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लिव इन रिलेशन न्यायपालिका की कम समय में वैवाहिक विवादों का निपटारा करने की अक्षमता से उपजा है।

समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

लिव इन रिलेशन में कोई कानूनी दायित्व या अधिकार नहीं।

rp_judicial-sep8.jpgसमस्या-

राकेश अग्रवाल ने गंगानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी छोटी बहन की शादी समाज मे होने के बाद जीजाजी के सेठ जी (स्वंय भी विवाहित) ने बहन को फँसाकर जीजाजी से रिश्ता मौखिक तोडाकर ता उम्र साथ निभाने का वादा करते हुए उस के दोनों लड़को व एक लड़की सहित अपना कर (वर्ष २००० से) अलग रखकर दोनो पत्नियों से संबध बनाये हुए हैं। सिर्फ भरण पोषण योग्य राशि भी देते हैं, रहने का मकान सेठजी के नाम पर है। उम्र के साथ अय्याशी बढ़ने के साथ बहन से मोह भंग हो रहा है, शहर का प्रतिष्ठित और प्रमुख व्यापारी होने के बाद भी मेरे भान्जो को कहीं व्यापार में सेट नहीं कर रहा है ना ही पिता जैसा प्यार देता है। लिव इन रिलेशनशिप के चलते अब मेरी बहन व उसके बच्चो का भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है। बहन के नाम पर कुछ नहीं किया ना उस ने कुछ करवाया। बहन से जीवन में बडी भारी गलती तो हो गयी पर अब अपने व बच्चो के भविष्य के लिये क्या करना चाहिये? अगर उसका कोई कानूनी अधिकार बनता है तो उसके लिये क्या करना होगा

समाधान-

क हिन्दू विवाह में पत्नी को भरण पोषण का और मृत्यु के उपरान्त पति की संपत्ति में उत्तराधिकार के सिवा और कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता। यदि पति अपनी सारी संपत्ति को वसीयत कर दे तो पत्नी उत्तराधिकार से भी वंचित हो जाती है। तब लिव इन रिलेशन में किसी अधिकार की मांग कैसे की जा सकती है। लिव इन रिलेशन बिना किसी दायित्व और अधिकार के एक दूसरे के साथ रहने का समझौता है। इस में किसी तरह का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता। दोनों पक्ष अपने लिए स्वयं जिम्मेदार होते हैं। एक लंबे समय तक साथ रहने और पत्नी के जैसा व्यवहार करने के कारण स्त्री को अपने साथी से भरण पोषण कराने का अधिकार है, इस से अधिक कुछ भी नहीं।

हाँ तक आप की बहिन के बच्चों का प्रश्न है, वे बालिग हो चुके होंगे या हो जाएंगे। सेठ जी आप की बहिन और बच्चों का भरण पोषण कर ही रहे हैं। बालिग हो जाने के बाद तो हिन्दू माता पिता पर भी अपने बच्चों के भरण पोषण करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है। फिर लिव इन रिलेशन में रहने पर स्त्री के पति से उत्पन्न बच्चों का दायित्व लिव इन रिलेशन वाले पति पर नहीं डाला जा सकता।

लिव इन रिलेशन का अर्थ ही यह है कि स्त्री और पुरुष सब कानूनी दायित्वों से अलग हैं और केवल अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं। इस में किसी तरह का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता। यदि इस में किसी प्रकार का कोई अधिकार उत्पन्न होगा तो यह भी विवाह का ही एक प्रकार हो जाएगा लिव इन रिलेशन नहीं रहेगा।

मौसी की पु्त्री से सपिण्ड संबंध है और यह विवाह हिन्दू विधि में अकृत है।

rp_sex.jpgसमस्या-

सोनू सिंह ने हाजीपुर बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैं ने अपनी मौसी की पुत्री से 01-12-14 को विवाह कर लिया। लेकिन मेरी माँ और मेरी पत्नी के पापा ने सीजेएम कोर्ट में धारा 5 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन दिया। हम ने मुकदमा लड़ा भी है, लेकिन अदालत ने हमारी शादी को तोड़ दिया है। अब मैं क्या करूँ कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प का मौसी की पुत्री से संबंध सपिण्ड है और यह विवाह प्रतिबंधित रिश्तेदारी में होने के कारण हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत अवैध था। इस कारण न्यायालय ने उसे अवैध घोषित कर दिया है। अब आप दोनों विवाहित नहीं माने जाएंगे। लेकिन यदि आप दोनों पति पत्नी एक साथ रह रहे हैं तो कानूनन साथ रहने में किसी तरह की कोई बाधा नहीं है। क्यों कि यह अपराध नहीं है। इस से यही अन्तर पड़ेगा कि आप दोनों को पति पत्नी नहीं माना जाएगा। आप की होने वाली संतान को तो आप दोनों की ही संतान माना जाएगा लेकिन उसे पुश्तैनी संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो सकेगा।

प दोनों का साथ रहना अब लिव-इन-रिलेशन माना जाएगा। लंबे समय तक साथ रहने और समाज में पति पत्नी की तरह व्यवहार करने के कारण। सभी मामलों में आप दोनों को पति पत्नी माना जाएगा सिवाय इस के कि आप दोनो हिन्दू विवाह रीति से विवाहित नहीं हैं। हमारे ज्ञान में इस तरह का विवाह इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में मान्य नहीं है। लेकिन यदि आप आपस में पति पत्नी कहलाने के लिए इस्लाम धर्म भी ग्रहण करेंगे तो इस धर्म परिवर्तन को वैध नहीं कहा जा सकता क्यों कि यह केवल पति पत्नी के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए होगा। आप दोनों का हिन्दू विवाह पहले ही अवैध घोषित हो चुका है। इस कारण भी यह धर्म परिवर्तन आप दोनों के इस रिश्ते को कोई वैधानिकता प्रदान नहीं करेगा।

स्वतंत्र स्त्री पर कानून का कोई जोर नहीं, तब किसी पुरुष का कैसे हो सकता है?

mother_son1समस्या-

हरीश शिवहरे ने ब्यावरा, जिला राजगढ़, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी रजनी मालवीया से मैं ने 8 -10. -2005 में नोटरी द्वारा 100 रु. के स्टाम्प पर लिखित रूप से विवाह संविदा किया गया था जिसे उस स्टाम्प पर गन्धर्व विवाह के नाम से लिखित किया गया था। 2005 के पहले मेरी पत्नी रजनी मालवीय पूर्व में कान्हा वर्मा के साथ पत्नी के रूप में निवास कर रही थी। परन्तु उन दोनों का कोई हिन्दू रीति रिवाज से विवाह संपन्न नहीं हुआ था, बस लिव इन रिलेशनशिप के तहत रह रहे थे। कान्हा वर्मा से रजनी मालवीया को कोई संतान भी नहीं थी। इसके बाद रजनी मालवीया और मुझ हरिश शिवहरे के मध्य प्रेम संबध स्थापित हुए और हम दोनों ने विवाह करने का फैसला किया। २००५ में हम तीनो पक्षों के बीच 100 के स्टाम्प पर एक समझौता हुआ जिस में कान्हा वर्मा ने रजनी मालवीय को मुझ हरीश शिवहरे के साथ विवाह करने की सहमति प्रदान की। जिस का 100 रु. के स्टाम्प पर नोटरी से प्रमाणित संविदा निष्पादित किया गया कि जिस मे हम तीनों पक्षकार हैं। कान्हा वर्मा रजनी मालवीया से विवाह विच्छेद होना स्वीकार करता है, उसी लेख पत्र में मेरे साथ रजनी मालवीया का गन्धर्व विवाह होना स्वीकार किया जाता है। कान्हा वर्मा द्वारा यहाँ भी लिखित किया जाता है कि हम दोनों के विवाह से और साथ रहने से उसे कोई आपत्ति नहीं होगी और नहीं किसी प्रकार की कोई पुलिस कार्यवाही की जायेगी, न ही किसी प्रकार का हम दोनों रजनी और हरीश के विरूद्ध न्यायालय में कोई वाद प्रस्तुत किया जाएगा। 8 -10 -2005 से ही रजनी मालवीय मुझ हरीश शिवहरे के साथ पत्नी के रूप में रह रही थी और मुझसे रजनी मालवीय को 11 -12 -2012 को एक बेटी का जन्म हुआ। अभी तक सब कुछ ठीक चल रहा था, पर बीच में कुछ बातो को लेकर हम दोनों में झगड़े होने लगे और वाद विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई। झगड़े जब ज्यादा बढ़ गए तब रजनी द्वारा मुझे बार बार आत्महत्या करने की धमकी दी जाने लगी और तलाक की मांग करने लगी। दो से तीन महीने तक मेरे घरवालो और पड़ोसियों द्वारा समझाए जाने पर कुछ समय तक सब ठीक रहा। पर फिर से रजनी द्वारा मुझ से तलाक की मांग की जाने लगी। इस बात से परेशान होकर दिनाक 30 -11 -2013 को हम दोनों के मध्य एक 100 रु. के स्टाम्प पर एक समझौता तलाक को लेकर किया गया जिस में हम दोनों पक्षों की आपसी सहमति से तलाक होना स्वीकार किया गया। उक्त समझौते की नोटरी करायी गयी। इस के एक माह बाद तक रजनी मेरे साथ निवास करती रही। दिनांक 9 -01 -2014 को मुझ से जिद कर के मेरे बार बार मना करने पर भी रजनी भोपाल अनाथ आश्रम में केयर टेकर के रूप में काम करने चली गई। अभी वहीं निवास कर रही है और मेरी बेटी भी उसके पास है। अब मैं अपनी बेटी के भविष्य को लेकर काफी चिंतित हूँ। मैं अपनी बेटी को किसी भी तरह से अपने पास रख उसका पालन पोषण करना चाहता हूँ। लेकिन रजनी मुझे मेरी बेटी से मुझे मिलने भी नहीं देती, ना मुझे उसे देखने देती है। अनाथ आश्रम में मेरी बेटी का भविष्य क्या होगा यह सोचकर में दुखी हो जाता हूँ। इस बारे में मैं ने रजनी को कई बार समझाने का प्रयास किया कि वह सब कुछ भूलकर मेरे साथ रहे। हम दोनों मिलकर हमारी बेटी की परवरिश अच्छे से करेंगे। वह मानने को तैयार नहीं है, अब में अपनी बेटी को किस तरह से अपने पास रख सकता हूँ उस की परवरिश कर सकता हूँ ताकि उसका उज्जवल भविष्य हो। मैं अपनी बेटी को अपने पास और रजनी को भी अगर वो तयार हो जाती है तो रखना चाहता हूँ। मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं किस तरह से अपनी बेटी की कस्टडी प्राप्त कर सकता हूँ और रजनी के साथ दाम्पत्य जीवन स्थापित कर सकता हूँ।

समाधान-

प का मानना और कहना है कि रजनी का पहला विवाह विवाह नहीं था, अपितु एक लिव इन रिलेशन था। जिस से उसे कोई सन्तान नहीं हुई। फिर उसी रिलेशन के दौरान आप दोनों के बीच प्रेम विकसित हुआ और उस के साथी के साथ एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद रजनी आप के साथ आ कर रहने लगी।

ब उस का पहला विवाह नहीं था तो आप के साथ जो संबंध रजनी का है वह विवाह कैसे हो गया। आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी होती है और सप्तपदी के बिना विवाह को संपन्न नहीं माना जाता है। इस तरह आप का और रजनी का संबंध भी लिव इन रिलेशन ही हुआ।

जनी एक स्वतंत्र स्त्री है। वह अपनी इच्छा से पहले अन्य व्यक्ति के साथ रही। जिस से उसे कोई सन्तान नहीं हुई। आप ने अपनी समस्या लिखने इस बात पर जोर दिया है। इस से प्रतीत होता है कि उस का आप के साथ सम्बन्ध बनाने में उस की माँ बनने की इच्छा की भूमिका अधिक थी। उस ने और आप ने किसी भी प्रकार के विवाद से बचने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौता करना उचित समझा। आप की संन्तान प्राप्ति की इच्छा आप की समस्या में कहीं दिखाई नहीं देती। आप के साथ रहने के बाद भी उसे संन्तान की प्राप्ति 7 वर्ष बाद हुई। निश्चित रूप से देरी से संन्तान होने के बाद रजनी का झुकाव और प्रेम अपनी बेटी की तरफ चला गया और आप ने इसे अलगाव समझा। रजनी की पुत्री के कारण आर्थिक जरूरतें बढ़ गईं और आप के साथ जो समय वह देती थी वह कम हो गया। आप ने यह नहीं बताया कि रजनी आप के साथ रहते हुए भी कोई काम कर के कुछ कमाती थी या नहीं। पर मुझे लगता है कि वह भी कुछ न कुछ अर्थोपार्जन करती रही होगी। जिस में बेटी के जन्म के समय जरूर कुछ व्यवधान आया होगा। हमारी नजर में यही कारण रहे होंगे जिन्हों ने आप के बीच विवादों को जन्म दिया।

प ने रजनी और आप के बीच विवाद का कारण नहीं बताया है और छुपाया है। इस का अर्थ है कि उन कारणों के पीछे आप का स्त्री पर संपूर्ण आधिपत्य का पुरुष स्वभाव अवश्य रहा होगा। पुत्री पर खर्चे के प्रश्न भी जरूर बीच में रहे होंगे। खैर, आप ने उन्हें बताए बिना समाधान चाहा है।

जनी लगातार आप से अलग होने का प्रयास करती रही और आप अन्यान्य प्रयासों से उसे रोकते रहे। जिस में परिवार और पड़ौसियों द्वारा उसे समझाने का काम भी सम्मिलित था। लेकिन उस केबाद भी विवाद बना रहा। अर्थात आप ने विवाद को समाप्त करने का प्रयत्न नहीं किया। आप ने समझने का प्रयास ही नहीं किया कि रजनी आखिर आठ वर्षों के दाम्पत्य जीवन के बाद अपनी बेटी को ले कर अलग क्यों होना चाहती है। यदि आप उस बात को समझने का प्रयास करते और कुछ खुद को भी बदलने का प्रयास करते तो शायद रजनी आप को छोड़ कर नहीं जाती और पुत्री भी आप के पास बनी रहती।

जनी जैसे समझौते के अन्तर्गत आप के साथ रहने आई थी वैसे ही समझौता कर के अलग हो गई। आप खुद भी जानते हैं कि उस पर आप का कोई जोर नहीं है। विधिपूर्वक हुए विवाह में भी पत्नी पर पति का इतना हक नहीं होता है कि वह उसे जबरन अपने साथ रख सके। अब आप को लगता है कि यदि किसी तरह बेटी को आप अपने साथ रख सकेंगे तो रजनी भी वापस लौट आएगी और बेटी के साथ रहने की इच्छा के कारण आप की सब बातों को उसे सहन करना होगा। रजनी एक स्वतंत्र स्त्री है उस पर आप का तो क्या कानून का भी कोई जोर नहीं है।

ह सही है कि बेटी आप की है लेकिन जितनी आप की है उतनी ही रजनी की भी है। संतान यदि पुत्र हो तो 5-7 वर्ष का होने पर पिता को उस की अभिरक्षा मिल सकती है वह भी तब जब कि बच्चे का हित उस में निहित हो। लेकिन बेटी की अभिरक्षा तो अत्यन्त विकट परिस्थितियों में ही पिता को मिल पाती है। आप के मामले में ऐसी कोई विकट परिस्थिति नहीं है कि बेटी की कस्टड़ी उस की माँ से उसे अलग करते हुए आप को मिल सके। आप जो अनाथ आश्रम का तर्क गढ़ रहे हैं कि वहाँ बेटी की परवरिश ठीक से न हो सकेगी। वह बहुत थोथा तर्क है। वह अनाथ आश्रम की निवासिनी नहीं है। बल्कि अनाथ आश्रम के केयर टेकर की बेटी है। अनाथ आश्रम के बच्चों का स्नेह और आदर भी उसे प्राप्त हो रहा होगा जो किसी भी स्थिति में आप के यहां प्राप्त नहीं हो सकता। रजनी की अनाथ आश्रम की केयर टेकर के रूप में इतनी आय है कि एक बेटी को पालने में वह समर्थ है। अनाथ आश्रम का नाम अनाथ आश्रम जरूर होता है लेकिन अनाथ आश्रम बनाए ही इस कारण जाते हैं कि अनाथ बच्चों को उचित संरक्षण मिल सके। वस्तुतः अनाथ आश्रम के बच्चे अनाथ नहीं रह जाते हैं।

प यदि रजनी को वापस अपने साथ रहने को तैयार करना चाहते हैं तो कोई न्यायालय आप की कोई मदद नहीं करेगा। आप यदि चाहते हैं कि बेटी आप के साथ रहे तो केवल एक ही विधि हो सकती है कि रजनी स्वेच्छा से आप के साथ रहने को तैयार हो जाए। लेकिन यह कार्य असंभव दिखाई पड़ता है। क्यों कि अब रजनी के पास आश्रय भी है और रोजगार भी है। वह क्यों फिर से परतंत्रता में पड़ना चाहेगी। फिर जो स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ समझ गई हो वह क्यों आप के अधीन रहना चाहेगी। उसे मातृत्व चाहिए था वह उसे मिल गया है। यदि उसे किसी पुरुष साथी का चुनाव करना होगा तो जो स्त्री अपनी स्वतंत्रता और मातृत्व की इच्छा के कारण एक पुरुष साथी को छोड़ कर आप के साथ संबंध बना सकती है वह अब किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध बनाना पसंद करेगी न कि आप के साथ।

प अपनी बेटी के पिता हैं। आप चाहें तो रजनी को यह भरोसा दे कर उस से मिलने की युक्ति कर सकते हैं कि आप न तो रजनी के जीवन में उस की इच्छा के विरुद्ध प्रवेश करेंगे और न ही बेटी पर अपना अधिकार जमाएंगे। आप केवल इतना चाहते हैं कि साल में दो चार बार उस से मिल लें और कुछ समय उस के साथ बिता सकें।

आप वैध पत्नी नहीं लेकिन वैध पुत्रियों की माँ और संरक्षिका हैं, आप को पुत्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ना चाहिए।

father & married daughter3समस्या-

सोनम वर्मा ने ब्‍यावरा,मध्यप्रदेश से पूछा है-

र, मेरा विवाह आज करीब 16-17 वर्ष पूर्व हिन्‍दू रीति से हुआ था। विवाह के करीब ए‍क साल बाद मेरे पति से मेरा झगडा बढ गया और मैं अपना ससुराल छोड कर अपने मायके में आ गई और उसके बाद करीब ३-४ साल में अपने ससुराल नहीं गई, न ही वहां से मुझे कोई लेने आया। उस के बाद मेरे घर वालों ने मेरा दूसरा विवाहकरा दिया।दूसरे पति के साथ मैं 8-10 वर्ष रही। करीब 2 वर्ष पहले पहले मेरे दूसरेपति का स्‍वर्गवास हो गया, जिन के दो बालिग २ पुत्र हैं। उनकी मां का यानी मेरे दूसरे पति की पहली पत्‍नी का देहान्त मेरी दूसरी शादी के 2 वर्ष पहले ही देहान्त हो गया था। मेरे दूसरे पति सरकारी कर्मचारी थे और मेरे पहलेपति भी सरकारी कर्मचारी थे अब मैं ने अपने दूसरे पति के स्‍थान पर अनुकंपानियुक्ति एवं उनके समस्‍त देय स्‍वत्‍वों के लिए आवेदन दिया है जिस पर मेरेदूसरे पति के बच्‍चों ने आपत्ति प्रकट की हैं। वे चाहते हैं कि अनुकम्‍पानियुक्ति उन दोनों भाइयों में से किसी एक भाई को मिले और में चाहती हूं किअनुकंपा नियुक्ति मुझे मिले। क्‍योंकि मेरी दो पुत्रियां हैं। लेकिन मेरेदूसरे पति के सर्विस बुक में उनकी पहली पत्‍नी का नाम है और बाकी सभीनोमीनेशन भी उनकी पहली पत्‍नी के दोनों बच्‍चों के नाम पर है जो कि अभी भीहै।मेरा नाम सर्विस बुक व किसी भी रिकार्ड में नहीं है। मेरादूसरा विवाह भी वैदिक हिन्‍दू रीति से नहीं हुआ है। मेरा पहला पति भीजीवित है जिन से मेरा डिवोर्स नहीं है और न ही मेरे पहले पति ने अभी तक शादीकी है। मेरे दूसरे पति के दोनों बच्चे मुझे उनकी पत्‍नी नहीं मानते हैं। में उनकी अनुकम्पा नियुक्ति एवं उनके सभी समस्‍त देय स्‍वत्‍व चाहती हूं।उस के लिए मुझे क्‍या करना चाहिए? क्‍योंकि अगर यह प्रकरण कोर्ट में पहुंचताहै तो मेरे पास मेरे पहले पति से डिवोर्स नहीं है इस बारे में आपकी राय चाहतीहूं। अगर यह प्रकरण कोर्ट में चला जाता है तो मुझे स्वयं को डिवोर्स पेपर और दूसरीपत्‍नी साबित करना होगा। मेरी दूसरी शादी का कोई वेलिडरजिस्‍ट्रेशन भी नहीं है ऐसी स्‍थिति में मुझे क्‍या करना चाहिए?

समाधान-

प की स्थिति से स्पष्ट है कि आप के पहले पति से आप का विवाह विच्छेद आज तक नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में आप कानूनी रूप से अपने पहले पति की पत्नी बनी हुई हैं। हिन्दू विधि में एक पति की वैध पत्नी होते हुए आप दूसरा विवाह नहीं कर सकती थीं। इस कारण आप का दूसरा विवाह वैध नहीं था। आप अपने दूसरे पति की पत्नी नहीं थीं। आप की दोनों पुत्रियाँ यदि दूसरे पति से हैं तो उन्हें तो दूसरे पति की पुत्री होने का अधिकार है लेकिन आप का पत्नी होने का नहीं। आप का दूसरे पति से जो भी सम्बन्ध था वह पति पत्नी का न हो कर लिव इन रिलेशन का था। आप के दूसरे पति भी इस सम्बन्ध को लिव इन रिलेशन ही मानते रहे अन्यथा वे अपनी सर्विस बुक आदि सेवा अभिलेख में पत्नी के स्थान पर आप का नाम अंकित करवाते। आप किसी भी स्थिति में अपने आप को अपने दूसरे पति की पत्नी साबित नहीं कर सकतीं। आप को अनुकम्पा नियुक्ति किसी स्थिति में नहीं मिल सकेगी इस कारण उस की लड़ाई लड़ना आप के लिए निरर्थक सिद्ध होगा।

प की दोनों बेटियाँ आप के दूसरे पति की पुत्रियाँ हैं, उन के परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं और मृतक आश्रित हैं और आप उन की माता हैं इस कारण उन की संरक्षक हैं।

प की दोनों पुत्रियों का आप के दूसरे पति के सेवा में रहते हुए देहान्त हो जाने के कारण मिलने वाले परिलाभों पर पूरा अधिकार है। आप की पुत्रियाँ अवयस्क हैं इस कारण उन के हितों की रक्षा करने का पूरा दायित्व आप का है। इस कारण एक संरक्षक की हैसियत से आप अपनी पुत्रियों को उन के अधिकार दिला सकती हैं। आप के पति के सेवा संबंधी लाभों में पुत्रियों का हिस्सा मिले इस के लिए आप उन की ओर से आवेदन कर सकती हैं। आप की दोनों पुत्रियाँ नाबालिग हैं इस से वे परिवार पेंशन पाने की की भी अधिकारी हैं। आप को पति के लाभों में पुत्रियों के हिस्से और उन की परिवार पेंशन के लिए लड़ना चाहिए। इस मामले आप दूसरे पति के बालिग पुत्रों से बात कर के समझौता भी कर सकती हैं कि उन में से किसी एक को अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने में आप आपत्ति नहीं करेंगी यदि वे पति के सेवा लाभों में पुत्रियों का हिस्सा, परिवार पेंशन और आप के पति की चल अचल संपत्ति में पुत्रियों का हिस्सा देने को तैयार हों। यदि वे इस के लिए तैयार न हों तो आप अपनी पुत्रियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ सकती हैं।

पति दूसरी स्त्री के साथ रहने लगे तो पत्नी को तुरंत कानूनी कार्यवाहियाँ करनी चाहिए।

पति पत्नी और वोसमस्या-

गौहाटी, असम से कामाख्या नारायण प्रसाद सिंह ने पूछा है-

क व्यक्ति ने बिना तलाक के दूसरी शादी कर लीहै। पहली पत्नी को भगा दिया,  उसकी पिटाई भी होती थी, जिससे दो बच्चे एक लड़का और एक लड़की भी हैं जो अब बाल बच्चेदार है,  दूसरी पत्नी से मात्र पांच लड़कियाँ ही हैं, अब रिटायर्ड होकर वह आदमी अपनी दूसरी पत्नी के साथ अपने पैत्रृक गाँव से दूर अपने दूसरे ससुराल के पास घर बना कर रह रहा है, दूसरी पत्नी किसी को वहाँ फटकने नहीं देती, सब संपत्ति पर कुंडली मार बैठी है, पहली पत्नी का लड़का गाँव वाली संपत्ति पर है जो बाप की पैत्रृक सम्पत्ति है। जबकि उसे पिता द्वारा अर्जित सम्पत्ति में से मिलना चाहिए। बेटा कोर्ट नहीं जाना चाहता। पिता रेलवे कर्मचारी था ,जो जीवित है। आप से सलाह से उसकी मदद की जाय।

समाधान-

प ने जिस परिवार का उल्लेख किया है वैसे हर नगर, तहसील में कुछ परिवार मिल जाएंगे। आप का खलनायक पहली पत्नी को अरक्षित छोड़ कर दूसरा विवाह रचा कर एक परिवार बना कर बैठा है। उस ने सब से पहला अपराध तो पहली पत्नी की पिटाई कर के क्रूरतापूर्ण व्यवहार कर के किया जो कि धारा 498-ए, 323, 324 भा.दंड संहिता के अन्तर्गत अपराध थे। उस ने पहली पत्नी से विवाह विच्छेद न कर के दूसरा विवाह किया। उसी समय उस की रिपोर्ट पुलिस को या न्यायालय को शिकायत होनी चाहिए थी।

दि यह साबित किया जा सकता हो कि दूसरी स्त्री से दूसरा विवाह किया गया है और लिव इन रिलेशन नहीं है तो उसे अभी भी सजा दिलाई जा सकती है। जहाँ तक संपत्ति का प्रश्न है तो हो सकता है अभी उस परिवार की गाँव में पैतृक संपत्ति बची हो, हालाँकि अब तक पैतृक संपत्ति का लगभग अन्त हो चुका है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार किसी भी व्यक्ति की स्वअर्जित संपत्ति उस की स्वयं की है जिसे वह वसीयत कर सकता है। यदि व्यक्ति की मृत्यु के बाद कोई संपत्ति निर्वसीयती रहे तो उस में उत्तराधिकारियों को समान रूप से हिस्सा होता है। इस मामले में भी उस व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त उस की स्वअर्जित संपत्ति में उस की पहली पत्नी और दोनों पत्नियों से उत्पन्न संताने बराबर की हिस्सेदार होंगी। इस तरह आठ हिस्से होंगे जिस में तीन हिस्से पहली पत्नी और उस की संतानों के होंगे और पाँच हिस्से दूसरी पत्नी की संतानों के होंगे। दूसरी पत्नी का कोई हिस्सा नहीं होगा। क्यों कि उस के साथ उस व्यक्ति का विवाह अवैध है। पैतृक संपत्ति में दूसरी पत्नी और उस से उत्पन्न संतानों का कोई अधिकार नहीं होगा। वैसे भी उस व्यक्ति की स्वअर्जित संपत्ति के बारे में पता करेंगे तो हो सकता है कि यह पता लगे कि संपत्ति पहले ही दूसरी स्त्री के नाम से बनाई गई है।

में नहीं लगता कि आप के पास पहली पत्नी और उस के बच्चों के लिए मदद करने को कुछ है। हाँ यदि उस के पिता देहान्त हो जाए और वह निर्वसीयती संपत्ति छोड़ दे तो लड़का उस संपत्ति के विभाजन और कब्जे के लिए वाद प्रस्तुत कर सकता है। किन्तु पिता के जीवित रहते नहीं। हाँ पहली पत्नी अपने पति के विरुद्ध भरण पोषण का आवेदन न्यायालय में कर सकती है जो जहाँ वह निवास करती है किया जा सकता है।

स्त्री जब तक स्वयं अपने पैरों पर न खड़ी हो और भविष्य सुरक्षित नहीं कर ले तब तक वह मनचाहा करने में असमर्थ है।

समस्या-

औरंगाबाद, महाराष्ट्र से पूजा ने पूछा है –

मैं जिस व्यक्ति के साथ रहती हूँ उस की दूसरी शादी हो चुकी है।  क्यों कि पहली पत्नी को रक्त केंसर हुआ और उस का देहान्त हो गया था।  मेरे साथी ने जिस के साथ दूसरा विवाह किया है वह मेरी एक मित्र है और 100 लोगों के सामने उन की शादी हुई।  पर मैं शादी न कर के उस के साथ रहती हूँ। दूसरी पत्नी को ये पता है। हम साथ में ही रह रहे हैं। दूसरी पत्नी को हमारे साथ रहने के बारे में पहले ही सब कुछ बता दिया था। उसे हमारे साथ रहने पर कोई आपत्ति नहीं है। हम दो वर्ष से साथ रह कर बहुत खुश हैं।  पर मैं घर से भाग कर आई हूँ।  क्यों कि मेरे परिवार के लोग मना करते और जिस के साथ मैं प्यार करती हूँ वह व्यक्ति उन को पसंद नहीं था। इसलिए मैं दो साल से घर में बैठ कर ही सब काम करती हूँ। पर अब मुझे बाहर निकलना हो तो जब मेरे सामने मेरे परिवार के लोग आएंगे तो वे मुझे ले के जाएंगे। पर मुझे नहीं जाना। उस के लिए मैं क्या कर सकती हूँ?

समाधान-

liveinकोई भी बालिग (18 वर्ष या उस से अधिक का) स्त्री या पुरुष किसी भी मनचाहे व्यक्ति के साथ रहने को स्वतंत्र है बशर्ते कि ऐसा कर के वह कोई अपराध नहीं कर रहा हो।  आप के मामले में आप जिस के साथ रह रही हैं वह विवाहित है (यदि उस का यह विवाह कानूनी है तो) और उस के एक पत्नी है। कोई भी व्यक्ति पत्नी के होते हुए यदि किसी दूसरी स्त्री के साथ निवास करता है तो यह अपराध नहीं है।  लेकिन यदि वह दूसरी स्त्री  (इस मामले में आप) किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी हो तो वह उस के पति के प्रति अपराध करता है।  लेकिन आप विवाहित नहीं है, इस कारण से वह व्यक्ति कोई अपराध नहीं कर रहा है। किसी विवाहित पुरुष के साथ किसी अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा का निवास करना भी अपराध नहीं है। इस तरह आप भी कोई अपराध नहीं कर रही हैं। कानून की तरफ से आप दोनों का साथ रहना किसी भी प्रकार से अपराध नहीं है।

लेकिन आप का साथी विवाहित होते हुए भी आप के साथ निवास कर के व संबंध बना कर जारता कर रहा है जिस के कारण उस की पत्नी उस के साथ निवास करने से इन्कार करते हुए अलग आवास और खर्चे की मांग कर सकती है। इस आधार पर आप के साथी से विवाह विच्छेद की डिक्री भी न्यायालय से हासिल कर सकती है।

प यदि अब तक आप के साथी के साथ घर पर ही रह रही हैं तो इस का अर्थ है कि आप की आय का कोई साधन नहीं है। आप पूरी तरह से आप के साथी पर निर्भर हैं। यही एक खतरनाक बात है। यदि आप का साथी आप का निर्वाह करने से इन्कार कर दे, अपने घर से निकाल दे और आप के परिवार वाले भी आप को आश्रय देने से इन्कार कर दें जो कि स्वाभाविक है तो फिर आप की स्थिति क्या होगी? आप ने क्या कभी इस की कल्पना भी की है? निश्चित रूप से तब आप अनिवार्य रूप से सड़क पर पूरी तरह से निस्सहाय खड़ी होंगी और इस के लिए किसी भी अन्य व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकेगा। आप के साथी की ऐसी स्थिति में कोई जिम्मेदारी नहीं है कि वह आप का पालन पोषण करे।  आप अदालत से भी कोई राहत की मांग नहीं कर सकेंगी। इस कारण से यदि आप के परिवार वाले आप को अपनाने को तैयार हों तो आप को उस व्यक्ति का साथ छोड़ कर अपने परिवार वालों के पास चले जाना चाहिए।  लेकिन परिवार वाले भी आप का साथ कब तक देंगे आप को अपने भविष्य की चिंता खुद करनी होगी। उस के लिए या तो आप कानूनी रूप से किसी पुरुष के साथ विवाह करें जिस पर कानूनी रूप से आप के भरण पोषण का दायित्व हो, या फिर आप स्वयं अपने भरण पोषण के लिए कोई ऐसा काम करें जिस से आप को इतनी आय हो कि आप अपना खर्चा खुद चला सकती हों और भविष्य में जब आप कमा सकने के लिए असमर्थ हो जाएँ तो उस समय के लिए बचा भी सकें।

हाँ तक आप के मूल प्रश्न का प्रश्न है कि बाहर निकलते ही आप के परिवार के लोग आप को साथ ले जाएंगे तो वह बेकार का प्रश्न है। आप की आयु 18 वर्ष से अधिक की है और आप बालिग हैं। तो आप अपने परिवार वालों के साथ जाने के लिए इन्कार कर सकती हैं। आप नहीं जाना चाहती हैं और आप को खतरा है कि आप के परिवार वाले आप को जबरन ले जाएंगे तो आप उन के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखवा सकती हैं और सिविल न्यायालय में दीवानी वाद प्रस्तुत कर वहाँ से आप के परिवार के लोगों के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकती हैं कि वे आप को न ले जाएँ और आप को अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ दें।

लेकिन सब से पहले आप को अपने लंबे भविष्य के जीवन पर विचार करना चाहिए कि वह कैसे बीतेगा। सब से मजबूत बात तो यह है कि आप अपने पैरों पर खड़ी हों। यदि आप अपने पैरों पर खड़ी न होंगी तो आप अपनी इच्छा के अनुसार स्वतंत्र जीवन नहीं जी सकतीं।

तलाक लेना या बिना तलाक लिए किसी अन्य स्त्री के साथ रहना गंभीर और अपराधिक गलती होगी

समस्या-

कोटा, राजस्थान से शौर्य ने पूछा है-

मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता हूँ तथा माता-पिता और बड़े भाई के साथ रहता हूँ। मेरा विवाह हिंदू रीति रिवाज के साथ 7 मई 2009 को हुआ।  मेरा यह विवाह मुझ पर दबाव डाल कर करवाया गया था।  जिस लड़की से मेरा विवाह करवाया गया वो मुझ से उम्र में भी बड़ी है।  उस की उम्र 30 और मेरी 26 है। वह मेरे साथ मेरे घर में रहती है लेकिन हमारा रिश्ता पति-पत्नी जैसा नहीं है।  हमारे अभी तक कोई संतान भी नहीं है।  आए दिन हम दोनों में लड़ाई चलती रहती है। मैं ने मेरी पत्नी को तलाक़ के लिए कहा लेकिन वह मुझे तलाक़ भी नहीं दे रही है।  मैं उसे तलाक़ के लिए मेरे नाम की सारी प्रॉपर्टी भी देने को तैयार हूँ।  हम दोनों का जीवन बर्बाद हो रहा है। मेरा विवाह मेरे माता-पिता ने इसलिए दबाव डाल कर जल्दी करवा दिया क्योंकि मैं एक लड़की को बहुत ज़्यादा प्रेम करता था।  वह लड़की हमारी जाति की नहीं थी।  इसलिए मेरे माता पिता बड़े भाई ने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए मुझे धमकी दी कि यदि मैं ने शादी से मना किया तो वे उस लड़की के घर वालों को पिटवा देंगे।  उन लोगों ने मेरा विवाह एक ऐसी लड़की से करवा दिया जिसे मैं  कभी अपनी पत्नी के रूप मैं स्वीकार नहीं कर सकता।  मैं शादी से पहले जिस लड़की से प्यार करता था उस से अब भी करता हूँ उस की उम्र 24 वर्ष है वह भी मुझे बहुत प्यार करती है और आज भी शादी करने को तैयार है।  हम दोनों के बीच 6 वर्ष से यह रिश्ता है।  हम एक दूसरे को कभी नहीं भूल सकते।  उस लड़की का कहना है कि यदि उसके परिवार वालों ने किसी और से शादी के लिए उस पर दबाव डाला तो वह आत्महत्या कर लेगी।  मेरी समस्या यह है कि मैं उस लड़की को खोना नहीं चाहता लेकिन मैं उस से बिना मेरी पत्नी से तलाक लिए विवाह भी नहीं कर सकता।  ये कानूनी रूप से अपराध होगा।  क्या मुझे मेरे पत्नी से तलाक़ मिल सकता है? क्या क़ानून मैं कोई ऐसा नियम है क्या जिस से मैं और वह लड़की बिना शादी किए एक साथ भी रह सकें। हम दोनों पति-पत्नी की तरह रहना चाहते हैं।  हम तीनों का जीवन बर्बाद हो रहा है। मुझे कोई रास्ता बताएँ?

 समाधान-

प के माता-पिता और भाई को तो सामाजिक प्रतिष्ठा बचानी थी।  लेकिन आप के लिए वह क्या चीज थी? जिस ने आप को विवाह करने को बाध्य किया। उस लड़की के घर वालों की पिटाई करवा देना तो इतना बड़ा दबाव नहीं जिस से आप विवाह करे लिए तैयार हो जाएँ।  आप बड़ी आसानी से कह सकते थे कि मैं अपने से चार वर्ष बड़ी लड़की से विवाह नहीं करूंगा। या यह भी कह सकते थे कि मुझे अभी विवाह नहीं करना है। आप वयस्क थे और आप को इस के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता था। आज यदि तीन जीवन बर्बाद हो रहे हैं तो सिर्फ इस कारण कि आप ने उस लड़की से विवाह करना स्वीकार कर लिया जो अब आप की पत्नी है।  यह तो आप को उसी समय लगने लगा होगा कि तीन जीवन बर्बाद हो जाएंगे।

प का अपनी पत्नी के साथ पति-पत्नी जैसा रिश्ता नहीं है। लेकिन यह तो आप के कारण ही है कि आप ने उसे अब तक पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया है। वह तो अभी भी इस बात की प्रतीक्षा कर रही है कि आप उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लें। इस में आप की पत्नी का कोई दोष नहीं है।  उस तो इस बात का विवाह तक पता भी न रहा होगा कि जिस से उस का विवाह हो रहा है वह अन्य लड़की को चाहता है और उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उसे पत्नी के रूप में स्वीकार न कर के आप उसे किस बात की सजा दे रहे हैं? केवल यह कि वह आप से उम्र में बड़ी है कोई बात नहीं। समाज में अनेक पति-पत्नी मिल जाएंगे जहाँ पत्नियाँ पतियों से बड़ी है। आप के इलाके में तो कहावत है – बड़ी बहू, बड़ा भाग। कृष्ण और राधा का प्रेम हमारे समाज में बहुत सम्मान के साथ देखा जाता है। राधा भी उम्र में बड़ी थीं।  राधा-कृष्ण ने प्रेम किया और जीवन भर एक न हो सके। लेकिन आज भी सारी दुनिया उन की पूजा करती है।  प्रेम में जरूरी नहीं कि विवाह किया ही जाए,  शारीरिक संबंध बनें ही सही। प्रेम उस के बिना जीवित ही नहीं रह सकता बल्कि अमरत्व भी प्राप्त कर सकता है।

प ने अग्नि को साक्षी मान कर एक लड़की से विवाह किया है।  आप की पत्नी उस घड़ी की प्रतीक्षा कर रही है जिस दिन आप उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेंगे।  आप दोनों के बीच लड़ाई का एक और मुख्य कारण यही हो सकता है कि आप उसे विवाह के तीन वर्ष बाद भी स्वीकार नहीं कर सके हैं। आप के पास वर्तमान में तलाक का कोई कारण नहीं है जिस से आप अपनी पत्नी से तलाक ले सकें।  आप का और आप की पत्नी में केवल सहमति से तलाक संभव है। जिस के लिए वह तैयार नहीं है। मेरी राय में तो आप को अपनी पत्नी को अपना लेना चाहिए। अपनी प्रेमिका को समझाना चाहिए कि वह भी विवाह कर के अपनी गृहस्थी बसाए।  इस से तीनों जीवन बच जाएंगे।  इस दिशा में कोशिश कीजिए शायद आप ऐसा कर पाएँ।  अपनी पत्नी के रहते हुए आप किसी दूसरी अविवाहित स्त्री के साथ रहें यह अनैतिक है और बहुत से लोगों के साथ एक तरह का धोखा भी है। निश्चित रूप से आप ऐसा कुछ नहीं कर पाएंगे। आप कोशिश तो करें। यदि आप कोशिश में सफल न हों या फिर कोशिश ही न कर सकें तो आप पुनः तीसरा खंबा को स्मरण करें। शायद कोई ऐसा मार्ग निकल सके जिस से तीनों जीवन सुधर सकें।

विवाह नहीं, तो तलाक कैसा

मैं एक हिन्दू परिवार से हूँ और लगभग साढ़े आठ साल पहले मुझे एक मुस्लिम लड़की से प्रेम हो गया। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनी की मुझे उस के साथ रहना आरंभ करना पड़ा। हमारी कभी कोई शादी नहीं हुई। न आर्यसमाज में, न कोर्ट में और न ही कोई निकाह हुआ। लेकिन साथ रहने के कारण उस का नाम मेरे राशनकार्ड, वोटर लिस्ट, बच्चे के स्कूल में मेरी पत्नी के रूप में लिखा है। मैंने कभी इस का विरोध नहीं किया क्यों कि सभी तरीके से हम पति पत्नी की तरह ही रहते थे।

स का बर्ताव मेरे प्रति बहुत ही बुरा और निन्दनीय हो चला है। वह अपने साथ हुई सभी खराब बातों के लिए मुझे जिम्मेदार बताती है। लगभग हर रोज हमारे बीच झगड़ा होता है। वह पुलिस थाने तक चली जाती है। उस का व्यवहार बहुत हिंसक है। उस की मेरे परिवार से ही नही पास पड़ौस वालों से भी नहीं बनती। दो बार उस का झगड़ा आस-पास वालों से हो चुका है। जिस के कारण मुजे थाने में जा कर समझौता करना पड़ा। उस ने एक बार मेरे खिलाफ भी पुलिस में शिकायत की जो आपसी समझौते से समाप्त हुई।

मैं उस के इस बर्ताव से परेशान हो कर पिछले चार माह से ब्वाय्ज होस्टल में रह रहा हूँ। मैं उस से तलाक लेना चाहता हूँ लेकिन वह मुझे 498-ए की धमकी देती है और उस की पहुँच राजनैतिक दलों तक भी है जिस के कारण मुझे अपने भविष्य के प्रति डर लगा रहता है।

मैं अपनी एक मित्र से विवाह करना चाहता हूँ लेकिन वकील साहब ने कहा है कि बिना तलाक के आप विवाह नहीं कर सकते। मैं ने हिम्मत कर के उन के व्यवहार को और घऱेलू हिंसा, मानसिक व शारीरिक संताप को आधार बना कर तलाक के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया लेकिन मुझे सही निर्देश नहीं मिल पा रहा है। मेरी एक साढ़े आठ वर्ष की बेटी भी है जिस का भविष्य मुझे उस के साथ अंधकारमय लगता है। कृपया सलाह दें मुझे क्या करना चाहिए?

-अनुतोष मजूमदार, भिलाई छत्तीसगढ़

सलाह-

प ने सब से बड़ी गलती तो यह की है कि आप ने तलाक की अर्जी दाखिल कर दी है। यदि इस अर्जी का नोटिस जारी न हुआ हो तो उसे तुरंत वापस ले लें, अर्थात उसे एज विद्ड्रॉन निरस्त करवा लें। तलाक की अर्जी में सब से पहले यह लिखना पड़ता है कि दोनों पक्षकारों पर कौन सी व्यक्तिगत विधि लागू होती है तथा विवाह कब और किस विधि से संपन्न हुआ है। आप ने भी तलाक की अर्जी में यह सब लिखा होगा। आप उसे किसी भी प्रकार से साबित नहीं कर सकते। आप हिन्दू हैं और आप की साथी मुस्लिम इस कारण हिन्दू या मुस्लिम विधि से कोई भी विवाह आप दोनों के बीच तब तक संपन्न नहीं हो सकता है जब तक कि आप दोनों में से कोई एक अपना धर्म परिवर्तन न कर ले। यदि आप हिन्दू धर्म त्याग कर मुस्लिम हो जाते तो आप के बीच मुस्लिम विधि से निकाह संपन्न हो सकता था। यदि आप की साथी हिन्दू हो जाती तो हिन्दू विधि से विवाह हो सकता था। आप के बीच विवाह की एक ही रीति से हो सकता था वह विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह अधिकारी के समक्षन पंजीकरण करवा कर वह हुआ नहीं है। इस कारण से आप दोनों के बीच कोई विवाह संपन्न नहीं हुआ है। जब विवाह ही संपन्न नहीं हुआ है तो फिर तलाक या विवाह विच्छेद के लिए कोई मुकदमा चल ही नहीं सकता। केवल आप के द्वारा प्रस्तुत याचिका के उत्तर में आप की साथी आप के इस अभिवचन को स्वीकार कर ले कि विवाह आप के द्वारा बताई गई विधि से संपन्न हुआ है तो न्यायालय यह मान लेगा कि विवाह हुआ है। न्यायालय के मान लेने से आप की मुसीबतें कई गुना बढ़ जाएंगी।

चूंकि आप का विवाह संपन्न नहीं हुआ है इस कारण से आप अपनी नई मित्र से विवाह कर सकते हैं उस में कोई बाधा नहीं है। आप ऐसा तुरंत कर सकते हैं। आप इस के लिए आर्य समाज की पद्धति या परंपरागत हिन्दू विवाह की विधि अपना सकते है या फिर विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह कर सकते हैं।

प का आप के साथी के साथ विवाह संपन्न नहीं हुआ है इस कारण से आप की साथी आप के विरुद्ध धारा 498-ए भा.दं.संहिता का मुकदमा नहीं कर सकती।  यदि वह करती है तो उसे इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि आप के बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं रहा है। लेकिन आप की साथी घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत राहत प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकती है और राहत भी प्राप्त कर सकती है। लेकिन वह भी उस के लिए इतना आसान नहीं होगा।

स सब के बाद आप के लिए केवल एक समस्या रह जाएगी कि आप की बेटी उस की माता के साथ रह रही है। आप को उस की कस्टडी प्राप्त करने में बहुत बाधाएँ आएंगी। आम तौर पर पुत्री की कस्टडी पिता को नहीं मिलती है। 18 वर्ष की उम्र की होने पर वह इच्छानुसार किसी के भी पास रह सकती है। लेकिन उस के पूर्व माता की कस्टडी से पिता को पुत्री तभी मिल सकती है जब कि पिता अदालत के समक्ष ठोस सबूतों के आधार पर यह साबित कर दे कि उस का भविष्य माता के पास असुरक्षित है और पिता के पास वह सुरक्षित रह सकती है और उस का लालन पालन पिता अच्छे से कर सकता है। यह साबित करना आप के लिए लोहे के चने चबाना सिद्ध हो सकता है।

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