Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

दादी उन के पति से मिले हिस्से की वसीयत कर सकती है।

समस्या-

योगेश सोलंकी ने नामली (रतलाम), मध्य्प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मारे दो मकान ओर एक खेत हैं। कुछ महीनों पूर्व ही मेरी दादी की मृत्यु हुई है और मेरी दादी ने एक रजिस्टर्ड वसीयतनामा किया है उसमें एक बड़ा मकान और वो खेत मेरे चाचा के नाम किया गया और सिर्फ छोटा मकान मेरे पापा को दिया गया। जबकि खेत मेरी दादी के नाम का था और दोनों मकान नगर परिषद में के रजिस्टर में और रजिस्ट्री भी मेरे दादाजी के नाम से है और कानूनी तौर पर भी दोनों मकान मेरे दादा जी के नाम से है। वसीयत सिर्फ खुद की खरीदी हुई या स्वअर्जित संपत्ति पर ही की जाती है। तो ये जो वसीयत की गई वो सही है या गलत और मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प बिलकुल सही हैं। दादाजी के नाम की जो संपत्ति है उस का उत्तराधिकार तो दादाजी के समय ही निश्चित हो गया। यदि आप के दादाजी के दो पुत्र ही हैं और कोई पुत्री नहीं थी तो उन की समूची संपत्ति उन के देहान्त पर तीन हिस्सों में विभाजित हो कर एक एक हिस्सा दादी और आप के पिता और चाचा को मिलना चाहिए। इस तरह दोनों मकानों का एक तिहाई हिस्सा आप के पिता को मिला, एक चाचा को और एक दादी को। अब यदि दादी उन मकानों की वसीयत नहीं कर सकती है तो भी वह अपने हिस्से की वसीयत कर सकती है। इस तरह मकानों का 2/3 हिस्सा चाचा को मिलेगा और जमीन दादी के नाम होने से वसीयत से चाचा को मिलेगी।

अब आप को खुद सोचना चाहिए कि अभी जो मकान मिला हुआ है वह दोनों मकानों के मूल्य के एक तिहाई से अधिक मूल्य का है तो कुछ भी करने में कोई लाभ नहीं है। और यदि लड़ाई लड़ी जाए और फिर भी इतना ही अधिक मिले की उस से केवल लड़ाई का खर्च भी न निकले तो लड़ाई लड़ने से कोई लाभ नहीं।

विवाद होने पर भी पति पत्नी का उत्तराधिाकारी है, यदि उसे वसीयत से उत्तराधिकार प्राप्त करने से वंचित न कर दिया गया हो।

समस्या-

इति श्रीवास्तव ने रांची , झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता का देहांत 2013 में हुआ, वे माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका के पद पर पिछले 30 सालों से अधिक से कार्यरत थीं। 2015 में वह रिटायर होने वाली थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी तीन पुत्रियों में से किसी को भी अब तक उनके सेवा से जुड़ी कोई भी राशि प्राप्त नहीं हुई है। जब मैं जे.डी. ऑफिस गई तो मुझे यह बताया गया कि तीनों लड़कियों में से किसी एक को नौकरी मिलेगी और मेरे पिता को पेंशन मिलेगी हालांकि मेरी माता के अन्य बकाया के सम्बंध में कोई बात नहीं की गई। मेरी माता का मेरे पिता से कोई लेना-देना नहीं था, हालांकि दोनों में तलाक नहीं हुआ था, और माँ की सेवा पंजिका में भी उनका नाम है जिसे वो हटाना चाहती थीं लेकिन हटा नहीं सकीं। मेरे पिता कोऑपरेटिव सोसायटी, इलाहाबाद में क्लर्क हैं। मेरी माँ की मृत्यु के समय हम तीनों बहने बेरोजगार थीं और माँ के रिश्तेदारों के घर में रहती थीं। हालांकि 2015 में मुझे केंद्र सरकार में नौकरी मिल गई। पर अन्य दोनों बहनें कम सैलरी पर प्राइवेट जॉब करती हैं और कभी-कभी छोड़ना भी पड़ता है। माँ की जगह पर नौकरी हम तीनों ही नहीं करना चाहते हैं। हम तीनों अविवाहित हैं। अभी हमारी माँ की एक पैतृक अचल सम्पत्ति बिकी उसमें से माँ के रिश्तेदारों, जिनका हिस्सा भी उस सम्पत्ति में था, ने यह कहकर की कानून के अनुसार उनको एक हिस्सा मिलेगा, हमारे शेयर में से पिता को एक हिस्सा दिया जबकि हमलोग उनसे कोई मतलब नहीं रखते। अब मेरे सवाल हैं कि, मेरी माँ के विभाग से नियमतः हम तीनों को किस-किस मद में पैसे मिलने हैं। और एल आई सी तो मुझे पता क्या उनका कोई और भी देय बनता है? उनके पैसे को प्राप्त करने के लिए क्या कागजी कार्रवाई करनी होगी? कैसे मैं अपने पिता को कुछ भी लाभ प्राप्त होने से रोक सकती हूँ, क्योंकि मेरी माँ उनको पैसे नहीं देना चाहती थीं, उनका नाम सेवा पंजिका में सिर्फ इसलिए देना पड़ा क्योंकि हमतीनों नाबालिग थे। और पिता के नाम के नीचे हमतीनों के नाम भी लिखे हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती हूं कि उन्होंने हमारा देय अभी तक नहीं दिया, मेरी माँ की मृत्यु के 4 साल बाद भी! यदि मेरी नौकरी न लगती तो हम तीनों बहनों की हालत दयनीय होती क्योंकि हमारे पिता ने कभी हम पर या माँ पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हम लड़कियां थे। लेकिन मेरी माँ के सारे पैसे लेने के लिए वो प्रयास कर रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या और आप के तर्क वाजिब हैं लेकिन संपत्ति आदि का जो भी निपटारा होना है वह कानून के अनुसार ही होना है। आप की माताजी की मृत्यु के समय तक उन का आप के पिता से तलाक नहीं हो सका था। इस कारण आप की माताजी के उत्तराधिकारियों में आप तीनों बहनों के साथ साथ आप के पिता भी शामिल हैं। उन की जो भी बकाया राशि विभाग, बीमा विभाग, जीवन बीमा, प्रावधायी निधि विभाग और बैंक आदि में मौजूद हैं उन्हें प्राप्त करने का अधिकार आप चारों को है। आप चारों प्रत्येक ¼ हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

यदि आप की माताजी का पिता से विवाद चल रहा था तो उन्हें चाहिए था कि वे अपनी वसीयत लिख देतीं जिस में अपनी तमाम संपत्ति को आप तीनों बेटियों को वसीयत कर सकती थीं और आप के पिता को उत्तराधिकार से वंचित कर सकती थीं। लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया जिस के कारण आपके पिता भी उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उन्हें यह सब राशियाँ प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है लेकिन वे कानूनी रूप से अधिकारी हैं।

यदि कहीं या सभी स्थानों पर नामांकन आप के पिता का है तो वे यह सारी राशि प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि नोमिनी हमेशा एक ट्रस्टी होता है औऱ उस का कर्तव्य है कि वह राशि को प्राप्त कर के मृतक के सभी उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के हिसाब से वितरित करे। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नोमिनी सारी राशि प्राप्त कर के उस पर कब्जा कर के बैठ जाता है और बाकी उत्तराधिकारियों को अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस कारण आप को चाहिए कि आप अपनी माताजी के विभाग, प्रावधायी निधि विभाग, कर्मचारी बीमा विभाग और जीवन बीमा व बैंक आदि को तीनों संयुक्त रूप से लिख कर दें कि नोमिनी होने पर भी आपके पिता को किसी राशि का भुगतान नहीं किया जाए क्यों कि ऐसा करने पर वे आप को आप के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

आप स्वयं अपनी माता जी के विभाग में जा कर संबंधित विद्यालय या जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से पता कर सकती हैं कि आप की माताजी की कौन कौन सी राशियाँ विभाग के पास बकाया हैं। उन राशियों का मूल्यांकन भी आप पता सकती हैं। यदि समस्या आए तो आप सूचना के अधिकार का उपयोग कर के विभाग से ये सूचनाएं प्राप्त कर सकती हैं। जब आप को पता लग जाए कि कौन कौन सी राशिया विभाग और अन्यत्र बकाया हैं तो आप उन सब के लिए जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हैं।  इस के साथ ही जिला न्यायालय में आवेदन कर के विभाग/ विभागों के विरुद्ध यह आदेश भी जारी करवा सकती हैं उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनने के पहले किसी को भी आप की माताजी की बकाया राशियों का भुगतान नहीं किया जाए।

इस मामले में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद लेनी होगी। इस कारण बेहतर है कि किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के मुताबिक यह काम करें।

आप तीनों अनुकम्पा नियुक्ति नहीं चाहती हैं, आप के पिता की अनापत्ति के बिना आप  में से किसी बहिन को अनुकम्पा नियुक्ति मिल भी नहीं सकती थी। आप की अनापत्ति के बिना आप के पिता को नहीं मिलेगी। वैसे भी वे अब नौकरी प्राप्त करने की उम्र के नहीं रहे होंगे।

वसीयतकर्ता की मृत्यु के समय मौजूद संपत्ति के संबंध में वसीयत प्रभावी रहेगी।

समस्या-

नीलेश ने रॉबर्ट्सगंज, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी जमींदार थे। सन 2001 में उन्होंने एक रजिस्टर्ड वसीयत लिखी थी। पर उसे सम्पत्ति में से आधा हिस्सा 2003 में उन्होंने ही बेच दिया। क्या यह वसीयत मान्य होगी?

समाधान-

सीयत के संबंध में विधि यह है कि कोई भी व्यक्ति वसीयत कर सकता है। अपने जीवनकाल में उसे बदल सकता है, एक से अधिक वसीयत होने पर अन्तिम वसीयत मान्य होगी। यदि आप के दादा जी ने एक ही वसीयत की है जो पंजीकृत भी है तो वह मान्य होगी।

यदि वसीयत की गयी संपत्तियों में से कोई संपत्ति वसीयतकर्ता द्वारा विक्रय कर दी गयी है तो वैसी स्थिति में जो  भी संपत्ति वसीयतकर्ता की मृत्यु के समय मौजूद होगी वह वसीयती को प्राप्त होगी। इस कारण आपके दादा जी की वसीयत उन संपत्तियों के संबंध में जो कि उन की मृत्यु के समय मौजूद थीं प्रभावी रहेगी।

नामान्तरण निरस्ती को दीवानी न्यायालय में चुनौती दें।

समस्या-

डॉ. मोहन कुमार वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रेदश से  समस्या भेजी है कि-

मैंने नगरपालिका सीएमओ को नामांतरण हेतु आवेदन किया, जिसमें मैंने पिता की पंजीकृत वसियत एवं अनुप्रमाणित गवाह की फोटोकॉपी प्रस्तुत की। इस पर मेरे भाई बहनों ने आपत्ति दर्ज कराई।  उन्होंने बटवारा विलेख नोटरी का प्रस्तुत किया जिस पर सलाहकार ने टीप दिया कि आवेदक ने पंजिकृत वसीयत दिया जिस पर न्यायालय का स्टे नहीं है अतः नामांतरण में आपत्ति नहीं है। न.पा.शुजालपुर पी.आइ.सी. की बैठक में नामांतरण स्वीकार हो मेरा नामांतरण होगया। तत्पश्चात मैंने वर्ष 2011-12 से 2016-17 तक संपत्ति कर प्रति वर्ष जमा किया। वर्ष 17-18 का सं.कर जमा करने गया तो मालुम हुआ कि मेरा नामांतरण निरस्त कर मेरे पिताजी का नाम अंकित कर दिया गया। शायद आपत्तिकर्ताओं ने अधिकारियों से साठगांठ करके मेरे नामांतरण अवैध रूप से निरस्त करा दिया अब मुझे क्या कार्यवाही करना चाहिए?

समाधान-

क बार आप के पक्ष में हो चुका नामान्तरण बिना आप को सुनवाई का अवसर दिए निरस्त नहीं हो सकता था। नगरपालिका ने गलती की है। आप नगर पालिका को इस मामले में नगरपालिका अधिनियम के अंतर्गत नोटिस दें कि उन्हों ने नामान्तरण को निरस्त कर के गलती की है। यदि वे नामान्तरण निरस्तीकरण का आदेश वापस न ले कर नामान्तरण आप के नाम नहीं करते हैं तो आप दीवानी अदालत में नगर पालिका के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित करेंगे।

नोटिस देने के उपरान्त दो माह की अवधि व्यतीत हो जाने पर आप नगर पालिका के विरुद्ध उक्त नामान्तरण निरस्तीकरण को हटाने का व्यादेश पारित करने तथा इस आशय की घोषण करने का वाद संस्थित करें कि पंजीकृत वसीयत से पिता की मृत्यु के बाद आप स्वामी हो गए हैं। इस मामले में वाद संस्थित करने के लिए किसी अच्छे वकील की सेवाएँ प्राप्त करें।

नामिनी ट्रस्टी होता है मृतक की संपत्ति का वसीयती या उत्तराधिकारी नहीं।

समस्या-

प्रशान्त वर्मा ने नवाकपुरा, लंका, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी हमसे पिछले 21 वर्षों से अलग रह रही है। मेरी माँ की मृत्यु के पश्चात मुझे अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी मिली। अब मेरी पत्नी चाहती है कि मेरी सेवा पुस्तिका और अन्य अभिलेखों में नामिनी के तौर पर उसका नाम दर्ज हो।  जबकि मैं ने अपने प्रधान लिपिक से इस बारे मे बात की तो उन्होंने कहा कि यह कर्मचारी के ऊपर निर्भर करता है कि वह किसे नामिनी बनाए। क्या यह मुझ पर निर्भर है मैं किसे नामिनी बनाऊँ या यह पत्नी का अधिकार है?  जबकि मेरी पत्नी हमसे मुक़दमा भी लड़ती है 125 दं.प्र.सं. 498 भा.दं.सं के मुकदमे किए हैं मैं माननीय उच्च न्यायालय के आदेश से अपनी पत्नी को हर माह 1500/ प्रति माह देता हूँ। उसने ये भी कहा है कि उसे विभाग द्वारा पैसा दिलवाया जाए। कृपया उचित मार्गदर्शन करे।

समाधान-

धिकांश लोगों को यह नहीं पता कि सरकारी विभाग में, पीएफ के लिए या बीमा के लिए नॉमिनी क्यों बनाए जाते हैं। आप को और आप की पत्नी को भी संभवतः यह पता नहीं है। इस कारण सब से पहले यह जानना आवश्यक है कि नॉमिनी का अर्थ क्या है।

नौकरी करते हुए किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो उस का वेतन व अन्य लाभ नियोजक के यहाँ अथवा सरकारी विभाग की ओर बकाया रह जाते हैं। इस राशि को प्राप्त करने का अधिकार उस कर्मचारी के कानूनी उत्तराधिकारियों का है। लेकिन उत्तराधिकारियों की स्थिति हमेशा बदलती रहती है। हो सकता है मृत्यु के कुछ दिन पूर्व ही कर्मचारी को संतान हुई हो लेकिन उस का नाम विभाग में दर्ज न हो। मृत्यु के बाद अक्सर उत्तराधिकारियों के बीच इस बात की होड़ भी लगती है कि मृतक की संपत्ति में से अधिक से अधिक उसे मिल जाए। इस कारण विभाग या कर्मचारी या बीमा विभाग या भविष्य निधि विभाग किसे उस राशि का भुगतान करे यह तय करना कठिन हो जाता है। इस के लिए नॉमिनी की व्यवस्था की जाती है। नॉमिनी की नियुक्ति एक ट्रस्टी के रूप में होती है। जिस का अर्थ यह है कि विभाग किसी कर्मचारी या बीमा कर्ता की मृत्यु के उपरान्त कर्मचारी की बकाया राशियाँ नॉमिनी को भुगतान कर दे। नॉमिनी का यह कर्तव्य है कि वह उस राशि को प्राप्त कर उसे मृतक के उत्तराधिकारियों के मध्य उन के कानूनी अधिकारों के अनुसार वितरित कर दे। इस तरह नॉमनी हो जाने मात्र से कोई व्यक्ति किसी की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हो जाता, अपितु उस का दायित्व बढ़ जाता है। लेकिन समझ के फेर में लोग समझते हैं कि किसी का नॉमिनी नियुक्त हो जाने से वह मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति का अधिकारी हो जाएगा। जब नॉमिनी को संपत्ति मिल जाती है तो वह उसे मृतक के उत्तराधिकारियों में नहीं बाँटता और उत्तराधिकारी अपने अधिकार के लिए नॉमनी से लड़ते रह जाते हैं और मुकदमेबाजी बहुत बढ़ती है।

यदि किसी व्यक्ति को अपनी मृत्यु के उपरान्त अपनी संप्तति किसी व्यक्ति विशेष को देनी हो तो वह उस के नाम वसीयत लिखता है। नोमिनी वसीयती या उत्तराधिकारी नहीं होता। इस कारण नॉमिनी उसी व्यक्ति को नियुक्त करें जो मृत्यु के पश्चात आप की संपत्ति को पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ आप के उत्तराधिकारियों में कानून के अनुसार वितरित कर दे। यह पूरी तरह आप की इच्छा पर निर्भर करता है कि आप किसे अपने नोमिनी नियुक्त करते हैं।

व्यर्थ मुकदमे में भी प्रतिरक्षा करना जरूरी है।

समस्या-

शिवानी ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे ताऊजी का अपनी पत्नी से 2008 से घरेलू हिंसा का मुकदमा चल रहा है, जिस में न्यायालय ने सितम्बर 2016 में निर्णय देते हुए भरण पोषण के लिए 5000 रूपये प्रति माह देने और 20000 रुपए एक मुश्त क्षतिपूर्ति देने के लिए कहा है। ताऊजी सेंट्रल गवर्नमेंट के पेंशनर है और चलने फिरने उठने बैठने में असमर्थ है। उनके कोई संतान नहीं है। लड़का था, उसकी मृत्यु 2005 में रोड एक्सीडेंट में हो गयी थी। ताऊजी की देखभाल मेरी माँ करती है । वह भी केंद्रीय कर्मचारी है । मेरे पिताजी की भी मृत्यु हो चुकी है 1994 में। मेरे चाचा भी हैं हम सभी एक घर में रहते हैं। चाचा ने बटवारे का मुकदमा दर्ज किया था 2008 में, जिस में  प्राथमिक डिक्री 2011 में हुई जिसमें चाचा का एक तिहाई हिस्सा घोषित किया गया। फाइनल डिक्री के लिए मेरी माँ की तरफ से 2017 जनवरी में आवेदन दिया गया है जो विचाराधीन है। मैं जानना चाहती हूँ की क्या ताऊ जी के हिस्से में ताईं जी का भी हिस्सा बनता है? ताऊजी के मरने के बाद ताऊ जी ने अपनी रजिस्टर्ड वसीयत मेरे यानि अपनी भतीजी के नाम कर रखी है। ताईजी क्या हिस्से की मांग कर सकती है। डाइवोर्स का केस ख़ारिज हो चुका है। ताई जी का कहना है कि वह परेशान करने के लिए ये सब कर रही है, मुझे कुछ मिले न मिले वकीलो को दिलवाऊंगी और भरना पोषण के लिए और ज्यादा पैसों की मांग के लिए 127 में केस करुंगी। ताऊजी की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है मार्गदर्शन करें।क्योंकि मेरी माँ ही उनकी देखभाल करती है तो यदि ताऊजी को कुछ हो जाता है तो उसमें मेरी माँ को तो कोई दिक्कत नहीं हो जायेगी। क्योंकि ताई जी ने माँ के ऊपर भी ताऊजी से सम्बन्ध के आरोप लगाए हैं।

समाधान-

केवल आरोप लगा देने से कोई चीज सिद्ध नहीं हो जाती। और कानूनी निर्णय और अधिकार ठोस सबूतों पर निर्भर करते हैं। आप की माँ पर आरोप लगा देने से उन का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। उन्हें कानून की तरफ से कोई परेशानी नहीं होगी। ताऊजी का जो हिस्सा है यदि उन्हों ने उसे वसीयत कर दिया है तो उस का दाय वसीयत के अनुसार होगा बशर्ते कि ताऊजी और कोई वसीयत न करें या की हुई वसीयत में अपने जीवनकाल में कोई बदलाव न करें।

जहाँ तक नाराज और बदले पर उतारू ताईजी का प्रश्न है तो वे कुछ भी कर सकती हैं। वे जितने चाहें मुकदमे करें। आप और आप की माँ पर उस का कोई असर नहीं होगा। हाँ वे यह कर सकती हैं ताऊजी के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत को चुनौती दे दें। तब आप को फिजूल में मुकदमा लड़ना पड़ सकता है। आप को कोई अन्य फर्क नहीं पड़ेगा। पर यह भी याद रखें कि यदि किसी के विरुद्ध बेकार और बेदम मुकदमा भी होता है और उस में प्रतिरक्षा ठीक से न की जाए तो उस से नुकसान भी हो सकता है। इस लिए सावधान रहना और अपनी प्रतिरक्षा करने की सजगता रखना आप के लिए आवश्यक है।

जिस जन्म-मृत्यु पंजीयक कार्यालय के क्षेत्राधिकार में मृत्यु हुई है वही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर सकता है।

समस्या-

कमल शुक्ला ने जंजगीर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


दो वर्ष पूर्व मेरे पिता जी की देखभाल के लिए जांजगीर शहर में हमने एक आबादी भूमि में स्थित मकान खरीदा । इसके लिए तीनो भाई ने और पिता जी ने खर्च किया । नगर पालिका में पिता जी के नाम से नामांतरण कराया । पिता जी की देखभाल मेरे जिम्मे थी । पर अक्टूबर से नवंबर महीने में मुझे एक सम्मान समारोह में अमेरिका जाना हुआ । इस बीच मेरे 84 वर्षीय पिता जी की देखभाल के लिए मैंने वही पड़ोस में रहने वाली अपनी बहन को सौंपा था । इस बीच मे पिता जी का स्वास्थ्य खराब हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी । मैं अपनी यात्रा स्थगित कर लौट आया और मृतक संस्कार के बाद हम तीनो भाइयों ने दिसम्बर में नामांतरण हेतु अर्जी दी , शुल्क पटाया । इश्तहार प्रकाशन के दो माह बाद भी नगर पालिका से कोई जवाब नही आने पर सम्पर्क किया तो उन्होंने बताया कि हमारे आवेदक पर आपत्ति आया है । पता चला कि मेरी बहन ने पिता जी से उनकी बीमारी की स्थित में मृत्यु से 15 दिन पूर्व वसीयत कराया हुआ है । वसीयत की तिथि के दिन उसने बेहोशी की स्थिति में पिता जी को एक कार में डाल कर मुहल्ले वालों को बताई कि वह उसे अस्पताल ले जा रही है । पिता जी को उसी स्थिति में पंजीयक कार्यालय ले जाकर उसका अंगूठा वसीयत में करवाई जबकि मेरे पिता जी रिटायर्ड शिक्षक थे । उसी तिथि को गंभीर स्थिति में पिता जी का चेकअप भी उसी ने करवाया है । जिसके कागजात हमारे पास ही है । नगर पालिका नबाब तक हमे किसी प्रकार का नोटिश नही दिया । काफी दिन टालने के बाद अब कह रहे हैं कि इस मामले में दोनो की ओर से अलग अलग मृत्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है । आगे कार्यवहीँ करने से दोनों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाना पड़ेगा , इसलिए मामले को ठंठे बस्ते में डाल दिये हैं और इस मकान का नामांतरण नही होगा । क्या ऐसा हो सकता है ? कहीं मेरी बहन के पक्ष में कोई एकतरफा कार्यवाही तो नही कर रहे ? नगर पालिका का बड़ा बाबू मेरे जीजा जी का मित्र है और साथ पढ़ा हुआ है । दो प्रमाण पत्र इसलिए बन गया क्योंकि मुझे नही पता था कि पहले से ही मेरी बहन ने इसी नगर पालिका में बनवा लिया है । जबकि मैंने पास के ही पैतृक गांव से बनवा लिया है । दोनो में एक ही तिथि और समय है ।


समाधान-

मृत्यु प्रमाण पत्र उस कार्यालय से जारी होगा जिस कार्यालय के क्षेत्राधिकार में मृतक की मृत्यु हुई है। इस कारण जो प्रमाण पत्र उस कार्यालय से जारी हुआ है जहाँ आप के पिता मृत्यु नहीं हुई है वह गलत है उसे निरस्त माना जाना चाहिए। आप सही कार्यालय से जारी प्रमाण पत्र की प्रतियाँ प्राप्त कर अपने उपयोग में ले सकते हैं।

यदि नगर पालिका नामांतरण नहीं कर रही है तो नगर पालिका को नोटिस दे कर नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद घोषणा व स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत किया जा सकता है। इस वाद में आप के पिता के सभी उत्तराधिकारी और नगर पालिका को पक्षकार बनाना होगा। यदि आप की बहिन संपत्ति को केवल अपने नाम नामान्तरण कराना चाहती है तो वह वसीयत के आधार पर उस का प्रतिवाद करेगी। आप वहाँ वसीयत को गलत साबित कर सकते हैं जिस से सभी उत्तराधिकारियों के नाम मकान का नामांतरण हो सके।

वसीयत को नामान्तरण में आपत्ति होने पर प्रोबेट करा लेना उचित है।

समस्या-

हितेश गोयल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी का देहांत 2002 में हो गया है तथा मेरे दादा जी का देहांत वर्ष 2014 में हो गया मेरे दादा जी ने वर्ष 2013 में अपनी रजिस्टर्ड वसीयत की थी जिसमे उन्होंने इस बात का उल्लेख किया की उनकी चारो पुत्रियों के विवाह उन्होंने सम्पन्न करा दिया है तथा उनके कर्तव्यों का निर्वहन हो चूका है तथा मेरे पिता जी के अलावा मेरे अन्य दो ताऊ जी को कुछ भी नहीं देना है तथा जो पक्का बना मकान है वो मेरे नाम हो तथा एक जमीन है जो मेरी माता जी के नाम हो! इस वसीयत में नामंतरण करवाने की लिए सभी वारिसों के हस्ताक्षर की बात कही जा रही है तथा मेरे दोनों ताऊजी को तथा एक बुआ को इस पर आपत्ति है! मैंने ऐसा सुना है की यदि इसे प्रोबेट करा लिया जाये तो यह संपत्ति बिना आपति के हस्तांतरित करवाई जा सकती है! कृपया उचित मार्गदर्शन प्रदान करे जिस से हम इस प्रकरण को जल्द से जल्द निपटा सके!

समाधान-

ब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उस की संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को समान रूप से प्राप्त होती है। लेकिन यदि मृतक ने वसीयत कर दी हो तब वसीयत के अनुसार प्राप्त होती है। नामांतरण की कार्यवाही में वसीयत के आधार पर नामांतरण का आवेदन आने पर यदि आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं तो राजस्व विभाग को यह अधिकार नहीं है कि वह इन आपत्तियों का निस्तारण कर सके। वसीयत को प्रमाणित करने पर वसीयत उचित है या नहीं यह केवल दीवानी न्यायालय ही तय कर सकता है। इसी कारण से प्रोबेट कराना उचित है। आप को प्रोबेट की यह सलाह स्वयं नामान्तरण करने वाले अधिकारी ने ही दी होगी।

प्रोबेट में सभी उत्तराधिकारियों के साथ साथ एक सामान्य सूचना समाचार पत्र के माध्यम से भी प्रकाशित होगी। उस के उपरान्त आप वसीयत को उस के गवाहों और उप पंजीयक या उस के कार्यालय के कर्मचारी के बयानों के आधार पर प्रमाणित करवा सकते हैं। प्रोबेट हो जाने पर राजस्व विभाग वसीयत के आधार पर नामान्तरण दर्ज कर देगा।

कोई भी अपनी स्वअर्जित संपत्ति को वसीयत कर सकता है।

समस्या-

अरविन्द कुमार ने बुन्दू झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा और चाचा एक माँ के हैं और मेरे पापा और चाचा के तीन बड़े भाई है जो कि सौतेले हैं। सौतेले हमें जमीन का हिस्सा सभी जगह नहीं दे रहे हैं और कही कहीं के जमीन पर उन्होंने अपने नाम से जमीन को करवा लिया है जो कि पहले दादा जी के नाम से थी।  तो मुझे सभी जगह जमीन का हिस्सा कैसे मिलेगा बताएं? इसका जवाब आप मेल में भी जरुर भेजे|

समाधान-

रविन्द जी, तीसरा खंबा की कानूनी सलाह सेवाएँ निःशुल्क हैं। हम जिन समस्याओं का उत्तर अपनी साइट पर देते हैं उन्हें मेल नहीं करते। आप को चाहिए कि आप साइट देखते रहें। जिन समस्याओं का उत्तर हम साइट पर नहीं दे सकते उन्हें अवश्य मेल करने की कोशिश करते हैं।

आप को जानना होगा कि आखिर आप के दादा की जमीन आप के तीन ताउओं को बिना बँटवारे के कैसे मिल गयी। कोई भी अपनी स्वअर्जित संपत्ति को वसीयत कर सकता है। हो सकता है दादा जी की यह जमीन उन की स्वअर्जित हो और उन्हों ने पहले ही आप के ताउओं के नाम वसीयत कर रखी हो। अक्सर ऐसा होता है कि जब व्यक्ति दूसरा विवाह करता है तो अपनी कुछ संपत्ति पहले विवाह की संतानों के नाम वसीयत कर देता है जिस से उन के साथ सौतेला व्यवहार न हो। यदि ऐसा है तो फिर आप को उस जमीन में कोई हिस्सा प्राप्त नहीं हो सकेगा। यदि वह जमीनें गलत तरीके से आप के ताउओं के नाम आ गयी है तो आप उन के नाम जमीन के नामान्तरण को चुनौती दे कर उसे निरस्त करवा सकते हैं। चूंकि हर राज्य का कृषि भूमि से संबंधित कानून भिन्न है इस कारण से आप को चाहिए कि इस मामले में स्थानीय वकीलों से परामर्श कर के उचित उपाय करें।

पर्याप्त तथ्यों के अभाव में दी गयी सलाह गलत भी हो सकती है।

rp_legal-education2.jpgसमस्या-

आदित्य शर्मा ने लखीमपुर खीरी, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मेरी बुआ श्रीमती जनक दुलारी शर्मा ने मुझे गोद लिया, लेकिन मैं अपने वास्तविक पिता के के साथ रहा। वे सरकारी सेवा में होने के कारण बाहर रहती थी। उन के नाम कोई संपत्ति नहीं है। लेकिन नकद, जेवर व सारी अचल संपत्ति उन के देवर के बेटे ने मार पीट कर ले ली। लेकिन फूफा जी के नाम एक प्रोपर्टी है जिस की वसीयत डर के भतीजी के नाम कर दी है। क्या मैं उस के लिए मुकदमा कर सकता हूँ?

समाधान-

प ने अपनी समस्या में बहुत सारे तथ्य स्पष्ट नहीं किए हैं। आप को कब गोद लिया गया है और किस विधि से गोद लिया गया है यह नहीं बताया है, क्या आप का गोदनामा पंजीकृत है? आप ने यह भी नहीं बताया कि आप की बुआ जीवित है या नहीं तथा फूफाजी मौजूद हैं या नहीं है और यदि नहीं हैं तो उन का देहान्त कब हुआ?

गोद लेने का परिणाम यह है कि आप गोद लिए जाने पर गोद लेने वाले दम्पत्ति की संतान हो जाते हैं और वही सब अधिकार प्राप्त हो जाते हैं जो एक पुत्र को होने चाहिए। यह एक शर्म की बात है कि एक पुत्र के होते हुए उस की मां के साथ मारपीट कर उस की अचल संपत्ति छीन ली गयी और उस के पति की छोड़ी हुई संपत्ति की वसीयत करवा ली गयी।

यदि बुआ मौजूद हैं और वे चाहती हैं कि उन की संपत्ति आप को प्राप्त हो तो वे पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकती हैं कि उन की संपत्ति छीन ली गयी है और जबरन वसीयत लिखा ली गयी है। वे वसीयत को निरस्त भी कर सकती हैं।

यदि आप ने उक्त नहीं बताए हुए तथ्य और बताए होते तो हम आप को स्पष्ट रूप से सलाह दे सकते थे। लेकिन पर्याप्त तथ्यों के न होने से हम कोई सटीक सलाह देने में असमर्थ हैं। पर्याप्त तथ्यों के अभाव में दी गयी सलाह गलत भी हो सकती है। बेहतर है कि आप किसी स्थानीय वकील से मिलें और अपने लिए समाधान उन से प्राप्त करें।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada