Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Registration Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय कृषि भूमि क्रूरता चैक बाउंस तलाक न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

वकील अपने मुवक्किल की प्राइवेसी को भंग कर के अपने ही प्रोफेशन को हानि पहुँचाते हैं।

Lawyers in courtसमस्या-

विनय ने जबलपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे मित्र के पक्ष मे कोर्ट का एक फ़ैसला हुआ था। मित्र के एडवोकेट ने न्यूज़ पेपर्स में पूरी न्यूज़ छपवा दी। दोनो पक्षकारों के पूरे नाम पते के साथ। जबकि मित्र से इसकी कोई अनुमति नहीं ली गयी थी। वो परेशान हो गया पूरे शहर मे गली गली मेरी बदनामी हो गयी, ऐसा कहता है और उसके ऑफिस में उसे बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वो आत्महत्या की बातें करता है। जब कि एक बार उस के वकील साहब के ये कहने पर की इसे छपवा देना चाहिए। उसने साफ कहा था कि हमारे नाम नहीं आए तो छाप सकता है। लेकिन वकील साहब ने न्यूज़ दे दी अपने नाम के लिए। अब फ्रेंड बहुत मानसिक तनाव पीड़ा और परेशानी में है। वकील साहब से बात करने पर वो असंगत आर्ग्युमेंट देने लगते हैं। मित्र का कहना है हम ने समाज के खिलाफ कोई अपराध नहीं किया। ये पर्सनल मैटर था। हो सकता है कल को मेरे घर को बसाने के लिए मैं प्रयास करूँ। लेकिन इन वकील साहब ने सब बिगाड़ कर दिया। क्या करना चाहिए? क्या वकील साहब को ये हक है कि बिना उस की अनुमति के वो न्यूज़ छपवा दे। क्या बिना नाम के या नाम बदल के न्यूज़ नहीं छप सकती थी? क्या वकील साहब के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है? वकील साहब ने एक दिन पहले मित्र के फोन करने पर उसे बताया था कि कल न्यूज़ देख लेना छप जाएगी। मित्र के पास एसएमएस है जो उसने वकील साहब को किए थे कि यदि न्यूज़ दे दी है तो नाम मत छापने देना और बात भी की थी। कृपया मार्गदर्शन करें। वकील साहब अपनी गलती तक मानने को तैयार नही हैं। क्या किया जाए? वकील साहब को क्या इतने असीमित अधिकार हैं?

समाधान-

न्यायालय से निर्णय हुआ है और आजकल समाचार पत्र इस तरह के पारिवारिक मामलों के समाचार प्राप्त करने के लिए अपने संवाददाताओं को नियमित रूप से न्यायालय भेजते हैं जो हर न्यायालय में रोज होने वाले वाले निर्णयों की जानकारी न्यायालय के कार्यालय से तथा वकीलों से प्राप्त करते हैं। वकीलों में भी उन का नाम अखबार में छपने की चाहत होती है तो वे संवाददाताओं को यह जरूर कहते हैं कि उन का नाम छपे तो बेहतर होगा।

स समाचार के प्रकाशन में वकील की गलती सिर्फ इतनी है कि उन्हों ने आप के मित्र को यह कह दिया कि न्यूज छप जाएगी, कल के अखबार में देख लेना। वर्ना इस तरह का समाचार आप के वकील की जानकारी के बिना भी अखबार वाले छाप सकते थे। यदि उस में समाचार जैसा तत्व होता तो वे अवश्य छापते वकील के मना करने पर भी नहीं रुकते। इस कारण वकील ने विधिक रूप से कोई गलती नहीं की है। अखबार वालों ने भी जो समाचार प्रकाशित किया है वह केवल वही है जो कि उन्हें न्यायालय के निर्णय से प्राप्त हुआ है।

जो निर्णय हुआ है उसे आप के मित्र को सहज रूप से स्वीकार करना चाहिए। सचाई को तो लोग कभी न कभी जान ही जाते हैं इस कारण उस से कब तक बचा जा सकता है। इस कारण सचाई को साहस के साथ स्वीकार करते हुए निर्भीकता से समाज का सामना करना चाहिए। उस में शर्म की कोई बात नहीं है। वकील साहब ने किसी तरह का कोई विधिक दुराचरण नहीं किया है इस कारण उन के विरुद्ध कोई कार्यवाही किया जाना संभव नहीं है। फिर भी वकीलों को चाहिए कि कम से कम वे अपने मुवक्किलों की प्राइवेसी का ध्यान रखें। इस से मुवक्किल को तो कम ही नुकसान होता है, अधिक हानि वकील की होती है कि उस की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है जो उस के प्रोफेशन को नुकसान पहुँचाती है। आप के मित्र या आप से यदि कोई पूछे कि कौन वकील करना चाहिए तो आप शायद किसी का नाम न बताएँ लेकिन यह जरूर कहेंगें कि उस वकील को मत करना वह मुवक्किलों की परवाह नहीं करता।

वकील को तथ्य बताने, साक्ष्य तथा सबूत जुटाने में गंभीरता बरतें, इन की कमी से एक अच्छा वकील भी मुकदमा हार सकता है।

समस्या-

मुजफ्फरपुर, बिहार से रामनारायण कुमार ने पूछा है-

क लड़की शादी के बाद अपने ससुराल से झगड़ा करके मायके चली आई। मायके में आने के समय उसे तीन माह का गर्भ था।  मायके में उसने एक लड़के को जन्म दिया। लड़के वाले ने लड़की को अपने ससुराल चलने को कहा तो उस ने जाने से इनकार कर दिया। लड़का पक्ष समाज को विदा करने के लिए निवेदन किया।  लड़की पक्ष ने समाज का भी कहना नहीं माना।  तब हार कर लड़का पक्ष ने फॅमिली कोर्ट में आवेदन दिया।  लड़की पक्ष ने दहेज प्रताड़ना का झूठा केस लड़का पक्ष पर कोर्ट में कर दिया है।  इस में लड़का पक्ष को क्या करना चाहिए?  लड़का पक्ष लड़की एवम् उस बच्चे को मान सम्मान के साथ रखना चाहता है।

समाधान-

Lawyers in courtप ने अपनी समस्या में यह नहीं बताया कि लड़का पक्ष ने फैमिली कोर्ट में आवेदन किस संबंध में दिया है, विवाह विच्छेद के लिए अथवा दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना (पत्नी को ससुराल लाने) के लिए? खैर¡

ड़का पक्ष को अपना मुकदमा पूरी तैयारी के साथ लड़ना चाहिए। गवाह सबूत प्रस्तुत करने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिए। उसी तरह उस के व उस के परिवार के विरुद्ध दहेज प्रताड़ना का जो झूठा मुकदमा किया गया है उस में भी अच्छा वकील कर के मजबूती से प्रतिरक्षा करना चाहिए। यदि लड़का पक्ष सही और सच्चा है तो उस का आवेदन भी न्यायालय मंजूर करेगा और उन के विरुद्ध जो मिथ्या मुकदमें बनाए गये हैं वे भी खारिज हो जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता है तो आगे अपील भी की जा सकती है।

क्सर इस तरह के मामलों में कभी यदि सचाई हारती है तो वह केवल इस कारण से न्यायालय में अपने पक्ष के गवाह सबूत ठीक से प्रस्तुत नहीं किए जाते और प्रतिरक्षा सही तरीके से नहीं होती। इस कारण से यह जरूरी है कि लड़का पक्ष का वकील अच्छा हो, मुकदमे को समय देने वाला हो। वकील को तथ्य और साक्ष्य हमेशा पक्षकार ही ला कर देते हैं। यदि स्वयं पक्षकार सबूत जुटाने और तथ्यों को अपने वकील को बताने में कोई कमी रखता है तो एक अच्छा वकील होने पर भी मुकदमे में हार का सामना करना पड़ सकता है। इस लिए मुकदमा करने के बाद सबूत और साक्ष्य जुटाने में तथा तथ्यों को बताने में पक्षकारों को पूरी गंभीरता बरतनी चाहिए।

वकील विश्वविद्यालय/ महाविद्यालय का नियमित विद्यार्थी हो सकता है

समस्या-

सिरसा, हरियाणा से राजेश ने पूछा है-

मेरा बार कौंसिल द्वारा एक अधिवक्ता (वकील) के रूप में नामांकन हो चुका है और मैं जिला न्यायालय में प्रेक्टिस कर रहा हूँ।  क्या मैं प्रेक्टिस करते हुए एलएल.एम./एम.एड. की उपाधियों के लिए विश्वविद्यालय में नियमित विद्यार्थी के रूप में अध्ययन कर सकता हूँ? यदि मैं ऐसा करूँ तो क्या ये उपाधियाँ मान्य होंगी।

समाधान-

क अधिवक्ता के रूप में नामांकन हो जाने पर कोई भी व्यक्ति अधिवक्ता अधिनियम के अनुसार न्यायालयों के समक्ष पक्षकारों की पैरवी करने में सक्षम हो जाता है। लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह न्यायालय के कार्य समय में न्यायालय में उपस्थित ही रहे। वह अपने कामों को इस तरह से संयोजित कर सकता है कि वह अपना वकालत का काम भी करता रहे और साथ के साथ अध्ययन भी कर सके। इस तरह एक अधिवक्ता अपना काम करते हुए अपने नियमित अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय या महाविद्यालय की कक्षाओं में भी उपस्थित हो सकता है।

धिवक्ता अधिनियम तथा बार कौंसिल के नियमों में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि एक अधिवक्ता किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का नियमित विद्यार्थी नहीं हो सकता है। इस कारण से आप अधिवक्ता का कार्य करते हुए किसी भी उपाधि के लिए महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में नियमित प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं और नियमित कक्षाओं में उपस्थित हो सकते हैं। इस तरह प्राप्त की गई उपाधि वैध होगी। उपाधि की मान्यता का इस से कोई संबंध नहीं है। यदि जिस विश्वविद्यालय से आप ने उपाधि प्राप्त करेंगे वह सर्वत्र मान्य होगी तो वह इस कारण से अमान्य नहीं होगी कि अधिवक्ता का कार्य करते हुए आप ने प्राप्त की है।

अधिवक्ता बार कौंसिल की अनुमति से अंशकालिक नौकरी कर सकता है

समस्या-

सिरसा, हरियाणा से रामसिंह ने पूछा है-

मैं एक अधिवक्ता (एडवोकेट) हूँ।  मैं बी.ए., एलएल.बी., बी.एड. आदि डिग्रीधारी हूँ। क्या मैं बार कौंसिल में अपना एनरॉलमेंट होते हुए भी एक अध्यापन का अनुभव प्राप्त करने के लिए अध्यापक के रूप में काम करने के लिए अपनी बी.एड. की डिग्री किसी स्कूल में प्रस्तुत कर सकता हूँ?

समाधान-

प एक अधिवक्ता के रूप में बार कौंसिल में अपना एनरॉलमेंट बनाए रखते हुए न केवल अपनी बी.एड. की डिग्री किसी स्कूल में प्रस्तुत कर सकते हैं, वहाँ नियोजन के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और साक्षात्कार भी दे सकते हैं। लेकिन यदि आप को किसी स्कूल में पूर्णकालिक नौकरी के लिए प्रस्ताव प्राप्त होता है तो आप वह स्वीकार नहीं कर सकते।  लेकिन कोई अंशकालिक नौकरी का प्रस्ताव आप अपने राज्य की बार कौंसिल की अनुमति प्राप्त करने के उपरान्त स्वीकार कर सकते हैं।

बार कौंसिल की राय में यदि वह पाती है कि इस अंशकालिक नौकरी का आप के अधिवक्ता के रूप में किए जाने वाले प्रोफेशनल कार्य के साथ कोई टकराव नहीं है और आप के प्रोफेशनल सम्मान को उस नौकरी से कोई आँच नहीं आएगी तो कुछ उचित निर्देशों के साथ राज्य बार कौंसिल एक अधिवक्ता को ऐसी नौकरी करने के लिए अनुमति प्रदान कर देगी।

क्या बिना वकील के मुकदमा किया जा सकता है?

क्या बिना वकील के मुकदमा किया जा सकता है?

-अनिरुद्ध सिंह, बांदा, उत्तर प्रदेश

स प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ भी हो सकता है और ‘ना’ भी। वस्तुतः कानून इस बात की इजाजत देता है कि कोई भी व्यक्ति बिना किसी वकील को नियुक्त किए न्यायालय के समक्ष अपना मुकदमा प्रस्तुत कर सकता है और स्वयं ही उस की पैरवी भी कर सकता है। न्यायालय किसी भी व्यक्ति को उसका मुकदमा स्वयं प्रस्तुत करने और उस में पैरवी  करने की अनुमति देता है। लेकिन यह केवल कानून की किताब तक सीमित है।

किसी व्यक्ति को मुकदमा प्रस्तुत करने के लिए उसे उन सब कानूनों का ज्ञान होना आवश्यक है जिन का उपयोग उस मुकदमे को प्रस्तुत करने और उस की पैरवी करने के लिए होने वाला है। उदाहरण के रूप में आपने किसी को रुपया दिया है या किसी से आप को रुपया लेना है और इस के लिए वह आप को एक वचन पत्र (promissory note) लिख कर देता है लेकिन वचन पत्र के अनुसार आप को रुपया नहीं देता है। वैसी स्थिति में आप वचन पत्र के आधार पर रुपया वसूली का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को सब से पहले वाद पत्र लिखना आना चाहिए। आप को पता होना चाहिए कि वाद पत्र की रचना कैसे की जाती है, उस में क्या क्या तथ्य किस तरह और कहाँ लिखे जाने चाहिए, आदि आदि। फिर आप को यह पता होना चाहिए कि उस पर कितनी न्याय शुल्क अदा करनी होगी। कौन से प्रपत्र प्रतिवादी को समन करने के लिए भेजे जाने हैं। उन्हें कैसे भरना है? इस तरह के अनेक प्रश्नों से आप को जूझना होगा। यह वाद दीवानी प्रक्रिया के किन किन उपबंधों के अधीन प्रस्तुत किया जाना है? फिर उस मुकदमे की प्रकिया क्या होगी? हर कदम पर आप के सामने इतने सवाल होंगे कि किसी तरह आप ने वाद पत्र तैयार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर भी दिया तो भी एक दो पेशियों के उपरान्त आप को समझ आ जाएगा कि एक अच्छे वकील की मदद के बिना मुकदमा नहीं लड़ा जा सकता है।

म तौर पर परिवार न्यायालयों में वकील का प्रवेश वर्जित है और सभी मुकदमे स्वयं पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत किये जाते है और पक्षकारों द्वारा ही प्रतिवाद किया जा सकता है। लेकिन कोई भी मुकदमा इन न्यायालयों में ऐसा प्रस्तुत नहीं होता है जिस में वकील की सहायता प्राप्त नहीं की जाती हो। बल्कि वकील की अनुपस्थिति के कारण पक्षकारों को बहुत हानियाँ उठानी पड़ती हैं। यहाँ तक कि न्यायालय स्वयं ही यह मानता है कि कोई मुकदमा वकील के बिना चल ही नहीं सकता और परिवार न्यायालयों के मामले में स्वयं परिवार न्यायालय ही यह सलाह देता है कि पक्षकार वकील की सलाह और सहायता प्राप्त करे। मैं ने एक महिला का भरण पोषण का मुकदमा हिन्दू दत्तक एवं भरण पोषण अधिनियम की धारा-18 के अन्तर्गत तैयार करवाया और महिला को परिवार  न्यायालय में प्रस्तुत करने भेजा। घंटे भर बाद महिला वाद पत्र वापस ले कर आई और कहने लगी कि अदालत ने कहा है कि वकील से यह लिखवा कर लाओ कि यह मुकदमा किस कानून की किस धारा में प्रस्तुत किया गया है। मुझे कानून बनाने वालों और अदालत पर बड़ा क्रोध आया कि उन्हों ने वकील के प्रवेश को परिवार न्यायालय में क्यो निषिद्द किया है, और निषिद्ध किया है तो न्यायालय स्वयं पक्षकार की मदद क्यों नहीं करता है?  मैं न्यायालय के न्यायाधीश से मिला और उन्हें कहा कि जब वकील का इस न्यायालय में निषेध किया है तो वे पक्षकारों की स्वयं मदद क्यों नहीं करते?  तो न्यायाधीश का कहना था कि आप भी जानते हैं और हम भी कि वकील के बिना कोई अदालत नहीं चल सकती। लेकिन कानून से मजबूर हैं कि आप की उपस्थिति नहीं लिख सकते। वास्तविकता तो यह है कि वकील के बिना अदालत एक कदम नहीं चल सकती। पक्षकार अदालत की भाषा नहीं समझ सकता और अदालत पक्षकार की।

सलिए यदि कोई यह सोचता है कि वकील के बिना मुकदमा लड़ा जा सकता है तो गलत सोचता है। यदि इस सोच के अंतर्गत वह मुकदमा कर भी दे तो भी उसे किसी न किसी स्तर पर जा कर वकील की मदद लेने के लिए बाध्य होना ही पड़ता है।

बीमा कंपनी के सेल्स मैनेजर ने धोखाधड़ी की उस के खिलाफ क्या कार्यवाही की जाए?

कमलेश दरवाई ने पूछा है-

रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के सेल्स मैनेजर ने इंश्योरेंस के नाम पर धोखाधड़ी की है। पॉलिसी के रुपए लिए, परंतु पालिसी वास्तव में की ही नहीं। 4-5  महीने तक पॉलिसी बॉण्ड नहीं आने पर सेल्स मैनेजर से बात की तो उस ने कहा कि आ जाएगा। कंपनी से संपर्क किया तो पता चला कि ऐसी कोई पॉलिसी जारी ही नहीं हुई है। बाद में सेल्स मैनेजर ने चैक दिया जो कि बाउंस हो चुका है। ऐसा और भी लोगों के साथ किया है। अब मैं उक्त सेल्स मैनेजर के साथ अपना रुपया कैसे वापस ले सकता हूँ?  उस पर कैसे कार्यवाही की जा सकती है? मेरे साथ और भी लोग हैं जो उस पर कार्यवाही करना चाहते हैं इस के साथ ऐसे ही धोखाधड़ी हुई है।

उत्तर-

सेल्स मैनेजर पद से ऐसा लगता है जैसे इस पदनाम का व्यक्ति वास्तव में कंपनी का कोई बहुत बड़ा अधिकारी है। इस तरह किसी के कहे जाने से यह विश्वास नहीं कर लेना चाहिए कि वह वास्तव में कंपनी का अधिकारी है। सब से पहले तो उस का परिचय पत्र जान कर तस्दीक कर लेना चाहिए कि वास्तव में वह इस तरह का अधिकारी भी है या नही़? चाहे वह आप का निकटतम व्यक्ति ही क्यों न हो। कोई भी धन किसी को तभी देना चाहिए जब वह उस की रसीद जारी कर के आप को दे रहा हो। कोई भी इंश्योंरेंस कंपनी अपने किसी अधिकारी या ऐजेंट के माध्यम से पालिसी के लिए प्रीमियम प्राप्त नहीं करती। हमेशा प्रीमियम कंपनी के कार्यालय पर ही प्राप्त किया जाता है जिस के लिए वह तुंरत रसीद जारी करती है। यदि आप का पैसा कंपनी में जमा हुआ होता और किसी कारण से पॉलिसी के लिए आप का प्रस्ताव किसी कारण से अस्वीकार बपी कर दिया जाता तब भी कंपनी आप का पैसा स्वयं वापस कर देती।

जिस व्यक्ति ने आप को कंपनी का सेल्स मैनेजर बताया है वह सैल्स मैनेजर न हो कर कंपनी का ऐजेंट हो सकता है। ऐजेंट का काम कंपनी का प्रचार करना होता है तथा ग्राहक तैयार कर उसे कंपनी के दफ्तर पहुँचाना होता है। पालिसी के लिए धन जमा करने का काम उस का नहीं है। यदि कोई एजेंट आप को यह कहता है कि वह आप का प्रीमियम जमा करवा देगा  आप स्वंय अपनी रिस्क पर ऐसा करते हैं। अभिकर्ता इस के लिए वह अधिकृत नहीं है। कम से कम आगे से किसी भी बीमा पॉलिसी के लिए पैसा हमेशा कंपनी के दफ्तर में जमा करवाएँ और तुरंत रसीद प्राप्त करें।

स तथाकथित सेल्स मैनेजर ने निश्चित रूप से आप को रसीद नहीं दी होगी और रसीद बाद में पॉलिसी के साथ देने को कहा होगा। आप के मांग ने पर उस ने आप को आप की राशि के चैक दे दिए जो बाउंस हो गए। बाउंस हुए चैक की राशि को प्राप्त करने के लिए तो आप को धारा-138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत उसे नोटिस दे कर कार्यवाही करनी चाहिए। यदि नोटिस के पंद्रह दिनों में वह राशि नकद वापस नही करता है तो आप उस के विरुद्ध अदालत में परिवाद दाखिल कर सकते हैं। (कार्यवाही कैसे करें इस के लिए इसी वेबसाइट पर अन्यत्र जानकारी मिल जाएगी)

स के अतिरिक्त केवल एक ऐजेंट होते हुए भी या न होते हुए भी किसी कंपनी का सेल्स मैनेजर बताना तथा रुपया इकट्ठा कर कंपनी में जमा न कराना गंभीर अपराध हैं। इस के लिए आप लोग अपने क्षेत्र के पुलिस थाना में रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं। पुलिस थाना द्वारा कार्यवाही न करने पर क्षेत्र के पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट को शिकायत कर सकते हैं और फिर भी कार्यवाही न होने पर आप सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद दाखिल कर सकते हैं। इस के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद हासिल करनी चाहिए।

न्याय प्रणाली में सुधार आवश्यक है जिस से पक्षकार या वकील उसे लंबा न कर सकें

बिजनेस स्टेंडर्ड के 18 सितंबर 2011 के अंक में एम. जे. एंटनी के एक लेख का हिन्दी अनुवाद वकीलों की चालबाजी से लंबी खिंच जाती है मुकदमे बाजी शीर्षक से प्रकाशित किया है। इस आलेख में उन्हों ने उच्चतम न्यायालय के दो निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा है कि सभी न्यायाधीश अतीत में अधिवक्ता की भूमिका अदा कर चुके होते हैं, इसी तरह सभी अधिवक्ताओं के भविष्य में न्यायाधीश बनने की संभावना रहती है। इस तरह वे समूची न्याय प्रणाली को अंदरूनी तौर पर जानते हैं। ऐसे में अगर न्यायाधीश उन कुछ युक्तियों का खुलासा करते हैं जिनको अपना कर विधि पेशे के लोग न्याय प्रक्रिया में देरी करते हैं तो लोगों को उनकी बातों को गौर से सुनना चाहिए। 
ल्लखित मामलों में से एक मामला तो दिल्ली उच्च न्यायालय में वर्ष 1977 में शुरू हुआ था।
यह मामला इतने न्यायालयों में घूमता रहा कि सर्वोच्च न्यायालय को इन का आकलन करने में छह पन्ने लग गए। रामरामेश्वरी देवी बनाम निर्मला देवी के इस मामले में अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘यह इस बात का शानदार नमूना है कि कैसे हमारे न्यायालयों में मामले चलते हैं और किस तरह बेईमान वादी इनके जरिए अनंतकाल तक अपने विरोधियों तथा उनके बच्चों को परेशान करने के लिए न्याय प्रणाली का दुरुपयोग कर सकते हैं।’
ह मामला एक व्यक्ति को भूखंड आवंटन से आरंभ हुआ था, बाद में तीन छोटे भाई भी उसके साथ रहने लगे। छोटे भाइयों ने संपत्ति के बँटवारे की मांग की। बँटवारे का मामला तो बहुत पहले ही निपट गया था लेकिन न्यायाधीशों के मुताबिक मामले की लागत कौन वहन करेगा जैसेतुच्छ तथा महत्त्वहीन प्रश्न शेष रह गए। आखिर ये मामले भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच ही गए। इस मामले में एक पक्ष द्वारा पेश किए गए बहुत सारे आवेदनों को देखकर (जिनमें से कुछ गलत तथ्यों पर आधारित थे) न्यायालय ने पहले कहा था, ‘याचिकाकर्ताओं का एक मात्र उद्देश्य मुकदमे में देरी करना है, जबकि यह मामला पहले ही 18 वर्षों से लंबित है। यह बात साबित हो चुकी है कि ऐसी तुच्छ मुकदमेबाजी न्याय प्रक्रिया को शिथिल बनाती है और इसकी वजह से सही वादियों को आसानी से और तेज गति से न्याय मिलने में देरी होती है।’
र्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आगे कहा, ‘और अधिक समय गँवाए बिना प्रभावी उपचारात्मक उपाय नहीं अपनाए गए तो समूची न्यायपालिका की विश्वसनीयता दाँव पर लग जाएगी।’ मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे एक वरिष्ठ अधिवक्ता की किताब “जस्टिस, कोट्र्स ऐंड डिलेज” का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालयों का 90 फीसदी समय और संसाधन अनचाहे मामलों की सुनवाई में निकल जाते हैं। यह हमारी मौजूदा प्रणाली की कमियों के चलते होता है जिसमें गलती करने वाले को सजा के बजाय प्रोत्साहन मिलता है। यदि न्यायालय इस मामले में चौकस रहें तो मुकदमेबाजी का गलत फायदा उठाने वालों की संख्या को काबू किया जा सकता है। 
पुस्तक के मुताबिक हर लीज अथवा लाइसेंस अपनी नियत तिथि की समाप्ति पर किसी न किसी मामले की वजह बन जाते हैं। न्यायालय ऐसे मामलों से भरे हुए हैं क्योंकि इनमें गलत करने वालों को स्वाभाविक तौर पर लाभ हासिल हो

क्या वकीलों की पोशाकें न्याय प्रणाली और समाज के बीच अवरोध हैं?

न्यायाधीशों और वकीलों ने काले कोट वाली पोशाक  इंग्लेंड में पहली बार 1685 ईस्वी में किंग जॉर्ज द्वितीय की मृत्यु पर शोक संकेत के लिए अपनाई थी। तब यह विश्वास किया जाता था कि काला गाउन और विग जजों और न्यायाधीशों को गुमनामी की पहचान देती है। कुछ भी  हो काला कोट वकीलों और न्यायाधीशों की पोशाक में ऐसा सम्मिलित हुआ कि  ब्रिटिश साम्राज्य के साथ यह सारी दुनिया में पहुँच गया। न्याय करने का दायित्व और अधिकार सामंती समाज में राजा का होता था। लेकिन राज्य के विस्तार के साथ यह संभव नहीं रह गया था कि राजा ही सब स्तरों पर न्याय करेगा। इस के लिए राजा को बहुत से न्यायाधिकारी नियुक्त करने होते थे। हालांकि अंतिम अपील राजा को  ही की जा सकती थी। इस तरह एक न्यायाधिकारी राजा के प्रतिनिधि के रूप में ही न्याय करता था। जिस तरह राजा अपने दरबार में विशिष्ठ पोशाक में होता था और दरबार में उपस्थित होने वाले दरबारी भी केवल विशिष्ठ पोशाक में ही दरबार में उपस्थित हो सकते थे। इस तरह राजा और दरबारियों की पोशाक राज्य की शक्ति का प्रतीक थी। राजा के प्रतिनिधि के रूप में न्यायाधीश की पोशाक भी इसी तरह से शक्ति का प्रतीक थी। वकालत के पेशे का आरंभ वकील न्यायार्थियों के पैरोकार नहीं हुआ करते थे, बल्कि वे न्यायाधीश को न्याय करने में सक्षम बनाने के लिए उस के सलाहकार हुआ करते थे। कालांतर में कुछ लोगों को न्यायार्थियों का पक्ष न्यायाधीश के समक्ष रखने की अनुमति  मिलने लगी। केवल वे ही व्यक्ति जो न्यायाधीश या राज्य की ओर से अधिकृत थे किसी पक्षकार की पैरवी कर सकते थे। आरंभ में न्यायाधीशों के सलाहकारों को ही इस तरह का अधिकार प्राप्त हुआ। इस तरह काला कोट वकीलों की भी पोशाक बन गई। 
लेकिन वे सामंती राज्यों के अथवा साम्राज्य के न्यायालय थे।  वहाँ न्यायाधीशों और वकीलों की पोशाकें शक्ति का प्रतीक थीं। ये पोशाकें  आम जनता को राज्य की शक्ति का लगातार अहसास कराती थीं। लेकिन अब  तो यह जनतंत्र का युग है। उन की पोशाकों को शक्ति का प्रतीक होना आवश्यक नहीं है उसे तो जनता के बीच न्याय का प्रतीक होना चाहिए। लेकिन फिर भी सामंती और साम्राज्यवादी शक्ति का प्रतीक ये पोशाकें न्यायालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। निश्चित रूप से आज इस पोशाक को कोई भी इस रूप में न तो व्याख्यायित करना चाहता है और न ही करना चाहेगा। लेकिन उस के लिए कुछ नए तर्क सामने आने लगे हैं। अब यह कहा जाता है कि ये पोशाकें आप शक्ति का प्रतीक नहीं बल्कि वकीलों के बीच अनुशासन पैदा करती हैं और उन्हें न्याय के लिए लड़ने को प्रेरित करती हैं। यह भी कहा जाता है कि यह पोशाक उन्हें अन्य प्रोफेशन वाले लोगों से अलग पहचान देती है। यह भी कहा जाता है कि काला रंग न्याय का प्रतीक है जब कि सफेद रंग के बैंड्स शुद्धता और निर्लिप्तता का अहसास कराते हैं। 
न सब तर्कों के होते हुए भी भारत के वकील काले कोट में असुविधा महसूस करते हैं। वस्तुतः भारत के गर्म वातावरण में काला कोट पहन कर वकील स्वयं अपने शरीर के साथ क्रूरता का व्यवहार करते हुए उस का शोषण करते हैं। बहुत से वकीलों से पूछने पर पता लगा कि वे यह महसूस करते हैं कि काला कोट उन के लिए पहचान बन गया है। भीड़ भरे न्यायालय परिसरों में उन की पहचान केवल काले कोट से ही हो प

न्यायाधीश और वकील काला कोट क्यों पहनते हैं?

भारत में कहीं भी आप किसी अदालत में जाएंगे। आप को काले कोटों की बहुतायत दिखाई देगी। चाहे भीषण गर्मी क्यों न पड़ रही हो। चेहरे से पसीने की बूंदें झर-झर झर रही हों। कोट के नीचे कमीज बनियान तर हो चुके हों लेकिन वकील कोट में ही दिखाई देंगे। यही नहीं, अंदर कमीज का भी गले का बटन बंद होगा और ऊपर से बैंड्स या टाई और बंदी दिखाई देगी। कहीं ऐसा न हो कि गले के रास्ते कहीं से हवा घुस जाए। आप यदि सर्वोच्च न्यायालय या किसी हाईकोर्ट में पहुँच जाएंगे तो वहाँ कोट के ऊपर एक गाउन और डाला हुआ मिलेगा।  वकील नहीं सारे न्यायाधीश भी यही वर्दी पहने नजर आएंगे। आप के मन में यह प्रश्न भी उठेगा कि क्या वकीलों और न्यायाधीशों को गर्मी नहीं लगती?  मुझ से तो कई लोग पूछ भी लेते हैं कि क्या आप को गर्मी नहीं लगती? मैं सहज रूप से उन्हें कह भी देता हूँ कि नहीं लगती। सिर्फ सुबह जब पहनते हैं तब लगती है, फिर कुछ देर में अंदर की बनियान, कमीज सब पसीने से भीग जाते हैं, तब जरा भी हवा अंदर प्रवेश करती है तो सब ठण्डे भी हो जाते हैं। 

लेकिन मेरा यह उत्तर सहज मिथ्या से अधिक कुछ नहीं। मुझे गर्मी लगती है, कई बार तो लगातार पसीने के कारण त्वचा पर खुजली होने लगती है। जब एक से दूसरी अदालत जाने के लिए धूप में हो कर गुजरना होता है तो काला रंग उष्मा का अच्छा ग्राहक होने के कारण कोट से तेजी से गर्मी अंदर प्रवेश करती है और पसीना गर्म हो उठता है। तब ऐसा लगता है जैसे खोलते हुए पानी में घुस गए हों। तब तुरंत ही पंखे के नीचे शरण लेनी होती है। पाँच मिनट हवा लगने के बाद ही कुछ राहत मिलती है।  एक दो बरसात हो जाएँ तो हालत और बुरी होती है। तब बाहर भी ऊमस होती है और पसीना सूखना बंद हो जाता है। लगता है जैसे दिन भर खौलते पानी में बैठे रहे। उसी में दिन भर काम भी करना होता है। बरसात होते ही बिजली आने-जाने लगती है और पंखे का सहारा भी छिन जाता है। कभी कभी तो यह सोचने लगता हूँ कि मैं ने क्या सोच कर वकालत के प्रोफेशन का चुनाव  किया था।

र्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में यह परेशानी कम है। वहाँ सभी न्यायालय वातानुकूलित हैं। न्यायाधीशों को वहाँ कोट पहनने में कोई परेशानी नहीं होती। जितनी देर वकील अंदर न्यायालय कक्ष में रहते हैं उन्हें भी परेशानी नहीं होती। परेशानी होती है तो जिला न्यायालय और उस से नीचे के न्यायालयों के वकीलों को। अब आप को समझ आ रहा होगा कि भारत में दीवानी न्यायालय गर्मी के मौसम में क्यों  बंद कर दिए जाते हैं और क्यों राजस्थान जैसे सब से गर्म प्रदेश में ढाई माह के लिए न्यायालयों का समय सुबह सात से साढ़े बारह का क्यों कर दिया जाता है? लेकिन वकीलों को इस से भी राहत नहीं मिलती उन के काम केवल दीवानी अदालतों में ही नहीं होते उन्हें फौजदारी, राजस्व और दूसरी अदालतों में भी जाना होता है। इन में से राजस्थान में राजस्व न्यायालय और अनेक न्यायाधिकरण 10 से 5 बजे तक काम करते हैं। परिणामतः वकीलों को लगभग दिन भर अदालतों में रहना होता है।

प सोच रहे

अपना वकील सावधानी से चुनें

क्सर ही मैं यह कहता हूँ कि ‘जब भी आप को कभी किसी वकील की आवश्यकता हो तो आप वकील का चुनाव करने में सावधानी बरतें।’  यह ठीक वैसे ही है जैसे आप मकान का निर्माण कराने के लिए एक अनुभवी और प्रतिष्ठित बिल्डर का चुनाव करते हैं। यूँ तो कानून की व्यवसायिक डिग्री हासिल करने के बाद किसी राज्य की बार कौंसिल में अपना पंजीयन कराते ही एक व्यक्ति वकालत करने का अधिकार प्राप्त कर लेता है। लेकिन वकालत के व्यवसाय में पैर जमा पाना इतना आसान नहीं। कानूनन किसी वरिष्ठ वकील के पास ट्रेनिंग जरूरी न होते हुए भी एक नए वकील को जल्दी ही यह पता लग जाता है कि उस के पास के ज्ञान के भरोसे वकालत कर पाना संभव नहीं है, उसे जल्दी ही किसी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में स्थान बनाना पड़ता है। कोई भी वरिष्ठ वकील अपने कार्यालय में नए वकील को सहज स्वीकार नहीं करता क्यों कि इस तरह वह अपने ही कार्यालय में अपने ही एक प्रतिस्पर्धी को स्थान दे रहा होता है। लेकिन हर वरिष्ठ वकील को भी जिस के कार्यालय में पर्याप्त काम है, अपनी सहायता के लिए हमेशा ही कुछ सहयोगी वकीलों की जरूरत होती है। यही जरूरत नए वकीलों के वरिष्ठ वकीलों के कार्यालयों में प्रवेश को सुगम बनाती है। नए वकील को किसी भी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में पहले छह माह तक न तो कोई काम मिलता है और न ही कोई आर्थिक सहायता। इस काल में वह केवल कार्यालय और अदालत में अपने वरिष्ठ वकील के काम का निरीक्षण कर सीखता है और खुद को इस काबिल बनाता है कि वह वरिष्ठ वकील के काम में कुछ सहायता करे। इस बीच उसे केवल वही काम करने को मिलते हैं जो एक वरिष्ठ वकील का लिपिक (मुंशी) करता है। इस बीच वह अपने वरिष्ठ वकील का अनुसरण करते हुए काम करना सीखता है और उस की पहचान बनने लगती है। छह माह में उसे अदालत के न्यायाधीश, लिपिक, अन्य वकील, उन के मुंशी और वरिष्ठ वकील के मुवक्किल उसे नए वकील के रूप में पहचानने लगते हैं। इस बीच वह जितना काम करने के लायक हो जाता है उतनी ही आर्थिक सहायता उसे वरिष्ठ वकील के माध्यम से प्राप्त होने लगती है जो अक्सर अनिश्चित होती है।

च्च माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करते करते किसी भी युवक की उम्र 17-18 वर्ष हो जाती है। उस के बाद तीन वर्ष स्नातक बनने में और तीन वर्ष विधि-स्नातक बनने में कुल 23-24 वर्ष की आयु का होने पर ही कोई व्यक्ति वकालत के व्यवसाय में पैर रखता है। यह वह उम्र है जब वह विवाह कर चुका होता है या करने वाला होता है। उसे अपने भावी जीवन की चिंता सताने लगती है। इस उम्र में आते-आते उस पर यह दबाव बन जाता है कि वह अपने परिवार (पत्नी और बच्चे) को चलाने के लायक आमदनी अवश्य करने लगे। यह दबाव ही एक नए वकील को शीघ्र कमाने लायक बनने को प्रेरित करती है। अगले छह माह के दौरान वह यह पता लगाने का प्रयत्न करता है कि शीघ्र कमाई के साधन क्या हो सकते हैं। नए वकीलों में पाँच प्रतिशत ऐसे व्यक्ति भी होते हैं। जो सुदृढ़ आर्थिक स्थिति आते हैं या जिन के पास कोई अन्य आय का साधन होता है। इन में वे वकील भी सम्मिलित हैं जिन के पिता या परिवार का कोई सदस्य पहले से वकालत के व्यवसाय में होता है। इस श्रेणी के वकीलों पर कमाई का दबाव नहीं होता है। वे आराम से अपना अभ्यास जारी रखते हैं। उन की कमाई धीरे धीरे आरंभ होती है। उन का काम भी अच्छा होता है और वे विश्वसनीय वकील साबित होते हैं। 
शेष लोग जिन पर कमाई का दबाव होता है। उन में से अधिकांश शीघ्र कमाई का जुगाड़ करने के चक्कर में छोटे-छोटे काम करने लगते हैं और जल्दी ही वरिष्ठ वकील के कार्यालय से पृथक अपना अस्तित्व कायम कर लेते हैं। लेकिन उन का अभ्यास कमजोर रह जाता है। वे जो भी काम मिलने का अवसर उन्हें मिलता है उसे नहीं छोड़ते, चाहे उस काम को करने में वे स्वयं सक्षम हों या नहीं। वे ऐसे कामों को करने में बहुधा ही त्रुटियाँ करते हैं जो कभी बहुत गंभीर होती हैं और जिन्हें किसी भी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है। ऐसे वकील अक्सर मुवक्किल के लिए खतरा-ए-जान सिद्ध होते हैं। इस श्रेणी के वकील भले ही अपने काम में सिद्ध हस्तता हासिल न कर सके हों लेकिन किसी मुवक्किल को यह विश्वास दिलाने की कला सीख लेते हैं कि वे ही उस के काम के लिए सब से उपयुक्त वकील हैं। इस तरह के वकीलों से सावधान रहने की सब से अधिक आवश्यकता है। इन वकीलों के मुवक्किल को जल्दी ही पता लग जाता है कि वह गलत स्थान पर फंस गया है। वह वहाँ से जान छुड़ाने की कोशिश करता है। अक्सर ही उसे अपनी अदा की जा चुकी वकील फीस का मोह त्याग कर अपने मुकदमे को किसी काबिल वकील को देना पड़ता है। किसी भी काबिल वकील के लिए ऐसा मुकदमा लेना आसान नहीं होता। पहली अड़चन वह नियम है जिस के अंतर्गत किसी भी मुकदमे में कोई भी वकील पूर्व में नियुक्त किए गए वकील की अनुमति के बिना अपना वकालत नामा प्रस्तुत नहीं कर सकता जब तक कि न्यायालय स्वयं ही परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस की अनुमति न दे दे। इस कारण से दूसरा वकील नियुक्त करने के पहले किसी भी शर्त पर मुवक्किल को पहले वाले वकील से नए वकील के लिए अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है। जो काबिल वकील इस तरह बिगड़े पुराना लेना स्वीकार करता है, वह पहले यह देख लेता है कि जो नुकसान उस के मुवक्किल को हो चुका है उस में से कितना सुधारना संभव है? और वह यह बात अवश्य ही अपने मुवक्किल को बता भी देता है। इस तरह के बिगड़े हुए मुकदमों में काबिल वकील को अतिरिक्त श्रम करना होता है। इसी कारण से वह अपनी शुल्क भी अधिक ही लेता है। 
प समझ ही गए होंगे कि किसी भी काम के लिए किसी वकील का चुनाव करना क्यों आवश्यक है?