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सामान्य आशय और धारा-34 भारतीय दंड संहिता

rp_Lady-Justice.jpgसमस्या-

धर्मेन्द्र बट्ट ने दमोह, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३४ क्या है? इस के अंतर्गत दर्ज अपराध में क्या सजा और क्या जुर्माने का प्रावधान है?

समाधान-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 का मूल पाठ निम्न प्रकार है-

34. सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य–जबकि कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो।

धारा-34 भारतीय दण्ड संहिता के मूल पाठ को पढ़ने के उपरान्त आप को यह तो समझ आ गया होगा कि इस धारा में किसी विशिष्ट अपराध का वर्णन नहीं है और किसी विशेष दण्ड का प्रावधान भी नहीं है। यह धारा सामान्य आशय से एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा संपन्न किए गए अपराधों के संबंध में है। यदि दो या दो से अधिक व्यक्ति कोई कार्य संयुक्त रूप से करते हैं तो विधि के अंतर्गत स्थिति वही होगी कि मानो उन में से प्रत्येक के द्वारा वह कार्य स्वयं व्यक्तिगत रूप से किया गया है।

दाहरण के रूप में चार व्यक्ति मिल कर किसी को चोट पहुँचाना चाहते हैं और इस के लिए वे अपने स्थान से रवाना हो कर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ वह व्यक्ति मौजूद है, जैसे ही वह व्यक्ति दिखाई पड़ता है उन चारों में एक व्यक्ति लाठी से उस के सिर पर हमला करता है, वह व्यक्ति लाठी को सिर पर पड़ने से बचाने के लिए हाथ पर झेल लेता है और चार व्यक्तियों को सामने देख कर चिल्लाते हुए भाग लेता है। जब तक हमलावर उसे पकड़ पाएँ आस पास के लोग इकट्ठे हो जाते हैं जिन्हें देख कर चारों हमलावर भाग लेते हैं। यहाँ चोटिल व्यक्ति को चोट पहुँचाने का कार्य एक व्यक्ति ने ही किया है इस कारण केवल उसी ने धारा 323 आईपीसी का अपराध किया है, लेकिन अन्य तीन व्यक्ति उस व्यक्ति को चोट पहुँचाने के उददेश्य से साथ थे इस कारण वे तीनों भी लाठी से हमला करने वाले के समान ही अपराधी हैं क्यों कि उन का सामान्य आशय एक ही था। उन पर जब अभियोग चलाया जाएगा तो धारा 323 के साथ धारा 34 भी आरोपित की जाएगी। यदि उस अभियोग में सभी को दंडित किया गया तो सभी को उसी व्यक्ति के समान दंड मिलेगा जैसा कि लाठी से हमला करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा।

अमरीका की तुलना में भारत में न्याय की संभावना मात्र 10 प्रतिशत

विगत आलेख क्या हम न्यायपूर्ण समाज की स्थापना से पलायन का मार्ग नहीं तलाश रहे हैं ? पर तीन महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएँ आईँ।संगीता पुरी जी ने कहा कि ‘सजा गल्‍ती की निरंतरता को रोकने के लिए दी जाती है .. न्‍याय के क्षेत्र में होनेवाली देरी और खर्च के कारण तो उतने दिनों तनाव में रहने से तो अच्‍छा है .. एक दो बार हुए किसी की गल्‍ती को कुछ लोगों के हस्‍तक्षेप से सुलह करवाकर माफी वगैरह मांग मंगवाकर समस्‍या को हल कर लिया जाए !!’ काजल कुमार ने कहा ‘जब न्यायव्यवस्था बढ़ते मुक़दमों को नहीं निपटा पा रही है तो हमें वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचना होगा. मसलन ओम्बडसमैन व राजीनामा जैसी संस्थाओं को मज़बूत करना होगा ताकि ये न्यायालयों के स्थानापन्न का रूप ले सकें.’ उन्हों ने यह भी कहा कि ‘आज हालत ये है कि निचले न्यायालयों को एक मिनट के लिए छोड़ भी दिया जाए तो उच्च-न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय के सम्मुख अधिकांश मामले ऐसे आते हैं जिनमें कानून की व्याख्या को कोई सवाल नहीं होता किन्तु उन्हें यही जामा पहना कर पेश किया जाता है. जबकि, इन न्यायालयों को इस तरह के मुक़दमों को सरसरी नज़र में खारिज कर देना चाहिये.’ इस के अलावा ताऊ रामपुरिया जी की राय थी कि ‘असल में कानून में जो झौल है उसे खत्म करने की जरुरत है, ये मेरा अपना निजी सोच है जिससे न्यायिक प्रक्रिया उलझे नही और त्वरित न्याय मिल सके.’
संगीता जी ने जो राय रखी वह एक आम व्यक्ति की सोच है जो अपर्याप्त और न्याय प्राप्त करने के कष्टप्रद न्यायप्रणाली के प्रभाव से उत्पन्न हुई है। न्याय के क्षेत्र में केवल अपराध ही नहीं आते हैं। आज जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिस में न्याय प्राप्ति की आवश्यकता नहीं हो। वस्तुत स्थिति यह है कि देश के तमाम सक्षम लोग कानून का उल्लंघन करते हैं और सोचते हैं जो वे करेंगे वही न्यायपूर्ण है। लेकिन साधारण लोगों के पास इस अन्याय से उबरने का एक मात्र उपाय न्यायिक संस्थाओँ के पास जाना है। यदि वहाँ भी न्याय न मिले और समझौते की राह दिखाई जाए जहाँ फिर उसी अन्याय का सामना करना पड़े तो इस वैकल्पिक न्याय व्यवस्था से क्या लाभ है। सही और उचित न्याय तो वही है जो न्यायालय में सबूतों, सचाई और कानून के आधार पर प्राप्त हो। इस तरह वैकल्पिक व्यवस्थाएँ वास्तविक न्याय से पलायन करने की एक तदर्थ व्यवस्था है। अमरीका में दस लाख की आबादी के लिए 110 जज नियुक्त हैं जब कि हम भारत में केवल 11 से काम चला रहे हैं। इस तरह अमरीका की तुलना में भारत में न्याय की संभावना मात्र 10 प्रतिशत है। क्या भारत जैसा देश दस प्रतिशत न्याय से काम चला सकता है? और यह कहा जा सकता है कि हम न्याय कर रहे हैं। वैकल्पिक प्रणालियों का लाभ भी तभी मिल सकता है जब मूल न्यायिक व्यवस्था पर्याप्त हो। तब समझौते से निकाले गए हल अधिक न्यायपूर्ण हो सकेंगे। क्यों कि तब उन के पीछे सोच यह नहीं होगी कि वह न्याय की लंबी, उबाऊ, थकेलू और मारक व्यवस्था से पिंड छुड़ाने के लिए समझौता कर लेना बेहतर है।
ताऊ जी की सोच हमेशा यथार्थ होती है। उन्हों ने कानून के झोल की बात कही है। जब रस्सी पूरी तनी हुई नहीं बंधी होती है तो उस में झोल आ जाना स्वाभाविक है। आज भारतीय अदालतों के पास अमरीका की अदालतों स

क्या हम न्यायपूर्ण समाज की स्थापना से पलायन का मार्ग नहीं तलाश रहे हैं ?

म भारत में जरूरत की केवल 20 प्रतिशत अदालतों से देश में न्यायालयों की कमी ने अनेक समस्याएँ खड़ी की हैं और लगातार हो रही हैं। अदालतों की इस कमी ने सब से बड़ी समस्या खड़ी की है कि मुकदमों के निर्णय में असीमित देरी होती है जिस के कारण न्याय का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जा रहा है। कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं जिन का निर्णय जल्दी हो जाता है, कुछ ऐसे जिन का निर्णय होने की कोई समय सीमा ही नहीं है। न्यायार्थी के जीवन में यदि निर्णय हो भी जाए तो वह खुद को खुशकिस्मत समझता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.के. गांगुली ने न्यायपालिका को कम धन आंवटन पर सवाल उठाया है कि नौवीं योजना में सरकार ने न्यायिक प्रणाली के लिए सिर्फ 385 करोड़ रुपये आवंटित किए जो खर्च योजना का सिर्फ 0.071 फीसदी था। दसवीं योजना में स्थिति में आंशिक रूप से सुधार आया जब सरकार ने 700 करोड़ या खर्च योजना का 0.078 फीसदी खर्च किया। इस सवाल से स्पष्ट है कि हमारी सरकार का ध्यान न्यायव्यवस्था को आवश्यकता के अनुसार विकसित करने पर नहीं है, अपितु इसे वह अनावश्यक बोझ समझती है। वह देश और समाज में न्याय स्थापित करने के स्थान पर अन्य इतर उपायों से काम चलाना चाहती है।
ये इतर उपाय एक ओर तो लोक अदालतों में समझाइश से समझौते के माध्यम से मुकदमों का निपटारा करने के रूप में सामने आ रहे हैं, दूसरी ओर अर्ध न्यायिक संस्थानों की स्थापना कर उन्हें सीधे सरकार के अधीन कर देने के रूप में। लेकिन दोनों ही मार्ग वास्तविक न्याय से पलायन को प्रदर्शित करते हैं। हम फिलहाल लोक अदालतों और समझौतों की बात करें। लोक अदालतों में जज अपने निर्धारित स्थान से नीचे उतर कर एक हॉल में बैठता है। वहाँ पक्षकार भी समान स्तर पर बात करता है। लेकिन हमेशा कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर न्याय मांगने वाले पक्ष को समझाया जाता है कि मुकदमा लड़ने  में कोई लाभ नहीं है, बहुतेरा पैसा और समय जाया होगा, आपसी वैमनस्यता बढ़ेगी। इस लिए अपने अधिकारों को छोड़ कर वह समझौता क्यों न कर ले। पूरी नहीं तो चौथाई रोटी तो मिल ही रही है। लोक अदालत में ऐसा माहौल पैदा किया जाता है कि न्यायार्थी को लगने लगता है कि उस ने न्याय के लिए अदालत आ कर गलती कर दी। वैसी अवस्था में या तो वह अपने अधिकारों को छो़ड़ कर समझौता कर लेता है या फिर अपनी लड़ाई को छोड़ बैठता है।
लेकिन क्या एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए समझौतों और लोक अदालतों की यह प्रक्रिया उचित है? मेरी राय में नहीं। इस से हम एक न्यापूर्ण समाज की ओर नहीं जा रहे हैं, अपितु अन्याय करने वालों को एक सुविधा प्रदान कर रहे हैं। वैसी ही जैसे किसी को एक झापड़ कस दिया जाए और फिर माफी मांग ली जाए। फिर भी नाराजगी दूर न होने पर कहा जाए कि बेचारे ने माफी तो मांग ली अब क्या एक झापड़ के लिए उस की जान लोगे क्या।

न्यायिक सुधार – ऊँट के मुहँ में जीरे के समान भी नहीं



बार एंड बैंच, एक भारतीय अंग्रेजी  वेबसाइट है जो भारत में विधि और न्यायिक पत्रकारिता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने में जुटी है। इसी ने कल अपनी वेबसाइट पर भारतीय न्यायिक प्रणाली के गंभीर संकट को प्रकट करते आँकड़े जारी किए हैं। आप भी अवलोकन कीजिए कि हमारे यहाँ न्याय प्रणाली की स्थिति क्या है? ……

भारतीय न्यायालयों में लंबित मुकदमों की स्थिति का त्रिवर्षीय आकलन …
स सारणी से स्प्ष्ट है कि लंबित मुकदमों की संख्या प्रतिवर्ष 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। लंबित मुकदमों की संख्या जजों की कमी की संख्या की समानुपाती है।  इस से स्पष्ट है कि न्यायालयों की संख्या बढ़ाया जाना आवश्यक है। जरा हम यह भी देखें कि हमारे यहाँ के न्यायालयों में न्यायाधीशों के कितने पद रिक्त पड़े हैं? ……
न्यायाधीशों के स्वीकृत और रिक्त पद
च्चतम न्यायालय में रिक्त प

सर्वोच्च न्यायालय की परामर्श प्रदान करने की अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-96

संविधान के अनुच्छेद 143 से सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने की अधिकारिता प्रदान की गई है। इस उपबंध के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति उन के समक्ष कुछ विशिष्ठ परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने के लिए निर्देश दे सकते हैं।
नुच्छेद 143 (1) में कहा गया है कि किसी भी समय जब राष्ट्रपति के सन्मुख यह प्रकट होता है कि कोई विधि या तथ्य का प्रश्न उपस्थित हो गया है या होने की संभावना है, जो जनमहत्व का है और जिस में सर्वोच्च न्यायालय का परामर्श प्राप्त किया जाना आवश्यक है तो वह ऐसे प्रश्न को सर्वोच्च न्यायालय को विचार करने और परामर्श देने के लिए संप्रेषित कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ऐसे प्रश्न पर ऐसी सुनवाई करने के उपरांत, जिसे वह उचित समझता है, राष्ट्रपति को अपने परामर्श से अवगत करा सकता है। लेकिन इस उपबंध के अंतर्गत प्रेषित किए गए प्रश्न के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय पर परामर्श  देने की बाध्यता नहीं है।
नुच्छेद 143 (2) में यह उपबंध किया गया है कि राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा कोई भी मामला परामर्श के लिए संप्रेषित कर सकते हैं जो कि अनुच्छेद 131 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता में नहीं आता। ऐसे मामले में सर्वोच्च न्यायालय ऐसी सुनवाई के उपरांत जिसे वह आवश्यक समझता है, अपना परामर्श राष्ट्रपति प्रदान करेगा। इस उपबंध के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय परामर्श देने के लिए आबद्ध है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की ऐसी राय किसी भी न्यायालय पर आबद्धकारी नहीं होगी। इस मामले में दिल्ली लॉज एक्ट और केरल एजुकेशन बिल के मामले उदाहरण हैं, जिन में सर्वोच्च न्यायालय दिए गए परामर्श को न्यायालयों द्वारा आबद्धकर नहीं माना गया था।

सर्वोच्च न्यायालय की रिटें जारी करने की अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-95

भारत के सर्वोच्च न्यायालय को उस की अपीलीय और आरंभिक अधिकारिता के अतिरिक्त संविधान में नागरिकों को प्रदत्त मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उचित कार्यवाहियाँ करने की अधिकारिता संविधान के अनुच्छेद 32 द्वारा प्रदत्त की गई है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि संविधान के खंड (3) में प्रदत्त अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उचित कार्यवाहियाँ संस्थित करने के अधिकार की गारंटी दी जाती है। इसी अनुच्छेद के दूसरे चरण में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के भाग-3 में उपबंधित अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए निर्देश और आदेश जारी करने का अधिकार है और वह बंदीप्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा में से जो भी उचित हो उसी प्रकृति की रिट जारी कर सकता है। 
नुच्छेद 32 के द्वारा मूल अधिकारों का प्रवर्तन कराने के अधिकार संविधान द्वारा जो गारंटी दी गई है उसे इस संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार के अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रकार से निलंबित नहीं किया जा सकता है।
नुच्छेद 139 के  में संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 में वर्णित प्रयोजनों से भिन्न किसी अन्य प्रयोजनों के लिए भी रिटें जारी करने की अधिकारिता प्रदान कर सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति से अपीलीय अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-94

र्वोच्च न्यायालय भारत का अंतिम और उच्चतम न्यायिक निकाय है। यही कारण है कि उसे संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत विशेष अनुमति से अपील सुनने का प्राधिकार दिया गया है। इस अनुच्छेद के उपबंधों के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी न्यायालय अथवा अधिकरण के किसी भी निर्णय, डिक्री, अवधारण, दंडादेश, अथवा आदेश के विरुद्ध अपील करने की विशेष अनुमति प्रदान कर सकता है। इस का केवल एक अपवाद यह है कि वह सशस्त्र सेनाओं से संबद्ध विधि के अधीन गठित न्यायालय अथवा अधिकरण के निर्णयों के विरुद्ध इस शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति प्रदान करने की यह शक्ति किसी संवैधानिक सीमा के अधीन नहीं है अपितु सर्वोच्च न्यायालय के विवेकाधीन है। इस उपबंध का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 132,133 व 134 के अंतर्गत विहित नहीं किए गए मामलों में भी नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का संरक्षण करना और व्यथित न्यायार्थी को उपाय प्रदान करना है। 
नुच्छेद 136 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को प्रदान की गई शक्ति को न तो परिभाषित किया जा सकता है और न ही उस के स्वरूप को निर्धारित किया जा सकता है। इस शक्ति पर किसी प्रकार का कोई निर्बंध नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन इतना होने पर भी सर्वोच्च न्यायालय अपनी इस शक्ति का उपयोग अत्यंत आवश्यक और अपवादित मामलों में ही कर सकता है जिस में न्याय के हनन का गंभीर प्रश्न उपस्थित होता है।

सर्वोच्च न्यायालय की सामान्य अपीलीय अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-93

र्वोच्च न्यायालय भारत का अंतिम न्यायालय है जहाँ किसी न्यायार्थी को न्याय प्राप्त हो सकता है। इसे सभी प्रकार के मामलों में अपीलीय शक्तियाँ प्राप्त हैं।

संवैधानिक मामले-
संविधान के अनुच्छेद 132 में यह उपबंधित किया गया है कि भारत के किसी उच्च न्यायालय की सिविल, दांडिक या अन्य कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है यदि वह उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर दे कि उस मामले में कानून का ऐसा सारवान प्रश्न अंतरवलित है जिस में संविधान के किसी भाग की व्याख्या की जानी है तो सर्वोच्च न्यायालय को अपील प्रस्तुत की जा सकती है।
स तरह का प्रमाण पत्र उच्च न्यायालय द्वारा जारी कर दिए जाने पर अपील इस आधार पर भी प्रस्तुत की जा सकती है कि उस मामले में किसी प्रश्न को गलत निर्णीत कर दिया गया है।

दीवानी मामले-
संविधान के अनुच्छेद 133 में संवैधानिक प्रश्नों के अलावा अन्य दीवानी मामलों का उल्लेख किया गया है जिस के अनुसार भारत के किसी भी उच्च न्यायालय की सिविल कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय को की जा सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि –
1. उस मामले में विधि का सार्वजनिक महत्व का कोई सारवान प्रश्न अंतर्वलित है और उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विनिश्चय आवश्यक है।
2. संविधान के अनुच्छेद में संविधान की व्याख्या के संबंध में उपबंध होने पर भी इस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणपत्र जारी किए जाने पर की गई अपील में यह आधार भी लिया जा सकता है कि संविधान के किसी उपबंध की व्याख्या से संबंधित विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतरवलित है।
3. लेकिन इस अनुच्छेद के उपबंधों के अधीन किसी उच्च न्यायालय की एकल पीठ के किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय को तब तक नहीं की जा सकेगी जब तक कि ससंद विधि द्वारा इस बारे में कोई उपबंध न कर दे।

दांडिक मामले –
नुच्छेद 134 के अंतर्गत भारत के किसी उच्च न्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है  यदि–
1. उस उच्च न्यायालय ने अपील में किसी अभियुक्त या व्यक्ति की दोषमुक्ति के आदेश को उलट दिया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या
2. उस उच्च न्यायालय ने अपने प्राधिकार के अधीनस्थ किसी न्यायालय से किसी मामले को विचारण के लिए अपने पास मंगा लिया है और ऐसे विचारण में अभियुक्त या व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या
3. वह उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर देता है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में अपील किए जाने योग्य है।
स के अतिरिक्त संसद विधि द्वारा उपबंध कर के सर्वोच्च न्यायालय को भारत के किसी उच्च न्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील ऐसी विधि में उपबंधित शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए अपील ग्
रहण करने और सुनने की अतिरिक्त शक्ति दे सकती है।

क्त संवैधानिक, दीवानी और दांडिक मामलों में किसी उच्च न्यायालय द्वारा अपील योग्य होने का प्रमाणपत्र जारी होने पर भी सर्वोच्च न्यायालय यदि यह समझता है कि उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणपत्र जारी करने के उपबंध का उचित रूप में प्रयोग नहीं किया गया है तो वह मामले को वापस उच्च न्यायालय को पुनःप्रेषित कर सकता है या फिर अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए उस अपील को विशेष अनुमति से की गई अपील मान कर ग्राह्य कर सकता है।

नागपुर में उच्च न्यायालय की स्थापना : भारत में विधि का इतिहास-86

भारत शासन अधिनियम की धारा 229 (1) में उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई थी। इस शक्ति का प्रयोग करते हुए मध्य प्रान्त के लिए नागपुर में उच्च न्यायलय स्थापित करने हेतु 2 जनवरी 1936 को लेटर्स पेटेंट जारी किया गया। नागपुर उच्च न्यायालय के गठन, अधिकारिता, शक्तियाँ आदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समान ही निरुपित की गई। 
ब्रिटिश भारत में स्थापित होने वाला यह अंतिम उच्च न्यायालय था। बाद में नागपुर को महाराष्ट्र राज्य में सम्मिलित कर लिया गया और वह मध्य प्रान्त से पृथक हो गया। उस स्थिति में मध्य प्रान्त के लिए  जबलपुर में पृथक से उच्च न्यायालय स्थापित किया गया जिस की दो पीठें इंदौर औऱ ग्वालियर में गठित की गईं।

भारत शासन अधिनियम 1935 और विधि व्यवस्था -2 : भारत में विधि का इतिहास-85

भारत शासन अधिनियम 1935 में उच्च न्यायालयों को पूर्व में प्राप्त अधिकारिता को ही अनुमोदित किया गया था। उन्हें 1915 के अधिनियम के अंतर्गत देशज प्रथाओं और रूढ़ियों से शासित राजस्व मामलों के विचारण का अधिकार नहीं था, लेकिन उन्हें इन मामलों पर अपीली अधिकारिता प्राप्त थी और वे राजस्व के मामलों में हुए निर्णयों की अपील सुन सकते थे।
उच्च न्यायालयों को इस अधिनियम से अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति प्रदान की गई थी। वे अधीनस्थ न्यायालयों को विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकते थे और उन के लिए प्रक्रिया संबंधी नियम बना सकते थे, प्रभावी होने के पूर्व जिन का अनुमोदन राज्य सरकार से होना आवश्यक था। इस अधिनियम में यह स्पष्ट नहीं था कि वह अधीनस्थ न्यायालयों के मुकदमों का स्थानांतरण कर सकता था या नहीं। लेकिन वह अधीनस्थ न्यायालय को किसी भी मामले को अपने सामने प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता था और उसे निर्णीत कर सकते था।
उच्च न्यायालय द्वारा 50000 रुपए से अधिक मूल्य के मामलों में संघीय न्यायालय में अपील की जा सकती थी। इस संबंध में उच्चन्यायालय को यह विचार करने का अधिकार दिया गया था कि उस मामले में कोई ऐसा प्रश्न अंतर्वलित है या नहीं जो अपील के योग्य है। अपील के योग्य प्रश्न पाए जाने पर वह अपील किए जाने के लिए प्रमाण पत्र जारी कर सकता था। यदि इस तरह का प्रमाणपत्र जारी न किया जाता था तो पक्षकार संघ न्यायालय से विशेष अनुमति प्राप्त कर अपील कर सकता था।
इस अधिनियम में उच्च न्यायालयों की अर्थव्यवस्था का दायित्व राज्य सरकारों को अवश्य दिया गया था लेकिन ऐसी व्यवस्था थी कि वे न्यायालयों को किसी प्रकार भी प्रभावित कर सकें। इस तरह यह अधिनियम न्यायालयों के प्रसार और स्वतंत्र न्यायपालिका  के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। जिस की नींव पर स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका खड़ी हो सकी।
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