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पृथक आवास, हिंसा पर रोक व गुजारे भत्ते के लिए महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम में परिवाद दाखिल करें।

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

जन्म से हिन्दू व मुस्लिम के मध्य विवाह कैसे साबित किया जा सकेगा?

समस्या-

मैं एक मुस्लिम लड़की के साथ विगत नौ वर्ष से रह रहा हूँ।  हम दोनों बिना विवाह किए सहमति से साथ साथ रह रहे थे।  जिस के कारण राशन कार्ड, और अन्य दस्तावेजों (पासपोर्ट, जीवन बीमा पॉलिसी, संतान के जन्म प्रमाण पत्र, उस के एम. कॉम. की अंक तालिका) में उस का नाम मेरी पत्नी के रूप में अंकित है।  अब मेरे एवं मेरे माता पिता पर उस ने धारा 498-ए, 294, 323, 34 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत मिथ्या प्रकरण दर्ज करवाया और हमें 12 दिन तक जेल में रहना पड़ा।  उस ने धारा 125 दं.प्र.संहिता के अन्तर्गत भरण पोषण के लिए भी मुझ पर प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किया है।  सभी प्रकरण न्यायालय में लंबित हैं।  पुलिस ने दबाव दे कर मेरा बयान लिख लिया कि वह मेरी पत्नी है।  हमारे विवाह का कोई अन्य प्रमाण नहीं है।  क्या पुलिस द्वारा दबाव में दर्ज किए गए बयान को आधार मान कर न्यायालय द्वारा धारा 125 दं.प्र.संहिता के अन्तर्गत अन्तरिम आदेश दिया जा सकता है?

-अनुतोष, भिलाई, छत्तीसगढ़

समाधान-

स्त्री पुरुष के बीच पति-पत्नी का संबंध विवाह से उत्पन्न होता है तथा विवाह प्राकृतिक नहीं अपितु एक सामाजिक और विधिक संस्था है।  आप एक हिन्दू हैं और वह स्त्री जिस ने आप के विरुद्ध स्वयं को आप की पत्नी बताते हुए मुकदमे किए हैं एक मुस्लिम है।  आप दोनों के मध्य वैवाहिक संबंध या तो विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह के सम्पन्न होने और उस का पंजीकरण होने से स्थापित हो सकता है या फिर आप के इस्लाम ग्रहण करने पर मुस्लिम विधि के अनुसार निक़ाह के माध्य़म से हो सकता है अथवा उस महिला द्वारा मुस्लिम धर्म त्याग कर हिन्दू धर्म की दीक्षा लेने पर सप्तपदी के माध्यम से हो सकता है।  उस महिला को स्वयं को आप की पत्नी साबित करने के लिए यह प्रमाणित करना होगा कि इन तीन विधियों में से किसी एक के माध्यम से आप के साथ उस का विवाह संपन्न हुआ था।  जो तथ्य आप ने अपने प्रश्न में अंकित किए हैं उन से ऐसा प्रतीत होता है कि वह स्वयं को आप की पत्नी सिद्ध नहीं कर सकती।

धारा-125 दं.प्र.संहिता में पत्नी को भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है लेकिन उस का पुरुष के साथ वैध रूप से विवाहित होना भी आवश्यक है। इस धारा में पत्नी शब्द को आगे व्याख्यायित करते हुए उस में ऐसी पत्नी को सम्मिलित किया गया है जिस का विवाह पति के साथ विच्छेद हो गया है और जिस ने पुनः विवाह नहीं किया है।  इस से भी स्पष्ट है कि केवल विधिक रूप से विवाहित स्त्री ही धारा-125 के अन्तर्गत भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी है।  इस धारा के अन्तर्गत किसी भी ऐसी स्त्री को अपने उस पुरुष साथी से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार नहीं है जो उस के साथ स्वैच्छा से लिव-इन-संबंध में रही है और जिस संबंध से एक या एकाधिक संतानें उत्पन्न हुई हैं। इस तरह वह महिला आप से भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

लेकिन आप के प्रश्न से पता लगता है कि आप दोनों के लिव-इन-संबंध से एक या एकाधिक संतानें हैं। ऐसी किसी भी संतान के लिए आप पिता हैं और वह स्त्री माता है। ऐसी वैध या अवैध अवयस्क संतान को जो कि स्वयं का भरण पोषण करने में असमर्थ है अपने पिता से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार धारा-125 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत है।  आप के साथ लिव-इन-संबंध से उस स्त्री द्वारा जन्म दी गई संतान को भी आप से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है। अवयस्क अपने संरक्षक के माध्यम से ऐसा आवेदन कर सकता है।  यदि उस स्त्री ने जो आवेदन धारा-125 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत आप के विरुद्ध प्रस्तुत किया है उस में उस संतान के लिए भी भरण-पोषण की मांग की गई है तो न्यायालय द्वारा उस संतान के लिए भरण पोषण राशि दिलाया जाना  निश्चित है।  इस के लिए आप को तैयार रहना चाहिए।

प के प्रश्न का सार है कि पुलिस द्वारा दबाव में लिए गए बयान के आधार पर क्या वह स्त्री पत्नी सिद्ध की जा सकती है।  तो ऐसा बहुत सारे तथ्यों और उस प्रकरण में आई मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पर निर्भर करता है।   यदि आप ने उक्त मामले में यह कहा है कि आप का यह बयान दबाव में लिया गया था तो फिर आप पर यह साबित करने का दायित्व आता है कि पुलिस ने आप पर दबाव डाला था।   यदि आप यह साबित कर पाए कि पुलिस ने ऐसा बयान देने के समय दबाव डाला था या आप पुलिस हिरासत में थे तो ही आप के उस बयान को साक्ष्य के बतौर प्रयोग नहीं किया जा सकता।  लेकिन पुलिस ने पहले बयान दर्ज किया होगा और बयान दर्ज करने के बाद आप की गिरफ्तारी दिखाई होगी।  आप के इस का प्रश्न का समुचित उत्तर समस्त साक्ष्य का अध्ययन किए बिना किया जाना संभव नहीं है।  पर मेरा मानना है कि यदि प्राथमिक तौर पर यह साक्षय रिकार्ड पर हो कि वह स्त्री जन्म से मुस्लिम है और आप जन्म से हिन्दू हैं तो फिर जब तक दोनों में से किसी एक के धर्म परिवर्तन या फिर विशेष विवाह अधिनियम में विवाह का पंजीकरण साबित किए बिना आप दोनों को पति-पत्नी साबित किया जाना संभव नहीं है।

पहला विवाह समाप्त हुए बिना महिला का दूसरा विवाह शू्न्य है

 दीपक ने पूछा है –
मेरा एक मुस्लिम लड़की से प्रेम संबंध था। आर्य समाज में उस लड़की का धर्म परिवर्तन करवा कर उस का नाम मुस्कान आर्य रखा गया। उस के बाद 5 जनवरी को हम ने आर्य समाज में ही विवाह कर लिया। विवाह के बाद हम ने अपने अपने घर वालों को सूचना दी तो मेरे घरवालों ने तो मुझे 50 रुपए के स्टाम्प पेपर पर घोषणा कर मुझे बेदखल कर दिया। जब कि मुस्कान के घर वालों ने दो दिनों की नाराजगी के बाद प्रस्ताव रखा कि यदि मैं मुस्लिम धर्म ग्रहण कर के निकाह कर लूँ तो वो लड़की से रिश्ता रखेंगे अन्यथा तुम तकलीफ में आ सकते हो। मुस्कान अपने परिवार को नहीं छोड़ रही थी और परेशान हो रही थी इस कारण से मैं ने मुस्लिम धर्म ग्रहण कर के उस से निकाह कर लिया। लेकिन लड़की का पुनः धर्म परिवर्तन नहीं कराया गया, क्यों कि उस के धर्म परिवर्तन और आर्य समाजी विवाह की बात काजी को बताई नहीं गई थी। हम दोनों अलग रहने लगे। तब मुस्कान ने अपनी मित्र मंडली को नहीं छोड़ा वह मेरे मना करने के बाद भी मेरे काम पर जाने के बाद मित्र लड़कों से मिलती रही। मैं ने बहुत समझाने की कोशिश की पर वह नहीं मानी। मैं ने उस के परिवार से शिकायत की तो उन्होंने पहले लड़की को समझाया, वह फिर भी नहीं मानी। इस बीच मुस्कान ने आर्य समाज मंदिर के प्रमाण पत्र, निकाहनामा, शादी का एलबम, चालक लायसेंस, पेन कार्ड तथा अन्य बहुत से दस्तावेज मेरे यहाँ से ले जा कर अपने परिवार में रख दिए। मेरे मांगने पर मुझे घुमाने लगी। मैं ने मुस्कान के परिवार से दस्तावेज मांगे तो वे भी 5 माह तक घुमाते रहे। मैं ने उन की शिकायत काजी को की तो उस ने लड़की पक्ष को बता दिया तो उन्हों ने मेरे ही घर पर आ कर मेरे साथ बहुत बुरा सलूक किया। केवल हाथापाई की कसर रह गई। मुस्कान भी उन के साथ हो गई। मैं ने इस की शिकायत महिला थाना और क्षेत्रीय थाना को की, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस पर मैं ने 16.08.2010 को मुस्लिम रीति से लिखित तलाक दे दिया और शहर से बाहर चला गया। मुस्कान ने दिनांक 25.09.2010 को थाने में मेरे गुम हो जाने की रिपोर्ट लिखाई और 13.10.2010 को धारा 498 ए तथा धारा 125 के मुकदमे करवा दिए। मैं ने न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया और 6 दिन जेल में रहने के बाद मेरी जमानत हुई। अब मुस्कान मुझे फोन करती है। मेरे ई-मेल आईडी में भी सेटिंग बदल दी गई। मैं ने इस की शिकायत पुलिस में की है। मुस्कान ने महिला सहायता केंद्र में शिकायत की थी लेकिन वह निरस्त हो गई। उस ने धारा 125 में मेरा 2008-09 के आयकर रिटर्न की प्रति लगाई है जिस में मेरी आय 1,40,000 रुपए है और 6000 रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की है। अब मैं जानना चाहता हूँ कि –
 
1. क्या मेरा तलाक मान्य है?
2. जब मैं ने महिला थाना में शिकायत की थी तब भी मेरे ऊपर 498ए का मुकदमा चलाना सही है क्या?
3. जब मैं परिवार से अलग रहता था तो मेरे परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी सही है क्या? क्या पुलिस इस में कुछ नहीं देखती? 
4. क्या हमारा मुकदमा परिवार न्यायालय में चलने योग्य है? 
5. क्या अब मैं दूसरी शादी कर सकता हूँ? 
6. अब  मुझे क्या करना चाहिए?

 उत्तर –

दीपक जी,

प ने उस कहावत को चरितार्थ कर दिया कि प्यार अंधा होता है। आप ने एक लड़की से प्यार किया उस के साथ घर बसाने का विचार किया और घर बसाने का प्रयत्न भी किया। लेकिन आप ने यह सब कुछ आँख बंद कर के किया। आप को मुस्क

क्या मुझे संतान के लिए दूसरा विवाह करना चाहिए ?

ज़िनी पूछते हैं —-
मस्कार, मैं एक मुस्लिम हूँ ऒर केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी हूँ।  मैं ने मेरी बीबी का हर सम्भव ईलाज कराया पर हमारे कोई औलाद नही हुई। रिश्तेदारो से बच्चा गोद लेना चाहा पर किसी ने नहीं दिया। मेरी उम्र ४४ साल है। क्या मै दूसरी शादी कर सकता हूँ। मेरी बीबी ने पहले तो रजामन्दी दे दी। लेकिन जब मैं ने किसी और से शादी के लिए बात की तो उस के बाद उस का व्यवहार कुछ परेशान करने वाला हो गया है। मुझे अब क्या करना चाहिये?  जिस से  मैं ने शादी के लिए बात की है उन्हें क्या जवाब दूँ। उसे मेरी पहली बीबी के बारे में पता है कि वो मेरे साथ ही रहती है और मै उस को तलाक नहीं देना चाहता। मुझे मेरे ऑफिस में किस प्रकार आवेदन करना चाहिए।
उत्तर – – –
ज़िनी भाई,
प मुस्लिम हैं और अपने व्यक्तिगत कानून के अनुसार दूसरा विवाह कर सकते हैं यदि आप उस की शर्तों की पालना कर सकते हों जिस में सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करना महत्वपूर्ण है। लेकिन व्यवहारिक रूप से यह सब संभव नहीं हो सकता। आप संतान के लिए दूसरा विवाह करना चाहते हैं लेकिन यह कतई आवश्यक नहीं है कि दूसरा विवाह करने पर भी संतान प्राप्ति हो ही जाए। आप की पहली पत्नी ने दूसरी शादी के लिए रजामंदी प्रकट कर दी। पर मुझे लगता है कि उन की यह रजामंदी इस विश्वास के साथ थी कि आप ऐसा नहीं करेंगे। लेकिन जब उन्हें लगा कि आप वास्तव में ऐसा करने जा रहे हैं तो उन का व्यवहार बदल गया है। वास्तव में पहले दी गई रजामंदी का कोई महत्व इस लिए नहीं है कि वह रजामंदी एक गलत विश्वास के अंतर्गत आप को दी गई थी। 
प केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी हैं तो पहले यह जानकारी कर लें कि वहाँ किसी भी कर्मचारी को दूसरे विवाह पर क्या क्या प्रतिबंध हैं। क्यों कि यदि दूसरे विवाह पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध है तो फिर दूसरा विवाह किया जाना सेवा नियमों का उल्लंघन और दुराचरण होगा। जिस के लिए आप को आरोप पत्र दिया जा सकता है और सेवाच्युति का दंड दिया जा सकता है। राजस्थान में पुलिस विभाग के एक कर्मचारी को दूसरा विवाह कर लेने पर आरोप पत्र दे कर सेवाच्युति का दंड दिया गया था और इस मामलें में सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी 2010 में निर्णय दिया है कि ऐसी सेवाच्युति उचित है। यह सही है कि शरीयत दूसरे विवाह के लिए अनुमति देती है लेकिन जब आप एक नौकरी करते हैं जिस की एक शर्त यह हो कि आप एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकते तो सेवा नियमो के तहत यह दूसरी शादी वैध होते हुए भी एक दुराचरण होगी। इस से शादी तो अवैध नहीं होगी लेकिन नियोजक आप को सेवा से पृथक कर सकता है। इस संबंध में आप अपने नियुक्ति अधिकारी को सारी परिस्थियों से अवगत करवाते हुए दूसरे विवाह की अनुमति के लिए आवेदन कर दें। यदि अनुमति मिल जाए तो फिर यह दूसरा विवाह दुराचरण नही होगा। तब आप विवाह कर सकते हैं। अन्यथा स्थिति में आप को दूसरा विवाह करने के लिए वर्तमान पत्नी को तलाक देना होगा। इस संबंध में आप तीसरा खंबा की पोस्ट क्या कोई मुस्लिम सरकारी कर्मचारी पहली बीवी के रहते दूसरी शादी कर सकता है? पढ़ सकते हैं।

 
सूचना – खेद है कि कुछ दिन अंतर्जाल संपर्क बंद रहने के कारण तीसरा खंबा और अनवरत पर पोस्टों का प्रकाशन नहीं हो सकेगा।

तलाक जल्दबाजी में नहीं सोच समझ कर और पूरे 90 दिन का समय ले कर दें

   शमशाद हुसैन पूछते हैं ……………
मेरी शादी को 4 माह हुए हैं,  मेरी पत्नी ज़्यादातर अपनी मायके में रहती है में बुलाने जाता हूँ तो वो नहीं आती। जब मेरे यहाँ रहती है तो घर वालों से तथा मुझ से लड़ती है तथा सबको फँसवाने और खुद आग लगाने को कहती है। जानकारी करने पर पता चला के शादी के पहले से उसके सम्बन्ध किसी लड़के के साथ हैं  इसी लिए वो ये सब ड्रामा करती है। अबकी बार मैं बहुत ही परेशान होकर उसे उसकी माँ के यहाँ छोड़ आया हूँ। लगभग एक महीने  से ज्यादा हो गया है और मैं अब उससे छुटकारा चाहता हूँ।  वकील के कहने पर मैंने वाद भी दायर कर दिया है जिसमें वकील साहब ने ये लिखा है कि मेरी पत्नी मेरे घर रहना नहीं चाहती तथा वो बिना पूछे मेरे घर से चली गयी है बार बार बुलाने जाने पर भी वो बदतमीजी करती है और मुझे झूठा दहेज के मुकदमें में फँसाने के लिए ड्रामा करती है।  वाद दायर हुए एक महीना हो गया है, लेकिन वो लोग न तो फैसला ही करना चाह रहे हैं और न ही तलाक।  अब आप बताएँ मैं क्या करूँ?  मैं  उससे तलाक लेना चाहता हूँ। लेकिन किसी ने मुझे बताया कि अगर तुम ऐसे तलाक दोगे तो वो तलाक अदालत में माननीय नहीं होगा और वो उसके बाद भी दहेज का मुकदमा कर सकती है, मैं बहुत ही गरीब आदमी हूँ, मेरे घर में सिर्फ एक माँ बाप के अलावा एक छोटा भाई है। आप मुझे कुछ रास्ता बताएं? 
उत्तर – – –
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शमशाद भाई,

मुझे लगता है कि आप बहुत जल्दी में हैं। हो सकता है कि इस का कारण यह हो कि आप दहेज के मुकदमे से डर रहे हों। यदि आप ने दहेज की मांग नहीं की है और पत्नी को नहीं सताया है, उस के साथ कोई दुर्व्यवहार, मारपीट या कोई अन्य क्रूरता पूर्ण व्यवहार नहीं किया है तो आप को दहेज के मामले से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। झूठा मुकदमा तो कोई भी कर सकता है, कोई अनजान व्यक्ति भी कर सकता है। यदि इस प्रकार भय के अधीन हो कर आप कुछ करेंगे तो जीवन बहुत ही दूभर हो जाएगा। 
प का विवाह हुए केवल चार माह हुए हैं। इतने से समय में पति-पत्नी के बीच संबंध ठीक से बन ही नहीं पाता है। एक माह पहले आप ने मुकदमा कर दिया है। मुकदमे में आप ने अदालत से क्या मांग की है यह भी नहीं बताया है। ऐसी अवस्था में कोई सटीक कानूनी राय दिया जाना संभव नहीं है। फिर भी आप ने जो तथ्य बताए हैं वे सभी सही हैं और आप ने अपनी पत्नी को तलाक देने के निर्णय कर ही लिया है तो फिर आप को अपनी पत्नी को तलाक दे ही देना चाहिए। तलाक लेने के लिए एक ही बार में तीन बार तलाक कह देने वाले तलाक को आज कर कानून में अच्छा तलाक नहीं माना जाता अपितु यह माना जाता है कि यह कोई तलाक ही नहीं है। इस के लिए सब से सही तरीका यह है कि आप गवाहों के सामने अपनी पत्नी को पहला तलाक कहें, फिर एक माह बाद दूसरा तलाक गवाहों के सामने कहें। फिर पहला तलाक कहने के 90 दिनों के बाद तीसरा तलाक गवाहों के सामने कहें। पहला तलाक कहने के बाद अपनी पत्नी से किसी प्रकार का संपर्क नहीं रखें। यदि बात तीसरे तलाक तक पहुँचती है तो तीसरी बार तलाक कहने के साथ ही तलाक हो जाएग
ा। दहेज की सामग्री और पत्नी को पति व  पति के परिवार सहित किसी के भी द्वारा दिए गए उपहार और भेंटें  पत्नी का स्त्री-धन है। उसे पहली बार तलाक कहने के साथ ही लौटा दें। मेहर भी पत्नी का हक है, जिसे वह कभी भी मांग सकती है। आप मेहर भी उसे देने का प्रस्ताव भी पहली बार तलाक कहने के साथ ही दे दें। इस तरह हुआ तलाक कानून के सामने मान्य होगा। आप चाहें तो जिस काजी ने विवाह कराया है उस के सामने ही तीनों बार तलाक कह सकते हैं। इस पर वह तलाक होने का प्रमाण-पत्र भी जारी कर सकता है।
हाँ तक पत्नी के अन्य अधिकारों की बात है। उसे दूसरी बार विवाह होने तक आप से भरण-पोषण प्राप्त करने का हक है। यदि वह न्यायालय में इस की मांग करती है तो न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकता है जो पत्नी के दूसरी बार विवाह करने तक या उस की मृत्यु तक देना पड़ सकता है। आप मेरी इस सलाह को पढ़ने के उपरांत अपने वकील के साथ परामर्श कर के ही अगला कदम उठाएँ। क्यों कि वह सारी बात औऱ परिस्थितियों को समझ कर आप को सब से सही सलाह दे सकता है।

तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत अवधि के बाद पुनर्विवाह तक पूर्व पति से भरण पोषण प्राप्त सकती है

नाब शरीफ़ ख़ान साहब ने सवाल किया था कि क्या तलाक शुदा मुस्लिम महिला इद्दत की अवधि के बाद भी अपने खाविंद से धारा 125 दं.प्र.संहिता में जीवन निर्वाह भत्ते के लिए आवेदन कर प्राप्त कर सकती है, यदि उस ने विवाह नहीं किया हो? तीसरा खंबा पर 19.05.2010 को प्रकाशित पोस्ट क्या तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत अवधि के बाद पूर्व पति से भरण पोषण प्राप्त नहीं कर सकती ? में  उस का उत्तर दिया गया था कि मुस्लिम महिला ( तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 (Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986) पारित होने के पहले तक तो स्थिति यही थी कि एक मुस्लिम तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह करने तक अपने पूर्व पति से जीवन निर्वाह के लिए भत्ता प्राप्त करने हेतु धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत आवेदन कर सकती थी और प्राप्त कर सकती थी। लेकिन इस कानून के पारित होने के उपरांत यह असंभव हो गया।  इस कानून के आने के बाद स्थिति यह बनी कि मुस्लिम तलाकशुदा महिला  इस कानून की धारा 5 के अंतर्गत भरण-पोषण की राशि के लिए आवेदन कर सकती है, लेकिन वह केवल उन व्यक्तियों से जीवन निर्वाह भत्ता प्राप्त कर सकती है जो उस की मृत्यु के बाद उस की संभावित संपत्ति के वारिस हो सकते हैं या फिर वक्फ बोर्ड से यह भत्ता प्राप्त कर सकती है। लेकिन धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत नहीं। सुप्रीमकोर्ट ने इसी कानून के आधार पर बिल्किस बेगम उर्फ जहाँआरा बनाम माजिद अली गाज़ी के मुकदमे में उपरोक्त बात को स्पष्ट किया कि एक तलाकशुदा महिला अपने लिए तो नहीं लेकिन यदि उस की संतानें उस के पास हैं तो उन के लिए भरण पोषण प्राप्त करने के लिए वह धारा 125 दं.प्र.संहिता में आवेदन कर सकती है।
स पोस्ट के प्रकाशन के उपरांत उन्मुक्त जी ने आगे का मार्गदर्शन किया और बताया कि -शायद इस प्रश्न का सही जवाब २००१ के उस लोक हित याचिक के फैसले में निहित है जिसमें डैनियल लतीफी ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम को चुनौती दी थी। मैं इस निर्णय को पढ़ कर अपनी राय कायम करता उस के पूर्व ही जनाब शरीफ खान साहब जो कि राजस्थान के एक छोटे नगर में वकील हैं स्वयं श्रम किया और मुझे सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4 दिसंबर 2009 को शबाना बानो बनाम इमरान खान के मुकदमे में पारित निर्णय प्रेषित किया। इस में सु्प्रीमकोर्ट ने यह निर्धारित किया है कि डेनियल लतीफ़ी और इक़बाल बानो के मुकदमे में प्रदान किए गए निर्णयों को एक साथ पढ़ने और विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति से तब तक भरण-पोषण राशि प्राप्त करने की अधिकारिणी है जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है। इसी निर्णय में अंतिम रूप से यह निर्णय भी दिया गया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत इद्दत की अवधि के उपरांत भी तब तक भरण-पोषण राशि प्राप्त कर सकती है जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है।
स तरह अब यह स्पष्ट है कि एक लाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत इद्दत की अवधि के उपरांत भी तब तक भरण-पोषण राशि प्राप्त कर सकती है जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है। तीसरा खंबा महिलाओं के लिए लाभकारी कानून की
अद्यतन स्थिति इस के पाठकों तक पहुँचाने में आदरणीय उन्मुक्त जी के मार्गदर्शन और जनाब शरीफ़ ख़ान साहब, अधिवक्ता के सहयोग के लिए आभारी है।

क्या तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत अवधि के बाद पूर्व पति से भरण पोषण प्राप्त नहीं कर सकती ?

प्रश्न-

 जनाब शरीफ़ ख़ान साहब ने सवाल किया है कि क्या तलाक शुदा मुस्लिम महिला इद्दत की अवधि के बाद भी अपने खाविंद से धारा 125 दं.प्र.संहिता में जीवन निर्वाह भत्ते के लिए आवेदन कर प्राप्त कर सकती है, यदि उस ने विवाह नहीं किया हो?

उत्तर-
 नाब शरीफ़ ख़ान साहब मुस्लिम महिला ( तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 (Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986) पारित होने के पहले तक तो स्थिति यही थी कि एक मुस्लिम तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह करने तक अपने पूर्व पति से जीवन निर्वाह के लिए भत्ता प्राप्त करने हेतु धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत आवेदन कर सकती थी और प्राप्त कर सकती थी। लेकिन इस कानून के पारित होने के उपरांत यह असंभव हो गया।  इस कानून के आने के बाद स्थिति यह बनी कि मुस्लिम तलाकशुदा महिला  इस कानून की धारा 5 के अंतर्गत भरण-पोषण की राशि के लिए आवेदन कर सकती है, लेकिन वह केवल उन व्यक्तियों से जीवन निर्वाह भत्ता प्राप्त कर सकती है जो उस की मृत्यु के बाद उस की संभावित संपत्ति के वारिस हो सकते हैं या फिर वक्फ बोर्ड से यह भत्ता प्राप्त कर सकती है। लेकिन धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत नहीं।

सुप्रीमकोर्ट ने इसी कानून के आधार पर बिल्किस बेगम उर्फ जहाँआरा बनाम माजिद अली गाज़ी के मुकदमे में उपरोक्त बात को स्पष्ट किया कि एक तलाकशुदा महिला अपने लिए तो नहीं लेकिन यदि उस की संतानें उस के पास हैं तो उन के लिए भरण पोषण प्राप्त करने के लिए वह धारा 125 दं.प्र.संहिता में आवेदन कर सकती है।  
(क्रमशः आगे पढ़ें)

क्या कोई मुस्लिम सरकारी कर्मचारी पहली बीवी के रहते दूसरी शादी कर सकता है?

एम फारूक़ ने पूछा है —
क्या कोई मुस्लिम सरकारी कर्मचारी पहली बीवी के रहते दूसरी शादी कर सकता है? यदि उसके कोई संतान न हुई हो और वह अपनी पत्नी की हर प्रकार से चिकित्सा करा चुका हो। 
 उत्तर —

फारूक़ भाई!

किसी भी मुस्लिम को एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने का अधिकार नहीं है। यह शरियत में दी गई छूट है कि वह एक साथ चार पत्नियों से वैवाहिक संबंध रख सकता है, जिस के साथ कुछ शर्तें भी हैं।
रकार की भी नौकरी देने की शर्त यह है कि उस का कर्मचारी दूसरा विवाह नहीं कर सकता और वह ऐसा करता है तो यह सेवा शर्तों के अनुसार दुराचरण होगा। अभी जनवरी में ही राजस्थान के एक पुलिस कर्मी लियाकत अली के मामले में भारत के उच्चतम न्यायालय ने निर्णय किया है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी बिना अपने नियोजक की अनुमति के एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह करता है तो यह दुराचरण है और इस कारण से  नियोजक द्वारा उसे नौकरी से निकाला जाना उचित है।
स निर्णय से स्पष्ट है कि कोई मुस्लिम सरकारी कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत विधि के अनुसार एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह कर सकता है, वह विवाह वैध होगा। लेकिन यदि उस ने ऐसा कर के दुराचरण किया है तो उसे नौकरी पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। यदि वह अपने नियोजक की अनुमति प्राप्त कर के ऐसा विवाह करता है तो फिर वह दुराचरण नहीं होगा और उसे नौकरी से नहीं निकाला जाएगा। 

शोएब को आयशा को तलाक क्यूँ देना पड़ा? -एक ठोस वजह

खिर शोएब ने आयशा को तलाक दे दिया और सानिया के साथ निकाह होने में किसी तरह की बाधा नहीं रही। लेकिन यह प्रश्न अभी भी रहस्य बना हुआ है कि जो शोएब यह कहता था कि मेरा किसी आयशा के साथ निकाह नहीं हुआ है वही तलाक को कैसे तैयार हो गया? उस ने एक ऐसी खातून को कैसे तलाक दे दिया जिस से उस का निकाह हुआ ही नहीं था? इन प्रश्नों का उत्तर हम कानून में तलाश करने की कोशिश कर सकते हैं।

स विवाद की आयशा एक भारतीय हैं, जब कि शोएब एक पाकिस्तानी। भारत में आजादी के बाद से इस्लामी कानून को किसी भी तरह से संहिताकृत किए जाने का प्रयास नहीं हुआ। जब जब ऐसा किया गया तब तब मुसलमानों ने उस का विरोध किया और वोट की खातिर जो भी संसद में प्रभावी दल रहा उस ने हथियार डाल दिए। सब से बड़ी बात यह कि इस्लामी कानून का संहिताकरण करने के लिए किसी भी मुस्लिम मजलिस ने जोर नहीं दिया। इस का नतीजा यह है कि भारत में इस्लामी कानून अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। इस के विपरीत पाकिस्तान में इस्लामी कानून को अनेक तरह की व्याख्याओं से बाहर निकाल कर उसे स्पष्ट आकार देने के प्रयास वहाँ हुए हैं। इस से वहाँ कानून स्पष्ट ही नहीं हुआ है अपितु उस के कारण स्त्रियों को कुछ अधिकार भी हासिल हुए हैं। हम इस विवाद की रोशनी में उन में से कुछ पर बात करेंगे।
पाकिस्तान में 1961 में मुस्लिम फैमिली लॉ ऑर्डिनेंस-1961 जारी किया गया। इस के आमुख में कहा गया था कि यह शादी और फैमिली कानून के मामले में गठित आयोगों की सिफारिशों को लागू करने के लिए जारी किया जा रहा है।
मुस्लिम विवाह का पंजीकरण
स कानून के अंतर्गत पाकिस्तान में होने वाले प्रत्येक मुस्लिम विवाह का पंजीकरण कराया जाना अनिवार्य बना दिया गया तथा यूनियन कौंसिल को अधिकार दिया गया कि वह विवाह पंजीयक नियुक्त करे, यह भी निर्देशित किया गया कि एक वार्ड के लिए एक से अधिक विवाह पंजीयक नहीं होंगे। इस में उपबंधित किया गया कि जो भी विवाह विवाह पंजीयक के द्वारा संपन्न नहीं कराया जाएगा उस की सूचना विवाह संपन्न कराने वाला विवाह पंजीयक को देगा। विवाह संपन्न कराने वाला व्यक्ति (काजी)  द्वारा विवाह की सूचना विवाह पंजीयक को नहीं देना अपराध घोषित किया गया और उस अपराध के लिए तीन माह तक का कारावास और एक हजार रुपए जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाना निश्चित कर दिया गया। यूनियन कौंसिल द्वारा विवाहों का रिकार्ड रखना और निश्चित शुल्क पर निकाहनामे की नकल देने का प्रावधान किया गया।
बहुविवाह पर प्रतिबंध
सी कानून के अंतर्गत बहुविवाह पर भी प्रतिबंध लगाने के लिए प्रावधान बनाए गए। एक आर्बीट्रेशन कौंसिल का गठन किया गया और यह प्रावधान किया गया कि कोई भी विवाहित पुरुष जिस की पत्नी मौजूद है  आर्बिट्रेशन कौंसिल की लिखित अनुमति के बिना दूसरा विवाह नहीं करेगा और आर्बिट्रेशन कौंसिल की लिखित अनुमति के बिना ऐसा कोई भी विवाह पंजीकृत नहीं किया जाएगा। दू्सरे विवाह की अनुमति के लिए आवेदन आर्बिट्रेशन कौंसिल को दूसरा विवाह करने के कारणों का वर्णन करते हुए तथा  वर्तमान पत्नी या पत्नियो की पूर्व स्वीकृति और निर्धारित शुल्क के साथ प्रस्तुत की जाएग

मुस्लिम तलाक को अदालत में किस तरह से साबित किया जाए?


फीरोज अहमद साहब ने अपने एक प्रश्न में पूछा था–

 ‘मुस्लिम तलाक को अदालत में किस तरह से साबित किया जाए? ‘

उत्तर-

फीरोज़ अहमद जी,

क मुस्लिम तलाक़ को अदालत में साबित करने के लिए सब से पहले आवश्यक है कि तलाक नियम  पूर्वक दिया गया हो। मुस्लिम तलाक के लिए पत्नी को तीन बार तलाक कहना आवश्यक है। तीसरी बार तलाक कहा जाने पर तलाक पूर्ण हो जाता है। इस कारण तीनों बार तलाक कहने की घटना के गवाहों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाए तो तलाक साबित हो जाता है। तलाक कहने की यह प्रक्रिया लिखित भी हो सकती है। 
ब भी तलाक विवाद का विषय बन कर अदालत के सामने आता है तब उसे साबित करने की जिम्मेदारी उस पक्ष की होती है जो पक्ष यह कहता है कि तलाक हो चुका है। उस पक्ष को चाहिए कि वह अपने बयान अदालत के समक्ष दे साथ ही उन गवाहों के बयान अदालत के सामने कराए जिन के सामने उस ने तीन बार तलाक कहा है। यदि तीन बार तलाक कहने का काम एक साथ ही हुआ है तो एक ही वक्त के गवाहों के बयान कराना पर्याप्त होगा। यदि यह काम तीन बार अलग  अलग वक्त में हुआ है तो तीनों बार के गवाहों  के बयान अदालत में कराने होंगे। यदि तलाक की कोई दस्तावेजी साक्ष्य है तो उस दस्तावेज को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा और उस दस्तावेज के गवाहों के न्ययालय के समक्ष बयान कराने होंगे।
स तरह अदालत के सामने यह तथ्य साबित करना होगा कि मुस्लिम पति ने तीन बार तलाक पत्नी को कहा है। अब अदालत में गवाहों से निश्चित रूप से जिरह भी होगी। उस के उपरांत अदालत उस के समक्ष लाए गए दस्तावेजों और मौखिक बयानों के आधार पर यह तय करेगी कि तलाक हुआ है अथवा नहीं हुआ है।
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