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1930 में उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी और सहदायिक है।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

द्वारका ने बीकानेर राजस्थान से पूछा है-

मेरे परदादा जी ने सन 1926  में एक घर ख़रीदा।  परदादा जी की मृत्य 1930  के आस पास हो गई।   परदादा जी के एक लड़के मेरे दादाजी हुए।   दादाजी के चार लड़के तीन लडकियाँ हुईं।  दादाजी की मृत्यु सन 1983 में हो गई। अंकल ने सन 1988 में अपना हिस्सा लेने के लिए मेरे पिताजी पर विभाजन का मुकदमा किया। मुकदमा ख़ारिज हो गया।  अब अंकल के लड़के ने सन 2008 में मेरे दादा जी के नाम से अपने पिता के पक्ष में सन 1981 की एक फर्जी वसीयत बना कर घर को 2009 में बेच दिया। वसीयत में मेरी एक भुआ को 1981 में मरा हुआ बताया गया है जबकि मेरी भुआ मेरे दादा जी के 3 साल  बाद 1986 में  मरी है ,लेकिन  पुलिस ने इस बात को जाँच में शामिल नहीं किया।  हिन्दू उत्तराधिकार 1925 और हिन्दू उत्तराधिकार 1956  के अनुसार तो पुस्तैनी घर की वसीयत करने का दादा जी को अधिकार ही नहीं था।  दादाजी को उत्तराधिकार, परदादा जी की मृत्यु होने के बाद 1930 के आस पास में ही मिल गया था।   मामला 2009 से कोर्ट में चल रहा है। क्या घर पुस्तैनी कहलायेगा?  क्या दादा जी को पूरे घर की वसीयत करने का अधिकार था?  क्या कोर्ट इस तरफ भी ध्यान देगी कि घर तो पुस्तेनी है?

समाधान-

प का मकान पुश्तैनी और सहदायिक संपत्ति है। यह आप के दादा जी की निजि संपत्ति नहीं थी। जो भी दीवानी वाद अदालत में लंबित है उस में आप को वसीयत को भी चुनौती देनी चाहिए। क्यों कि वसीयत के कंटेंट गलत हैं और कोई भी पिता अपनी जीवित पुत्री को मृत घोषित नहीं कर सकता। उस के गवाह आदि को जिरह करने पर वसीयत भी गलत साबित हो सकती है।

सहदायिक संपत्ति में पुत्रों का जन्म से अधिकार होता है। इस कारण आप के दादा जी द्वारा की गयी संपूर्ण सम्पत्ति की वसीयत कानून के विपरीत है। आप के दादाजी उन के अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे, पूरी संपत्ति की नहीं।

फिर भी इस प्रकरण में अन्य अनेक जटिल बिन्दु आ सकते हैं, बल्कि अनिवार्य रूप से आएंगे। इस कारण आप का वकील ऐसा होना चाहिए जो कानून की नवीनतम व्याख्याओं की जानकारी रखता हो और लगातार नयी जानकारियाँ हासिल कर पैरवी करता हो। आप को भी विशेष रूप से एलर्ट रहने की जरूरत है। अनेक बार मुवक्किल की सुस्ती और नवीनतम कानूनी व्याख्याओं की जानकारी न होने से भी मुकदमें में हार का मुहँ देखना पड़ता है।

पुश्तैनी सम्पत्ति मेंं हिस्से की वसीयत की जा सकती है।

Farm & houseसमस्या-

अविनाश कुमार सिंह ने गमरिया मेयारी बाजार, नोखा, सासाराम, बिहार से पूछा है-

मेरे दादा के नाम पुश्तैनी जमीन है, क्या वे किसी के नाम वसीयत कर सकते हैं? उन के दो लड़के थे जिन की मृत्यु हो चुकी है दोनों के एक एक लड़के हैं।

समाधान-

हिन्दुओं के पास दो तरह की संपत्तियाँ हो सकती हैं। एक पुश्तैनी और दूसरी स्वअर्जित संपत्ति। 17 जून 1956 के पूर्व तक सामान्य कानून यह था कि जो भी संपत्ति किसी पुरुष को अपने किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह पुश्तैनी है और उस में पुत्रों का अधिकार जन्म से ही है। 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होने पर ऐसा नहीं रहा। जो संपत्ति उक्त अधिनियम प्रभाव में आने के पूर्व पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति हो गयी थी वह तो सहदायिक रही और उस में पुत्रों का जन्म से अधिकार रहा। लेकिन उत्तराधिकार में प्राप्त जो संपत्ति पहले से पुश्तैनी या सहदायिक नहीं थी वह पुश्तैनी या सहदायिक नहीं रही।

यदि आप के दादा जी के पास उक्त संपत्ति पुश्तैनी / सहदायिक थी तो उस में उन के मृत पुत्रों के परिवार का भी हिस्सा है। इस कारण वे उस संपूर्ण सम्पत्ति की वसीयत नहीं कर सकते। पुश्तैनी संपत्ति में जो हिस्सा दादा जी का बनता है उसे वे वसीयत कर सकते हैं।

यदि उक्त संपत्ति दादा जी को प्राप्त होने के समय सहदायिक या पुश्तैनी नहीं थी तो दादा जी पूरी संपत्ति की वसीयत कर सकते हैं।

वसीयत से उत्तराधिकारी वंचित होते हैं।

Willसमस्या-

राम भजन सिंह ने ग्राम और पोस्ट जरहा, थाना बीजपुर, जिला सोनभद्र, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे बड़े पिता जी के दो पत्नियाँ थीं और दोनों के एक एक लड़की हुई। पिता जी की मृत्यु  के बाद पहली वाली पत्नी के अकेले अपनी लड़की को वसीयत लिख दी क्या सेकेंड वाली पत्नी के लड़की को हिस्सा नहीं मिलना चाहिए।

समाधान-

प की बात ही समझ नहीं आ रही है। वसीयत किस ने लिखी है बड़े पिता जी ने या पहले वाली पत्नी ने? हम आम तौर पर ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते जो अपने आप में स्पष्ट नहीं होते। पर आप के प्रश्न का उत्तर इस कारण से दे रहे हैं कि लोगों को उत्तराधिकार के अधिकार में और वसीयत में भेद के बारे में बताया जा सके।

वसीयत हमेशा व्यक्ति अपने जीवनकाल में करता है कि उस की मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति का क्या किया जाए। यदि कोई व्यक्ति वसीयत नहीं करता है तो उत्तराधिकार के नियम के हिसाब से उस के उत्तराधिकारियों को संपत्ति प्राप्त होती है। व्यक्ति सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में अपने अधिकार को भी वसीयत कर सकता है।

हिन्दू विधि में 1955 से दूसरा विवाह करना वैधानिक नहीं रहा है। इस कारण आप के बड़े पिता का दूसरा विवाह यदि  1955 के बाद हुआ था और पहले वाली पत्नी जीवित थी तो वह अवैध था। हालांकि इस का असर दूसरी पत्नी की संतान पर बस इतना ही होगा कि पुश्तैनी संपत्ति में उस का अधिकार नहीं होगा।

यदि किसी ने अपनी स्वअर्जित संपत्ति की वसीयत अपनी संतानों में से किसी एक के नाम कर दी है तो अन्य संतानें स्वतः ही वंचित हो जाएंगी। आप के मामले में यदि आप के बड़े पिता जी ने वसीयत से अपनी संपत्ति बड़ी पत्नी की पुत्री को दे दी है तो फिर अन्य उत्तराधिकारियों को कुछ नहीं मिलेगा और यह कानूनन है।

अपने उत्तराधिकार के बारे में शंका होने पर वसीयत कर दें।

Willसमस्या-

राजू ने सवाई माधोपुर राजस्थान से पूछा है-

मेरी पत्नी के कोई औलाद नहीं होने पर टेस्ट टयूब बेबी का इलाज लिया जो सफल नहीं होने पर एक बच्चा अनाथालय से गोद लिया। बच्चा गोद लेते ही मेरी पत्नी अपने परिवार वालों से मिलकर मेरे घर को छोडकर चली गयी तथा मेरे व भाई के उपर 498अ, 406 व 323 का मुकदमा दर्ज करा दिया। इसी बीच मेरा कोर्ट से तलाक हो गया। उसने भरण पोषण का मुकदमा दर्ज करा दिया जिसमें 10 हजार रूपये महिने का भरण पोषण का आदेश करा लिया। मैं गम्भीर बीमारी से ग्रस्त हूँ। मेरी मृत्यु के पश्चात क्या मेरी पूर्व पत्नी मेरी सम्पति में से हिस्सा बँटवा सकती है।

समाधान-

प अपनी पूर्व पत्नी से तलाक ले चुके हैं इस कारण अब आप की पूर्व पत्नी आप की पत्नी नहीं रही है और उसे  आप की संपत्ति में किसी प्रकार का कोई उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस कारण वह आप की संपत्ति पर किसी प्रकार का कोई दावा नहीं कर सकती है। आप एक बच्चा गोद ले चुके हैं इस कारण वही एक मात्र उत्तराधिकारी रह गया है। आप के जीवनकाल के उपरान्त वही आप की संपत्ति का एक मात्र उत्तराधिकारी होगा।

फिर भी किसी भी तरह की शंका आप को हो तो आप अपनी समूची सम्पत्ति की वसीयत आप के गोद पुत्र के नाम कर के उसे उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा सकते हैं। यदि गोद पुत्र अभी नाबालिग है तो आप को चाहिए कि आप अपने जीवनकाल के बाद उस के संरक्षक की नियुक्ति भी उसी वसीयत मे कर दें।

मौखिक वसीयत को साबित करना लगभग असंभव है।

Willसमस्या-

जयपुर राजस्थान से जगदीश ने पूछा है-

मेरी माँ ने अपने पिता (मेरे नाना) से उनके मकान का आधा हिस्सा खरीदा।  मेरी माँ ने इसकी मौखिक वसीयत मेरे नाम कर दी। जिसको मेरे सभी भाइयों ने तथा पिता ने भी मानने से मना कर दिया है।  मेरी माता का निधन हो चुका है, अब इस संपाति में मेरे पिता हम तीन भाई तथा एक बहिन हैं। हमारा सभी का इस संपात्ति में कितना कितना हिस्सा बनता है?  क्या मैं उस मौखिक वसीयत के आधार पर कुछ दावा कर सकता हूँ? जब कि मेरे परिवार (भाई भाभी पिता) के अलावा उसका कोई गवाह नहीं है।

समाधान-

प की समस्या मौखिक वसीयत है। वसीयत मौखिक, लिखित, पंजीकृत या अपंजीकृत कैसी भी क्यों न हो, यदि वह वसीयतकर्ता के देहान्त के उपरान्त किसी व्यक्ति द्वारा विवादित की जाती है तो उस वसीयत का प्रमाणीकरण आवश्यक है।

वसीयत के लिए यह आवश्यक है कि उसे स्वैच्छा से किया गया हो। वसीयत करने के कम से कम दो गवाह हों। लिखित वसीयत में वसीयत कागज पर अंकित होती है जिस पर खुद वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर या अंगूठा निशानी होता है और कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर होते हैं। इस तरह यदि लिखित वसीयत का कोई गवाह पलटना भी चाहे तो आसान नहीं होता। लेकिन मौखिक वसीयत में तो यह सब अत्यन्त कठिन ही नहीं लगभग असंभव है।

आप का कहना है कि मौखिक वसीयत के गवाह सिर्फ पिता, भाई व भाभी हैं। वसीयत उन तीनों के हितों के विरुद्ध है। इस कारण उन का मौखिक वसीयत से इन्कार कर देना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में आप अपनी माँ की मौखिक वसीयत को साबित नहीं कर सकेंगे।

जहाँ तक उक्त संपत्ति में उत्तराधिकारियों के हिस्से का प्रश्न है तो इस में तीन भाई, एक बहिन व पिता उत्तराधिकारी हैं वैसी स्थिति में कुल पाँच हिस्सेदार हैँ और प्रत्येक हिस्सेदार के हिस्से में संपत्ति का पाँचवाँ 1/5 हिस्सा आएगा, आप को संपत्ति का 1/5 हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार है।

वसीयत उत्तराधिकार के अधिकार को समाप्त कर देती है।

Willसमस्या-

सारिका राजपूत ने रतलाम (म.प्र.) से पूछा है-.

मेरे माता पिता ने मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति की वसीयत मेरे नाम कर दी। उनका देहांत हो गया है अब मेरे दोनों भाई उस ज़मीन में अपना हिस्सा माँग रहे हैं। मेरा तलाक हो चुका है मैं अपने माता पिता के साथ रहती थी। वसीयत रजिस्टर्ड है तो क्या वसीयत के बाद भी उनको हिस्सा मिलेगा या नहीं।

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की स्वअर्जित संपत्ति उस की स्वयं की संपत्ति होती है और उस व्यक्ति के जीते जी किसी भी व्यक्ति का उस में हिस्सा नहीं होता। यदि विवादित संपत्ति पुश्तैनी संपत्ति नहीं थी, अर्थात 17 जून 1956 के पूर्व उत्तराधिकार में आप के पिता या दादा को प्राप्त नहीं हुई थी तो वह आप के पिता के पूर्ण स्वामित्व की संपत्ति थी और उस में आप के भाइयों का कोई अधिकार नहीं था।

किसी भी व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त उस की संपत्ति का दाय उस पर प्रभावी व्यक्तिगत विधि के अनुसार होता है। आप के पिता हिन्दू थे इस तरह यदि आप के पिता ने अपनी संपत्ति की वसीयत नहीं की होती तो उन की संपत्ति का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होता तब आप के भाइयों का उस में अधिकार होता। आप के पिता पंजीकृत वसीयत से वह संपत्ति आप को वसीयत कर गए हैं तो अब उस संपत्ति की स्वामिनी आप हैं। आप के भाइयों का उस संपत्ति में हिस्से का दावा गलत है। यदि वे न्यायालय में दावा करते भी हैं तब भी वे असफल होंगे। आप रजिस्टर्ड वसीयत के आधार पर संपत्ति पर अपना स्वामित्व साबित कर सकती हैं।

संपत्ति के बँटवारे का वाद संस्थित करना चाहिए, वसीयत का निर्णय उसी में होगा।

Willसमस्या-

सुनील जैन ने रायपुर छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र राज्य की समस्या भेजी है कि-

मारे पिताजी की संपत्ति 1000 वर्गफुट पर तीन मंज़िल बिल्डिंग है। हम दो भाई और दो बहनें हैं, वह दोनों ससुराल में रहती हैं। मैं 22 साल से रायपुर रहता हूँ, हमारा परिवार भुसावल जिला जलगांव में रहता है। पिताजी का निधन 05/02/2004 में हो गया और माताजी का 07/10/2006 में। बड़े भाई ने झूठी वसीयत बनाकर 2005 में उक्त मकान का मालिक बन गया और बात दोनों बहनों को और मुझे पता नहीं चली । माताजी को उक्त संपत्ति का मालिकाना हक़ भी छीन लिया। 2013 में भुसावल नगर पालिका में गया और उक्त संपत्ति का 10 साल का रिकॉर्ड निकाला तो पता चला कि उक्त संपत्ति मालिक मेरा बड़ा भाई है। वसीयत में जो गवाह का नाम था मैं उनसे मिला और पूछा कि ये वसीयत हमारे पिताजी ने आपके सामने लिखी थी और ये हस्ताक्षर पिताजी ने आपके समक्ष किये थे। उस पर उन्होने जबाब दिया कि तुम्हारा भाई मई महीने के 2005 में हमारे पास आया और बोला कि आप मुझे पहचानते हो ऐसा हस्ताक्षर कर दो, हमने वो दस्तावेज बिना देखे तेरे भाई पर विश्वास रख कर हस्ताक्षर कर दिया और आज पता चल रहा है कि उसका इस्तेमाल वसीयत के गवाह के रूप में किया। उन दोनों गवाहों ने कोर्ट में अफेडेबिट पर शपथ पर कहा है कि मरे हुए व्यक्ति ने हमारे सामने कोई भी वसीयत नहीं बनाया और न हीं हमने कोई वसीयत पर गवाह के रूप में हस्ताक्षर किये हैं। उक्त वसीयत को फोरेंसिक लैब भेजा गया 156 (3) तहत और अभी फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट जज साहब ने बड़े भाई के वकील के निवेदन पर खोली है जिस में ये अभिप्राय दिया कि, जो वसीयत पर हस्ताक्षर है और बाकी जो उसके बैंक में किए गए हस्ताक्षघरों के नमूने से मिलता है। अब हमें बताने का कष्ट करे हमें ये रिपोर्ट वो शासकीय अधिकारी को भी बुलाकर उनसे पूछ सकते है ये हस्ताक्षर का मिलान कैसे हो रहा है। क्या कोर्ट शासकीय राय को कितना सही मानेगी जब गवाहों के जबाब को मद्देनज़र रखकर। मैं अपने पिताजी का हस्ताक्षर जानता हूँ। मेरे बड़े भाई ने अपने को बचाने के लिए ऑलराउंडर वकील लगाया जो सब सेटिंग करने में माहिर है।

समाधान-

प न्यायालय से निवेदन कर सकते हैं कि आप अन्य हस्ताक्षर विशेषज्ञ से हस्ताक्षरों की जाँच करवाना चाहते हैं और उस का बयान कराना चाहते हैं। ऐसा आप करवा सकते हैं। लेकिन यह मुकदमा किस बात का है यह आप ने नहीं बताया है। 156(3) के उल्लेख से प्रतीत हो रहा है कि यह मुकदमा अपराधिक मुकदमा है। जिस का अधिक से अधिक परिणाम यह होगा कि आप के भाई को फर्जी दस्तावेज बनाने के कारण सजा हो जाएगी। यदि उस वसीयत पर आप के पिता के हस्ताक्षर साबित भी हो जाएँ तब भी गवाहों के हस्ताक्षर बाद में करवा कर आप के भाई ने फर्जी दस्तावेज बनाया है, उसे तो इस आधार पर भी सजा हो सकती है।

दि आप के भाई ने एक तेज तर्रार सेटिंग वाला वकील किया है तो यह उस का अधिकार है। उस से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप को एक अच्छा और विश्वसनीय वकील अपने लिए नियुक्त करना चाहिए।

मामला मकान का है जिसे फर्जी वसीयत से भाई ने अपने नाम कर लिया है। उस का मसला इस अपराधिक मुकदमे से हल नहीं होगा। उस के लिए आप को यह मानते हुए कि वह मकान पिताजी का है और उस में चारों भाई बहनों का अधिकार है, बँटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित करना चाहिए। बँटवारे के वाद में आप का भाई वसीयत के आधार पर प्रतिवाद प्रस्तुत करेगा। वसीयत को केवल गवाहों के आधार पर प्रमाणित कराया जा सकता है। उस वसीयत पर हस्ताक्षर करने वाले गवाह न्यायालय के समक्ष पहले ही गवाही दे चुके हैं कि उन के हस्ताक्षर आप के पिताजी की मृत्यु के बाद कराए गए हैं। यदि दीवानी न्यायालय में वे यह बयान देते हैं तो वसीयत फर्जी साबित हो जाएगी और बँटवारे में आप को मकान का हिस्सा प्राप्त हो सकता है। आप को संपत्ति के बँटवारे के लिए वाद यदि अब तक नहीं किया है तो तुरन्त कर देना चाहिए, उस में देरी करना ठीक नहीं है।

पूर्ण वसीयत का अध्ययन करने और संपत्तियों के स्वामित्व का संज्ञान किए बिना उस की व्याख्या असंभव है।

Willसमस्या-

सुरेश जायसवाल ने मुहम्मदाबाद, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी अपनी माँ बाप की इकलौती संतान है। हमारे ससुर जी का स्वर्गवास हो गया है और सास जी जिन्दा हैं। उन्होंने मरने से पहले अपने पुत्री के नाम वसीयत इस प्रकार की थी “हम दोनों पति_पत्नी के मरने के बाद हमारी चल अचल सम्पति की मालिक हमारी पुत्री हो” इस वसीयत के अनुसार क्या सास जी की रजामन्दी से हमारी पत्नी को मालिकाना हक मिल सकता है या नहीं?

समाधान

ब तक वसीयत को पूरी तरह पढ़ा नहीं जाता है और उस में वर्णित संपत्ति किस के स्वामित्व की थी यह संज्ञान नहीं कर लिया जाता है तब तक वसीयत की ठीक ठीक व्याख्या करना असंभव है। आप ने वसीयत का जो अंश यहाँ उद्धृत किया है उस से सिर्फ इतना पता लगता है कि आप के ससुर जी अपनी मृत्यु के तुरन्त बाद अपनी संपत्ति को अपनी पुत्री नहीं देना चाहते थे। उन की इच्छा थी कि संपत्ति की स्वामिनी पुत्री बने लेकिन उन के देहान्त के उपरान्त नहीं बल्कि उन के और उन की पत्नी दोनों के देहान्त के उपरान्त।

प के इस वाक्य से यह भी पता नहीं लग रहा है कि यह केवल आप के ससुर जी की वसीयत है अथवा आप के ससुर जी और सास की संयुक्त वसीयत है, यह भी पता नहीं लगता है कि यदि ससुर जी की ही वसीयत है तो फिर उन के देहान्त और उन की पत्नी के देहान्त के बीच उन की संपत्ति के संबंध में इस वसीयत में क्या व्यवस्था की गयी है।

सीयत की गयी संपत्ति किस के स्वामित्व की थी वह ससुर जी के स्वामित्व की है या दोनों पति-पत्नी के स्वामित्व की है अथवा कुछ ससुर जी के स्वामित्व की और कुछ सास के स्वामित्व की है। इन कारणों से आप की समस्या का निश्चयात्मक उत्तर दिया जाना संभव नहीं है।

मारी आप से सलाह है कि आप किसी नजदीकी दीवानी मामलों के वकील को उक्त वसीयत दिखा कर राय करें और उन की राय के अनुरूप कार्यवाही करें।

मूल वसीयत उपलब्ध न होने पर उस की प्रमाणित प्रति को न्यायालय की अनुमति से साबित करें।

समस्या-Will

अनिकेत ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

सीयत प्रमाणित किस तरह करवाई जा सकती है? उसकी फोटो स्टेट प्रतिलिपि को किसी अधिकारी द्वारा प्रमाणित करवाना पड़ता है? अथवा पंजीयन कार्यालय से उसकी प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त होती है। क्यों कि वसीयत के गवाह अब नहीं रहे।

समाधान-

सीयत को उस के गवाह ही प्रमाणित कर सकते हैं। यदि गवाहों का देहान्त हो गया है तो आप को न्यायालय के समक्ष यह साक्ष्य से यह साबित करना होगा कि वसीयत के गवाहों का देहान्त हो चुका है। इस के साथ ही उन गवाहों के हस्ताक्षर पहचानने वाले लोगों की गवाही करवा कर वसीयत को प्रमाणित किया जा सकता है। यदि ये हस्ताक्षर प्रमाणित करने वाले गवाह यह भी कह सकें कि उन्हें इस बात की जानकारी है कि गवाह ने वसीयत प्रमाणित की थी तो और बेहतर होगा।

किसी भी दस्तावेज की फोटो प्रति प्रमाणित नहीं कराई जा सकती है। उस के लिए उस की असल प्रति न्यायालय के समक्ष होना आवश्यक है। यदि असल प्रति उपलब्ध न हो तो वसीयत की पंजीयन कार्यालय से प्रमाणित प्रति प्राप्त की जा सकती है। प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें और न्यायालय से साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 में न्यायालय से द्वितियक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति प्राप्त कर उसे प्रमाणित कराएँ। यदि वसीयत पंजीकृत है तो वह इस स्थिति में प्राथमिक रूप से प्रमाणित मान ली जाएगी तथा वसीयत को चुनौती देने वाले व्यक्ति को प्रमाणित करना होगा कि वसीयत का पंजीकरण उचित नहीं था।

संपत्ति में जिस का अधिकार नहीं उसे संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता।

rp_Hindu-Succession-199x300.jpgसमस्या-

आनन्द सिंह ने गया, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी जो एक प्रतिष्ठित डॉक्टर थे, उन के पाँच पुत्र हैं, ने मरने से पहले अपने पुरी संपत्ति का वसीयत क्रमशः अपने तीन पुत्रों के नाम कर दी और अपने दो पुत्रों को पाँच–पाँच बीघा जमीन ही दिया। मकान में भी एक एक कमरा रहने के लिए दिया। उन की मृत्यु 1996 में हुई, वसीयत में उन्होंने अपने बड़े पुत्र को केअर टेकर बनाया जो खुद निःसन्तान हैं और अपने छोटे भाई के बड़े पुत्र को गोद लिया है। वसीयत और उनकी मृत्यु के समय उनके पाँच पोते बालिग थे जिसमे से तीन पोते उन दो लड़कों के हैं जिनको उन्होंने अपनी संपत्ति से बेदखल किया है। यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि वसीयत में उन्होंने कहीं नहीं लिखा है की मैं अपने दोनों पुत्रों को उनके बेटों सहित अपनी संपत्ति से बेदखल करता हूँ। आप ये बताएँ कि क्या मेरे दादा जी के संपत्ति में हम पोतों का अधिकार होता है कि नहीं। मेरे बड़े चाचा जो अपने छोटे भाई के बड़े बेटे को गोद लिए हुए हैं, अब सारी संपत्ति उसके नाम से वसीयत करने जा रहे हैं। जब कि उनको मेरे दादा ने केवल अपनि संपत्ति का केअर टेकर बनाया है। क्या ऐसा संभव है कि वो हम सबका हक़ उसके नाम कर दें। एक बात और है उन्होंने बिना किसी दत्तक ग्रहण कानून के ही उसको गोद लिया है और इसका कोई भी कानूनी कागजात उपलब्ध नहीँ है। क्या दादा की संपत्ति में हम निर्दोष पोतों का हक़ नहीं है, अगर हमारा हक़ बनता है तो हम उसको कैसे हासिल कर सकते है? मेरे बड़े चाचा ने उस जमीन पर गन्ना और मसालों की खेती करके 1996 से अबतक पचास लाख और आम लीची के बगीचे से लगभग चालीस लाख और सूखे पेडों को बेचकर पंद्रह लाख रुपये गबन कर लिए हैं और अब उसी पैसे से नया घर बनवा रहे हैं। उन का इरादा है कि नया घर जो छोटा है (चार कमरे का) के बनते हीं पुराना घर तोड़वा दें। ताकि हम गांव छोड़कर कहीं और चले जाएँ। मेरे एक चाचा ने उन की वसीयत को कोर्ट में चॅलेंज किया था जो ख़ारिज हो चुका है। वो पहले से हीं बहुत पैसे वाले हैं और मेरे बड़े चाचा वकील भी हैं। आप से करबद्ध प्रार्थना है कि हमारी जल्द से जल्द मदद करें ताकि हम अपना पुराना हीं सही घर टूटने से बचा लें।

समाधान –

किसी की भी निजी संपत्ति में किसी रिश्तेदार का हक नहीं होता, पुत्रों और पत्नी का भी नहीं। संपत्ति का स्वामी अपने जीवनकाल में अपनी सारी संपत्ति को कैसे भी ठिकाने लगा सकता है या वसीयत कर सकता है। वसीयत करने पर वसीयत कर्ता के जीवनकाल में संपत्ति उसी की रहती है लेकिन उस की मृत्यु के साथ ही वसीयत के अनुसार संपत्ति पर उन का अधिकार हो जाता है जिन्हें संपत्ति दी गयी है। कोई भी वसीयत कर के किसी संपत्ति में किसी को उस के अधिकार से बेदखल नहीं कर सकता। मसलन मेरी संपत्ति मेरे जीतेजी मेरी है। उस में मेरी संतानों, संतानों की संतानों का कोई अधिकार नहीं होता। मैं उसे कैसे भी ठिकाने लगाऊँ मेरी मर्जी या वसीयत करूँ। मुझे किसी वसीयत में यह लिखने की जरूरत नहीं है कि मेरी कोई संपत्ति से किसी खास बेटे या पोते को बेदखल करता हूँ। मृत्यु के बाद मृतक की वह संपत्ति जो निर्वसीयती है अर्थात जिस की वसीयत मृतक ने नहीं की है उस में उस के उत्तराधिकारियों का अधिकार उत्पन्न होता है।

प के दादा ने अपनी संपत्ति की वसीयत कर दी। दो बेटों को केवल पाँच पाँच बीघा भूमि दी तो उन की मर्जी ऐसी ही थी। या तो यह सिद्ध किया जाए कि वसीयत फर्जी थी या कानून के अनुसार नहीं थी,या फिर यह साबित किया जाए कि जिस संपत्ति की दादा जी ने वसीयत की थी वह उन की निजी संपत्ति न हो कर पूरे परिवार की पुश्तैनी या संयुक्त संपत्ति थी। यदि ऐसा साबित करें तो जिन के नाम वसीयत नहीं है वे अपना अधिकार बता कर उस में से कानून के अनुसार बँटवारे का दावा कर सकते हं। लेकिन उस वसीयत के विरुद्ध एक वाद पहले ही खारिज हो चुका है इस कारण आप के मामले में ये दोनों बातें सही नहीं हो सकतीं।

जो पाँच पाँच बीघा जमीन दो भाइयों को मिली है उसे उन से कोई नहीं छीन सकता। उसी तरह रहने को जो घर दिया गया है उसे भी कोई नहीं छीन सकता है न उसे गिराया जा सकता है। केयर टेकर किसी संपत्ति का मालिक नहीं होता। वह केवल देखरेख कर सकता है। उन घरों में रहने वाले जिन्हें उस घर को गिराए जाने से आपत्ति है वे दीवानी अदालत से घऱ को गिराए जाने के विरुद्ध स्थाई और अस्थाई निषेधाज्ञा का आदेश प्राप्त कर सकते हैं। इस से अधिक कुछ नहीं।

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