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घरेलू हिंसा मामले में संरक्षा अधिकारी के कर्तव्य …

sexual-assault1समस्या-

राहुल ने कानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

जिला प्रोबेशन ऑफीसर के यहाँ घरेलु हिंसा के अन्तर्गत दिया गया प्रार्थना पत्र तथा पति पत्नी से पूछताछ में पूछे गए सवाल के जवाब को जो वह नोट करता है उसे क्या कहते हैं? तथा उन जवाबों क्या महत्व है? क्या प्रोबेशन अधिकारी के यहाँ से अदालत जाने से पहले सेक्शन 9 दाखिल कर देने से 498-ए तथा अन्य में धराओं में राहत मिल सकती है। जिला प्रोबेशन अधिकारी द्वारा भेदभाव की शिकायत किस से की जा सकती है? क्या एक महीने में एक डेट में ही प्रोबेशन अधिकारी न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है।

समाधान-

हिलाओँ का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम में किसी प्रोबेशन अधिकारी का उल्लेख नहीं है। इस अधिनियम में प्रोटेक्शन / संरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है। ऐसे संरक्षा अधिकारी का कार्य किसी भी महिला के साथ घरेलू हिंसा के मामले की रिपोर्ट बना कर मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करना तथा उस की प्रतियाँ उस थाना क्षेत्र के भारसाधक अधिकारी को व क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं को देना है। संरक्षा अधिकारी  घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला की ओर से आवेदन भी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। संरक्षा अधिकारी द्वारा जो जवाब पूछे जाते हैं उन्हें उस व्यक्ति के बयान के रूप में घरेलू हिंसा की घटना की रिपोर्ट के साथ संलग्न किया जाता है। इन बयानों और घटना रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय प्रथम दृष्टया कोई राहत हिंसा की शिकार महिला को प्रदान कर सकता है।

संरक्षा  अधिकारी का कार्य हि्ंसा से पीड़ित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण से मिलने वाली सहायता उपलब्ध कराना,  पीडित महिला को संरक्षण गृह उपलब्ध कराना , आवश्यक होने पर पीड़िता की चिकित्सकीय जाँच करवाना, मौद्रिक अनुतोष की अनुपालना करवाना तथा घरेलू हिंसा के मामले में न्यायालय की मदद करना है।

धारा-9 का आवेदन प्रस्तुत करने का तात्पर्य मात्र इतना है कि उस से यह स्पष्ट होगा कि आप तो स्वयं ही पत्नी को रखने को तैयार है। इस से अधिक कुछ नहीं। प्रत्येक मामले का निर्णय उस मामले में साक्ष्य द्वारा प्रमाणित तथ्यों पर निर्भर करेगा।

प का अन्तिम प्रश्न समझ से बाहर है। आप किस चीज के स्थानान्तरण की बात कर रहे हैं यह लिखना शायद भूल गए। लेकिन संरक्षा अधिकारी कभी भी न्यायालय को आवेदन या घटना रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।

पुरुषों के प्रति महिलाओं की हिंसा के लिए कानून

समस्या-

ब घर में पत्नी या बेटी या किसी अन्य महिला के साथ हिंसा का व्यवहार होता है तो वह पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है। लेकिन यदि कोई महिला या लड़की अपने परिजनों के विरुद्ध हिंसा का व्यवहार करे तो क्या कोई कानून नहीं है क्या? यदि है तो कृपया जानकारी प्रदान करें।

-दीपक कुमार, पानीपत, हरियाणा

समाधान-

ब भी कोई व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) किसी अन्य व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) के प्रति हिंसा का व्यवहार करता है तो वह एक अपराध दोषी होता है। उस के द्वारा की गई हिंसा किस तरह का अपराध है, इस से यह तय होता है कि उस ने क्या अपराध किया है। भारतीय दंड संहिता के उपबंधों को पढ़ कर यह जाना जा सकता है कि उस ने क्या अपराध किया है। उस हिंसक घटना की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यदि पुलिस समझती है कि किया गया कृ्त्य एक संज्ञेय अपराध है तो वह उस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के कार्यवाही कर सकती है। यदि वह समझती है कि किया गया कृत्य असंज्ञेय अपराध है तो वह रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को सलाह देती है कि उस मामले में वह व्यक्ति सीधे न्यायालय के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है।  यदि मामला असंज्ञेय अपराध का हो या संज्ञेय अपराध में पुलिस रिपोर्ट दर्ज न  करे तो वह व्यक्ति न्यायालय के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर सकता है। न्यायालय मामले को पुलिस को अन्वेषण करने के लिए प्रेषित कर सकता है अथवा स्वयं साक्षियों के बयान दर्ज कर अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है। भारतीय दंड संहिता के ये उपबंध स्त्री या पुरुष दोनों ही यदि हिंसा कर के कोई अपराध करें तो प्रभावी होते हैं।  इस मामले में स्त्री पुरुष का कोई भेद नहीं किया गया है। ये अपराध क्या हैं और इन में से कौन से संज्ञेय (Cognizable) हैं और कौन से असंज्ञेय ( Non Cognizable) हैं यह दंड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची देख कर जाना जा सकता है।

लेकिन इस बात को तो आप भी स्वीकार करेंगे कि लगभग सारी दुनिया में मानव समाज पुरुष प्रधान है और स्त्री चाहे घर में रहे या कामकाजी हो उसे घर में पुरुषों की हिंसा का सामना करना पड़ता है। इस कारण से संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में स्त्री के प्रति घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं। भारत में भी ऐसा कानून बनाया गया है। लेकिन उस कानून में की गई किसी कार्यवाही में किसी को दंडित नहीं किया जा सकता है लेकिन हिंसा को रोकने के लिए और हिंसा की शिकार महिला को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए आदेश पारित किए जा सकते हैं। यदि इन आदेशों की अवहेलना की जाए तो फिर वह अवहेलना अपराध होगी। इस कानून का यह अर्थ कदापि नहीं है कि कोई स्त्री यदि हिंसा करती है तो उस के विरुद्ध कार्यवाही नहीं की जा सकती है।

स के अतिरिक्त भारत में दहेज प्रथा और उस के या अन्य कारणों से महिलाओं को अपनी ससुराल में  क्रूरता का शिकार होना पड़ता है। इस के लिए भारतीय दंड संहिता में धारा 498-अ जोड़ी गयी है जो एक संज्ञेय अपराध है। ऐसी परिस्थिति पुरुषों के साथ नहीं है इस कारण से यह धारा केवल स्त्रियों के प्रति की गई क्रूरता के लिए है, न कि पुरुषों के प्रति क्रूरता के लिए। यदि कभी यह आदर्श स्थिति भारतीय समाज में उत्पन्न हो जाए कि स्त्रियों को इस तरह की क्रूरता और हिंसा का शिकार न होना पड़े और यह अपवाद स्वरूप रह जाए तो संभव है कि भारत की संसद इन कानूनों और उपबंधों की आवश्यकता न समझे और समाप्त कर दे। लेकिन यह संभावना अभी दूर दूर तक दिखाई नहीं देती।

पत्नी की संपत्ति में पति एक भाग उत्तराधिकार में प्राप्त करने का अधिकारी है

समस्या-

मेरी माताजी के नाम पर एक भूखंड है।  माताजी का देहान्त हो गया है। उन के बाद  परिवार में मेरे पिताजी, मैं और मेरा एक बड़ा भाई है।  बड़ा भाई अलग रहता है उस से हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं। आप बताएँ कि उक्त भूखंड का बँटवारा कैसे होगा? बड़ा भाई कहता है कि उस भूखंड पर पिताजी का कोई अधिकार नहीं है। क्या यह सही है?

-सुभाष गौतम, उत्तर प्रदेश

समाधान-

 

किसी भी हिन्दू महिला की मृत्यु हो जाने पर उस की संपत्ति के सर्वप्रथम उत्तराधिकारी उस के पुत्र, पुत्री व पति समान रूप से हैं। वे सब एक एक भाग प्राप्त करने के अधिकारी हैं। इस तरह किसी भी महिला की सम्पति में उस के पति को उत्तराधिकार प्राप्त है। आप के भाई गलत कहते हैं। आप के पिता जी को आप की माता जी की संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त है तथा वे संपत्ति का एक भाग प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

प ने बताया है कि आप दो भाई और आप के पिता आप की माता जी के उत्तराधिकारी हैं। लेकिन आप ने नहीं बताया है कि आप के कोई बहिन नहीं है। यदि आप की एक या अधिक बहिनें हैं तो वे भी एक-एक भाग प्राप्त करने की अधिकारी हैं।

स तरह आप की माताजी की संपत्ति में यदि आप के कोई बहिन नहीं है तो आप को, आप के भाई को तथा आप के पिताजी को प्रत्येक को माताजी की संपत्ति का एक तिहाई भाग प्राप्त करने का अधिकार है। यदि आप के एक बहिन है तो आप चारों को संपत्ति का एक चौथाई और दो बहिनें हैं तो प्रत्येक को पाँचवा हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार है।

पत्नी के किए झूठे मुकदमे से परेशान पुरुष की आह! और उस से एक छोटी सी बात

 रविन्दर काम्बोज ने यह पत्र तीसरा खंबा को भेजा है –
भारतीय संविधान में महिलाओं को जो अधिकार दिए गए हैं,  मुझ जैसे पता नहीं कितने बेगुनाह उसका शिकार हो रहे हैं।  मुझपर मेरे ससुराल वालो ने झूठा दहेज का केस थोपा है, मेरे पास अपनी बेगुनाही के सबूत भी मौजूद हैं, परन्तु फिर भी मुझे इन्साफ नहीं मिल रहा है।  करीब 2 साल पहले मेरी शादी हुई थी, शादी के कुछ दिन बाद ही मेरी पत्नी की तबियत ख़राब हो गई, उसे हॉस्पिटल में भरती करवाया तो डाक्टर  ने उसकी जाँच  की तो पता चला की वो एक ला इलाज़ हृदय रोग से ग्रस्त है।  डॉक्टर ने बोला की ये लड़की शादी के काबिल नहीं थी, और लड़की के पिताजी को भी डॉक्टर ने फटकार लगाई कि जब तुम्हें पता था कि ये लड़की शादी के काबिल नहीं है तो तुमने जान बूझकर क्यूं इस लड़के की जिंदगी खराब की।  डॉक्टर ने हमें सलाह दी कि अपने ससुराल वालों पर 420 का मुकदमा कर दो और लड़की को तलाक दे दो।  परन्तु हमने इंसानियत के नाते ऐसा करना ठीक नहीं समझा और उसे अपने पास ही रखा।  उसका इलाज़ करवाते रहे जिस में हमारा बहुत धन व्यय हुआ।
कुछ दिनों बाद लड़की अपने घर चली गई।  मैं उसके घर वालों को भी उसके इलाज़ का खर्चा देता रहा। लेकिन फिर उनका लालच बढ़ गया और वो मुझ से बहुत अधिक धन की मांग करने लगे जो मेरी पहुँच से दूर था। मैंने उन्हें पैसे देने से इनकार कर दिया तो मुझे धमकियाँ देने लगे कि 7 लाख रूपए दे दो नहीं तो हम तुम पर झूठा दहेज का केस कर  तुमको सारी उम्र जेल में कैद करवा देंगे। मैं उतनी राशि देने में असमर्थ था।  इस बारे में मैंने अपने जिले के स.प. को शिकायत भी की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की। पत्नी ने हम पर  दहेज का झूठा केस कर दिया, जिस वजह से मुझे 3 दिन हवालात में भी रहना पड़ा। मैंने अपनी बेगुनाही के सबूत भी पुलिस को दिखाए, लेकिन मेरी एक नहीं सुनी गई। मैं  हर रोज कोर्ट कचहरियों के चक्कर काट काट कर बहुत परेशांन हो चुका हूँ। बहुत पैसा भी बर्बाद हो गया है, तक़रीबन  40,000  रूपए से भी ज्यादा लग चुके हैं। लेकिन कोर्ट से फिर भी इन्साफ नहीं मिल रहा है जिस वजह से मेरे ससुराल वालों के होसले और बुलंद हो गए हैं। उन्होंने पैसों के बल पर पुलिस और कानून दोनों को अपनी तरफ कर लिया है, बिलकुल ऐसा ही वो पहले भी एक बार कर चुके हैं अपने एक  दामाद के साथ जब वह  दिल्ली में रहता था तो उनसे भी इन्होने 10,00,000 रूपए वसूले थे।  इस वजह से हमारे साथ भी वो ऐसा ही कर रहे हैं.  मेरे पास अपनी बेगुनाही के सारे पुख्ता सबूत मौजूद हैं।
ज कल इस दहेज वाले कानून का दुरूपयोग करके लोग पता नहीं कितने बेगुनाहों से लाखों कमा रहे हैं, लड़कियां ससुराल वालों को ब्लैकमेल करती  हैं।  इस वजह से मजबूर पतियों को उनकी इस जिद्द के आगे अपने माँ-बाप तक को छोडना पड़ता है।.  मेरा कसूर सिर्फ इतना है कि मैंने  उसी वक़्त डॉक्टर की बात मान कर उसे तलाक देने के बजाए उस से हमदर्दी दिखाई.। एक तरफ तो भारत का कानून स्त्रियों से हमदर्दी करने की सलाह देता है और दूसरी तरफ मुझे सिर्फ उसी हमदर्दी की सजा मिल रही है।  मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि मेरे साथ जो हुआ सो हुआ, लेकिन  किसी और के साथ ऐसा न हो। यदि इस कानून का इसी  तरह गलत इस्तेमाल होता रहा तो, विवाहित जीवन  नरक बन जाएगा और लोगो के मन से इंसानियत बिलकुल खतम हो जाएगी और लोग स्त्रियों का भला करने से भी कतराने लगेंगे। इसी बारे में मैंने ऐसा ही एक पत्र महामहिम राष्ट्रपति जी को भी ई-मेल किया था जिसका पंजीकरण नम्बर : PRSEC/E/2011/09707 मिला था। लेकिन राष्ट्रपति जी से भी मुझे निराशा भी हाथ लगी।
 उत्तर –
रविन्दर जी,
 प के साथ जो कुछ भी हुआ है, उस के लिए मुझे आप के साथ हमदर्दी है। आप की इस दुर्दशा में समाज की और आप की भी बहुत भूमिका रही है। सब से पहला दोष तो हमारे समाज का यह है कि हम लड़कियों और स्त्रियों को पुरुषों के समान इंसान नहीं समझते। यदि वह लड़की पहले से या जन्म से ही बीमार थी तब उस की चिकित्सा उस के पिता को करानी चाहिए थी, उन्हों ने उस की चिकित्सा ठीक से नहीं कराई और उसे विवाह कर के अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए। आप के साथ विवाह हुआ कैसे भी हो वह आप की पत्नी हो गई। लेकिन आप ने उसे बराबरी का दर्जा तो दूर उसे पत्नी का दर्जा भी नहीं दिया। इस पत्र में भी आप उसे लड़की ही कह रहे हैं, पत्नी नहीं, जब कि वह आज भी आप की पत्नी है। उस के साथ उस के माँ-बाप ने उचित व्यवहार नहीं किया। आप ने उस से हमदर्दी दिखाई लेकिन समान दर्जा फिर भी उसे नहीं दिया।  खैर! इस में आप का अकेले का क्या कसूर? उस के माता-पिता ही उस के सगे न हुए। कुल मिला कर हमारे समाज का ढांचा ऐसा है कि एक स्त्री के प्रति वह न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं करता। संविधान उस के साथ समानता का व्यवहार करने की कहता है और उसे समानता का दर्जा देता है, लेकिन हम संविधान को कहाँ मानते हैं?
हिलाओं के प्रति अत्याचारों को रोकने के लिए संसद ने कानून बनाए। लेकिन उन कानूनों का पालन कितना किया जाता है? सब जानते हैं। दंप्रसं की धारा 498 ए में कोई कमी नहीं है। जैसे ही कोई मामला पुलिस के पास पहुँचता है, पुलिस की बाध्यता है कि वह मुकदमा दर्ज करे और उस में अन्वेषण करे। हमारा सामाजिक ढाँचा ऐसा है कि शायद ही कोई स्त्री ऐसी मिले जिस के साथ उस के ससुराल में क्रूरतापूर्ण व्यवहार न किया गया हो। लगभग हर मामले में क्रूरता के सबूत मिलते हैं और पुलिस द्वारा मुकदमा तैयार करना जरूरी हो जाता है। फँस जाने पर पति और ससुराल वाले पुलिस से साँठगाँठ करते हैं। लेकिन पुलिस की मजबूरी है कि वह क्रूरता के सबूत मिलने के बाद पति को बरी नहीं कर सकती। वह ससुराल वालों को किसी तरह ले दे कर मामले से निकाल देती है, लेकिन रिश्वत ले कर भी पति को गिरफ्तार करती है और अदालत में मुकदमा पेश करती है। पति की वहाँ दो तीन दिन में नहीं तो एक-दो माह में जमानत हो जाती है।  आप खुशकिस्मत हैं कि आप तीन दिनों में हिरासत से मुक्त हो गए। अब आप को बस इतनी तकलीफ है कि आप को बरसों पेशियाँ करनी पड़ेंगी। या फिर पत्नी को हर माह खर्चा देना पड़ेगा। मुकदमा ठीक से लड़ा गया तो आप को सजा नहीं होगी। पुलिस को मुकदमा साबित करने में कोई रुचि नहीं और आप के ससुराल वाले उसे साबित कर नहीं सकते।
प अपने आप को पूरी तरह बेदाग नहीं कह सकते। यदि होते तो चालीस हजार रुपया किस में खर्च कर दिया। यदि पुलिस को पैसा नहीं दिया हो तो आप की जमानत अधिक से अधिक पाँच-दस हजार में हो गई होती और मुकदमा भी उस में लड़ लिया होता। आप ने स्वयं भ्रष्टाचार का सहारा लिया है। यदि आप पूरी तरह सच्चे थे तो व्यवस्था से भिड़ कर लड़ सकते थे। खैर! इस में भी आप ने वही किया जो सब करते रहे हैं। आप तो समाज की धारा में बह रहे हैं। बह रहे हैं तो आप को समाज द्वारा किए जा रहे अपराधों की सजा भी भुगतनी पड़ेगी। जो आप भुगत ही रहे हैं।
प ने कहा कि लड़कियाँ पतियों को ब्लेक मेल करती हैं। आप ने बिलकुल गलत कहा। ब्लेक मेल पुरुष ही करते हैं वे लड़कियों के पिता, चाचा और मामा वगैरा होते हैं। लड़कियाँ तो ब्लेकमेल में इस्तेमाल की जाती हैं। आप ने बिलकुल सही कहा कि कानून का गलत इस्तेमाल होता रहा तो वैवाहिक जीवन नष्ट हो जाएगा। आप चाहते हैं कि और लोगों का जीवन बरबाद न हो। तो इस दिशा में आप को काम करने से कौन रोक रहा है? आप ये करना चाहते हैं तो समाज में बदलाव लाने के लिए काम करें। ऐसी फिजाँ बनाने के लिए काम करें जिस में लड़कियों और औरतों को इंसान समझा जाए, उन्हें किताबी नहीं वास्तविक रूप से समान अधिकार हों। विवाह अंधों की तरह न किए जाएँ। लड़के-लड़की एक दूसरे को समझें और अपने माता-पिता की इच्छा से नहीं, अपनी इच्छा से विवाह करने लगें। माता-पिता मार्गदर्शक हों, लेकिन युवक-युवतियाँ अपने जीवन का मार्ग स्वयं तय करें। लड़कियाँ अपने पैरों पर खड़ी हों। (ऐसा हुआ तो वे पति से भरण-पोषण खर्चा नहीं मांग सकेंगी, जरूरत पड़ने पर उन से ही मांगा जा सकेगा)
हाँ तक कानून बदलने का प्रश्न है तो उसे बदलने के लिए तो सरकार ने कमर कस ली है। जल्दी ही उस के परिणाम देखने को मिलेंगे। हो सकता है 498 ए का अपराध संज्ञेय न रह जाए, हो सकता है वह जमानतीय रह जाए। ऐसा हुआ तो उस कानून का पूरा दम ही निकल जाएगा। फिर जम कर लोग पत्नियों बहुओं के साथ क्रूरता करते रह सकते हैं। अधिक से अधिक उन्हें मुकदमे का ही तो सामना करना पड़ेगा। वे आसानी से कर लेंगे। बस पुलिस के तंग करने की थोड़ी समस्या होगी और थोड़ी सी समस्या बरसों मुकदमा चलने की रहेगी। तो अदालतों की संख्या बढ़ाने के लिए लड़ा जा सकता है जिस से मुकदमों का निर्णय एक-दो वर्ष में होने लगे। इन सब कामों के लिए संगठन खड़ा करना होगा। तो आप अपने आसपास देखिए, कोशिश कीजिए, अपने जैसे कुछ नौजवानों को साथ लाइए और समाज में काम आरंभ कीजिए। हो सकता है आप की पहल पर ही कुछ बर्फ पिघले।

कोई वसीयत न करने पर हिन्दू स्त्री की संपत्ति उत्तराधिकार में किसे प्राप्त होगी?

 रचना ने पूछा है –

क परिवार में पति-पत्नी और तीन बेटे हैं। पत्नी हमेशा गृहणी रही यानी उनकी अपनी कोई आय नहीं थी। बड़े बेटे का विवाह हो चुका है और वह उसकी पत्नी के साथ अलग रहता है। शेष दोनों बेटे अविवाहित हैं और विदेश मे हैं। अभी माँ का देहांत होगया है। माँ ने कुछ कैश और एफ डी करा रखी थी जिसका उनके पति कहते हैं उनको पता नहीं है। माँ के पास कुछ जेवर भी थे जैसे 3 सोने की चैन { हर बेटे ने एक दी थी } २ सोने के कड़े { जो उन्होने बहू को मुहँ दिखाई में दिये थे और वापस ले लिये } इस अलावा एक चैन जो उनको बहू के मायके से मिली थी। मैं जानना चाहती हूँ की क्या माँ की जो ये सम्पत्ति है, उस पर बेटों और पति का अधिकार है या केवल पति का जो चीज़ बहू को मुहँ दिखाई में देने के बाद वापस ली गयी, उस पर बहू का अधिकार होगा या नहीं? जो चीज बहू के मायके से दी गयी थी सास को उस पर किसका अधिकार बनता हैं? बड़े बेटे के बेटे-बेटी का क्या क़ानूनी अधिकार हैं? बैंक में जो पैसा हैं उस पर क्या बहू का अधिकार है या बेटे के बेटे-बेटी का कोई कानूनी अधिकार है?

 उत्तर –
रचना जी,
प ने संपत्ति का अलग-अलग वर्णन कर के प्रश्न को बहुत जटिल बना दिया है, वास्तव में यह इतना जटिल नहीं है। सब से पहले हमें यह निर्णय करना चाहिए कि कौन सी संपत्ति मृतक गृहणी महिला की थी, और कौन सी उन के पास अमानत के रूप में थी?  वे गृहणी थीं, और उन की स्वयं की कोई आय नहीं थी। इस कारण से उन के पास स्वअर्जित संपत्ति नहीं थी। लेकिन कोई भी व्यक्ति उपहार के रूप में कोई भी संपत्ति अर्जित कर सकता है। इस तरह अर्जित संपत्ति उस की स्वयं की संपत्ति होती है। किसी स्त्री को किसी भी व्यक्ति से मिला उपहार उसी की संपत्ति होता है। इस मामले में जो धनराशि नकद अथवा सावधि जमा के रूप में बैंक में उन गृहणी के नाम से जमा है वह उन की स्वयं की संपत्ति थी। उन के पास तीन सोने की चैनें जो उन के बेटों ने उन्हें उपहार में दी थीं वे उन की अपनी संपत्ति थी। दो सोने के कड़े जो वे अपनी बहू को उपहार में दे चुकी थीं और वापस ले लिए थे वे पहले से ही बहू की संपत्ति हैं, उन गृहणी के पास वे केवल अमानत के बतौर रखे हुए थे। जो चैन बहू के मायके से उन्हें मिली है वह भी उन की स्वयं की संपत्ति है क्यों कि वह उन्हें उपहार में प्राप्त हुई है। इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि उन्हें वह किस से उपहार में प्राप्त हुई थी। इस तरह हम देखते हैं कि उन के पास जो भी संपत्ति आपने बताई है, उन में से बहू को उपहार में दे कर वापस ले लिए गए दो सोने के कड़ों के अतिरिक्त सभी संपत्ति उन गृहणी की हैं। बहू की अमानत पर तो उसी बहू का अधिकार है, जिसे वे सोने के कड़े उपहार में दिए गए थे। शेष संपत्ति किसे प्राप्त हो इस का निर्धारण हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के उपबंधों के अनुसार होगा। 
किसी भी हिन्दू स्त्री की मृत्यु हो जाती है और वह कोई वसीयत नहीं कर जाती है तो उस की संपत्ति के उत्तराधिकार का निर्णय निम्न क्रम में होगा-
क. सर्वप्रथम उस के पुत्रों और पुत्रियों (यदि किसी पुत्र या पुत्री का देहान्त पहले ही हो गया हो तो उस के पुत्र पु्त्रियों को अपने पिता या माता के बराबर के भाग सहित) व पति को बराबर भागों में प्राप्त होगा।
अर्थात् – यदि किसी महिला के दो पुत्र, दो पुत्रियाँ और पति हैं तो उस की संपत्ति पाँच भागों में विभाजित की जाएगी और एक भाग प्रत्येक को प्राप्त होगा

घरेलू हिंसा के मामले में स्त्री किस किस न्यायालय में अपनी अर्जी प्रस्तुत कर सकती है?

  राजू पवार ने पूछा है-
मेरी बीवी ने मेरे खिलाफ घरेलू हिंसा के तहत नासिक के न्यायालय में दर्ज करवा दिया है, क्या मैं उसे मुम्बई स्थानान्तरित नहीं करवा सकता?
उत्तर – – – 
राजू जी,
रेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत यह प्रावधान है कि व्यथित व्यक्ति (इस मामले में आप की पत्नी) उस  न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपनी अर्जी दाखिल कर सकती है जिस की सीमाओं के भीतर-
1-  व्यथित व्यक्ति स्थाई रुप से या अस्थाई रूप से निवास करता है या कोई कारोबार करता है या कोई नौकरी करता है; या
2- प्रत्यर्थी अर्थात जिस के विरुद्ध अर्जी दी गई है वह निवास करता है या कारोबार करता है; या
3- वाद हेतुक उत्पन्न हुआ है।
स तरह व्यथित व्यक्ति को अर्जी दाखिल करने के लिए तीन विकल्प दिए गए हैं और वह तीनों में से किसी भी विकल्प का उपयोग कर सकता है। उसे इन तीनों ही स्थानों की अदालतों में अपनी अर्जी दाखिल करने का अधिकार है। मेरा अनुमान है कि आप की पत्नी अस्थाई रूप से नासिक में निवास कर रही है ऐसी स्थिति में उसे नासिक में अपनी अर्जी दाखिल करने का अधिकार है। जिस के कारण आप को उस अर्जी को स्थानांतरित कराने का अधिकार नहीं है। हाँ नासिक में अर्जी का विचारण न हो सकने के बहुत ही गंभीर कारण हों तो किसी अन्य न्यायालय में उक्त अर्जी से उत्पन्न मुकदमे को स्थानान्तरित कराया जा सकता है लेकिन तब अदालत का चुनाव आप नहीं कर सकते। स्थानान्तरित करने वाली अदालत ही उस अदालत का चुनाव करेगी जिस में उक्त मुकदमा स्थानांतरित किया जाएगा। उस में भी यह देखा जाएगा कि अर्जी दाखिल करने वाले पक्ष की सुविधा क्या है। 
स अधिनियम के अंतर्गत  किसी भी क्षेत्राधिकार प्राप्त न्यायालय का आदेश पूरे भारत में प्रवृ्त्त कराया जा सकता है। इस कारण से आप के विरुद्ध दाखिल की गई अर्जी में पारित हुए आदेशों का पालन मुम्बई अथवा भारत के किसी भी क्षेत्र में कराया जा सकता है। 
प को अपना मुकदमें नासिक जा कर ही प्रतिरक्षा करनी होगी।

यौन उत्पीड़न पर एक और कानून, क्या कुछ बदल पाएगा?

यौन उत्पीड़न से स्त्रियों की रक्षा के लिए एक और कानून आने को है, मंत्रीमंडल ने इस के लिए अनुमति प्रदान कर दी है। किसी भी सामाजिक समस्या के लिए कानून बना कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझने में भारतीय राजनीतिज्ञों का कोई सानी नहीं है। देश के आजाद होने के बाद से आज तक यही होता आया है कि जब भी किसी सामाजिक समस्या के बारे में जनता के पीड़ित हिस्से से आवाज उठनी आरंभ होती है तभी उन्हें खयाल आता है और सरकार एक कानून का प्रस्ताव संसद में ले कर आती है, विपक्ष उस कानून का समर्थन करता है और कानून बन जाता है। समस्या को पुलिस, अदालत और नौकरशाहों के हवाले कर दिया जाता है। समस्या जहाँ की तहाँ बनी रहती है और पुलिस, वकीलों और नौकरशाहों की चांदी हो जाती है।
विवाहित स्त्रियों पर हो रहे क्रूरता के मामलों की अधिकता को देखते हुए भारतीय दंड संहिता में धारा 498-ए जोड़ी गई थी। लेकिन पता लगा कि जिन मामलों में तुरंत कार्यवाही की आवश्यकता होती है वहाँ कार्यवाही नहीं होती, लेकिन जहाँ पुलिस को अतिरिक्त लाभ की गुंजाइश होती है वहाँ फर्जी शिकायतों पर लोगों का तेल निकाल लिया जाता है। अब कहा जा रहा है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है, जिसे रोका जाना चाहिए। वास्तविकता भी यही है कि कानून में कोई खराबी नहीं है। केवल समस्या यह है कि अपराधों के अन्वेषण का काम हमारी पुलिस के हाथों में है, और सब जानते हैं कि हमारी पुलिस की दशा क्या है?
कोई भी सामाजिक समस्या केवल कानून बना कर समाप्त नहीं की जा सकती। उस के लिए देश भर में सामाजिक अभियान जरूरी हैं। लेकिन जहाँ हमारे राजनेता पूरी तरह बेईमान हों वहाँ इस की संभावना नहीं के बराबर है। जो सांसद कानून बनाने के लिए वोट देते हैं या फिर बहस और मतदान से गैरहाजिर रहते हैं वे कभी इन सामाजिक समस्याओं के बारे में बात नहीं करते। उन के कर्तव्य की इतिश्री संसद के भीतर ही हो जाती है। आज सारे दलों के नेता दहेज के विरुद्ध हैं, स्त्री के उत्पीड़न के विरुद्ध हैं, लेकिन सामाजिक रूप से वे खुद दहेज लेते हुए और स्त्री उत्पीड़न में संलग्न दिखाई पड़ते हैं। भारतीय व्यवहार का यही दोमुखापन है जो सामाजिक समस्याओं को समाप्त नहीं होने देता। हम अच्छी तरह जानते हैं कि इस कानून के आने के बाद भी  स्त्री उत्पीड़न में शायद कुछ कमी आ पाए।

पतिगृह में रहते हुए भी भरण-पोषण मांगा जा सकता है और निवास का स्थान भी

  हरियाणा से अमन जी पूछती हैं – – –
मेरी शादी को दो हुए हैं, हमने प्रेम विवाह किया था। लेकिन शादी से मेरी सास प्रसन्न नहीं है और बात-बात पर ताना देती रहती है। मैं एक प्रोफेशनल महिला हूँ, पर मेरा वेतन कम है। शुरू में तो मेरा पूरा वेतन मेरी सास ले लेती थी। पर अब दो माह से मैं ने देना बंद कर दिया है क्यों कि मुझे कुछ नहीं मिलता था। मेरे पति मुझ से झूठ बोलते हैं और कोई बात नहीं बताते। अभी चार माह पहले ये कनाडा गए थे मुझे झूठ बोला कि कम्पनी के माध्यम से जा रहा हूँ पर ऐजेंट के माध्यम से छात्र वीजा ले कर तीन साल के लिए गए थे और पासपोर्ट में खुद को अविवाहित बताया था। इन सब बातों का मुझे इन के लौट आने पर पता लगा। मैं ने इन सब बातों के बारे में मैं ने अपने पति से पूछा तो साफ मना कर दिया। ये ऐसे ही करते हैं झूठ बोलते हैं और फिर मुकर जाते हैं। मुझे दो साल में आज तक इन्हों ने कोई पैसा नहीं दिया बल्कि लेते ही रहे हैं। मेरा सारा सोना जो मेरे शादी के समय मिला था वह मेरी सास ने बेच दिया है। ये लोग वित्तीय रूप से अच्छे हैं, खुद का व्यवसाय है पर मुझे मानसिक रूप से तंग करते हैं। क्या मैं अपने पति से अपने ससुराल में रहते हुए भी खर्चा मांग सकती हूँ? और कैसे इस परिस्थिति का सामना करूँ? मैं अकेले ही हूँ, मेरे मां-बाप वित्तीय रूप से कमजोर हैं। मुझे अपना भविष्य असुरक्षित लगता है इस लिए मैं बचत करना चाहती हूँ, ताकि कुछ भी गलत होने पर काम आ सके। इस के लिए मैं इन लोगों से क्या बोलूँ? कानूनी तौर पर मेरा वेतन भी ना मांगें और कुछ मुझे भी पैसे दे दिया करें। क्या  पति के वेतन में ये मेरा हक बनता है।   
  उत्तर – – –
अमन जी,
प का प्रेम विवाह तो असफल हो चुका है। अब आप के साथ उन महिलाओं से भी बुरी स्थिति है जो माता-पिता के कहने से विवाह करती हैं। लेकिन इन परिस्थितियों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। आप को अपने जीवन यापन  का खर्च प्राप्त करने का अधिकार केवल अपने पति से है। लेकिन उस के लिए आप को प्रमाणित करना होगा कि आप के पति की आय आप से बहुत अधिक है। वैसी स्थिति में आप अपना वेतन खुद रखते हुए भी पति से गुजारा भत्ता इस आधार पर मांग सकती हैं कि आप को अपने पति के स्टेटस से जीवन यापन करने का हक है। आप को इस तरह से मानसिक रूप से प्रताड़ित करना घरेलू हिंसा है। जिस के लिए महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा कानून बना हुआ है। आप घरेलू हिंसा कानून के अंतर्गत अपना आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती हैं। इस में आप को अपने पतिगृह में रहने का हक मिलेगा और साथ ही यदि आप के पति की आय को आप अपनी आय से बहुत अधिक होना प्रमाणित कर सकें तो आप को कुछ गुजारा भत्ता भी मिल सकता है। 

प चाहें तो अपना सोना जो आप की सास ने बेच दिया है उस की भी मांग कर सकती हैं। क्यों कि आप का सोना आप का स्त्री-धन जो अमानत के बतौर आप की सास के पास था। उस ने उसे बेच कर अमानत में खयानत की है जो कि धारा 406 भा.दं
.प्र. संहिता के अंतर्गत अपराध है। इस के लिए आप की सास और आप के पति के विरुद्ध धारा-406 का अपराध दर्ज हो सकता है। यदि प्रमाणित हो सका तो इस के लिए उन्हें सजा भी हो सकती है। आप यह सब अपने पति के घर में रहते हुए करना चाहती हैं इस के लिए आप को बहुत मजबूत होना पड़ेगा। आप को स्थानीय महिला संगठनों और पुलिस के परिवार सहायता केंद्र की मदद लेनी चाहिए।

तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत अवधि के बाद पुनर्विवाह तक पूर्व पति से भरण पोषण प्राप्त सकती है

नाब शरीफ़ ख़ान साहब ने सवाल किया था कि क्या तलाक शुदा मुस्लिम महिला इद्दत की अवधि के बाद भी अपने खाविंद से धारा 125 दं.प्र.संहिता में जीवन निर्वाह भत्ते के लिए आवेदन कर प्राप्त कर सकती है, यदि उस ने विवाह नहीं किया हो? तीसरा खंबा पर 19.05.2010 को प्रकाशित पोस्ट क्या तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत अवधि के बाद पूर्व पति से भरण पोषण प्राप्त नहीं कर सकती ? में  उस का उत्तर दिया गया था कि मुस्लिम महिला ( तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 (Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986) पारित होने के पहले तक तो स्थिति यही थी कि एक मुस्लिम तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह करने तक अपने पूर्व पति से जीवन निर्वाह के लिए भत्ता प्राप्त करने हेतु धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत आवेदन कर सकती थी और प्राप्त कर सकती थी। लेकिन इस कानून के पारित होने के उपरांत यह असंभव हो गया।  इस कानून के आने के बाद स्थिति यह बनी कि मुस्लिम तलाकशुदा महिला  इस कानून की धारा 5 के अंतर्गत भरण-पोषण की राशि के लिए आवेदन कर सकती है, लेकिन वह केवल उन व्यक्तियों से जीवन निर्वाह भत्ता प्राप्त कर सकती है जो उस की मृत्यु के बाद उस की संभावित संपत्ति के वारिस हो सकते हैं या फिर वक्फ बोर्ड से यह भत्ता प्राप्त कर सकती है। लेकिन धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत नहीं। सुप्रीमकोर्ट ने इसी कानून के आधार पर बिल्किस बेगम उर्फ जहाँआरा बनाम माजिद अली गाज़ी के मुकदमे में उपरोक्त बात को स्पष्ट किया कि एक तलाकशुदा महिला अपने लिए तो नहीं लेकिन यदि उस की संतानें उस के पास हैं तो उन के लिए भरण पोषण प्राप्त करने के लिए वह धारा 125 दं.प्र.संहिता में आवेदन कर सकती है।
स पोस्ट के प्रकाशन के उपरांत उन्मुक्त जी ने आगे का मार्गदर्शन किया और बताया कि -शायद इस प्रश्न का सही जवाब २००१ के उस लोक हित याचिक के फैसले में निहित है जिसमें डैनियल लतीफी ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम को चुनौती दी थी। मैं इस निर्णय को पढ़ कर अपनी राय कायम करता उस के पूर्व ही जनाब शरीफ खान साहब जो कि राजस्थान के एक छोटे नगर में वकील हैं स्वयं श्रम किया और मुझे सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4 दिसंबर 2009 को शबाना बानो बनाम इमरान खान के मुकदमे में पारित निर्णय प्रेषित किया। इस में सु्प्रीमकोर्ट ने यह निर्धारित किया है कि डेनियल लतीफ़ी और इक़बाल बानो के मुकदमे में प्रदान किए गए निर्णयों को एक साथ पढ़ने और विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति से तब तक भरण-पोषण राशि प्राप्त करने की अधिकारिणी है जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है। इसी निर्णय में अंतिम रूप से यह निर्णय भी दिया गया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत इद्दत की अवधि के उपरांत भी तब तक भरण-पोषण राशि प्राप्त कर सकती है जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है।
स तरह अब यह स्पष्ट है कि एक लाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत इद्दत की अवधि के उपरांत भी तब तक भरण-पोषण राशि प्राप्त कर सकती है जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है। तीसरा खंबा महिलाओं के लिए लाभकारी कानून की
अद्यतन स्थिति इस के पाठकों तक पहुँचाने में आदरणीय उन्मुक्त जी के मार्गदर्शन और जनाब शरीफ़ ख़ान साहब, अधिवक्ता के सहयोग के लिए आभारी है।

क्या तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत अवधि के बाद पूर्व पति से भरण पोषण प्राप्त नहीं कर सकती ?

प्रश्न-

 जनाब शरीफ़ ख़ान साहब ने सवाल किया है कि क्या तलाक शुदा मुस्लिम महिला इद्दत की अवधि के बाद भी अपने खाविंद से धारा 125 दं.प्र.संहिता में जीवन निर्वाह भत्ते के लिए आवेदन कर प्राप्त कर सकती है, यदि उस ने विवाह नहीं किया हो?

उत्तर-
 नाब शरीफ़ ख़ान साहब मुस्लिम महिला ( तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 (Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986) पारित होने के पहले तक तो स्थिति यही थी कि एक मुस्लिम तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह करने तक अपने पूर्व पति से जीवन निर्वाह के लिए भत्ता प्राप्त करने हेतु धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत आवेदन कर सकती थी और प्राप्त कर सकती थी। लेकिन इस कानून के पारित होने के उपरांत यह असंभव हो गया।  इस कानून के आने के बाद स्थिति यह बनी कि मुस्लिम तलाकशुदा महिला  इस कानून की धारा 5 के अंतर्गत भरण-पोषण की राशि के लिए आवेदन कर सकती है, लेकिन वह केवल उन व्यक्तियों से जीवन निर्वाह भत्ता प्राप्त कर सकती है जो उस की मृत्यु के बाद उस की संभावित संपत्ति के वारिस हो सकते हैं या फिर वक्फ बोर्ड से यह भत्ता प्राप्त कर सकती है। लेकिन धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत नहीं।

सुप्रीमकोर्ट ने इसी कानून के आधार पर बिल्किस बेगम उर्फ जहाँआरा बनाम माजिद अली गाज़ी के मुकदमे में उपरोक्त बात को स्पष्ट किया कि एक तलाकशुदा महिला अपने लिए तो नहीं लेकिन यदि उस की संतानें उस के पास हैं तो उन के लिए भरण पोषण प्राप्त करने के लिए वह धारा 125 दं.प्र.संहिता में आवेदन कर सकती है।  
(क्रमशः आगे पढ़ें)

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