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पुत्र से मिलने व संरक्षा हेतु धारा 26 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन करें।

rp_CUSTODY-OF-CHILD-254x300.jpgसमस्या-

धीरज मिश्रा ने उत्तर प्रदेश के गाँव-बहेड़वा, पोस्ट-मिर्जामुराद, जिला-वाराणसी से पूछा है-

मेरे बेटे आर्यन से स्कूल में मिलने पर उसकी नानी चंदा देवी ने स्कूल के प्रबंधक को लिखकर रोक लगा रखा है।  परंतु मैं अपने बेटे से स्कूल में मिलने का अधिकार चाहता हूँ ताकि उसकी काउंसलिंग करवा सकूँ।  कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

र पिता अपने पुत्र का नैसर्गिक संरक्षक है और उसे अपने पुत्र से मिलने का अधिकार है। यदि आप के पुत्र का स्कूल प्रबंधन आप को अपने पुत्र से मिलने नहीं दे रहा है तो आप स्कूल को लीगल नोटिस दे सकते हैं और कह सकते हैं कि स्कूल प्रबंधन इस तरह गलती कर रहा है।

यदि स्कूल नोटिस के बाद भी पुत्र से मिलने नहीं देता है तो आप स्कूल प्रबंधन के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत कर के न्यायालय से स्थायी व्यादेश जारी करवा सकते हैं।

यदि आप के और आप की पत्नी के बीच किसी तरह का विवाद है और परिवार न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत किसी तरह का मुकदमा चल रहा है तो आप हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अन्तर्गत इस तरह का आदेश उसी न्यायालय से प्राप्त कर सकते हैं जहाँ यह मुकदमा चल रहा है।

बालक और उस की संपत्ति का संरक्षक नियुक्त करने हेतु जिला कलेक्टर का आवेदन।

rp_CUSTODY-OF-CHILD-254x300.jpgसमस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने चिड़ावा, राजस्थान समस्या भेजी है कि-

गार्जियन्स एण्ड वार्ड एक्ट 1890 की धारा 8 बी के अन्तर्गत अवयस्क बच्चे के लिए जिसे गोद लेने वाले माँ और बाप दोनों की मृत्यु हो गई है उस की संपत्ति का कस्टोडियन और सरंक्षक तथा अवयस्क स्वयं का संरक्षक नियुक्त करने का प्रार्थना पत्र जिला कलेक्टर संबंधित जिले जहाँ उसकी संपत्ति है उसके जिला एवं सत्र न्यायाधीश को किन परिस्थितियो में भिजवा सकता है? ऐसा करने के लिए नाबालिग को स्वयम् कलेक्टर को आवेदन करना होगा या अन्य व्यक्ति द्वारा कलेक्टर को उस की सूचना देने पर सूचना के आधार पर भी कलेक्टर एक व्यक्ति को कस्टोडियन एवं संरक्षक नियुक्त करने का पत्र धारा 10(2) के तहत भिजवा देना चाहिए?

समाधान-

संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा-8 व 10 में जो प्रावधान दिए गए हैं उन में एक जिला कलेक्टर को यह सुविधा दी गयी है कि किसी बालक और उस की संपत्ति का संरक्षक नियुक्त करने हेतु वह आवेदन कर सकता है। पूरा कानून इस मामले में मौन है कि वह ऐसा कब कर सकता है? वैसी स्थिति में यह कलेक्टर की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह स्वतः ऐसा कर सकता है या किसी भी व्यक्ति अथवा स्वयं बालक के आवेदन पर ऐसा कर सकता है। लेकिन कलेक्टर को ऐसा आवेदन जिला न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने को बाध्य नहीं किया जा सकता।

स तरह के मामलों में कलेक्टर के कर्तव्यो को निर्धारित करने वाला कोई निर्णय किसी न्यायालय का उपलब्ध नहीं है। किन्तु इस कानून से यह स्पष्ट है कि जब भी कलेक्टर को यह जानकारी हो कि उस के जिले में कोई बालक और उस की संपत्ति का कोई वैध संरक्षक नहीं है तो उस की जिम्मेदारी है कि ऐसा प्रार्थना पत्र वह जिला न्यायाधीश को प्रस्तुत करे।

स तरह के मामलों में बेहतर है कि जो व्यक्ति स्वयं स्वेच्छा से संरक्षक बनना चाहता है वह स्वयं ही ऐसा आवेदन प्रस्तुत करे। राजस्थान में अब ऐसा आवेदन जिला न्यायालय के स्थान पर परिवार न्यायालय को प्रस्तुत किया जानि चाहिए।

बेटी की कस्टड़ी के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन किया जा सकता है।

Muslim-Girlसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से पुनः समस्या भेजी है कि-

मुझे लड़की की कस्टड़ी कितने दिनों में मिल सकती है। मैं क्या कर सकती हूँ? मैं उन की दूसरी पत्नी हूँ, पहली ने विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर ली थी। मैं ने भरण पोषण का मुकदमा किया था। उन्हों ने मुझे अपने साथ रखने को कहा तो मैं ने केस वापस ले लिया। लेकिन उन्होने बच्चा छीन कर मुझे फिर निकाल दिया। अब 498ए का मुकदमा चल रहा है अभी तारीख नहीं पड़ी है। मुझे अपनी बेटी चाहिए। बहुत छोटी है वो। मेरा समाधान करें।

समाधान-

कंचन जी, आप की समस्या को देखते हुए हम ने तुरन्त आप को समाधान दिया था। आप ने पूरा विवरण दिया होता तो हम तभी आप का समाधान उसी तरह देते। हम यहाँ समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। नियमित वकालत नहीं करते। फिर भी आप की समस्या को देखते हुए समाधान बता रहे हैं। कृपया आगे कोई कार्यवाही किए बिना कोई प्रश्न हम से न करें। करें तो इसी पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में करें आप को यहीं उत्तर दिया जा सके।

प को कस्टड़ी जल्दी मिल सकती है। क्यों कि छोटी उम्र की बच्ची को उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। आप को तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन देना चाहिए और अपने व बच्ची के खर्चे के साथ बच्ची की कस्टडी की राहत मांगनी चाहिए। उस में मजिस्ट्रेट धारा 21 के अन्तर्गत तुरन्त कस्टड़ी के लिए आदेश कर सकता है। बस आप को एक अच्छा स्थानीय वकील करना होगा।

498ए के मामले में आप शिकायतकर्ता हैं, मुकदमा पुलिस ने चलाया है और सरकारी वकील उस की पैरवी करेगा। जब उस में साक्ष्य ली जाएगी तब आप को केवल बयान के लिए समन आएगा। उस के पहले आप को कोई सूचना प्राप्त नहीं होगी।

प चाहें तो परिवार न्यायालय में धारा-9 या धारा-10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना या न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए आवेदन कर सकती हैं। उस के साथ ही बच्ची की कस्टड़ी प्राप्त करने के लिए भी आवेदन कर सकती हैं। लेकिन यह बताना कठिन है कि बच्ची की कस्टड़ी कितने दिन में मिल सकती है।

आप को बेटी की कस्टडी मिल सकती है।

born after faild tubectomyसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मैं ने लव मैरिज की है और मेरा पति मुझे मारता है, मेरी 18 माह की बेटी है जो उस ने मेरे से छीन ली है और मुझे घऱ से बाहर निकाल दिया है। मैं ने 498ए का केस किया था लेकिन उस में उन लोगों ने जमानत ले ली। मेरे से नोटेरी करवाई है कि लड़की पर मेरा कुछ भी हक नहीं होगा। क्या लड़की मैं नहीं ले सकती? कृपया समाधान करें।

समाधान-

ति से विवाद होने पर सब से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि आप के पास सपोर्ट क्या है? यदि आप आत्मनिर्भर हैं, अर्थात आप स्वयं अपना खर्च उठा सकती हैं और बेटी की देखभाल कर सकती हैं तो सब से बेहतर है। यदि नहीं है तो सब से पहले आप को यह सोचना चाहिए कि आप का अकेले जीवन गुजारने का साधन क्या बनेगा और मुकदमा लड़ने के लिए आप का सपोर्ट क्या होगा।

धारा 498ए में जमानत तो हो ही जाती है। मुकदमा चलेगा और उस का साबित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि आप खुद न्यायालय के समक्ष क्या बयान करती हैं। आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत कार्यवाही कर के सुरक्षा, निवास की सुविधा, बच्चे की कस्टडी और अपने और बच्चे के लिए भरण पोषण का खर्च मांगना चाहिए। दूसरी ओर पारिवारिक न्यायालय में आवेदन दे कर न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए साथ में बच्चे की कस्टडी के लिए भी आवेदन करना चाहिए। आप को बच्चे की कस्टडी मिल सकती है। विशेष रूप से तब जब कि वह बालिका है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप के पति ने आप से कुछ लिखवा कर नोटेरी करवा लिया है। वह सब कुछ दबाव में भी हो सकता है जैसा कि प्रतीत होता है।

प जान लें विवाह किसी भी रीति से हो कानून के समक्ष वह विवाह होता है और उस के दायित्व और कर्तव्य समान होते हैं। हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है और किसी भी तरह से स्त्री को अधीन बनाने के रास्ते तलाशता रहता है। आप बच्चे के साथ प्रेम के कारण अपने पति के साथ बनी रहेंगी और जीवन भर यातनाएँ सहन करती रहेंगी। इसी कारण आप से बच्चे को छीन लिया गया है। आप यदि आत्मनिर्भर नहीं हैं तो उस तरफ कदम रखिए। एक स्त्री का सम्मान जनक स्थान समाज में इसी बात पर निर्भर करता है कि वह आत्मनिर्भर है या नहीं।

सब से पहले दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत कराएँ…

father daughterसमस्या-

अनाम अग्रवाल ने होशंगाबाद मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे दोस्त की शादी जुलाई 2012 में हुई। उस की पत्नी का पहले से किसी और से अफेयर था। दोस्त की सास उन के घर में ज़्यादा इंटरफेयर करती थी। इसी बात में एक दिन उसकी पत्नी 12 जुलाई 2013 को अपने माँ बाप के घर चली गई। वहीं 3 महीने बाद सितम्बर 2013 में एक बेटे को जन्म दिया। दोस्त के घर वाले और दोस्त पत्नी को देखने भी गये और लाने की कहने पर भी पर दोस्त की सास ने नहीं लाने दिया। फिर करीब 6 महिने बाद दोस्त और उसकी पत्नी की बात शुरू हुई और वो अपने पति की शर्तों पर आने तो तैयार हो गई। दोस्त बच्चे के खातिर सब बातें भुला के उस को वापस ले आया। फिर अगस्त 2014 में राखी पर उसके मायके गई और वहाँ उसके एक्स-ब्वायफ्रेंड से मिलने के लिए रुक गई। मन से झूठी कहानी बना कर कह दिया कि मुझे ससुराल में पति मारते हैं और परेशान करते हैं, वह पति के साथ नहीं चाहती। मेरे दोस्त ने अपने बेटे के जन्म दिन पर उसे फ़ोन लगाया तो उस ने बेटे से नहीं मिलने दिया। दो दिन पहले ही उसकी बड़ी बहन के घर बेटे को ले कर चली गई और कहा कि यदि तुमने किसी को मेरे अफेयर का बताया तो मैं बेटे को जान से मार दूँगी। मेरे दोस्त ने उस की ये बातें अपने घर वालों को बता दीं लेकिन बदनामी के दर से उस के अफेयर का किसी को कुछ नहीं बता पा रहा है क्यों कि उसके पास कोई पक्का सबूत नहीं है। ना कोई कॉल रिकॉर्डिंग है। वह बहुत डिप्रेस्ड है किसी से कुछ बोल नहीं पा रहा है। वो क्या करे जिस से कि उस का एक वर्ष दो माह का बच्चा उसके पास आ जाए।

समाधान-

र्तमान परिस्थिति में किसी भी प्रकार से यह संभव नहीं है कि आप के मित्र का पुत्र उसे मिल जाए।

प के मित्र केवल संतान को चाहते हैं। लेकिन पत्नी को वह भी अपने पास नहीं रखना चाहते। पत्नी स्वयं भी नहीं आना चाहती है। स्थिति ऐसी है कि दोनों का संबंध टूटने की तरफ बढ़ रहा है। ऐसी अवस्था में आप के मित्र को तुरन्त दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए।

स के प्रतिवाद में पत्नी 406, 498 ए आईपीसी के अपराधों के लिए मिथ्या परिवाद प्रस्तुत कर सकती है और आप के मित्र कुछ परेशानी में पड़ सकते हैं। लेकिन केवल इन धाराओं में मुकदमा और गिरफ्तारी के भय से पुरुष कोई कार्यवाही नहीं करते हैं और देर हो जाती है। देर सबेर पत्नियाँ इन धाराओं के अंतर्गत कार्यवाही करती हैं तो तब बचाव करना भी कठिन हो जाता है। बचाव में सब से पहले धारा 9 का आवेदन प्रस्तुत करने की जरूरत पड़ती है। इस कारण यह अधिक अच्छा है कि धारा 9 का आवेदन तुरन्त प्रस्तुत किया जाए। उस का परिणाम देखा जाए। अभी आप के मित्र के पास पत्नी से विवाह विच्छेद का कोई आधार नहीं है। लेकिन यदि धारा 9 के आवेदन स्वीकार हो कर डिक्री मिल जाने के बाद भी एक वर्ष तक पत्नी और पति के बीच कोई संपर्क नहीं होता है तो उसी आधार पर विवाह विच्छेद भी हो सकता है। एक बार धारा 9 का आवेदन लंबित हो जाने पर पुत्र की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

पत्नी से तलाक नहीं हुआ तो उस का दूसरा विवाह अवैध है।

alimonyसमस्या-

दिल्ली से मोहम्मद नसीम ने पूछा है –

मेरी शादी 15.05.1990 को हुई थी,  हमारे एक बेटा भी हुआ। उसके बाद हम दोनों में झगड़े होने लगे मेरी पत्नी 1993 में अपनी माँ के पास चली गई। वहीं से महिला समिति में केस कर दिया महिला समिती में एक साल तक केस चला।  हमने 1994 में दहेज का सारा सामान महिला समिति में पत्नी को दे दिया और केस वही खतम हो गया।  लेकिन तलाक नहीं हुआ था। सामान लेकर मेरी पत्नी अपनी माँ के साथ ही वापस चली गई।  फिर 1995 में मेरी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली।  वह तभी से दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही है। मेरा बेटा भी मेरी पत्नी के पास है। पत्नी से मेरा तलाक नहीं हुआ है तो क्या वो आज भी कानूनन मेरी पत्नी है?  मेरी पत्नी ने जो दूसरी शादी की है क्या उस शादी की कानूनी मान्यता है? और क्या मैं अदालत से अपने बेटे को अपनी अभिरक्षा में ले सकता हूँ?

समाधान-

प की शादी अपनी पत्नी से हुई थी और तलाक नहीं हुआ है तो आप की पत्नी अभी भी आप की पत्नी है। उस ने जो दूसरी शादी की वह अवैध है जो कि धारा 494 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है। जिस व्यक्ति ने आप की पत्नी के साथ शादी की है वह जार-कर्म का दोषी है। जो कि धारा 497 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत अपराध है।  यदि आप साबित कर सकते हों कि आप की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है तो आप अपनी पत्नी के विरुद्ध धारा 494 भा.दं.संहिता तथा उस के साथ विवाह करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध धारा 497 भा.दं.संहिता के अंतर्गत पुलिस थाना में रिपोर्ट लिखा सकते हैं या फिर सीधे न्यायालय में शिकायत कर के मुकदमा कर सकते हैं।

दि आप पत्नी का दूसरा विवाह साबित कर सकते हैं तो आप उसे इस आधार पर तलाक भी दे सकते हैं और अपने बेटे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर उस की अभिरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

बालक की अभिरक्षा के निर्णय में उस का हित सर्वोपरि

न्यायालयों के समक्ष अनेक बार माता, पिता और संरक्षक के बीच यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि बालक किस की अभिरक्षा में रहे? ऐसे प्रश्नों पर निर्णय देने में सर्वोपरि तथ्य यह है कि बालक का हित किस के संरक्षण में रहने पर साध्य होगा। सर्वेोच्च न्यायालय ने श्यामराव मारोती कोरवाटे बनाम दीपक किसनराव टेकम के मुकदमे में यही व्यवस्था प्रदान की है।

क्त प्रकरण में दीपक किसनराव का विवाह कावेरी के साथ 2002 में सम्पन्न हुआ था। 2003 में उस ने एक बालक विश्वजीत को जन्म दिया। लेकिन बालक के जन्म के उपरान्त अत्यधिक रक्तस्राव के कारण कावेरी का देहान्त हो गया। माता के देहान्त के उपरान्त बालक उस की नाना श्यामराव मारोती के संरक्षण में पलता रहा। दीपक किसनराव ने दूसरा विवाह कर लिया जिस से उसे एक और पुत्र का जन्म हुआ। इस बीच अगस्त 2003 में बालक के नाना ने बालक का संरक्षक नियुक्त करने के लिए जिला न्यायालय को आवेदन किया जब कि पिता ने बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए। जिला जज ने दोनों प्रार्थना पत्रों पर एक ही निर्णय देते हुए बालक के 12 वर्ष का होने तक की अवधि के लिए  नाना को उस का संरक्षक  नियुक्त किया। न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि तब तक पिता को बालक से मिलने की स्वतंत्रता होगी। जिला न्यायाधीश ने पिता के आवेदन को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि वह बालक के 12 वर्ष का होने के पश्चात बालक की अभिरक्षा के लिए पुनः आवेदन कर सकता है।

पिता ने जिला न्यायाधीश के निर्णय को मुम्बई उच्च न्यायालय की नागपुर बैंच के समक्ष नअपील प्रस्तुत कर चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने पिता की अपील को स्वीकार करते हुए बालक की अभिरक्षा पिता को देने का निर्णय प्रदान किया। नाना ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि पिता के प्राकृतिक संरक्षक होते हुए भी बालक के हितों को देखते हुए न्यायालय किसी अन्य व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त कर सकता है। इस मामले में जन्म से ही बालक नाना के साथ निवास कर रहा है और उस का लालन-पालन सही हो रहा है उस की शिक्षा भी उचित रीति से हो रही है ऐसी अवस्था में जिला जज द्वारा नाना को 12 वर्ष की आयु तक के लिए बालक का संरक्षक नियुक्त किया जाना विधिपूर्ण था।

र्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि बालक 12 वर्ष की आयु तक नाना के संरक्षण में ही रहेगा। इस अवधि में पिता बालक के विद्यालय का दो सप्ताह से अधिक का अवकाश होने पर सात दिनों तक के लिए पिता बालक को अपने पास रख सकेगा। जिस के दिनों की पूर्व सूचना पिता बालक के नाना को देगा। इस के अतिरिक्त माह में दो बार अवकाश के दिन शनिवार रविवार को या किसी अन्य त्योहारी अवकाश के दिन नाना बालक को सुबह से शाम तक उस के पिता के पास रहने देगा। इस बीच पिता चाहे तो बालक के स्कूल की फीस, ड्रेस, पुस्तकें व भोजन आदि का खर्च उठा सकता है। बालक 12 वर्ष की आयु का होने के उपरान्त पिता उस की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए जिला न्यायाधीश के समक्ष फिर से आवेदन कर सकेगा।

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