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देश भर में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं जो मजदूर को उस की बकाया मजदूरी साल भर में भी दिला दे।

समस्या-

महेन्द्र सिंह ने पोर्वोरिम, गोआ से समस्या भेजी है कि-

मै उत्तराखण्ड का रहने वाला हूँ, मैं गोआ के 4 स्टार होटल मे काम करता था। एक साल काम करने के बाद कुछ कारणवश मुझे काम छोड़ना पडा। उसके बाद जल्दी कहीँ काम न मिलने पर मैं एक छोटा होटल में जनवरी से मई तक 5 माह काम किया। उनसे 10 हजार रुपयोँ पगार की बात हुई थी। जिसमें उसने केवल जनवरी का एक महिने का पगार दिया था।  उसके वह बात टालने लगा। कल दूँगा.परसोँ दूँगा. 2-3 दिन मेँ दूँगा, ऐसे करके बात टालने लगा। मैंने मई लास्ट में काम छोडा। उनकी ओर  मेरा 40 हजार रुपया बाकी है। घर वालोँ ने मेरी सगाई तय किया था, जिससे मुझे जून मे घर जाना था पैँसे न मिलने के कारण घर नहीं जा पाया। मेँ घर मै खाली बैठा पडा हूँ। मालिक से पैसो की प्रतीक्षा करते-2 दो महिना हो गया है और वह पैसे देने का नाम नही ले रहा है। मुझे गोआ में 2 वर्ष होने वाला है और मैं घर नही जा पा रहा हूँ। घर वालोँ का कॉल पे कॉल आ रहा है, लेकिन शर्म के मारे मैं उनका कॉल रिसीव नहीं कर पाता हूँ और हाल ही में मेरे पास एक भी रुपया नहीं है। ऐसे लाईफ से सुसाईड बेहतर है। मेरी बातोँ का बुरा मत मानना सर। आप ही बताईए इसका हल किस प्रकार करुँ।

समाधान-

प को सब से पहले तो यह समझना चाहिए कि आप ने मेहनत की है और आप के मालिक ने आप को चार माह की मजदूरी नहीं दी तो इस में आप का कोई कसूर नहीं है। इस के लिए परिवार वालों या किसी भी अन्य व्यक्ति के सामने आप को शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं है। इस तरह आप अपनी तकलीफ और अपने विरुद्ध हुए अन्याय को छुपा रहे हैं और आप अन्याय करने वाले आप के उस मालिक को जो आप की मजदूरी को दबाए बैठा है और डकार जाना चाहता है उस की मदद कर रहे हैं। आप को तो इस अन्याय के विरुद्ध पूरी ताकत से चिल्लाना चाहिए। मजदूरी न देने वाले मालिक की उस के आसपास के इलाके में खूब बदनामी करनी चाहिए कि इस होटल वाला बेईमान है, उस के हर ग्राहक को बताना चाहिए कि होटल वाला कितना बेईमान है।

आप ने जिस छोटे होटल में काम किया उस के मालिक से आप का मजदूरी का जो कांट्रेक्ट हुआ वह लिखित में नहीं केवल मौखिक हुआ होगा। आप के पास इस तरह का कोई सबूत नहीं होगा जिस से आप साबित कर सकें कि मजदूरी की क्या दर तय हुई थी। आप ने वहाँ वाकई 5 माह काम किया है। न तो कोई हाजरी रजिस्टर होटल वाले ने रखा होगा और रखता होगा तो उस में आप का नाम नहीं लिखा होगा।

देश में वेतन भुगतान अधिनियम 1936 नाम का एक कानून है। मजदूरी न देने पर कोई भी मजदूर जिस का नहीं दिया गया है, वेतन बकाया होने के एक वर्ष की अवधि में इस अधिनियम में नियुक्त प्राधिकारी के यहाँ बकाया वेतन की वसूली के लिए दावा कर सकता है। गोआ में जहाँ आप ने काम किया है उस इलाके के श्रम विभाग में जा कर बकाया वेतन का दावा कर दें। यदि आप यह साबित करने में सफल हुए कि आप कि मजदूरी बकाया है तो प्राधिकारी आप को वेतन देने का आदेश नियोजक को देगा। और न देने पर वेतन की वसूली जुर्माने की तरह वसूल कर आप को दिलाएगा। लेकिन यह प्रक्रिया ऐसी है कि इस में कम से कम साल दो साल लग जाएंगे। तब तक आप गोआ में नहीं रह सकते। आप नहीं रहेंगे तो आप का यह मुकदमा खारिज हो जाएगा। इस तरह मजदूर को मजदूरी दिलाने का जो सरकारी इन्तजाम है वह केवल दिखावे का है। उस के भरोसे रहना बेवकूफी है। असल में इस देश में कोई इन्तजाम नहीं है कि एक मजदूर की बकाया मजदूरी सरकार उसे शिकायत मिलने के बाद एक दो माह में मजूर को दिला दे।

बेहतर यह है कि उस इलाके के अपने परिचितों और अन्य व्यक्तियों को जो आप के साथ खड़े होने को तैयार हों ले कर होटल मालिक के सामने जाएँ और मजदूरी देने को कहें। कहें कि यदि मजदूरी न दी तो होटल की बदनामी करेंगे, यदि होटल वाला इस तरह मजदूरी दे तो ठीक है वर्ना सोच लें कि यह मजदूरी बट्टे खाते गई।

 

भारतीय सत्ता अब जनतांत्रिक नहीं, चरित्र से पूंजीपतियों, भूस्वामियों और उन के विदेशी दोस्तोें की तानाशाही बन चुकी है।

Market dictatorshipसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी कंपनी पिछले 1 साल से वेतन का भुगतान समय पर नहीं कर रही है। हर महीने 14 से 20 तारीख को कर रही है। एक साल पहले 7 तारीख तक भुगतान कर दिया जाता था। कुल 250 से 300 कर्मचारी है PF, ESI, सही है। पर वेतन समय पर मिले इस के लिए क्या करें?

समाधान-

जिन उद्योगों में 1000 से कम कर्मचारी हैं उन में अगले माह की 7 तारीख तक तथा जहाँ 1000 या अधिक कर्मचारी हैं उन में कर्मचारियों को 10 तारीख तक वेतन का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। इस के बाद किया गया भुगतान देरी से किया गया भुगतान है। जिस में प्रत्येक कर्मचारी को हर बार 25 रुपया जुर्माना दिलाया जा सकता है। लेकिन उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में मुकदमा करना पड़ेगा। यदि आप अकेले मुकदमा करेंगे तो प्रबंधन आप को किसी भी तरह से नौकरी से निकाल देगा। इस कारण यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। इसे लड़ने के लिए सारे उद्योग के श्रमिकों को एक जुट होना पड़ेगा।

कुछ साल पहले तक यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नियोजक से समय पर वेतन दिलाए। यदि समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता था तो श्रम विभाग के निरीक्षक उस नियोजक के विरुद्ध श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ मुकदमा करते थे। लेकिन अब सरकारों ने श्रमिकों की ओर से मुकदमा करना बन्द कर दिया है। सरकारों का मानना है कि वेतन समय पर दिलाना सरकारों का नहीं बल्कि कानून और अदालत का काम है। यदि समय पर वेतन चाहिए तो मजदूर खुद मुकदमा करे। मुकदमा करने के लिए काम से गैर हाजिर हो, नुकसान उठाए। इस तरह वह मुकदमा करेगा ही नहीं और उद्योगपति अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे। यही मौजूदा भाजपा और पिछली कांग्रेस सरकार का सत्य है। वे मालिकों के लिए बनी हैं और उन के लिए ही काम करेंगी। श्रम विभाग में अफसर नहीं हैं। तीन चार अदालतों को एक अफसर चलाता है। फैसले बरसों तक नहीं होते। श्रम न्यायालय भी जरूरत के अनुसार नहीं हैं। जिस से 30-35 साल पुराने मुकदमे भी अभी तक लंबित पड़े हैं।

दि कोई उद्योग एक माह देरी से वेतन देता है तो उस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन साल भर से यही हो रहा है तो सरकार को खुद उस पर मुकदमा चलाना चाहिए और मजदूरें को देरी के एक एक दिन का ब्याज 12% की दर से पैनल्टी के साथ दिलाना चाहिए। वैसे भी मजदूर रोज काम करता है और कमाता है। उस कमाई को एक माह से अधिक समय तक अपने पास रख कर उद्योगपति मुनाफा कमाता है। उस का कोई हिसाब नहीं होता। ब्रिटेन में वेतन इसी कारण हर सप्ताह भुगतान किया जाता है जिस से मजदूर की मजदूरी का पैसा मालिक के पास अधिक दिन न रहे और मालिक अनुचित लाभ न उठाए।

ब हर उद्योग के मजदूर को संगठित होना पड़ेगा। केवल एक उद्योग के मजदूर को नहीं अलग अलग उद्योगों के मजदूरों को भी आपस में संगठित होना पड़ेगा। अब उन की लड़ाई केवल सामुहिक सौदेबाजी या अदालत की नहीं रह गयी है। क्यों कि इन दोनों तरह की लड़ाइयों को सरकार मालिकों के पक्ष में तब्दील कर देती है। इस तरह हमारे देश की व्यवस्था भी जनतांत्रिक नहीं रह गयी है। वह कहने को जनतांत्रिक है लेकिन चरित्र में वह पूंजीपतियों-भूस्वामी वर्गों की शेष जनता पर तानाशाही है।

ब मजदूरों की समस्याओं का इस देश में एक ही इलाज रह गया है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में राजनैतिक रूप से संगठित हों और वर्तमान सत्ता को पलट कर अपनी वर्गीय सत्ता स्थापित करें। तभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों और उन के दोस्त विदेशी पूंजीपतियों की इस तानाशाही को धराशाही किया जा कर जनता का जनतंत्र स्थापित किया जा सकता है।

अविश्वसनीय नियोजक के यहाँ एक दिन भी नौकरी करना ठीक नहीं।

No employmentसमस्या-
आगरा, उत्तर प्रदेश से अजय गुप्ता ने पूछा है –

मैं 8  महिने पहले आगरा की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था, जिस में मेरी सेलरी 11,500/- थी। वहाँ पर काम करते हुए मेरे पास एक दूसरी कंपनी से ऑफर आया, जहाँ मेरी सेलरी 12000/- तय की गयी और कंपनी के चार्टर्ड अकाउंटेंट के द्वारा मुझसे यह बोला गया कि 3 महीने के बाद हम आपकी सेलरी बढ़ा देंगे। मैं ने वह कंपनी जोइन कर ली। लेकिन मेरा वहाँ किसी भी प्रकार का रेजिस्ट्रेशन नही हुआ और न ही मुझे अपायंटमेंट लेटर दिया गया। मुझे दूसरी वाली कंपनी में काम करते 8 महीने हो चुके हैं, मेरा किसी भी प्रकार का इन्क्रिमेंट नहीं हुआ। मैं वहाँ पर बहुत अच्छी तरह से काम कर रहा हूँ। मैं ने कंपनी के सी.ए. से सेलरी मे इनक्रिमेंट की बात की तो उन्हों ने बोला कि नये नये लड़के 8000 से 10000 रुपये में आ रहे हैं। इसलिए आपका इन्क्रीमेंट नहीं होगा। अब मुझे कंपनी के अकाउंटेंट और चार्टर्ड अकाउंटेंट के द्वारा काम नहीं दिया जा रहा है और डेली कोई ना कोई बहाना बताकर कंपनी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कंपनी के मालिक कंपनी में नहीं बैठते कंपनी को सिर्फ़ कंपनी का चार्टर्ड अकाउंटेंट ही ऑपरेट करता है। मुझे क्या करना चाहिए जिससे मुझे काम भी मिले ओर सेलरी भी बढ़े।  कृपया जल्द ही रास्ता बताएँ।

समाधान –

प ने केवल पाँच सौ रुपए की बढ़ौतरी के लिए पुरानी कंपनी छोड़ कर गलती की है। पाँच सौ रुपए प्रतिमाह की बढ़ोतरी ऐसी नहीं कि जिस के लिए कोई पुरानी नौकरी छोड़ी जाए। तीन माह बाद आप का वेतन बढ़ाने की बात भी मौखिक झाँसा मात्र ही था। आप को कोई नियुक्ति पत्र भी नहीं दिया और न ही इस बात का सबूत आप के लिए छोड़ा है जिस के आधार पर आप यह कह सकें कि आप कब से उस कंपनी में काम कर रहे हैं।

वास्तव में हुआ यह है कि कंपनी को उस समय काम करने वाले नहीं मिल रहे थे। उन्हों ने आप को झाँसा दे कर आप की नौकरी छुड़वा दी और काम निकाल लिया। अब उन्हें नए लड़के कम वेतन पर मिल रहे हैं तो वे आप को अधिक वेतन दे कर क्यों काम पर रखेंगे? आप का सेवा काल भी अभी इस कंपनी में इतना नहीं हुआ है कि उन्हें आप को सेवा से अलग करने के लिए कोई नोटिस और मुआवजा आदि देना पड़े। आप के काम की शर्तें भी तय नहीं हैं।

वे आप को काम पर नहीं ले रहे हैं इस का सीधा अर्थ यही है कि उन्हों ने आप को काम से अलग कर दिया है। ऐसे अविश्वसनीय नियोजक के यहाँ एक दिन भी नौकरी करना बेकार है। बेहतर यही है कि जितने दिन आप ने वहाँ काम किया है उस का वेतन ले कर उस कम्पनी को आप खुद छोड़ दें और कोई बेहतर नौकरी तलाश करें। इस बार नियुक्ति पत्र भी प्राप्त करें और शर्तें भी लिखित में तय कर लें। इस संस्थान से लड़ कर भी आप को कुछ नहीं मिलेगा।

शासकीय कर्मचारी वेतन अदा न करने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत कारण पूछें।

समस्या-

बलरामपुर, छत्तीसगढ़ से उत्तम साहू ने पूछा है-

मैं शिक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत हूँ। पति-पत्नी स्थानांतरण के तहत मेरा स्थानांतरण जिला कोरिया से जिला बलरामपुर के शासकीय प्राथमिक शाला केरा में हुआ है। स्थानांतरण पश्चात मैंने विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी कार्यालय में वेतन प्राप्त करने हेतु पासबुक की छायाप्रति जमा किये 6 माह से ज्यादा समय हो चुके है हर महीने कार्यालय के बाबुओं द्वारा शासकीय प्रक्रिया का हवाला देकर मेरा वेतन अब तक नही बनाया है। इसके लिए मुख्यकार्यपालन अधिकारी को प्रार्थना पत्र भी दिया था।  कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं।या किस तरह की लड़ाई लड़नी होगी बिना वेतन के मेरी स्थिति बहुत ख़राब है कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं?

समाधान-

सूचना का अधिकारशासकीय प्रक्रिया का केवल बहाना किया जाता है।  किसी स्थानान्तरित व्यक्ति का वेतन प्रदान करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पूर्व पदस्थापना कार्यालय से पद छोड़ने के साथ ही प्रदान कर दिए जाते हैं। आम तौर पर अवकाशों का विवरण तथा अंतिम वेतन प्रमाण पत्र पूर्व कार्यालय से नए कार्यालय को पहुँचना आवश्यक है। यदि वेतन बकाया होने पर नहीं दिया जाता है तो कार्यालय को कारण बताना चाहिए।

मेरी राय में आप को विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी से व्यक्तिगत रूप से मिल कर उन्हें अपनी शिकायत बताएँ। इस के अलावा आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर यह पूछें कि कर्तव्य पर उपस्थित होने व सभी दस्तावेज उपलब्ध करवा देने के बाद भी आप का वेतन समय पर क्यों अदा नहीं किया गया है और अब क्या कारण है कि आप का वेतन अदा नहीं किया जा रहा है। सूचना प्राप्त हो जाने पर यदि कोई आवश्यक दस्तावेज के अभाव में ऐसा हो रहा है तो उसे उपलब्ध करवाएँ।  सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन देने के पश्चात संभवतः आप के वेतन का भुगतान शीघ्र आरंभ हो जाएगा। यदि फिर भी न हो तो धारा-80 सीपीसी के अंतर्गत एक नोटिस वेतन अदा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी को दिलवाएँ। सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन का प्रारूप इसी वेबसाइट पर तलाशने से मिंल जाएगा।

मनरेगा श्रमिक को वेतन न मिलने पर वह वेतन भुगतान अधिनियम में आवेदन प्रस्तुत कर सकता है

समस्या-

राजस्थान से दिनेश पूछते हैः

मैं ने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगारा गारन्टी योजना) में 30.06.2012 को नौकरी छोड़ दी है।  लेकिन दिनांक 01.01.2012 से ले कर 30.06.2012 तक का कुल छह माह का वेतन मुझे ग्राम सचिव द्वारा अदा नहीं किया गया है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

हात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगारा गारन्टी योजना में काम करने वाले श्रमिकों को जिन्हें समय पर वेतन नहीं मिला है या जिन के वेतन में अवैधानिक रूप से वेतन में कटौती कर ली गई है वेतन भुगतान अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत प्राधिकारी वेतन भुगतान अधिनियम को वेतन दिलाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह आवेदन वेतन बकाया होने की तिथि से एक वर्ष की अवधि में प्रस्तुत कर देना चाहिए। आप को यह आवेदन 31 जनवरी 2013 के पूर्व प्रस्तुत कर देना चाहिेए क्यों कि आप का जनवरी 2012 का वेतन 1 फरवरी 2012 को बकाया हो चुका था। हालाँकि उचित कारण बताने के बाद ऐसा आवेदन एक वर्ष के उपरान्त भी स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन जब समय है तो इस झंझट को क्यों पाला जाए?

स के लिए राजस्थान के प्रत्येक जिला मुख्यालय पर श्रम विभाग द्वारा वेतन भुगतान प्राधिकारियों के न्यायालय स्थापित किए गए हैं।  तीसरा खंबा के आलेख नियोजक ने वेतन नहीं दिया, मुझे क्या करना चाहिए …?  में वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत आवेदन पत्र का प्रपत्र उक्त पोस्ट में दिया गया है।
प चाहें तो इस पोस्ट से आप आवेदन प्रपत्र प्रिंट कर सकते हैं या डाउनलोड सकते हैं।

भिन्न दिनों वाले महिनों में मासिक वेतन क्या होगा?

समस्या-

गंगानगर, राजस्थान से बलविन्दर ने पूछा है-

मैं एक एनजीओ में कंप्यूटर ऑपरेटर हूँ। कृपया बताएँ कि 30 दिन और 31 दिन के माह में वेतन किस प्रकार प्राप्त होगा?

समाधान-

किसी भी कर्मचारी का वेतन उस के नियुक्ति संविदा (नियुक्ति पत्र) से या फिर संस्थान में प्रभावी सेवा नियमों से निर्धारित होता है।  यदि नियुक्ति पत्र में किसी कर्मचारी को मासिक दर से वेतन देना निर्धारित किया गया है तो उसे मासिक वेतन प्रतिमाह प्राप्त होगा, चाहे वह माह 28, 29, 30 या 31 दिनों का क्यों न हो। यदि माह में किसी दिन की अनुपस्थिति हो तो एक दिन का वेतन काटे जाने की स्थिति में उस माह में जितने दिन होंगे उतने दिनों से मासिक वेतन को विभाजित कर के एक दिन का वेतन काटा जाएगा।

लेकिन यदि नियुक्ति पत्र में वेतन दैनिक वेतन दर से निर्धारित किया गया है तो फिर महिने में जितने दिन काम किया होगा उतने दिन का वेतन कर्मचारी को दिया जाएगा। उदाहरणार्थ यदि किसी कर्मचारी का वेतन 150 रुपए प्रतिदिन है और वह नवम्बर 2012 माह में चार रविवार के दिन अवकाश पर रहा है तो उसे 26 दिनों का वेतन 3900 रुपए प्राप्त होंगे।  यदि कोई कर्मचारी इस माह में दो दिन अनुपस्थित रहा है तो उसे 24 दिनों का वेतन 3600 रुपए प्राप्त होगा।

वेतन की दर मासिक 6000 होने पर चार रविवार साप्ताहिक अवकाश होने पर कर्मचारी को वेतन 6000 रुपए ही प्राप्त होगा।  यदि कर्मचारी दो दिन अनुपस्थित रहता है तो उस का दो दिन का वेतन 6000 रुपए को 30 दिनों से विभाजित कर के एक दिन का वेतन 200 रुपए आएगा और उस के वेतन से 400 रुपए काट लिए जाएंगे, कर्मचारी को केवल 5600 रुपए प्राप्त होंगे।  लेकिन यदि यही कर्मचारी अक्टूबर 2012 के माह में दो दिन अनुपस्थित रहता तो उस के वेतन को 31 से विभाजित कर के एक दिन का वेतन निकाला जाता जो कि 193.55 रुपए आता और उस के वेतन से दो दिनों की अनुपस्थिति के लिए 387.10 रुपए ही काटे जाते।  लेकिन यदि माह 28 दिन का ही होता तो दो दिन की अनुपस्थिति के लिए उस के वेतन से 428.60 रुपए काट लिए जाते।

लिखित आदेश, नियुक्ति पत्र या अनुबंध के बिना कहीं कोई मजदूरी न करें

समस्या-

ताजपुर, जिला-समस्तीपुर, राज्य-बिहार से पंकज कुमार ने पूछा है-

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा मालपुर (कोड 08396) जिला वैशाली, बिहार के शाखा प्रबंधक श्री बैजू पासवान ने मुझे अपनी शाखा में डाटा एंट्री कार्य के लिए प्राइवेट से आठ हजार रुपया मासिक पर नौकरी रखा था। मैं ने 23 अप्रैल 2012 से काम शुरू किया। मुझे एलसीपीसी रजिस्टर दिया गया जिस पर. खाता सं., सीआईएफ नंबर, खातेदार का नाम और तिथि एंट्री  करना पड़ता था।  23 अप्रैल 2012 से कार्य करता रहा।  इसके अलावा मुझसे और भी काम कराया गया।  जैसे पानी पिलाना, गेट खोलना या बंद करना, छायाप्रति करवाकर लाना, फाइल बढ़ाना इत्यादी।  यानि शाखा प्रबंधक महोदय के आदेसनुसार जो भी कार्य दिया जाता मैं वो सभी कार्य करता था।  मैं उनसे जब भी अपना पारिश्रमिक माँगा तो उन्होंने मुझे केवल आश्वासन देते रहे कि तुम काम करते रहो, एजीएम बदल गए हैं इसलिए तुम्हारा भुगतान होने में देरी हो रही है।  तुम्हारा काम अच्छा है इसी तरह काम करते रहो। बहुत जल्द ही तुम मेरे साथ एजीएम के यहाँ चलना वहीं से आदेश लेकर तुम्हारा भुगतान कर दूंगा।  इसी बीच बहुत कहने पर जून में 1,000=00 रुपया तथा अगस्त में 2,000=00 रुपया एडवांस दिए थे। मैं  इनके आश्वासन पर चुपचाप काम करता रहा।  जब अक्टूबर 2012 ख़त्म होने वाला था तो मुझे डाक्टर के यहाँ जाने के लिए पैसे की जरुरत हुई तो मैंने उनसे पैसा माँगा तो उन्होंने मुझे कहा की किसी से क़र्ज़ लेकर काम चलाओ और 09 या 10 नवम्बर 2012 को आना तुम्हारा पूर्ण भुगतान कर दिया जायेगा।  जब मै 09 तारीख को बैंक पर गया तो उन्होंने मुझे कहा की तुम्हारा तो तीन हजार रुपया ही बनता है। मैं स्तब्ध! रह गया। जब मैं उनसे हाथ जोड़कर विनती करने लगा तब उन्होंने गार्ड को बुलाकर मुझे गेट से बाहर करवा दिया।  23 अप्रैल 2012 से अक्टूबर 2012 तक कार्य किया जिसका पारिश्रमिक 48,000=00 (अड़तालीस हजार रुपया) बनता है 3,000 काटकर 45,000=00 (पैतालीस हजार) बकाया निकलता है। लेकिन वो नहीं दे रहे हैं।  मैं बहुत परेशान हूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा है।  साथ ही कोई लिखित उन्होंने मुझे नहीं दिया है। हां काम का रिकॉर्ड जरुर है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने उक्त काम मौखिक आश्वासन पर किया था। आप को प्रतिमाह आठ हजार रुपया देने को ब्रांच मैनेजर ने कहा था आप के पास इस का कोई लिखित सबूत नहीं है। लेकिन यदि किन्हीं व्यक्तियों के सामने यह बात हुई हो तो आप उन व्यक्तियों की साक्ष्य (गवाही) के माध्यम से यह साबित कर सकते हैं कि आप को आठ हजार रुपया प्रतिमाह पर नौकरी पर रखा गया था। इसी तरह आप आप के द्वारा किए गए काम के रिकॉर्ड तथा मौखिक गवाही से यह साबित कर सकते हैं कि आप से अप्रेल से अगस्त तक काम लिया गया है।

म तौर पर शाखा प्रबंधक को किसी व्यक्ति को नौकरी पर रखने का कोई अधिकार नहीं होता है। इस का अधिकार एजीएम या किसी उच्चाधिकारी को ही होता है। हाँ यदि उच्चाधिकारी यह अवश्य कर सकते हैं कि शाखा में कार्याधिक्य होने पर कुछ काम आकस्मिक कर्मचारी लगा कर करवा सकते हैं। जिस के लिए कुछ धनराशि खर्च करने का अधिकार शाखा प्रबंधक को मिल जाता है। ऐसी स्थिति में वे आकस्मिक कर्मचारी नियुक्त कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि आप के शाखा प्रबंधक ने एजीएम के इस आश्वासन पर कि उन्हें आकस्मिक कर्मचारी रखने की अनुमति दे दी जाएगी आप को नियोजित कर काम करवा लिया और बाद में एजीएम ने अनुमति देने से इन्कार कर दिया। ऐसे मामलों में यह साबित करना कि आप को किसी निश्चित वेतन पर नियोजित किया गया था, आप ने किस अवधि में काम किया और आप का कितना वेतन बकाया है यह साबित करना अत्यन्त कठिन होता है।

लेकिन आप ने काम किया है तो उस की मजदूरी आप को मिलनी चाहिए। आप को अपनी मजदूरी प्राप्त करने के लिए मजदूरी भुगतान अधिनियम के अंतर्गत तुरंत एक आवेदन प्राधिकारी मजूदूरी (वेतन) भुगतान अधिनियम के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। इस आवेदन में आप को उक्त शाखा के ब्रांच मैनेजर, तत्कालीन ब्रांच मैनेजर बैजू पासवान तथा एजीएम को पक्षकार बनाना चाहिए। मौखिक साक्ष्य से तथा दस्तावेजी साक्ष्य से साबित किया जा सकता है कि आप को आठ हजार रुपए प्रतिमाह पर नियोजित किया गया था। और आपने अप्रेल से अक्टूबर तक काम किया है। यदि दस्तावेजी साक्ष्य़ आप के पास नहीं है तो बैंक द्वारा जवाब प्रस्तुत करने के उपरान्त तथा आप की साक्ष्य प्रस्तुत होने के पहले दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 12 व 14 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर आप अपने पक्ष के प्रासंगिक दस्तावेज बैंक से प्रस्तुतु कराने के लिए न्यायालय से प्रार्थना कर सकते हैं। इस आवेदन को प्रस्तुत करने के लिए आप को किसी स्थानीय वकील या फिर किसी ट्रेड यूनियन अधिकारी की सेवाएँ प्राप्त करनी चाहिए।  भविष्य में आप को ध्यान रखना चाहिए कि बिना किसी लिखित आदेश, नियुक्ति पत्र या अनुबंध के कहीं पर भी कोई मजदूरी न करें। यह भी ध्यान रखें कि किसी प्रपत्र या पंजी में आप की प्रतिदिन की उपस्थिति अंकित की जाती है या नहीं। जहाँ तक हो सके उपस्थिति का सबूत अपने पास रखें।

अधिकतम कितनी राशि का भुगतान नकद किया जा सकता है?

समस्या-

मुम्बई, महाराष्ट्र से भूपेन्द्र सिंह ने पूछा है-

धिकतम कितनी राशि का भुगतान नकद किया जा सकता है? यदि कंपनी 20,000 रुपए से अधिक का वेतन नकद भुगतान कर रही हो तो क्या यह आयकर अधिनियम के अन्तर्गत अपराध है?

समाधान –

यकर अधिनियम की धारा 40 ए (3) के द्वारा यह उपबंधित किया गया है कि कोई भी आयकर देने वाला व्यक्ति रेखांकित चैक, डिमांड ड्राफ्ट या अन्य किसी बैंकिंग रीति के अतिरिक्त किसी एक पक्षकार को 20000 रुपए से अधिक की धनराशि का भुगतान करता है या प्राप्त करता है तो उस भुगतान को उसे व्यक्तिगत खर्च या व्यक्तिगत आय माना जाएगा। इस से स्पष्ट है कि 20 हजार रुपए से अधिक के नकद भुगतान या प्राप्ति को कोई अपराध घोषित नहीं किया गया है।  अपितु उसे व्यक्तिगत खर्च या व्यक्तिगत आय मात्र माना गया है।

क्त उपबंध में भी आयकर नियम 6 डीडी में अनेक भुगतानों और प्राप्तियों को छूट प्रदान की गई है। जिन में किसी कर्मचारी को आयकर अधिनियम की धारा 192 के अंतर्गत आयकर की कटौती के उपरान्त किया गया वेतन का नकद भुगतान भी सम्मिलित है। किस किस तरह के भुगतानों और प्राप्तियों को नियम 6 डीडी में छूट प्रदान की गई है उन की जानकारी आप यहाँ क्लिक कर के प्राप्त कर सकते हैं

औद्योगिक विवाद अधिनियम में कामगार की परिभाषा

पिछली पोस्ट औद्योगिक नियोजक एवं श्रमिक/कर्मकार में हमने नियोजक और कर्मकार की परिभाषाएँ जानी थीं। इन में कर्मकार की परिभाषा कुछ व्यापक और विस्तृत है। इस परिभाषा को सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार बार परिभाषित किया है। इस परिभाषा को हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं। पहला भाग कर्मकार को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो किसी उद्योग में शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालकीय, लिपिकीय या पर्यवेक्षीय कार्यों के लिए वेतन या ईनाम के  नियोजित है। इस भाग में यह परिभाषित किया गया है कि कर्मकार का अर्थ क्या है? दूसरे भाग में कुछ अन्य चीजों को भी सम्मिलित किया गया है जो पहले भाग में सम्मिलित नहीं था। ‘जिन की सेवाच्युति, सेवामुक्ति और छंटनी के कारण कोई औद्योगिक विवाद उत्पन्न हुआ है वे उस औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के लिए कामगार होंगे। इस भाग से कामगार शब्द में कुछ लोग और शामिल किए गये हैं। तीसरा भाग विशेष रूप से कुछ लोगों को इस परिभाषा से बाहर कर देता है। जिस का अर्थ है कि यदि वह पहले दो भागों के आधार पर कामगार माना जाए तब भी वह इस भाग के कारण कामगार नहीं माना जाएगा।

रिभाषा का प्रथम भाग में यह संकल्पना प्रस्तुत की गई है कि एक व्यक्ति को कामगार होने के लिए किसी के द्वारा नियोजित होना चाहिए। अर्थात उस व्यक्ति और किसी औद्योगिक नियोजक के मध्य नियोजन की संविदा होनी चाहिए। यदि दोनों के मध्य कोई नियोजन संविदा नहीं है या नियोजक और नियोजिति का संबंध नहीं है तो कामगार की परिभाषा की भूमिका आरंभ नहीं हो सकती। एक बार यह संबंध स्थापित होना सिद्ध हो जाए तो वह कितने समय का था, आकस्मिक अस्थाई या स्थाई प्रकृति का था, पूर्णकालिक था या अंशकालिक था यह सब गौण हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो उद्योग में नियोजित है वह कामगार हो सकता है उस की प्रास्थिति गौण हो जाती है।

परिभाषा के प्रथम भाग में प्रशिक्षु (एप्रेंटिस) को विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है। जिस का अर्थ है कि यदि किसी व्यक्ति को केवल कोई काम सीखने की संविदा पर भी नियोजित किया गया है तो वह कामगार होगा। लेकिन प्रशिक्षु अधिनियम के प्रावधानों की समीक्षा करने के बाद यह निर्धारित किया गया कि इस अधिनियम अंतर्गत के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति उद्योग में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आता है तो वह कामगार नहीं होगा। लेकिन अन्य व्यक्ति जो प्रशिक्षु अधिनियम के अंतर्गत उ्दयोग में नहीं आए हैं लेकिन जिन्हें किसी प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत काम सीखने के लिए नियोजित किया गया है वे व्यक्ति कामगार माने जाएंगे। इस उपबंध का एक विशिष्ठ कारण यह भी रहा कि बहुत से उद्योग प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत कई वर्षों तक लोगों से नाम मात्र की मजदूरी पर काम कराते रहते हैं और फिर उन्हें नौकरी से हटा कर नए लोगों को प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत काम पर रख लेते हैं। इस तरह गरीब मजबूर बेरोजगारों का शोषण चलता रहता है। इसी को रोकने के उपाय के अंतर्गत प्रशिक्षु शब्द को कामगार की परिभाषा में सम्मिलित किया गया।

रिभाषा के प्रथम भाग में कहा गया कि नियोजित व्यक्ति किसी उद्योग में नियोजित होना चाहिए। यदि जिस संस्थान में उसे नियोजित किया गया है वह उद्योग नहीं है तो उस व्यक्ति को कर्मकार नहीं माना जा सकता। एक और बात है कि नियोजित व्यक्ति को किसी ईनाम या वेतन के लिए नियोजित होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के काम के बदले में कोई प्रतिफल निश्चित न किया गया हो कोई संविदा ही अस्तित्व में नहीं होगी। संविदा न होने की स्थिति में किसी व्यक्ति को कर्मकार नहीं कहा जा सकता। ईनाम शब्द का उल्लेख यहाँ विशेष रूप से किया गया है जिस का अर्थ है कि हमेशा काम के लिए वेतन ही प्रतिफल नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति को उस के काम के परिमाण के आधार पर अर्थात किए गए काम के आधार पर प्रतिफल दिया जाना भी तय किया जा सकता है और यहाँ तक कि कमीशन के आधार पर भी मजदूरी चुकाई जा सकती है।

कामगार की परिभाषा के प्रथम भाग की महत्वपूर्ण शर्त यह है कि दो व्यक्तियों के मध्य नियोजन की संविदा होनी चाहिए। पुराने जमाने में इसे मालिक-मजदूर संबंध कहा जाता था, पर इस औद्योगिक युग में इसे नियोजन संविदा कहा जाना उचित ही है।अगले शनिवार को हम देखेंगे इस संविदा को पहचानने के तरीके क्या हैं?

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