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हिन्दू विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

समस्या-

घनश्याम पाण्डेय ने सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


 मेरे पड़ोस में मेरी मुँह बोली बहन रहती है। जिसका विवाह मात्र १२ वर्ष के उम्र १९९८ में ही कर दिया गया। यह बाल विवाह ही था, लड़के की उम्र १२ साल ही थी।  खैर यह शादी मात्र चार वर्ष ही चली और २००२ में पंचायत के सामने तलाक करवा दिया गया और उनसे कोई संतान नहीं हुई।  बहन का दूसरा विवाह लगभग १८ की उम्र में २००४ में हुआ, जहाँ पर उसे दो लड़की संताने भी हुई, साल २०११ में उसे दूसरी लड़की पैदा होने पर घर से निकाल दिया गया। अतः वह तब से मायके में ही रहती है। उसके ननद, देवर और पति सभी उस पर अत्याचार करते हैं। जब वह जाती है, बड़ी बेरहमी से पति, देवर मार कर उसे भगा देते हैं।  बहन के मायके वाले भी ज्यादा सहयोगी नहीं। अतः पुनः २०१५ के एक साधारण समारोह द्वारा उसका तीसरी जगह जबरदस्ती घरवालों ने विवाह करवा दिया।  जो कि वैवाहिक संस्कार करके नहीं किये गए थे, उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। लेकिन यह विवाह भी मात्र २ महीने न चला। अब बहन आज भी बार बार दूसरे विवाह के पति के घर जाती है, जहाँ पर उसकी बड़ी बेटी ले ली गयी, जब कि दूसरी बेटी को पति अपनी संतान स्वीकार नहीं करता है। जब उसका जन्म पति के घर में ही हुआ। अतः ऐसी परिस्थिति में बच्चों के क्या अधिकार अपने नैसर्गिक पिता से बनते हैँ तथा बहन भी क्या अपने दूसरे पति के अधिकार प्राप्त कर सकती है। वह अत्यंत गरीब अवस्था में है, माँ-बाप तथा पति सभी उसके खिलाफ हो गए। वह अपनी छोटी बेटी के साथ किसी तरह गुजारा कर रही है। अतः बच्चों और बहन का क्या अपने दूसरे पति के ऊपर क़ानूनी अधिकार बनता है। बहन आज भी अपने पति के घर जाना चाहती है तथा लगभग पागलपन की अवस्था पर पहुँच गयी है।

समाधान-

हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की डिक्री से ही समाप्त हो सकता है इस कारण से आप की मुहँबोली बहिन यदि अनुसूचित जनजाति से नहीं है तो उस का पहला विवाह आज तक भी समाप्त नहीं हुआ है। उस का पहला पति ही उस का वैधानिक पति है। पहले पति से विवाह विच्छेद वैधानिक न होने से दूसरा विवाह वैध नहीं था। इस कारण आपकी बहिन का दूसरे पति से कोई अधिकार नहीं है। लेकिन उस की दोनों संतानें दूसरे पति से हैं इस कारण संतानों को अपने पिता से भरण पोषण पाने का अधिकार है। तीसरे पति के साथ आप की बहिन दो माह से भी कम समय रही है वह रिश्ता एक लघु अवधि का लिव इन था। इस कारण इस संबंध से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है।

अभी तक आपकी मुहँ बोली बहिन का पहले पति से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ है इस कारण वह पहले पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है। इस के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकती है। इस के साथ ही वह अपनी छोटी पुत्री के लिए अपने दूसरे पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है।

दहेज प्रताड़ना की एफआईआर निरस्त होने के आदेश की प्रतियाँ अन्य सभी मामलों में प्रस्तुत करें।

समस्या-

सुनील ने अहमदाबाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी फरवरी 2014 में हुई थी मेरी पत्नी को मिर्गी का रोग है। जो हमको बताए बिना शादी की थी। मुझे यह बात नवम्बर 2014 में पता चली। फिर मेरी पत्नी मायके गई तो मैंने उसे तलाक की नोटिस भेजी। तलाक की नोटिस भेजने के बाद में उसने मुझ पर दहेज का झूठा केस लगाया जिसके कारण मुझे और मेरी फैमिली को लॉकअप में रहना पड़ा। उस केस को हमने हाईकोर्ट में रखा मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने मेरी पत्नी की पूरी FIR रद्द की और हमको बरी कर दिया। मेरी वाइफ ने सूरत में 125 भरण पोषण के लिए और डोमेस्टिक वायलेंस का केस घरेलू हिंसा के लिए किया है वे अभी चल रहे हैं और अहमदाबाद में तलाक का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है अगर दहेज का केस झूठा निकलता है तो पति को तलाक का पूरा अधिकार है। उसके तहत और मेरी पत्नी को मिर्गी की बीमारी है उसको छुपाकर शादी की है उसके तहत में तलाक लेना चाहता हूं। लेकिन कोर्ट की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि मैं तलाक की प्रक्रिया फास्ट करने के लिए क्या कर सकता हूँ। जिसके कारण तलाक के केस की जल्दी तारीख पड़े मेरा केस जल्दी पूरा हो। हाई कोर्ट ने मेरी वाइफ की 498 की जो FIR रद्द की है उस पर मुझे डोमेस्टिक वायलेंस यानी घरेलू हिंसा अधिनियम में क्या फायदा हो सकता है? कृपया कर अपना सुझाव दीजिए। मैं नवंबर 2015 से अपने भाई, बुआ के लड़के के घर पर रह रहा हूँ और मेरी अभी पीएचडी की पढ़ाई चालू है। अगर कोर्ट भरण पोषण की रकम तय करती है तो मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी और कहीं जॉब ढूंढना पड़ेगा क्या? कोर्ट फैसला दे सकती है कि तुम अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठाओ? क्योंकि मैं अपने मम्मी पापा से अलग हो गया हूँ वह मुझे अपने घर में नहीं रखते, मेरी पढ़ाई लिखाई का खर्चा मेरे भाई उठाते हैं।

समाधान-

मुकदमा निपटने की प्रक्रिया फास्ट होने का कोई माकूल तरीका नहीं है। देरी इस कारण होती है कि देश में पर्याप्त मात्रा में न्यायालय नहीं हैं। न्यायालयों की कमी को केवल राज्य सरकारें ही पूरी कर सकती हैं। फिलहाल आप यह कर सकते हैं कि उच्च न्यायालय में रिट लगवा कर अदालत के लिए यह निर्देश जारी करवा सकते हैं कि आप के मुकदमे में सुनवाई जल्दी की जाए और नियत समय में आप के मुकदमे में निर्णय पारित किया जाए।

498 ए की प्रथम सूचना रिपोर्ट रद्द होने के निर्णय की प्रतियाँ आप अपने सभी मामलों में प्रस्तुत करें। वह आप को लाभ देगी। इस से यह साबित होगा कि आप की पत्नी की ओर से मिथ्या तथ्यों के आधार पर आप के विरुद्ध मुकदमे करने का प्रयत्न किया गया है। इस से आप को लाभ प्राप्त होगा।

न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकती है लेकिन इस के लिए वह आप को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह सकती। वह यह कह सकती है कि जब आप कमाते नहीं थे, अध्ययनरत थे और पत्नी का खर्च नहीं उठा सकते थे तो आप को विवाह नहीं करना चाहिए था। वैसे इस परिस्थिति में पत्नी का भरण पोषण इतना नहीं होगा कि उसे अदा करने के लिए आप को पढ़ाई छोड़नी पड़े।

मुस्लिम स्त्री क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है।

समस्या-

मोहम्मद असलम ने मया बाजार, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी बहन जिसका नाम काल्पनिक जोया की शादी 3 साल पहले अहमदाबाद निवासी फिरोज के साथ हुई थी, मेरी बहन की भी दूसरी शादी है और फिरोज की भी यह दूसरी शादी है, दोनों की एक-एक तलाक हो चुका है। पिछले 3 सालों से लगातार मेरी बहन के पति का व्यवहार क्रूरतम से क्रूरतम रहा है, उसका पति और उसके पूरे परिवार वाले उसको प्रतिदिन प्रताड़ित करते हैं, उन लोगों के मारपीट से तंग हो कर मेरी बहन अब उस घर में रहना नहीं चाहती और अपने पति से तलाक चाहती है। मेरा घर फैजाबाद उत्तर प्रदेश में है मेरी बहन के हस्बैंड का घर अहमदाबाद जिला गुजरात में है। अगर हम कानूनी रुप से तलाक लेना चाहें और मेरी बहन का हस्बैंड तलाकनामे पर साइन ना करें और वह जाकर दूसरी औरत के साथ शादी कर ले तो इस पोजीशन में मेरी बहन क्या कर सकती है? क्योंकि मुस्लिम में पुरुष तो शादी कर सकता है,  और मेरी बहन को जब तक तलाकनामा नहीं मिलेगा तब तक यह तीसरी शादी कर नहीं सकती ऐसी स्थिति में मेरी बहन के लिए क्या कानून है?


समाधान-

मुस्लिम समाज में यह अज्ञान है कि मुस्लिम महिला को विवाह विच्छेद कराने का अधिकार नहीं है। यह एक तरह का भ्रम है जो जानबूझ कर फैलाया जाता है। मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक लेने का हक है और वे कुछ निश्चित आधारों पर तलाक की डिक्री पारित करने के लिए दीवानी न्यायालय (जहाँ पारिवारिक न्यायालय हैं वहाँ पारिवारिक न्यायालय) के समक्ष विवाह  विच्छेद कराने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं और न्यायालय विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकता है।

दी डिसोल्यूशन ऑव मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 की धारा 2 में उन आधारों का वर्णन किया गया है जिन पर एक मुस्लिम महिला अपने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकती है। इन आधारों में एक आधार क्रूरतापूर्ण व्यवहार का भी है। आपकी बहिन के साथ क्रूर से क्रूरतम व्यवहार हुआ है तो वे इस आधार पर खुद विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस वाद में न्यायालय का क्षेत्राधिकार दो तथ्यों से तय होगा पहला यह कि जहाँ प्रतिवादी रहता है, दूसरा वहाँ जहाँ वाद कारण पूरी तरह व आंशिक रूप से उत्पन्न हुआ है। तो इस मामले में वाद कारण भी अहमदाबाद में ही उत्पन्न हुआ है। दोनों ही आधारो पर यह वाद अहमदाबाद में दाखिल करना पड़ेगा। लेकिन वाद दाखिल करने के उपरान्त सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा कर वाद को फैजाबाद स्थानान्तरित कराने का प्रयत्न किया जा सकता है।

हिन्दू विधि में तलाक/ विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

विवाह विच्छेद का विचार फिलहाल त्याग कर अपने बीच की समस्याएँ समझ कर हल करने की कोशिश करें।

समस्या-

हेमन्त प्रताप सिंह ने कानपुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2014 में हुई थी, मेरी ससुराल वाले धनी परिवार से हैं। मैं एक प्राइवेट फर्म में काम करता हूँ। हमारे विचार एक दूसरे से कभी नहीं मिले। मेरा ससुराल पक्ष मेरे ऊपर दबाव डालता है कि आप अपने भाई से अलग रहो। छह छह माह एक दूसरे से दूर रहते हैं और मुझे कोई कमी भी महसूस नहीं होती। मेरा उन के साथ इंटीमेट होने का मन भी नहीं करता। मेरे मन में डाइवोर्स का ख्याल आया कि क्यों न हम कानूनी तौर पर अलग हो जाएँ। लेकिन घर वाले डरते हैं कि वे धनी लोग हैं हमें दहेज एक्ट में फँसा देंगे। मेरा मार्गदर्शन करें।

समाधान-

मुझे नहीं लगता कि आप के बीच कोई बड़ी समस्या है। आप ने यह तो बताया कि ससुराल पक्ष आप पर दबाव डालता है कि आप भाई से अलग रहें। लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि जब वे यह बात करते हैं तो क्या तर्क देते हैं कि भाई से अलग क्यों रहना चाहिए। वे कुछ तो कहते होंगे कि भाई के साथ रहने में फलाँ बुराई है और इस कारण से अलग होना चाहिए। हो सकता है उन की इस बात के पीछे कोई गंभीर वजह हो। आप को अपने ससुराल पक्ष से पूछना चाहिए कि इस का कारण क्या है। यदि कारण पता लग जाए और वह वाजिब हो तो आप को उस कारण को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि कारण ऐसा है कि उसे दूर करना संभव नहीं हो तो ससुराल पक्ष का सुझाव स्वीकार कर लेना चाहिए।

ऐसा तो अक्सर होता है कि पति पत्नी के बीच के विचारों में पर्याप्त अंतर हो। लेकिन उस के बाद भी वे साथ रहते हैं। यह सब आपसी समझदारी से होता है। आप दोनों भी इस तरह अपने बीच आपसी समझदारी विकसित कर सकते हैं।  जो कि समय के साथ हो जाती है। यदि छह माह दूर रहने पर भी आप को कोई कमी महसूस नहीं होती, पत्नी के साथ इंटीमेट होने का मन नहीं होता तो यह आप के अंदर किसी तरह की हार्मोनल गड़बड़ी के कारण भी हो सकता है और यह अन्य कोई यौन समस्या भी हो सकती है। आप को चाहिए कि इस संबंध में किसी अच्छे मनोचिकित्सक से मिलें वह आप की समझाइश कर के तथा कुछ दवाएँ आदि दे कर आप के अंदर की इस उदासीनता को समाप्त कर सकता है।

यदि इन सब के बाद भी आप समझते हैं कि आप दोनों को अलग होना ही अच्छा हल है तो इस संबंध में खुल कर अपनी पत्नी से बात करें। उसे सारी समस्या बताएँ। हो सकता है आप की पत्नी इस समस्या का कोई अच्छा हल सुझा सके। हो सकता है वह भी इस समस्या को समझ कर आप से अलग होने को तैयार हो जाए। यदि ऐसा होता है तो सहमति से तलाक की अर्जी न्यायालय में दाखिल की जा सकती है। आप को यह भी सोचना चाहिए कि तलाक अपने आप में अनेक नई समस्याएँ खड़ी करता है। आप सोचें कि क्या क्या समस्याएँ तलाक से उत्पन्न होंगी और उन से कैसे निपटा जाएगा। आप यह भी सोचें कि आप के तलाक देने से आप की पत्नी के जीवन में क्या समस्याएँ पैदा होंगी और उन का क्या हल निकल सकता है।

मेरे विचार में आप और आप की पत्नी के बीच कोई बड़ी समस्या नहीं है जिसे किसी तरीके से हल न किया जा सके। इस कारण आप को इस मामूली समस्या को हल करना चाहिए। विवाहित जीवन मे डाइवोर्स तो अंतिम हल होता है इस कारण आप को फिलहाल डाइवोर्स का विचार त्याग देना चाहिए।

बेटी के साथ न्याय हो इस के लिए तलाक का विचार मन से निकाल देना चाहिए

rp_divorce-lawyer.pngसमस्या-

दीपक ने राजगढ़ मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे विवाह को 5 साल हो चुके हैं मेरे एक 3 साल कि बेटी है। परन्तु मेरे ग्रामीण पृष्ठभूमि का होने से मेरी सगाई जब मैं 5 साल का था तब ही तय कर दी गयी थी।  मेरी शादी घर वालों  ने  मेरी मर्जी के खिलाफ 20 साल कि उम्र में कर दी थी। मेरे घर वालों और मेरी पत्नी के घर वालों ने  मुझ पर मानसिक और भावनात्मक दबाव बना कर हमारी शादी कर दी थी। परन्तु मेरी पत्नी बिलकुल अनपढ़ है इस वजह से हम दोनों के बीच कभी नहीं बन पाई। अब मेरी पत्नी  मेरे घर वालों से उसकी लड़ाई कि वजह से उस के मायके में रह रही है। पर अब मैं उससे तलाक चाहता हूँ।  मैं उसे अपने घर नहीं लाना चाहता हूँ।  इसके लिए मैं गुजारा भत्ता भी देने को तैयार हूँ। पर मैं उसके साथ पूरा जीवन नहीं बिता सकता ये मेरा  आखिरी फैसला है,  कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

ब आप का विवाह हुआ तब आप अठारह वर्ष से अधिक की आयु के हो चुके थे और निर्णय ले सकते थे। उस समय आप के दबाव में आने की बात कुछ जमती नहीं है। कहीं न कहीं सहमति तो आप के अंदर भी थी वर्ना आप अपने घरवालों से मना कर सकते थे। अब आप पांच साल पत्नी के साथ रह चुके हो। उस के साथ यौन संबध भी बनाए हैं एक बेटी भी है। फिर आप ने कहा है कि वह आप के परिजनों से झगड़े के कारण अपने मायके में रह रही है, अर्थात आप के साथ उस का कोई झगड़ा नहीं है। उस के बारे में एक ही बात आप ने कही है कि वह अनपढ़ है। उस का झगड़ा आप के परिजनों से है, आप इस झगड़े में अपने परिजनों के साथ हैं अपनी पत्नी की ओर नहीं हैं और इसी कारण उसे छोडना चाहते हैं। पर तलाक के लिए यह कारण न तो सामाजिक रूप, लो न मानवीय दृष्टिकोण से सही है औऱ न ही यह कानूनी आधार हो सकता है। इस तरह आप के पास पत्नी से तलाक लेने का कोई कारण नहीं है।

जहाँ तक वह अनपढ़ है, वह भी तब जब उस का संभवतः 18 वर्ष की उम्र के पहले विवाह हो गया था, पांच वर्ष वह आप के साथ रही है। इतने सालों में कोशिश करते तो आप उसे साक्षर तो बना ही सकते थे।

मेरा मानना है कि आप को अपनी पत्नी के साथ रहना तय करना चाहिए। अपने परिवार में उस की पैरवी करनी चाहिए। यदि संयुक्त परिवार में रहना कठिन हो रहा हो तो अपनी पत्नी के साथ अलग रहना चाहिए। आखिर आप का अब अपना खुद का परिवार है जिस में एक तीन साल की बेटी है। तलाक होने पर उस का क्या होगा? यदि तलाक हुआ और बेटी की कस्टड़ी की बात चली तो आप की पत्नी की जीत होगी। बेटी उस के पास रहने पर वैसे ही अनपढ़ रह सकती है जैसे उस की माँ रह गयी है। क्या आप की बेटी के साथ यह अन्याय होना चाहिए? यदि आप न्याय के पक्ष में हैं और अन्याय के विरुद्ध तो आप को इस तलाक की बात को अपने मन से पूरी तरह निकाल देना चाहिए और बेटी को न्याय दिलाना चाहिए। इस के लिए यह जरूरी है कि आप पत्नी के साथ कैसे भी निबाहें। आप पढ़े लिखे हैं, वह अनपढ़ इस कारण भी निबाह की जिम्मेदारी भी आप की है।

बिना ठोस कानूनी आधारों के बिना तलाक संभव नहीं है।

rp_judicial-sep8.jpgसमस्या-

प्रवीण ने जंजगीर चम्पा, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरी शादी को मात्र 3 महीने हुए हैं। शादी के एक महीने बाद मुझे पता चला कि शादी के पहले किसी को प्यार करती थी और अभी भी करती है। उन दोनो के बीच की बात को सुन कर घृणा होने लगी। मैं अपनी बीवी को साथ नहीं रखना चाहता। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के विवाह को अभी मात्र 3 माह हुए हैं। इस तीन माह में किसी बातचीत के आधार पर आप ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि आप की पत्नी को किसी लड़के से प्यार था और अब भी है और आप मात्र इस आधार पर अपनी पत्नी से घृणा करने लगे और उस के साथ नहीं रहना चाहते। आप की यह सारी बात बहुत बचकाना है।

आप ने यह नहीं बताया कि यह बातचीत आप ने कैसे सुनी? वे फोन पर बात कर रहे थे या प्रत्यक्ष रूप से बात कर रहे थे? आप के अलावा भी उस बातचीत को किसी ने सुना है या नहीं? कोई भी तथ्य आप ने सामने नहीं रखा है।

विवाह के पहले आप की पत्नी क्या करती थी और क्या नहीं करती थी इस के बारे में आप को पूरी तरह से पता कर लेना चाहिए था। आप को अपने ससुराल वालों से और होने वाली पत्नी से भी बात कर लेनी चाहिए थी। यदि वे कोई बात बताते और गलत निकलती तो आप उन्हें कुछ कह सकते थे। पर आप ने विवाह के पहले तो इस तरह का कोई प्रयत्न नहीं किया।

किसी लड़की या लड़के का किसी व्यक्ति को विवाह के पहले या या बाद में प्यार करना अपराध नहीं है और न ही विवाह का किसी तरह उल्लंघन है जिस के आधार पर उस से अलग हुआ जा सके या तलाक लिया जा सके। किसी कानून में कहीं यह नहीं लिखा है कि किसी की पत्नी या पति किसी दूसरे के साथ प्यार करे तो उस से तलाक लिया जा सकता है।  यदि पति या पत्नी किसी दूसरे पुरुष या स्त्री के साथ यौन संबंध स्थापित करे तो इस आधार पर तलाक के लिए कार्यवाही की जा सकती है और यह तथ्य साबित होने पर न्यायालय तलाक की डिक्री आप को प्रदान कर सकता है। तलाक के लिए ठोस कानूनी आधार चाहिए जिन्हें सबूतों के साथ न्यायालय के समक्ष प्रमाणित किया जा सके। लेकिन जिन तथ्यों के आधार पर आपने समस्या भेजी है उन के आधार पर तो कुछ भी नहीं किया जा सकता।

बेहतर यह है कि आप बात की तह तक जाएँ और उसे समझने का प्रयास करें। हो सकता है आप की पत्नी ने किसी व्यक्ति के साथ प्यार किया हो और उस से विवाह न हो सका हो। उस प्यार के अवशेष अब भी मौजूद हों। लेकिन अब वह आप की विवाहिता है। उसे आप के साथ ईमानदारी से जीवन निर्वाह करना चाहिए। अपने वैवाहिक जीवन को शुचितापूर्ण रीति से चलाना चाहिए। लड़कियाँ इस तथ्य को समझती हैं और विवाह के बाद जीवन को एक नए तरीके से ढालने की कोशिश करती हैं। हो सकती है उस ने अपने किसी बहिन या भाई से ही इस तरह की बत की हो और आप का संदेह पूरी तरह गलत हो। आप को पत्नी के प्रति उपजी घृणा को त्याग कर  सहृदयता पूर्वक अपने दाम्पत्य को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

स्त्री या पुरुष अपने आधारों पर तलाक की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं, सहमति आवश्यक नहीं।

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धर्मेन्द्र सिंह ने जेहानाबाद बिहार से पूछा है-

गर पति न चाहे तब भी तलाक हो सकता है क्या? अगर हो सकता है तो उस का आरंभ कैसे करना होगा?

समाधान-

निश्चित रूप से आप से यह प्रश्न  किसी स्त्री ने पूछा होगा। या फिर हो सकता है किसी स्त्री की स्थिति को देख कर आप ने खुद सोचा हो कि क्या ऐसा हो सकता है? आप का सोचना बिलकुल सही है 1955 में हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी होने के उपरान्त से पत्नी और पति दोनों में से कोई भी कुछ निश्चित आधारों पर तलाक के लिए अर्जी दाखिल कर सकते हैं और आधार प्रमाणित हो जाने पर तलाक की डिक्री हासिल कर सकते हैं। बल्कि सहमति से तलाक तो तब भी आरंभ नहीं हुआ था इसे तो बाद में संशोधन के जरिए लागू किया गया। 1955 के पूर्व हिन्दु विवाह में किसी प्रकार का विवाह विच्छेद था ही नहीं।

स्त्री या पुरुष किन आधारों पर अपने जीवनसाथी से तलाक प्राप्त कर सकते हैं वे सब आधार हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-13 में वर्णित है। धारा 11व 12 का भी अध्यनयन करना चाहिए।

तलाक के लिए सब से पहले यह करें कि अपने इलाके के किसी अच्छे अनुभवी वकील से मिलें और सलाह करें। वह आप से बातचीत कर के यह बता सकेगा कि तलाक के लिए कोई आधार है या नहीं। यदि आधार है तो फिर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी दाखिल करने और डिक्री हासिल करने में आप की मदद कर सकता है।

बिना आवेदन किए तो तलाक नहीं होगा, डरने से तो समस्या बनी ही रहेगी।

rp_divorce.jpgसमस्या-

नन्द किशोर ने बरेली उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा विवाह 2008 में हुई थी। जून 2009 में मेरा एक्सीडेण्ट हुआ और सितम्बर 2009 में पत्नी मुझे छोड़ कर चली गयी। उस ने मुझ पर  498ए, 125 का केस कर दिया 498ए में सब की जमानत हो चुकी है ओर मुझ लगभग 3 दिन जेल में रहना पड़ा। 125 का केस डिसमिस हो चुका है। उस के चार माह बाद पत्नी ने  125 वा 125 (6) का केस फाइल कर दिया जिसमे 125(6) में अंतरिम मैंटीनेंस 1000 प्रति माह देना पड़ रहा है ओर मैं बेरोज़गार हूँ। शादी के टायर पंचर सुधारने का काम करता था उसी दौरान मेरा एक्सीडेंट हुआ था जिस में मेरा दायाँ पैर फ्रेक्चर हुआ था और रॉड डालनी पड़ी थी। अब भारी काम नहीं कर सकता और पिताजी पर पूरी तरह से निर्भर हूँ। इसी मार्च में पत्नी ने घरेलू हिंसा। फेमिली जज ने कुछ नहीं सुना और भरणपोषण की राशि तय कर दी।  अब पता चला है कि पत्नी किसी दूसरे पुरुष के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही है और  हर माह 4000-5000 कमा रही है। वह सरकार से अखिलेश पेंशन योजना में भी 500 रुपया प्रतिमाह ले रही है इस का सबूत मेरे पास है लेकिन नौकरी ओर दूसरे के साथ रहने का सबूत नहीं है। मैं ने प्रयत्न किया ता पर शायद पत्नी को पता चल गया और उस ने 498ए की बहस के दिन अपने पिता और ब्वाय फ्रेंड के साथ मुझे घेर लिया  और  जान से मरने की धमकी दी और दस लाख रुपए की मांग की। ओर इसकी सूचना मैंने ई मैल व रजि. डाक से एसएसपी, डीआईजी को दी। दो सप्ताह बाद एसएसपी के यहाँ से फोन आया और मुझे बुलाया पर विवेचना अधिकार का ट्रांसफर हो गया। फिर कोई फोन नहीं आया। वकील ने थाने जाने से मना कर दिया। कह रहा था कि तुम से रुपए ले लेंगे और चुपचाप बैठ जाएंगे। क्या मैं तलाक ले सकता हूँ। मेरा वकील कहता है कि तुम तलाक के लिए आवेदन दोगे तो वह धारा 24 का आवेदन कर देगी और तुम्हें मुकदमे का खर्च उठाना पड़ेगा।

समाधान-

प साधारण टायर पंचर का काम करते थे, एक्सीडेंट के बाद वह भी बंद हो गया। भारी काम न कर पाने के कारण भविष्य की संभावनाएँ समाप्त हो गयीं। पत्नी ने अपना भविष्य देखा और आप को छोड़ कर चली गयी। आप को उसी समय धारा 9 हिन्दू अधिनियम का आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए था। वह आप के साथ आ कर अब नहीं रहेगी। विवाह को समाप्त कराने के लिए आप को तलाक तो लेना होगा। इस के लिए जितनी जल्दी हो आप मुकदमा कर दें बेहतर है। धारा 24 के आवेदन की परवाह न करें। वह तो हर केस में लगता ही है। उस से डर कर मुकदमा न करेंगे तो फँसे ही रह जाएंगे।आप की समस्या का हल कभी न निकलेगा।

आप को प्रयत्न करना चाहिए और हर हालत में अपनी पत्नी के लिव-इन रिलेशन और कमाई करने के सबूत इकट्ठे करने चाहिए. यदि दोनों बातें सही हैं तो सबूत अवश्य मिलेंगे। इन सबूतों से ही आप को राहत मिलेगी। आप क्रूरता, स्वेच्छा से आप का घर छोड़ कर चले जाने और वापस नहीं आने और जार कर्म के आधार पर तलाक का मुकदमा कर सकते हैं और तलाक मिल सकता है। इन सबूतों के आधार पर ही उसे मेंटीनेंस मिलना भी रुक सकता है। आप को घेर कर धमकी देने के मामले आप को स्वयं पुलिस को सहयोग करना पड़ेगा। आप पुलिस को रुपया न दें लेकिन लगातार दबाव बनाएँ तो पुलिस कार्यवाही करेगी। यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो उस मामले में सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर मुकदमा दर्ज कराया जा सकता है।

मानसिक रूप से कमजोर होना विवाह विच्छेद का आधार नहीं हो सकता।

ChildMarriageसमस्या-

धर्मसिंह गुर्जर ने सिकन्दरा, जिला दौसा, राजस्थान से पूछा है-

मेरा बाल विवाह 16 साल कि उम्र मे 2008 मे  हुआ , तब मालुम नहीं था कि लड़की मानसिक रुप से कमजोर है वह तब से ही  अपने पिता के घर पर है मेरी  जन्म दिनांक 01.05.1992 है उम्र 24 है तथा मैं उस के साथ जीवन यापन नहीं कर सकता  कृपया उचित उपाय बताएँ।

समाधान-

बाल विवाह का कोई भी पक्ष पति या पत्नी स्वंय के बालिग होने की तिथि से दो वर्ष की अवधि में न्यायालय में आवेदन दे कर अपने विवाह को अकृत घोषित करवा सकता है। लेकिन आप की आयु अधिक हो चुकी है इस कारण आप बाल विवाह के आधार पर अपने विवाह को अकृत घोषित नहीं करवा सकते।

मानसिक रूप से कमजोर होना ऐसा कोई आधार नहीं है जिस के कारण किसी विवाह को समाप्त करने के लिए डाइवोर्स की डिक्री पारित की जा सके। इस कारण आप इस विवाह को इस आधार पर समाप्त नहीं कराया जा सकता है। अन्य कोई आधार आप के पास नहीं है।

आप को चाहिए कि आप अपनी पत्नी के साथ किसी भी तरह जीवन बिताने का सोचें। यदि विवाह के उपरान्त एक जीवन साथी किसी दुर्घटना में अपंग हो जाए तो उसे छोड़ा तो नहीं जा सकता।

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