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वीडियोग्राफ महत्वपूर्ण साक्ष्य

rp_rapevictim.jpgसमस्या-

किशन ने सिरसा, हरियाणा से पूछा है-

क्या एक वीडियोग्राफ किसी रिश्वत के मुकदमे में एक अधिकारिक रिकॉर्ड है?

समाधान-

क वीडियोग्राफ एक इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड है और इसे एक सबूत के रूप में साक्ष्य अधिनियम द्वारा मान्यता दी गयी है। इस कारण न केवल रिश्वत के मुकदमे में अपितु सभी अपराधिक मामलों में और दीवानी मामलों में भी कोई वीडियोग्राफ तथा अन्य कोई भी इलेक्ट्रानिक रिकार्ड एक दस्तावेज के रूप में ग्रहण किए जाने वाला दस्तावेजी सबूत है।

लेकिन आप को यह भी जान लेना चाहिए कि कोई भी रिकार्ड केवल मात्र एक सबूत है। उसे पहले साबित करना पड़ेगा कि किस इन्स्ट्रूमेंट द्वारा किस तरह और किस ने उसे रिकार्ड किया है, उस का समय क्या है आदि आदि। यह सब साबित करने के लिए विभिन्न साक्षियों के बयान भी कराने होंगे। एक मात्र सबूत से कभी अपराध साबित नहीं होता है। अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है और इस के लिए सभी जरूरी साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है। 

इस लिए यह कहा जा सकता है कि वीडियोग्राफ एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है लेकिन किसी भी मामले को अकेले इस साक्ष्य से साबित नहीं किया जा सकता।

स्वयं को अपने वास्तविक पिता की पुत्री कैसे प्रमाणित करें?

rp_law-suit.jpgसमस्या-

रेनू ने जालोर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम रेनू है। मेरे पिताजी का स्वर्गवास मेरी 5 दिन की आयु में हो गया था। मैं उनकी इकलौती संतान हूँ। मेरी माँ मन्जू देवी मेरे साथ 7 वर्ष तक साथ रही बाद में उन्होंने मुझे ननिहाल छोड़कर नाता विवाह कर लिया। मेरी पढ़ाई कक्षा दूसरी तक मेरे पैतृक शहर ब्यावर में हुई थी। मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी ने मेरे स्कूल में दाखिला करवाते समय मेरे पिताजी ओम प्रकाश जी के स्थान पर खुद का नाम मदन लाल लिखवा दिया था। कक्षा 3 से 10 तक पढ़ाई मेरे ननिहाल सोजत सिटी में हुई। मेरे नानाजी ने कक्षा 10 बोर्ड के फॉर्म में मेरे वास्तविक पिताजी ओम प्रकाश जी का नाम लिखवाने के लिए मेरी माँ मन्जू देवी से उस समय शपथ पत्र भी लिखवाया। परन्तु स्कूल हेडमास्टर ने मेरे बड़े पिताजी मदन लाल जी से पिताजी के नाम परिवर्तन के लिए शपथ पत्र लिखवाने के लिए कहा, तब मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी ने शपथ देने से इनकार कर लिया। इस तरह मेरे वास्तविक पिताजी का नाम ओम प्रकाश मेरे शैक्षणिक दस्तावेजो में कहीं इन्द्राज नहीं हुआ। मैं कक्षा 11 व् 12 मेरे पैतृक शहर ब्यावर में मेरे दादाजी व् दादाजी के पास पढ़ी। मेरी शादी 1997 मेरे दादाजी और दादीजी ने मेरे पैतृक मकान ब्यावर में ही करवाई। मेरे विवाह कार्ड मेरे पिताजी का नाम ओम प्रकाश जी लिखवाया। मुझे 5 दिसम्बर 2009 को जानकारी मिली कि मेरे बड़े पिताजी ने मेरी पैतृक जायदाद बेचने का सौदा कर रहे है। उपरोक्त जायदाद के मालिक मेरे पिताजी के दादाजी हैं। कभी कानूनन बँटवारा भी नही हुआ है। मैं ने मेरे बड़े पिताजी स्व. मदनलाल जी की पत्नी यानि मेरी बड़ी माँ से व्यक्तिगत सम्पर्क कर उन से मेरे पिताजी के हिस्से की रकम की मांग रखी। तो उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया। तब मैं ने उक्त जायदाद पर मेरे अधिकार की आम सूचना 16 दिसम्बर 2009 को समाचार पत्र में प्रकाशित करवाई। 21 दिसम्बर 2009 को सिविल न्यायालय में बेचान पर रोक और परिवार की सदस्या होने की वजह से जायदाद को प्रथम खरीदने का अवसर मुझे मिले इस का वाद दायर किया। जिस के समन का जवाब मेरे बड़े पिताजी के परिवार ने 22 दिसम्बर 2009 को कोर्ट में दिया कि वो मुझे नहीं जानते हैं और मेरी पुश्तैनी जायदाद को मेरे परिवार वालों ने 30 दिसम्बर 2009 को ब्यावर के पास मसूदा जाकर रजिस्टर्ड बेचान कर लिया। मैं ने कोर्ट में मेरे स्व पिताजी ओम प्रकाशजी की हिस्से की अधिकारी बताते हुए वाद दायर किया। मेरे परिवार ने मेरे शैक्षणिक दस्तावेजो में मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी पुत्री लिखा है बताकर मुझे ओम प्रकाश जी की पुत्री होने का सबूत मांग रहे है। मेरे दादाजी दादीजी का स्वर्गवास हो चुका है। बाकी पूरा परिवार मेरे से विरोध में है। सम्पति पर कोर्ट आगे बेचान व् यथास्थिति का स्टे लग चुका है। स्टे की अपील भी ख़ारिज हो चुकी है। मैं ने स्टे के बाद कोर्ट में जायदाद की रजिस्ट्री की पूरी राशि की कोर्ट फीस जमा करवाकर हक शफा (परिवार की सदस्या होने के नाते पूरी जायदाद को खरीदने का) का वाद दायर किया। मेरी समस्या यह है कि मैं मुझे मेरे वास्तविक पिताजी ओम प्रकाश जी की पुत्री कोर्ट में कैसे साबित करूँ। मेरे नानाजी और मेरी वास्तविक माँ मन्जू देवी जीवित है और उनसे मेरे सम्बन्ध अच्छे है। मेरे स्व पिताजी का पूरा परिवार मेरे विरुद्ध है।

समाधान

में लगता है कि आप ने जो हक शफा का वाद प्रस्तुत किया है उस की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी यदि आपने वाद किया है तो उसे अन्तिम स्तर तक लड़ना चाहिए।

प को अपने आप को अपने पिता ओम प्रकाश जी की पुत्री साबित करने के लिए अपनी माता जी को ला कर न्यायालय में बयान कराना होगा। एक बार माता जी से मिल लेंगी तो हो सकता है आप का जन्म प्रमाण पत्र या फिर जिस अस्पताल में आप का जन्म हुआ हो उस का रिकार्ड भी मिल जाए। आप उस रिकार्ड के आधार पर अपने को ओम प्रकाश जी की पुत्री साबित कर सकती हैं।

प ने अपनी समस्या में यह उल्लेख किया है कि आप ने अपने पिता का नाम अपने शैक्षणिक रिकार्ड में दर्ज कराने के लिए अपनी माता जी का शपथ पत्र प्राप्त किया था। यदि वह वजूद में हो तो वह भी एक अच्छा दस्तावेजी साक्ष्य हो सकता है। जिन प्रधानाध्यापक जी ने मदन लाल जी का शपथ पत्र प्रस्तुत करने को कहा था उन का बयान भी इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकता है।

स के अलावा परिवार के मित्रों या रिश्तेदारों में कोई व्यक्ति हो सकता है जो आप के ओम प्रकाश जी की पुत्री होने की हकीकत से परिचित हो। आप ऐसे व्यक्ति का बयान करवा सकती हैं। यदि आप का जन्म अस्पताल में हुआ है और अस्पताल का रिकार्ड नहीं मिलता है तो आप के जन्म समय की डाक्टर या नर्स का बयान भी महत्वपूर्ण है। यदि आप का जन्म अस्पताल में न हो कर घऱ पर हुआ हो जिस दाई ने आप की माताजी का प्रसव कराया है उस का बयान अति महत्वपूर्ण है। जन्म के समय होने वाले औपचारिक समारोह जैसे सूरज पूजन आदि में उपस्थित महिलाओं, पुरुषों, नाइन और ढोली आदि का बयान भी महत्वपूर्ण हैं।

न सब साक्ष्यों पर डीएनए का साक्ष्य सब से बड़ा है। आप की वास्तविक माताजी उपलब्ध हैं आप उन का तथा अपना डीएनए टेस्ट करवा सकती हैं तथा आप की माताजी व डीएनए टेस्ट करने वाले विशेषज्ञ का बयान डीएनए रिपोर्ट प्रस्तुत कर उसे प्रदर्शित करवाने के साथ करवा सकती हैं। यह साक्ष्य सारे साक्ष्य पर भारी पड़ेगा।

म ने आप के लिए साक्ष्य के इतन स्रोत बता दिए हैं इन में से कोई दो-तीन स्रोतों से भी आप साक्ष्य ले आएंगी तो आप का मकसद पूरा हो जाएगा।

आधार कार्ड और अंक तालिका में अंकित तिथियाँ जन्मतिथि का पुख्ता प्रमाण नहीं?

lawसमस्या-

मनीष शर्मा ने ब्यावरा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे लड़के ने एक लड़की से आर्य समाज मंदिर में प्रेम विवाह किया है। जो आधार कार्ड व मेडिकल परीक्षण के बाद संपन्न हो गया है। विवाह का आर्य समाज के वैदिक पंडित द्वारा विवाह प्रमाण पत्र भी दिया जा चुका है। समस्या यह है कि लड़की कि मार्कशीट के अनुसार लड़की के बालिग होने में 4 माह शेष हैं और आधार कार्ड में 19 वर्ष की आयु है तो श्रीमान यह शादी कानूनन वैध है या नहीं अगर नहीं तो क्यों? और है तो अब क्या उपबंध हैं?

समाधान-

विवाह आर्य समाज पद्धति से संपन्न हुआ है और वैदिक पंडित ने उस का प्रमाण पत्र दिया है। यदि विवाह का हिन्दू विधि से संपन्न होना साबित है तो यह विवाह वैध है। लड़की के नाबालिग होने के बावजूद भी वैध है। कोई भी विवाह उस के एक पक्षकार के विवाह योग्य उम्र से कम उम्र का होने पर भी वह अवैध नहीं होता।

लेकिन यदि विवाह का कोई भी पक्षकार विवाह की तिथि को विवाह योग्य उम्र से कम उम्र का हो तो वह विवाह योग्य उम्र का होने से दो वर्ष की अवधि में अपने विवाह को अकृत घोषित करने के लिए न्यायालय को आवेदन कर सकता है और यदि न्यायालय यह पाता है कि आवेदक विवाह की तिथि को विवाह योग्य आयु से कम का था तो उस विवाह को अकृत घोषित कर सकता है। आवेदक लड़की होने की स्थिति में विवाह अकृत होने की स्थिति में उस का फिर से विवाह होने तक भरण पोषण का खर्चा पति से दिलाया जा सकता है।

प के मामले में आधार कार्ड कोई पक्का सबूत नहीं है और न हो सकता है। इसी प्रकार मार्क्सशीट में अंकित जन्म दिनांक भी जन्मतिथि का कोई मजबूत साक्ष्य नहीं हो सकता। मेडीकल प्रमाण पत्र यदि पर्याप्त जाँच जैसे ओसिफिकेशन टेस्ट आदि कर के दिया हो तो आयु का अच्छा प्रमाण है। उस के आधार पर यह प्रमाणित माना जा सकता है कि लड़की विवाह के समय विवाह योग्य उम्र की थी और विवाह में कोई कानूनी बाधा नहीं थी।

दि लड़की को विवाह योग्य उम्र की और बालिग नहीं माना जाता है तो लड़के और विवाह कराने वालों के विरुद्ध बाल विवाह कराने के अपराध का आरोप लगाया जा कर उन्हें दंडित किया जा सकता है। इस के अलावा लड़के पर अपहरण और बलात्कार का आरोप भी लगाया जा सकता है। विवाह में सम्मिलित अन्य लोगों को भी इस मामले में अभियुक्त बनाया जा सकता है। वैसे इस तरह के मामलों में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय अग्रिम जमानत की अर्जियाँ स्वीकार कर विवाह करने वाले पुरुष को जमानत का लाभ दे चुका है।

 

विपरीत बयानों की प्रतिलिपियाँ ले कर दूसरे मुकदमों में प्रस्तुत करें

समस्या-
भरतपुर, राजस्थान से रामेश्वर ने पूछा है-

मैं पिछले लेख में अपने विवाद की पूरी बात बता चुका हूँ। मैं यह जानना चाहता हूँ कि 498अ व भरण-पोषण के दोनों केसो में मेरे खिलाफ विपक्षी पक्षकार द्वारा अलग अलग बयान दर्ज कराये हैं। क्या इस स्थिति में भरण-पोषण देना होगा?

divorcebfसमाधान-

प ने पहले कब विवाद का विवरण दिया था, उसे तलाश करना असंभव है। इस कारण जब भी समस्या हमें भेजें तब उस का पूरा विवरण एक साथ हमें भेजें। आप के दोनों मुकदमों में विपक्षी द्वारा भिन्न भिन्न बयान दिए गए हैं उस से अधिक प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है। आप ने यह नहीं बताया है कि दोनों बयानों में अलग अलग क्या है? क्या दोनों में एक दूसरे के विरुद्ध बातें कही गई हैं। यदि ऐसा है तो आप को उस का थोड़ा बहुत लाभ मिल सकता है। इस के लिए भी आप को दोनों प्रकरणों से बयानों की प्रमाणित प्रतियाँ ले कर एक दूसरे मुकदमों में प्रस्तुत करनी होंगी। अधिक अच्छा हो कि आप न्यायालयों में आवेदन के साथ ये प्रमाणित प्रतियाँ प्रस्तुत करें कि दोनों बयानों में अलग अलग बातें कही गई हैं इस कारण विपक्षी का दुबारा प्रतिपरीक्षण करना अनिवार्य हो गया। उसे रिकाल किया जाए। यदि न्यायालय विपक्षी को बुला कर प्रतिपरीक्षण करने की अनुमति देता है तो आप को उस से पुनः प्रतिपरीक्षण कर के पूछना चाहिए कि दोनों बयानों में उस ने अलग अलग बातें क्यों कही हैं? तब आप साबित कर सकते हैं कि विपक्षी मिथ्या बयान दे रही है।

र मुकदमे में उस में हुए बयानों पर ही निर्णय निर्भर करेगा। इस कारण आप को दोनों मुकदमों में बहुत सावधानी के और पूरी तैयारी के साथ पैरवी करानी चाहिए।

फोन रिकार्डिंग साक्ष्य है

phone recording apsसमस्या-
आर के ने भरतपुर राजस्थान से पूछा है-

मेरी शादी जून २०११ को हुई थी। शादी के कुछ दिनों बाद ही मेरी पत्नी ने मुझसे झगड़ा करना शुरू कर दिया था। जब मैं ने झगड़े का कारण जानने कि कोशिश की तो मुझे मेरी पत्नी के जीजा से बातचीत (दोनों का आपस में) करने का सिलसिला मिला।  जब मेरी पत्नी को पता चला कि मैं उस की प्रेम कहानी के बारे में जान चुका हूँ तो फिर मुझसे लड़ना-झगड़ना और ज्यादा शुरू कर दिया। मैं ने दोनों के बीच किस प्रकार का रिश्ता है यह जानने के लिए मोबाइल में रिकॉर्डिंग का सॉफ्टवेयर डलवाकर दे दिया। जब मैं ने दोनों कि रिकॉर्डिंग सुनी तो मेरी पत्नी का जीजा मेरी पत्नी को अपनी पत्नी होने का दावा कर रहा था कि- बता कि तू मेरी लुगाई है कि नहीं? तो मेरी पत्नी बोली- हाँ हूँ। इस प्रकार कि और भी बातें रेकोडिंग में है। शादी को लगभग १ १/२ वर्ष हो गया, उस के बाद मैं ने तलाक कि अर्जी कोर्ट मे लगा दी। मेरी अर्जी लगाने के बाद मेरी पत्नी ने मुझ पर दहेज़ व घरेलू हिंसा व साथ ही भरण पोषण का दावा कर दिया है। मैं यह जानकारी चाहता हूँ कि जो मेरे पास रिकॉर्डिंग है क्या वह सबूत के तौर पर माना जायेगा या नहीं और मुझे तलाक मिल सकता है या नहीं। और पत्नी के द्वारा दर्ज कराये गए तीन केसो के बारे में क्या होगा, क्या मुझे भरण-पोषण का खर्च देना पड़ेगा?

समाधान-

फोन रिकार्रडिंग एक सबूत है और यह साबित कर दिया जाए कि उस में जो आवाजें हैं वह आप की पत्नी और उस के जीजा की हैं तो तथ्य प्रमाणित किए जा सकते हैं। यदि रिकार्डिंग में पर्याप्त सबूत इस बात के हैं कि विवाह के बाद भी आप की पत्नी ने आप के सिवा किसी दूसरे पुरुष से यौन संबंध बनाए हैं तो आप को तलाक मिल जाएगा।

रेलू हिंसा, दहेज व भरण पोषण के मामले उन प्रकरणों में निर्णय आप की पत्नी के द्वारा प्रस्तुत तथ्यों और आप के द्वारा प्रस्तुत प्रतिवाद के तथ्यों के प्रमाणित होने न होने पर निर्भर करेंगे। भरण पोषण के मामले में कहा जा सकता है कि आप को भरण पोषण तब तक तो देना ही होगा जब तक आप का तलाक नही हो जाता है। उस के बाद भी तब तक देना पड़ सकता है जब तक कि आप की पत्नी दूसरा विवाह नहीं कर लेती है, या खुद नहीं कमाने लगती है।

फोन रिकॉर्डिंग में अमानत लौटाने से इन्कार करना मजबूत सबूत है।

Desertedसमस्या-
पटना, बिहार से प्रिया ने पूछा है-

मेरी शादी के दो साल हो चुके हैं। शादी के पश्चात मैं 6 महीनों तक अपने सास-ससुर के साथ रही जबकि मेरे पति काम के सिलसिले में दूसरे शहर में निवास करते थे। शादी के तीन महीने बाद ही मेरी सास मुझसे महंगे घरेलू सामानों के लिए एक लाख रुपयों की माँग करने लगीं, उनकी इच्छा थी कि मैं अपने पिताजी पर दबाव डालकर ये पैसे दिलवाऊँ। पर मैंने ऐसा नहीं किया। 6 माह के बाद जब मैं पति के साथ रहने गई तब भी उनकी माँग पूर्ववत जारी रही। मैंने यथासंभव अपने पति से इस संदर्भ में आपत्ति भी की पर उसका कुछ असर नहीं हुआ। अंततः जब मेरे पति भी मुझसे पैसों की माँग करने लगे तो मैंने परेशान हो कर वह घर छोड़ दिया और दूसरे शहर में अपने माता पिता के घर में आ कर रहने लगी। अब मैं पिछले एक साल से पति से अलग रह कर यहीं पर नौकरी कर रही हूँ। मेरी समस्या है कि मुझे शादी और अन्य अवसरों पर दिये गये गहने एवं मेरे पिताजी के द्वारा मुझे दिए गए पाँच लाख रुपये नगद मेरी सास के पास हैं। कई बार फोन पर यह बात उठाने पर मेरे पति मेरी यह संपत्ति मुझे देने से साफ मना कर चुके हैं। मेरे पास इन काल्स की रिकॉर्डिंग सेव है। अब मैं चाहती हूँ कि धारा 406 के तहत उन पर मुकदमा करूँ। कृपया मुझे यह बताएँ कि सुनवाई के दौरान अगर वो यह आरोप लगाते हैं कि सारे गहने अपने साथ ले गई हूँ तो मुझे यह प्रमाणित करने के लिए क्या करना पड़ेगा कि गहने-पैसे उनके ही पास हैं? यदि गहने उन्होंने किसी रिश्तेदार के यहाँ रख दिये हों तो क्या इससे मेरा केस कमजोर हो जायेगा? मेरे पास गहनों की लिस्ट मौजूद है जो मैंने शादी के कुछ समय बाद बनाई थी। मेरी एक अन्य समस्या है कि मेरे पति पूर्ण सहयोग के बावजूद शारीरिक संबंध बना पाने में असफल रहे हैं, सामाजिक तथा धार्मिक कारणों से मैं तलाक नहीं लेना चाहती, क्या इन परिस्थितियों में मैं न्यायिक पृथक्करण Judicial Separation के लिए अर्जी दे सकती हूँ? क्या इसके लिए मुझे अदालत में उनकी नपुंसकता साबित करनी होगी, क्योंकि मुझे संदेह है कि थोड़ा -बहुत सामर्थ्य उनमें हो सकता है पर उनकी मेरे साथ यौन संबंध कायम करने में दिलचस्पी नहीं है। हालाँकि मेरे पूछने पर वह इससे इनकार करते थे परंतु मेरे लाख प्रोत्साहन पर भी डॉक्टर से दिखाने को कभी तैयार नहीं हुए। कृपया मेरी एक और शंका का समाधान करें।  मेरे सास-ससुर दोनों की आय मिलाकर 30 हजार प्रतिमाह से ज्यादा है और उन्हें अन्य कोई पुत्र नहीं है। मेरी मासिक आय 24 हजार रुपये है। मेरे पति की नौकरी अस्थायी है, ऐसे में यदि वह न्यायिक पृथक्करण अथवा तलाक की सुनवाई के दौरान अपनी नौकरी छोड़कर मुझसे गुजारा भत्ता की माँग करें तो क्या मुझे देना पड़ेगा?

समाधान-

प ने अपनी परिस्थितियों में अपने पिता के साथ आ कर रहने और नौकरी कर के उचित ही निर्णय लिया है। आप की समस्या यह है कि आप का स्त्री-धन अर्थात आप को विवाह और उस के उपरान्त अपने माता-पिता और अन्य लोगों से उपहार में प्राप्त संपत्ति व धन आप के सास-ससुर के पास रह गया है। आप उस की मांग भी कर चुकी हैं, जिसे देने से उन्हों ने इन्कार कर दिया है जिस की मूल रिकार्डिंग भी आप के पास उपलब्ध है। इस रिकार्डिंग में उस संपत्ति का उल्लेख किया गया होगा जो आप की आप के ससुराल में है और जिसे आप वापस चाहती हैं। यदि ऐसा है तो यह मूल रिकार्डिंग इस तथ्य का अच्छा सबूत है कि आप का क्या स्त्री-धन उन के पास है जिसे वे नहीं लौटा रहे हैं। यदि मूल रिकार्डिंग सुरक्षित न भी हो तो कोई भी कार्यवाही करने के पहले आप पुनः फोन पर बात कर के फिर से रिकार्डिंग करने का अवसर आप के पास है। फोन की रिकार्डिंग में आप के पति या उन के माता-पिता द्वारा आप का स्त्री-धन जो उन के पास आप की अमानत है लौटाने से इन्कार करना स्वयं में एक मजबूत सबूत है।

स के अलावा यदि आप यह साबित कर देती हैं कि आप का स्त्री-धन उन के पास था और वे यह कहते हैं कि आप उसे वापस ले आई हैं तो आप के द्वारा अपना स्त्री-धन का वापस लाना उन्हें साबित करना होगा, आप को नहीं। फिर भी धारा 406 भा.दं.संहिता का मामला एक अपराधिक मामला है। इस में जितना स्त्री-धन पुलिस उन के यहाँ से बरामद कर लेगी उतना आप को न्यायालय से मिल जाएगा तथा आप के पति व अन्य लोगों को दंडित किया जा सकता है। लेकिन जो धन बरामद नहीं होगा वह नहीं दिलाया जा सकता। शेष धन प्राप्त करने के लिए तो आप को उन के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा।

प के सास ससुर द्वारा आप से निरन्तर धन की मांग की गई और पति द्वारा भी की गई। इस धन की मांग करने में आप के सास-ससुर और पति द्वारा यदि किसी तरह मानसिक या शारीरिक क्रूरता की है तो आप के पति और उन के माता-पिता के विरुद्ध धारा 498-ए भा.दं.संहिता का मामला भी बनता है। इस तरह आप धारा 406 तथा 498-ए भा.दं.संहिता का मामला दर्ज करवा सकती हैं।

फिलहाल आप अपने माता पिता के साथ निवास कर रही हैं और नौकरी भी करती हैं। आप की इच्छा के विरुद्ध आप को अपने साथ रखने को कोई बाध्य नहीं कर सकता तथा आप के पास साथ रहने से इन्कार करने का कारण भी है। इस स्थिति में न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त करने का कोई लाभ नहीं है। इस डिक्री का एक लाभ तो यह है कि आप डिक्री प्राप्त करने के बाद अपने पति के साथ सहवास का दायित्व निभाने के लिए बाध्य नहीं की जा सकतीं। दूसरे एक वर्ष के बाद आप इके आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती हैं कि न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के बाद एक वर्ष तक दोनों के बीच सहवास नहीं हुआ है। लेकिन न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त करे के लिए फिलहाल आप के पास कोई आधार दिखाई नहीं देता अलावा इस के कि आप यह आधार लें कि विवाह के बाद पति की नपुंसकता के कारण आप दोनों के बीच कोई सहवास नहीं हुआ है। फिलहाल आप का विवाह विच्छेद का कोई इरादा नहीं है। ऐसी स्थिति में न्यायिक पृथक्करण की डिक्री का आप के लिए कोई विशेष लाभ प्रतीत नहीं होता है।

हाँ तक आप से आप के पति द्वारा खर्चा मांगे जाने का प्रश्न है तो वे अभी नौकरी कर रहे हैं तब तक तो इस बात की कोई संभावना नहीं है। अभी कुछ मामले ऐसे आए हैं जिन में उच्च न्यायालय ने यह कहा है कि यदि यह साबित हो जाता है कि पत्नी कमाने में सक्षम है तो यदि वह कमा नहीं रही है तब भी उसे भरण पोषण नहीं मांगा जा सकता। इन निर्णयों की रोशनी में आप से भरण पोषण मांगे जाने की कोई संभावना दिखाई नहीं पड़ती।

एक ही घटना के संबंध में पत्नी के दो तरह के बयानों की प्रतियाँ प्राप्त कर उन्हें साक्ष्य में प्रमाणित कराएँ।

courtroomसमस्या-

ब्यावर, राजस्थान से दिनेश कुर्ड़िया ने पूछा है –

मेरी पत्नी ने मुझ पर झूठा 498-ए का मुकदमा दर्ज कराया तब उस ने अलग घटना बताई, तथा  मेरे द्वारा जब मेरी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया तो मेरी पत्नी ने उसी समय की अलग घटना बताई। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

हली घटना जिस पर आप की पत्नी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई है, उस की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ आप प्राप्त कर सकते हैं। आप की पत्नी ने दूसरा बयान कहाँ दिया है इस का उल्लेख आपने नहीं किया है। हो सकता है वह उस ने आप के द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे के जवाब के रूप में न्यायालय में प्रस्तुत किया हो। आप को दोनों ही बयानों की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर सभी मुकदमों की पत्रावलियो में प्रस्तुत कराएँ जिस से आप की पत्नी के दोनों तरह के बयान हर पत्रावली में रेकार्ड पर आ जाएँ। इस से यह पता लगेगा कि आप की पत्नी दो तरह के बयान दे रही है।

ब उन मुकदमों में आप की पत्नी के बयान हों तो उस से जिरह के दौरान इन दोनों बयानों को प्रदर्शित करवाते हुए इन की सत्यता के बारे में प्रश्न करने होंगे जिस से आप की पत्नी का मिथ्यापन न्यायालय के समक्ष साबित हो जाए।

दि 498-ए का मुकदमा मिथ्या साबित हो जाता है तो यह क्रूरता की श्रेणी में आएगा और इस आधार पर आप को विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।

वकील को तथ्य बताने, साक्ष्य तथा सबूत जुटाने में गंभीरता बरतें, इन की कमी से एक अच्छा वकील भी मुकदमा हार सकता है।

समस्या-

मुजफ्फरपुर, बिहार से रामनारायण कुमार ने पूछा है-

क लड़की शादी के बाद अपने ससुराल से झगड़ा करके मायके चली आई। मायके में आने के समय उसे तीन माह का गर्भ था।  मायके में उसने एक लड़के को जन्म दिया। लड़के वाले ने लड़की को अपने ससुराल चलने को कहा तो उस ने जाने से इनकार कर दिया। लड़का पक्ष समाज को विदा करने के लिए निवेदन किया।  लड़की पक्ष ने समाज का भी कहना नहीं माना।  तब हार कर लड़का पक्ष ने फॅमिली कोर्ट में आवेदन दिया।  लड़की पक्ष ने दहेज प्रताड़ना का झूठा केस लड़का पक्ष पर कोर्ट में कर दिया है।  इस में लड़का पक्ष को क्या करना चाहिए?  लड़का पक्ष लड़की एवम् उस बच्चे को मान सम्मान के साथ रखना चाहता है।

समाधान-

Lawyers in courtप ने अपनी समस्या में यह नहीं बताया कि लड़का पक्ष ने फैमिली कोर्ट में आवेदन किस संबंध में दिया है, विवाह विच्छेद के लिए अथवा दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना (पत्नी को ससुराल लाने) के लिए? खैर¡

ड़का पक्ष को अपना मुकदमा पूरी तैयारी के साथ लड़ना चाहिए। गवाह सबूत प्रस्तुत करने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिए। उसी तरह उस के व उस के परिवार के विरुद्ध दहेज प्रताड़ना का जो झूठा मुकदमा किया गया है उस में भी अच्छा वकील कर के मजबूती से प्रतिरक्षा करना चाहिए। यदि लड़का पक्ष सही और सच्चा है तो उस का आवेदन भी न्यायालय मंजूर करेगा और उन के विरुद्ध जो मिथ्या मुकदमें बनाए गये हैं वे भी खारिज हो जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता है तो आगे अपील भी की जा सकती है।

क्सर इस तरह के मामलों में कभी यदि सचाई हारती है तो वह केवल इस कारण से न्यायालय में अपने पक्ष के गवाह सबूत ठीक से प्रस्तुत नहीं किए जाते और प्रतिरक्षा सही तरीके से नहीं होती। इस कारण से यह जरूरी है कि लड़का पक्ष का वकील अच्छा हो, मुकदमे को समय देने वाला हो। वकील को तथ्य और साक्ष्य हमेशा पक्षकार ही ला कर देते हैं। यदि स्वयं पक्षकार सबूत जुटाने और तथ्यों को अपने वकील को बताने में कोई कमी रखता है तो एक अच्छा वकील होने पर भी मुकदमे में हार का सामना करना पड़ सकता है। इस लिए मुकदमा करने के बाद सबूत और साक्ष्य जुटाने में तथा तथ्यों को बताने में पक्षकारों को पूरी गंभीरता बरतनी चाहिए।

एक तरफा निर्णय व डिक्री साक्ष्य के आधार पर मामला साबित कर देने पर ही प्रदान किए जा सकते हैं।

समस्या-

सिरोही, राजस्थान से मांगीलाल चौहान ने पूछा है-

मेरी पत्नी और मेरे बीच मे एक साल से किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं है।  क्यों कि वह शुरू से संदिग्ध चरित्र की है।  फिर भी मैं ने उसको अपनाया।  लेकिन अब मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ।  इसलिए मैं ने कोर्ट में तलाक़ के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया है।  जिसकी 16-02-2013 को पेशी है।  इस कार्यवाही का नोटिस मेरी पत्नी को मिल चुका है।  लेकिन वह कोर्ट मे पेशी के लिए आने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या एक तरफ़ा फ़ैसला सुनाया जा सकता है? या नही?

समाधान-

justiceकिसी भी मामले में यदि प्रतिवादी / प्रतिपक्षी को न्यायालय का समन / नोटिस प्राप्त हो गया हो और वह पक्षकार न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो न्यायालय सब से पहले इस बात की जाँच कर के संतुष्ट होता है कि क्या उस पक्षकार को समन / नोटिस उचित और विधिपूर्ण रीति से तामील हो गया है अथवा नहीं।  न्यायालय के संतुष्ट होने पर कि पक्षकार को समन / नोटिस उचित और विधिपूर्ण रीति से तामील हो चुका है तो वह मुकदमे की पत्रावली पर आदेश देता है कि उस पक्षकार के विरुद्ध मुकदमे की एक तरफा सुनवाई की जाए।

स आदेश के उपरान्त वादी / प्रार्थी को अपने दावे /आवेदन के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया जाएगा।  वादी / प्रार्थी द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत कर देने के उपरान्त न्यायालय वादी / प्रार्थी के तर्क सुनेगा और तय करेगा कि क्या वादी / प्रार्थी की साक्ष्य से उस का मामला साबित हुआ है अथवा नहीं।  न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वादी / प्रार्थी ने उस के द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से उस का मामला साबित कर दिया है तो फिर वादी / प्रार्थी को उस के द्वारा चाहा गया निर्णय और डिक्री प्रदान कर दी जाएगी।

न्यायालय द्वारा किसी पक्षकार के विरुद्ध एक तरफा सुनवाई का आदेश दे देने के उपरान्त निर्ण्य होने तक किसी भी समय वह पक्षकार जिस के विरुद्ध ऐसा आदेश दिया गया है आवेदन प्रस्तुत कर एक तरफा सुनवाई के आदेश को निरस्त कर उसे सुनवाई का अवसर प्रदान करने के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकता है।  आम तौर पर इस तरह के प्रार्थना पत्र निर्धारित अवधि में प्रस्तुत होने पर तथा उचित कारण होने पर स्वीकार कर लिये जाते हैं।  यह वादी / प्रार्थी के लिए भी उचित है क्यों कि एक तरफा निर्णय या डिक्री को इस आधार पर कि उसे समन /नोटिस की तामील नहीं हुई थी तथा उसे मामले का ज्ञान  नहीं था चुनौती दी जा सकती है तथा उसे निरस्त कराया जा सकता है।

प के मामले में आप की साक्ष्य से आप के आवेदन के तथ्य आप की साक्ष्य से साबित हो जाने पर विवाह विच्छेद की एक तरफा डिक्री आप को प्राप्त हो सकती है तथा।  डिक्री की अपील या उसे अपास्त किए जाने का आवेदन निर्धारित अवधि में प्रस्तुत नहीं होने पर वह अंतिम हो सकती है।

इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार साबित की जा सकती है

समस्या-

क लड़की द्वारा मुझ पर अपहरण और बलात्कार का मुक़दमा किया गया।  प्रकरण का न्यायालय में विचारण चल रहा है।  वह लड़की मुझ से जैल में मिलने जाती थी और मेरे साथ मोबाइल पर बात भी करती थी जिसे मैंने रेकॉर्ड कर लिया है और उसकी सीडी बनवा ली।  अभी न्यायालय में लड़की के बयान में उस से जिरह चल रही है।  जिरह में उस ने कहा कि वह  जैल मे मुझ से मिलने नहीं जाती थी और मोबाइल पर बात भी नहीं करती थी।  मेरे वकील ने जज के सामने निवेदन किया कि जैल से मुझ से मिलने वालों का रिकार्ड मँगवाया जाए तो जज  ने कहा कि मुझे न्यायिक दृष्टान्त (रूलिंग) दीजिए की जिरह के दौरान ऐसे दस्तावेज मंगाए  जा सकते हैं।   मेरे वकील ने रूलिंग दी है लेकिन उस में केवल अंगूठे का निशान और हस्ताक्षर के बारे में उल्लेख है।  वॉयस रेकॉर्डिंग के बारे में उल्लेख नही है।  कृपया ये बताएँ कि साक्ष्य अधिनियम या किस अन्य अधिनियम के तहत वॉयस रिकॉर्डिंग को कोर्ट में रखा जा सकता है। यदि वह लड़की अपनी आवाज़ से मुकर जाती है तो उसका परीक्षण करने का क्या नियम है? कृपया विस्तार से बताएँ।  क्यों कि मेरे जज साहब को हर बात पर रूलिंग चाहिए।  मेरे वकील साहब को ये रूलिंग नहीं मिल रही है। कृपया मेरी मदद करें।

-अशोक तिवारी, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

प के प्रश्न से यह ठीक से पता नहीं लग रहा है कि वास्तव में आप की परेशानी क्या है और न्यायालय को किस कानूनी तथ्य के बारे में न्यायिक दृष्टान्त चाहिए।  हम आप के प्रश्न से केवल यह अनुमान लगा सके हैं कि क्या वॉयस रिकार्डिंग को एक साक्ष्य के बतौर ग्रहण किया जा सकता है या नहीं?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम आरंभ में 1872 में अधिनियमित किया गया था।  उस समय तक इलेक्ट्रोनिकी इतनी विकसित ही नहीं थी कि उस में इलेक्ट्रोनिक साधनों से उत्पन्न की हुए रिकार्ड को साक्ष्य के रूप में ग्रहण किए जाने के संबंध में उपधारणा की जाती।  लेकिन समय के साथ इस तरह के साधनों के माध्यम से उत्पन्न रिकार्ड को साक्ष्य के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता महसूस की गई और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में तदनुरूप अनेक संशोधन कर के नए उपबंध जोड़े गए हैं।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 क में यह उपबंध किया गया है कि इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार साबित की जा सकती है।

धिनियम की धारा 65ख में यह अधिनियमित किया गया है कि इलेक्ट्रोनिक अभिलेख में अन्तर्विष्ट कोई सूचना जो कागज पर मुद्रित है और कम्प्यूटर द्वारा उत्पादित प्रकाशकीय या चुम्बकीय माध्यम में भंडारित, अभिलिखित या नकल की गई है को दस्तावेज होना माना जाएगा तथा उसे साक्ष्य में ग्राह्य माना जाएगा। इस तरह के अभिलेख को साक्ष्य में प्रस्तुत करने के संबंध में कुछ शर्तें इस धारा में दी गई हैं। जिन की पालना किया जाना आवश्यक है।

स तरह आप के द्वारा अपने मोबाइल में रिकार्ड किया गया संदेश और उस से कंप्यूटर की सहायता से बनाई गई उस की प्रतिलिपि एक दस्तावेज है जो धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार न्यायालय के समक्ष साक्ष्य के रूप में ग्रहण की जा सकती है। इस सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा State (N.C.T. Of Delhi) vs Navjot Sandhu@ Afsan Guru के मामले में दिनांक 04.08.2005 को तथा Societe Des Products Nestle S.A. … vs Essar Industries And Ors के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 04.09.2006 को दिए गए निर्णय आप के काम के हो सकते हैं।  इन निर्णयों को आप उन के शीर्षकों पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं और प्रिंट कर के अपने काम में ले सकते हैं।

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