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जिस जन्म-मृत्यु पंजीयक कार्यालय के क्षेत्राधिकार में मृत्यु हुई है वही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर सकता है।

समस्या-

कमल शुक्ला ने जंजगीर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


दो वर्ष पूर्व मेरे पिता जी की देखभाल के लिए जांजगीर शहर में हमने एक आबादी भूमि में स्थित मकान खरीदा । इसके लिए तीनो भाई ने और पिता जी ने खर्च किया । नगर पालिका में पिता जी के नाम से नामांतरण कराया । पिता जी की देखभाल मेरे जिम्मे थी । पर अक्टूबर से नवंबर महीने में मुझे एक सम्मान समारोह में अमेरिका जाना हुआ । इस बीच मेरे 84 वर्षीय पिता जी की देखभाल के लिए मैंने वही पड़ोस में रहने वाली अपनी बहन को सौंपा था । इस बीच मे पिता जी का स्वास्थ्य खराब हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी । मैं अपनी यात्रा स्थगित कर लौट आया और मृतक संस्कार के बाद हम तीनो भाइयों ने दिसम्बर में नामांतरण हेतु अर्जी दी , शुल्क पटाया । इश्तहार प्रकाशन के दो माह बाद भी नगर पालिका से कोई जवाब नही आने पर सम्पर्क किया तो उन्होंने बताया कि हमारे आवेदक पर आपत्ति आया है । पता चला कि मेरी बहन ने पिता जी से उनकी बीमारी की स्थित में मृत्यु से 15 दिन पूर्व वसीयत कराया हुआ है । वसीयत की तिथि के दिन उसने बेहोशी की स्थिति में पिता जी को एक कार में डाल कर मुहल्ले वालों को बताई कि वह उसे अस्पताल ले जा रही है । पिता जी को उसी स्थिति में पंजीयक कार्यालय ले जाकर उसका अंगूठा वसीयत में करवाई जबकि मेरे पिता जी रिटायर्ड शिक्षक थे । उसी तिथि को गंभीर स्थिति में पिता जी का चेकअप भी उसी ने करवाया है । जिसके कागजात हमारे पास ही है । नगर पालिका नबाब तक हमे किसी प्रकार का नोटिश नही दिया । काफी दिन टालने के बाद अब कह रहे हैं कि इस मामले में दोनो की ओर से अलग अलग मृत्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है । आगे कार्यवहीँ करने से दोनों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाना पड़ेगा , इसलिए मामले को ठंठे बस्ते में डाल दिये हैं और इस मकान का नामांतरण नही होगा । क्या ऐसा हो सकता है ? कहीं मेरी बहन के पक्ष में कोई एकतरफा कार्यवाही तो नही कर रहे ? नगर पालिका का बड़ा बाबू मेरे जीजा जी का मित्र है और साथ पढ़ा हुआ है । दो प्रमाण पत्र इसलिए बन गया क्योंकि मुझे नही पता था कि पहले से ही मेरी बहन ने इसी नगर पालिका में बनवा लिया है । जबकि मैंने पास के ही पैतृक गांव से बनवा लिया है । दोनो में एक ही तिथि और समय है ।


समाधान-

मृत्यु प्रमाण पत्र उस कार्यालय से जारी होगा जिस कार्यालय के क्षेत्राधिकार में मृतक की मृत्यु हुई है। इस कारण जो प्रमाण पत्र उस कार्यालय से जारी हुआ है जहाँ आप के पिता मृत्यु नहीं हुई है वह गलत है उसे निरस्त माना जाना चाहिए। आप सही कार्यालय से जारी प्रमाण पत्र की प्रतियाँ प्राप्त कर अपने उपयोग में ले सकते हैं।

यदि नगर पालिका नामांतरण नहीं कर रही है तो नगर पालिका को नोटिस दे कर नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद घोषणा व स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत किया जा सकता है। इस वाद में आप के पिता के सभी उत्तराधिकारी और नगर पालिका को पक्षकार बनाना होगा। यदि आप की बहिन संपत्ति को केवल अपने नाम नामान्तरण कराना चाहती है तो वह वसीयत के आधार पर उस का प्रतिवाद करेगी। आप वहाँ वसीयत को गलत साबित कर सकते हैं जिस से सभी उत्तराधिकारियों के नाम मकान का नामांतरण हो सके।

वसीयत को नामान्तरण में आपत्ति होने पर प्रोबेट करा लेना उचित है।

समस्या-

हितेश गोयल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी का देहांत 2002 में हो गया है तथा मेरे दादा जी का देहांत वर्ष 2014 में हो गया मेरे दादा जी ने वर्ष 2013 में अपनी रजिस्टर्ड वसीयत की थी जिसमे उन्होंने इस बात का उल्लेख किया की उनकी चारो पुत्रियों के विवाह उन्होंने सम्पन्न करा दिया है तथा उनके कर्तव्यों का निर्वहन हो चूका है तथा मेरे पिता जी के अलावा मेरे अन्य दो ताऊ जी को कुछ भी नहीं देना है तथा जो पक्का बना मकान है वो मेरे नाम हो तथा एक जमीन है जो मेरी माता जी के नाम हो! इस वसीयत में नामंतरण करवाने की लिए सभी वारिसों के हस्ताक्षर की बात कही जा रही है तथा मेरे दोनों ताऊजी को तथा एक बुआ को इस पर आपत्ति है! मैंने ऐसा सुना है की यदि इसे प्रोबेट करा लिया जाये तो यह संपत्ति बिना आपति के हस्तांतरित करवाई जा सकती है! कृपया उचित मार्गदर्शन प्रदान करे जिस से हम इस प्रकरण को जल्द से जल्द निपटा सके!

समाधान-

ब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उस की संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को समान रूप से प्राप्त होती है। लेकिन यदि मृतक ने वसीयत कर दी हो तब वसीयत के अनुसार प्राप्त होती है। नामांतरण की कार्यवाही में वसीयत के आधार पर नामांतरण का आवेदन आने पर यदि आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं तो राजस्व विभाग को यह अधिकार नहीं है कि वह इन आपत्तियों का निस्तारण कर सके। वसीयत को प्रमाणित करने पर वसीयत उचित है या नहीं यह केवल दीवानी न्यायालय ही तय कर सकता है। इसी कारण से प्रोबेट कराना उचित है। आप को प्रोबेट की यह सलाह स्वयं नामान्तरण करने वाले अधिकारी ने ही दी होगी।

प्रोबेट में सभी उत्तराधिकारियों के साथ साथ एक सामान्य सूचना समाचार पत्र के माध्यम से भी प्रकाशित होगी। उस के उपरान्त आप वसीयत को उस के गवाहों और उप पंजीयक या उस के कार्यालय के कर्मचारी के बयानों के आधार पर प्रमाणित करवा सकते हैं। प्रोबेट हो जाने पर राजस्व विभाग वसीयत के आधार पर नामान्तरण दर्ज कर देगा।

कोई भी अपनी स्वअर्जित संपत्ति को वसीयत कर सकता है।

समस्या-

अरविन्द कुमार ने बुन्दू झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा और चाचा एक माँ के हैं और मेरे पापा और चाचा के तीन बड़े भाई है जो कि सौतेले हैं। सौतेले हमें जमीन का हिस्सा सभी जगह नहीं दे रहे हैं और कही कहीं के जमीन पर उन्होंने अपने नाम से जमीन को करवा लिया है जो कि पहले दादा जी के नाम से थी।  तो मुझे सभी जगह जमीन का हिस्सा कैसे मिलेगा बताएं? इसका जवाब आप मेल में भी जरुर भेजे|

समाधान-

रविन्द जी, तीसरा खंबा की कानूनी सलाह सेवाएँ निःशुल्क हैं। हम जिन समस्याओं का उत्तर अपनी साइट पर देते हैं उन्हें मेल नहीं करते। आप को चाहिए कि आप साइट देखते रहें। जिन समस्याओं का उत्तर हम साइट पर नहीं दे सकते उन्हें अवश्य मेल करने की कोशिश करते हैं।

आप को जानना होगा कि आखिर आप के दादा की जमीन आप के तीन ताउओं को बिना बँटवारे के कैसे मिल गयी। कोई भी अपनी स्वअर्जित संपत्ति को वसीयत कर सकता है। हो सकता है दादा जी की यह जमीन उन की स्वअर्जित हो और उन्हों ने पहले ही आप के ताउओं के नाम वसीयत कर रखी हो। अक्सर ऐसा होता है कि जब व्यक्ति दूसरा विवाह करता है तो अपनी कुछ संपत्ति पहले विवाह की संतानों के नाम वसीयत कर देता है जिस से उन के साथ सौतेला व्यवहार न हो। यदि ऐसा है तो फिर आप को उस जमीन में कोई हिस्सा प्राप्त नहीं हो सकेगा। यदि वह जमीनें गलत तरीके से आप के ताउओं के नाम आ गयी है तो आप उन के नाम जमीन के नामान्तरण को चुनौती दे कर उसे निरस्त करवा सकते हैं। चूंकि हर राज्य का कृषि भूमि से संबंधित कानून भिन्न है इस कारण से आप को चाहिए कि इस मामले में स्थानीय वकीलों से परामर्श कर के उचित उपाय करें।

पर्याप्त तथ्यों के अभाव में दी गयी सलाह गलत भी हो सकती है।

rp_legal-education2.jpgसमस्या-

आदित्य शर्मा ने लखीमपुर खीरी, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मेरी बुआ श्रीमती जनक दुलारी शर्मा ने मुझे गोद लिया, लेकिन मैं अपने वास्तविक पिता के के साथ रहा। वे सरकारी सेवा में होने के कारण बाहर रहती थी। उन के नाम कोई संपत्ति नहीं है। लेकिन नकद, जेवर व सारी अचल संपत्ति उन के देवर के बेटे ने मार पीट कर ले ली। लेकिन फूफा जी के नाम एक प्रोपर्टी है जिस की वसीयत डर के भतीजी के नाम कर दी है। क्या मैं उस के लिए मुकदमा कर सकता हूँ?

समाधान-

प ने अपनी समस्या में बहुत सारे तथ्य स्पष्ट नहीं किए हैं। आप को कब गोद लिया गया है और किस विधि से गोद लिया गया है यह नहीं बताया है, क्या आप का गोदनामा पंजीकृत है? आप ने यह भी नहीं बताया कि आप की बुआ जीवित है या नहीं तथा फूफाजी मौजूद हैं या नहीं है और यदि नहीं हैं तो उन का देहान्त कब हुआ?

गोद लेने का परिणाम यह है कि आप गोद लिए जाने पर गोद लेने वाले दम्पत्ति की संतान हो जाते हैं और वही सब अधिकार प्राप्त हो जाते हैं जो एक पुत्र को होने चाहिए। यह एक शर्म की बात है कि एक पुत्र के होते हुए उस की मां के साथ मारपीट कर उस की अचल संपत्ति छीन ली गयी और उस के पति की छोड़ी हुई संपत्ति की वसीयत करवा ली गयी।

यदि बुआ मौजूद हैं और वे चाहती हैं कि उन की संपत्ति आप को प्राप्त हो तो वे पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकती हैं कि उन की संपत्ति छीन ली गयी है और जबरन वसीयत लिखा ली गयी है। वे वसीयत को निरस्त भी कर सकती हैं।

यदि आप ने उक्त नहीं बताए हुए तथ्य और बताए होते तो हम आप को स्पष्ट रूप से सलाह दे सकते थे। लेकिन पर्याप्त तथ्यों के न होने से हम कोई सटीक सलाह देने में असमर्थ हैं। पर्याप्त तथ्यों के अभाव में दी गयी सलाह गलत भी हो सकती है। बेहतर है कि आप किसी स्थानीय वकील से मिलें और अपने लिए समाधान उन से प्राप्त करें।

1930 में उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी और सहदायिक है।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

द्वारका ने बीकानेर राजस्थान से पूछा है-

मेरे परदादा जी ने सन 1926  में एक घर ख़रीदा।  परदादा जी की मृत्य 1930  के आस पास हो गई।   परदादा जी के एक लड़के मेरे दादाजी हुए।   दादाजी के चार लड़के तीन लडकियाँ हुईं।  दादाजी की मृत्यु सन 1983 में हो गई। अंकल ने सन 1988 में अपना हिस्सा लेने के लिए मेरे पिताजी पर विभाजन का मुकदमा किया। मुकदमा ख़ारिज हो गया।  अब अंकल के लड़के ने सन 2008 में मेरे दादा जी के नाम से अपने पिता के पक्ष में सन 1981 की एक फर्जी वसीयत बना कर घर को 2009 में बेच दिया। वसीयत में मेरी एक भुआ को 1981 में मरा हुआ बताया गया है जबकि मेरी भुआ मेरे दादा जी के 3 साल  बाद 1986 में  मरी है ,लेकिन  पुलिस ने इस बात को जाँच में शामिल नहीं किया।  हिन्दू उत्तराधिकार 1925 और हिन्दू उत्तराधिकार 1956  के अनुसार तो पुस्तैनी घर की वसीयत करने का दादा जी को अधिकार ही नहीं था।  दादाजी को उत्तराधिकार, परदादा जी की मृत्यु होने के बाद 1930 के आस पास में ही मिल गया था।   मामला 2009 से कोर्ट में चल रहा है। क्या घर पुस्तैनी कहलायेगा?  क्या दादा जी को पूरे घर की वसीयत करने का अधिकार था?  क्या कोर्ट इस तरफ भी ध्यान देगी कि घर तो पुस्तेनी है?

समाधान-

प का मकान पुश्तैनी और सहदायिक संपत्ति है। यह आप के दादा जी की निजि संपत्ति नहीं थी। जो भी दीवानी वाद अदालत में लंबित है उस में आप को वसीयत को भी चुनौती देनी चाहिए। क्यों कि वसीयत के कंटेंट गलत हैं और कोई भी पिता अपनी जीवित पुत्री को मृत घोषित नहीं कर सकता। उस के गवाह आदि को जिरह करने पर वसीयत भी गलत साबित हो सकती है।

सहदायिक संपत्ति में पुत्रों का जन्म से अधिकार होता है। इस कारण आप के दादा जी द्वारा की गयी संपूर्ण सम्पत्ति की वसीयत कानून के विपरीत है। आप के दादाजी उन के अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे, पूरी संपत्ति की नहीं।

फिर भी इस प्रकरण में अन्य अनेक जटिल बिन्दु आ सकते हैं, बल्कि अनिवार्य रूप से आएंगे। इस कारण आप का वकील ऐसा होना चाहिए जो कानून की नवीनतम व्याख्याओं की जानकारी रखता हो और लगातार नयी जानकारियाँ हासिल कर पैरवी करता हो। आप को भी विशेष रूप से एलर्ट रहने की जरूरत है। अनेक बार मुवक्किल की सुस्ती और नवीनतम कानूनी व्याख्याओं की जानकारी न होने से भी मुकदमें में हार का मुहँ देखना पड़ता है।

पुश्तैनी सम्पत्ति मेंं हिस्से की वसीयत की जा सकती है।

Farm & houseसमस्या-

अविनाश कुमार सिंह ने गमरिया मेयारी बाजार, नोखा, सासाराम, बिहार से पूछा है-

मेरे दादा के नाम पुश्तैनी जमीन है, क्या वे किसी के नाम वसीयत कर सकते हैं? उन के दो लड़के थे जिन की मृत्यु हो चुकी है दोनों के एक एक लड़के हैं।

समाधान-

हिन्दुओं के पास दो तरह की संपत्तियाँ हो सकती हैं। एक पुश्तैनी और दूसरी स्वअर्जित संपत्ति। 17 जून 1956 के पूर्व तक सामान्य कानून यह था कि जो भी संपत्ति किसी पुरुष को अपने किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह पुश्तैनी है और उस में पुत्रों का अधिकार जन्म से ही है। 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होने पर ऐसा नहीं रहा। जो संपत्ति उक्त अधिनियम प्रभाव में आने के पूर्व पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति हो गयी थी वह तो सहदायिक रही और उस में पुत्रों का जन्म से अधिकार रहा। लेकिन उत्तराधिकार में प्राप्त जो संपत्ति पहले से पुश्तैनी या सहदायिक नहीं थी वह पुश्तैनी या सहदायिक नहीं रही।

यदि आप के दादा जी के पास उक्त संपत्ति पुश्तैनी / सहदायिक थी तो उस में उन के मृत पुत्रों के परिवार का भी हिस्सा है। इस कारण वे उस संपूर्ण सम्पत्ति की वसीयत नहीं कर सकते। पुश्तैनी संपत्ति में जो हिस्सा दादा जी का बनता है उसे वे वसीयत कर सकते हैं।

यदि उक्त संपत्ति दादा जी को प्राप्त होने के समय सहदायिक या पुश्तैनी नहीं थी तो दादा जी पूरी संपत्ति की वसीयत कर सकते हैं।

वसीयत से उत्तराधिकारी वंचित होते हैं।

Willसमस्या-

राम भजन सिंह ने ग्राम और पोस्ट जरहा, थाना बीजपुर, जिला सोनभद्र, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे बड़े पिता जी के दो पत्नियाँ थीं और दोनों के एक एक लड़की हुई। पिता जी की मृत्यु  के बाद पहली वाली पत्नी के अकेले अपनी लड़की को वसीयत लिख दी क्या सेकेंड वाली पत्नी के लड़की को हिस्सा नहीं मिलना चाहिए।

समाधान-

प की बात ही समझ नहीं आ रही है। वसीयत किस ने लिखी है बड़े पिता जी ने या पहले वाली पत्नी ने? हम आम तौर पर ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते जो अपने आप में स्पष्ट नहीं होते। पर आप के प्रश्न का उत्तर इस कारण से दे रहे हैं कि लोगों को उत्तराधिकार के अधिकार में और वसीयत में भेद के बारे में बताया जा सके।

वसीयत हमेशा व्यक्ति अपने जीवनकाल में करता है कि उस की मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति का क्या किया जाए। यदि कोई व्यक्ति वसीयत नहीं करता है तो उत्तराधिकार के नियम के हिसाब से उस के उत्तराधिकारियों को संपत्ति प्राप्त होती है। व्यक्ति सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में अपने अधिकार को भी वसीयत कर सकता है।

हिन्दू विधि में 1955 से दूसरा विवाह करना वैधानिक नहीं रहा है। इस कारण आप के बड़े पिता का दूसरा विवाह यदि  1955 के बाद हुआ था और पहले वाली पत्नी जीवित थी तो वह अवैध था। हालांकि इस का असर दूसरी पत्नी की संतान पर बस इतना ही होगा कि पुश्तैनी संपत्ति में उस का अधिकार नहीं होगा।

यदि किसी ने अपनी स्वअर्जित संपत्ति की वसीयत अपनी संतानों में से किसी एक के नाम कर दी है तो अन्य संतानें स्वतः ही वंचित हो जाएंगी। आप के मामले में यदि आप के बड़े पिता जी ने वसीयत से अपनी संपत्ति बड़ी पत्नी की पुत्री को दे दी है तो फिर अन्य उत्तराधिकारियों को कुछ नहीं मिलेगा और यह कानूनन है।

अपने उत्तराधिकार के बारे में शंका होने पर वसीयत कर दें।

Willसमस्या-

राजू ने सवाई माधोपुर राजस्थान से पूछा है-

मेरी पत्नी के कोई औलाद नहीं होने पर टेस्ट टयूब बेबी का इलाज लिया जो सफल नहीं होने पर एक बच्चा अनाथालय से गोद लिया। बच्चा गोद लेते ही मेरी पत्नी अपने परिवार वालों से मिलकर मेरे घर को छोडकर चली गयी तथा मेरे व भाई के उपर 498अ, 406 व 323 का मुकदमा दर्ज करा दिया। इसी बीच मेरा कोर्ट से तलाक हो गया। उसने भरण पोषण का मुकदमा दर्ज करा दिया जिसमें 10 हजार रूपये महिने का भरण पोषण का आदेश करा लिया। मैं गम्भीर बीमारी से ग्रस्त हूँ। मेरी मृत्यु के पश्चात क्या मेरी पूर्व पत्नी मेरी सम्पति में से हिस्सा बँटवा सकती है।

समाधान-

प अपनी पूर्व पत्नी से तलाक ले चुके हैं इस कारण अब आप की पूर्व पत्नी आप की पत्नी नहीं रही है और उसे  आप की संपत्ति में किसी प्रकार का कोई उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस कारण वह आप की संपत्ति पर किसी प्रकार का कोई दावा नहीं कर सकती है। आप एक बच्चा गोद ले चुके हैं इस कारण वही एक मात्र उत्तराधिकारी रह गया है। आप के जीवनकाल के उपरान्त वही आप की संपत्ति का एक मात्र उत्तराधिकारी होगा।

फिर भी किसी भी तरह की शंका आप को हो तो आप अपनी समूची सम्पत्ति की वसीयत आप के गोद पुत्र के नाम कर के उसे उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा सकते हैं। यदि गोद पुत्र अभी नाबालिग है तो आप को चाहिए कि आप अपने जीवनकाल के बाद उस के संरक्षक की नियुक्ति भी उसी वसीयत मे कर दें।

मौखिक वसीयत को साबित करना लगभग असंभव है।

Willसमस्या-

जयपुर राजस्थान से जगदीश ने पूछा है-

मेरी माँ ने अपने पिता (मेरे नाना) से उनके मकान का आधा हिस्सा खरीदा।  मेरी माँ ने इसकी मौखिक वसीयत मेरे नाम कर दी। जिसको मेरे सभी भाइयों ने तथा पिता ने भी मानने से मना कर दिया है।  मेरी माता का निधन हो चुका है, अब इस संपाति में मेरे पिता हम तीन भाई तथा एक बहिन हैं। हमारा सभी का इस संपात्ति में कितना कितना हिस्सा बनता है?  क्या मैं उस मौखिक वसीयत के आधार पर कुछ दावा कर सकता हूँ? जब कि मेरे परिवार (भाई भाभी पिता) के अलावा उसका कोई गवाह नहीं है।

समाधान-

प की समस्या मौखिक वसीयत है। वसीयत मौखिक, लिखित, पंजीकृत या अपंजीकृत कैसी भी क्यों न हो, यदि वह वसीयतकर्ता के देहान्त के उपरान्त किसी व्यक्ति द्वारा विवादित की जाती है तो उस वसीयत का प्रमाणीकरण आवश्यक है।

वसीयत के लिए यह आवश्यक है कि उसे स्वैच्छा से किया गया हो। वसीयत करने के कम से कम दो गवाह हों। लिखित वसीयत में वसीयत कागज पर अंकित होती है जिस पर खुद वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर या अंगूठा निशानी होता है और कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर होते हैं। इस तरह यदि लिखित वसीयत का कोई गवाह पलटना भी चाहे तो आसान नहीं होता। लेकिन मौखिक वसीयत में तो यह सब अत्यन्त कठिन ही नहीं लगभग असंभव है।

आप का कहना है कि मौखिक वसीयत के गवाह सिर्फ पिता, भाई व भाभी हैं। वसीयत उन तीनों के हितों के विरुद्ध है। इस कारण उन का मौखिक वसीयत से इन्कार कर देना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में आप अपनी माँ की मौखिक वसीयत को साबित नहीं कर सकेंगे।

जहाँ तक उक्त संपत्ति में उत्तराधिकारियों के हिस्से का प्रश्न है तो इस में तीन भाई, एक बहिन व पिता उत्तराधिकारी हैं वैसी स्थिति में कुल पाँच हिस्सेदार हैँ और प्रत्येक हिस्सेदार के हिस्से में संपत्ति का पाँचवाँ 1/5 हिस्सा आएगा, आप को संपत्ति का 1/5 हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार है।

वसीयत उत्तराधिकार के अधिकार को समाप्त कर देती है।

Willसमस्या-

सारिका राजपूत ने रतलाम (म.प्र.) से पूछा है-.

मेरे माता पिता ने मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति की वसीयत मेरे नाम कर दी। उनका देहांत हो गया है अब मेरे दोनों भाई उस ज़मीन में अपना हिस्सा माँग रहे हैं। मेरा तलाक हो चुका है मैं अपने माता पिता के साथ रहती थी। वसीयत रजिस्टर्ड है तो क्या वसीयत के बाद भी उनको हिस्सा मिलेगा या नहीं।

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की स्वअर्जित संपत्ति उस की स्वयं की संपत्ति होती है और उस व्यक्ति के जीते जी किसी भी व्यक्ति का उस में हिस्सा नहीं होता। यदि विवादित संपत्ति पुश्तैनी संपत्ति नहीं थी, अर्थात 17 जून 1956 के पूर्व उत्तराधिकार में आप के पिता या दादा को प्राप्त नहीं हुई थी तो वह आप के पिता के पूर्ण स्वामित्व की संपत्ति थी और उस में आप के भाइयों का कोई अधिकार नहीं था।

किसी भी व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त उस की संपत्ति का दाय उस पर प्रभावी व्यक्तिगत विधि के अनुसार होता है। आप के पिता हिन्दू थे इस तरह यदि आप के पिता ने अपनी संपत्ति की वसीयत नहीं की होती तो उन की संपत्ति का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होता तब आप के भाइयों का उस में अधिकार होता। आप के पिता पंजीकृत वसीयत से वह संपत्ति आप को वसीयत कर गए हैं तो अब उस संपत्ति की स्वामिनी आप हैं। आप के भाइयों का उस संपत्ति में हिस्से का दावा गलत है। यदि वे न्यायालय में दावा करते भी हैं तब भी वे असफल होंगे। आप रजिस्टर्ड वसीयत के आधार पर संपत्ति पर अपना स्वामित्व साबित कर सकती हैं।

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