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बेनामी संपत्ति व्यवहार क्या है?

समस्या-

जितेन्द्र ने  मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे बाबा ने अपनी दो ऐकड जमीन मेरे मामा के नाम बसीयत 1985 में करदी थी। यदि मामा वह जमीन मेरे नाम वसीयत करदे, तो यह जमीन बेनामी सम्पत्ति अधिनियम के अन्तर्तगत तो नहीं आएगी।


समाधान-

बेनामी संपत्ति व्यवहार वह संपत्ति व्यवहार है जिस में संपत्ति किसी के नाम पर खरीदी जाए और जिस का मूल्य किसी और ने चुकाया हो तथा वह संपत्ति जिसे कोई अपने नाम पर किसी अन्य के लाभ के लिए रखता है लेकिन उस संपत्ति का मूल्य चुकाया हो।  इस प्रकार वसीयत और दान आदि व्यवहार किसी तरह के बेनामी व्यवहार नहीं हैं।

आपके मामा को वसीयत में प्राप्त संपत्ति यदि मामा द्वारा आप को वसीयत की जाती है तो यह किसी भी प्रकार से बेनामी संपत्ति नहीं कही जाएगी।

अपने हक पर डटे रहिए, तो हक कायम रहेगा।

ऊसरसमस्या-

श्वेता तिवारी ने रीवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मै मध्य प्रदेश की रहने वाली हूँ। सन 1992 मे मेरे ससुर जी ने और मेरे पति ने मिलकर एक जमीन ली थी उस जमीन की रजिस्ट्री मेरे नाम है। मेरे ससुर जी ने धीरे धीरे उस प्लाट में सन 2000 में दो मंजिला मकान बनवा दिया है जिस पर मेरा सारा परिवार और सास ससुर सब रह्ते थे। सन 2009 में मेरे ससुर के देहान्त के बाद मेरी सासू जी अपने छोटे बेटे के पास जाकर रहने लगी और अब कुछ समय पश्चात मेरे देवर घर आकर हम सब को धमकी देते हैं कि मैं इस मकान में हिस्सा ले के रहूंगा और उन्होने इसके लिये कचहरी के चक्कर काटने शुरु भी कर दिये हैं। जब कि गाँव में 4 बीघा पैतृक सम्पति भी है जिस में से हम लोगो ने अभी एक दमडी भी नहीं लिया है। वे पिछले 20 सालों से उस पर अनाज पैदावार करके कमाई कर रहे हैं। ससुर जी उन के लिये भी गांव में ही मकान बनवाया है। जब मेरे पति ने उनसे ये कहा की भाई जो पैतृक जमीन है हमारे हिस्से वाली उसे तुम्हीं खरीद लो कुछ पैसे कम ही सही दे देना। जमीन तुम्हारी ही रहेगी इतने मे देवर जी भडक गये। कहे कि कोई हिस्सा नहीं मिलेगा अब तो गोलियाँ चलेंगी और उस मकान (मेरे नाम वाला मकान) में भी हिस्सा लूंगा। अब आप उचित राय दे मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प को परेशान होने की जरूरत नहीं है। जो मकान आप का है वह आप का ही रहेगा। आप के देवर को सही सलाह मिली तो वे कोई मुकदमा न करेंगे। यदि करते हैं तो उन्हें असफलता मिलेगी। उन की बातों से उत्तेजित या घबराने की कोई बात नहीं है।

दि आप के देवर गाँव की जमीन में हिस्सा देने को तैयार नहीं हैं होते हैं तो आप के पति को चाहिए कि वे गाँव की जमीन के बँटवारे का मुकदमा कर दें। समय तो लगेगा पर विभाजन हो कर आप के पति का हिस्सा बन कर उस का कब्जा मिल जाएगा। तब जमीन आप के पति के हिस्से को बेचा जा सकता है। कोई गोलियाँ नहीं चलेंगी। यदि आप को लगता है कि देवर कुछ ऐसा भी कर सकता है और अब की बार धमकी दे तो पुलिस को रिपोर्ट कराइएगा। हिम्मत कर के अपने अधिकार पर डटे रहना पड़ेगा। चीजें ठीक हो जाएंगी।

जो संपत्ति जिस के नाम पंजीकृत है उसी की मानी जाएगी।

Farm & houseसमस्या-

यज्ञदत्त वर्मा नो चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से पूछा है-

मैं मध्यप्रदेश का निवासी हूं तथा वर्तमान में मैं राजस्थान में प्राइवेटजाब कर रहा हूं, हमारा कोर्ट केस चल रहा है जिसका विवरण निम्न प्रकार है- मेरे पिताजी ने आज से लगभग 45-47 वर्ष पूर्व नगरपालिका से अपनी नौकरीलगने के पश्चात रहवासी जमीन खरीदी थी दादाजी उस समय जीवित थे पिताजी, दादाजी, दादीजी तथा पिताजी के तीन बहनें व एक भार्इ था जो उस समय नाबालिगथे मेरे पिताजी की आमदनी जमीन के मूल्य से लगभग तीन गुना थी। दादाजी घरके मुखिया थे अत: पिताजी जो भी काम करते थे उनकी सलाह तथा आदेश के अनुसारही कार्य करते थे अत: वह जमीन मेरे पिताजी ने अपने नाम से खरीदी थी और उसकारूपया कीमत अपने वेतन की बचत से जमा करवाया था तथा सभी प्रकार के टेक्सपिताजी ही भरते हैं। दादाजी की मृत्यु के पश्चात पिताजीने उनके छोटे भार्इ तथा तीनों बहनों की शादी करी, मकान भी अपनी बचत सेवेतनभत्तों, जी.पी.एफ. से अग्रिम लेकर धीरे-धीरे टुकड़ों में मकान बनवाया तथा छुटपन से छोटेभार्इ (मेरे चाचा) को अपने साथ रखा चाचा की शादी के कुछ समयपश्चात उसको उसीमकान में अलग रहने की इजाजत दी । मकान में प्रेम वश रहने दिया क्योंकि मेरेचाचा पास रहने के लिये मकान नहीं था तथा काम धन्धा भी ठीक नहीं था परन्तुजब मेरे चाचा ने (पिताजी के भार्इ) अपना मकान बना लिया तो पिताजी ने अपनेछोटे भार्इ (चाचा) को अपने मकान में जाने के लिये कहा। पहले तो जाने केलिये तैयार हो गया परन्तु बाद में मना कर दिया और कहने लगा की ये बेनामीसम्पति है तथा मेरे पिताजी (दादाजी ने) हम दोनों भार्इयों (पिताजी व चाचा)के लिये खरीदी है तथा कहता है दादाजी ने परिवार के सामने मौखिक रूप से जमीनकाआधा-आधा हिस्सा कर दिया था जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। हो सकता है दादीजी सेजीवित अवस्था में कोर्इ कोर्ट स्टाम्प पर अंगूठा लगवा लिया हो।मेरेचाचा आधी जमीन का मालिक खुद को बताता है और कहता है कि मैं नाबालिग थाइसलिये उस समय जमीन बड़े भार्इ के नाते दादाजी ने मेरे पिताजी के नाम खरीदीथी जबकि दादाजी की कोर्इ आर्थिक सहायता नहीं थी और दादाजी उस समय आर्थिकरूप से सम्पन्न नहीं थे दादाजी की आर्थिक सिथति खराब होने के कारण पिताजीको जल्दी नौकरी करनी पड़ी। अभी फिलहाल आधे प्लाट पर मेरे चाचा का ही कब्जाहै मेरे चाचा बोलते है कि जिस भाग में मैं रहता हूं उसे मैनें ही बनाया हैजबकि उन्होंने कुछ भी पैसा नहीं लगाया है। मेरे पिताजी के पास जमीनके सभी कागज उपलब्ध है तथा मेरे पिताजी के पास निर्माण सम्बंधी कागजात नहींहै पिताजी अक्सर शहर से बाहर रहते थे और मकान किसी भी ठेकेदार से और ना हीएक-मुश्त बनवाया जितनी भी बचत होती थी मेरे पिताजी मकान में ही लगाते हैकोर्ट ने मकान खाली करने का प्रकरण चल रहा है। मेरे चाचा तथा उसका परिवारआधे हिस्से पर कब्जा जमाये हुऐ है परन्तु मकान का आधा हिस्सा खालीनहींकरते हैं। चाचा कोर्ट में केस को लम्बा खिंचने का प्रयासकरता रहता है अब कोर्ट निम्न प्रश्नों पर विचार कर रहा है-

  1. क्या विवादित भूखण्ड अपने पिताजी की अनुमति से वादी ने स्वंय प्रीमियमजमा कर अपने पक्ष में रजिस्ट्री करवार्इ थी।
  2. क्या भूखण्ड पर एक मात्र वादी ने सम्पूर्ण मकान निर्माण करवाया है यदिहां तो इसलिये उक्त मकान वादी के एक मात्र स्वामित्व का है क्या वादी नेवादग्रस्त मकान में बिना किसी किराये से प्रेम स्नेहवश निवास हेतु प्रदानकिया था।
  3. क्या वादी के विरूद्ध आदेशात्मक निषेधाज्ञा के माध्यम से विवादित भूखण्डके हिस्से का रिक्त आधिपत्य प्राप्त करने का अधिकारी है।
  4. क्या प्रतिवादी से वादग्रस्त भूखण्ड का आधिपत्य प्राप्त करने तक अन्तरिमलाभ प्राप्त करने का अधिकारी है।

समाधान-

प के पिताजी ने बिलकुल सही मुकदमा किया है। न्यायालय उन प्रश्नों पर विचार कर रहा है जो दावे और जवाब दावे में अंकित किए गए हैं और विवादित हैं। बेनामी संपत्ति होने की प्रतिरक्षा आप के चाचा ने ली है लेकिन वह चल नहीं पाएगी। कानून आप के पिता जी के पक्ष में है। बेनामी संपत्ति कानून कहता है कि जो संपत्ति जिस के नाम पंजीकृत है उसी की मानी जाएगी।

प के पिताजी को केवल इतना करना है कि वे अपने पक्ष के सभी दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रदर्शित कराएँ और साक्ष्य प्रस्तुत करें। यदि आप के पिताजी के वकील ने मुकदमे की पैरवी ठीक से की तो आप के पिताजी को उन की संपत्ति का कब्जा प्राप्त हो जाएगा। समय तो लगेगा। हमारी न्याय व्यवस्था सुस्त है और जरूरत के केवल 20 प्रतिशत न्यायालय देश में हैं। मध्यप्रदेश की स्थिति तो और भी बुरी है।

किसी संपत्ति पर उसी का अधिकार है जिस के नाम वह पंजीकृत है

समस्या-

मेरे पिता जी ने मेरी माता जी के नाम से एक घर खरीदा था।  पिता जी की मृत्यु हो चुकी है। इस घर के खरीदने में किसी और का पैसा नहीं लगा था न ही कोई पुश्तैनी जायदाद से उस में पैसा लगाया था, वह पूरी तरह मेरे पिताजी ने स्वअर्जित धन से खरीदा था। पिता जी की जमीन जायदाद का बँटवारा नहीं हुआ है। मेरी माता जी उस घर को बेचना चाहती हैं। लेकिन मेरे भाई लोग कहते हैं कि वह घर माताजी का नहीं है क्यों कि वह पिताजी ने खरीदा था इस लिए वह सबका होगा। क्या यह सही है?  क्या अपने नाम की जमीन जायदाद कोई व्यक्ति बेच नहीं सकता? क्या उस मकान में भाइयों का भी कोई हक है?

-गीता तिवारी, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश

समाधान-

बेनामी ट्रांजेक्शन्स (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 के द्वारा किसी भी व्यक्ति को बेनामी संपत्ति खरीदने से प्रतिबंधित किया जा चुका है। यदि कोई व्यक्ति कोई बेनामी संपत्ति खरीदता है तो यह दंडनीय अपराध है। इसी अधिनियम में यह उपबंध भी है कि कोई भी व्यक्ति किसी संपत्ति को जो किसी के नाम पंजीकृत है बेनामी बता कर कोई लाभ नहीं ले सकता है।  इसी अधिनियम में यह भी उपबंध है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी और अविवाहित पुत्री के नाम से कोई संपत्ति खरीद सकता है और जब तक कि यह प्रमाणित नहीं कर दिया जाए कि वह संपत्ति किसी और उद्देश्य से खरीदी गई थी तब तक यह माना जाएगा कि वह जिस के नाम खरीदी गई है उसी के लाभ के लिए खरीदी गई थी।

स तरह प्रथम दृष्टया आप की माता जी को उन के नाम से खरीदे गए मकान को विक्रय करने का अधिकार है। वे उसे बेच सकती हैं। यदि आप के भाई आदि आपत्ति उठाते हैं तो उन्हें न्यायालय के समक्ष जा कर यह साबित करना होगा कि वह मकान आप के पिताजी ने किसी अन्य उद्देश्य से खरीदा था जिसे साबित कर देना आसान नहीं है। आप के भाइयों का उक्त मकान पर कोई हक नहीं है।

बेनामी लेन-देन अपराध है, और सजा तीन वर्ष तक की कैद

गर विकास न्यास ने एक महिला को भूमि का विक्रय किया। जब उस की और से भूमि की विकास न्यास के बैंक खाते में जमा कराई जाने लगी तो बैंक कैशियर ने कहा कि राशि अधिक है, जमाकर्ता के पैन कार्ड की सत्यापित फोटो प्रति चाहिए। जमा कराने वाले ने पूछा कि पैन कार्ड तो नहीं है, क्या किसी दूसरे के पैन कार्ड से काम चलेगा? तो कैशियर कहने लगा कि पैन कार्ड उसी का चलेगा जिस के नाम से राशि जमा कराई जा रही है या फिर आप चैक से जमा करवा दें। वहीं एक न्यास कर्मचारी ने सुझाव दिया कि दूसरे के खाते में राशि जमा करवा दें और उस के खाते का चैक जमा करवा दें तो हो जाएगा। मैं ने उसे कहा कि यह तो बेनामी लेन-देन है और अपराध है, इस पर तो सजा हो सकती है। 
बेनामी लेन-देन का अर्थ है यदि किसी व्यक्ति के नाम से कोई संपत्ति खरीदी जाती है और उस की कीमत का भुगतान कोई और करता है तो यह बेनामी लेन-देन कहलाएगा। इस तरह के लेन-देन को 5 सितम्बर 1988 से बेनामी लेन-देन प्रतिषेध अधिनियम 1988 के द्वारा अपराधिक बना दिया गया है। यदि कोई बेनामी लेन-देन करता है तो यह अपराध है और ऐसा करने वाले को तीन वर्ष तक की सजा और जुर्माने के दंड से दंडित किया जा सकता है। 
स तरह के लेन-देन के अपवाद भी हैं। जैसे, यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी या अविवाहित पुत्री के नाम से कोई संपत्ति खरीदता है और उस के मूल्य का भुगतान करता है तो इसे बेनामी लेन-देन की श्रेणी में नहीं माना जाएगा और यह अपराध नहीं होगा। किन्तु इस तरह क्रय की गई संपत्ति के बारे में यह धारणा की जाएगी कि वह पत्नी या पुत्री के लाभ के लिए खरीदी गई है। बाद में कीमत का भुगतान करने वाला पति या पिता उस संपत्ति पर इस आधार पर अपना अधिकार नहीं जमा सकता कि उस का भुगतान उस के द्वारा किया गया था। 

स्थावर संपत्ति जिस के नाम पंजीकृत है, कानून में वही उस का स्वामी माना जाएगा

 श्रीमती एम. तिवारी ने पूछा है –
मेरे एवं मेरे स्‍व पति द्वारा झाबुआ में एक मकान क्रय किया गया था।  चूँकि पहले घर के बड़े सदस्‍यों के नाम से संपत्ति क्रय की जाति थी, इसलिए मकान मेरे पति द्वारा अपने बडे भाई साहब के नाम से क्रय किया गया, लेकिन रजिस्‍ट्री पर मेरे पति के ही हस्‍ताक्षर हैं।  रजिस्‍ट्री हेतु रूपयों की व्‍यवस्‍था भी मेरे द्वारा अपने जीपीएफ फंड से की गई थी। मेरी समस्‍या यह है कि मैं मकान को विक्रय करना चाहती हूँ, लेकिन मकान मेरे जेठ के नाम से है। मैं विगत 20 वर्षों से नगर पालिका में टेक्‍स भी जमा कर रही हूँ, जिसकी रसीदे मेरे पास सुरक्षित हैं नगर पालिका में भी मकान मेरे जेठ के नाम से अंकित है। ऐसी स्थिति में मैं मकान को बेचने के लिए क्‍या कर सकती हूं? यदि मेरे जेठ द्वारा कोई आपत्ति ली जाती है तो मै क्‍या कानूनी कार्यवाही कर सकती हूं? 
 उत्तर –
श्रीमती तिवारी जी,
पने कहा है कि “पहले घर के बड़े सदस्यों के नाम से संपत्ति खरीदी जाती थी”। लेकिन यह तभी होता था जब कि संयुक्त परिवार होता था, सारी संपत्ति संयुक्त परिवार की हुआ करती थी और संपत्ति की खरीद संयुक्त परिवार के मुखिया के नाम पंजीकृत करा ली जाती थी। अनेक बार ऐसा भी होता था कि संपत्ति पत्नी, पुत्री, भाई आदि के नाम से खरीद ली जाती थी। अर्थात संपत्ति का वास्तविक स्वामी तो कोई होता था और संपत्ति किसी और के नाम होती थी। ऐसी अवस्था में संपत्ति का वास्तविक स्वामी पंजीकृत स्वामी के विरुद्ध दावा कर के सम्पत्ति को अपनी प्रमाणित कर सकता था। यह भी हो सकता था कि संपत्ति पर असली स्वामी काबिज हो और जिस के नाम संपत्ति ली गई थी वह उसे बेदखल करने के लिए वाद प्रस्तुत करे तो संपत्ति का वास्तविक स्वामी यह प्रतिरक्षा कर सकता था कि संपत्ति का स्वामी वह स्वयं है और दावाकर्ता केवल मात्र बेनामी है। लेकिन 05.09.1988 से यह स्थिति समाप्त हो गई।
बेनामी हस्तांतरण (निषेध) अधिनियम,1988 के प्रभावी होने से किसी भी बेनामी संपत्ति के वास्तविक स्वामी के ये दोनों  अधिकार कि वे उस संपत्ति पर अपना स्वामित्व प्रमाणित करने के लिए न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकते हैं, या अपनी ही संपत्ति से बेदखल करने के लिए लाए गए वाद में वे स्वयं को वास्तविक स्वामी साबित कर सकते हैं, समाप्त कर दिए गए हैं। इस संबंध में पूर्व में दो आलेख पिताजी ने अपनी अर्जित आय से संपत्ति माँ के नाम खरीदी थी। संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा?  और बेनामी संपत्ति क्या है? संपत्ति के बेनामी हस्तांतरण पर रोक किस तरह की है? तीसरा खंबा पर प्रकाशित किए जा चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय आर. राजगोपाल रेड्डी बनाम पद्मिनी चंद्रशेखरन के मामले में दिया है। आप इन्हें पढ़ कर अपना ज्ञानवर्द्धन कर सकती हैं। 
प का मकान आप के जेठ के नाम पंजीकृत है, कानून में उन्हीं का माना जाएगा। यदि आप उसे बेचती हैं तो क्रेता के नाम हस्तांतरण विलेख भी आप के जेठ द्वारा हस्ताक्षरित होने पर ही स्वा

बेनामी संपत्ति क्या है? संपत्ति के बेनामी हस्तांतरण पर रोक किस तरह की है?

मुंबई की वर्षा झा के प्रश्न के उत्तर में लिखी गई तीसरा खंबा की चिट्ठी पिताजी ने अपनी अर्जित आय से संपत्ति माँ के नाम खरीदी थी। संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा? पर राज भाटिया जी ने टिप्पणी की थी …

दिनेश जी आप की बात समझ में नहीं आई आज, अगर कोई आदमी अपनी पत्नी के नाम से मकान या कोई संपत्ति बनाता है, ओर फ़िर उन दोनों के मरने के बाद वो संपत्ति या मकान आनामी कहलाएगी या बाकी बचे परिवार के नाम होगा? कृपया दोबारा से विस्तार से समझाएँ।

मुझे लगता है भाटिया जी बेनामी संपत्ति का अर्थ ही नहीं समझ पाए हैं। “बेनामी हस्तांतरण” कानून द्वारा उस हस्तांतरण को कहा गया है जिस में। कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति को धनराशि के बदले हस्तांतरित करता है जिस की धनराशि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चुकाई या उपलब्ध गई हो। 

इस तरह हस्तांतरित संपत्ति को बेनामी संपत्ति कहा गया है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति भाटिया जी की पत्नी को बेचता है लेकिन उस की कीमत भाटिया जी की पत्नी के स्थान पर भाटिया जी ने चुकाई या उपलब्ध कराई हो। इस तरह यह संपत्ति बेनामी संपत्ति कहलाएगी। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि संपत्ति खरीदी तो भाटिया जी ने लेकिन उसका विक्रय पत्र पत्नी के नाम लिख कर रजिस्टर करवा लिया। इस तरह उस संपत्ति के वास्तविक स्वामी तो भाटिया जी हुए लेकिन दस्तावेजों और रिकार्ड में यह संपत्ति भाटिया जी की पत्नी के नाम दर्ज रहेगी।
1988 के पहले यह स्थिति थी कि इस बेनामी संपत्ति का वास्तविक स्वामी वही व्यक्ति माना जाता था जिस ने उस संपत्ति को खरीदने के लिए धनराशि चुकाई हो। लेकिन संपत्ति जिस के नाम दस्तावेजों या रिकार्ड में होती थी वह उसे दस्तावेजों के सहारे से किसी को बेच देता या दान, हस्तांतरण आदि कुछ कर देता तो बाद में इस तरह के विवाद अदालतों में आते थे कि वह संपत्ति तो बेनामी थी और वास्तविक स्वामित्व किसी और का था। इस से निरर्थक विवाद बहुत होते थे। 1988 में भारतीय संसद ने बेनामी हस्तांतरण (निषेध) अधिनियम  1988 पारित किया। इस में यह प्रावधान रखा गया कि कोई भी व्यक्ति बेनामी हस्तांतरण में शामिल नहीं होगा तथा किसी संपत्ति को बेनामी बता कर स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति को उस का वास्तविक स्वामी बताते हुए कोई भी वाद, दावा या कार्यवाही नहीं कर सकेगा। इस तरह किसी भी संपत्ति को बेनामी बताते हुए दायर होने वाले मुकदमों का अदालत में प्रस्तुत किया जाना बंद हो गया।  बेनामी हस्तांतरण को इस कानून के द्वारा दंडनीय अपराध बना दिया गया जिस में तीन वर्ष तक की कैद की सजा का प्रावधान है जो बिना जुर्माने या जुर्माने के साथ हो सकती है। दूसरी ओर बेनामी घोषित की गई संपत्ति को सरकार  द्वारा अपने कब्जे और स्वामित्व में  लेने का प्रावधान भी किया गया। 
लेकिन इस कानून में यह अपवाद भी रखा गया कि कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी या अविवाहित पुत्री के नाम से बेनामी संपत्ति खरीद सकता है जिसे अपराध नहीं समझा जाएगा।  जब तक इस के विरुद्ध तथ्य किसी अदालत में प्रमाणित नहीं कर दिया जाए तब तक यह माना जाएगा कि वह संपत्ति खर

पिताजी ने अपनी अर्जित आय से संपत्ति माँ के नाम खरीदी थी। संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा?

मुम्बई से वर्षा झा ने पूछा है …

सर!

हिन्दू संपत्ति कानून मुंबई महाराष्ट्र के हिसाब से माँ बेटियों और बेटों का  संपत्ति बंटवारे का क्या अधिकार है? मेरे पिताजी ने मरने से पहले किसी प्रकार की कोई वसीयत नहीं बनाई । सारी जायदाद मेरे पिताजी द्वारा अर्जित की गई है और माँ के नाम पर है तो सर बंटवारे का क्या नियम है? और कितना वक्त लग सकता है?

 उत्तर …

वर्षा जी!

हिन्दू उत्तराधिकार का नियम बहुत स्पष्ट है।  किसी भी हिन्दू पुरुष ने वसीयत नहीं की हो तो उस के देहांत के उपरांत उस की संपत्ति में उस के प्रथम  श्रेणी के उत्तराधिकारी समान हिस्सों में भागीदार हो जाते हैं। प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों में, विधवा पत्नी, सभी पुत्र और पुत्रियाँ और माता सम्मिलित हैं।  यदि पुत्र-पुत्रियों में से किसी की पहले ही मृत्यु हो गई हो तो उन के पुत्र पुत्रियां उस मृतक पुत्र या पुत्री के हिस्से के हकदार होंगे।
आप के मामले में आप के पिता ने केवल मकान ही संपत्ति के रूप में छोड़ा है और वह भी आप की माँ के नाम है। इस तरह वह मकान एक बेनामी संपत्ति है। बेनामी अंतरण अधिनियम 1988 के अनुसार अब बेनामी संपत्ति का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है और कोई भी संपत्ति उसी की मानी जाती है जिस के नाम वह संपत्ति होती है. लेकिन उस में यह अपवाद भी है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी या अविवाहित पुत्री के नाम से खरीदी जा सकती है लेकिन उस स्थिति में यही माना जाएगा कि जिस व्यक्ति ने उक्त संपत्ति खरीदी है वह जिस के नाम से खरीदी है उस के ही लाभ के लिए खरीदी है।
इस कानून में एक अपवाद यह भी है कि किसी अविभाजित संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य के नाम कोई भी संपत्ति पूरे परिवार के लाभ के लिए खरीदी जा सकती है। लेकिन अदालत में यह प्रमाणित करना होगा कि संपत्ति पूरे परिवार के लाभ के लिए खरीदी गई थी। ऐसा प्रमाणित हो जाने पर वह संपत्ति पूरे संयुक्त परिवार की होगी और सभी उस संपत्ति के हिस्सेदार होंगे। आप के मामले में बहुत से तथ्य ऐसे हैं जिन की व्यक्तिगत रूप से जानकारी के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि आप की माता जी के नाम जो संपत्ति आप के पिता ने खरीदी थी उसे संयुक्त परिवार की संपत्ति माना जाएगा अथवा केवल आप की माता जी की संपत्ति माना जाएगा। इस प्रश्न पर कोई भी वकील दस्तावेजों के अध्ययन के उपरांत ही स्पष्ट राय दे सकता है। आप के लिए यह उचित होगा कि आप उक्त संपत्ति के स्वामित्व के दस्तावेजात की प्रमाणित प्रतियाँ संबंधित उप पंजीयक से प्राप्त कर संपत्ति के मामलों की जानकारी रखने वाले वकील को दिखाएँ और स्पष्ट राय प्राप्त करें। 
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