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तलाक का आधार हो तो दूसरे पक्ष की सहमति की जरूरत नहीं।

समस्या-

नवीन ने साईखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को एक  साल हो चुका है। मेरी पत्नी छत से कूदने की, फाँसी लगाने की धमकी देती है। काम करने की मना कर चुकी है। शादी से पहले उसका अफ़ेयर रह चुका है। घर से 2 बार व मायके से 1 बार भाग चुकी है। एक रात कहीं रह चुकी है। 4 माह से उसका मानसिक इलाज़ करा रहा हूँ। दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करती है। तलाक की याचिका लगा दी है पर वो तलाक देने को तैयार नहीं है। क्या करूँ?

समाधान-

प के सवाल का छोटा सा जवाब है कि “मुकदमा लड़िए”।

आप की ही तरह मेरे पास ऐसे बहुत लोग समस्या ले कर आते हैं, जो यही कहते हैं कि मेरी पत्नी या पति तलाक के लिए राजी नहीं है। 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट प्रभावी होने के पहले तो भारत में कोई भी इस बात पर राजी नहीं था कि हिन्दू विवाह में तलाक होना चाहिए।

फिर हिन्दू मैरिज एक्ट आया तो उस में तलाक के प्रावधान आए जिन के अनुसार कुछ आधारों पर पति या पत्नी तलाक की मांग कर सकते थे, कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर केवल पत्नी तलाक की मांग कर सकती थी। लेकिन कानून के अनुसार इस के लिए अदालत में आवेदन देना अनिवार्य था। पति की अर्जी पर पत्नी या पत्नी की मर्जी पर पति अदालत में सहमत भी होता था तो तलाक होना असंभव था। स्थिति यह थी कि जो भी तलाक लेना चाहता/ चाहती थी उसे जिस आधार पर तलाक चाहिए था उसे साक्ष्य के माध्यम से साबित करना जरूरी था। आधार मुकम्मल रूप से साबित होने पर ही तलाक मिल सकता था। तलाक का यह तरीका हिन्दू मैरिज में अभी भी मौजूद है।

फिर  1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान आया। पहले यदि पति पत्नी दोनों सहमत होते हुए भी तलाक लेने जाते थे तब भी कम से कम एक पक्ष को विपक्षी के विरुद्ध तलाक के आधार को साक्ष्य से साबित करना पड़ता था। अब दोनों पक्षों के सहमत होने पर इस की जरूरत नहीं रह गयी। बस सहमति से तलाक का आवेदन पेश करें और छह माह बाद भी सहमति बनी रहे तो अदालत तलाक की डिक्री प्रदान करने लगी।

तो नवीन जी¡ तो कुछ समझ आया? आप के पास तलाक के लिए आधार मौजूद है। आपने अपनी समस्या में जो बातें लिखी हैं उन में से शादी के पहले के अफेयर की बात के सिवा सारी बातें अदालत में साबित कर देंगे तो आप को तलाक की डिक्री मिल जाएगी। उस के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है। बस ये है कि कुछ समय अधिक लगेगा।

आपसी समझ बना कर वैवाहिक समस्या का समाधान तलाशने का प्रयत्न करें।

rp_play_habeas_rb.jpgसमस्या-

रितिक कौशिक ने गाजियाबाद से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी एक फीजियोथेरेपिस्ट है और दिल्ली के सरकारी अस्पताल में संविदा पर फीजियोथेरेपिस्ट की नौकरी (38,000/-प्रतिमाह) करती है। मैं भी श्रेणी प्रथम राजकीय अधिकारी हूँ। हम दोनों में मनमुटाव के कारण जीना दूभर हो गया है। विवाह को दो वर्ष हुए हैं एक दस माह की बेटी भी है। पत्नी चाहती है कि 30 लाख का मुकदमा कर के घरेलू हिंसा और 498ए में मुझे जेल भिजवा दे जिस से मेरी नौकरी भी चली जाए। कृपया सुझाव दें कि आपसी सहमति से तलाक में भी कामकाजी पत्नी को भी मेंटीनेंस देना होगा क्या? और तलाक के बाद बेटी की कस्टडी किस के पास रहेगी। क्या बेटी के लिए अलग से भत्ता देना पड़ेगा क्या? वह सुप्रीमकोर्ट के निर्णयों की प्रति अपने पास रखती है ताकि इस मामले में अच्छी राशि प्राप्त कर सके।

समाधान-

प ने मन मुटाव का कोई कारण यहाँ नहीं बताया है। मुझे लगता है कि आप दोनों को किसी काउंसलर की मदद लेनी चाहिए। अभी आप के विवाह को अधिक समय नहीं हुआ है। यदि किसी तरह आप लोगों में बात बन सकती है तो इस विवाह को बनाए रखें। इस से बच्चे पर बुरा असर नहीं होगा।

दि आप समझते हैं कि बात इतनी बिगड़ गयी है कि अब नहीं बन सकती तो बेहतर है कि आप दोनों आपस में सहमति से तलाक लें। तलाक की सहमति भी तभी संभव हो सकती है जब कि तलाक के फलस्वरूप आप की पत्नी के लिए स्थाई पुनर्भरण तथा बेटी के भरण पोषण की राशि तय हो जाए। यह राशि दोनों की मिला कर एक मुश्त तय हो सकती है। यदि ये सब बातें तय हो जाएंगी तभी सहमति से तलाक संभव हो सकेगा अन्यथा आप दोनों को बहुत सी मुकदमों को झेलना पड़ेगा। बेहतर है कि साथ रहने के संबंध में नहीं तो अलग होने के संबंध में ही सहमति बना ली जाए।

लाक की स्थिति में यदि पत्नी की खुद की पर्याप्त आय है तो उसे भरण पोषण राशि दिलाने का कोई अर्थ नहीं है लेकिन आप की आय और पत्नी की आय में बड़ा अन्तर है तो न्यायालय पत्नी को अपने स्तर से जीने के लिए कुछ भरण पोषण राशि आप से दिलवा सकता है।

बेटी की अभिरक्षा आप को प्राप्त नहीं हो सकेगी। बेहतर है कि वह अपनी माँ के साथ रहे। बाद में जब उस की उम्र अधिक हो जाए और यह लगे कि माँ के साथ उस का पालन पोषण ठीक से नहीं हो रहा है और आप के पास हो सकता है तो उस समय कस्टडी प्राप्त करने के लिए आवेदन किया जा सकता है।

प राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में निवास करते हैं। वहाँ बहुत अच्चे वकील उपलब्ध हैं। आप उन की फीस देने में भी सक्षम हैं आप को चाहिए कि किसी स्थानीय वकील से सारे तथ्य बता कर राय करें। वह सारे तथ्य जान लेने के बाद आप को उचित राय दे सकता है।

परस्पर विश्वास नहीं तो विवाह विच्छेद ही सर्वोत्तम हल है।

rp_divorce-lawyer.pngसमस्या-

शिवकुमार ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी २०१० में हुई थी मेरा एक तीन साल का लड़का है, मेरी बीवी पिछले एक साल से अपने मायके रह रही है मेरे बच्चे को साथ लेकर। मेरे लाख कहने पर भी वह आने के लिए तैयार नहीं है कहती है कि मुझे लिख कर दो कि अगर मेरे साथ कुछ भी हो गया तो उसके जिम्मेदार तुम होगे। जबकि पिछले साल २०१४ में यह अपनी मर्जी से चार दिन के लिए घर से गायब हो गयी थी और इसके माँ बाप ने मेरे ऊपर अपनी बीवी को मारने की रिपोर्ट करा दी। जब वह चार दिन बाद मिली तो उसने थाने में बयान दिया कि मैं गुस्से में चली गयी थी। उस के बाद से वह थाने से ही राजीनामा लिखकर अपने मायके चली गयी 15 दिन की कह कर और एक साल होने पर भी आना नहीं चाहती। फ़ोन पर खुद और मेरे बेटे को मारने की धमकी देती है। उस ने फ़ोन पर मुझ से कई बार तलक माँगा है और उस के बाप ने भी कहा कि मेरी बेटी को तलाक दे दे। इन सब में मेरे बेटे का फ्यूचर ख़राब हो रहा है। मैं उसे लाकर अलग रखना चाहता हूँ। पर मैं खुद भी उस के साथ रह नहीं सकता क्यों कि वह मुझे मारने के लिए कोई भी हद पार कर सकती है। मैं परिवार में अकेला कमाने वाला हूँ, मेरे तीन छोटे भाई बहन हैं जिन की जिम्मेदारी मेरी उपर है। मैं चाहता हूँ कि वह आकर मेरे द्वारा दिलाए गए किराये के मकान में रहे और मेरे बच्चे को स्कूल भेजे, सारा खर्चा मैं दूंगा। पर वह कहती है कि पहले तुम लिखकर दो की मेरी जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। क्यों कि वह पहले ही विश्वासघात कर चुकी है तो मैंने उसे कहा है कि तू अपने और अपने पापा के साइन कराकर चली आ कि मेरे द्वारा की गयी कोई भी अनहोनी की जिम्मेदार मैं खुद होउंगी। इस पर वह तैयार नहीं है, बल्कि मुझे से कह रही है कि तुम मुझे लिखकर दो कि मेरे साथ कुछ भी हुआ तो तुम जिम्मेदार हो और तुम मेरे साथ ही रहोगे। मैं ने उसे कहा कि जब तुझे मेरे साथ ही रहना था तो पुलिस मेरे खिलाफ झूठी रिपोर्ट और महिला सेल में मेरे पीठ पीछे रिपोर्ट क्यों करी? तो वह कहती है कि मैंने अपनी सेफ्टी के लिए की थी। अब मैं अपने बच्चे को वापिस पाना चाहता हूँ। क्योकि वह दिमाग से बेकार है और वह मेरे बच्चे को मार सकती है। जिस की उस ने मुझे फ़ोन पर कई बार धमकी दी है। मेरे उपर खर्चे के केस की धमकी देती है, मेरे घर वालों को मरवाने की धमकियाँ देती है। यह सब मेरे पास फ़ोन में रिकॉर्ड है। अब आप मुझे बतायें कि मुझे अपने बेटे के लिए क्या करना चाहिए? क्यों कि उसे लगभग 20 बार माफ़ करने बाद यह हाल है। हर बार मैं ने बाहर के लोगों के कहने पर समझौता किया। पर इस बार तो पानी सर से ऊपर हो गया और मेरा उसका रिश्ता अब न के बराबर है। आप मुझे सलाह दें। मेरा बच्चा ३ साल एक महीने का है।

समाधान

प की कहानी पूरी तरह से एकतरफा है। आप ने अपनी शिकायतें लिख दीं हैं, लेकिन तथ्य बिलकुल नहीं बताए हैं। विवाह के उपरान्त आप लोग ठीक से रहे, एक संतान हो गयी और उस के बाद झगड़े शुरू हो गए और इस कदर हो गए कि आप की पत्नी घर छोड़ कर चली गयी और चार दिन तक गायब रही। पुलिस में उस ने भी असली शिकायत न बता कर खुद के गुस्से पर सारी बात ले कर आप को बचा लिया। 15 दिन बाद मायके से वापस लौट कर आने को कहा, लेकिन नहीं आयी। आप दोनों के बीच कुछ तो ऐसा घटित हुआ है जिस के कारण आप की पत्नी को आप का घर छोड़ कर जाना पड़ा। यदि आप वह सब नहीं बताएंगे तो समस्या का सही समाधान नहीं दिया जा सकता। यदि गायब होने और पुलिस के पास पहुँचने के बाद वह आप की शिकायतें करती तो आप और आप के परिवार के लोग गिरफ्तार हो सकते थे। लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया। उस ने आप को सिर्फ इस कारण बचाया कि आप के साथ वह रिश्ते को समाप्त नहीं करना चाहती थी या फिर इस मामले में निर्णय नहीं कर पा रही थी।

मायके पहुँच कर उस ने अपने मायके वालों को अपनी व्यथाकथा बताई होगी, निश्चित रूप से उन्हों ने आपस में भी सलाह की होगी। तब उस के सामने यही रास्ता बचा होगा कि वह या तो तलाक ले कर आप से अलग हो जाए, या फिर आप से सुरक्षा के लिए वायदा ले। आखिर उस की इस मांग के पीछे उस की कोई तो मानसिकता या डर काम कर रहा होगा। हो सकता है आप की निगाह में पत्नी के प्रति आप के सभी कृत्य उचित रहे हों, लेकिन फिर भी कुछ तो बातें ऐसी हैं जिन के कारण आप की पत्नी को आप का विश्वास नहीं है वह आप से डरती है। आप को वह कारण अपने भीतर तलाशना चाहिए। आप पत्नी को अपने साथ नहीं, अलग किराए के मकान में रखना चाहते है, आप उस के साथ रह नहीं सकते। क्या यह पत्नी का अपमान नहीं है? क्या कोई भी स्वाभिमानी औरत यह सब स्वीकार कर सकती है? आप ने कहा कि आप 20 बार पत्नी को माफ कर चुके हैं। अर्थात आप उसे गुनहगार समझते हैं। उस ने क्या गुनाह किया है यह भी तो आप नहीं बताना चाहते।

 प दोनों के बीच कोई आपसी विश्वास नहीं है। दोनों एक दूसरे से डरते हैं। इस डर को निकालना भी नहीं चाहते। जिस तरह से आप अपनी पत्नी को रखना चाहते हैं वह किसी भी स्त्री के लिए घोर अपमान जनक है। हमें नहीं लगता कि आप दोनों किसी भी तरह से साथ रह सकते हैं। सब से अच्छा यही है कि आप की पत्नी तलाक के लिए कह रही है तो आप दोनों सहमति से तलाक की अर्जी लगाएँ और सहमति से विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करा लें। यदि सहमति से तलाक हो तो यह भी तय किया जा सकता है कि बच्चा भविष्य में कब और किस के पास रहेगा उस का पालन पोषण कैसे होगा। कौन कौन कब कब बच्चे से मिलेगा। आप बच्चे को अपने पास रखना चाहते हैं क्यों कि बच्चा आप का है। लेकिन बच्चा क्या आप की पत्नी का नहीं है? वह भी कहेगी कि बच्चा उस का है वह अपने पास रखेगी। यह भी सही है कि जिस उम्र का बच्चा है उस उम्र में बच्चे को माँ की अधिक जरूरत है। इस कारण इस समय तो न्यायालय भी यही निर्णय करेगा कि बच्चा माँ के साथ रहे। अदालत कभी भी बच्चे पर माँ और पिता के अधिकार को नहीं देखती, वह देखती है कि बच्चे का हित किस में है। भविष्य में जब भी आप समझें कि उस की माँ के पास उस का हित सुरक्षित नहीं है तो तथ्यों के साथ आवेदन करें। शायद बच्चे की अभिरक्षा आप को मिल जाए।

जब विवाह चल सकने लायक न रहे तो सहमति से तलाक ही उचित और आसान उपाय है।

erectile dysfunctionसमस्या-

जगन्नाथ राव ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पुत्री का विवाह 30 जनवरी 2015 को हुआ। लड़के के माता-पिता अभद्र भाषा और लड़ाई झगड़े द्वारा लड़की को परेशान करते थे। किसी पड़ौसी से बात नहीं करने देते थे। यहाँ तक कि मोबाईल पर की जा रही वार्ता भी छुप छुप कर सुनते थे। शादी अच्छे ढंग से धूम धाम से की गयी थी फिर भी वो बिटिया को सुनाते रहते थे। कई बार सामान की मांग की गयी जो हमने पूरी की। पुत्री कई बार घर आकर रो रोकर उनकी ज़्यादतियों के बारे में बताती थी, पर हम उसे समझाते कि नया घर है, धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा और वो वापस चली जाती। फिर उन्होंने मेरी पुत्री से उसकी सैलरी की मांग की। जिसके लिए हमीं ने अपनी बेटी को कहा की ना दे क्योंकि उन की मांगें कम नहीं हो रही थीं। एक दिन सुबह सुबह बेटी घर आई तो उस का रो रोकर बुरा हाल था। पत्नी से पता चला कि वो ससुराल में एक माह से सो नहीं पा रही थी और उसका डिप्रेशन का इलाज चल रहा था। हम तुरंत उसे डॉक्टर के पास लेकर गए जहां जांच के बाद डॉक्टर ने हमें साफ़ कहा कि उसे ससुराल ना भेजें। कुछ समय अपने पास रखें। तब से यानि अप्रैल के अंतिम सप्ताह से पुत्री मेरे घर है। २-३ दिन बाद मेरी पत्नी और पुत्री उसके कुछ रोज़मर्रा के कपडे लेने उसके ससुराल गए जहां उसके सास ससुर का असली विकराल रूप दिखा जिस के बारे में अपनी पत्नी से सुनकर मुझे लगा कि मेरी बच्ची अक्सर शिकायत करती थी, पर हम ही समझ नहीं पाये। अकेले में वो उस का क्या हाल करते होंगे! कुछ सप्ताह में वो डिप्रेशन से बाहर आई। वापस ऑफिस जाने लगी। तब मेरी पत्नी से उस की बात हुई की शादी के 3 माह तक भी मेरी पुत्री और दामाद में पति पत्नी के सम्बन्ध नहीं बने जिसका कारण शायद लड़के में इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या है पर इसका प्रुफ कैसे दिया जाये। उस की माँ और पिताजी को जब बताया तो माँ बिफर गयी और बोली, मेरे बेटे में कोई कमी नहीं है। जब कि हम ने कमी की बात की ही नहीं सिर्फ बताया था की क्या समस्या है। हमने लड़के वालों से बात की तो वो झगडे पर उतर आये। लड़का बोला कि मुझ पर कोई इलज़ाम लगाए बिना म्यूच्यूअल डाइवोर्स ले लो तो ठीक है, दे दूंगा। हमने राजीनामा किया जिसमें केवल लड़की के पीहर के गहने, कपडे और ससुराल पक्ष को दिए गहने वापस मिले। उसका स्त्री धन भी नहीं लिया। लड़की ने पारिवारिक न्यायालय में धारा 13 (B) व 14 के अंतर्गत जॉइंट एप्लीकेशन लगा दी। अभी तो न्यायाधीश के साथ पहली मीटिंग भी डेढ़ माह बाद की तारीख पर है। प्रार्थनापत्र स्वीकार हो गया है। सवाल ये है कि कम से कम कितने समय में तलाक संभव है? और क्या हम विधि रूप से सही दिशा में हैं?

समाधान

प बिलकुल सही राह पर हैं। पुरुष की यौन संबंध बना सकने की अक्षमता को इरेक्टाइल डिसफंक्शन कहा जाता है।  यह एक ऐसी अवस्था है जिसे साबित करना बहुत कठिन है। केवल चिकित्सकीय परीक्षणों से यह साबित करना लगभग दुष्कर है कि किसी पुरुष को इरेक्टाइल डिसफंक्शन है। यह शारीरिक और मानसिक कमी दोनों के कारण हो सकता है और कभी दोनों का सम्मिलित परिणाम भी हो सकता है। पुरुष कभी भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होता है कि वह इस रोग से पीड़ित है। अनेक बार यह रोग छोटी उम्र में या विवाह पूर्व हुई किसी दुर्घटना का परिणाम हो सकता है। चूंकि छोटी उम्र में इरेक्टाइल डिसफंक्शन स्वभावतः होता है इस कारण उस पर ध्यान नहीं जाता है। चिकित्सकीय परीक्षण में यह साबित हो जाता है कि इरेक्शन स्वाभाविक रूप से हो रहा है तथा शुक्राणु की संख्या भी पर्याप्त मात्रा में है। इस के आगे चिकित्सकीय परीक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। लेकिन वस्तुतः यह इरेक्शन यौन संबंध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होता है, जिस के कारण पुरुष विवाह का उपभोग नहीं हो पाता है।

वैसी स्थिति में यदि दोनों पक्ष तैयार हैं तो किसी भी पक्ष की किसी प्रकार कि कमजोरी को उजागर किए बिना हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 (बी) के अन्तर्गत सहमति से विवाह विच्छेद होना सब से बेहतर उपाय है। यह 6-8 माह में हो जाता है। आवेदन प्रस्तुत करने और न्यायालय में पंजीबद्ध हो जाने के उपरान्त छह माह का समय देना जरूरी है। यदि छह माह के उपरान्त भी दोनों यह बयान करते हैं कि वे स्वेच्छा से विवाह विच्छेद चाहते हैं तो न्यायालय दोनों के विवाह को विघटित करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर देता है।

हाँ धारा 14 के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि विवाह संपन्न होने के एक वर्ष की अवधि में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। लेकिन न्यायालय प्रार्थी को असाधारण कठिनाई होने अथवा असाधारण दुराचरण होने की विशिष्ट परिस्थितियों में इस अवधि के पूर्व भी विवाह विच्छेद के आवेदन को सुनवाई के लिए स्वीकार कर सकता है। आप के मामले में आवेदन स्वीकार कर लिया गया है यह अच्छी बात है। लेकिन यदि सुनवाई के समय न्यायालय यह महसूस करता है कि वैसी स्थिति नहीं थी और विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करता है तो वह यह शर्त लगा सकता है कि विवाह को एक वर्ष पूर्ण होने के पूर्व यह डिक्री प्रभावी नहीं होगी।

हाँ समय लगने की बात है तो यह मान कर चलें कि आवेदन स्वीकार होने के छह माह के बाद ही उक्त डिक्री पारित की जा सकती है। हम वकील मानते हैं कि इस तरह के मामले में 8 से 10 माह की अवधि में विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है।

बच्चे की अभिरक्षा के लिए न्यायालय बच्चे का हित देखेगा।

father daughterसमस्या-

युवराज ने बर्दमान, पश्चिम बंगाल से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 8 साल पहले हुई थी। मेरा एक 7 वर्ष का पुत्र भी है। पिछले तीन सालों से मेरी पत्नी मेरे बेटे को ले कर अपने मायके में निवास कर रही है क्यों कि उस के मायके में सिर्फ माँ अकेली है, पिता का देहान्त हो चुका है। और भाई शहर के बाहर नौकरी करता है। उस की माँ अपने गृहनगर में ही राज्य सरकार की नौकरी करती है। अब पत्नी मेरे साथ नहीं आना चाहती और आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है। उस के लिए मैं भी तैयार हूँ। लेकिन मैं अपने पुत्र की कस्टड़ी लेना चाहता हूँ। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

वास्तव में आप की कोई समस्या ही नहीं है। यदि आप की पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है तो आप उस के सामने शर्त रख सकते हैं कि आप तभी तलाक देंगे जब वह स्वेच्छा से आप के पुत्र की कस्टड़ी आप को दे देगी। इस के लिए यदि वह तैयार हो जाती है तो आप सहमति से तलाक लेंगे तब तलाक की अर्जी में लिख सकते हैं कि पुत्र आप के साथ रहेगा। वैसे भी सहमति से तलाक की अर्जी में आप दोनों को बताना पड़ेगा कि पुत्र किस के पास रहेगा।

पुत्र किस की कस्टड़ी में रहेगा या तो आप दोनों सहमति से तय कर सकते हैं, या फिर न्यायालय तय कर सकता है। यदि न्यायालय कस्टड़ी की बात तय करता है तो वह आप दोनों की इच्छा से तय नहीं करेगा बल्कि  देखेगा कि उस का हित किस के साथ रहने में है। यह तथ्यों के आधार पर ही निश्चित किया जा सकता है कि बच्चे की कस्टड़ी किसे प्राप्त होगी। वैसे पुत्र 7 वर्ष का हो चुका है और आप आवेदन करेंगे तो उस की कस्टड़ी आप को मिल सकती है। क्यों कि आप की पत्नी के पास आय का अपना साधन है यह आप ने स्पष्ट नहीं किया। जहाँ तक देख रेख का प्रश्न है तो निश्चित रूप से चाहे लड़का हो या लड़की माँ अपने बच्चों का पालन पोषण पिता से अधिक अच्छे से कर सकती है।

मारी राय है कि आप को बच्चे की कस्टड़ी के सवाल को अभी त्याग देना चाहिए और आपसी सहमति से तलाक ले लेना चाहिए। उस से आप एक नए जीवनसाथी के साथ अपना नया दाम्पत्य आरम्भ कर सकते हैं। बाद में आप को लगता है कि बच्चे का भविष्य माँ से बेहतर आप के साथ हो सकता है तो आप बाद में भी इस के लिए आवेदन कर सकते हैं।

मियाँ बीवी राजी, फिर भी शादी कैसे करें?

handshakeसमस्या-

नीतिश ने बैतूल, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मैं धनगर पाल समाज से हूँ साहु समाज की लड़की से कोर्ट मेरिज करना चाहता हूँ। ना लड़की के माँ बाप तैयार हैं और ना ही मेरे। लड़की हर बात में राजी है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

हुत मासूम सवाल है आप का। हमारे यहाँ कहावत है, मियाँ बीवी राजी तो क्या करेगा काजी। हमारा देश एक जनतांत्रिक देश है। वयस्क स्त्री-पुरुषों को अपनी इच्छा से आपसी सहमति से विवाह करने का अधिकार है। जब स्त्री और पुरूष आपस में सहमत हो कर विवाह करना चाहें तो किसी को उन्हें रोकने का अधिकार नहीं है। फिर आप को चिन्ता क्यों हो रही है? यदि चिन्ता हो रही है तो आप की चिन्ता क्या है? आप को अपनी चिन्ताओं को इस प्रश्न में खोल कर रखना चाहिए था। आप अपनी चिन्ताएँ छुपा कर क्या सलाह चाहते हैं? बीमारी या वे लक्षण जिन से रोगी को सामान्य जीवन जीने में परेशानी हो रही है खोल कर बताए बिना कोई डाक्टर रोगी का इलाज कैसे कर सकता है?

 म समझते हैं कि वयस्क स्त्री पुरुषों का आपसी सहमति और रजामंदी से विवाह करने का अधिकार केवल किताबी है। जो माता पिता और संबंधी आप से प्रेम करते हैं आप को उन्हीं का भय सता रहा है कि वे आप को विवाह न करने देंगे। फर्जी रिपोर्टें पुलिस को करवाएंगे, फिर पुलिस आप के पीछे पड़ जाएगी। आप को किसी अपराध में हवालात में बन्द कर देगी। लड़की को पकड़ कर उस के मां बाप के सुपूर्द कर देगी। फिर लड़की को माँ बाप की अभिरक्षा में माँ, बाप, भाई और रिश्तेदार टार्चर करेंगे कि उन्हों ने जो रिपोर्ट पुलिस को दी है उस का समर्थन कर बयान दे कि लड़का मुझे बहला फुसला कर ले गया और मेरे साथ बलात्कार किया। वगैरा वगैरा। यही चिन्ताएँ आप के दिमाग में होंगी।

न चिन्ताओं का कोई इलाज नहीं है। आप दोनों को विवाह करना है तो पहली शर्त ये है कि आप दोनों या दोनों में से कम से कम एक अपने पैरों पर खड़ा हो और उस की आमदनी इतनी हो कि परिवार को चला सके। यदि दोनों आत्मनिर्भर हों तो सब से बेहतर है। क्यों कि इन सब से लड़ने के लिए धन भी चाहिए, हिम्मत भी। फिर एक अलग निवास की व्यवस्था करें। उस के बाद आप दोनों मिल कर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की नजदीकी बैंच में रिट आवेदन दीजिए कि आप दोनों विवाह करना चाहते हैं और आप दोनों के मां बाप और परिजन आप के इस विवाह को पसंद नहीं करते और विवाह में रोड़ा अटकाएंगे और पुलिस उन की मदद करेगी। इस कारण जिला कलेक्टर कम विवाह पंजीयक को निर्देश दिया जाए कि आप के विवाह को पंजीकृत करे और पुलिस को निर्देश दिया जाए कि विवाह होने और उस के बाद सब कुछ सामान्य होने तक आप दोनों को सुरक्षा प्रदान करे। ऐसा आदेश प्राप्त कर लेने के उपरान्त आप जिला कलेक्टर कम जिला विवाह पंजीयक के कार्यालय में विवाह के पंजीयन के लिए आवेदन कीजिए जहाँ आवेदन के 30 दिन के बाद आप अपना विवाह संपन्न करवा कर उस का पंजीयन प्रमाण पत्र प्राप्त करें और साथ रहना आरंभ कर सकते हैं। यदि आप में समाज के लोगों से यह लड़ाई लड़ने की हिम्मत और आत्मनिर्भरता नहीं है तो यह विवाह करने का इरादा छोड़ दीजिए।

सभी उत्तराधिकारियों में संपत्ति के विक्रय पर सहमति न होने पर विभाजन का वाद प्रस्तुत करें।

समस्या-

ब्यावर, जिला अजमेर, राजस्थान से विजय खंडेलवाल ने पूछा है-

म सात भाई और चार बहनें हैं।  हमारे माता पिता का बहुत पहले देहान्त हो चुका है।  मेरे दो बड़े भाई तथा एक बड़ी बहिन का भी देहान्त हो चुका है, उन के परिवार मौजूद हैं।  हमारे पैतृक मकान में अब कोई नहीं रहता है।   ग्यारह परिवारों के मुखियाओँ में से मेरे एक भाई का परिवार उक्त संपत्ति के विक्रय के लिए सहमत नहीं है। कृपया सुझाएँ कि आगे कैसे बढ़ा जा सकता है?

समाधान-

मकानप के माता पिता के देहान्त के पश्चात से ही उक्त संपत्ति संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है। ऐसी संपत्ति को बिना सभी साझीदारों की सहमति के विक्रय नहीं किया जा सकता है। यदि विक्रय होगा तो क्रेता संपत्ति पर अविवादित स्वामित्व तथा कब्जा चाहेगा। यह तभी संभव है जब कि सभी साझीदारों द्वारा संयुक्त रूप से उक्त संपत्ति के विक्रय पत्र को निष्पादित किया जाए और उपपंजीयक के कार्यालय में उपस्थित हो कर उस का पंजीयन कराया जाए। लेकिन यदि एक साझीदार सहमत नहीं है तो फिर ऐसा होना संभव नहीं है।

क्त संपत्ति के अब तक कई संयुक्त स्वामी हो चुके हैं। आप के जिन भाई बहिनों का देहान्त हो चुका है उन के उत्तराधिकारी उन के हिस्सों के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। वैसी स्थिति में उक्त मकान का भौतिक विभाजन भी संभव प्रतीत नहीं होता है। ऐसी स्थिति में यही एक मात्र मार्ग है कि कोई भी एक साझीदार शेष सभी साझीदारों के विरुद्ध दीवानी न्यायालय में संपत्ति के विभाजन का दीवानी वाद प्रस्तुत करे तथा यह अभिवचन करे कि उक्त संपत्ति के अनेक स्वामी होने के कारण उस का भौतिक विभाजन संभव नहीं है इस कारण उक्त संपत्ति को विक्रय कर के सभी साझीदारों को उन के हिस्से की राशि दे दी जाए। इस वाद पत्र में जो साझीदार संपत्ति के विक्रय के लिए सहमत हैं वे सभी सहमति का उत्तर प्रस्तुत करें। वैसी स्थिति में केवल एक साझीदार जो संपत्ति का विक्रय नहीं चाहता वह जो भी जवाब दे उसे देने दिया जाए।  बाद में साक्ष्य के आधार पर न्यायालय से निर्णय प्राप्त कर के उक्त संपत्ति को उस के आधार पर विक्रय किया जा सकता है। इस संबंध में आप को ब्यावर के दीवानी मामलों के किसी वरिष्ठ वकील से सलाह कर के आगे कार्यवाही की जा सकती है।

हिन्दु विवाह विच्छेद न्यायालय के बाहर संभव नहीं

समस्या-

मेरी शादी को तीन माह हुए हैं।  मैं एक मध्यवर्गीय परिवार से हूँ लेकिन मेरी पत्नी एक धनी परिवार से आई है। हम  दोनों में आप सी समझ नहीं बन पा रही है। हम लोग अपना विवाह विच्छेद करना चाहते हैं। लेकिन हम यह भी चाहते हैं कि हमारा तलाक बिना अदालत जाए हो जाए। क्यों कि अदालत में तलाक में कई साल लग जाएंगे।  मेरी पत्नी भी तलाक चाहती है क्यों कि विवाह के पहले वह किसी से प्यार करती है और उसी से विवाह करना चाहती है। उस के अनुसार यह शादी उस की मर्जी के खिलाफ हुई है।  क्या कोई तरीका है कि हमारा तलाक बिना अदालत हो जाए और वह वैध भी हो?

-अनूप केसरवानी, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

समाधान-

भारत में निवास करने वाले सभी मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों, यहूदियों,  वे जो कि यह सिद्ध कर सकें कि वे  हिन्दू विधि से शासित नहीं होते तथा अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों को छोड़ कर सभी पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। आप के विवरण के अनुसार आप पर भी हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। इस अधिनियम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिस से न्यायालय के बाहर किसी तरह विवाह विच्छेद किया जा सके। इस तरह आप का और आप की पत्नी के बीच विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

प के विवाह को केवल तीन माह हुए हैं। शायद ही दुनिया में कोई पति पत्नी ऐसे मिलें जिन के बीच इतने कम समय में आपसी समझदारी विकसित हुई हो। आम तौर पर समझदारी बनने में कुछ वर्ष लग जाते हैं। इस कारण दोनों ही पक्षों को लगातार आपसी समझदारी विकसित करने का प्रयत्न करना चाहिए। स्त्री पुरुष के बीच विवाह कोई गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं है जिसे जब चाहो तब कर लिया जाए और जब चाहो तब तोड़ दिया जाए। अभी जितना समय आप लोगों ने एक साथ गुजारा है वह तो एक दूसरे को पहचानने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। आप की पत्नी सोचती हैं कि जिस व्यक्ति से वह विवाह करना चाहती थीं वह तलाक के बाद उन से विवाह कर लेगा। हो सकता है अब वह विवाह से इनकार कर दे। फिर उन के पास क्या मार्ग शेष रहेगा? मेरे विचार में आप दोनों को अपने रिश्ते को समझना चाहिए और उसे मजबूत बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

दि आप तलाक लेना चाहेँ तो वर्तमान में एक तरफा तलाक का कोई आधार आप लोगों के पास नहीं है। यदि दोनों सहमत हों भी तो भी विवाह होने के एक वर्ष की अवधि तक तलाक की अर्जी न्यायालय स्वीकार नहीं करेगा। यदि एक वर्ष प्रतीक्षा करने के बाद आप लोग अर्जी लगाएँ तो भी कम से कम आठ माह और लग जाएंगे तलाक होने में। इस तरह आप के पास लगभग डेढ़ वर्ष का समय अभी साथ रहने के लिए है। यदि इस बीच आप दोनों कोशिश करें और ऐसी स्थिति लाएँ कि तलाक की आवश्यकता नहीं रहे। तो आप लोग इस निर्णय को टाल सकते हैं और अपना जीवन सुखमय बना सकते हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि तलाक के बाद आप दोनों अपने जीवन को सुखी बना सकेंगे। हो सकता है बाद भी ऐसी ही परेशानियाँ आप दोनो को देखनी पड़े। इस से तो अच्छा है कि वर्तमान परेशानी को हल किया जाए।

हिन्दू विधि में सहमति से विवाह विच्छेद

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 विवाह विच्छेद की व्यवस्था भी करता है। लेकिन इस में विवाह के पक्षकारों की सहमति से विवाह विच्छेद की व्यवस्था 1976 तक नहीं थी। मई 1976 में एक संशोधन के माध्यम से इस अधिनियम में धारा 13-ए व धारा 13-बी जोड़ी गईं, तथा धारा 13-बी में सहमति से विवाह विच्छेद की व्यवस्था की गई। 
धारा 13-बी में प्रावधान किया गया है कि यदि पति-पत्नी एक वर्ष या उस से अधिक समय से अलग रह रहे हैं तो वे यह कहते हुए जिला न्यायालय अथवा परिवार न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं कि वे एक वर्ष या उस से अधिक समय से अलग रह रहे है, उन का एक साथ निवास करना असंभव है और उन में सहमति हो गई है कि विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर विवाह को समाप्त कर दिया जाए।
स तरह का आवेदन प्राप्त होने पर न्यायालय आवेदन प्रस्तुत करने की तिथि से छह माह उपरांत और अठारह माह पूरे होने के पूर्व यदि ऐसा आवेदन पक्षकारों द्वारा वापस नहीं ले लिया जाता है तो उस आवेदन की सुनवाई और जाँच के उपरान्त इस बात से संतुष्ट हो जाने पर कि आवेदकों के मध्य विवाह संपन्न हुआ था और पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत आवेदन के कथन सही हैं, डिक्री पारित करते हुए दोनों पक्षकारों के मध्य विवाह को डिक्री की तिथि से समाप्त किए जाने की घोषणा कर देता है। 

सेवा बंध-पत्र की सीमाएँ तय हों

युवनीत सूरी को कंपनी ने 07.12.2003 के पत्र से रेस्टोरेंट जनरल मैनेजर के पद पर नियुक्त किया था। नियुक्ति पत्र की शर्त के अनुसार उसे दिसम्बर 2003 से मार्च 2004 तक रेस्टोरेंट ऑपरेशन की ट्रेनिंग के लिए अमरीका जाना था, जिस का समूचा खर्च कंपनी को भुगतना था। युवनीत को सफलता पूर्वक ट्रेनिंग समाप्त होने की तिथि 19.05.2007 से 18.05.2007 तक तीन वर्ष कंपनी में नौकरी करनी थी, जिस की गारंटी के लिए उस ने 15.12.2003 को एक लिखित अनुबंध किया था, इस अनुबंध को लागू करने की गारंटी राजेश क्वात्रा ने दी थी। अनुबंध में तीन वर्ष तक नौकरी न करने पर क्षतियों के रुप में युवनीत सूरी को 3.5 लाख रुपए कंपनी को अदा करने की शर्त थी। युवनीत ने दिनांक 15.02.2006 को नौकरी छोड़ दी और कंपनी के अनुसार उसने इस की सूचना भी कंपनी को नहीं दी।

इस मामले में 12.11.2003 का कंपनी का एक पत्र प्रस्तुत हुआ जिस में युवनीत को नौकरी के लिये चयन कर लिए जाने और 25,000.00 रुपए जमा करने की की सूचना दी गई थी। जमा की गई यह राशि तीन वर्ष की सेवा पूरी कर लेने पर युवनीत को वापस प्राप्त होनी थी। इसी पत्र में यह भी लिखा था कि यदि कंपनी उसे ट्रेनिंग के लिए अमरीका भेजना तय करती है तो उसे तीन वर्ष तक कंपनी की नौकरी करने की अंडरटेकिंग लिख कर देनी पड़ेगी। दूसरा प्रलेख नियुक्ति पत्र था, जिसमें सेवा बंध-पत्र का कोई उल्लेख नहीं था। 05.12.2003 व 08.12.2003 के दो प्रलेख अमरीकन दूतावास को वीजा दिए जाने हेतु लिखे गए थे, जिस से पता लगता था कि युवनीत सूरी को नियुक्त किये जाने के पहले ही वीजा के लिए कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई थी। अंतिम प्रलेख दिनांक 15.12.2003 का अनुबंध था जिस में पहली बार यह कहा गया था कि निश्चित समय तक नौकरी न करने पर उसे 3.5 लाख रुपए क्षतिपूर्ति के रूप में कंपनी को अदा करने होंगे।

युवनीत व उस के गारंटर ने बचाव के लिए तर्क था कि उस ने नियुक्ति पत्र मिलने पर पिछली नौकरी छोड़ी और 25 हज़ार रुपए कंपनी में जमा कराए। इस के बाद उस से सेवा बंध-पत्र निष्पादित कराने के लिए कंपनी ने ‘अनुचित प्रभाव’ का प्रयोग किया है।

‘अनुचित प्रभाव’ के लिए दो तत्व आवश्यक थे, एक तो पक्षकारों के बीच ऐसा संबंध जिस से एक पक्षकार दूसरे की इच्छा पर हावी हो सके और दूसरा यह कि हावी हो सकने वाले पक्षकार ने इस संबंध का दूसरे से अनुचित लाभ उठाने के लिए प्रयोग किया हो।

न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए प्रलेखों के आधार पर दिल्ली उच्च-न्यायालय ने यह माना कि युवनीत से सेवा बंध-पत्र निष्पादित कराने के लिए अनुचित दबाव का प्रयोग किया हो सकता है, जिसे वह अदालत में सबूत पेश कर साबित कर सकता है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने युवनीत सूरी की बचाव करने की अनुमति देने का आवेदन निरस्त कर गलती की। उच्च-न्यायालय ने उसे बिना शर्त बचाव करने की अनुमति प्रदान कर दी। अब यह मामला साक्ष्य के आधार पर जिला न्यायालय द्वारा तय किया जाना है।

इस तरह हम देखते हैं कि सेवा बंध-पत्र कंट्रेक्ट कानून में वर्णित विभिन्न आधारों पर शून्यकरणीय या शून्य घोषित किया जा सकता है। प्रत्येक मामले में बंध-पत्र की शर्तों और उस के निष्पादन की परिस्थितियों के आधार पर ही यह तय किया जा सकता है कि उस बंध-पत्र की वैधानिक स्थिति क्या होगी। सामान्य रुप से यह नहीं कहा जा सकता कि सभी सेवा बंध-पत्र गैर कानूनी हैं। यदि ऐसा हो जाए तो फिर नियोजक बंध-पत्र निष्पादित कराने की कसरत क्यों करेंगे? और क्यों कराएँगे?

ज्ञानदत्त जी पाण्डे के इस प्रश्न का उत्तर कि “अदालतें इसमें नीर-क्षीर-विवेक करती हैं?” इसी उदाहरण से मिल गया होगा। अदालतों में कोई भी काम तब तक एक-तरफा नहीं होता जब तक कि कोई पक्षकार स्वयं ही अनुपस्थित न हो जाए। दोनों पक्ष अपनी-अपनी साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं और उन के वकील तर्क प्रस्तुत करते हैं। पूरी विवेचना के उपरांत ही न्यायालय निर्णय देते हैं। फिर कोई त्रुटि रह भी जाए तो अपील, पुनरीक्षण आदि के प्रावधान हैं। हाँ, दावे में किए गए कथनों, प्रलेख प्रस्तुत करने, साक्ष्य प्रस्तुत करने में कोई गलती हो जाए तो उसे तो पक्षकार को ही भुगतना पड़ेगा। अदालतों से जो बड़ी शिकायत है वह मामलों में शीघ्र निर्णय नहीं होने की है। उस का कारण तो “तीसरा खंबा” अनेक बार आप के सामने रख चुका है कि अदालतें जरूरत की 20% से भी कम हैं। उस का इलाज तो सरकारें ही कर सकती हैं। उस पर दबाव बनाने के लिए सशक्त जनांदोलन की जरूरत देश को है।

ज्ञानदत्त जी का आज का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस प्रकार के सभी काण्ट्रेक्ट एक तरफा होते हैं। लोन लेने वाले के पास चारा क्या है? इस प्रकार के करार का कोई स्टेण्डर्ड प्रकार होना चाहिये, सरकार के विधि विभाग से सम्मत। कुछ उसी प्रकार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उपभोक्ता का हित देखने के लिये अथारिटी हैं”

वास्तविकता यह है कि जब किसी समझोते में दोनों पक्ष बराबर के न हों वहाँ मजबूत-पक्ष मजबूर-पक्ष का लाभ उठाता है। हमारे देश में बेरोजगारी जिस सीमा की है, उस से नियोजक हमेशा ही इस स्थिति में रहते हैं कि वे रोजगार के आकांक्षियों का अनुचित लाभ उठाते हैं। अब यह तो संभव नहीं दिखाई देता कि बेरोजगारी का प्रतिशत एक दम इतना कम किया जा सके कि रोजगार आकांक्षी अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग कर सकें। इस लिए जब तक स्वतंत्र इच्छा के प्रयोग की आदर्श स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती तब तक सरकार को चाहिए कि वह कानून बना कर सीमाएं तय करे। जैसे नियोजक एक वर्ष से अधिक नौकरी करने के लिए बाध्यकारी अनुबंध नहीं कर सके, क्षतिपूर्ति की राशि की अधिकतम सीमा भी निश्चित की जा सकती हैं।

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