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बँटवारा कैसे किया जाए?

समस्या-

नटवर साहनी ने गोबरा नवापारा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

क्या पैतृक सम्पति का बँटवारा करवाने पर बटवारा करने वाला जीवित न रहने पर मान्य रहता है?  क्या बटवारा नामा बिना पंजीकृत मान्य रहता है? क्योंकि वह पंजीकृत करवाने में असहाय है।

समाधान-

किसी भी साझी संपत्ति का बँटवारा आपसी सहमति से हो सकता है। यदि साझीदार या परिवार किसी एक व्यक्ति के द्वारा सुझाए गए बंटवारे पर सहमत हों तो वैसे भी किया जा सकता है। पर सभी साझीदारों की सहमति जरूरी है। एक बार बँटवारा हो जाने पर और सब के अपने अपने हिस्से पर काबिज हो जाने पर एक लंबे समय तक स्थिति वैसे ही बने रहने पर उस बँटवारे को चुनौती देना संभव नहीं होता है।

यह बँटवारा मौखिक हो कर बँटवारे के अनुसार संपत्ति का कब्जा सब को मिल जाने पर उस का निष्पादन हो जाता है। बँटवारे के कुछ समय बाद चाहेँ तो सारे साझीदार बँटवारे का स्मरण पत्र लिख कर उस पर सभी के हस्ताक्षर और गवाहों के हस्ताक्षर करवा कर उसे नौटेरी से प्रमाणित करा कर रख सकते हैं इसे भविष्य में किसी भी  मामले में साक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सकता है।

बँटवारा यदि लिखित में होता है तो उस का पंजीकृत होना आवश्यक है, यदि वह पंजीकृत न हुआ तो भविष्य में साक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में उस दस्तावेज का कोई महत्व नहीं रह जाता है।

बेहतर यह है कि बँटवारा पंजीकृत हो। यदि नहीं होता है तो बँटवारा मौखिक हो और बँटवारे के मुताबिक संपत्ति पर पृथक पृथक कब्जे दे दिए जाएँ और उस के बाद बँटवारे का स्मरण पत्र नौटेरी से निष्पादित करा लिया जाए तो वह पर्याप्त है।

पिता की संपत्ति में पुत्री का हिस्सा है वह बँटवारे का वाद संस्थित कर सकती है।

समस्या-

वत्सला कुमारी ने पटना, बिहार से  समस्या भेजी है कि-

म लोग तीन बहन और एक भाई है। तीनों बहन औार भाई की शादी हो चुकी है। भाई का एक बेटा है। एक बहन की एक बेटी है। एक बहन की कोई संतान नहीं है। हमारे दो संतान है, एक बेटा और बेटी है। हमारे दादा जी के दो मकान हैं। एक मकान जिला-पटना, राज्य-बिहार में है जो पटना पीपुल्स कॉपरेटिव से सन् 1968 में खरीदी गई थी, और दूसरा मकान जिला-मुंगेर, राज्य-बिहार में है जो सन् 1969 में मेरे दादा जी ने अपने भाई से खरीदा था जो खास महल की जमीन पर बनाया हुआ है। मेरे दादा जी को एक ही संतान मेरे पिताजी थे। मेरे दादा जी का देहांत सन 1983 में, पिताजी का देहांत सन 1999 में तथा मेरे माता जी की देहांत सन 2017 में हुई। मेरे भाई ने पिताजी की देहांत के बाद पटना के मकान जो पिपुल्स कॉपरेटीव में हैं बिना किसी सूचना के अपना नाम सन् 2000 में अपना नाम से करबा लिया। उक्त मकान का विभाजन किस प्रकार किया जा सकता है। मेरा भाई दोनों मकान पर अपना दावा करता है। क्या उक्त मकान पर हमारा अधिकार है?

समाधान-

दोनों मकान आप के दादा जी ने 1956 के बाद खरीदे थे। आप के दादाजी और पिता जी की संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 के अनुसार तय होगा। आप के दादाजी के देहान्त के बाद यदि दादी जीवित रही होंगी तो इन दोनों मकानों के दो हिस्सेदार आप के पिता और आप की दादी हुईं। दादी के देहान्त के बाद केवल आप के पिता उस के स्वामी हुए। अब पिता के तीन बेटियाँ और एक पुत्र है। माताजी का देहान्त भी हो चुका है। ऐसी स्थिति में तीनों पुत्रियाँ और एक पुत्र कुल संपत्ति के ¼ एक चौथाई हिस्से के स्वामी हैं। बंटवारा होने पर चारों को बराबर के हिस्से प्राप्त होंगे।

आप ने लिखा है कि भाई ने मकान अपने नाम करा लिया है। तो अधिक से अधिक यह हुआ होगा कि भाई ने नगर पालिका या नगर निगम में नामान्तरण करवा लिया होगा। लेकिन नामान्तरण से किसी अचल संपत्ति का स्वामित्व निर्धारित नहीं होता है। आप के पिता के देहान्त के साथ ही संपत्ति चारों संतानों की संयुक्त हो चुकी थी। चारों का यह स्वामित्व केवल किसी स्थानान्तरण विलेख ( विक्रय पत्र, दानपत्र, हकत्याग पत्र) आदि के पंजीयन से ही समाप्त हो सकता है अन्यथा नहीं। इस तरह सभी संतानें एक चौथाई हिस्से की अधिकारी हैं।

हमारी राय है कि आप को आप के पिता की समस्त चल अचल संपत्ति के विभाजन के लिए वाद संस्थित कर देना चाहिए। यह वाद पटना या मुंगेर दोनों स्थानों में से किसी एक में किया जा सकता है। आप पटना रहती है  तो वहाँ यह  वाद संस्थित करना ठीक रहेगा। इस काम में जितनी देरी करेंगी उतनी ही देरी से परिणाम प्राप्त होगा। इस कारण बिना देरी के यह काम करें।

संयुक्त संपत्ति में विधवा दादी का हिस्सा है और वे उस का बंटवारा करा सकती हैं।

समस्या-

राजीव गुप्ता ने सकरा, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के नाम से कुछ ज़मीन और मकान की ज़मीन है, मगर सारी पुश्तैनी है। मेरे पापा 4 भाई हैं दादा गुज़र चुके हैं मेरे पापा ओर चाचा को ज़मीन घर बनाने के लिए मौखिक रूप से बाँट दिया गया। हम सबका 20 साल से मकान पर समान रूप से क़ाबिज हैं। दिल्ली में भी ह्मारा 1 मकान है जो मेरी माँ के नाम है मेरे छोटे चाचा ने उसपर दावा किया था। लेकिन हम केस जीत गये अब चाचा और दादी मिलकर उस मकान का बदला लेने के लिए गाँव की ज़मीन चाचा के नाम करना चाहती है। क्या मेरी दादी का भी मेरे दादा की पुश्तैनी ज़मीन में अधिकार है? वो ऐसा बदला लेने के लिए कर रही है। एक बात और ह्मारा मकान पर 20 सालों से क़ब्ज़ा तो है मगर ज़्यादा प्रूफ सर्टिफिकेट नहीं हैं। चुनाव का पहचान पत्र, ओर स्कूल सर्टिफिकेट हैं। हम दादी का पूरा खर्च उठाने को भी तैयार हैं, मगर वो अब तैयार नहीं है। इससे पहले 20 साल तक हमने ही उनकी सेवा की है। क्या हमें अब मकान बनाने के बाद इस में से दादी को हिस्सा देना होगा?

समाधान-

दि आप के गाँव की संपत्ति पुश्तैनी है तो उस में दादी का हिस्सा तो अवश्य है। लेकिन पुश्तैनी संपत्ति में जिसे वास्तव में सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। पुरुष संतानों का जन्म से ही अधिकार होता है, 2005 से पुत्रियों का भी जन्म से अधिकार हो गया है। यदि संयुक्त /सहदायिक संपत्ति में हिस्सेदार की मृत्यु होती है तो उस का उत्तराधिकार वसीयत से अथवा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होगा न कि उत्तरजीविता के पुराने नियमों से। इस कारण दादी का उस में हिस्सा है।

आप के पिता का कुछ तो हिस्सा तब भी था जब दादाजी जीवित थे। फिर दादा जी की मृत्यु के समय कुछ हिस्सा उन से उत्तराधिकार में मिला है। इस तरह आप के अधिकार में काफी हिस्सा आ सकता है। दादी का हिस्सा भी बहुत थोड़ा होगा। आप बंटवारे में कह सकते हैं कि आप के पिता को यह जमीन दादा ने मकान बनाने के लिए दी थी।  मकान आप के पिताजी ने अपनी आय से बनाया है। आप यह साबित कर देते हैं कि मकान आप के पिता ने अपनी निजी आय से बनाया है तो बंटवारे में उस का भी ध्यान रखा जा सकता है।

बेहतर तो यह है कि आप इस तरह अंदाज लगाना बंद करें। यदि दादी चाचा के नाम वसीयत करती हैं या दादी बंटवारे का वाद करती हैं तो आप के पिताजी अपने अधिकार के लिए लड़ सकते हैं। बंटवारा भी होता है तो हमारी राय में आप के पिता दादी के आंशिक हिस्से की राशि का भुगतान कर के अपना बनाया हुआ मकान पर अपना पूर्ण स्वामित्व प्राप्त कर सकते हैं।

मुस्लिम विधि में पत्नी, पुत्रियों व भाई का उत्तराधिकार में हिस्सा।

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने एक जमीन 1998 में खरीदी थी। मेरे पति की मृत्यु हो गयी। उन से मेरी चार लड़कियाँ हैं। मेरा और मेरी लड़कियों का जमीन में कितना कितना हिस्सा होगा। मेरे देवर जो मेरे पति के सगे भाई हैं उन का क्या हक है, जब कि वह जमीन उन की पुश्तैनी नहीं है यह जमीन मेरे पति ने अकेले ही खरीदी थी। कृपया मुस्लिम ला के मुताबिक पूरी जानकारी दें।

समाधान-

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में पुश्तैनी जमीन जैसा कोई सिद्धान्त नहीं है और कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। जो भी संपत्ति होती है वह व्यक्तिगत होती है हाँ यदि किसी मृतक व्यक्ति की संपत्ति का बंटवारा न हो और किसी उत्तराधिकारी की पहले ही मृत्यु हो जाए तो वैसी संपत्ति में मृतक का हित बना रहता है और वह उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाता है। इस तरह आप के पति की जमीन चाहे उन्हों ने खुद खरीदी हो या पूर्वजों से प्राप्त हुई है वह व्यक्तिगत ही है।

मुस्लिम विधि के अनुसार आप के पति की संपत्ति में से 1/8 आप को, 2/3 सभी लड़कियों को मिला कर और 1/6 हिस्सा आप के पति के भाई अर्थात आप के देवर को मिलेगा। शेष बचा हुआ हिस्सा भी लड़कियों को मिलेगा। आप अपने पति की संपत्ति के 24 हिस्से बनाएँ, उस में से 3 हिस्से आप के, 4 हिस्से आप के देवर के तथा 17 हिस्से लड़कियों को संयुक्त रूप से प्राप्त होंगे।। प्रत्येक लड़की को कुल संपत्ति का 4.25 हिस्सा मिलेगा।

संयुक्त संपत्ति के किसी भी हिस्से का विकास करने के पहले विधिपूर्वक बंटवारा करें।

समस्या-

ज्ञानेन्द्र कुमार रूँठाला ने जयपुर, राजस्थान समस्या भेजी है कि-

म चार भाई हैं, जिनमें से दो जयपुर में इसी मकान में रहते हैं. पिता का निधन हो चुका है. माता जीवित हैं. पिता ने एक वसीयत बनाई थी जो रजिस्टर्ड नहीं है पर नोटेरी है. एक भाई को मकान का जो हिस्सा दिया गया वो उन्हें पसंद नहीं है. बाकि तीन भाई उनको जो हिस्सा चाहिए, वो देने को तैयार हैं. अब बाकी तीन भाई अपनी ज़मीन पर रिहाइशी बिल्डिंग बनाना चाहते हैं. क्या चौथे भाई स्टे आर्डर ले सकते हैं. यदि हाँ तो किस कारण पर?

समाधान-

प के पिता जी की संपत्ति आप के पिता की मृत्यु के साथ ही संयुक्त संपत्ति हो गयी है। आप के पिता की जो वसीयत है वह केवल इस कारण से खारिज नहीं मानी जा सकती कि वह नोटेरी है। उस का प्रोबेट कराया जा सकता है। आप ने यह नहीं बताया कि उस वसीयत में क्या अंकित है?

आप के पिता के देहान्त के बाद आप चार भाई, आप की माँ और यदि कोई बहिन हो तो वह सब पिता की छोड़ी हुई संपत्ति में हिस्सेदार हैं। सभी हिस्सेदारों के बीच संपत्ति का बंटवारा विधिक रूप से होना चाहिए। यह या तो आपसी समझौते से हो और फिर उस पर सभी हिस्सेदारों के हस्ताक्षर हो कर वह उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा लिया जाए। या फिर बंटवारा न्यायालय के माध्यम से हो। पंजीयन में खर्च अधिक होने के कारण लोग यह सूरत निकाल लेते हैं कि बंटवारा मौखिक हो गया था और अब कुछ सप्ताह, माह या वर्ष के बाद उस का मेमोरेंड़म लिखा गया है। इस मेमोरेंडम ऑफ पार्टीशन को नोटेरी करा लें। बंटवारा हुए बिना किसी भी एक हिस्सेदार को छोड़ कर संयुक्त संपत्ति के किसी हिस्से का विकास करना हमेशा ही संकटग्रस्त हो सकता है। कोई भी हिस्सेदार न्यायालय जा कर स्टे ला सकता है।

इन सारी परिस्थितियों में हमारी राय है कि आप सभी हिस्सेदार पहले विधिपूर्वक बंटवारा कर लें, उस के बाद जो करना हो सो करें।

व्यर्थ धमकियों से न डरें, आवश्यकता होने पर कार्यवाही करें।

समस्या-

अहमद ने जिला देवरिया, (उत्तर प्रदेश) समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी के पिता जी के नाम पर एक पुश्तैनी जमीन थी जिसका बंटवारा 37 साल पहले मेरे पिता और उनके छोटे भाई ने आपसी रजामंदी से कर लिया था। मेरे पिता ने अपने हिस्से के 15*40 स्क्वायर फुट के प्लाट पर 37 साल पहले ही पक्का मकान बनवा लिया, कितु उनके भाई ने अपने हिस्से के 15*40 पर कोई निर्माण नहीं करवाया। अब मेरे पिता उनके भाई एवं भाई की पत्नी तीनों की मृत्यु हो चुकी है। मेरी माँ जीवित और स्वस्थ है। अभी तक उस पुश्तैनी जमीन के खसरे मे पिता के पिताजी का ही नाम दर्ज है,लेकिन मकान के पिछले 37 सालों की टैक्स पावती,37 साल पुरानी मकान की नंबर प्लेट की पावती मे भी पिताजी का ही नाम है।पिता की मृत्यु के बाद घर का जल कर/बिजली बिल मेरे ही नाम से आ रहा। मेरे परिवार के सद्स्यो का नाम भी राशन कार्ड में है तथा सभी के जाति/ निवास पत्र भी बने है। पिताजी के मकान का नगर निगम टाउन एरिया से स्वीकृत नक्शा भी पिताजी के नाम पर है। अब विवाद का विषय यह है कि मेरे पिता के भाई का इकलौता पुत्र 37 साल पहले हुए बंटवारे को मान नही रहा, उसका कहना है कि जमीन के खसरे मे उसके पिता के पिता का नाम है तथा बंटवारे की कोई बात नही लिखी। अब वह छल कपट मारपीट पर उतारू है। मकान और उसके पीछे मौजूद उसके खुद के प्लाट का बंटवारा करने को कह रहा। मैं ने उससे कहा कि यदि 37 साल पहले बंटवारा नही हुआ होता तो तुम्हारे पिताजी क्या यह मकान बनाने देते,अपने भाई पर केस न कर दिये होते? लेकिन वह नही मान रहा और न ही मुझ पर बंटवारे विवाद पर कोर्ट केस कर रहा क्यों कि वह जानता है कि उसका मकान मे कोई हक नहीं।  वह यही कह रहा कि अपना मकान हमको बेच दो या आधा हिस्सा दो, नहीं तो झूठे केस मे फंसाकर सबको जेल करवा देंगे। महोदय इन परिस्थितियो में मुझे क्या कदम उठाना चाहिये। इस समय मैं मध्यप्रदेश में नौकरी कर रहा हूँ,  मेरा परिवार भी साथ में है और गांव के मकान में मेरा ही ताला लगा है। किस तरह से मकान का खसरा अपने नाम से बनवा सकता हूँ। जिससे  कि भविष्य मे कभी उसे बेच सकूँ। क्या चाचा का पुत्र मेरे पिता का आधा मकान हड़प लेगा? क्या मेरे पास मौजूद डाक्युमेंट से मेरे नाम से खसरा बन जाएगा??  कृपया उचित सलाह दीजिए मै क्या करूं?

समाधान-

कानून और अदालत से तो वह आप के मकान में हिस्सा लेने में असमर्थ है। इसी से वह आप को उलझाने की धमकी देता है। यह सब वह स्थानीय दोस्तों आदि के सिखाए में कहता है। उसे लगता है कि आप परदेसी हो गए हैं। मकान बेचेंगे ही, उसे सस्ते में पल्ले पड़ जाएगा। आप सख्त बने रहें, और यदि वे लोग न्यूसेंस करने की कोशिश करे तो उस की पुलिस को रिपोर्ट कराएँ। साथ के साथ गाँव में मित्र बनाए रखें जिस से आप को वहाँ के हालात की जानकारी मिलती रहे। कोरी धमकियों के आधार पर कोई भी कार्यवाही करना उचित नहीं है, धमकियों को आप प्रमाणित नहीं कर सकेंगे। बेहतर है दृढ़ता बनाए रखें। चचेरा भाई यदि कुछ न्यूसेंस करे तो उस के विरुद्ध अपराधिक कार्यवाही तो करें ही। मकान पर कब्जा करने की उस की कोशिश के विरुद्ध न्यायालय से स्थगन भी प्राप्त करें। आप का मामला परिस्थितियों के अनुसार कार्यवाही करने का है। इस कारण गाँव के जिले के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर जिस तरह की कार्यवाही वे उचित समझें करें। व्यर्थ मुकदमेबाजी में भी न पड़ें।

जो बंटवारा चाहता है उसे कार्यवाही करने दें।

समस्या-

सुनील शर्मा ने कोटा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी ने उनके चारो बेटो को बराबर जमींन बाट दी, लेकिन जमीन नाम पर नहीं हुई। सिर्फ एक पेपर पर लिखा है और सभी के साइन हैं उस पर। लेकिन हमारे हिस्से की जमीन में शहर का रोड निकल गया हे तो बाकी के भाई उस जमींन में हक़ मांग  रहे हैं।  हमें हमारी जमीन अपने नाम पर करवानी है। दादा जी का देहांत हो गया है।

समाधान-

दि आप के दादाजी सभी बेटों को बराबर जमीन बांट गए थे तो उन्हें उसी समय राजस्व रिकार्ड में अलग अलग खाते बनवा देने चाहिए थे, यह काम वे जीतेजी नहीं कर गए। उन की मृत्यु के उपरान्त भी बंटवारा किया जा कर सब के खाते अलग अलग करवा लेने चाहिए थे। लेकिन तब भी नहीं हुआ। अब दादाजी की जमीन का रिकार्ड एक साथ है और उस में सभी पुत्रों के नाम अंकित हैं। इस कारण सारी जमीन अभी तक संयुक्त स्वामित्व मे ंहै। हो सकता है जमीन के कब्जे अलग अलग हों, लेकिन स्वामित्व सारी जमीन पर सब का है।

आप के पास जो दस्तावेज है यदि वह  किसी मौखिक बंटवारे के स्मरण पत्र के रूप में है और उस पर सभी हिस्सेदारों के हस्ताक्षर हों तो न्यायालय उसे बंटवारे के समान मान सकता है। पर इस के लिए आप को कानूनी कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। यदि आप कानूनन बंटवारा करेंगे तो भी सब को आज की स्थिति में बराबरी से देखा जाएगा और सब को समान रूप से हिस्सा मिलेगा। यदि बंटवारे के स्मरण पत्र को वैध मान लिया गया तो हो सकता है आप के कब्जे की जमीन आप के ही हिस्से में रह जाए।  यदि आप जमीन का खाता अपने नाम कराने जाएंगे तो आप को हानि ही हो सकती है। इस कारण से आपके जो भाई हिस्सा चाहते हैं उन्हें कहें कि वे अपने हक के लिए अपने हिसाब से कार्यवाही करें।

बंटवारे का वाद प्रस्तुत कर न्यायालय से बंटवारा कराएँ।

समस्या-

उमाकान्त ने देवी तहसील सौसर, जिला छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी ने अपने जीवनकाल में कोई बंटवारा नहीं किया और न ही नाप के हिसाब से जोतने के लिए दिया। लेकिन उन की मृत्यु के बाद जिन्हें जोतने को ज्यादा मिला वे बंटवारा नहीं चाहते लेकिन बाकी हिस्सेदार बंटवारा चाहते हैं। हमन कुछ कानूनी कार्यवाही की लेकिन उन्हों ने जानपहचान से रद्द करवा दी। बताए हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने क्या कानूनी कार्यवाही की यह नहीं बताया। हमें लगता है कि आप ने कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की बल्कि आप राजस्व अधिकारियों को फिजूल मैं आवेदन देते रहे। अब आप की समस्या का हल न्यायालय द्वारा बंटवारे में है। आप ने यह भी नहीं बताया है कि दादाजी के देहान्त के बाद नामान्तरण भी हुआ है या नहीं। यदि नहीं हुआ है तो नामान्तरण कराना चाहिए।

यदि नामान्तरण हो गया है तो ठीक वर्ना नामान्तरण की कार्यवाही के साथ साथ आप को चाहिए कि आप राजस्व न्यायालय में अपनी जमीन के बंटवारे, खाते अलग अलग करने और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाए जाने के लिए वाद प्रस्तुत करें। बाकी सभी हिस्सेदार और राज्य सरकार जरिए तहसीलदार पक्षकार बनेंगे। यह वाद तब तक चलेगा जब तक कि बंटवारा हो कर सब को अपने अपने हिस्से पर अलग कब्जा न मिल जाए।

अपना खाता अलग कराने और पृथक कब्जा प्राप्त करने के लिए बंटवारे का वाद संस्थित करें।

समस्या-

रोहन ने लुधियाना, पंजाब से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना का देहान्त2015 में हुआ। वो हमारे साथ लुधियाना ही रहते थे। सारी संपत्ति हरदोई उत्तर प्रदेश में है। मृत्यु के पहले उन्हों ने वसीयत की इच्छा की थी, वो हमने करवाई। उन्हों ने 4 हिस्सों में अपनी सम्पति वसीयत की क्यों कि उनके 3 लड़के थे। चौथा हिस्सा उन्हों ने हमारी मां को वसीयत किया। उत्तराधिकार में उस सम्पति का नामान्तरण नायब की कोर्ट से 3 लोगो के हक़ में था। बाद में वसीयत दाखिल की हमने और तहसीलदार ने पंजीकृत वसीयत के आधार पर मेरी माँ का नाम भी नामान्तरण करवा दिया। समस्या ये है कि आर्डर के 70 दिन बाद एक मामा ने आर्डर के खिलाफ अपील की है। क्या अपील अवधि बाधित नहीं है?  क्या नामान्तरण हो जाने से भी हमें कोई लाभ नहीं मिलेगा? नाना ने चौथा हिस्सा हमारे नाम किया है क्या उस पे हम कब्जा नहीं ले सकते।  वसीयत के समय छोटे मामा साथ थे, उन्होंने हमारे हक़ में एफिडेविट भी लगाया था । क्या एसडीएम ऑर्डर बदल सकते हैं। हम को कब्जा कैसे मिलेगा एग्रीकल्चर लैंड का,वो 14 बीघा का है? उसका पार्टीशन कैसे करवाए? उसका अलग खाता कैसे करवाएँ?

समाधान-

दि  किसी नामान्तरण के मामले में वसीयत प्रस्तुत हो और  उसे चुनौती दी जाए तो तहसलीदार या नायब उस मामले में नामान्तरण नहीं कर सकता। वैसी स्थिति में नामान्तरण कराने के लिए न्यायालय ही जाना होगा। इस  मामले में आप ने जब वसीयत पेश की तो तहसलीदार ने अन्य पक्षकारों को बुलाया या नहीं या आपत्तियाँ ली या नहीं उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अपील तो व्यथित पक्षकार का अधिकार है, इस कारण उस पर सुनवाई होगी और तभी उस का निर्णय होगा। अपील यदि अवधि बाधित है तो आप अपील में यह आपत्ति ले सकते हैं। यदि वसीयत में कोई खेोट नहीं है तो अपील भी आप की माँ के पक्ष में निर्णीत हो जाएगी। लेकिन अपील आप के हक में निर्णीत हो जाने मात्र से आप को जमीन का कब्जा नहीं मिल जाएगा। .

नामान्तरण से किसी भी कृषि भूमि में उस के हिस्सेदारो का हिस्सा निर्धारित हो जाता है लेकिन भूमि संयुक्त बनी रहती है उस पर सभी हिस्सेदारों का संयुक्त स्वामित्व बना रहता है। अलग अलग खाता करने के लिए और अपने खाते की भूमि पर अलग कब्जा प्राप्त करने के लिए आप की माता जी को संयुक्त स्वामित्व की भूमि के बंटवारे और अपने हिस्से पर कब्जा दिलाए जाने का दावा करना पड़ेगा। चूँकि नामान्तरण आज भी आप के पक्ष में है इस कारण आप यह दावा तुरन्त कर सकते हैं। आप को अपील का निर्णय होने का इन्तजार किए बिना बंटवारे का दावा कर देना चाहिए।

हिस्से के लिए विभाजन का वाद करें।

समस्या-

हेमन्त मिश्रा ने अजमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं जिस मकान में रहता हूँ वो मेरे दादाजी के नाम है। उनकी कोई वसीयत नहीं है, रजिस्ट्री की कॉपी मेरे पास है। ओरिजनल रजिस्ट्री मेरी दादी और बुआ ने गायब कर दी है। मेरे दादाजी का देहांत 1992 में हो गया था। मेरे पिताजी का देहांत भी 2015 में हो गया है। अब घर में मैं, दादी, मम्मी, एक क्वांरी बहिन, मेरी पत्नी और मेरा बच्चा रहता है। हम यहाँ लगभग 30 साल से रह रहे हैं। अब दादी कहती है कि मैं अपनी लड़कियों को हिस्सा या इस मकान को बेच कर पैसे दूंगी। तुम सब जाओ यहाँ से ये मेरे पति का घर है। जबकि मेरे पिताजी ने अपनी बहनों (5) में से (3) की शादी की। अपने जीवित समय तक सारी रस्में निभाई। पर अब दादी अपनी उम्र का फायदा उठा कर मुझे और बाकी सब को परेशान करती रहती है। उन्होंने मेरी छोटी बुआ के साथ मिलकर मेरे खिलाफ झूठी पुलिस कंप्लेन भी की थी। इसके कारण मैं बहुत परेशान रहता हूँ। मैंने घर का हिस्सा करने की बात भी कह दी उनसे पर न तो दादी हिस्सा कर रही है न कोई वसीयत और न ही घर में कुछ मरम्मत करवाती है। घर भी जर्जर हो रहा है। मैं इसमें पैसे लगाने से डरता हूँ क्यूंकि कब दादी और बुआ मिलकर क्या कर दे कुछ पता नहीं। कुछ समाधान बताये।

समाधान-

दि मकान की रजिस्ट्री की मूल प्रति आप को नहीं मिल रही है तो उस की फोटो कॉपी में दर्ज विवरण के आधार पर रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रतिलिपि सहायक कलेक्टर स्टाम्प के यहाँ से प्राप्त की जा सकती है।

मकान दादा जी के नाम था। इस कारण उन की मृत्यु के उपरान्त आप की दादी, आप के पिता और आप की 5 बुआओं के कुल सात हिस्से हुए। इस में से एक हिस्सा आप का है। आप के पिता ने अपनी बहनों का विवाह किया है तो वह उन का पारिवारिक दायित्व था। इस से बहनों का अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा कम नहीं हो जाता है।

आप की दादी आप के कहने पर भी हिस्से नहीं कर रही है तो आप न्यायालय में विभाजन का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि आप की बुआओं में से कोई अपना हिस्सा नहीं लेना चाहती है तो उस से आप अपने नाम या अपनी माँ के नाम रिलीज डीड करवा सकते हैं। यदि आप विभाजन का वाद प्रस्तुत करने के पहले बुआओं से रिलीज डीड पंजिकृत करवा लेते हैं तो बेहतर होगा।

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