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तलाक का आधार हो तो दूसरे पक्ष की सहमति की जरूरत नहीं।

समस्या-

नवीन ने साईखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को एक  साल हो चुका है। मेरी पत्नी छत से कूदने की, फाँसी लगाने की धमकी देती है। काम करने की मना कर चुकी है। शादी से पहले उसका अफ़ेयर रह चुका है। घर से 2 बार व मायके से 1 बार भाग चुकी है। एक रात कहीं रह चुकी है। 4 माह से उसका मानसिक इलाज़ करा रहा हूँ। दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करती है। तलाक की याचिका लगा दी है पर वो तलाक देने को तैयार नहीं है। क्या करूँ?

समाधान-

प के सवाल का छोटा सा जवाब है कि “मुकदमा लड़िए”।

आप की ही तरह मेरे पास ऐसे बहुत लोग समस्या ले कर आते हैं, जो यही कहते हैं कि मेरी पत्नी या पति तलाक के लिए राजी नहीं है। 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट प्रभावी होने के पहले तो भारत में कोई भी इस बात पर राजी नहीं था कि हिन्दू विवाह में तलाक होना चाहिए।

फिर हिन्दू मैरिज एक्ट आया तो उस में तलाक के प्रावधान आए जिन के अनुसार कुछ आधारों पर पति या पत्नी तलाक की मांग कर सकते थे, कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर केवल पत्नी तलाक की मांग कर सकती थी। लेकिन कानून के अनुसार इस के लिए अदालत में आवेदन देना अनिवार्य था। पति की अर्जी पर पत्नी या पत्नी की मर्जी पर पति अदालत में सहमत भी होता था तो तलाक होना असंभव था। स्थिति यह थी कि जो भी तलाक लेना चाहता/ चाहती थी उसे जिस आधार पर तलाक चाहिए था उसे साक्ष्य के माध्यम से साबित करना जरूरी था। आधार मुकम्मल रूप से साबित होने पर ही तलाक मिल सकता था। तलाक का यह तरीका हिन्दू मैरिज में अभी भी मौजूद है।

फिर  1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान आया। पहले यदि पति पत्नी दोनों सहमत होते हुए भी तलाक लेने जाते थे तब भी कम से कम एक पक्ष को विपक्षी के विरुद्ध तलाक के आधार को साक्ष्य से साबित करना पड़ता था। अब दोनों पक्षों के सहमत होने पर इस की जरूरत नहीं रह गयी। बस सहमति से तलाक का आवेदन पेश करें और छह माह बाद भी सहमति बनी रहे तो अदालत तलाक की डिक्री प्रदान करने लगी।

तो नवीन जी¡ तो कुछ समझ आया? आप के पास तलाक के लिए आधार मौजूद है। आपने अपनी समस्या में जो बातें लिखी हैं उन में से शादी के पहले के अफेयर की बात के सिवा सारी बातें अदालत में साबित कर देंगे तो आप को तलाक की डिक्री मिल जाएगी। उस के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है। बस ये है कि कुछ समय अधिक लगेगा।

कोई वैध आधार होने पर ही विवाह विच्छेद हो सकता है, या फिर सहमति से।

समस्या-

निर्वेश ने गॉव कुम्हारिया राव, तह. सोनकच्छ, जिला देवास, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं म.प्र.पुलिस में आरक्षक के पद पर पदस्थ हूँ|  मेरी शादी को 4 वर्ष बीत चुके हैं, मेरा एक 3 वर्षीय बालक भी है और मेरी पत्नी प्रेगनेंट है। मेरी पत्नी का मायका मेरे गाँव से केवल 12 किलोमीटर दूर है। उसी के गाँव के एक लडके से उसका अवैध सम्बध है, अवैध सम्बध की बात को लेकर जब मैं उसे उसके घर छोडने जा रहा था। तब वह मेरी बाइक से मेरे 3 वर्षीय बालक को लेकर कूद गई। जिसके कारण उसे मामूली एवं लडके को गम्भीर चोट आई। मेने उसके बाइक से कूदने की बात डाक्टर को नहीं बताया व ना ही थाने में इसकी रिपोर्ट दर्ज करवाई। मेरी सेलेरी 18000 है व ईलाज में मेरा 150000 रुपया खर्च हो चुका है। मैं मेरी पत्नी को रखना नहीं चाहता और वह मुझे छोडना नहीं चाहती।  मुझे तलाक लेने के लिए क्या करना चाहिए?  अगर वे मुझ पर 498a का केस करते हैं तो मेरी नौकरी में मुझे क्या समस्या आएगी? व भरण पोषण कितना देना होगा?

समाधान-

प को कैसे पता लगा कि आप की पत्नी के उस के गाँव के लड़के से अवैध संबंध हैं? हो सकता है कि यह आप की गलफहमी ही हो। यदि ये संबंध विवाह के पहले थे और अब नहीं हैं और आप की पत्नी आप के साथ पूरी ईमानदारी से रहना चाहती है तो हमें नहीं लगता कि आप को तलाक लेना चाहिए।

यदि आप यह साबित नहीं कर सकते कि आप की पत्नी का विवाह के बाद किसी अन्य पुरुष से कोई संबंध है तो आप अवैध संबंध के आधार पर तलाक नहीं ले सकते। आप किसी अन्य आधार पर तलाक ले सकते हैं या नहीं यह केवल तथ्यों पर निर्भर करेगा।

आप की पत्नी बच्चे की कस्टडी ले सकती है, वह गर्भवती है तो दूसरी संतान भी जन्म लेगी। यदि वह भऱण पोषण मांगती है तो आप को दोनों बच्चों और पत्नी के लिए भरण पोषण देना होगा जो कि आप के आधे या उस से अधिक वेतन के बराबर तक हो सकता है।

498ए में यदि आप की गिरफ्तारी होती है और आप 24 घंटों से अधिक हिरासत में रहते हैं तो आप का स्वतः ही निलम्बन हो जाएगा। तब विभाग कब आप को बहाल करेगा कोई नहीं बता सकता। यदि 498ए में आप को दंडित कर दिया जाए तो आप की सरकारी नौकरी भी जा सकती है।

विवाह के पूर्व जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए।

समस्या-

दिशा शर्मा ने मुजफ्फरपुर उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने 7.3.2017 को घऱ से छिप कर रजिस्टर्ड मैरिज की, दो साल से हमारे बीच प्यार था। उस का घर बनारस में बहुत दूर था, हम ट्रेन में मिले थे। हमने सोचा था कि एक साल बाद घर वालों को बताएंगे। मैं शादी के दिन ही घर आ गई किसी को पता नहीं चला। लेकिन मेरे पति ने शादी के 5 दिन बाद ही ड्रामा कर दिया। मेरे घर आ कर घरवालों और सभी रिश्तेदारों को धमकी और गालियाँ दीं। सोशल साइट पर मैरिज की फोटो डाल दी। मेरे घर पुलिस भी भेज दी कि मेरी पत्नी को मार रहे हैं। मुझे थाने जाना पड़ा। पूरे एरिया को पता चल गया। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही व्यक्ति है। मैंने उस से बात की तो कहने लगा उस ने ड्रिंक कर ली थी इस कारण यह सब हो गया। मेरे घर वाले बोले कि घर वालों के साथ आ कर विदाई करा लो। पर वह नहीं आया। उस का परिवार शादी के खिलाफ है उन्हों ने उसे घर से निकाल दिया है। वह फिर भी मेरे घर वालों को धमकी देता है। मैं ने उसे कहा है कि तुमने जो कुछ किया है उस के बाद मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती। फिर वह मुझे बहुत बुरा भला बोला और फिर कहा कि ड्रिंक कर ली थी। अभी 100 नंबर पर काल कर के फिर से पुलिस भेज दी है। अभी धारा 9 का केस कर दिया है। मेरे पापा नहीं हैं, माँ है और दो छोटे भाई हैं। मामा मदद कर रहे हैं। मैं क्या करूँ आप बताएँ। मैं घर वालों के साथ रहना चाहती हूँ।

समाधान-

प शायद पहले भी अपनी समस्या लिख चुकी हैं। उसी दिन आप के श्रीमान जी ने भी हमें अपनी समस्या लिख भेजी थी। हम ने शायद दोनों को उत्तर भी दिया था या हो सकता है न दिया हो।

शादी इतनी हलकी चीज नहीं होती कि छोटी मोटी घटना से टूट जाए। इस कारण वह हलके में नहीं करना चाहिए। आपने केवल लड़के का बनावटी व्यवहार और बातों, वायदों पर ध्यान दिया। जिन्दगी के अन्य पहलुओं पर सोचा ही नहीं। माँ के बाद आप ही परिवार में जिम्मेदार व्यक्ति थीं। आप को अपनी माँ और छोटे भाइयों के बारे में सोचना चाहिए था। भाइयों के आत्मनिर्भर होने तक आप को परिवार को सपोर्ट करना था यह भी भूल गयीं। धारा 9 के प्रकरण में कुछ नहीं होगा। डिक्री भी हो जाएगा तो भी कोई जबरन आप को उस के साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकता। अधिक से अधिक आप न जाएंगी तो उसे तलाक लेने का अधिकार मिल जाएगा। वह तो आप भी चाहने लगी हैं। लेकिन आप को भी तलाक के पहले खूब सोचना चाहिए। मेरी राय में अपने छोटे भाइयों के पैरों पर खड़े होने तक की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

विवाह से एक वर्ष तक की अवधि में तलाक का आवेदन नहीं दिया जा सकता। उस ने जो हरकतें की हैं वे क्रूरता की श्रेणी में आती हैं और विवाह का एक वर्ष पूर्ण होने पर इस आधार पर आवेदन दिया जा सकता है।

हिन्दू विवाह में झगड़े तलाक का कारण नहीं हो सकते।

समस्या-

रविकान्त ने अलीगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मै एक केन्द्रीय कमर्चारी हू और मेरी पत्नी एक राज्य कमर्चारी है। हमारी शादी को ८ साल हो गया है और हमारे २ लड़के पहला ५ साल दूसरा ३ साल भी है। आपसी झगड़े की बजह से साथ रहना मुश्किल हो गया है।  *क्या तलाक हो सकता है, मुझे क्या हर्जाना देना होगा?  बच्चे किसके पास रहेंगे? *मेरी पत्नी मुझ पर क्या-क्या इल्जाम लगा सकती है?

समाधान-

पसी झगड़े के कारण साथ रहना मुश्किल हो गया है, तो यह दुतरफा समस्या है यह आपसी बातचीत, समझदारी और सहमति से सुलझने वाला मामला है। यदि आप दोनों द्विपक्षीय रूप से बात न कर सकते हों तो कम से कम किसी एक मित्र या संबंधी जिस पर दोनों विश्वास कर सकें उसे बीच में डाल कर आपसी समस्याएँ हल करें। किसी काउन्सलर की मदद भी ली जा सकती है। यदि समस्या हल न हो और अन्तिम विकल्प विवाह विच्छेद ही हो तो दोनों सारी शर्तें कि कितना हर्जाना देना होगा, बच्चे किस के पास रहेंगे और कौन किस को कितना खर्चा देगा आदि आदि आपस में तय कर के सहमति से विवाह विच्छेद का आवेदन लगाएँ और सात-आठ माह में इस आवेदन पर विवाह  विच्छेद हो सकता है।

हिन्दू विवाह अधिनियम में विवाह विच्छेद इतना आसान नहीं है कि आप पत्नी के लिए किसी हर्जाने, पर सहमत हो जाएँ तो हो जाए। वह कानून में वर्णित आधारों पर ही आवेदन कर्ता को प्राप्त हो सकता है। वह भी अपने आधार को प्रमाणित कर देने पर। आप ने अपनी समस्या में ऐसे कोई तथ्य नहीं रखे हैं जिस से कोई आधार विवाह विच्छेद हेतु बनता हो।

पति पत्नी के अलग होने पर बच्चों की अभिरक्षा का प्रश्न इस बात से तय होता है कि बच्चों का हित कहाँ अधिक सुरक्षित है। इस की जाँच दोनों पक्षों द्वारा न्यायालय के समक्ष रखे गए तथ्यों और सबूतों के आधार पर किया जा कर निर्णय होता है। आम तौर पर बच्चों की अभिरक्षा पत्नी को ही मिलती है और पति को उन के भरण पोषण के लिए हर माह नियमित राशि देनी होती है। यह राशियाँ इस बात से तय होती हैं कि दोनों की आमदनी कैसी है, सामाजिक और आर्थिक स्थिति कैसी है।

यदि आप वास्तव में तलाक लेने जैसे कदम उठाने जा रहे हैं तो आप को वकील से रूबरू मिल कर परामर्श करना चाहिए। उसी से आप को ठीक राह मिलेगी।

 

पत्नी से किसी तरह संपर्क साधने का प्रयत्न करें।

समस्या-

सूरज सिंह ने फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने 16 फरवरी 2017 को रजिस्ट्री ऑफीस और आर्य समाज मंदिर में बिना फॅमिली को बताए शादी की। उसी दिन वाइफ अपने घर गई और फिर आने से मना कर दिया। उस के घर वाले किसी कीमत पर नहीं चाहते कि हम साथ रहें।  वो उन की बात मान रही है। उस के घऱ वाले मुझे गाली देते हैं। मैं ने डिप्रेशन में आ कर शराब पी ली। और गालियाँ दे ली और उल्टा पुल्टा बोल दिया और शादी के फोटो उस के घर वालों की फेसबुक आईडी पर पोस्ट कर दिए। जब मुझे लगा कि उसे कहीं कुछ न हो जाए तो 100 नंबर पर फोन कर दिया और पुलिस को वहाँ भेज दिया। उस के घर वालों ने मेरा गाली  गलौच वाला फोन उसे सुना दिया। अब वो भड़क गयी। ना कोई बात करती है ना उस के घऱ वाले बात करते हैं। मैं अब क्या करूँ उस के बिना नहीं रह सकता। हमारे घरों में 700 किलोमीटर की दूरी है। और उस के घर के पास मेरा कोई नहीं। क्या वह उस रिकार्डिंग से डाइवोर्स ले सकती है? कुछ भी हो जाए पर मैं डाइवोर्स नहीं देना चाहता।

समाधान-

प बेकार घबरा रहे हैं। एक फोन काल रिकार्डिंग के आधार पर कोई तलाक नहीं हो सकता। यदि आप की शादी का पंजीकरण हो गया है तो या तो आप की पत्नी को अपना विवाह किसी तरह से अकृत कराना होगा या फिर आप से तलाक लेना होगा। दोनों काम अदालत में आवेदन किए बिना संभव नहीं हैं। उस का आप को नोटिस आएगा। आप चाहें तो प्रतीक्षा कर सकते हैं।

प्यार में मिलन ही नहीं होता, विछोह भी होता है। आप  ने प्यार किया और विवाह कर लिया। अब कुछ दिन विछोह के भी गुजारें। दो चार सप्ताह में बात पुरानी होने पर अपनी पत्नी से किसी तरह संपर्क साधने का प्रयत्न करें और हो सके तो बातचीत आरंभ करिए। उस का जो भी थोड़ा बहुत विश्वास टूटा है उसे फिर से जोड़िए। आप को लगे कि पत्नी में आप के प्रति थोड़ी भी सकारात्मकता है तो अदालत में धारा 9 का आवेदन लगाएँ, दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए।

हिन्दू विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

समस्या-

घनश्याम पाण्डेय ने सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


 मेरे पड़ोस में मेरी मुँह बोली बहन रहती है। जिसका विवाह मात्र १२ वर्ष के उम्र १९९८ में ही कर दिया गया। यह बाल विवाह ही था, लड़के की उम्र १२ साल ही थी।  खैर यह शादी मात्र चार वर्ष ही चली और २००२ में पंचायत के सामने तलाक करवा दिया गया और उनसे कोई संतान नहीं हुई।  बहन का दूसरा विवाह लगभग १८ की उम्र में २००४ में हुआ, जहाँ पर उसे दो लड़की संताने भी हुई, साल २०११ में उसे दूसरी लड़की पैदा होने पर घर से निकाल दिया गया। अतः वह तब से मायके में ही रहती है। उसके ननद, देवर और पति सभी उस पर अत्याचार करते हैं। जब वह जाती है, बड़ी बेरहमी से पति, देवर मार कर उसे भगा देते हैं।  बहन के मायके वाले भी ज्यादा सहयोगी नहीं। अतः पुनः २०१५ के एक साधारण समारोह द्वारा उसका तीसरी जगह जबरदस्ती घरवालों ने विवाह करवा दिया।  जो कि वैवाहिक संस्कार करके नहीं किये गए थे, उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। लेकिन यह विवाह भी मात्र २ महीने न चला। अब बहन आज भी बार बार दूसरे विवाह के पति के घर जाती है, जहाँ पर उसकी बड़ी बेटी ले ली गयी, जब कि दूसरी बेटी को पति अपनी संतान स्वीकार नहीं करता है। जब उसका जन्म पति के घर में ही हुआ। अतः ऐसी परिस्थिति में बच्चों के क्या अधिकार अपने नैसर्गिक पिता से बनते हैँ तथा बहन भी क्या अपने दूसरे पति के अधिकार प्राप्त कर सकती है। वह अत्यंत गरीब अवस्था में है, माँ-बाप तथा पति सभी उसके खिलाफ हो गए। वह अपनी छोटी बेटी के साथ किसी तरह गुजारा कर रही है। अतः बच्चों और बहन का क्या अपने दूसरे पति के ऊपर क़ानूनी अधिकार बनता है। बहन आज भी अपने पति के घर जाना चाहती है तथा लगभग पागलपन की अवस्था पर पहुँच गयी है।

समाधान-

हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की डिक्री से ही समाप्त हो सकता है इस कारण से आप की मुहँबोली बहिन यदि अनुसूचित जनजाति से नहीं है तो उस का पहला विवाह आज तक भी समाप्त नहीं हुआ है। उस का पहला पति ही उस का वैधानिक पति है। पहले पति से विवाह विच्छेद वैधानिक न होने से दूसरा विवाह वैध नहीं था। इस कारण आपकी बहिन का दूसरे पति से कोई अधिकार नहीं है। लेकिन उस की दोनों संतानें दूसरे पति से हैं इस कारण संतानों को अपने पिता से भरण पोषण पाने का अधिकार है। तीसरे पति के साथ आप की बहिन दो माह से भी कम समय रही है वह रिश्ता एक लघु अवधि का लिव इन था। इस कारण इस संबंध से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है।

अभी तक आपकी मुहँ बोली बहिन का पहले पति से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ है इस कारण वह पहले पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है। इस के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकती है। इस के साथ ही वह अपनी छोटी पुत्री के लिए अपने दूसरे पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है।

दहेज प्रताड़ना की एफआईआर निरस्त होने के आदेश की प्रतियाँ अन्य सभी मामलों में प्रस्तुत करें।

समस्या-

सुनील ने अहमदाबाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी फरवरी 2014 में हुई थी मेरी पत्नी को मिर्गी का रोग है। जो हमको बताए बिना शादी की थी। मुझे यह बात नवम्बर 2014 में पता चली। फिर मेरी पत्नी मायके गई तो मैंने उसे तलाक की नोटिस भेजी। तलाक की नोटिस भेजने के बाद में उसने मुझ पर दहेज का झूठा केस लगाया जिसके कारण मुझे और मेरी फैमिली को लॉकअप में रहना पड़ा। उस केस को हमने हाईकोर्ट में रखा मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने मेरी पत्नी की पूरी FIR रद्द की और हमको बरी कर दिया। मेरी वाइफ ने सूरत में 125 भरण पोषण के लिए और डोमेस्टिक वायलेंस का केस घरेलू हिंसा के लिए किया है वे अभी चल रहे हैं और अहमदाबाद में तलाक का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है अगर दहेज का केस झूठा निकलता है तो पति को तलाक का पूरा अधिकार है। उसके तहत और मेरी पत्नी को मिर्गी की बीमारी है उसको छुपाकर शादी की है उसके तहत में तलाक लेना चाहता हूं। लेकिन कोर्ट की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि मैं तलाक की प्रक्रिया फास्ट करने के लिए क्या कर सकता हूँ। जिसके कारण तलाक के केस की जल्दी तारीख पड़े मेरा केस जल्दी पूरा हो। हाई कोर्ट ने मेरी वाइफ की 498 की जो FIR रद्द की है उस पर मुझे डोमेस्टिक वायलेंस यानी घरेलू हिंसा अधिनियम में क्या फायदा हो सकता है? कृपया कर अपना सुझाव दीजिए। मैं नवंबर 2015 से अपने भाई, बुआ के लड़के के घर पर रह रहा हूँ और मेरी अभी पीएचडी की पढ़ाई चालू है। अगर कोर्ट भरण पोषण की रकम तय करती है तो मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी और कहीं जॉब ढूंढना पड़ेगा क्या? कोर्ट फैसला दे सकती है कि तुम अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठाओ? क्योंकि मैं अपने मम्मी पापा से अलग हो गया हूँ वह मुझे अपने घर में नहीं रखते, मेरी पढ़ाई लिखाई का खर्चा मेरे भाई उठाते हैं।

समाधान-

मुकदमा निपटने की प्रक्रिया फास्ट होने का कोई माकूल तरीका नहीं है। देरी इस कारण होती है कि देश में पर्याप्त मात्रा में न्यायालय नहीं हैं। न्यायालयों की कमी को केवल राज्य सरकारें ही पूरी कर सकती हैं। फिलहाल आप यह कर सकते हैं कि उच्च न्यायालय में रिट लगवा कर अदालत के लिए यह निर्देश जारी करवा सकते हैं कि आप के मुकदमे में सुनवाई जल्दी की जाए और नियत समय में आप के मुकदमे में निर्णय पारित किया जाए।

498 ए की प्रथम सूचना रिपोर्ट रद्द होने के निर्णय की प्रतियाँ आप अपने सभी मामलों में प्रस्तुत करें। वह आप को लाभ देगी। इस से यह साबित होगा कि आप की पत्नी की ओर से मिथ्या तथ्यों के आधार पर आप के विरुद्ध मुकदमे करने का प्रयत्न किया गया है। इस से आप को लाभ प्राप्त होगा।

न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकती है लेकिन इस के लिए वह आप को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह सकती। वह यह कह सकती है कि जब आप कमाते नहीं थे, अध्ययनरत थे और पत्नी का खर्च नहीं उठा सकते थे तो आप को विवाह नहीं करना चाहिए था। वैसे इस परिस्थिति में पत्नी का भरण पोषण इतना नहीं होगा कि उसे अदा करने के लिए आप को पढ़ाई छोड़नी पड़े।

मुस्लिम स्त्री क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है।

समस्या-

मोहम्मद असलम ने मया बाजार, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी बहन जिसका नाम काल्पनिक जोया की शादी 3 साल पहले अहमदाबाद निवासी फिरोज के साथ हुई थी, मेरी बहन की भी दूसरी शादी है और फिरोज की भी यह दूसरी शादी है, दोनों की एक-एक तलाक हो चुका है। पिछले 3 सालों से लगातार मेरी बहन के पति का व्यवहार क्रूरतम से क्रूरतम रहा है, उसका पति और उसके पूरे परिवार वाले उसको प्रतिदिन प्रताड़ित करते हैं, उन लोगों के मारपीट से तंग हो कर मेरी बहन अब उस घर में रहना नहीं चाहती और अपने पति से तलाक चाहती है। मेरा घर फैजाबाद उत्तर प्रदेश में है मेरी बहन के हस्बैंड का घर अहमदाबाद जिला गुजरात में है। अगर हम कानूनी रुप से तलाक लेना चाहें और मेरी बहन का हस्बैंड तलाकनामे पर साइन ना करें और वह जाकर दूसरी औरत के साथ शादी कर ले तो इस पोजीशन में मेरी बहन क्या कर सकती है? क्योंकि मुस्लिम में पुरुष तो शादी कर सकता है,  और मेरी बहन को जब तक तलाकनामा नहीं मिलेगा तब तक यह तीसरी शादी कर नहीं सकती ऐसी स्थिति में मेरी बहन के लिए क्या कानून है?


समाधान-

मुस्लिम समाज में यह अज्ञान है कि मुस्लिम महिला को विवाह विच्छेद कराने का अधिकार नहीं है। यह एक तरह का भ्रम है जो जानबूझ कर फैलाया जाता है। मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक लेने का हक है और वे कुछ निश्चित आधारों पर तलाक की डिक्री पारित करने के लिए दीवानी न्यायालय (जहाँ पारिवारिक न्यायालय हैं वहाँ पारिवारिक न्यायालय) के समक्ष विवाह  विच्छेद कराने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं और न्यायालय विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकता है।

दी डिसोल्यूशन ऑव मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 की धारा 2 में उन आधारों का वर्णन किया गया है जिन पर एक मुस्लिम महिला अपने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकती है। इन आधारों में एक आधार क्रूरतापूर्ण व्यवहार का भी है। आपकी बहिन के साथ क्रूर से क्रूरतम व्यवहार हुआ है तो वे इस आधार पर खुद विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस वाद में न्यायालय का क्षेत्राधिकार दो तथ्यों से तय होगा पहला यह कि जहाँ प्रतिवादी रहता है, दूसरा वहाँ जहाँ वाद कारण पूरी तरह व आंशिक रूप से उत्पन्न हुआ है। तो इस मामले में वाद कारण भी अहमदाबाद में ही उत्पन्न हुआ है। दोनों ही आधारो पर यह वाद अहमदाबाद में दाखिल करना पड़ेगा। लेकिन वाद दाखिल करने के उपरान्त सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा कर वाद को फैजाबाद स्थानान्तरित कराने का प्रयत्न किया जा सकता है।

हिन्दू विधि में तलाक/ विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

विवाह विच्छेद का विचार फिलहाल त्याग कर अपने बीच की समस्याएँ समझ कर हल करने की कोशिश करें।

समस्या-

हेमन्त प्रताप सिंह ने कानपुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2014 में हुई थी, मेरी ससुराल वाले धनी परिवार से हैं। मैं एक प्राइवेट फर्म में काम करता हूँ। हमारे विचार एक दूसरे से कभी नहीं मिले। मेरा ससुराल पक्ष मेरे ऊपर दबाव डालता है कि आप अपने भाई से अलग रहो। छह छह माह एक दूसरे से दूर रहते हैं और मुझे कोई कमी भी महसूस नहीं होती। मेरा उन के साथ इंटीमेट होने का मन भी नहीं करता। मेरे मन में डाइवोर्स का ख्याल आया कि क्यों न हम कानूनी तौर पर अलग हो जाएँ। लेकिन घर वाले डरते हैं कि वे धनी लोग हैं हमें दहेज एक्ट में फँसा देंगे। मेरा मार्गदर्शन करें।

समाधान-

मुझे नहीं लगता कि आप के बीच कोई बड़ी समस्या है। आप ने यह तो बताया कि ससुराल पक्ष आप पर दबाव डालता है कि आप भाई से अलग रहें। लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि जब वे यह बात करते हैं तो क्या तर्क देते हैं कि भाई से अलग क्यों रहना चाहिए। वे कुछ तो कहते होंगे कि भाई के साथ रहने में फलाँ बुराई है और इस कारण से अलग होना चाहिए। हो सकता है उन की इस बात के पीछे कोई गंभीर वजह हो। आप को अपने ससुराल पक्ष से पूछना चाहिए कि इस का कारण क्या है। यदि कारण पता लग जाए और वह वाजिब हो तो आप को उस कारण को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि कारण ऐसा है कि उसे दूर करना संभव नहीं हो तो ससुराल पक्ष का सुझाव स्वीकार कर लेना चाहिए।

ऐसा तो अक्सर होता है कि पति पत्नी के बीच के विचारों में पर्याप्त अंतर हो। लेकिन उस के बाद भी वे साथ रहते हैं। यह सब आपसी समझदारी से होता है। आप दोनों भी इस तरह अपने बीच आपसी समझदारी विकसित कर सकते हैं।  जो कि समय के साथ हो जाती है। यदि छह माह दूर रहने पर भी आप को कोई कमी महसूस नहीं होती, पत्नी के साथ इंटीमेट होने का मन नहीं होता तो यह आप के अंदर किसी तरह की हार्मोनल गड़बड़ी के कारण भी हो सकता है और यह अन्य कोई यौन समस्या भी हो सकती है। आप को चाहिए कि इस संबंध में किसी अच्छे मनोचिकित्सक से मिलें वह आप की समझाइश कर के तथा कुछ दवाएँ आदि दे कर आप के अंदर की इस उदासीनता को समाप्त कर सकता है।

यदि इन सब के बाद भी आप समझते हैं कि आप दोनों को अलग होना ही अच्छा हल है तो इस संबंध में खुल कर अपनी पत्नी से बात करें। उसे सारी समस्या बताएँ। हो सकता है आप की पत्नी इस समस्या का कोई अच्छा हल सुझा सके। हो सकता है वह भी इस समस्या को समझ कर आप से अलग होने को तैयार हो जाए। यदि ऐसा होता है तो सहमति से तलाक की अर्जी न्यायालय में दाखिल की जा सकती है। आप को यह भी सोचना चाहिए कि तलाक अपने आप में अनेक नई समस्याएँ खड़ी करता है। आप सोचें कि क्या क्या समस्याएँ तलाक से उत्पन्न होंगी और उन से कैसे निपटा जाएगा। आप यह भी सोचें कि आप के तलाक देने से आप की पत्नी के जीवन में क्या समस्याएँ पैदा होंगी और उन का क्या हल निकल सकता है।

मेरे विचार में आप और आप की पत्नी के बीच कोई बड़ी समस्या नहीं है जिसे किसी तरीके से हल न किया जा सके। इस कारण आप को इस मामूली समस्या को हल करना चाहिए। विवाहित जीवन मे डाइवोर्स तो अंतिम हल होता है इस कारण आप को फिलहाल डाइवोर्स का विचार त्याग देना चाहिए।

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