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किसी भी पंजीयन के लिए झूठे तथ्यों का शपथ पत्र देना अपराध है।

समस्या-

मुरारी ने रामगढ़ पचवाड़ा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मेरा विवाह 2003 में हुआ था, 1989 जन्म तिथि है। तब में 14 वर्ष का था। तो क्या में 21 वर्ष 2010 में होने पर 21 वर्ष की डेट में विवाह पंजीयन करा सकता हूँ?  ये गलत होगा या सही? इससे पहले मेरे दो बच्चे भी हो गए अगर 2010 की डेट में करवाता हूँ तो शादी से पहले दो बच्चे नौकरी में अयोग्यता का आधार तो नही होंगे? उचित सलाह दें।


समाधान-

ब से बड़ी गलत बात तो यह है कि आप विवाह की एक ऐसी तारीख चुन रहे हैं जो सही नहीं है। जिस तिथि को आप का विवाह हुआ था उस के सिवा किसी भी अन्य तारीख का विवाह का पंजीयन कराना गलत होगा। क्यों कि इस के लिए आप झूठ बोलेंगे, झूठा शपथ पत्र देंगे जो अपराध होगा जिस के लिए आप को सजा हो सकती है। यदि नौकरी लग भी जाए तो इसी कारण छूट भी सकती है और आप को कारावास का दंड भी भुगतना पड़ सकता है।

यह सही है कि आप की शादी हुई तब आप नाबालिग थे, या विवाह की उम्र के नहीं थे। विवाह हुए 14 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। यदि वह बाल विवाह किसी के लिए आप के व आप की माता की पत्नी का अपराध था भी तो अब इतना समय गुजर चुका है कि उस मामले में पुलिस या कोई भी उन के वि्रुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सकता। इस कारण किसी का अपराध छुपाने के लिए झूठ बोलने की  जरूरत ही नहीं है और बोलते हैं तो अपराध छुपाना भी अपराध है। इस कारण से आप को झूठ नहीं बोलना चाहिए।

कोई भी हिन्दू विवाह यदि संपन्न हो जाता है तो वह गलत हो सकता है लेकिन समाप्त नहीं होता और वैध होता है। इस कारण कम उम्र में किया गया आप का विवाह पूरी तरह से वैध है और आप उस का पंजीयन करवा सकते हैं। मेरी राय में आप को विवाह का पंजीयन उसी तिथि का करवाना चाहिए जिस तिथि में आप का विवाह हुआ है। इस से आप को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा। यदि पंजीयक पंजीयन करने से  मना करे तो न्यायालय से पंजीयक के विरुद्ध घोषणा व आदेशात्मक व्यादेश का वाद प्रस्तुत कर डिक्री पारित कराई जा सकती है और पंजीयन करवाया जा सकता है।

 

बाल विवाह हर हाल में रोका जाना चाहिए।

ChildMarriageसमस्या-

श्रवण नाथ स्वामी ने आगरा उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

पुराने रीति रिवाजों के आधार पर बाल विवाह करना सही है अथवा गलत? मेरे पड़ोस में एक बाल विवाह हो रहा है उसको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है?

समाधान-

ह प्रश्न जिन भाई ने भेजा है उन्हों ने अपना नाम व स्थान छुपाया है। यदि कोई अपना नाम किसी कारण सामने नहीं लाना चाहता है तो हम उस के इस अधिकार की रक्षा करते हैं। लेकिन समस्या आम हो तो उस का उत्तर सार्वजनिक रूप से देना उचित समझते हैं। आप अपना नाम न छुपाएँ, बस बता दें कि आप नाम उजागर नहीं करना चाहते।

बाल विवाह हर रूप में गलत है, सामाजिक रूप से भी और कानूनी रूप से भी। बाल विवाह से व्यक्ति ठीक से सोच समझ कर निर्णय लेने की स्थिति में आने के पहले ही विवाह के बंधनों में बांध दिया जाता है। उस के बाद उस के विकास की संभावनाएँ अत्यधिक सीमित हो जाती हैं। इस के अतिरिक्त विवाह योग्य उम्र होने तक कोई भी बालक बालिका विवाह की जिम्मेदारियों को संभालने के योग्य नहीं होते। वे गलतियाँ करते हैं और फिर उन के परिणाम जीवन भर भुगतते हैं।

कानूनन बाल विवाह अपराध है इसे रोका ही जाना चाहिए। यदि आप इसे रोकना चाहते हैं तो सीधे पुलिस को सूचित कर सकते हैं कि बाल विवाह हो रहा है उसे रोका जाए। आप नगर के सिटी मजिस्ट्रेट या उपखंड के उपखंड मजिस्ट्रेट और जिला कलेक्टर को भी सूचित कर सकते हैं। उन का दायित्व है कि वह इस तरह के विवाह को रोकें और यह अपराध करने वालों को सजा दिलाएँ।

लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। इस के विरुद्ध समाज में आंदोलन होना चाहिए। जो बच्चे किशोर उम्र के हैं वे ही इस के सब से अधिक शिकार होते हैं। किशोर उम्र में इतना तो व्यक्ति सोच ही लेता है कि उसे अभी विवाह नहीं करना चाहिए। तब किशोर आपस में मिल कर ऐसा समूह बना सकते हैं जो हर होने वाले बाल विवाह का प्रत्यक्ष रूप से विरोध करे और उन्हें रुकवाने के लिए पुलिस और प्रशासन को मदद के लिए बुला सके। समाज में अन्य लोग भी जो बाल विवाह के विरोधी हैं वे इस काम में किशोरों की मदद कर सकते हैं।

बाल विवाह को तुरन्त अकृत कराने के लिए आवेदन करें।

rp_divorce.jpgसमस्या-

विकास ने भीलवाड़ा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी जन्म दिनांक 24/07/1995 है, मेरा बाल विवाह पिछले साल ही हुआ है। लेकिन मुझे वो लडकी नापंसद है क्योंकि वो आधी पागल है। फिर भी मैं ने न चाहते हुये भी उसे स्वीकारा क्योंकि मेरी नजर में शादी जीवन का अहम हिस्सा होता है। किन्तु उसकी हरकतों से मैं परेशान हो गया। ना ही उसके पापा कोई बात सुनते हैं और ना ही मुझे कभी सही से बात करते हैं क्योकि वो नशे के आदी हैं और गैरकानूनी काम व चोरी करते हैं। किन्तु गाँव के लोगो को डरा धमका कर सरपंच बनकर हर जगह अपनी दादागीरी लगाते हैं। यहॉ तक कि मेरे माता पिता के ऊपर भी। अब जब मैं प्यार से उनकी बेटी को उनके घर छोड के आया हूँ ताकि वो उसे सुधार सकें और उस की अश्लील गालीयो को तथा गंदे कामों को छुडा सकें। किन्तु उन्होंने मुझ पर व मेरे परिवार पर मारपीट व दहेज जैसा गंदा केस लगाया। अब मुझे क्या करना चाहिये? जिस से मैं अपना जीवन इस नर्क से छुडा सकूँ।

समाधान

प की जन्मतिथि के अनुसार आप अब भी 21 वर्ष के नहीं हुए हैं। पर 20 वर्ष का युवक इतना भी नासमझ नहीं होता कि उसे अपने भले बुरे का पता न हो। पर विवाह एक ऐसी चीज है जिस से इस उम्र में इन्कार कर पाना कठिन होता है। यह केवल पारिवारिक सामाजिक दवाब के कारण ही नहीं होता अपितु कहीं न कहीं विवाह करने वाले पुरुष की इच्छा उस में सम्मिलित होती है। ये जो शिकायतें आप कर रहे हैं उन के बारे में आप को विवाह के पहले पता होना चाहिए था। यदि नहीं था तो इस का पता लगाया जाना चाहिए था।

प अपनी पत्नी को उस के पिता के पास छोड़ आए हैं। पर पिता तो अपनी बेटी का विवाह कर चुका है। उस का अब कोई लेना देना नहीं है। मायका कोई फैक्ट्री तो है नहीं कि पत्नी नहीं पसंद आयी तो उसे वहाँ छोड़ दो जैसे खरीदा हुआ माल आप दुकानदार को लौटा दें कि इस में दोष है सुधार कर दो। न तो आप अपने ससुर को ठीक कर सकते हैं और शायद वे खुद भी चाहें तो नहीं हो सकते हैं। आप की पत्नी को ठीक करने की बात तो बहुत दूर की है।

प के विरुद्ध आप की पत्नी की और से मारपीट और दहेज जैसे आरोपों का मुकदमा लगाए गए हैं तो उन से निपटने का तरीका तो यही है कि अदालत सब को बचाव का अवसर देती है, आप को भी देगी। आप इस अवसर का उपयोग कीजिए और खुद को निरपराध साबित करने का प्रयत्न कीजिए। इस के लिए आप को एक अच्छा वकील करना होगा।

प का विवाह एक बाल विवाह है। इस विवाह को अकृत घोषित किया जा सकता है। आप विवाह योग्य उम्र (21 वर्ष) के होने से दो वर्ष की अवधि समाप्त होने के पूर्व अपने जिले के पारिवारिक न्यायालय और पारिवारिक न्यायालय न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष अपने बाल विवाह को अकृत घोषित कराने के लिए आवेदन दे सकते हैं। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की परिभाषा के अनुसार आप 21 वर्ष की आयु पूर्ण हो जाने पर वयस्क होंगे। आप की जन्मतिथि के अनुसार आप 24.07.2016 को 21 वर्ष के हो जाएंगे। अर्थात आप दिनांक 23.07.2018 तक अपने विवाह को अकृत घोषित कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन यह काम आप को जितना जल्दी हो सके करना चाहिए। आप 18 से अधिक की आयु के हैं और स्वयं यह आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं

आप का विवाह अकृत घोषित किए जाने के साथ ही न्यायालय आप को आप की पत्नी के भरण पोषण के लिए आदेश दे सकता है। लेकिन यह आदेश तब तक ही प्रभावी रहेगा जब तक आप की पत्नी दुबारा विवाह नहीं कर लेती है।

विवाह योग्य उम्र होने से दो वर्ष तक बाल विवाह अकृत कराया जा सकता है।

ChildMarriageसमस्या-

विनोद जाट ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विकास है मेरी जन्मतिथि 26.11.1995 है। मेरी शादी 15.11.2009 को 14 वर्ष की आयु में मेरी नापसंद लडकी के साथ चौरों की तरह रात 2 बजे एकान्त में हिन्दू रिवाज से करवाई गई। लडकी को ना अपनाने के कारण मैं ने बी.कॉम सैकण्ड इयर परीक्षा कर ली और वह अभी 8वीं मे पढ़ती है। मेरी लंबाई 5.10″ है और उसकी 4.5″ से भी कम है। वह मुझे बिलकुल नापसन्द है। उस का व्यवहार बच्चों जैसा है। वह दिखने में एकदम बच्ची लगती है। उस को कुपोषण है। विवाह का उपभोग नहीं किया है। मैं उसे कैसे भी करके छौड चाहता हूँ। लडकी मुझे छोडना नहीं चाहती। मैं उसे 1% भी नही चाहता। कृपया मुझे इस से छुटकारा दिलवायें।

समाधान-

प अपनी पत्नी से छुटकारा चाहते हैं। आप विवाह योग्य उम्र के होने के दो वर्ष की अवधि में अपने जिले के पारिवारिक न्यायालय और पारिवारिक न्यायालय न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष अपने बाल विवाह को अकृत घोषित करने के लिए आवेदन दे सकते हैं। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की परिभाषा के अनुसार आप 21 वर्ष की आयु पूर्ण हो जाने पर वयस्क होंगे। आप की जन्मतिथि के अनुसार आप 26.11.2016 को 21 वर्ष के हो जाएंगे। अर्थात आप दिनांक 26.11.2018 तक अपने विवाह को अकृत घोषित कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन यह काम आप जितना जल्दी हो कर सकते हैं। इस आवेदन को प्रस्तुत करने के लिए आप 18 वर्ष की उम्र प्राप्त करते ही योग्य हो चुके हैं और स्वयं अपने बाल विवाह को अकृत कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

प का विवाह अकृत घोषित किए जाने के साथ ही न्यायालय आप को आप की पत्नी के भरण पोषण के लिए आदेश दे सकता है। लेकिन यह आदेश तब तक ही प्रभावी रहेगा जब तक आप की पत्नी दुबारा विवाह नहीं कर लेती है।

वयस्क होने के पूर्व बाल विवाह को अकृत घोषित कराया जा सकता है।

ChildMarriageसमस्या-

अनिरूद्ध मीना ने सीकर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा बाल विवाह 11 साल की आयु में 2005 में हुआ था। 2013 में मेरा गौना कर दिया गया। अब हमारे आपस में बिलकुल भी नहीं बन रही है। अभी हम ने कोई संतान उत्पन्न नहीं की क्यों कि मेरी पढ़ाई पूरी नहीं हुई है। मेरे किसी भी दस्तावेज में इस शादी का उल्लेख नहीं है। मैं अपनी पत्नी से तलाक लेना चाहता हूँ। मैं ने इन्टरनेट पर इस से सम्बन्धित जानकारी खोजी तो 2006 का कानून सामने आया। इस में होने वाली अभिवावकों की सजा एवं भरण पोषण के बारे में बताये। क्या जुर्माना देकर सजा से बचा जा सकता है? बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी कौन होता है व कहाँ बैठता है? इस कानून में हुए संशोधन व तलाक की प्रकिया बताइये। जन्म दिनाँक 20/11/1994 ( केन्द्रीय स्तर पर जनजाति)

समाधान-

प तलाक लेना चाहते हैं। लेकिन उस की आवश्यकता नहीं है। आप वयस्क होने के दो वर्ष की अवधि में अपने जिले के पारिवारिक न्यायालय और पारिवारिक न्यायालय न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष अपने विवाह को अकृत घोषित करने के लिए आवेदन दे सकते हैं। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की परिभाषा के अनुसार आप 21 वर्ष की आयु पूर्ण हो जाने पर वयस्क होंगे। आप की जन्मतिथि के अनुसार आप 20.11.2015 को 21 वर्ष के हो जाएंगे। अर्थात आप दिनांक 19.11.2015 तक अपने विवाह को अकृत घोषित कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

प का विवाह 2005 में हुआ था इस कारण इस कानून में वर्णित अपराधों के लिए किसी को दंडित कराने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है। कोई भी कानून प्रभावी होने से पिछली तिथि की घटनाओं पर प्रभावी नहीं होता है। इस मामले में बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी की कोई भूमिका नहीं है। वैसे जिला मजिस्ट्रेट अर्थात जिला कलेक्टर को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी की शक्तियाँ प्रदान की हुई हैं।

प का विवाह अकृत घोषित किए जाने के साथ ही आप को न्यायालय आप की पत्नी के भरण पोषण के लिए आदेश दे सकता है। लेकिन यह आदेश तब तक ही प्रभावी रहेगा जब तक आप की पत्नी दुबारा विवाह नहीं कर लेती है।

बाल विवाह को अकृत करवाने और आपसी समझौते का प्रयास करें।

Counsellingसमस्या-

आर्यन ने छावनी, उत्तर प्रदेश बस्ती से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 7.6.2011 हिन्दू रितिरिवाज से सम्पन्न हुई थी मेरी पत्नी मेरी साथ विदा हो कर आई। लगभग। एक साल मेरी साथ थी इस बीच मुझे। पता चला कि मेरी पत्नी का एक लडके से सम्बन्ध है। हमने अपनी पत्नी से पूछा तो बोली हमारा सम्बन्ध शादी से पहले से है और मेरे मायके वाले जानते हैं। फिर हम ने अपने ससुर को बुलाया और पूछा कि क्या ये सब सही है तो उन्हो ने कहा कि शादी के पहले था पर अब नहीं है। फिर मैंने फोन पर रिकार्डिगं सुनाया जो 5.9.12 का था। तब मेरे ससुरजी ने मेरी पत्नी कोसमझाया कि अब ये सब गलत कर रही हो। फिर मेरे ससुरजी चले गये। 29.9.12 को मेरे ससुरजी पत्नी के मामा आये, मैं घर पर नहीं था और मेरी पत्नी को विदा करा के ले गये। फिर मेरे पिता जी 10.12.12 को विदा करवाने गये। मेरे ससुरजी ने कहा कि खिचड़ी के बाद आर्यन को भेज देना, वही आ कर ले जाएगा। मेरे पिता जी चले आये और मुझे कहे कि खिचड़ी के दूसरे दिन चले जाना। मैं 17.1.13 को अपनी पत्नी को लेने गया। जिस पर मेरे ससुरजी सास ने कहा कि अपना हिस्सा बाँट लो फिर मैं तुम्हारे साथ भेजूंगा। तब मैंने कहा कि मेरी पत्नी से बात कराओ। पर मुझे मेरी पत्नी से मिलने नहीं दे रहे हैं और कहा कि जो करना होगा कर लेना। इस बीच बहुत कहा सुनी हुई। मेरी पत्नी और ससुरजी अपने जिले पर 23.1.13 को तलाक का वाद दाखिल कर दिया जिस में आरोप लगाया कि मेरे पति मुझे मारते पीटते हैं और तान्त्रिक का काम कराते हैं और मेरे साथ तान्त्रिक साधना के समय स्त्री गमन प्रातिबन्धित है। मेरे साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं हुआ है और मेरा बालविवाह हुआ था और मैं इस समय नाबालिग हूँ। मेरी जन्मतिथी 1.7.1996 है। फिर मैं अपने जिले पर विदाई का दावा 27.2.13 को किया और 1.3.13 को 406/504 का मुकदमा किया। जिस में मेरी पत्नी मेरे ससुरजी व मामा को 15.11.13 को तलब करने का आदेश हुआ। फिर मेरे ससुराल वाले अपनी जमानत 15.9.14 को कराये। इसके बाद मेरे ससुरजी ने 10.10.14 को दहेज उत्पीड़न का और घरेलू हिंसा का वाद दाखिल कराये। अब मैं यह जानना चाहचा हूँ कि क्या हमारे रिश्तेदार को भी जेल जाना पडेगा। इस के बाद मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की जन्मतिथि 01.07.1996 है। इस हिसाब से विवाह के दिन 06.07.2011 को आप की उम्र केवल 15 वर्ष कुछ दिन थी और आप अवयस्क थे। विवाह निश्चित रूप से बाल विवाह था। आप दिनांक 01.07.2014 को 18 वर्ष के हुए हैं, बालिग हो गए हैं लेकिन विवाह की उम्र आप की अभी भी नहीं हुई है। आप 01.07.2017 को 21 वर्ष के होंगे। आप की पत्नी को हक है कि उक्त विवाह को वह अकृत घोषित करवा दे। आप भी अपने विवाह को अकृत घोषित करने का आवेदन दे सकते हैं। चूंकि यह बाल विवाह का मामला है इस कारण आप के परिवार वालों और रिश्तेदारों को पुलिस अभियुक्त बना सकती है। यदि पुलिस ने आप के परिवार वालों और रिश्तेदारों को अभियुक्त बनाया तो उन की गिरफ्तारी हो सकती है लेकिन जमानत हो जाएगी।

स विवाद का हल आप दोनों के विवाह विच्छेद से ही संभव है। आप को स्वयं पत्नी के परिवार वालों के समक्ष विवाह को अकृत घोषित करवा कर विवाद को समाप्त करने का प्रस्ताव रखते हुए समझौते की तरफ बढ़ना चाहिए।

जो मुकदमे चल रहे हैं उन्हें न्यायालय से निवेदन कर के लोक अदालत में रखवा लें और समझौते का प्रयास करें यही बेहतर होगा। वर्ना इस लड़ाई में बरसों निकल जाएंगे। दोनों पक्षों का बहुत धन और समय व्यर्थ होगा और सब से बड़ी बात ये कि आप के जीवन के वे महत्वपूर्ण साल जो आप का कैरियर बनाने और अच्छे दाम्पत्य के लिए होने चाहिए बेकार चले जाएंगे। आप ने मुकदमे किए हैं तो वकील की सहायता आप को प्राप्त है। आप उन से सलाह ले कर आगे बढ़ सकते हैं।

अल्पवयस्क का विवाह क्या अवैध होगा?

Muslim-Girlसमस्या-

समीर जी ने उत्तरप्रदेश के शाहाबाद, जिला हरदोई उत्तर प्रदेश राज्य से समस्या भेजी है कि


क्या कोई मुस्लिम लडकी 17 वर्ष की उम्र में किसी हिन्दू लडके से विवाह कर सकती है‚? लडकी की शैक्षिक प्रमाण पत्र में उम्र 17 वर्ष हो और उसका मतदाता पहचान प्रमाण पत्र भी बना हो‚ मतदाता पहचान प्रमाण पत्र पहले से बना है और हाईस्कूल का प्रमाणपत्र बाद का है। क्या यह विवाह वैध होगा और उसकी प्रक्रिया क्या होगी? क्या इसके विरूद्ध कोई कार्यवाही हो सकती हैॽ


समाधान-

प की समस्या स्पष्ट नहीं है। अपितु एक काल्पनिक समस्या को सामने रखा है। सब से पहले तो एक मुस्लिम लड़की का तीन प्रकार से एक हिन्दू लड़के से विवाह हो सकता है। पहला तो यह कि लड़का इस्लाम ग्रहण करे और इस्लामिक तरीके से उन का निकाह हो। दूसरा यह कि लड़की हिन्दू धर्म ग्रहण करे और हिन्दू विधि से विवाह हो तथा तीसरा यह कि दोनों विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह को जिला विवाह पंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराएँ।

स्लाम व हिन्दू विधि में एक लड़की 17 वर्ष की रहते हुए विवाह कर सकती है लेकिन उस के माता पिता की सहमति होना आवश्यक है। यह विवाह एक बाल विवाह की श्रेणी में आएगा। हालांकि विवाह अवैध नहीं होगा लेकिन विवाह करने वाले, कराने वाले और सम्मिलित होने वालों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में मुकदमा चला कर दंडित किया जा सकता है। विशेष विवाह अधिनियम में यह विवाह नहीं हो सकता क्यों कि वहाँ जब तक लड़की 18 वर्ष पूर्ण नहीं कर लेगी विवाह पंजीकृत नहीं हो सकेगा।

तदाता पहचान पत्र बना है तो उस में उम्र 18 वर्ष से अधिक की होगी। उस के आधार पर तीनों तरह के विवाह संपन्न हो सकते हैं।  विशेष विवाह अधिनियम में विवाह की तिथि के 30 दिन पहले नोटिस देनाा अनिवार्य है जिस के बाद पंजीयक की ओर से कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर तथा दोनों के पते पर नोटिस चस्पा किया जा कर आपत्तियाँ आमंत्रित की जाती हैं। वैसी स्थिति में कोई भी उस का स्कूल प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर उक्त विवाह के पंजीकरण पर आपत्ति कर सकता है। जब तक विवाह पंजीयक आपत्ति को निरस्त न कर दे तब तक विवाह का पंजीकरण नहीं हो सकेगा।

स तरह के मामलों मे सब से सुरक्षित और विधिक रीति यही है कि कोई धर्म परिवर्तन न हो तथा विशेष विवाह अधिनियम में ही विवाह संपन्न हो तथा स्कूल सर्टिफिकेट के अनुसार आयु 18 वर्ष की हो जाने की प्रतीक्षा की जाए।

अवयस्क के विवाह के शून्यकरण के लिए वयस्क होने के दो वर्ष की अवधि में ही आवेदन संभव

ChildMarriageसमस्या-
नालंदा, बिहार  से अनिल ने पूछा है-

मेरी शादी मेरे माता-पिता ने तथा मेरी पत्नी के माता-पिता ने 15 वर्ष की उम्र में वर्ष 2004 में मेरी मर्जी के बिना कर दी थी। जबकि मैंने इस शादी के लिए अपने पिता एवम् ससुर दोनो को ही मना किया था लेकिन वे नहीं माने। वो लडकी मुझे पसंद नहीं थी और सही से पढ़ी लिखी भी नहीं थी । मैं ने अपनी पत्नी से अभी तक शारीरिक सम्बन्ध भी नहीं बनाया है और ना ही उसे अपने पास रखा है। सभी के दबाब बनाने पर 4 साल पहले पहले उसे पढाने के लिए अपने ससुर को बोला। लेकिन उस का अब कहना है कि उस से अब पढ़ाई नहीं होगी। हर समय आकर गाली गलौज भी ससुराल वाले करते हैं और धमकी देते हैं कि अगर अब मैं उसे नहीं रखता हूँ तो अब वो लोग दहेज का केस कर देंगे।  मेरी नौकरी बर्बाद कर देंगे। मैं क्या करूँ? क्या ये विवाह वैध है? यदि वैध है तो तलाक कैसे लूँ।

समाधान-

प दोनों का विवाह अवैध और शून्य नहीं है। लेकिन बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की धारा -3 ने बालक-बालिका को यह अधिकार प्रदान किया है कि यदि उस का विवाह अवयस्क हालत में कर दिया जाए तो वह उस विवाह को न्यायालय में आवेदन दे कर अकृत करवा सकता है। यह आवेदन बालक या बालिका वयस्क होने के दिन से दो वर्ष की अवधि में न्यायालय को प्रस्तुत कर सकते हैं।

प ने यह नहीं बताया कि आप का विवाह 2004 में किस तिथि को संपन्न हुआ था तथा आप की जन्मतिथि क्या है? इस से यह निर्धारित करना असंभव है कि आप अब भी ऐसा आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं या नहीं। आप ने विवाह के समय 2004 में अपनी उम्र 15 वर्ष बताई। इस तरह आप 2010 में 21 वर्ष की आयु के हो जाते हैं। 21 वर्ष की उम्र के होने से दो वर्ष की अवधि में अर्थात 2012 में आप के 23 वर्ष की उम्र के होने तक यह आवेदन जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता था और आप के विवाह को अकृत घोषित किया जा सकता था। लैकिन इस मामले में आप ने कम से कम एक-दो वर्ष की देरी कर दी है। इन परिस्थितियों में आप का विवाह अकृत घोषित नहीं करवाया जा सकता।

प ने अपनी समस्या में पत्नी को न अपनाने के मात्र दो कारण बताए हैं जिन में से एक उस का पढ़ा लिखा न होना है और दूसरा आप की पसंद का न होना है। इन दोनों कारणों के आधार पर आप विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त नहीं कर सकते। विवाह विच्छेद की डिक्री केवल उन्हीं आधारों पर प्राप्त की जा सकती है जो आधार हिन्दू विवाह अधिनियम में वर्णित हैं। इस के लिए आप को स्वयं किसी स्थानीय वकील को सारी परिस्थितियाँ बता कर सलाह लेनी चाहिए कि आप दोनों का तलाक हो सकता है अथवा नहीं।

न परिस्थितियों में आप के पास अपनी पत्नी को अपनाने के सिवा अन्य कोई मार्ग नहीं है। यदि आप की पत्नी और उस के मायके वाले दहेज का मुकदमा करने की धमकी दे रहे हैं तो उस का उद्देश्य यही है कि आप अपनी पत्नी को अपना लें। यदि वे दहेज का मुकदमा करते हैं तो यह झूठा होगा और बाद में समाप्त हो जाएगा। लेकिन इसे ले कर आप को परेशान तो किया ही जा सकता है। इन परिस्थितियों में बहुत सोच समझ कर निर्णय लें। क्यों कि आप अपनी पत्नी के साथ निबाह कर पाएंगे यह संभव नहीं लग रहा है। इस स्थिति में कोई मार्ग ऐसा निकल आए कि दोनों पति-पत्नी आपसी सहमति से विवाह विच्छेद कर लें तो सब से उत्तम है। अन्यथा, फिलहाल तो यही मार्ग है कि आप अपनी पत्नी को अपना लें।

जग्या और गौरी को कारावास की सजा हो सकती है

  
 कल शाम मेरी पाठिका सिमरन से फोन पर बात हुई। पूछ रही थी -आप ‘बालिका वधु’ देखते हैं? -हाँ, यदा-कदा, पर पत्नी के सौजन्य से कहानी पता लगती रहती है। मैं ने उत्तर दिया। उस ने सवाल किया …
बालिका वधु में जगदीश और आनंदी का बाल विवाह हुआ, फिर जगदीश का गुड़िया के साथ दूसरा बाल विवाह हुआ। जगदीश डाक्टरी पढ़ने चला गया। वहाँ एक लड़की से उसे प्रेम हुआ और उसने उस लड़की से पंजीकृत विवाह कर लिया। वह लड़की वही थी जिस से उस का दूसरा विवाह हुआ था। इन तीनों विवाहों की वैधानिक स्थिति क्या है? 
सिमरन को इस सवाल का जवाब फोन पर नहीं दिया जा सकता था, मैं ने उसे कहा -जवाब ‘तीसरा खंबा’ पर ही देखना। 

 उत्तर – 
ज के इन टीवी सीरियलों से सम्बन्धित उत्तर देने में सब से बड़ी परेशानी उन का काल रहा है। उन की कहानी आज में आरम्भ होती है और आगे बढ़ती रहती है। सीरियल का हर अंक आज में होता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है. पिछले अंक विगत काल में पीछे, और पीछे खिसकते जाते हैं। भारत में विवाह सम्बन्धी कानूनों का भी समय के साथ विकास हुआ है। वे विभिन्न तिथियों पर प्रभावी हुए हैं, इस कारण सीरियल के किस सोपान पर कौन सा कानून प्रभावी होगा यह तय करना एक असम्भव कार्य है। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर मैं ने सभी घटनाओं पर आज प्रभावी कानूनों के प्रकाश में देने का निश्चय किया है।   
भारत में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनिम 1929 से लागू था। इस के बावजूद बड़े पैमाने पर बाल विवाह होते रहे। यह कानून बाल विवाहों को रोक पाने में पूरी तरह अक्षम सिद्ध हुआ। केवल वे ही विवाह रोके जा सकते थे जिन की पूर्व सूचना पुलिस और न्यायालय को दी जाती थी। इतना ही नहीं ऐसे विवाहों को रोकने के लिए एक सामाजिक दबाव या मजबूत व्यक्तिगत इच्छा की आवश्यकता होती थी। हालत यह थी कि पुलिस रिपोर्ट करने वाले को भी अक्सर यह सलाह देती थी कि वह क्यों इस पचड़े में पड़ रहा है, फिजूल ही बाल विवाहों की सामाजिक मान्यता का विरोध कर अपने जीवन में कष्टों को आयात कर रहा है। अदालतें भी जब तक कोई उन के सामने मुकदमा ले कर नहीं आता और अंतिम क्षण तक उस का समर्थन न करता रहता कोई कार्यवाही कर पाने में अक्षम रहती थीं। कानून का प्रभाव क्षीण होने के बाद भी अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बाल विवाहों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। स्थिति यह भी थी कि एक बार बाल विवाह हो जाने के बाद वह शून्य नहीं होता था और कानूनी रूप से वैध बना रहता था। उसे केवल न्यायालय से ही शून्य घोषित कराया जा सकता था। 
स स्थिति को देखते हुए 2007 में बाल विवाह उन्मूलन अधिनियम-2006 पारित हुआ और धीरे-धीरे भारत के सभी राज्यों में प्रभावी किया गया। इस कानून के अंतर्गत बाल विवाहों को रोकने के लिए प्रभ
ावी दंड व्यवस्था बनाई गई है।  अब बाल विवाह का कोई भी पक्षकार वयस्क होने के दो वर्ष की अवधि में न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर अपने विवाह को शून्य घोषित करवा सकता है। इस कानून में यह भी प्रावधान है कि विवाह शून्य घोषित होने पर दोनों पक्ष दिए गए उपहारों को वापस करेंगे और जब तक स्त्री पुनः विवाह नहीं कर लेती है या स्वयं का भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं हो जाती है तब तक पुरुष पक्ष को उसे न्यायालय द्वारा निर्धारित भरण पोषण राशि अदा करनी पड़ेगी। (बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 को यहाँ देखा जा सकता है)
तनी जानकारी के बाद हम इस सीरियल में हुए विवाहों की वैधानिकता पर विचार कर सकते हैं। आनन्दी और जगदीश का बाल विवाह होने के बाद भी उसे किसी न्यायालय द्वारा न तो शून्य घोषित किया गया है और न ही उसे विखंडित किया गया है। इस कारण से वह एक वैध विवाह है। जगदीश और आनन्दी दोनों ही वैधानिक रूप से आज तक पति-पत्नी हैं। दोनों हिन्दू हैं और उन पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। इस कारण से एक वैध विवाह से पति-पत्नी होते हुए उन में से कोई भी दूसरा विवाह नहीं कर सकता है। यदि उन में से किसी का भी दूसरा विवाह होता है तो ऐसा विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-5 (i) की शर्त के प्रतिकूल होने से अकृत और शून्य है तथा किसी भी पक्षकार द्वारा न्यायालय में धारा-11 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत करने पर अकृत घोषित किया जा सकता है। 
स तरह हम पाते हैं कि जगदीश और आनन्दी का विवाह आज भी वैध है और जगदीश का दूसरा बाल विवाह प्रारंभ से ही अकृत और शून्य था। उस विवाह को वैधानिकता प्राप्त नहीं थी और जगदीश व गौरी (गुड़िया) के बीच पति-पत्नी का कोई भी वैधानिक सम्बन्ध कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ था। अब जगदीश ने गौरी से फिर से एक पंजीकृत विवाह किया है और उस का प्रमाण पत्र प्राप्त कर अपने परिवार में प्रवेश कर उसे दिखाते हुए घोषणा की है कि उन का विवाह वैध है और वे दोनों पति-पत्नी हैं। लेकिन जगदीश की पत्नी आनन्दी के जीवित रहते तथा वह विवाह खंडित नहीं होने के कारण गौरी के साथ उस का विवाह अकृत और शून्य है। जगदीश का यह कहना कि गौरी उस की पत्नी है एक अवैध घोषणा है। 
गदीश जानता था कि उस की पत्नी अभी जीवित है इस के बावजूद उस ने गौरी से विवाह किया। इस तथ्य से गौरी भी परिचित थी। इस के बावजूद उन्हों ने गलत और मिथ्या तथ्य विवाह पंजीयक को बता कर तथा मिथ्या शपथ पत्र द्वारा उस की साक्ष्य प्रस्तुत कर अपने इस अकृत और शून्य विवाह को पंजीकृत कराया है। उन दोनों का यह कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 193, 197, 198, 199 तथा 200 के अंतर्गत अपराध भी है जिस के लिए पुलिस स्वयं प्रसंज्ञान ले कर कार्यवाही आरंभ कर सकती है, दोनों को गिरफ्तार कर सकती है और उन के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती है जिस में उन दोनों को कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

बाल विवाहों के पूर्ण प्रतिषेध के लिए उन्हें प्रारंभ से ही शून्य और अकृत घोषित किया जाए

 क और आखा तीज (अक्षय तृतिया) गुजर गई। इस दिन किए गए दान का पुण्य अक्षय होता है, ऐसी मान्यता है और तमाम हिन्दू धार्मिक पीठें, संत, कथावाचक आदि इस बात का खूब प्रचार भी करते हैं। यह भी मान्यता है कि रजस्वला होने के पूर्व ही कन्या (पुत्री) का कन्यादान कर दिया जाए तो उस से बड़ा दान कुछ नहीं होता। नतीजा यह है कि इन धारणाओं ने आखा तीज को विवाह के लिए अबूझ सावा (विवाह मुहूर्त) बना दिया है। इस दिन थोक में बाल विवाह होते हैं। विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात  मध्य प्रदेश और कुछ अन्य प्रांतों में बहुत बड़ी संख्या में बालविवाह  होते रहे हैं। पिछले तकरीबन पैंतीस वर्षों में सामूहिक विवाह होने लगे जिन में बाल विवाह धड़ल्ले से हुए। सांसद और विधायक जो स्वयं कानून बनाते हैं, राजनैतिक दलों के नेता जो बाल विवाह के खिलाफ खूब बोलते हैं, इन सामूहिक विवाह समारोहों में आशीर्वाद देते और वोट पटाते खूब नजर आए। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी जिन पर संवैधानिक रूप से और अपनी सेवाओं के कर्तव्य के एक भाग के रूप में बाल विवाहों को रोकने की जिम्मेदारी है,  इन सामूहिक विवाहों की व्यवस्था करते रहे।

बाल विवाहों का अनिवार्य परिणाम यह सामने आया कि विवाह संबंधी विवादों में भारी वृद्धि हुई। कुछ भी होता है कि लड़की को पिता के घर रोक लिया जाता है, और फिर धारा 125 दं.प्र.सं. में भरणपोषण के मुकदमे से विवाद का अदालत में आरंभ हो जाता है। अब तो अनेक माध्यम हैं जिन के जरिए अदालत जाया जा सकता है। दं.प्र.सं. के अतिरिक्त घरेलू हिंसा अधिनियम और हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का सहारा लिया जा रहा है। इस से पहले से ही मुकदमों से अटी अदालतों में मुकदमों की संख्या और बढ़ी है। कानून के अंतर्विरोध भी इस का कारण बने हैं। सब से बड़ा अंतर्विरोध है कि हिन्दू विवाह अधिनियम में किसी भी बाल विवाह को अवैध नहीं माना जाता। एक बार संपन्न हो जाने के उपरांत विवाह वैध हो जाता है और उसे बाल विवाह होने के कारण अवैध, अकृत, या शून्य घोषित नहीं किया जा सकता है।
क और तो यह स्थिति है, दूसरी और बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम ने बाल विवाह को अपराधिक कृत्य बनाया हुआ है और सजाओं का प्रावधान किया है, इसे विधि की विडम्बना कहा जाए या फिर विधायिका द्वारा निर्मित विधियों से विधिशास्त्र में उत्पन्न किया गया अंतर्विरोध। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में 18 से कम आयु की स्त्री और 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष के विवाह को वर्जित घोषित किया गया है और ऐसा विवाह करने वाले 18 से अधिक और 21 वर्ष से कम आयु के और उस से अधिक आयु के लड़के को अलग अलग दंडों का भागी घोषित किया गया है। इसी विवाह को कराने वाले पुरोहित और माता-पिता के लिए भी दंडों का विधान किया गया है। इस तरह एक ऐसा कृत्य जिस को करने और कराने वाले वयस्क व्यक्तियों को अपराधी कहा गया है उसी कृत्य के परिणाम विवाह को वैध करार दिया गया है। हिन्दू विवाह और अन्य किसी भी व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत संपन्न बाल विवाह को हर स्थिति में वैध माना गया है। ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानों को वही अधिकार प्राप्त हैं जो कि अन्य विवाहों से उत्पन्न संतानों को प्राप्त हैं। 

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