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किशोरों को अपनी समस्याएँ अपने अभिभावकों को बतानी चाहिए, न कि खुद समाधान खोजने में लगना चाहिए।

private schoolसमस्या-

रूपबास, भरतपुर, राजस्थान के एक किशोर भुवनेश्वर शर्मा ने तीसरा खंबा को समस्याएँ भेजी हैं-

1- हम एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं सभी बच्चे कक्षा टेंथ में पढ़ते है। हमारे यहां पर सामाजिक का कोई टीचर नहीं है क्या यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है या नहीं? कक्षा 10 राजस्थान बोर्ड की बोर्ड क्लास है, बच्चे सामाजिक में फेल भी हो सकते है। वहां पर सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाला कोई टीचर नहीं है, प्रधानाध्यापक से कहते हैं तो कहती हैं कोई बुराई नहीं, इस टीचर से सामाजिक विज्ञान पढ़ने में। इस के लिए कहां शिकायत करनी चाहिए?

2- एक व्यक्ति ऑफिस में लिपिक के पद पर कार्यरत है उसे उस की जाति से जाना जाएगा अथवा नाम से?

3- एक मास्टर है जो बच्चों के चूतड़ पर डंडा मारता है उस पर कोई कार्यवाही हो सकती है?

4- मिनरल वाटर का पानी खराब आने की सूचना हम कहां दे वाटर प्लांट सरकारी है?

5- हमने एक दुकानदार से एक नया सिम कार्ड खरीदा अब उसी पहचान पत्र की फोटो कॉपी करवाकर दुकानदार ने हमारे आईडी कार्ड और फोटो से अन्य सिम खरीद रखी है। उस के लिए क्या करना चाहिए? हमें कहां दावा पेश करना चाहिए?

6- हमने दुकानदार से नया मोबाइल खरीदा था। अब मोबाइल खराब हो गया है और वह गारंटी में है। वह दुकानदार उस मोबाइल को सर्विस सेंटर पर नहीं ले जा रहा है इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

7- हमने दुकानदार से एशियन पेण्ट  की पांच किलो की बाल्टी खरीदी अब उस बाल्टी में ऊपर पानी निकल आया है, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

8- मेरे दादा जी ने एक व्यक्ति के गाल पर थप्पड़ मार दिया था वह जाति से जाट है क्या वह हम पर दावा कर सकता है?

समाधान-

कुछ दिन पहले इस किशोर ने तीसरा खंबा के ई-मेंल बाक्स में प्रश्नों की लाइन लगा दी और उसे भर दिया। हम इस किशोर की अपनी, अपने साथियों, परिवार और समाज की चिन्ता करने की प्रवृत्ति की सराहना करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान खुद खोजने की प्रवृत्ति एक अच्छा गुण है। आगे चल कर यह प्रवृत्ति इस किशोर में नेतृत्वकारी गुण पैदा कर सकती है। लेकिन इस उम्र में जब कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी है उसे इन चिन्ताओं से मुक्त होना चाहिए। उसे ये चिन्ताएँ अपने अभिभावकों को बतानी चाहिए और स्वयं इन चिन्ताओं से मुक्त हो जाना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे इन चिन्ताओं को दूर करने के लिए प्रयास करें। किशोरों का काम है कि वे अपने अध्ययन पर अधिक ध्यान दें। पहले ही उन के स्कूल में सामाजिक विज्ञान का शिक्षक नहीं है। इस समस्या को बच्चो ने अपनी प्रथानाध्यापिका को बताया लेकिन लगता है इस समस्या का हल उन के पास नहीं है। उन्हों ने एक अन्य विषय के अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगाया है लेकिन लगता है वह ठीक से बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहा है। जिस से बच्चों को कष्ट हो रहा है। यह बात प्रधानाध्यापिका को समझनी चाहिए और स्कूल में उपलब्ध ऐसे अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगा देना चाहिए जो बच्चों को संतुष्ट कर सके। यदि यह भी संभव नहीं हो तो यह काम खुद प्रधानाध्याप्क को करना चाहिए।

1- राजस्थान में शिक्षकों की बहुत कमी है। सरकार नए शिक्षक भर्ती नहीं रही है। उस के स्थान पर उस ने सैंकड़ों विद्यालयों को बन्द कर के उन्हें समामेलित कर दिया है। इस से बच्चों को दूर दूर स्कूलों में जाना पड़ रहा है। फिर भी समस्या का अन्त नहीं हुआ है। इस से स्पष्ट है कि राज्य का धन बचाने का जो जुगाड़ सरकार ने निकाला था वह ठीक नहीं था। बच्चों के अध्ययन का पैसा बचा कर आप कैसा भारत बनाना चाहते हैं? ऐसा भारत या तो अशिक्षित होगा या फिर अर्ध शिक्षित, न घर का न घाट का।

स समस्या का कानूनी हल यह है कि बच्चे राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को जो कि जोधपुर में बैठते हैं एक पत्र लिख कर स्कूल के अधिक से अधिक बच्चों के हस्ताक्षर करवा कर भेजें और उन से प्रार्थना करें कि वे राज्य सरकार के शिक्षा विभाग को रिट जारी कर यह निर्देश दें कि बच्चों की इस कमी को पूरा किया जाए। यदि स्कूल सरकारी न हो कर प्राइवेट है तो सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। क्यों कि यह सरकार का कर्तव्य है कि उस के राज्य में ऐसा निजी स्कूल संचालित न हो जिस में विषयों को ठीक से पढ़ाने वाले अध्यापक ही न हों।

2- किशोर ने दूसरी समस्या लिखी है कि कोई व्यक्ति अपने नाम से जाना जाएगा या उस की जाति से? हालांकि हमारे संविधान ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का अधिकार दिया है। लेकिन यह अधिकार उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए दिया है, इस लिए नहीं कि यह उन की पहचान बन जाए। सही बात तो यह है कि किसी भी व्यक्ति को उस की जाति से नहीं पहचाना जाना चाहिए। उसे उस के नाम से ही पहचाना जाना चाहिए। लेकिन यह सब बातें समाज के समक्ष धरी की धरी रह जाती हैं। समाज में एक व्यक्ति अन्ततः अपने काम से पहचाना जाता है। भले ही लोगों को यह पता हो कि गांधी, नेहरू, अम्बेडकर, भगतसिंह आदि की जाति क्या है। लेकिन वे अपनी अपनी जातियों से नहीं अपितु अपने अपने कामों से जाने जाते हैं। इस कारण दीर्घकाल तक लोग केवल उन के काम से पहचाने जाते हैं।

3- अध्यापक का काम बच्चो को शिक्षा प्रदान करना है। उन्हें दंडित करना नहीं। किसी भी स्थिति में किसी भी विद्यार्थी को शारीरिक या आर्धिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। यदि शिक्षक की उचित बात को बच्चे नहीं मानते हैं तो कमी शिक्षक में है, बच्चो में नहीं। यह शिक्षक का कर्तव्य है कि वह ऐसे तरीकों की खोज करे जिस से बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान की जा सके। ऐसे शिक्षक की शिकायत बच्चों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। अभिभावक इस मामले में स्कूल के प्रधानाध्यापक से और जिला शिक्षाधिकारी से शिकायत कर सकते हैं। यदि समस्या का समाधान फिर भी न हो तो अभिभावक सीधे पुलिस या न्यायालय में परिवाद संस्थित कर सकते हैं।

4- मिनरल वाटर खराब आने की शिकायत भी किशोरों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। इस मामले में अभिभावक अपने इलाके के खाद्य विभाग के निरीक्षक और अधिकारी को लिखित में शिकायत कर सकते हैं। यह उस का दायित्व है कि वह उचित कार्यवाही करे। यदि वह कार्यवाही नहीं करता है तो जिला कलेक्टर को शिकायत लिखी जा सकती है और मिनरल वाटर खरीदने वाला व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय में भी परिवाद प्रस्तुत कर सकता है।

5-किशोर कोई सिम कार्ड नहीं खरीद सकता। सिम कार्ड अवश्य ही किसी वयस्क ने खरीदा होगा। उस वयस्क को चाहिए कि वह इस की शिकायत पुलिस को करे। किसी व्यक्ति की आई डी से स्वयं कोई सिम खरीद लेना अत्यन्त गंभीर अपराध है। लेकिन शिकायत करने के पहले यह शिकायतकर्ता को चाहिए कि वह जाँच ले कि ऐसी गलत सिम का फोन नं. क्या है?

6-मोबाइल खराब हो जाने पर उपभोक्ता को सीधे सर्विस सेन्टर जाना चाहिए जो मोबाइल बनाने वाली कंपनी का होता है। इस मामले में दुकानदार की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह मोबाइल को सर्विस सेन्टर नहीं ले जाएगा।

7-एशियन पेंट्स खऱाब निकलने पर दुकानदार से बदल कर नया डब्बा देने का आग्रह करना चाहिए। यदि वह सुनवाई न करे तो दुकानदार और कंपनी के विरुद्ध उपभोक्ता न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

8- आप के दादा जी ने किसी व्यक्ति को थप्पड़ मार दिया था तो उस के परिणाम की चिन्ता भी दादा जी को करनी चाहिए, उन के पोते को नहीं। पोते को सिर्फ उस की पढ़ाई करनी चाहिए। थप्पड़ खाया हुआ व्यक्ति चाहे तो न्यायालय में परिवाद कर सकता है और अपमान के लिए क्षतिपूर्ति चाहने के लिए दीवानी वाद भी कर सकता है। लेकिन पुलिस इस मामले में कार्यवाही नहीं कर सकती। थप्पड़ खाने वाला जाट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि वह व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति या जनजाति का होता तो पुलिस इस मामले में कार्यवाही कर सकती थी। जिस में दादा जी को गिरफ्तार किया जा सकता था। हाँ, आप दादाजी को समझा सकते हैं कि लोगों के साथ मारपीट करने और उन्हें गालियों से नवाजने का जमाना कब का समाप्त हो चुका। अब हर एक को सभ्यता से एक इन्सान की तरह पेश आना चाहिए। समाज में औरों से सभ्यता से पेश आने वालों का ही सम्मान होता है।

विवाह या दत्तक ग्रहण से जाति नहीं बदलती।

rp_indian-lawyer.jpgसमस्या-

राजकुमार शर्मा ने इन्द्रा कालोनी, काठघर, गुलाबबाड़ी, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं सामान्य श्रेणी में हूँ, लेकिन मेरी पत्नी ओबीसी श्रेणी से है। क्या उसे ओबीसी होने का लाभ शिक्षा विभाग में मिल सकता है? उस के जाति प्रमाण पत्र में पति के स्थान पर मेरा नाम है।

समाधान-

ब आप अपनी पत्नी के पति हैं तो जाति प्रमाण पत्र में पति के स्थान पर आप का ही नाम होगा। लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि जाति प्रमाण पत्र ओबीसी जाति के लिए बना है अथवा नहीं। क्यों कि ओबीसी श्रेणी में आरक्षण का लाभ लेने के लिए यह जरूरी है कि जो व्यक्ति लाभ लेना चाहता है उस का ओबीसी श्रेणी का प्रमाण पत्र बना हुआ हो।

किसी भी व्यक्ति की जाति जन्म से होती है और विवाह तथा दत्तक ग्रहण से वह नहीं बदलती है। आप की पत्नी की जाति आज भी ओबीसी ही है। उस की जाति केवल इस आधार पर बदल सकती है कि उसे दूसरी जाति ने अपनी जाति में शामिल कर लिया हो,  उसे वे अपनी जाति का सदस्य मानते हों और उस जाति ने उसे पूरी तरह से अपना लिया हो। इस संबंध में पूर्व में आलेख लिखे गए हैं आप तीसरा खंबा पर सर्च कर के उन्हें पढ़ें।

सरकारी नौकरी चाहते हैं तो दूसरी संतान के उपरान्त किसी संतान को जन्म न दें।

rp_judge-caricather11.jpgसमस्या-

दारा सिंह ने तारानगर, चूरू, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दो लड़कियाँ हैं, मेरे घर वाले चाहते हैं कि एक लड़का जरूर हो। मैं सरकारी अध्यापक बनना चाहता हूँ। अगर मैं अपनी एक लड़की को किसी को गोद दे दूँ तो यह संभव है क्या? या दो लड़कियों के साथ मैं अपने साले का लड़का गोद ले लूँ तो। मेरे बच्चे कितने कितने गिने जाएंगे? गोद लिए गए बच्चे को काउंट किया जाता है या नहीं?

समाधान-

पुत्र होने की अनिवार्यता की मानसिकता से आप स्वयं भी मुक्त नहीं हो सके हैं। अन्यथा परिवार के कहने मात्र से इतना सोचने की आवश्यकता नहीं थी। वैसे अब युग आ गया है जब इस मानसिकता से मुक्त हो जाना चाहिए। मेरी नजर में तो ऐसे अनेक लोग हैं जो एक पुत्री को जन्म देने के उपरान्त अब कोई और संतान को ही जन्म नहीं देना चाहते।

राजस्थान सरकार द्वारा दो संतानों के संबंध में नियुक्ति संबंधी जो नियम बनाया गया है वह निम्न प्रकार है-

“No candidate shall be eligible for appointment to the service who has more than two children on or before 1-6-2002.

Provided that where a candidate has only one child from earlier delivery but more than one child are born out of a single subsequent deliver, the children so born shall be deemed to be one entity while counting the total number of children.”

स नियम में दत्तक गए या लिए गए बालक के संबंध में कोई विवरण नहीं दिया गया है। इस तरह इस मामले में निश्चयात्मक रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

स नियम में मात्र इतना कहा गया है कि जिस व्यक्ति के दिनांक 01.06.2002 के बाद दो से अधिक संतानें होंगी वे नियुक्ति के योग्य नहीं होंगे। स्पष्टीकरण में केवल यह छूट दी गयी है कि यदि किसी व्यक्ति के पहली संतान होने के बाद दूसरे प्रसव में एक से अधिक संतानें उत्पन्न होती हैं तो उन्हें एक ही संतान माना जाएगा।

स नियम का उद्देश्य दो से अधिक संतान जन्म देने से रोकना है। इस कारण यह समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति की उन्हीं संतानों को इस मामले में गिना जाएगा जो कि उसे स्वयं या उस की पत्नी से उत्पन्न हुए हैं। दो लड़कियों में से एक को दत्तक दे कर तथा एक संतान को दत्तक ग्रहण कर के आप एक पुत्र के पिता बन सकते हैं। लेकिन आप को फिर भी सरकारी नौकरी से बाधित न किया जाए इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, जब तक कि ऐसे मामलों में निश्चित रूप से किसी न्यायालय का निर्णय सामने न आए या सरकार स्वयं नियम का स्पष्टीकरण न करे।

स मामले में उत्तम यह होगा कि आप स्वयं राजस्थान सरकार के विधि विभाग से सूचना के अधिकार के अन्तर्गत स्पष्टीकरण मांगें और मिल जाए। लेकिन यदि आप सरकारी नौकरी के इच्छुक हैं तो अब कोई संतान उत्पन्न न करें। जब नौकरी मिल जाए तो स्वयं इस मामले में सरकार से अनुमति ले कर एक पुत्री को दत्तक ग्रहण कराने के उपरान्त अनुमति प्राप्त कर एक पुत्र को दत्तक ग्रहण कर सकते हैं।

बच्चों की जाति क्या हो?

mother_son1समस्या-

सुरेश ने सुन्दरबनी, जम्मू और कश्मीर से समस्या भेजी है कि-

मेरी माताजी ने दूसरी जाति में शादी की है और दो बच्चे हैं। मेरी माताजी की जाति अलग है, लेकिन दोनों जाति पिछड़ी जाति हैं। कुछ साल के बाद एक विवाद हुआ और वो अलग हो गये। जिसके बाद कोर्ट में केस भी चला लेकिन मेरे पिता ने उस में नहीं माना कि मेरे दो बच्चे हैं। लेकिन बाद में सभी दस्तावेज के बाद कोर्ट ने फैसला दिया कि इनको पालन-पोषण के लिए हर माह कुछ पैसे दिए जाएँ। मेरी माताजी ने वो पैसा नही लिया। अब जब बच्चें बड़े होकर शादी भी हो गई। उसके बाद हम चाहते हैं कि मेरे बच्चों का जाति मैं वो ही रखूँ जो कि मेरी माताजी की हैं क्योंकि समाज में मेरे पिताजी ने हमें कुछ भी नहीं दिया है। क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ?

समाधान-

दि आप को आरक्षण से संबंधित कोई लाभ नहीं लेना है तो आप कोई भी जाति रखें किसी को क्या फर्क पड़ता है? जाति की जरूरत तब पड़ती है जब कोई प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आवेदन देता है।

न्यायालयों के समक्ष भी इस तरह के विवाद आए हैं कि किसी व्यक्ति की जाति क्या होनी चाहिए? इस विषय पर न्यायालयों के जो निर्णय हुए हैं उन में जाति को एक सामाजिक समूह माना है जो भारत में विद्यमान हैं। इन सामाजिक समूहों में केवल वे ही लोग नहीं शामिल होते जो उन समूहों में जन्म लेते हैं, अपितु वे लोग भी सम्मिलित होते हैं जिन्हें ये समूह अपना लेते हैं। मसलन एक लड़की के विवाह के बाद यदि उस के पति का जातीय समूह उसे स्वीकार कर ले तो उस की जाति बदल जाती है। एक व्यक्ति अन्य जाति के बच्चे को गोद ले ले तब भी उस की जाति बदल जाती है। एक पुरुष किसी दूसरी जाति की महिला से विवाह कर ले और उस की खुद की जाति उसे बहिष्कृत कर दे और पत्नी की जाति उसे स्वीकार कर ले तो भी जाति परिवर्तित हो जाती है।

प का मामला कुछ भिन्न है। आप की माताजी का विवाह हुआ लेकिन फिर पति से विवाद हो गया। वे अलग हो गयीं और बच्चे भी उन के साथ ही रहे। पिता पर खर्चा देने का आदेश अदालत से जरूर हुआ लेकिन पत्नी ने खर्चा नहीं लिया और बच्चों का पालन पोषण खुद किया।

स परिस्थिति में जरूरी बात यह है कि आप की माताजी पति से विवाद होने पर कहाँ रहीं। क्या वे मायके लौट आयीं? क्या वे अपने मायके वाले लोगों और मायके वाली जाति के साथ ही रहीं? ऐसा है तो बच्चे भी अपने मामा नाना के साथ ही रहे हैं और उन की जाति ने उन्हें स्वीकार किया है। यदि इस तरह के तथ्य हों तो आप को मानना चाहिए कि आप की और आप की माताजी की जाति वही है जो आप के मामा और नाना की है। आप खुद को माता जी की जाति का बता सकते हैं।

जब आप का मन खुद आप को सताए तो क्या करें?

समस्या-1

श्री चन्द्र ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

ब पत्नी और बच्चे सताएं तो पति कहाँ जाये? मेरी पत्नी सरकारी नौकरी करती है तथा दोनों बच्चे वयस्क व अविवाहित हैं, तीनों मुझे लगभग 6 महीने पहले छोड़ कर चले गए, ये मेरी पत्नी द्वारा शादी के पहले दिन से ही रचा हुआ षड़यंत्र था क्योंकि 24 साल हुए परन्तु वो अपने पिता के दबाव में इस रिश्ते को निभाती रही। अब तक बच्चों को मानसिक रूप से इतना तैयार कर लिया था कि वो मुझ पर हाथ भी उठाने लगे थे। ( प्रश्न कर सकते हैं कि वो ऐसा क्यों करते थे तो मेरा जवाब यही है कि मै उनकी मन-मानी जिद व जवान लड़की का घर से रात को बाहर रहना पसंद नहीं करता था) जिस की मैंने पुलिस-कमिश्नर को मेल द्वारा शिकायत भी की, स्थानीय पुलिस -स्टेशन में शिकायत भी दर्ज करायी, परन्तु पुलिस हर बार समझौता कराती रही। कई बार घर छोड़ कर गयी या किसी ना किसी रूप से मानसिक परेशान करती रही। ,मै लोक-लिहाज की शर्म करता हुआ तथा घर की पूरी जिमेवारी संभालता हुआ, हर बार समझौता करता रहा। मैं भी एक सरकारी बैंक में कार्यरत हूँ, और अकेला रह कर इतना डिप्रेशन में आ गया हूँ कि नौकरी पर भी नहीं जा पा रहा हूँ। जाते-जाते घर, जो की किराये का है ,वहां से मेरे कच्छा-बनियान तक उठा ले गयी, जिस की पुलिस ने रोजनामचा रिपोर्ट दर्ज की किन्तु कोई कारवाही नहीं की। मैं किसी भी हालत में ‘तलाक’ लेना चाहता हूँ। मेरी उम्र ५२ साल व पत्नी की उम्र ४७ साल है। समझौते की कोई गुंजाईश नहीं है, तलाक ना देने की धमकी के साथ वो और उसके सगे मुझे धमकी देते हैं कि ना तो तुम्हें तलाक देंगे ना ही कोई पैसा। कोर्ट के धक्के लगवाएंगे और सड़ा-सड़ा कर मारेंगे, मेरे साथ कोई सहयोगी नहीं है। कई बार आत्म-हत्या का ख्याल आया। परन्तु अपने खानदान की इज्जत का ख्याल आ गया, पुलिस और वकील मेरी आर्थिक -दशा को देखते हुए उन्हीं के साथ हैं। वकीलों और कानूनी प्रकिया को तो आप जानते हैं कि कितने लंबे खींच जाते हैं ऐसे केस, और फिर वकीलों के चक्कर, उनकी फीस?  मैं एक कमरे में बंद हो कर रह रहा हूँ, लोक -लाज की शर्म में ,बहुत ज्यादा डेप्रेसिन में हूँ। आप कोई व्यायाम आदि की सलाह देंगे तो मैं बता दूँ कि मेरा बिस्तर तक से उठने का मन नहीं करता। बेटी  M.S.C कर चुकी है, बेटा B.S.C कर रहा है, जिसका EDUCATION -लोन भी सह-ऋणी होते हुए मुझे ही चुकाना है, क्यों की उस की अभी नौकरी नहीं लगी। मेरा सारा पैसा वो किसी ना किसी रूप में खर्च करवाते रहे, तथा बैंक-लोन भी काफी हो गया है। नौकरी पर ना जाने की वजह से सैलरी भी नहीं मिल रही है। २६ साल की नौकरी होने के बावजूद बैंक मुझे नौकरी से निकाल सकता है क्यों कि हम अपनी पूरी सर्विस के दौरान ३६० दिन से अधिक अवैनिक अवकाश नहीं रह सकते, पत्नी ब्रह्मकुमारी धर्म अपना चुकी है जिसे मैं कोर्ट में प्रूव नहीं कर सकता। परन्तु शारीरिक संबंध लगभग एक साल से नहीं बने। कृपया इस अँधेरी-जिंदगी में आप ही एक उम्मीद की किरण नजर आये हैं, मार्गदर्शन करें वर्ना आत्महत्या के अलावा मुझे कुछ नहीं सूझ रहा।

समाधान-

प की इस बात से हम मुतमइन नहीं कि शादी के पहले दिन से ही पत्नी आप के विरुद्ध षड़यंत्र कर रही थी और अब 24 वर्ष बाद उस षड़यंत्र का परिणाम सामने आया। हाँ यह हो सकता है कि आप की पत्नी आप के साथ रिश्ते को किसी दबाव में निभा रही हो। लेकिन यह दबाव पिता का नहीं अपितु एक स्त्री की सामाजिक स्थिति का माना जा सकता है। हो सकता है यह रिश्ता आप की पत्नी की इच्छा के विरुद्ध हुआ हो। वह विवाह ही न करना चाहती हो या उस के लिए तैयार न हो। वैसी स्थिति में विवाह हो जाने से तथा विवाह के उपरान्त जबरन होने वाले यौन व्यवहार ने उसे पति द्वेषी बना दिया हो। जिस का अनिवार्य परिणाम यह हुआ हो कि आप की पत्नी ब्रह्मकुमारी हो गयी हों। इस तरह की संस्थाएँ स्त्रियों की इन्हीं विपरीत परिस्थितियों का तो लाभ उठाती रही हैं।

प को इन परिस्थितियों के लिए सारा दोष अपनी पत्नी और बच्चों को देना बिलकुल बन्द करें और अपनी समस्या पर विचार करें। इन सारी परिस्थितियों का निर्माण करने में आप का, आप के परिवार का और सामाजिक स्थितियों का योगदान सब से अधिक रहा है। वास्तव में अधिकांश वैवाहिक समस्याएँ किसी एक व्यक्ति के दोष के कारण नहीं अपितु अपनी सामाजिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती हैं।

ब तक जो कुछ हुआ भूल जाएँ। पुलिस ने कुछ नहीं किया या अदालत कुछ नहीं करती, बहुत समय तक परिणाम नहीं देती। यह सब सोचना बन्द कीजिए। पुलिस का चरित्र और अदालतों की गति न आप बदल सकते हैं और न कोई और ये सब एक बड़े परिवर्तन के मोहताज हैं। ये तब बदलेंगे जब देश की राजनीति बदलेगी और समाजोन्मुखी होगी। वर्तमान राजनीति में तो सब कुछ बाजारोन्मुखी है। आप को अपना भविष्य का जीवन खुद तय करना होगा।

जो जा चुका, जा चुका उसे भूल जाइए। पत्नी और बच्चे आप को छोड़ कर जा चुके हैं। बच्चे वयस्क हैं उन की कोई जिम्मेदारी आप की नहीं है। पत्नी खुद कमाती हैं। वे आप से कुछ भी मांग सकने में समर्थ नहीं हैं। समझ लीजिए कि वे कभी आप के जीवन में नहीं थे। यदि आप की कोई संपत्ति है तो उस के आप स्वयं स्वामी हैं और उस का प्रबंधन खुद कर सकते हैं, किसी को हस्तान्तरित कर सकते हैं या उस की वसीयत कर सकते हैं। आप की समस्या अकेले रहने की है तो पत्नी और बच्चे तो आप के लिए षड़यंत्रकारी हैं, उन के साथ रहने के बजाए अकेले रहने की स्थिति अधिक बेहतर है। इसे आप को स्वीकार करना होगा। डिप्रेशन से निकलिए, उस के लिए जरूरी हो तो किसी मनोविज्ञानी से काउंसिलिंग लीजिए और बैंक की नौकरी पर जाना आरंभ कीजिए। आप का सब से बड़ा शत्रु तो आप का मन है जो आप को नौकरी जाने से रोकता है। उस की चिकित्सा कीजिए। यदि आपने बैंक की नौकरी पर जाना आरंभ कर दिया तो बहुत समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। शेष भी समाप्त होने का मार्ग तय होगा। बहुत लोग अकेले रहेते हैं जिन के पास अपने घर नहीं होते। दुनिया में स्त्री और बच्चों के अलावा भी बहुत कुछ है। संगीत, लेखन आदि कलाएँ हैं, सामाजिक कार्य हैं, आप नौकरी से बचे समय में उन में अपना मन लगा सकते हैं। आप ने लिखा है “जब पत्नी और बच्चे सताएं तो पति कहाँ जाये?” मैं इस के उत्तर में अब आप को कहना चाहता हूँ कि जब आप का मन खुद आप को सताए तो क्या करें?

प की पत्नी और बच्चे जाते जाते रोजनामचा में रपट दर्ज करा गये हैं या आप ने कराई है वह रपट दर्ज है। थाने से उस की प्रतिलिपि प्राप्त कीजिए। छह माह हो चुके हैं छह और निकल जाने दीजिए। उस के बाद आप डेजर्शन और पत्नी के ब्रह्मकुमारी पंथ में संन्यास ले लेने के आधार पर विवाह विच्छेद हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

झूठ के पैर नहीं होते

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दिनेश ने  नैनीताल, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरा विवाह 10 मई 2006 को हिंदू रीति रिवाज से हुआ था। , मेरे दो पुत्रियाँ हैं, एक 7 साल की है ओर एक 5 साल की हो चुकी है। मेरी पत्नी अपने पिता के कहने पर चलती है और नवम्बर 2006 से अपने मायके में रह रही है जब कि दोनों बेटी मेरे पास है जो स्कूल में पढ़ती हैं, मेरी पत्नी ने मुझ पर सीजेएम कोर्ट में एक वकील से आवेदन प्रस्तुत करवा कर मुझ पर 498ए, 323, 504 आईपीसी का मुक़दमा दर्ज करवाया। जिस में मुझे पुलिस के दवाब में सरेंडर करना पड़ा और मैं 3 दिन हिरासत में रहा। जब कि मैं मार्च में फॅमिली कोर्ट में धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम का आवेदन प्रस्तुत कर चुका था। क्या मुझ को कोर्ट हिरासत में भेज सकती थी जब कि चार्ज शीट अभी प्रस्तुत नहीं हुई है? ये एक महीने पहले की बात है। क्या मेरी पत्नी मुझ से हर्जे खर्चे की अधिकारी है? क्या वो मुझ से मेरी पुत्रियों की कस्टडी ले सकती है? जब कि मैं उस को बच्चे नहीं देना चाहता। मेरी पत्नी खुद मुझ को छोड़ कर अपने मायके में अपने पिता के साथ अपनी मर्ज़ी से गई है। लेकिन इस का कोई भी सबूत मेरे पास नहीं है।

समाधान-

प ने जो समस्या लिख कर भेजी है उस में कोई गलती है। 10 मई 2006 को आप का विवाह हुआ और पत्नी नवम्बर 2006 से मायके में रह रही है। फिर आप के सात और पाँच वर्ष की दो बेटियाँ कैसे हो गईं? यदि 2006 से आप की पत्नी मायके में है तो फिर 498-ए का मुकदमा कैसे हुआ? क्यों कि उस में तो घटना के तीन वर्ष बाद प्रसंज्ञान नहीं लिया जा सकता। ऐसा लगता है कि आप के विरुद्ध मिथ्या प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई गई है। आप चाहें तो इस प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त करवाने के लिए उच्च न्यायालय में निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। जब तक प्रथम सूचना रिपोर्ट न पढ़ी जाए और उस पर आप से बात न की जाए तब तक उस के बारे में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। यह काम आप के स्थानीय वकील बेहतर कर सकते हैं।

जिस्ट्रेट आप को हिरासत में भेज सकता था इस कारण ही उस ने हिरासत में रखा। जब न्यायालय को लगा कि आप को हिरासत में रखा जाना उचित नहीं है तो उस ने आप की जमानत ले ली।

झूठ के पैर नहीं होते। यदि आप के विरुद्ध मामला बनावटी और मिथ्या है तो यह न्यायालय में नहीं टिकेगा। आप को एक ही भय हो सकता था कि आप को हिरासत में न भेज दिया जाए। अब आप वहाँ हो कर आ चुके हैं इस कारण डरने का कोई कारण नहीं है। आप मुकदमे में प्रतिरक्षा करें। यदि आप के वकील ने ठीक से मामले में प्रतिरक्षा की तो मामला मिथ्या सिद्ध हो जाएगा।

प की पत्नी जब तक विवाह विच्छेद न हो जाए और दूसरा विवाह न कर ले तब तक आप से भरण पोषण का खर्च मांग सकती है। पत्नी होने के नाते उसे यह अधिकार है आप उस के लिए तभी मना कर सकते हैं जब कि आप की पत्नी के पास आय का कोई स्पष्ट साधन हो।

दि आप की पत्नी बच्चियों की कस्टडी के लिए आवेदन करती है तो न्यायालय इस तथ्य पर विचार करेगा कि बच्चियों की भलाई किस में है और उन का भविष्य कहाँ सही हो सकता है। आप की छोटी बेटी 5 वर्ष की हो चुकी है। मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी उन की कस्टड़ी आप से ले सकती है।

पकी पत्नी स्वयं आप को छोड़ कर गई है इस का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं हो सकता। लेकिन आप गवाहों के बयानों से साबित कर सकते हैं कि ऐसा हुआ है।

सहमति से विवाह विच्छेद का मार्ग बनाएँ।

husband wifeसमस्या-
अनुराग ने बरेली, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मैं मूलतः बरेली जिले का रहने वाला हूँ व अपने ही कार्यक्षेत्र (प्राइवेट) से सम्बंधित एक सजातीय वर्ग की लड़की से मेरी मुलाकात 2006 में हुई। मैं उसे प्रेम करने लगा क्यों कि कुछ समय बाद उसने अपने अतीत के बारे में मुझे लगभग काफी कुछ बता दिया जो कि आम लड़कियां कम ही बताती हैं।  उसके एक वर्ष के उपरांत दोनों ही पक्षों की पारिवारिक सहमति से मेरा विवाह 21 अप्रैल 2007 को लखनऊ में संपन्न हुआ। मेरी पत्नी अपने माँ-बाप कि इकलौती संतान है तथा शादी के कुछ महीनों के बाद हम दोनों अपने कार्य क्षेत्र दिल्ली में आकर रहने लगे। शादी के एक वर्ष बाद हम दोनों को पारिवारिक व आर्थिक स्थितियों के कारण दिल्ली से बरेली आना पड़ा। यहाँ पर मेरी पत्नी की मेरी माँ से कहा-सुनी हो जाने के कारण वो 2008 में लखनऊ जाने लगी। वह एक बार दिल्ली में भी ऐसा कर चुकी थी और मैं उसके गुस्से व स्वछंद विचारों को जान चुका था और ये भी जानता था को वो दिल की बुरी नहीं है ऊपर से वो गर्भवती भी थी। इस कारण मुझे भी उसके साथ जाना पड़ा। उस समय मेरे घर पर मेरे दो छोटे भाई मेरी माँ के साथ रहते थे व मेरी माँ एक सरकारी टीचर थी। मेरे पिता का देहांत काफी पहले हो चुका था। लखनऊ जाने के बाद मेरे दो पुत्र हुए जिन की उम्र आज क्रमशः 5.5 व 4 वर्ष है। मेरी सास का देहांत 2009 में हार्टअटैक से हो चुका है व ससुर जी अक्टूबर 2014 में अपनी सरकारी नौकरी  से रिटायर होने वाले हैं और एक किराये के मकान में रहते हैं। मेरी समस्या जनवरी 2012 से शुरू हुई जब मेरे एक मित्र की शादी थी और वो अपने भाई के साथ कुछ दिन खरीददारी के लिए मेरे घर पर रुका। उस समय मै एक टूरिंग जॉब करता था। वापस आने पर एक बार फिर से वो लोग खरीदारी के लिए लखनऊ आये। उस समय मुझे मेरी पत्नी के व्यवहार में परिवर्तन महसूस हुआ जिसे मेरी पत्नी ने ज्यादा थकान को वजह बताया। पर चंद दिनों के बाद मेरी जानकारी में कई चीजे आयीं जैसे असमय फोन पर बात करना, बातों को छिपाना व झूठ बोल देना जिसके लिए मैंने उसको काफी दिनों तक उसे समझाया कि उसे मुझसे ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने उस मित्र की शादी में मैं अपनी पत्नी व बच्चो के साथ फरवरी 2012 में बरेली गया तथा इस समय के दौरान मुझे इस बात का पूर्ण अहसास होगया कि मेरी पत्नी मेरे दोस्त के भाई को पसंद करने लगी है। वहां पर एक रात किसी कारणवश उसके ऊपर मैंने शराब के नशे में हाथ उठा दिया और उस गलती का अहसास मुझे आज तक है। उसके बाद से मेरी पत्नी ने शादी से वापस आने के बाद मेरे सामने ही उस लड़के से फोन पर बातें करना चाहे वो दिन हो अथवा रात, मैं सामने रहूँ या घर पर ना रहूं, करने लगी। दो अलग-२ बार मार्च व अगस्त में उस लड़के को मेरे कई बार मना करने के बाबजूद बरेली से लखनऊ बुलाया और वो मेरे ही घर पर रुका। इस समय तक मेरे ससुर जी अथवा किसी भी दूसरे सदस्य को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पर इन बातों के बाद एक दिन जब मैं और अधिक बर्दास्त नहीं कर सका तो मैंने इन बातों का खुलासा अपने ससुर जी को पत्नी के सामने कर दिया। और जो साक्ष्य थे उनको बताया व दिखाया भी। पर मेरी पत्नी ने उन सभी बातों को अपने पिता के सामने नकार दिया और मेरे लिए कहा कि मैं उसको परेशान करता हूँ व उस पर शक करता हूँ। ससुर जी ने यहाँ अपनी बेटी को सही माना और मुझसे कहा कि मैं उनकी बेटी पर गलत इल्जाम लगा रहा हूँ। इन बातों से परेशान हो कर मैं लखनऊ से बरेली अपने घर पर सितम्बर 2012 में वापस आगया और फोन से अपनी पत्नी के संपर्क में रहा। मैंने इस दौरान अपनी पत्नी को वो बातें बोली जो उसने मुझसे शादी से पहले अपने बारे में कही थी। जिस पर आपस में काफी झगडा हो गया तथा अक्तूबर 2012 में मै वापस गया और अपनी पत्नी से व ससुर जी से अपनी गलतियों की माफ़ी भी मांगी। पर पत्नी ने ससुर जी से ये बोल दिया कि अगर में उस घर में रुका तो वो घर से बच्चो को लेकर चली जाएगी। तब ससुर जी ने मुझे अपने एक दोस्त के पास कुछ दिन रुकवाया (लगभग 1 हफ्ता)। उसके बाद मैं उनके कहने पर ससुर जी के बड़े भाई के पास 1 महीना रहा और अपनी पुरानी जॉब को करने लगा। इस दौरान अपने बीच में अपने बच्चो से मिलता रहा। पर मेरी पत्नी का ससुर जी की इस बात पर गुस्सा बढ़ गया। और एक दिन ससुर जी ने अपने भाई से कहा कि वो मुझे अब अपने घर पर ना रखे। इस पर उनके बड़े भाई ने मुझे समझाया और मुझे प्रेरित किया कि मैं अपने घर जाऊँ और अपने आप को आत्मनिर्भर बनाऊँ और कुछ समय अपनी पत्नी को दूँ। समय के साथ शायद मेरी पत्नी इन बातो को भुला दे जो कि मुझे भी सही लगी। मैं जनवरी 2013 में बरेली वापस आ गया उस लड़के व उसके परिवार से सारे सम्बन्ध समाप्त कर लिये। कुछ समय के बाद अपना कारोबार शुरू किया। इसके बाद मेरी पत्नी से बातचीत कम हो गयी क्योकि फोन पर जब भी उससे बात करता तो बातचीत एक झगडे का रूप ले लेती। जून 2013 में मैं एक बार फिर से अपनी पत्नी को मनाने गया वहां एक दिन रुका भी पर मेरी कोशिशें बेकार होती गयी। वो मेरी माँ और भाई को उल्टा सीधा कहने लगी और मेरे उपर इल्जाम लगाये कि मैं उसे बार बार  फोन करके परेशान करता हूँ और उसके चरित्र के बारे में ख़राब बोलता हूँ। जब कि वो ऐसा कुछ नहीं करती है मेरे इस तरह बोलने के कारण अब वो किसी दोस्त या रिश्तेदार से कोई मतलब नहीं रखती है, एक प्राइवेट स्कूल में अपनी जॉब करती है और खाली समय में कांट्रेक्ट बेस काम करती है। वह मेरे साथ नहीं रहना चाहती है। मेरे ससुर जी ने मुझसे यह बोला कि मै मासिक रूप से 10000 रू बच्चो की परवरिश हेतु उनको दूँ। जिससे शायद मेरी पत्नी का भी दिल बदल जाये।  अपने बच्चों से मैं उन की परमीशन के बाद मिल सकता हूँ या फोन पर बात कर सकता हूँ। पर मैंने ये कहकर उनकी बात नहीं मानी कि मैं अपने परिवार को अपने साथ रख कर अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखभाल करना चाहता हूँ। जिस पर वो राजी नहीं हुए और कई महीने निकल जाने के बावजूद तक ऐसी ही स्थिति बनी रही। बच्चों के लिए भी अगर कुछ करना हो या बात करनी हो तो उन दोनों की परमिशन लेनी होती थी। जनवरी 2014 में जब ससुर जी के बड़े भाई द्वारा कोई बात नहीं बनी तो तो ससुर जी के बड़े भाई ने पत्नी की एक चाची जी को मध्यस्थ बनाया और चाची जी ने मुझे अपनी माँ के साथ आने को बोला। वहां अपनी माँ के साथ जाने पर मेरी पत्नी ने सभी के सामने कई तरह के झूठे इल्जाम लगाये व पुलिस, कानून की धमकी दी कि वो चाहे तो मेरे परिवार को जेल भी करा सकती है। ससुर जी ने कहा कि अभी 2 साल का समय है, मेरे पास अपने रिश्तो को सुधारने के लिए।  2 साल के बाद जब बच्चे बड़े हो जाएंगे तो तय होगा कि हम दोनों लोग साथ में रह सकते है या नहीं। मेरी पत्नी का कहना था कि वो अपने आप को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है और मैं चाहूँ तो बच्चो से लखनऊ आकर मिल सकता हूँ। पर उन्हें अपने साथ अकेले कहीं भी नहीं ले जा सकता हूँ और वो बरेली आकर नहीं रहना चाहती है, ना ही तलाक देना चाहती है। उसकी चाची जी ने कहा कि मै कुछ महीने यहाँ आता जाता रहूँ जिससे स्थिति में परिवर्तन हो और उनका प्रयास रहेगा कि वो मेरी पत्नी को साथ रहने को मना सके। कुछ समय उनकी बात को मानकर मेरी माँ व मैं वापस आ गये और अपनी ओर से मैंने सार्थक पहल करनी चाही और मै वहां पर गया भी 1-2 दिन के लिए इस उम्मीद से कि शायद मेरी पत्नी मुझसे अलग रहने की डेढ़ साल पुरानी जिद्द को छोड़ दे। पर इस दौरान मेरे प्रति पत्नी ने अपना कोई रवैया नहीं बदला। जैसे मेरे सामने फोन को साइलेंट करना या फिर उसको बंद कर देना। मुझे वहाँ उन दिनों में कुछ फोटोग्राफ मिले जो कि मेरे ही घर (जहाँ पर मेरी पत्नी इस समय रहती है) के हैं। जो उसके स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर के अर्धनग्न अवस्था में अकेले के है और उस समय के जब मैं वहां पर नहीं था। क्योकि पुराने वाले मकान को बदल कर मेरे ससुर जी पिछले लगभग 1 साल से दूसरे घर में रहते हैं  और मै ये भी नहीं जानता हूँ कि मेरे ससुर जी को इन बातों पता है भी या नहीं।
इस बात को अभी तक किसी को नहीं बताया है क्योकि मै पुराने इतिहास को दोहराकर अपने बच्चो के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता हूँ। मेरी पत्नी अभी भी अपनी आर्थिक स्थिति व आत्मनिर्भरता का हवाला देते हुए 2 साल तक साथ में रहने को तैयार नहीं हो रही है। जब कि मैं अपने परिवार की बेहतर तरीके से देखभाल कर सकता हूँ। ये भी जानता हूँ कि अपनी पत्नी अथवा बच्चों को तब तक नहीं ला सकता हूँ जब तक कि पत्नी खुद ना चाहे। वो इस बारे में कुछ नहीं सोच रही है अब जब कि ससुर अपनी जॉब पर जाते हैं और पत्नी अपनी जॉब पर, दोनों बच्चे सुबह क्रच में जाते हैं (बड़ा बेटा वहीँ से अपने स्कूल जाता है वैन द्वारा) और शाम को पत्नी या ससुर अपनी जॉब से आने के बाद बच्चो को क्रच से लेकर आते हैं। आप मुझे ये सलाह दें कि मुझे क्या उपय़ुक्त कार्यवाही करनी चाहिए जिससे मै अपने परिवार के भविष्य को संभाल सकूँ? मैं अपने कारोबार को छोड़ कर लखनऊ जा कर नहीं रहना चाहता हूँ क्यों कि मुझे या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को स्त्रियों के बाहर काम करने या आने जाने अथवा बात करने पर कोई आपति नहीं है। पर वो अमर्यादित न हो।  अभी तक मैंने कोई भी कानूनी कार्यवाही नहीं की है और दूसरे पक्ष के बारे में मैं नहीं जानता हूँ कि उन्होंने ऐसा कुछ किया है अथवा नहीं। मैं केवल यही चाहता हूँ कि मेरा परिवार मेरे साथ रहे। अगर मेरी पत्नी मेरे साथ बरेली नहीं रहती है तो ऐसी स्थिति में मैं उससे तलाक लेना चाहूँगा।

समाधान-

मित्र, हो सकता है आप बुरा मान जाएँ। पर सचाई तो सचाई है। आप ने अपनी पत्नी को केवल चाहा, उस से प्रेम नहीं किया। आप चाहत भी इतनी थी कि वह आप की वफादार भारतीय पत्नी बनी रहे। लगता है आप प्रेम का अर्थ अभी तक जानते ही नहीं। आप की पत्नी ने जब जरा सी स्वतंत्रता लेनी चाही तो आप के मन में संदेह पनपने लगा। तब आप को अपनी पत्नी की मामूली व्यवहारिक बातें भी आप को बेवफाई लगने लगी। आप को लगा कि आप की पत्नी किसी और को चाहने लगी है। आप को गुस्सा भी आया और आप ने पत्नी पर हाथ उठा दिया। आप के लिहाज से आप की इतनी सी हरकत पत्नी के लिए तो बहुत बड़ी थी। उस ने आप को त्याग दिया। आप की पत्नी समझती थी कि आप उसे प्यार करते हैं, उसे सम्मान देते हैं। लेकिन उस की निगाह में आप वही भारतीय परंपरागत पति निकले।

प जिन सबूतों की बात कर रहे हैं, वे कोई सबूत नहीं हैं, उन से आप की पत्नी की बेवफाई साबित नहीं होती है। आप के मन में अभी भी सन्देह का कीड़ा विराजमान है। आप के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया है। जो तगड़ा सदमा आप ने अपनी पत्नी को दिया है, वह उस से बाहर नहीं निकल पाई है। वह अब आत्मनिर्भर जीवन जीना चाहती है। उस के जीवन में आप का कोई स्थान नहीं है। यहाँ तक कि वह उस के साथ जो आप का नाम जुड़ा है उसे छोड़ना भी नहीं चाहती। जब कि आप को फिर पत्नी की जरूरत है। आप एक पत्नी चाहते हैं। वह नहीं तो उस से छुटकारा प्राप्त कर के कोई और।

त्नी आप से सिर्फ अपने बच्चों का खर्च चाहती है। आज के जमाने में दो बच्चों का खर्च 10000 रुपया प्रतिमाह अधिक नहीं है। निश्चित रूप से उसे इस से अधिक खर्च करने पड़ेंगे। उस की यह मांग वाजिब है।

दि आप की पत्नी नहीं चाहती है तो आप उसे अपने साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकते। यह बात आप खुद अच्छी तरह जानते हैं। मेरे विचार में आप को अपनी पत्नी को प्रतिमाह खर्च देना चाहिए। यदि 10000 रुपए दे सकने की स्थिति में न हों तो कम दीजिए पर दीजिए। आप की पत्नी तपस्या पर उतर आई है। जब कि जो गलतियाँ आप ने की हैं उन में तपस्या आप को करनी चाहिए।

प विवाह विच्छेद चाहते हैं, फिलहाल उस का आप के साथ रहने से मना करना ही एक मात्र विवाह विच्छेद का आधार हो सकता है। लेकिन अलग रहने की उस की वजह अभी तो वाजिब लगती है। आप यदि कोई कार्यवाही करेंगे तो हो सकता है वह भी कानूनी कार्यवाही करे। उस के पास उस के ठोस कारण भी हैं। उस परिस्थिति में आप को परेशानी हो सकती है। कुछ दिन पुलिस और न्यायिक हिरासत में भी काटने पड़ सकते हैं।

मेरी राय में फिलहाल आप के पास कोई रास्ता नहीं है। आप चुपचाप बच्चों का खर्च देते रहें। समय समय पर बच्चों से मिलते रहें। उन्हें एक पिता का स्नेह देते रहें। बच्चों में आप के प्रति स्नेह पनपने लगे तो हो सकता है कि आप की पत्नी भी अपने बच्चों के पिता के प्रति नरम पड़े और आप का मसला हल हो जाए। मुकदमेबाजी से तो कुछ भी आप को हासिल नहीं होगा।

क काम और कर सकते हैं, आप अपने ससुर से बात कर सकते हैं कि जब उन की पुत्री आप के प्रति इतनी कठोर हो गई है तो उसे आप से विवाह विच्छेद की कर स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। वह बच्चों के लिए जितना हो सके एक मुश्त भरण पोषण राशि प्राप्त कर ले और विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करवा ले। यह काम दोनों की सहमति से हो जाए तो ही अच्छा है। अन्य कोई मार्ग आप के पास नहीं है। बच्चों की अभिरक्षा आप को कानूनी रूप से भी नहीं मिल सकेगी।

पत्नी सही प्रतीत होती है, अपना मामला उस के साथ मिल बैठ कर या काउंसलर के माध्यम से निपटाएँ।

समस्या-

सांगरिया, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से लोनाराम ने पूछा है –

मेरी शादी 1998 में हुई थी। हमारे दो संताने हैं। जून 2007 से पत्नी बच्चों के साथ घर छोड़ कर सुनाम चली गई जहाँ वह सरकारी नौकरी करती है। उस का वेतन 40,000/- रुपए प्रतिमाह है।  2007 के बाद हम कभी भी नहीं मिले न ही वे लोग मुझे बच्चों से मिलने देते हैं। मैं ने 2009 से सुनाम कोर्ट में बच्चों की कस्टडी के लिए मुकदमा कर रखा है पर न्यायालय में मेरी कोई बात नहीं बनी। न ही मुझे बच्चों से मिलवाया गया है। न्यायालय ने मेरे से 3000/- रुपए प्रतिमाह का खर्च पत्नी को देने को बोला है। मैं अब पत्नी से तलाक लेना चाहता हूँ। पत्नी और उस के माता-पिता और वह और रुपए की मांग कर रहे हैं मुझे पत्नी से तलाक और बच्चे कैसे मिल सकते हैं?

समाधान-

Counsellingप ने अपनी पत्नी के बारे में मामूली सूचनाएँ यहाँ दी हैं। अपने और अपने बच्चों के बारे में कोई सूचना नहीं दी है। बिना किन्हीं तथ्यों के तलाक और बच्चों की कस्टडी के बारे में क्या कोई किसी को राय दे सकता है?

प ने अपने बारे में कुछ नहीं बताया। आप क्या करते हैं? क्या कमाते हैं? परिवार में कौन कौन साथ रहता है। आप की पत्नी की शिकायत क्या है? वह आप को छोड़ कर जाने की बात क्यों करती है? बच्चों से न मिलने देने के कारण क्या बताती है? और आप बच्चों को माँ के पास रखने के स्थान पर अपने पास क्यों रखना चाहते हैं?

प की पत्नी 40,000/- रुपए प्रतिमाह वेतन पाती है, सरकारी सेवा में है जिस में सामाजिक सुरक्षा अधिकतम है। वह क्यों अपना रोजगार छोड़ेगी? अदालत को भी बच्चों का भविष्य उसी के पास नजर आएगा। इस कारण से आप को बच्चों की कस्टडी मिलने का मार्ग तो न्यायालय से नहीं ही खुलेगा। आप तलाक लेना चाहते हैं और आप की पत्नी व उस के माता-पिता इस के लिए धन चाहते हैं तो गलत क्या है? आखिर आप की संतानें आप की और आप की पत्नी की हैं और यदि बालिग होने तक उन की परवरिश के खर्चे में आप के योगदान के रूप में वे कुछ धनराशि चाहते हैं तो यह तो आप को देना होगा। वर्तमान में जो 3000 रुपया प्रतिमाह खर्च अदालत ने निर्धारित किया है वह भी बच्चों के लिए है। उसे देने में आप को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि इसी राशि को किसी राशि का ब्याज मानें तो भी वह राशि भी चार लाख रुपया होती है। बच्चों की उम्र् बढ़ने के साथ उन का खर्च भी बढ़ेगा।

प तलाक ही चाहते हैं तो अपनी पत्नी और उस के माता-पिता से बात करें। जरूरत हो तो किसी काउंसलर की मदद लें या अदालत को ही बीच में डालें और समझौते व सहमति से विवाह विच्छेद प्राप्त कर लें।

आप अपनी शर्तें जोड़ कर पत्नी के तलाक प्रस्ताव को स्वीकार करने की सूचना उसे दे दें।

समस्या-

दिल्ली से राकेश ने पूछा है –

मेरी पत्नी अपनी बहन की बातो में आकर मुझ से तलाक चाहती है। क्यों कि उसे लगता है कि मेरा किसी अन्य स्त्री के साथ संबंध है।  विवाह को 13 वर्ष हो चुके हैं।  मेरे दो बच्चे हैं, जिस में एक पाँच वर्ष का बेटा ऑटिस्टिक है।  मैं ने 2010 में पत्नी के नाम से एक मकान लिया था। मुझे घर भी नहीं आने दे रही है। पुलिस में झूठी शिकायत दर्ज करवा धी है। मैं तलाक नहीं चाहता। मुझे क्या करना चाहिए¿

समाधान-

प को सब से पहले तो घर का मोह त्याग देना चाहिए।  जिस दिन आप ने पत्नी के नाम से घर खरीदा था उसी दिन आप को सोच लेना चाहिए था कि यदि पत्नी आप को घर से निकाल देती है तो चुपचाप निकल जाउंगा।  यदि ऐसा नहीं सोचा था तो घर पत्नी के नाम से ले कर आप ने गलती की थी।  अपनी गलती की कोई क्षतिपूर्ति नहीं होती। उस क्षति को सहन करना होता है।

प की पत्नी यदि घर नहीं आने देती है तो वह उस का घर है।  इस का अर्थ है कि आप कहीं तो रह रहे होंगे।  यदि आप का यह आवास अस्थाई है तो फिर आप कुछ वर्षों के लिए स्थाई आवास की व्यवस्था कर लीजिए। क्यों कि जल्दी आप को अपना घर वापस नहीं मिलने वाला है।  हो सकता है कभी भी न मिले।

प अपनी पत्नी का तलाक का प्रस्ताव स्वीकार कर लीजिए, लेकिन उस के साथ अपनी शर्तें रखिए।  मकान जिस में वह रह रही है वह आप ने अपने पैसों से खरीदा है वह उस के पास रहेगा आप कभी भी उस पर दावा नहीं करेंगे।  दोनों बच्चे सदैव पत्नी के पास रहेंगे। उन की देखभाल पत्नी ठीक से करेगी और उन के लिए जीवन में कभी भी भरण पोषण का खर्चा नहीं मांगेगी। पत्नी कभी भी उस के अपने लिए गुजारा भत्ता नहीं मांगेगी। इस के अलावा जो भी संपत्ति आप के पास है उस में न पत्नी का और न ही बच्चों का कोई अधिकार होगा। आप की पत्नी सोचती है कि आप से अधिक उस की बहिन उस की हितैषी है तो उसे कहिए कि जब भी किसी तरह की आर्थिक व सामाजिक मदद की जरूरत हो वह आप से अपेक्षा न करे। उस के साथ उस की बहिन है ही।  जो पुलिस रिपोर्ट उस ने कराई है उन्हें वह वापस ले।  इन शर्तों के साथ आप तलाक का प्रस्ताव स्वीकार करने की सूचना पत्नी को दे दें।

मेरा सोचना है कि इन शर्तों को रखने के बाद आप की पत्नी सोचेगी कि उसे क्या करना है? एक बार पत्नी सोचने को बाध्य हो जाए तो आप की समस्या का हल निकलना आरंभ हो जाएगा।  आप चाहें तो इतना करने के उपरान्त यदि परिस्थितियों में परिवर्तन आता है तो आप पुनः तीसरा खंबा पर अपनी समस्या को रख सकते हैं।

काउंसलिंग वैवाहिक विवादों का अच्छा समाधान प्रस्तुत कर सकती है

समस्या-

मेरी शादी 2008 में हुई थी।  दो साल बाद मेरी जुड़वाँ बेटियाँ हुई जिनको मेरी पत्नी पालना नहीं चाहती थी और 25 दिन के बच्चों को छोड़ कर घर में क्लेश कर के और मेरे ऊपर मिथ्या आरोप लगाते हुए दोनो बच्चों को मेरे पास छोड़ कर मायके चली गयी थी।  रिश्तेदारों से काफ़ी बात-चीत करने के बाद लगभग 8 माह बाद वह वापस आ गयी।  दो- चार दिन ठीक से रहने के बाद फिर से क्लेश करना शुरू कर दिया।  क्लेश की वजह से मैं तनाव में रहने लगा।  वह हर वक़्त तलाक लेने की धमकी, या फिर आत्महत्या लेने की या फिर जेल मे बंद कराने की धमकियाँ देने लगी।  चार माह तक मेरे घर में ज़बरदस्ती रहने के बाद एक बेटी को लेकर बिना कुछ कहे वापस अपने मायके चली गई।  इन 4 महीनों में एक बार भी मेरा उस के साथ शारीरिक संबंध नहीं हुआ।  पिछले 9 माह से मैं एक बेटी को पाल रहा हूँ और एक उसके पास है।  ना तो कोई उसने क़ानूनी कार्यवाही की है और ना ही संपर्क करने की कोशिश की है।  जिन रिश्तेदारों के माध्यम से मेरी बात होती थी अब उन लोगो ने कुछ भी कहना सुनना बंद कर दिया है।  मुझे ही अपने जीवन से नफ़रत होने लगी है।  मुझे कोई रास्ता नही दिखाई दे रहा है।  कोई वकील धारा-9 के मुकदमे की सलाह देता है, लेकिन उसमें खर्चे आदि के मुक़दमे हो सकते हैं।  कोई वकील केवल काउंसलिंग के लिए कहता है।  जिसका कोई लाभ नहीं।  समझ में नही आता मैं क्या करूँ?  मेरे घर में मेरी 58 वर्ष की माँ हैं जो अध्यापन करती हैं,  एक भाई ड्रग एडिक्ट है, एक बहिन है जो बैंक में नौकरी करती है और एक मेरी 2 वर्ष की बेटी है।  एक बेटी पत्नी अपने साथ ले गई है।  मेरी केवल मोबाइल रिपेयर की दुकान है।  जिससे महीने का खर्च भी मुश्किल से चलता है।  जैसे तैसे करके गुजारा करता हूँ।  तनाव काफ़ी होने के वजह से दुकान पर भी ध्यान नहीं दे पा रहा हूँ।  लेकिन बेटी को पालने में कोई कसर नही छोड़ता हूँ।

 1-मुझे क्या अपनी पत्नी से तलाक़ मिल सकता है?

2-क्या मैं दूसरी बेटी की माँग कर सकता हूँ?

3-क्या मुझे जेल में जाना पड़ सकता है?

4-क्या मुझे खर्चा आदि भी देना पड़ सकता है?

 –वरुण, बरेली, उत्तर प्रदेश

 समाधान-

प ने पूर्व में भी अपनी समस्या तीसरा खंबा को भेजी थी,  जिस का समाधान भी किया गया था।  आप को चाहिए था कि कम से कम आप उस तिथि का उल्लेख अवश्य करते जिस तिथि को आप ने अपना प्रश्न भेजा था या तीसरा खंबा ने समाधान प्रकाशित किया गया था।  इस से हमें पुराना सूत्र तलाशने में आसानी होती। खैर, हम आप की समस्या का पुनः समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के द्वारा दिए गए विवरण से पता लगता है कि आप की समस्या का आरंभ दो जुड़वाँ पुत्रियों के पैदा होने के साथ हुआ है।  हो सकता है आप की पत्नी संतान को जन्म देने के लिए ही तैयार नहीं रही हो और जब उसे पता लगा हो कि वह संतान को जन्म देने वाली है तो वह परेशानी में आ गई हो।  फिर किसी तरह उस ने एक संतान के लिए स्वयं को तैयार भी कर लिया हो। लेकिन जब जुड़वाँ बेटियाँ मिली हों तो वह परेशान हो गई हो और उस परेशानी से न निपट पाने के कारण अपनी ही संतानों को छोड़ कर चली गई हो। पत्नी के इस तरह चले जाने पर ही आप सब को पत्नी की समस्या के रूप में देखना चाहिेए था। लेकिन संभवत: उसे पत्नी के दोष के रूप में देखा गया।  अनेक बार ऐसा होता है कि हम किसी घटना को अपने जीवन में अभी नहीं देखना चाहते लेकिन वह अनायास आ पड़ती है तो घबरा उठते हैं।  लेकिन जीवन इस से तो नहीं चलता। जीवन तो आने वाली समस्याओं का सामना करने से चलता है।  मेरे विचार में आप को काउंसलिंग पर विचार करना चाहिए।  हो सकता है कि पहले जब आप की पत्नी आप के पास आई हो तो यह सोच कर आई हो कि जैसे भी हो वह अपनी संतानों को पालेगी।  हो सकता है आप ने और आप के रिश्तेदारों ने यह आश्वासन दिया हो कि सास और पति उसे इस काम में मदद करेगा।  लेकिन आप की माता जी अपने अध्यापन के कार्य के कारण और आप अपने व्यवसाय के कारण इस बात पर ध्यान ने दे सके हों। मुझे लगता है आप, आप की पत्नी और आप की माता जी तीनों को काउंसलिंग की आवश्यकता है।

प ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि मायके से लौट कर आने के बाद आप का पत्नी से कोई शारीरिक संपर्क नहीं हो सका है।  जो स्त्री एक बार में ही अनिच्छा से दो संतानें प्राप्त कर चुकी हो वह असुरक्षित यौन संबंध से तो निश्चित ही दूर रहेगी।  मुझे तो इस में कुछ भी गलत नहीं लगा।  इस के लिए आप को चाहिए कि आप सुरक्षित और स्थाई प्रकार के सुरक्षा उपाय कर सकते थे जिस से संतान उत्पन्न न हो।  यदि परिस्थितियाँ ऐसी ही रही हैं तो आप को काउंसलिंग पर ध्यान देना चाहिए। यदि परिस्थिति ऐसी ही रही है तो काउंसलिंग एक अच्छी चीज है आप को उस तरफ ध्यान देना चाहिए। अभी तक आप की पत्नी ने कोई कानूनी कदम नहीं उठाया है, इस स्थित में काउंसलिंग आप की समस्या का एक अच्छा समाधान प्रस्तुत कर सकती है।  मेरा मानना तो यह है कि आप को यह सोच कर कि पत्नी की परेशानियों का हल किस प्रकार निकाला जा सकता है, कोई योजना बनानी चाहिए।  फिर आप को अपनी ससुराल जा कर अपनी पत्नी से बात करनी चाहिए कि आप उस की परेशानी नहीं समझ सके थे, लेकिन अब आप की समझ में आ गया है कि उस की परेशानी क्या है। अब बच्चे तो हो ही गए हैं, उन का पालन पोषण करना तो माता-पिता का दायित्व है। दोनों किसी तरह संभालेंगे।  अपनी पत्नी को मनाइये और घर ले आइये।  निश्चित रूप से यह काम एक बार में सम्भव नहीं है। लेकिन तीन-चार बार में अवश्य हो जाएगा।  इस काम में आप किसी ऐसे व्यक्ति की भी मदद ले सकते हैं जिस पर आप की पत्नी विश्वास कर सके।  आप की पत्नी की कोई सहेली हो तो उस के माध्यम से यह काम आसानी से हो सकता है। लेकिन आप को पहले उसे समझाना पड़ेगा। एक बार वह समझ गई तो फिर आप को अपनी पत्नी को समझाना आसान हो जाएगा।

प ने पूछा है कि आप को तलाक मिल सकता है क्या?  तलाक के लिए किसी न किसी ऐसे आधार की आवश्यकता आप को होगी जो कि तलाक के लिए कानून द्वारा निर्धारित हैं।  मुझे अभी तो ऐसा कोई आधार दिखाई नहीं दे रहा है।  हाँ, जब आप की पत्नी को अंतिम बार आप का घर छोड़े एक वर्ष हो जाए तो आप एक वर्ष के लगातार दाम्पत्य त्याग के आधार पर आप तलाक की अर्जी लगा सकते हैं।  लेकिन उस में वही सब परेशानियाँ खड़ी होंगी।  आप को न केवल अपनी पत्नी के लिए अपितु अपनी पुत्री के लिए भी तुरंत उतना खर्चा देना होगा जितना अदालत निर्धारित कर देगी।  आप की क्षमता ऐसी नहीं कि आप निरंतर खर्चा दे सकें।

प अपनी बेटी की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।  लेकिन उस स्थिति में न्यायालय इस आधार पर निर्णय करेगा कि बेटी का हित कहाँ रहने में है। यह सब न्यायालय के समक्ष लाए गए तथ्यों और साक्ष्य पर निर्भर करेगा।

स विवाद के बीच यदि आप की पत्नी धारा 498क और 406 आईपीसी का मुकदमा दर्ज करवा दे या फिर धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में आवेदन प्रस्तुत करे उस में यह आदेश हो जाए कि पत्नी और पुत्री के लिए हर माह निश्चित खर्च देना होगा और आप वह खर्च न दे सकें तो आप को जेल भी जाना पड़ सकता है।

प को पत्नी और पुत्री का खर्चा देना पड़ सकता है।  एक बार पत्नी के भरण-पोषण की राशि अदा करने से आप को भले ही मुक्ति मिल जाए।  लेकिन पुत्री के भरण पोषण का खर्चा तो आप को देना ही होगा।

न तमाम परिस्थितियों में केवल एक मार्ग आप के सामने शेष रहता है कि आप पत्नी की मानिसिकता और परेशानी को समझें और उसे समझाएँ उस की मदद करें तो हो सकता है आप का और आप की पत्नी का यह गृहस्थ जीवन बच सके।  इन तमाम परिस्थितियों में आप यह भी सोचें कि आप को दोनों पुत्रियाँ मिल जाएँ और पत्नी से तलाक हो जाए तब भी आप क्या पुत्रियों को उन की माँ दे सकते हैं।  अभी भी आप की एक पुत्री माँ से वंचित है तो दूसरी पिता से वंचित है।  यदि आप प्रयास कर के दोनों को माता-पिता दे सकें तो यह सब से उत्तम होगा। आप की समस्या का हल भी इसी में से निकलेगा।  तीसरा खंबा आशा करता है कि आप अपनी समस्या को हल कर पाएंगे और अपना, अपनी पत्नी और अपनी पुत्रियों के पटरी पर से उतरे हुए जीवन को फिर से पटरी पर ला सकेंगे।

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