। क्यों कि एक आवेदन का निपटारा तो केवल दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद ही हो सकता है। इसलिए न्यायालय तो आप को जाना होगा और अपने विरुद्ध मुकदमे में अपना पक्ष रखना होगा।

न्यायालय दोनों पक्षों की सुनवाई के उपरान्त ही उचित आदेश पारित करेगा। तब उस आदेश की पालना आप नहीं करेंगे तो आप के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाएगा जिस में आप को 20000 रुपए तक के जुर्माने और एक वर्ष तक के कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

दि आप की समस्या यह है कि आप के पास पैसा नहीं है और आप वकील नहीं कर सकते तो आप विधिक सहायता के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में आवेदन कर सकते हैं और कह सकते हैं कि आप निर्धन व्यक्ति हैं जिस की आय नहीं है अथवा अत्यल्प है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण आप को वकील उपलब्ध करवा देगा।

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