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पुलिस को मिथ्या शिकायत करने वाले के विरुद्ध क्या कार्यवाही करें?

rp_police-station8.jpgसमस्या-

पवन ने प्रतापगढ़ राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारे भवन निर्माण कार्य चल रहा था ! जिस में पडोसी ने आपति लगाई, वह हम से उस की दीवार बनवाना चाहता था! लेकिन हमने ऐसा नहीं किया तो उस ने हमारे पूरे परिवार के 7 सदस्यों पर नारी लज्जा भंग का झूठा केस लगा दिया है! हम ने हमारी और से 4 गवाह पेश किये कि यह केस झूठा है! अभी तक पुलिस द्वारा हमें किसी प्रकार से परेशान नहीं किया गया है! अब आगे क्या हो सकता है?! केस को लगे मात्र 10 दिन हुए हैं! हम उस के ऊपर कैसी क़ानूनी कार्यवाही कर सकते हैं! हमें समाधान दीजिये!

समाधान –

क्त प्रकरण में पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज की है या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। पुलिस कुछ मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर लेती है, लेकिन कुछ मामलों में उसे प्राप्त हुई रिपोर्ट की जाँच पहले ही कर लेती है जिस में वह यह जानना चहती है कि वास्तव में कथित अपराध हुआ भी है या नहीं। यदि पुलिस को लगता है कि कोई अपराध घटित नहीं हुआ है तो वह जाँच कर के वहीं शिकायत को समाप्त कर देती है। इस का कारण यह है कि लोग किसी भी व्यक्ति को परेशान करने की नीयत से भी मिथ्या शिकायतें पुलिस के पास करते हैं।

प को चाहिए कि थाने से संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय से यह पता करें कि क्या प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है। यदि रिपोर्ट दर्ज हुई होगी तो वह 24 घंटों की अवधि में मजिस्ट्रेट के न्यायालय में पहुँच चुकी होगी। आप स्वयं जाँच करने वाले पुलिस अधिकारी से पूछ कर भी पता कर सकते हैं। यदि कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है तो आप सूचना के अधिकार के अन्तर्गत एसपी कार्यालय को आवेदन प्रस्तुत कर के इस शिकायत तथा उस पर की गयी जाँच से संबंधित दस्तावेज की प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर लें और उन्हें किसी स्थानीय वकील को दिखाएँ। उन की प्रतियाँ देख कर ही वकील यह बता सकेगा कि कोई कार्यवाही आप के पड़ोसी के विरुद्ध की जा सकती है अथवा नहीं।

दि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी हो तो पुलिस या तो आप के विरुद्ध कोई आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी तो वह आप को बता देगी। वैसी स्थिति में आप को आप के विरुद्ध मुकदमे को लड़ कर समाप्त कराना होगा। यदि वह आरोप पत्र के स्थान पर अन्तिम प्रतिवेदन प्रस्तत करती है तो फिर अन्तिम प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रतियाँ न्यायायलय से प्राप्त कर लें और उन्हें किसी स्थानीय वकील को दिखा कर कार्यवाही करें।

किराएदार उस की सुविधा बन्द करने के लिए मकान मालिक के विरुद्ध शिकायत कर सकता है।

court-logoसमस्या-

अशोक एम. जैन ने मगदी रोड़, बैंगलोर, कर्नाटक से समस्या भेजी है कि-

मैं एक अपार्टमेंट में रहता हूँ जिस में 26 मकान हैं। मैं दूसरे माले पर रहता हूँ। हमारे यहाँ पिछले दो वर्ष से पानी की बहुत दिक्कत थी मगर अब बहुत ज्यादा हो गई है। सुबह में सिर्फ 10 मिनट के लिए पानी आता है। हम मकान मालिक सको पूछने जाते हैं तो वह एक ही बात बोलता है कि रहना है तो रहो नहीं तो मकान खाली कर दो। क्या वह इस तरह मकान खाली करवा सकता है? जब कि पानी की व्यवस्था भी नहीं करता है।

समाधान-

शोक जी आप की समस्या लगता है जानबूझ कर पैदा की हुई है। समस्या आप की नहीं है बल्कि मकान मालिक की है कि वह किसी वैधानिक तरीके से आप से मकान खाली नहीं करवा सकता। इसीलिए उस ने किराएदारों की पानी की सप्लाई कम कर के उन्हें परेशान करना आरंभ कर दिया है। उस ने पानी बन्द भी नहीं किया है जिस से यह नहीं कहा जा सके कि आप ने एमिनिटीज को बन्द कर दिया है।

किराएदारी कानून सभी राज्यों के भिन्न भिन्न हैं। हमें कर्नाटक के किराएदारी कानून की जानकारी नहीं है। लेकिन एमिनिटीज में कमी करने या उन्हें बन्द करने के लिए उपाय सभी राज्यों के किराएदारी कानून में मौजूद हैं। आप उस कानून का सहारा ले कर मकान मालिक को पानी की सप्लाई दुरुस्त रखने को बाध्य कर सकते हैं। इस के लिए आप को न्यायालय में आवेदन करना होगा। आप किसी स्थानीय वकील से इस मामले में मशविरा कर सकते हैं। यदि कर्नाटक में इस तरह के आवेदनों पर सुनवाई में बहुत समय लगता हो तो फिर पानी की सुविधा प्राप्त करने में आप को भी कम परेशानी नहीं होगी।

मानवाधिकार आयोग को आवेदन दस्तावेजों के साथ करें।

कानूनी सलाहसमस्या-

पवन जैन ने बारोसी बाजार, जिला कटिहार, बिहार से समस्या भेजी है कि-

माज द्वारा असामाजिक बताते हुवे अनाधिकृत रूप से बहिष्कृत करने के कारण न्याय हेतु कई पदाधिकारियों को आवेदन भेजा था और स्थानीय थाना और अनुमंडल पदाधिकारियों को भी न्याय हेतु गुहार लगाई। लेकिन अनुमंडल पदाधिकारी ने जाँच हेतु स्थानीय थाना को आवेदन भेज दिया लेकिन स्थानीय थाना ने अभी तक इस पर कोई FIR दर्ज नहीं की और अभी तक कोई अनुसन्धान नहीं किया है। सूचना का अधिकार से पता चला कि अभी अनुसन्धान अंतर्गत है। अनुसन्धान के बाद अग्रतर कार्रवाई की जायगी लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे गंभीरता से लेते हुवे मामला दर्ज किया जिस का फाइल नंबर 4549/4/16/2014 है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वेब साइट (http://nhrc.nic.in/) पर स्टेटस देखा तो पता चला कि( The complaint is addressed to other authority with only copy sent to this Commission. The authority is expected to take appropriate action in this matter. Hence, no action is called for. File.) मेरी समझ से उनके द्वारा कहा गया है कि आपने किसी और विभाग में आवेदन दिया है उसकी कॉपी ही हमें दी है। इसलिए हम कोई कार्यवाही नहीं कर सकते क्या मैं पुनः राष्ट्रीय मानवाधिकार के समछ आवेदन देकर उनसे ही न्याय की गुहार लगाऊ जानकारी देने की कृपा करे और क्या इस संबंध में मानवाधिकार आयोग संज्ञान लेगा? मुझे जल्द सुझाव देने की कृपा करे ताकि में जल्द आवेदन पुनः भेज सकूँ।

समाधान-

प ने बिलकुल ठीक समझा है। आप ने मानवाधिकार आयोग को कोई शिकायत भेजी ही नहीं है। केवल अन्य अधिकारी को जो शिकायत भेजी है उस की प्रतिलिपि भेजी है। इस कारण आप की डाक वहाँ जरूर दर्ज है लेकिन शिकायत न होने से कोई कार्यवाही नहीं की गई है।

प को चाहिए कि आप घटना के सम्बन्ध में एक शिकायत सिर्फ मानवाधिकार आयोग को प्रेषित करें और साथ में घटना को प्रमाणित करने वाले जो भी दस्तावेज हों वे भी संलग्न करें। आप की शिकायत पहुँचने पर उसे दर्ज कर आगे कार्यवाही की जा सकती है।

टेलीकॉम कंपनी के विरुद्ध चीटिंग और कपट की शिकायत कहाँ करें?

TELECOM COMPANYसमस्या-
मुम्बई, महाराष्ट्र से भूपेन्द्र सिंह ने पूछा है –

मैं रिलायंस कम्पनी का 3जी इंटरनेट का पोस्टपेड उपभोक्ता हूँ। पहले मैं 10GB का प्लान इस्तेमाल करता था और जुलाई महीने में मैंने अपना प्लान बदल कर 1GB का करने का रिक्वेस्ट दिया था जो कि मेरे अगस्त बिलिंग साइकिल से प्रभावी होना था।  इस प्लान मासिक किराया 250 रुपये है। लेकिन इसे परन्तु रिलायंस कंपनी ने मेरा रिक्वेस्ट प्रोसेस नहीं किया जिसकी वजह से मेरा 10GB वाला ही प्लान एक्टिव रह गया जिसका मासिक रेंट 950 रूपया है। अब चूँकि मैंने अपना प्लान बदला था और मैंने बहुत ही इन्टरनेट का लिमिटेड इस्तेमाल किया जो कि तकरीबन 1.5 GB था, परन्तु कंपनी के द्वारा मेरा प्लान नहीं बदले जाने के कारण मुझे 10 GB के आधार पर ही बिल भेज दिया गया। जब मैं ने कंपनी से अपने बिल का विस्तृत विवरण माँगा तो कंपनी ने मुझे ईमेल के जरिये मेरा बिल मुझे भेज जिस में एक ही दिन में एक ही डाटा यूजेज को कई बार दिखाया गया है। 1.5 GB यूजेज को 5 GB दिखाया गया है। जब कि मैंने अपने इस्तेमाल को चेक किया तो यह मात्र 1.5 GB ही है। जब मैंने इसकी शिकायत कंपनी को ईमेल के द्वारा और कस्टमर केयर पर फ़ोन करके दी तो कंपनी ने अपनी गलती मानने के बजाय उलटा मुझे ही ज्यादा इस्तेमाल करने का दोषी ठहराया और बिल प्लान को सही ठहराया। अब मैं अपने आप को ठगा हुआ और अपमानित महसूस कर रहा हूँ। मैं रिलायंस कंपनी के खिलाफ फ्रॉड और चीटिंग का केस करना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि मुझे क्या करना चाहिए और कैसे और कहाँ मैं कंपनी के खिलाफ क्या करवाई कर सकता हूँ?

समाधान-

स मामले में रिलायंस ने आप के साथ पहले तो यह उपभोक्ता सेवा में त्रुटि की कि आप के अनुरोध पर भी उन्हों ने समय पर आप के प्लान को संशोधित नहीं किया। इस कारण से उपभोक्ता की सेवा में कमी का उपभोक्ता विवाद बनता है जिस की आप उपभोक्ता समस्या निवारण फोरम के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।

स के बाद आप का कहना है कि उन्हों ने आप के यूसेज को फर्जी तरीके से बढ़ा कर दिखाया। इस तरह उन्हों ने आप को फर्जी बिल दिया और चीटिंग की। यह दोनों कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 468, 420 एवं 424 के अन्तर्गत अपराध हैं। ये तीनों अपराध संज्ञेय व अजमानतीय हैं और इन अपराधों में पुलिस कार्यवाही कर सकती है अपराधी को गिरफ्तार भी कर सकती है। यदि आप अपने दस्तावेजों तथा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड से यह साबित कर सकते हों कि कंपनी ने जो बिल और यूसेज दिखाया है वह फर्जी है तो आप अपने क्षेत्र के पुलिस थाना में रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं। यदि पुलिस जाँच के बाद पाती है कि अपराध घटित हुआ है तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण आरंभ कर सकती है और अपराध प्रमाणित पाए जाने पर अपराधियों को गिरफ्तार कर के उन के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती है।

दि पुलिस आप की शिकायत को लेने से इन्कार करे या उस पर एफआईआर दर्ज करने से इन्कार करे तो यह शिकायत आप उस पुलिस थाना पर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं जहाँ आप अपने बयान और दस्तावेजी साक्ष्य से यह सिद्ध कर सकते हैं कि अपराध घटित हुआ है तो न्यायालय उस पर प्रसंज्ञान ले सकता है अथवा मामले को अन्वेषण के लिए संबंधित पुलिस थाना को प्रेषित कर सकता है।

ज कल कुछ ब्रांडों के विरुद्ध कुछ संस्थाएँ भी कार्यवाही करने का काम करती हैं इन में से एक कम्प्लेण्ट बॉक्स डॉट इन है। आप चाहें तो यहाँ भी ऑन लाइन शिकायत डाल सकते हैं।

सड़क पर पानी और गंदगी फैलाने वालों के विरुद्ध शिकायत कहाँ करें . . .

nuisanceसमस्या-
हिन्दुपुर, आन्ध्रप्रदेश से सोमनाथ कुलकर्णी ने पूछा है –

मेरा घर का रजिस्टर हुआ है। मेरा घर में रोड से सौ मीटर दूरी पर है। मेरे घर को आने जाने के लिए बारह फीट चौड़ा रोड़ी का कच्चा रोड़ है, मगर उस रोड के बाजू मे कुछ घर वाले उस रोड पर उन के घर के बाथरूम का पानी और कचरा डाल देते हैं। ऐसे में मुझे किस से शिकायत करनी होगी? और क़ानूनी की कौन सी प्रक्रिया करूँ जिस से वो लोग उस रोड पर पानी ना डालें?

समाधान –

किसी भी सार्वजनिक स्थल पर या रास्ते में इस तरह की गंदगी और पानी डालना कंटक (न्यूसेंस) उत्पन्न करना है। आप इस की शिकायत अपने गाँव/नगर की पंचायत/नगरपालिका में कर सकते हैं। लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के अन्तर्गत इस तरह का कंटक हटाने के लिए आप के क्षेत्र के जिला मजिस्ट्रेट, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या कार्यपालक दंडनायक (Executive Magistrate)   को भी शिकायत एक आवेदन के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है।

स मामले में जिला मजिस्ट्रेट, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या कार्यपालक दंडनायक का न्यायालय उन व्यक्तियों के विरुद्ध जो ये कंटक उत्पन्न करते हैं नोटिस जारी कर के बुलाएगा और उन से जवाब देने को कहेगा। मामले की सुनवाई कर के उन्हें कंटक हटाने और भविष्य में कंटक उत्पन्न न करने का आदेश देगा। यदि इस आदेश की पालना नहीं की जाती है तो भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर धारा 188 के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज कर के उसे जुर्माना और कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

घरेलू हिंसा की शिकायत से बचने के स्थान पर स्वयं अंतरिम सहायता प्रस्तुत कर प्रतिवाद करने का निश्चय करें।

समस्या-

हरिद्वार, उत्तराखंड से अमित ने पूछा है –

मेरे तथा मेरे परिवार के विरुद्ध मेरी पत्नी ने घरेलू हिंसा का एक केस अदालत में किया हुआ है जिस में कोर्ट ने हमारे विरुद्ध समन जारी किये हुए हैं। परन्तु  इसके विरुद्ध हमने जिला जज के यहाँ अपील की हुई है जो की एडमिट तो हो गयी है  परन्तु न तो जिला जज महोदय ने निचली अदलत से फाइल तलब की है और न ही निचली अदालत की कार्यवाही स्टे करने का कोई आदेश पारित किया जिस से हमें काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आप बताएँ हमें क्या करना चाहिए? कोई नजीर हो तो बताएँ।

समाधान-

sexual-assault1ब से पहले तो आप यह जान लें कि महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा से संरक्षण के कानून के अंतर्गत न्यायालय को किसी को पहली बार में दंडित करने का कोई अधिकार नहीं है। केवल उस न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश की पालना यदि नहीं की जाती है या उस का उल्लंघन किया जाता है तो न्यायालय आदेश की पालना न करने वाले या उल्लंघन करने वाले को दंडित कर सकता है। इस कारण यदि किसी के विरुद्ध इस कानून में कोई शिकायत होती है तो उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है उसे न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

प ने अपनी समस्या में कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है। न तो आप ने यह बताया कि क्या कारण है कि आप की पत्नी ने आप के व आप के परिवार के विरुद्ध घरेलू हिंसा की शिकायत की है। शिकायत में आप की पत्नी ने क्या लिखा है? यह भी आप ने नहीं बताया। पत्नी द्वारा उस की शिकायत में अंकित तथ्य सही हैं या नहीं हैं, और वे तथ्य सही नहीं हैं तो आप के अनुसार क्या कारण हैं जिस से आप की पत्नी ने आप के विरुद्ध यह शिकायत की है? आप ने यह भी नहीं बताया कि आप को काफी परेशानी क्या हो रही है।

वास्तविकता तो यह है कि देश में ऐसी महिला तलाश कर निकालना दुष्कर ही नहीं लगभग असंभव है जिसे कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार न होना पड़ा हो।  अहिंसा के पुजारियों के इस देश में इस हिंसा को जारी तो नहीं रखा जा सकता है न? तो महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा से संरक्षण का कानून इसीलिए बनाया है कि महिलाओं को घरेलू हिंसा से निजात मिल सके। अब एक महिला ने अपने पति के और उस के परिजनों के विरुद्ध घरेलू हिंसा की शिकायत न्यायालय ने प्रस्तुत की है। न्यायालय ने उस पर आप के विरुद्ध समन जारी किया है, इस लिए कि आप उस शिकायत का उत्तर प्रस्तुत करें। दोनों और के जो भी तथ्य शपथ पत्रों और दस्तावेजों से न्यायालय के समक्ष प्रकट हों उन के आधार पर यह निर्णय किया जा सके कि आप की पत्नी वास्तव में उस शिकायत पर अंतिम निर्णय होने तक किसी प्रकार की कोई अंतरिम राहत प्राप्त करने की अधिकारी है या नहीं? इस में क्या गलत है। शिकायतकर्ता आप की पत्नी ही तो है।  वह किन्हीं कारणों से आप से नाराज है और आप की अदालत को शिकायत करती है तो इस से उस का आप से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार या किसी स्थान में निवास करने का अधिकार तो छिन नहीं गया है। अंतरिम आदेश के रूप में न्यायालय अधिक से अधिक कुछ धनराशि उस महिला के भरण पोषण हेतु अदा करने का आदेश देगा जो उस के भरण पोषण के वास्तविक खर्चे से बहुत कम होगा, साथ में इतना आदेश दे सकता है कि वह पति या उस के परिवार के जिस मकान में रह रही है उसे शांतिपूर्वक निवास करने दिया जाए। यह तो उस का अधिकार है। यदि ऐसा आदेश होता है तो उस में गलत क्या है?

प ऐसा आदेश भी नहीं होने देना चाहते और पत्नी की शिकायत को सुना ही न जाए इस के लिए ऊँची अदालत में चले गए। ऊंची अदालत ने आप की निगरानी याचिका दर्ज कर ली उस मे कोई बड़ी बात नहीं है, इस तरह की सभी याचिकाएँ दर्ज कर ली जाती हैं। लेकिन आप का सोचना है कि बिना आप की पत्नी को आप की याचिका की सूचना मिले ही निचली अदालत की पत्रावली वहाँ मंगा ली जाए जिस से वह शिकायत जो आप की पत्नी ने की है उस में सुनवाई रुक जाए, या फिर उस सुनवाई को रोकने का आदेश ही दे दिया जाए। यदि ऊंची अदालत ऐसा करती है तो निश्चित रूप से वह न्याय करने के जिस उद्देश्य से स्थापित की गई है उस उद्देश्य के विरुद्ध ही काम करने लगेगी। ऐसा कैसे संभव है?

प को करना तो यह चाहिए था कि जो समन आप के विरुद्ध जारी हुए हैं उन्हें आप प्राप्त कर के न्यायालय में उपस्थित हों और शिकायत का प्रतिवाद प्रस्तुत करें। यदि आप की पत्नी ने किसी तरह की अंतरिम राहत भरण पोषण या निवास के लिए चाही है तो बिना न्यायालय के आदेश के स्वयं रखें कि वह आप की पत्नी है और आप उसे प्रतिमाह कुछ राशि और निवास की सुविधा प्रदान करने को तैयार हैं। आप के इस प्रस्ताव से आप की सदाशयता ही प्रकट होगी। इस के उपरान्त आप अपने विरुद्ध की गई शिकायत का प्रतिवाद कर सकते हैं। इस से बेहतर मार्ग कोई नहीं है। आप की निगरानी याचिका में कोई दम नजर नहीं आता है। उसे आप को निरस्त करा लेना चाहिए। अच्छा तो यह है कि आपसी बातचीत से या ऐसा संभव नहीं हो तो न्यायालय की मध्यस्तता से पत्नी से अपने विवाद को सुलझाएँ।

आप सही हैं तो परिणाम से न डरें, लेकिन कोई काम नियम कानून के विरुद्ध करने से बचें।

समस्या-

नैनीताल, उत्तराखंड से घनश्याम भट्ट ने पूछा है –

मैं शिक्षक के रूप में 2007 से राजकीय सेवा में हूँ और स्वभावतः ईमानदारी से कार्य करने में विश्वास रखता हूँ मेरी नियुक्ति दुर्गम क्षेत्र में है जहाँ अधिकांश शिक्षक फर्जी छुट्टियाँ लेते हैं, परीक्षाओं में नकल कराते हैं और अशक्त बच्चों हेतु निर्मित मध्यान्ह भोजन का उपभोग धड़ल्ले से करते हैं। जिसका मैं कदापि समर्थन नहीं कर सकता।  इसलिए अधिकांश अध्यापक मेरे विरोधी हो गए हैं।  इसी दौरान मेरा विवाह हो गया और परिवार रखने योग्य कमरा वहाँ न होने के कारण  ग्राम पंचायत के खाली पड़े मकान में केयरटेकर की अनुमति से रहने लगा।  वे मेरे उस समय तक मकान मालिक भी थे। कुछ समय पश्चात मुझे परिस्थिति वश प्रधानाचार्य  के रूप में कार्य करना पड़ा, मैं ने स्वभावतया उस कर्तव्य का पालन पूर्ण निष्ठा से करना चाहा एक अध्यापक जो ने सभी प्रधानाचार्यो को परेशान करता था, फर्जी छुट्टियाँ नहीं मिलने व विद्यालय में सख्ती होने के कारण मेरे खिलाफ बीडीओ यहाँ सूचना के अधिकार में प्रश्न लगा दिया कि मैं सरकारी भवन में निवास कर के मकान किराया भत्ता  कटवाता हूँ या नहीं आदि?  उस अध्यापक ने मुझे बहुत परेशान किया।  अन्ततोगत्वा मैंने उच्चाधिकारियों को अवगत कराया और उसे जाँच के बाद विद्यार्थियों के वक्तव्य के आधार पर विद्यालय से हटाकर कार्यालय में योजित कर दिया।  मैं ने प्रधानाथ्यापक का कार्यभार भी त्याग दिया और अब शिक्षक के कार्य को निष्ठा से पूर्ववत कर रहा हूँ।  वह शिक्षक मुझे आज भी परेशान कर रहा है, आहरण वितरण अधिकारी को मेरा एक वर्ष का मकान किराया भत्ता मेरे वेतन से काटने का आवेदन कर चुका है। मुझ से मेरा पक्ष पूछा गया तो मैने लिख दिया कि मेरा तो वहां केवल सामान रखा था में तो अलग रहता था।  मैं ने सरकारी भवन में रहते हुए किराया भुगतान किया था, जिसका रसीदी टिकट युक्त रसीद ग्राम प्रधान द्वारा उपलब्ध कराई गयी है।

समाधान-

Primary Teacherरकारी सुविधाओं का अनुचित उपयोग करना और कामचोरी करना बहुत लोगों की आदत बन चुकी है। आपने ईमानदारी से काम किया है तो आप को डरने का कोई अवसर ही नहीं है। लेकिन एक बात जरूर है। जब भी इस तरह के लोगों के विरुद्ध कार्यवाही होती है तो वे बदले की भावना पर उतर आते हैं। इस कारण से किसी तरह की हानि से बचने के लिए यह जरूरी है कि आप कोई भी कार्य करने के पहले यह जरूर जाँच लें कि वह नियमों के विरुद्ध तो नहीं है। क्यों कि कोई भी आप को तभी नुकसान पहुँचा सकता है जब कि आप ने कोई गलती की हो।

किसी व्यक्ति द्वारा किसी भी अधिकारी या कार्यालय के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करने पर कोई पाबंदी नहीं है। लेकिन कोई भी व्यक्ति मिथ्या शिकायतें प्रस्तुत कर आप को परेशान नहीं कर सकता। न केवल इस से आप को परेशानी होती है अपितु विभाग का बहुत सारा समय भी व्यर्थ की जाँचों में बरबाद होता है। आप ने कोई गलत काम नहीं किया है तो आप को डटे रहना चाहिए। जाँचों से परेशानी तो होती है लेकिन और कोई रास्ता नहीं है। आप अपना पक्ष रखिए, आप सच्चे हैं तो आप का कोई कुछ नुकसान नहीं कर सकेगा।

प को एक बात अपने पक्ष में कहनी चाहिए कि ग्राम पंचायत कोई सरकार नहीं है। वह स्थानीय निकाय है और एक व्यक्ति की तरह सरकार से पृथक है। यदि ग्राम पंचायत के भवन में आप रहे हैं तो यह तो यह मामला ग्राम पंचायत और आप के बीच का है। इस का विभाग से कोई लेना देना नहीं है। वैसे भी आप ने ग्राम पंचायत के भवन में रहने का किराया ग्राम पंचायत को अदा किया है।

मोबाइल ऑपरेटर की सशुल्क सेवा संबंधी शिकायत कहाँ करें?

समस्या-

सबलगढ़, मध्यप्रदेश से तरुण कुमार गोयल ने पूछा है-

मेरे पास रिलायंस का मोबाइल है।  मैं ने अपने मोबाइल पर एसएमएस पैक एक्टीवेट करवाया था। एक माह भदा कंपनी ने इस सेवा का मुझ से पूछे बिना नवीनीकरण कर दिया। मैं ने शिकायत की तो  तो मुझे बताया गया कि यह स्वयं नवीनीकरण सेवा है जो अपने आप एक्टीवेट हो जाती है। उन्हों ने यह सेवा हटाने से मना कर दिया। इस से मेरे उपभोक्ता अधिकार का हनन हुआ है। मैं इन के विरुद्ध क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?

समाधान-

Traiभारत का कोई भी मोबाइल फोन ऑपरेटर किसी भी सशुल्क सेवा को तभी चालू कर सकता है जब कि उसे उस सेवा का प्रस्ताव इस रूप में दिया गया हो जिसे उपभोक्ता ठीक से समझ सके। ऐसा प्रस्ताव उपभोक्ता द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के उपरान्त ही ऐसी सशुल्क सेवा चालू की जा सकती है। यह भी जरूरी है कि इस तरह का प्रस्ताव देने और उस की स्वीकृति का स्पष्ट रिकार्ड ऑपरेटर के पास होना चाहिए। यदि आप किसी सशुल्क सेवा को बंद करने के लिए आदेश देते हैं तो वह ऑपरेटर को बंद करनी होगी।

प ने सेवा को बंद करने का आदेश दिया किन्तु ऑपरेटर ने सेवा बंद करने से इन्कार किया यह सेवा में कमी है। लेकिन आप ने सेवा को बंद करने का आदेश दिया है इस का आप के पास स्पष्ट सबूत होना चाहिए।  अच्छा तो यह है कि आप ऐसा आदेश एसएमएस के माध्यम से दें और उस एसएमएस को सुरक्षित रखें।

दि आप के पास इस बात का सबूत है कि आप के आदेश के बाद भी सशुल्क सेवा को बंद नहीं किया गया है, अथवा सशुल्क सेवाओं के संबंध में कोई भी शिकायत हो तो आप निम्न कार्यवाही कर सकते हैं –

1. आप मोबाइल ऑपरेटर के कस्टमर केयर नंबर पर अपनी शिकायत दर्ज कराएँ और शिकायत नं. प्राप्त करें;

2. यदि कस्टमर केयर शिकायत दर्ज करने से मना करे तो इस लिंक <http://www.trai.gov.in/ConsumerGroupUser.aspx> से अपने मोबाइल ऑपरेटर का नंबर ले कर उश पर शिकायत दर्ज कराएँ।

3. एक ई-मेल अपील अधिकारी को भेजें। पते उक्त लिंक पर आप को मिल जाएंगे।

4. अपनी शिकायत ट्राई को उक्त पते के साथ साथ एडवाइजर टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया, महानगर दूरसंचार भवन, जवाहरलाल नेहरू मार्ग (पुराना मिंटो रोड़), नई दिल्ली-110002 पर दर्ज कराएँ। इस का टेलीफोन नं. 011-23230404, फैक्स नं. 011-23213096, तथा ई-मेल के पते chaubemc@trai.Gov.In तथा secretary@trai.Gov.In हैं।

दवाखाना संचालित कर रहे व्यक्ति पर संदेह होने पर क्या करें?

समस्या-

अहमदाबाद, गुजरात से प्रकाश ने पूछा है-

किसी व्यक्ति ने दवाखाना खोल रखा है और बाहर एमईटीसी व एसएबीएस की डिग्री लिखा बोर्ड लगा रखा है।  क्या ऐसा व्यक्ति दवाखाना चला सकता है। ये डिग्रियाँ कौन सी हैं? यदि यह दवाखाना गलत खुला है तो उस की शिकायत मैं कहाँ कर सकता हूँ? और क्या ऐसी शिकायत मैं अपना नाम छुपा कर कर सकता हूँ?

समाधान-

वाखाना शब्द से प्रतीत होता है कि यह ऐसा स्थान है जहाँ कोई चिकित्सक रोगियों को देखता है और फिर दवा सुझाता है और दवा देता है। इस का एक अर्थ औषधालय या डिस्पेंसरी भी होता है। आम तौर पर भारत में दवाखाना शब्द का प्रयोग भारतीय औषध के माध्यम से रोगियों की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक करते हैं। वे न केवल रोगियों को देखते हैं अपितु दवा भी अपने पास से ही देते हैं।

भारत में इस तरह का कार्य करने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों है जो कि इंडियन मेडिसिन बोर्ड की राज्य कौंसिल या बोर्ड के रजिस्ट्रार के यहाँ पंजीकृत हैं। यह पंजीयन उन के द्वारा प्राप्त चिकित्सा पद्धति की शिक्षा और अनुभव के आधार पर किया जाता है। इस कारण से किसी व्यक्ति की डिग्रियों का इस बात के लिए कोई महत्व नहीं है कि वह चिकित्सा कर सकता है अथवा नहीं, अपितु महत्व इस बात का है कि वह चिकित्सा करने के लिए पंजीकृत है अथवा नहीं। उसे यह पंजीयन सही आधार पर दिया गया है अथवा नहीं?

प को यदि दवाखाना खोल कर चिकित्सा कर रहे किसी व्यक्ति के बारे में यह संदेह है कि वह इस कार्य के लिए पंजीकृत है अथवा नहीं या फिर उस व्यक्ति का पंजीकरण सही किया गया है अथवा गलत तो आप इस की जानकारी इंडियन मेडिसिन बोर्ड की अपने राज्य की कौंसिल या बोर्ड से प्राप्त कर सकते हैं। यह बोर्ड सूचना के अधिकार के अंतर्गत सूचनाएँ प्रदान करने के लिए जिम्मेदार है।

दि आप को पता लगता है कि दवाखाना खोल बैठे ऐसे व्यक्ति के पास कोई पंजीयन नहीं है अथवा उस का पंजीयन गलत है तो आप उस की शिकायत इंडियन मेडीसिन बोर्ड की राज्य कौंसिल या बोर्ड को कर सकते हैं। इस के साथ ही आप अपने संदेहों को प्रकट करते हुए एक शिकायत जिला स्वास्थ्य अधिकारी तथा जिला आयुर्वेद अधिकारी को कर सकते हैं। क्यों कि किसी भी जिले में स्वास्थ्य सेवाओँ की जिम्मेदारी इन अधिकारियों की होती है।

प ने पूछा है कि क्या आप यह शिकायत अपना नाम छुपा कर सकते हैं। नाम छुपा कर शिकायत की जा सकती है लेकिन ऐसी शिकायत का कोई अर्थ नहीं होता है। यदि कोई काम गलत हो रहा है या फिर आप को ऐसा संदेह है तो आप को अपना नाम छुपाना नहीं चाहिए। यदि आप का संदेह सही निकलता है तो एक अच्छा काम यह होगा कि एक अनधिकृत रुप से चिकित्सा करने वाला व्यक्ति पकड़ा जाएगा। यदि आप का संदेह गलत निकलता है तो आप उस व्यक्ति से जिस के विरुद्ध शिकायत की गई है क्षमा मांग लें। वैसे भी ऐसा व्यक्ति सही हुआ तो उस को तो इस से लाभ ही होगा क्यों कि ऐसी जाँच से उस की सत्यता स्थापित हो जाएगी और उस के बारे में फैले हुए सभी संदेह दूर हो जाएंगे।

न्यायाधीश के दुराचरण की शिकायत उच्च न्यायालय के विजिलेंस रजिस्ट्रार को करें

समस्या-

जमशेद्पुर, झारखण्ड से राकेश मिश्रा ने पूछा है-

मुझ पर एक झूठा केस किया गया, जिस में मुझे न्यायाधीश द्वारा पक्षपात करते हुए जेल भेज दिया गया। क्या मैं इस के लिए जज की शिकायत कर सकता हूँ तो कहाँ कर सकता हूँ? मैं निर्दोष होते हुए भी जेल गया। कृपया मेरी मदद करें।

समाधान-

हो सकता है कि आप के विरुद्ध मिथ्या मुकदमा किया गया हो और आप को उस में सजा हो गई हो। न्यायाधीश को कुछ पता नहीं होता है कि कौन सा मुकदमा सच्चा है और कौन सा मुकदमा झूठा है। न्यायाधीश सदैव ही उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए सबूतों के आधार पर निर्णय करता है। यदि न्यायाधीश के समक्ष मिथ्या सबूत प्रस्तुत किए गए हों और उन के झूठ को आप सुनवाई के दौरान साबित नहीं कर सके हों तो भी आप को झठे मुकदमे में सजा हो सकती है। सुनवाई के दौरान हर अभियुक्त को इस बात का अवसर प्राप्त होता है कि वह गवाहों और सबूतों को मिथ्या साबित करे। हो सकता है मुकदमे की सुनवाई के दौरान आप से और आप के वकील से गलती हुई हो और वे झूठ को पकड़ नहीं सके हों और आप को मिथ्या मुकदमे में सजा हो गई हो। लेकिन इस में न्यायाधीश की कोई गलती नहीं है।

ह भी हो सकता है कि न्यायाधीश से सबूतों के विश्लेषण में कोई गलती हुई हो तो आप सजा को निलंबित करवा कर न्यायालय के निर्णय की अपील करते। अपील में निर्णय आप के पक्ष में हो जाता।

प को इन सब बातों पर विचार करना चाहिए। यदि फिर भी आप को लगता है कि गलती न्यायाधीश की है और उस ने दुर्भावना से प्रेरित हो कर आप के विरुद्ध निर्णय किया है तो आप उच्च न्यायालय के विजिलेंस रजिस्ट्रार को न्यायाधीश के संबंध में शिकायत भेज सकते हैं। अपनी शिकायत के तथ्यों के समर्थन में आप को एक शपथ पत्र भी देना होगा। आप की शिकायत की जाँच हो जाएगी। यदि आपकी शिकायत सही पाई गई तो न्यायाधीश के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही हो सकती है।

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