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कोशिश करें और लोक अदालत की भावना से मुकदमे को निपटाएँ!

समस्या-

स्वाती ठाकुर ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरा कोर्ट मे एक केस चल रहा है 294, 323, 506 आईपीसी की धाराओँ में, जिसमे मैं और मेरी ३ सहेलियाँ भी शामिल हैं। जो सामने वाली लड़की है, जिसने हमारे खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई है, वो एक बार भी कोर्ट नहीं आयी है और मेरे साथ जो ३ लड़कियाँ हैं वो भी कोर्ट नहीं आती हैं। सिर्फ़ मैं ही हर महीने पेशी में जाती हूँ इस केस में आगे क्या होगा? वक़ील भी मुझे कुछ नहीं बताते हैं? मैं क्या करूँ? क्या जैसे सब इस केस में कोई और लड़की नहीं आती हैं मैं भी जाना बंद कर दूँ? इस केस को एक साल होने जा रहा है, कृपया राह दिखाएँ।

समाधान-

प के विरुद्ध जो मुकदमा है उस में धारा 294 आईपीसी संज्ञेय भी है और इस में आपस में राजीनामा भी नहीं हो सकता। इस धारा के कारण आप के विरुद्ध जिस लड़की ने रिपोर्ट की है उस की रिपोर्ट पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया, अन्वेषण किया और आप चारों के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा प्रस्तुत कर दिया है। अब वह लड़की केवल फरियादी है लेकिन अभियोग राज्य सरकार की ओर से है इस कारण उसे हर पेशी पर आने की जरूरत नहीं है। उसे तो न्यायालय तब बुलाएगा जब उस की गवाही अदालत को दर्ज करनी होगी।

इस मुकदमे में शिकायतकर्ता लड़की से सुलह हो जाए तो भी राजीनामा संभव नहीं है। यह हो सकता है कि 294 के सिवा दो अन्य धाराओं में राजीनामा पेश कर दिया जाए और 294 को स्वीकार कर के आइंदा ऐसी हरकत नहीं करने की चेतावनी के आधार पर न्यायालय लोकअदालत की भावना से मुकदमे का निपटारा कर दे। इस संबंध में आप को अपने वकील से बात करनी चाहिए। आप उन से बात करने की जिद करेंगी तो वे आप को सब बताएंगे। यदि नहीं बताएँ तो आप वकील बदल सकती हैं।

यदि तीन सहेलियाँ मुकदमे में पेशी पर हाजिर नहीं होती हैं तो उन की हाजरी माफी का आवेदन हर तारीख पर पेश किया जाता होगा या फिर उन की जमानत जब्त हो कर उन के वारंट निकल चुके होंगे। आप पेशी पर नहीं आएंगी तो आप के भी गिरफ्तारी के वारंट निकल जाएंगे।

सब से बेहतर तरीका यह है कि यदि इस मामले में अपना अपराध स्वीकार करना किसी लड़की के कैरियर को प्रभावित न करता हो तो आप चारों अपना अपराध स्वीकार कर लें और अदालत से कहें कि इस मामले में लोक अदालत की भावना से निर्णय कर दिया जाए। वैसी स्थिति में आप को चेतावनी के दंड से दंडित कर के या थोड़ा बहुत जुर्माना कर के मुकदमे का निर्णय हो सकता है। बेहतर है कि आप इस मामले में अपने वकील से बात कर के तय करें कि क्या करना चाहिए।

लोक अदालतें न्याय-पथ से विचलन और न्याय प्राप्ति से याचियों को दूर करने का उपाय है।

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अभिनव ने रीवा मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे किराएदार जो बहुत पहले से है वह अभी बहुत ही कम किराया देते हैं। ओर खाली करने कीकहने पर 20 लाख रुपयों की मांग कर रहे हैं। दूसरे लोगों को किराए पर दे कर खुद अच्छा किराया वसूल करते हैं। क्या उन से आसानी से हटाया जा सकता है या किराया बढ़ाया जा सकता है। क्या लोक अदालत में इस की कार्यवाही हो सकती है?

समाधान-

म ने हमेशा कहा है कि किराएदार किराएदार ही रहता है वह कभी मकान मालिक नहीं हो सकता। किराएदार कम किराया देता है तो उस का कारण है कि आप ने किराया बढ़ाने के लिए कभी कानूनी कार्यवाही नहीं की। यदि समय रहते आप ने किराया बढ़ाने की कार्यवाही की होती तो अब तक किराया बढ़ चुका होता। यदि आप किराया बढ़ाना चाहते हैं तो आप को न्यायालय में कार्यवाही करनी ही होगी।

आप के किराएदार आप को कम किराया देता है और उस ने अन्य व्यक्ति को वही परिसर या उस का कोई भाग अधिक किराये पर दे रखा है तो आप को इस बात के सबूत एकत्र करना चाहिए कि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदारी पर चढ़ा दिया है। यदि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदार को चढ़ा दिया है तो आप इसी आधार पर अपना परिसर खाली करवा सकते हैं।

किराएदार से परिसर खाली कराने का हर राज्य में अलग कानून बना है। इसी तरह मध्यप्रदेश में भी है। आप को तुरन्त किसी वकील से संपर्क करना चाहिए। आप किराया भी बढ़ा सकते हैं और परिसर खाली भी करवा सकते हैं। वकील आप से जरूरी सारे तथ्य जान कर उपाय बता सकता है।

कई लोग सोचते हैं कि अदालत में मुकदमा करने से बहुत समय लगेगा। तो अदालत में समय तो लगता है। कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यदि अदालत में मुकदमे बहुत अधिक संख्या में लंबित हैं तो समय भी अधिक लगेगा। मुकदमों में देरी होने का कारण अदालतों की संख्या का बहुत कम होना है। देश के मुख्य न्यायाधीश ने देश भर में 70000 अदालतों की और जरूरत बताई है। जब तक देश में पर्याप्त अदालतें नहीं होतीं तब तक मुकदमों के निर्णय में देरी होना जारी रहेगा। वैसे अधीनस्थ न्यायालय स्थापित करने का दायित्व राज्य सरकार का है। लोगों को चाहिए कि अधिक अदालतें स्थापित करने के लिए राज्य सरकार पर दबाव बनाएँ।

लेकिन यह सोच गलत है कि अदालत में मुकदमा करने से देरी होगी इस कारण अन्य उपाय तलाशा जाए। अन्य कोई भी वैध उपाय उपलब्ध नहीं है इस कारण आप को जाना तो अदालत ही पड़ेगा। आप अदालत जाने में जितनी देरी करेंगे उतनी ही देरी से आप को राहत प्राप्त होगी। इस कारण मुकदमा करने में देरी न करें।

लोक अदालत में न्याय बिलकुल नहीं मिलता। वहाँ भी मजबूर पक्ष को ही झुकना पड़ता है और जो कुछ मिल रहा है उस पर इसलिए सब्र करना पड़ता है कि अदालतें समय रहते न्याय करने में सक्षम नहीं हैं। वस्तुतः लोक अदालतें तो लोगों को न्याय प्राप्ति से दूर करने की तरकीब है जो सरकारों और न्यायपालिका ने मिल कर तलाश कर ली है। यह पूरी तरह से न्याय से विचलन है।

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