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सबूत मिल जाने पर अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र दुबाारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

सहदायिक संपत्ति में सन्तानों का जन्म से अधिकार है, पिता उसे किसी और को नहीं दे सकते।

समस्या-

नन्द किशोर ने देवरी, जिला सागर म.प्र. से समस्या भेजी है कि-


साल 1953 में मेरे पिताजी के पिताजी का देहांत होने के बाद पिताजी को दस एकड़ जमीन मिली। हम पांच भाई हैं, हमारे पिताजी ने उक्त जमीन हम तीन भाइयों में बराबर रजिस्टर्ड बटवारा द्वारा 2012 में बांट दी। मेरे दो भाईयों ने कोर्ट में केस लगाया है कि उक्त सम्पत्ति पैत्रिक है, मुझे भी हिस्सा चाहिए। पिताजी की कैंसर की बीमारी में हम तीनों भाइयों ने पैसा लगाया एवं सेवा की, मुझे सलाह दें।


समाधान-

प के पिताजी के इलाज में आप ने जो धन लगाया वह आप का कर्तव्य था। आप ने यह कर के कोई एहसान नहीं किया। वैसे भी आप जमीन पर काबिज हो कर उस का लाभ लेते रहे होंगे। इस कारण यह सोचना बन्द कर दें कि पिता  जी की बीमारी में धन लगाने से आप को कोई अधिकार उत्पन्न हो गया है।

1953 में परंपरागत हिन्दू अधिनियम प्रभावी था। इस कारण से आप को पिता को उन के पिता से मिली जमीन केवल आपके पिता की नहीं हुई अपितु वह एक सहदायिक संपत्ति हो गयी। जिस में आप के सभी भाइयों का जन्म से अधिकार उत्पन्न हो गया। इस कारण इस भूमि में आप के उन दो भाइयों का जिन्हें जमीन नहीं मिली है जन्म से अधिकार है। रजिस्टर्ड बँटवारे में आप के पिता ने उन के हिस्से की जमीन भी आप को दे दी है जो गलत है। आप के पिता केवल उन के हिस्से की जमीन का बंटवारा कर सकते थे। आप के दो भाई सही कर रहे हैं कि उन्हें पैतृक और सहदायिक भूमि में हिस्सा मिलना चाहिए।

पिता की संपत्ति में सन्तान का हिस्सा …

समस्या-

रश्मि ने भोपाल मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी को अपने पिता जी से संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी अब पिताजी उस की वसीयत सिर्फ मेरे भाई के नाम करना चाहते हैं। हम तीन बहनें हैं क्या इस संपत्ति में हम बहनों का भी अधिकार है।

 

 

समाधान-

दि आप के पिताजी को प्राप्त यह संपत्ति उन के पिताजी या दादा जी को उन के किसी पूर्वज से उत्तराधिकार में 17 जून 1956 के पूर्व प्राप्त हुई थी और तब से लगातार उत्तराधिकार में ही प्राप्त होती रही है तो वह संपत्ति सहदायिक हो सकती है और उस में आप का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन 17 जून 1956 के बाद कोई भी व्यक्तिगत संपत्ति उत्तराधिकार के आधार पर सहदायिक नहीं हो सकती। यदि ऐसा है तो आप के पिता जी को उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति उन की व्यक्तिगत हो सकती है, उस में उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होगा और उसे वे जिसे चाहें वसीयत कर सकते हैं। वैसी स्थिति में आप बहनों या भाई को कोई अधिकार उक्त संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। जिसे भी प्राप्त होगा वसीयत के कारण प्राप्त होगा।

पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति से पुनर्विवाह के कारण स्त्री को वंचित नहीं किया जा सकता

Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

दत्तक के सांपत्तिक अधिकार …

Hindu succession actसमस्या-

कृष्णगोपाल शर्मा ने देवगुढा बावडी, वाया जाहोता, तहसील आमेर,  जिला जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादाजी को उनके चाचाजी ने गोद ले रखा था। मेरे दादाजी की म़त्‍यु सऩ् 2003 में हो गई। हमने पंचायत से एक म़त्‍यु प्रमाण पत्र बनवाया जिसमें उनके दत्‍तक पिताजी का अंकन था,  कुछ समय बाद पता चला कि इनके (दादाजी के चाचाजी) पास कोई पैत़ृक जमीन नहीं है सो हमने अपने निज पिताजी के नाम से दूसरा म़ृत्यु प्रमाण पत्र बनवा लिया तथा उसके आधार पर हमारा जमीन में से नामांतकरण खुल गया। क्‍या इस तरह से एक ही व्यक्ति का म़त्‍यु प्रमाण पत्र दो अलग अलग पिताओं के नाम से बनना कानून की नजर में अपराध है? और क्‍या मेरे दादाजी को अपने वास्‍तविक पिताजी व दत्‍तक पिताजी दोनों की सम्‍पत्ति मिल सकती है या कानून केवल एक पिता की सम्‍पत्ति ही लेने के लिए कहता है।

समाधान-

जिस ने भी दादाजी की मृत्यु का प्रमाण पत्र बनवाया वह प्रक्रिया के अधीन बनवाया। इस प्रक्रिया में मृतक के संबंधी कुछ सूचनाएँ जन्म-मृत्यु पंजीयक को देते हैं उस के आधार पर मृत्यु दर्ज हो जाती है। जब उस से लाभ न हुआ तो कुछ सूचनाएँ परिवर्तित कर दूसरा प्रमाण पत्र बनाया इस का अर्थ है आप ने एक ही व्यक्ति की मृत्यु को दो बार रिकार्ड में अंकित करवाया। यह दंडनीय अपराध है और शिकायत होने पर इस मामले में कार्रवाई हो सकती है।

यदि कोई व्यक्ति गोद चला जाए और किसी सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में उस का कोई हिस्सा हो तो वह उसी का बना रहता है। गोद जाने से उस के उस हिस्से के स्वामित्व में कोई अंतर नहीं आता। लेकिन गोद जाने के बाद अपने मूल पिता से उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार खो देता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि गोद जाने वाला व्यक्ति दोनों तरह की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होता है। लेकिन ऐसा नहीं है।

हर व्यक्ति को ऐसा अधिकार होता है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति हो तो उस में तो किसी व्यक्ति का हिस्सा जन्म से ही मिल जाता है। जब कि उस के पिता, व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार का उस का अधिकार उन की मृत्यु पर उत्पन्न होता है। इसी तरह गोद गए व्यक्ति को जिस सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार मिल गया है वह तो उसी तरह बना रहता है। लेकिन उसे अपने गोद पिता व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार तो प्राप्त होता ही है लेकिन गोद पिता की सहदायिकी में भी हिस्सा प्राप्त करने का उस का अधिकार गोद लेते ही उत्पन्न हो जाता है।

पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार से वंचित करने के विरुद्ध वाद।

समस्या-

अखिल ने रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-rp_gavel5.jpg

कृपया हमारी शंका  का समाधान करें? क्या (1) यदि संपत्ति दादाजी के पिता की संपत्ति को बेचकर खऱीदी गयी थी तब वह संपत्ति पुश्तैनी मानी जायेगी। जिस पर हम सभी भाई बहनों का बराबर-बराबर अधिकार होगा (2) यदि संपत्ति  दादाजी ने अपनी कमाई से अर्जित की है तो क्या उस पर पिता का अधिकार है और वह चाहें तो उस संपत्ति को किसी को भी दे सकते हैं।

आशीष त्रिपाठी ने सिंगरौली मध्यप्रदेश से पूछा है-

क्या पिता के मृत्यु के पश्चात उस पुश्तैनी संपत्ति पर दावा किया जा सकता है जो पिता ने अन्य लोगों के नाम रजिस्ट्री कर चुका हो? यदि हाँ ! तो किस अधिनियम के तहत य

समाधान-

कोई भी संपत्ति पुश्तैनी या सहदायिक तभी मानी जाएगी जब कि वह 17 जून 1956 के पूर्व किसी पुरुष हिन्दू को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। यदि आप के दादा जी के पिता के पास वह संपत्ति उक्त तिथि से पूर्व उत्तराधिकार में आयी थी तो पुश्तैनी थी और उसे विक्रय कर के खरीदी गयी संपत्ति भी पुश्तैनी होगी और हर संतान का जन्म से उस में अधिकार होगा।

यदि संपत्ति दादा जी ने अपनी कमाई से खरीदी है और उन का देहान्त 17 जून 1956 के पूर्व हो गया था तो आप के पिता के पास वह संपत्ति पुश्तैनी होगी और उस में आप सभी भाई बहनों का भी अधिकार होगा। आप के पिता आप को उस अधिकार से वंचित कर के संपत्ति का विक्रय नहीं कर सकते थे। इस विक्रय को विक्रय की तिथि से 12 वर्ष की अवधि (मियाद) में दीवानी वाद कर के निरस्त कराया जा सकता है। यदि विक्रय के समय आप नाबालिग थे तो आप बालिग होने की तिथि से मियाद में ऐसा दावा कर सकते हैं। यदि आप को इस विक्रय की जानकारी न थी तो आप को जानकारी प्राप्त होने से मियाद में ऐसा वाद संस्थित कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी संपत्ति में उस के अधिकार से वंचित किए जाने के वि्रुद्ध वाद संस्थित करने की मियाद 12 वर्ष है। इसे मियाद अधिनियम में मिलने वाली छूटों के आधार पर कुछ और बढ़ाया जा सकता है। इस मामले में आप को किसी स्थानीय वकील से सलाह करना चाहिए।

विलेख को उस की जानकारी होने की तिथि से मियाद मानते हुए चुनौती दी जा सकती है।

rp_kisan-land.jpgसमस्या-

राकेश ने दिल्ली से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता और दादा जी का जन्म 17.06.1956 से पहले का है। मेरे पिता के सभी भाई (तीन) बहन (दो) का जन्म 1960 के बाद का है। पैतृक संपत्ति में 105 बिस्वा ज़मीन है जो कि चार खेतो में है। रेवेन्यू के अभिलेख में आज भी ज़मीन मेरे के दादा जी नाम है। 1982 में मेरे दादा जी ने मेरे दो चाचा को 28 बिस्वा ज़मीन गिफ्ट डीड दवारा दे दी। 2013 में मेरे दादा जी ने 42 बिस्वा मेरे पिता और तीसरे चाचा के नाम सेल डीड कर दी। मेरे पिता को उनके हक़ 52.5 बिस्वा में से मात्र 21 बिस्वा जमींन अभी तक मिली हैं। मेरा जन्म 1973 का है। मुझे 2013 में गिफ्ट डीड के बारे मे पता चला। क्या मैं गिफ्ट डीड के खिलाफ दावा कर सकता हूँ। मेरा 105 बिस्वा में क्या हक हैं, और मेरे हित में मैं क्या करूँ?

समाधान

दि यह कृषि भूमि पुश्तैनी है अर्थात आपके दादा जी को यह भूमि उन के पिता जी से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो जैसे ही आप के पिता जी का जन्म हुआ वे भी उस के हिस्सेदार हो गए। शेष भाई भी उसी प्रकार उस पुश्तैनी संपत्ति में जन्म से हिस्सेदार होते गए। 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 प्रभावी होने पर आप के पिता की बहनें भी उस में भाइयों के समान ही हिस्सेदार हो गयीं। आप के पिता और उन के सभी भाइयों की संतानें भी उसी तरह उस की हिस्सेदार होती गयीं।

1982 में आप के पिता की बहनें उक्त पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सेदार नहीं थीं। इस कारण उस समय आप के दादा जी उक्त संपत्ति में से जो उन का हिस्सा था उतनी संपत्ति की गिफ्ट डीड कर सकते थे। यदि उस के उपरान्त भी दादाजी का कोई हिस्सा उस संपत्ति में शेष रहा होगा तो वे 2013 में अपने हिस्से की सीमा तक भूमि का विक्रय पत्र निष्पादित कर सकते थे। लेकिन इन दोनों विलेखों के निष्पादन के समय वे अपने हिस्से से अधिक की भूमि हस्तान्तरित नहीं कर सकते थे। यदि उन्हों ने अपने हिस्से की संपत्ति से अधिक संपत्ति हस्तान्तरित की है तो उन विलेखों को चुनौती दी जा सकती है।

2013 के विलेख को चुनौती देने की समय सीमा अभी है। 1982 में जो विलेख निष्पादित हुआ है उसे चुनौती देने के लिए वाद आप केवल तब संस्थित कर सकते हैं जब कि उक्त विलेख की जानकारी होने के दिन से 3 वर्ष की अवधि समाप्त नहीं हुई हो।

आपको चाहिए कि आप तुरन्त किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और जितना जल्दी हो सके अपने हिस्से को प्राप्त करने के लिए उक्त दोनों विलेखों को चुनौती देते हुए संपत्ति का बंटवारा करने और आप के हिस्से पर आप को पृथक कब्जा दिलाए जा का वाद संस्थित करें।

पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय।

rp_law-suit.jpgसमस्या-

दीपक ने भिरङाना , फतेहाबाद से हरियाणा राज्य की समस्या भेजी है कि-

पने अपने पिछले लेखों मे पुश्तैनी ओर सहदायिक सम्पत्ति में अन्तर बताया। मेरे मन मे पुश्तैनी सम्पत्ति को लेकर कुछ प्रश्न हैं। 1. आपने बताया कि 1956 से पहले तीन पीढ़ी में से किसी पुरुष पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्ति पुश्तैनी है यदि वह सम्पत्ति पुरुष पूर्वजों से प्राप्त न हो कर स्त्री पूर्वज से प्राप्त हुई हो और स्त्री पूर्वज को अपने पति से प्राप्त हुई हो तब क्या होगा? 2. अब जैसे भारत पाकिस्तान का बटवारा हुआ ओर पूर्वज पाकिस्तान से भारत आए और उन्हें 1956 से पहले जमीन अलॅाट हुई तब वह सम्पत्ति क्या कहलाएगी? क्योंकि वह सम्पत्ति तो उन्हे न तो किसी पूर्वज से मिली न ही उनकी स्वार्जित हुई भले ही पाकिस्तान में उन के पूर्वजों की सम्पत्ति के बदले भारत में सम्पति उन्हे मिली हो? 3. मान लीजिए, अ व्यक्ति को 1956 से पहले अपने पिता से सम्पति मिली तो वह सम्पत्ति पुश्तैनी हो गई। और अ की मृत्यु 1956 के बाद हो गई ओर वह सम्पत्ति उसके पुत्र ब को 1956 के बाद प्राप्त हुई तो क्या वह सम्पत्ति पुश्तैनी नहीं रही? इस प्रकार से ब के पुत्र स. के लिए अपने पिता ब की सम्पति तो पुश्तैनी नहीं कहलाई। लेकिन क्या स के लिए उसके दादा अ की सम्पत्ति पुश्तैनी हो जाएगी? 4. आपने कहा कि पुश्तैनी जायदाद का बंटवारा उतरजीविता के अधार पर होता है अगर किसी सहदायिक का जन्म होता है तो पहले के सभी सहदायिकों का हिस्सा कट कर जन्म लेने वाले सहदायिक को मिलता है, मेरा प्रश्न है कि जिस व्यक्ति के नाम पुश्तैनी सम्पति उसके जीवित रहते किसी सहदायिक का जन्म लेना जरूरी है या उसके मरने के बाद भी अगर किसी का जन्म होता है तो वह भी उस में हिस्सेदार बनेगा? 5. आपने कहा कि पुश्तैनी सम्पति मे तीन पीढ़ी यानि पुत्र पोत्र, प्रपोत्र तक का हिस्सा होता है लेकिन जब तक प्रपोत्र का जन्म होता है समझदार बनता है तब तक वो सम्पत्ति कई व्यक्ति को हस्तांतरित हो चुकी होती है, तब वह प्रपोत्र क्या कर सकता है? तब वह अपना हिस्सा कैसे प्राप्त कर सकता है? 6. आप ने पुश्तैनी व सहदायिक में अन्तर बताया, इसलिए सहदायिक सम्पत्ति की अलग परिभाषा होगी।

समाधान-

ब से पहले तो आप समझें कि पुश्तैनी संपत्ति क्या है। यदि किसी पुरुष को अपने परदादा, दादा या पिता से उत्तराधिकार में कोई संपत्ति प्राप्त होगी तो वह पुश्तैनी संपत्ति कहलाएगी। यदि पुरुष अकेला है अर्थात उस के कोई पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र नहीं है तो इस संपत्ति का स्वामी वह पुरुष होगा। लेकिन उस संपत्ति का चरित्र पुश्तैनी ही होगा व्यक्तिगत नहीं। यदि वह व्यक्ति उस समय उस संपत्ति को विक्रय या हस्तान्तरित करना चाहता है तो कर सकता है क्यों कि उस संपत्ति का वह अकेला स्वामी है। लेकिन उक्त संपत्ति उस के स्वामित्व में रहते हुए उस के एक पुत्र का जन्म हो जाता है तो इस संपत्ति का चरित्र पुश्तैनी होने के कारण पुत्र को उस संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त हो जाएगा। पुत्र के जन्म के साथ ही उसे पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार मिलते ही इस संपत्ति के दो स्वामी हो जाएंगे और यह संपत्ति सहदायिक हो जाएगी। जब दूसरा पुत्र जन्म लेगा तो इस सहदायिक संपत्ति में उसे भी जन्म से स्वामित्व प्राप्त होगा। इस तरह उस सहदायिकी में 3 व्यक्ति हो जाएंगे। पुश्तैनी संपत्ति और सहदायिक संपत्ति में यही अन्तर है। यह अन्तर इतना महीन है कि अक्सर इस में कोई अन्तर दिखाई ही नहीं देता है। वस्तुतः एक व्यक्ति जिस के कोई पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र जीवित नहीं है उसे जब कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो उत्तराधिकारी उस का अकेला स्वामी होता है इस कारण उसे सहदायिक संपत्ति नहीं कह सकते। इसी कारण उसे पुश्तैनी संपत्ति कहा जाता है।

17 जून 1956 एक विशिष्ट तिथि है क्यों कि इस दिन हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभाव में आया है। इस अधिनियम की विशिष्ट बात यह थी कि इस में यह तो उपबंध था कि जो संपत्ति पहले से सहदायिक है उस में उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर होगा। लेकिन यदि कोई संपत्ति इस अधिनियम के प्रभावी होने के समय सहदायिक नहीं थी। पुश्तैनी या स्वअर्जित थी तो वह इस अधिनियम के प्रभावी होने के बाद उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होगी। इस अधिनियम में पुत्रों, पुत्रियों, पत्नी और माता को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त हुआ था। इस कारण गैर सहदायिक संपत्ति का उत्तराधिकार इस प्रकार से होने लगा।

स नए उत्तराधिकार कानून से पुरुष वंशजों को मिलने वाली संपत्ति अब स्त्रियों को भी मिलने लगी। पुत्रों और पुत्रियों को समान भाग प्राप्त होने लगा। अब यह तो नहीं हो सकता था कि पुत्र को मिली संपत्ति तो पुश्तैनी हो जाए और पुत्री को मिली संपत्ति उस की व्यक्तिगत हो जाए। दूसरे इस अधिनियम की अनुसूची में पुत्र तो उत्तराधिकारी है लेकिन जीवित पुत्र का पुत्र या जीवित पुत्र के जीवित पुत्र का पुत्र इस में कहीं सम्मिलित नहीं है। इन कारणों से इस नए कानून से पुत्र को प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी संपत्ति होना बन्द हो गई। हालांकि न्यायालय अब भी पुत्र को पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति को पुश्तैनी मान कर निर्णय करते रहे। बाद में जब उच्चतम न्यायालय ने इस गुत्थी को सुलझाया तो यह स्पष्ट हुआ कि गैर सहदायिक संपत्ति जो उत्तराधिकार में पुरुष को अपने पुरुष पूर्वजों को प्राप्त होती है वह न पुश्तैनी हो सकती है और न ही सहदायिक हो सकती है। यही कारण है कि 17 जून 1956 के पहले तक जो संपत्ति सहदायिक हो चुकी थी वही सहदायिक रही और नयी पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति का अस्तित्व में आना बन्द हो गया।

स्त्रियों को प्राप्त संपत्ति उन की व्यक्तिगत संपत्ति होती है और उन से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति भी व्यक्तिगत ही होगी।

जो भूमि पाकिस्तान से आने पर व्यक्तियों को आवंटित हुई है वह न पुश्तैनी है और न ही सहदायिक। वह संपति जिसे आवंटित हुई थी उस की व्यक्तिगत संपत्ति है। उस का उत्तराधिकार उत्तराधिकार अधिनियम के शासित होगा। यदि किसी को ऐसी भूमि आवंटित हुई है और आवंटी की मृत्यु 17 जून 1956 के पूर्व हो गयी तो ऐसी आवंटित भूमि जिन पुरुष उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई वे पुश्तैनी या सहदायिक हो गई होंगी। जो संपत्ति 17 जून 1956 तक पुश्तैनी या सहदायिक नहीं थी वह बाद में किसी भी भांति पुश्तैनी या सहदायिक नहीं हो सकती।

दि किसी के पास पुश्तैनी संपत्ति है तो वह उस की मृत्यु तक पुश्तैनी ही रहेगी। यदि एक सहदायिक उस संपति का उस के जीवनकाल में जन्म लिया तो वह संपत्ति पुश्तैनी न रह कर सहदायिक हो जाएगी और उस का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर होगा। जैसे ही उस का देहान्त होगा उस का उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार तय हो कर वह उत्तराधिकारियों की हो जाएगी। क्यों कि संपत्ति पुश्तैनी रही और उस व्यक्ति के जीवनकाल में कोई सहदायिक जन्म नहीं लिया तो उस के देहान्त के बाद उस का कोई भ सहदायिक नहीं हो सकता।

पौत्र के जन्म लेने तक संपत्ति का अनेक स्थानों तक हस्तांतरित होना स्पष्ट नहीं है। सहदायिक संपत्ति का केवल एक ही सहदायिक जीवित बचे तो वह संपत्ति पुश्तैनी हो जाएगी। लेकिन किसी अन्य सहदायिक के उत्पन्न होते ही वह पुनः सहदायिक हो जाएगी। कोई भी सहदायिक यदि अपना हिस्सा बेचता है या हस्तान्तरित करता है तो वह हिस्सा सहदायिक संपत्ति से अलग हो जाएगा। तब हिस्सा बेचने वाले के बाद में कोई पुत्र, पौत्र या प्रपोत्र होने पर उस का सहदायिक संपत्ति में कोई भाग नहीं होगा। यदि सहदायिक संपत्ति का बँटवारा हो जाता है तो बंटवारे के उपरान्त जिन व्यक्तियों को हिस्सा मिलेगा उन के पास वह हिस्सा पुश्तैनी संपत्ति के रूप में रहेगा। उन के यहाँ पुत्र, पौत्र या प्रपोत्र जन्म लेने पर वह पुन सहदायिक हो जाएगी।

डिसक्लेमर : यहाँ जितने निष्कर्ष हम ने प्रस्तुत किए हैं। वे हमारे स्वयं की विश्लेषण के आधार पर हैं। यदि किसी को इस में कोई निष्कर्ष गलत लगता है तो उसे अपने निष्कर्ष का आधार बताते हुए अपना मत प्रस्तुत कर सकता है। उस में विमर्श का अवसर बना रहेगा। बिना किसी आधार के कोई नया निष्कर्ष प्रस्तुत न करें।

संपत्ति तभी पुश्तैनी (सहदायिक) है यदि वह 17 जून 1956 के पू्र्व भी पुश्तैनी थी।

agricultural-landसमस्या-

प्रीतम ने गाँव-नारायणगढ, तह०-नरवाना, जिला- जींद, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मैं (उम्र-57 वर्ष) एक अनपढ़ व्यक्ति हूँ मेरी पत्नी 3 साल पहले गुजर गई थी। मेरी एक गंभीर समस्या है कि मेरे खुद के नाम पूरे 4 एकड़ अर्थात 480 मरले खेत की जमीन है जो मुझे मेरे पिता से प्राप्त हुई थी अर्थात पुश्तेनी है। मैं ने अभी-अभी पटवारी से पूछा है कि मेरी जमीन मेरे पिता के पास 17 जून 1956 से पहले से है। मेरे 4 पुत्र हैं बड़ा पुत्र का व्यवहार परिवार के किसी भी सदस्य के साथ ठीक नहीं है। वह मेरे साथ झगड़ता रहता है। मैं उसे अपनी सम्पति(जमीन) में से कुछ भी उसे देना नहीं चाहता। अब आप मुझे इन 9 बातों का अलग-अलग स्पष्ट समाधान बताएं:- 1.मेरे जीवित रहते मैं अपने बड़े पुत्र को 4 एकड़ अर्थात 480 मरले में से कुछ भी नहीं देना चाहता। क्या मेरा बड़ा पुत्र मेंरे जीवित रहते मेरी जमीन में से कोई हिस्सा लेने का दावा कर सकता है जबकि मैं उसे कुछ भी नहीं देना चाहता और जमीन भी मेरे नाम है। 2. क्या मैं बड़े पुत्र को छोड़कर सारी जमीन जो 4 एकड़ अर्थात 480 मरले है शेष तीनों पुत्रों के नाम वसीयत कर सकता हूँ। 3. अगर मैं शेष तीनों पुत्रों के नाम वसीयत कर देता हूँ तो क्या मेरे मरने के बाद मेरा बड़ा पुत्र कोर्ट के माध्यम से अपने हक लेने का कोई दावा कर सकता है। 4. अगर वो दावा करता है तो कोर्ट उसे उसका कितना हक दिला सकता है कृपया एकड़ या मरले में बताएं या कोर्ट के माध्यम से भी उसे कुछ नहीं मिल सकता। 5.कोई ऐसा तरीका या सुझाव बताओ ताकि मेरे बड़े पुत्र को मेरे मरने के बाद मेरी पूरी जमीन में से बिल्कुल भी हिस्सा न मिले। 6. मेरी पत्नी मर चुकी है क्या अब उसका भी मेरी जमीन में कोई हिस्सा है? अगर है तो वो किसके पास माना जायेगा? 7. अगर मेरी पत्नी का हिस्सा मेरे पास माना जाये तो क्या मैं उस हिस्से को किसी एक पुत्र को वसीयत कर सकता हूँ। दूसरे पुत्र कोर्ट के माध्यम से उस हिस्से में से कुछ ले सकते हैं या नहीं। 8. क्या मुझे सारी जमीन बेचने का हक है। 9. अगर मैं सारी जमीन बेचना चाहूँ तो क्या मेरा बड़ा पुत्र उसमें कोई रुकावट डाल सकता है जबकि सारी जमीन मेरे नाम है। 4 नं. बात का जवाब एकड़ या मरले में दें। कृपया इन सभी 9 बातों का अलग-अलग स्पष्ट समाधान बताएं। आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि समस्या को गम्भीरता से लेते हुए जरुर से जरुर और जितना जल्दी हो सके समाधान बताएं।

समाधान-

प ने जल्दी समाधान के लिए लिखा है। तीसरा खंबा की यह सेवा निशुल्क है। तीसरा खंबा पर प्रतिदिन कितने ही लोगों की समस्याएँ आती हैं। हम कोशिश करते हैं कि सभी की समस्याओं का क्रम से समाधान प्रस्तुत करें। यह क्रम तभी टूटता है जब किसी को तुरन्त आवश्यकता हमें महसूस होती है। हम केवल एक समस्या का समाधान प्रस्तुत कर पाते हैं। आप की समस्या का समाधान भी हम आप के क्रम पर ही प्रस्तुत कर रहे हैं। क्यों कि हमें महसूस नहीं हुआ कि आप का समाधान तुरन्त प्रस्तुत करना आवश्यक है।

टवारी ने आप को बताया है उक्त भूमि आप के पिता के पास 17जून 1956 के पहले से है। लेकिन आप के पिता को भूमि उन के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो ही पुश्तैनी है, अन्यथा नहीं। यदि आप के पिता को यह भूमि किसी भी अन्य व्यक्ति से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी या उन्हों ने खुद खरीदी थी तो यह भूमि किसी भी प्रकार से पुश्तैनी नहीं है और कभी हो भी नहीं सकती। क्यों कि उक्त तिथि के उपरान्त कोई भी भूमि उत्तराधिकार के कारण सहदायिक नहीं हो सकती। इस कारण पहले आप यह तय करें कि आप की भूमि पुश्तैनी है अथवा नहीं।

दि भूमि पुश्तैनी है तो आप के बड़े पुत्र का उस में हिस्सा है अन्यथा नहीं है। आप की पत्नी का देहान्त आप के जीवनकाल में हो चुका है इस कारण उसे तो आप की इस भूमि में कोई हिस्सा प्राप्त ही नहीं हुआ उस का कोई हिस्सा नहीं है।

प के बड़े पुत्र को कभी भी कोई भी मुकदमा प्रस्तुत कर दावा करने से रोका नहीं जा सकता। लेकिन यदि उक्त भूमि पुश्तैनी नहीं है तो उस के सारे दावे बेकार जाएंगे। लेकिन यदि पुश्तैनी है तो वह उस का हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

दि आप की भूमि पुश्तैनी है तो भी उस में आप का खुद का जो हिस्सा है उसे आप वसीयत कर सकते हैं। इस से आप के जीवनकाल के उपरान्त आप का जो हिस्सा है वह उन्हें ही नहीं मिलेगा जिस के नाम आप वसीयत करेंगे। जिन के नाम नहीं करेंगे वे उस से वंचित हो जाएंगे।

दि भूमि पुश्तैनी नहीं है तो आप सारी भूमि की वसीयत कर सकते हैं। जिस में आप अपने किसी पुत्र को या सभी पुत्रों को वंचित करते हुए किसी भी व्यक्ति को अपनी संपत्ति वसीयत कर सकते हैं। भूमि के पुश्तैनी न होने पर आप सारी भूमि विक्रय भी कर सकते हैं। कोई उस में बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। यदि कोई कोशिश करेगा तो भी वह नाकाम हो जाएगी।

संपत्ति पुश्तैनी होने की स्थिति में एकड़ या मरले का हिसाब केवल उन तथ्यों के आधार पर नहीं बताया जा सकता जो यहाँ आप ने बताए हैं। उन के लिए यह भी देखना होगा कि आप के पिता के जीवित रहते आप के बच्चों में कितने जन्म ले चुके थे और कितने बाद में। इस कारण इस समस्या के हल के लिए आप को स्थानीय वकील से संपर्क करना चाहिए।

पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति में पुत्र पुत्रियों का हिस्सा नहीं।

lawसमस्या-

किरन ने रीवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


म दो भाई बहन हैं। मेरे माता-पिता ने दादा की संपत्ति (सारी चल-अचल संपत्ति) की रजिस्ट्री मेरे छोटे भाई के नाम कर दी है। दादा जी जीवित नहीं हैं दादा जी का देहान्त 2001 में हुआ है। दादा जी से पिता को उक्त संपत्ति उत्तराधिकार के माध्यम से प्राप्त हुई है। दादा जी की संपत्ति स्वयं की है। कृपया मुझे बतायें कि यदि एक भाई को दे रहे हैं तो क्या कानूनन मुझे वंचित रखा जा सकता है? क्या दादा की प्रोपर्टी पर दावा किया जा सकता है? इस के लिए मुझे क्या करना होगा?


समाधान-

मिताक्षर हिन्दू विधि के अनुसार यदि किसी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो उस संपत्ति में उस के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र का अधिकार जन्म से ही निहित हो जाता है। इस तरह हिन्दू पुरुष को अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति एक पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति हो जाती है जिस में उस के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्रों के हिस्से भी होते हैं।  1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम आने के पहले यही स्थिति थी। बाद में भी वर्षों तक ऐसा ही समझा जाता रहा। लेकिन बाद में जब हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्यायित करना आरंभ किया तो स्थिति परिवर्तित हो गई।

हिन्दूु उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 4 कहती है कि हिन्दू विधि पर इस अधिनियम के उपबंध प्रभावी होंगे। दूसरी ओर धारा  8 में हिन्दू पुरुष की संपत्ति का दाय कैसे होगा इस के लिए उपबंध किए गए हैं। इस के लिए अनुसूची दी गई है। इस अनुसूची में पुत्र पुत्रियाँ दोनों सम्मिलित हैं साथ ही मृत पुत्र व पुत्रियों की संताने सम्मिलित हैं लेकिन जीवित पुत्र की संतानों के सम्मिलित नहीं किया गया है। इस का सीधा अर्थ यह है कि जो संपत्ति पुरुष को अपने पिता से प्राप्त होगी उस में उस के पुत्र,पौत्र व प्रपौत्र का कोई अधिकार नहीं होगा। इस की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हि्न्दू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रभावी होने के उपरान्त हुए उत्तराधिकार के मामलों में जो संपत्ति पुरुष को अपने पिता से प्राप्त होगी वह अब पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति नहीं होगी।

हालाँकि इस अधिनियम की धारा 6 में यह प्रावधान किया गया था कि यदि किसी पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति में मृतक पुरुष का कोई हिस्सा हुआ तो उस पुरुष के हिस्से उस का दाय उत्तराधिकार के नियम से न हो कर उत्तरजीविता के आधार पर होगा। लेकिन यह नियम पहले से स्थित पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति के संबंध में ही प्रभावी होगा। 2005 में धारा 6 में संशोधन कर के पुत्रियों को भी जन्म से पुश्तेैनी/सहदायिक संपत्ति में हिस्से का अधिकार प्रदान किया गया है। लेकिन वह भी पहले से संपत्ति के पुश्तैनी/ सहदायिक होने पर ही है।

मारी राय में इस तरह किसी भी पुरुष की मृत्यु पर उस की स्वअर्जित संपत्ति जो हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अस्तित्व में आने के पहले उस के पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र को प्राप्त होती थी वह प्राप्त होने वाले पुरुष की पुरुष संतान होने पर पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति में परिवर्तित हो जाती थी इस अधिनियम के प्रभाव में आने से अब नहीं होती। इस तरह इस अधिनियम के अस्तित्व में आने से अब नई पैतृक संपत्ति का सृजन रुक गया है। अब तक की सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई व्याख्याओं से यही अभिमत सामने आया है। हमारे इस अभिमत पर विरोधी विचार भी व्यक्त किए जा सकते हैं तथा सुप्रीम कोर्ट की कोई नई व्याख्या इस अभिमत को बदल सकती है। इस कारण हमारी इस राय को अन्तिम नहीं माना जाए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई इन व्याख्याओं के अनुसार आप के पिता को आप के दादा की स्वअर्जित संपत्ति से जो संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई उस में आप का और आप के भाइयों का कोई अधिकार नहीं है। उसे किसी को भी हस्तान्तरित करने का अधिकार आप के पिता को है। यदि उन्हों ने यह संपत्ति आप के छोटे भाई के नाम कर दी है तो आप को उस पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है। हमारी राय में आप का इस सम्बन्ध में किया गया दावा सफल नहीं होगा।

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