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स्त्री की संपत्ति सब से पहले उत्तराधिकार में उस की संतानों को प्राप्त होगी।

समस्या-

विशाल कुमार ने मवई कलाँ, मलीहा बाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या यह है कि मेरे पापा ने दो शादियाँ की थी। उनकी पहली पत्नी के लडका पैदा हुआ, उसके बाद किसी बीमारी के कारण पहली पत्नी की मृत्यु हो गई उसके बाद मेरे पापा ने दूसरी शादी की जिनका पुत्र मै हूँ।  कुछ समय बाद मेरे पापा की भी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मेरे पापा की सारी संपत्ति 1/3 हो गई जिसमें पहले पत्नी के लडके व मेरी माँ को एवम मुझे अधिकार प्राप्त हुआ था अब मेरी माता जी की भी मृत्यु हो गई है क्या मेरी माता जी की संपत्ति मुझे अकेले को प्राप्त होगी।

समाधान-

प की माता जी को जो संपत्ति आपके पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई वह उन की व्यक्तिगत संपत्ति हो चुकी थी। अब आप की माता जी के देहान्त के उपरान्त आप के माताजी का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-15 व 16 से शासित होगा।

इन धाराओं के अनुसार सब से पहले स्त्री की संपत्ति उस के पुत्रों व पुत्रियों को प्राप्त होगी। इस तरह यदि आप के अपनी माता से कोई भाई व बहिन नहीं हैं तो फिर उनकी सारी संपत्ति आप को ही प्राप्त होगी। धारा 15 की उपधारा (2) (बी) में यह उपबंध है कि स्त्री को कोई संपत्ति यदि उस के पति या ससुर से प्राप्त हुई थी तो वह मृतका की संतानों को प्राप्त होगी। निश्चित रूप से आप का सौतेला भाई आप की माँ की संतान नहीं है। इस कारण उसे आप की माता से उत्तराधिकार के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति से पुनर्विवाह के कारण स्त्री को वंचित नहीं किया जा सकता

Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

हिन्दू स्त्री का उत्तराधिकार कैसे होगा?

Hindu succession actसमस्या-

विजय कुमार ने बहरोड़, अलवर राजस्थान से पूछा है-

मारे पिता की दो बुआ जो की विधवा थी वे हमारे पास 60 साल से रह रही थी वह निःस्संतान थी। जिस में एक बुआ की मोत 1996 मे हो गयी उसकी जमीन का नामांतरण हमारे परदादा के वारिसों के अनुसार हो गया। दूसरी बुआ जो भी निःस्संतान थी जो हमारे पास ही रहती थी जिसका आधार कार्ड राशन कार्ड मतदाता पहचान पत्र सभी हमारे गांव के हैं। बीमार होने पर भी हमने ही दिखाया, उनके  सुसराल का कुछ नहीं है। दाह संस्कार व अन्य सभी क्रियाकर्म हमने ही किये। कुछ जमीन हमारी बुआ के उसके सुसराल पक्ष से  भी नाम थी जो हमारी बुआ के जेठ के लड्के ने खुद के नामानतरण करा ली। जब हम पटवारी के पास हमारी जमीन के नामानतरण के लिये गये तो हमारा इंतकाल दर्ज कर दिया। लेकिन बुआ के जेठ के लड़के ने रोक लगा दी। सिविल कोर्ट में स्टे ले लिया खुद वारिस बनने के लिए। पट्वारी कहता हे कि निःस्संतान विधवा स्त्री की जमीन पीहर पक्ष की जमीन पीहर पक्ष वाले के और सुसराल पक्ष की सुसराल पक्ष के, जहां से आयी थी वहीं वापस जा कर उसके वारिसों के नामानतरण होगी। क्या एक निःस्संतान स्त्री जिसने न वसीयत लिखी, न गोदनामा करवाया उसकी जमीन सुसराल पक्ष की व पिहर पक्ष की किसके नामान्तरण होगी जबकि वह 60 साल पीहर पक्ष में रही है?

समाधान-

किसी स्त्री के सारा जीवन मायके में रहने मात्र से उत्तराधिकार के नियम नहीं बदलते। वे किसी व्यक्ति की जीवनकाल के अंत में या अनेक वर्षों तक सेवा करने या अन्तिम संस्कार और क्रिया कर्म करने आदि से परिवर्तत नहीं होते। इस कारण किसी स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार कानून के अनुसार ही होगा। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 15 स्त्रियों के उत्तराधिकार के संबंध में है जो निम्न प्रकार है-

  1. General rules of succession in the case of female Hindus

(1) The property of a female Hindu dying intestate shall devolve according to the rules set out in section 16 :

(a) firstly, upon the sons and daughters (including the children of any pre-deceased son or daughter) and the husband;

(b) secondly, upon the heirs of the husband;

(c) thirdly, upon the mother and father;

(d) fourthly, upon the heirs of the father; and

(e) lastly, upon the heirs of the mother.

(2) Notwithstanding anything contained in sub-section (1)-

(a) any property inherited by a female Hindu from her father or mother shall devolve, in the absence of any son or daughter of the deceased (including the children of any pre-deceased son or daughter) not upon the other heirs referred to in sub-section (1) in the order specified therein, but upon the heirs of the father; and

(b) any property inherited by a female Hindu from her husband or from her father-in-law shall devolve, in the absence of any son or daughter of the deceased (including the children of any pre-deceased son or daughter) not upon the other heirs referred to in sub-section (1) in the order specified therein, but upon the heirs of the husband.

इस धारा की उपधारा (2) (a) में यह उपबंध है कि किसी भी हिन्दू स्त्री द्वारा उस के पिता या माता से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति का उत्तराधिकार उस स्त्री की स्वयं की संतान न होने पर उस के पिता के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।

इस नियम के अनुसार आप की बुआ ने जो संपत्ति अपने माता व पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त की थी वह अब आप के दादा जी के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाएगी। इस मामले में पटवारी का कथन सही है। आप की बुआ के जेठ के पुत्र ने जो वाद संस्थित किया है वह निरस्त हो जाएगा लेकिन आप को उस वाद में यह साबित करना होगा कि यह संपत्ति बुआ को उन के माता पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हाँ मुकदमा लड़ने में कोताही बरतने पर कोई भी अधिकार समाप्त हो सकता है इस कारण मुकदमा पूरी तत्परता और सजगता से साथ लड़ें।

स्त्री के नाम की संपत्ति उस की व्यक्तिगत है उस में किसी का कोई हिस्सा नहीं।

rp_courtroom4.jpgसमस्या-

सर्वेश गुप्ता ने रोहता रोड़, थाना कांकेर खेड़ा, मेरठ, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मैं एक विधवा हूँ, मेरे पति का देहान्त हुए तीन वर्ष हो चुके हैं। मेरी चार बेटियाँ और 2 बेटे हैं। सभी बेटी की शादी हो चुकी है और एक बेटा विवाहित है जिसकी उमर 34 साल है और दूसरा नाबालिग जिसकी उमर 15 साल है। मेरी समस्या ये है कि मेरा बेटा और बहू मेरे मकान पर अपना कब्जा करना चाहते हैं। हम साथ ही रह रहे थे किन्तु अब उन्हें मेरे लड़के और मुझे रखने में समस्या है। वो मेरे छोटे बेटे पर झूठा मुकदमा चलवा कर उसे जेल भिजवाना चाहते हैं और मुझे घर से बाहर करना चाहते हैं। मकान में अपना आधा हिस्सा मांग रहे हैं। हमारी कमाई का कोई साधन नहीं है। मकान मेरे नाम है। क्या मेरी बहू (बड़े बेटे का मकान में हिस्सा है? क्या मैं उसे बेदखल कर सकती हूँ। अब जब उसने कब्जा कर रखा है तो क्या मैं इस मकान के सात हिस्से कर के बेच सकती हूँ। अगर बड़ा बेटा इस पर राजी नहीं होता और घर खाली नहीं करता है तो मैं मकान बेचने की हकदार हूँ? हम मकान बेचकर उसका 7वां हिस्सा देने को तैयार हैं। पर /2 हिस्सा माँग रहा है। उसके खिलाफ किस धारा के अंतगत केस कर सकती हूँ। मेरी 4 बेटी मेरी ही साइड हैं। मैं और मेरी बेटियाँ मकान बेचने को तैयार हैं क्या मे मकान बेच सकती हूँ।

समाधान-

दि यह मकान आप के नाम है तो यह आप की निजि संपत्ति है इस में किसी का कोई अधिकार नहीं हैं। आप को यह मकान स्वयं विक्रय करने, वसीयत करने, दान आदि करने का पूरा अधिकार है। आप जब चाहें यह मकान बेच सकती हैं।

आप की मूल समस्या यह है कि आप का बड़ा पुत्र और बहू इसी मकान में रह रहे हैं और एक हिस्से पर उन का कब्जा है। इस कारण कोई भी खरीददार मकान को खरीदने में हिचकेगा और मकान की कीमत कम देगा क्यों कि उसे मकान खरीदने के उपरान्त जिस हिस्से पर आप के बड़े बेटे का कब्जा है उसे भी खाली कराना पड़ सकता है।

आप को सब से पहले तो यह करना चाहिए कि सब से बेटियों और बेटों से कहना चाहिए कि मकान मेरे नाम है मेरी इच्छा होगी वैसे करूंगी, यदि ठीक से न रहे तो इस मकान को दान कर के हरिद्वार चली जाउंगी।

आप का बेटा आप की अनुमति से उस मकान में निवास कर रहा है इस का अर्थ यह है कि उस की हैसियत एक लायसेंसी की जैसी है। आप उसे नोटिस दे कर लायसेंस खत्म करें और फिर बेदखली का दावा करें। इस दावे के साथ ही इस आशय की अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त करें कि वह जिस हिस्से में रहता है उस हिस्से के अतिरिक्त हिस्से का उपयोग न करे और अन्य हिस्से का उपयोग करने से आप को व आप के अन्य पुत्र पुत्रियों को न रोके। यदि बेटा और बहू कुछ गलत करते हैं तो आप घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत भी शिकायत पुलिस को कर सकती हैं।

यदि आप को कोई ऐसा खरीददार मिल जाता है जो कि आप के बड़े बेटे के रहते हुए मकान खरीदने को तैयार हो तो आप मकान बेच सकती हैं। जो धन प्राप्त हो उस का अपने हिसाब से उपयोग कर सकती हैं।

हिन्दू स्त्री अपने नाम की संपत्ति की संपूर्ण स्वामी है।

hinduwidowसमस्या-

मोहन लाल सैनी ने सीकर, राजस्थान से पूछा है-

मेरी माँ के नाम से दो प्लाट हैं और हम तीन भाई और एक बहन हैं। मैं भाइयों में सब से छोटा हूँ और बहन मुझ से भी छोटी है। क्या मुझे माँ के प्लाट में कोई हक है? जबकि मैंने मेरी अब तक की पूरी कमाई उन के साथ ही लगायी है।

समाधान-

किसी भी स्त्री के नाम जो संपत्ति होती है हिन्दू विधि के अनुसार वह उस की अकेली स्वामी होती है। इस तरह आप के माँ के नाम जो भी संपत्ति है वह उस की संपूर्ण स्वामी आप की माताजी हैं। उन के जीवनकाल में उस संपत्ति को किसी भी तरह से बेचने, दान करने, हस्तान्तरित करने आदि का अधिकार है। उन्हें उस संपत्ति की वसीयत करने का भी अधिकार है।

यदि आप की माताजी अपने जीवनकाल में उक्त संपत्ति को किसी भी तरह से हस्तान्तरित नहीं करती हैं और कोई वसीयत भी नहीं करती हैं तो उन के जीवनकाल के उपरान्त आप तीन भाइयों और एक बहन को उन की संपत्ति में समान हिस्सा अर्थात प्रत्येक को ¼ हिस्सा प्राप्त होगा। आप जो अपनी आय में से लोगों पर जो भी खर्च कर रहे हैं उस का कोई महत्व इस संपत्ति के मामले में नहीं है।

हिन्दूु स्त्री का उत्तराधिकार कैसे निश्चित होगा?

Hindu Successionसमस्या-

शोभा गुप्ता ने उज्जैन मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

क स्त्री के नाम पर एक भूखंड (स्व अर्जित आमदनी से लिया हुआ) है। वह अपने पति की दूसरी पत्नी है इस स्त्री के २ संतान हैं और २ सौतेली संतान हैं। इस स्त्री की मृत्यु के बाद इस भूखंड पर किस-किस का हक़ होगा?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अन्तर्गत किसी भी हिन्दू स्त्री की संपत्ति उस की परम संपत्ति होती है। उस में किसी का अधिकार नहीं होता। वह उसे विक्रय कर सकती है, दान कर सकती है और किसी भी अन्य रीति से हस्तान्तरित कर सकती है। वह उस की वसीयत भी कर सकती है।

स्त्री के देहान्त के उपरान्त उस की संपत्ति हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 15 के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होती है। उस के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों में उस के पुत्र, पुत्री व पति सम्मिलित हैं, अर्थात किसी स्त्री की मृत्यु के उपरान्त जितनी संतानें होंगी उन में पति को जोड़ कर जो संख्या आएगी उन सब को उस की संपत्ति का बराबर हिस्सा प्राप्त होगा।

प के मामले में यदि उस स्त्री के पुत्री भी है तो उस की सम्पत्ति उस की मृत्यु के उपरान्त उस के दोनों पुत्रों, पुत्री व पति में बराबर बंटेगी। यदि पुत्री नहीं है तो उस के दो पुत्रों व पति तीनों को एक तिहाई हिस्सा प्राप्त होगा। उस स्त्री के सौतेले पुत्रों को और यदि सौतेली पुत्रियाँ भी हों तो उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। क्यों कि सौतेली संतानें उस स्त्री की संतानें नहीं हैं, उस के पति की संतानें हैं। जब एक पुत्र वाली स्त्री विधवा होने या तलाक होने के बाद किसी पुरुष से विवाह करती है तो उस की संतान को अपनी माँ से तो उत्तराधिकार प्राप्त होता है लेकिन अपने सौतेले पिता से नहीं सौतेला पिता चाहे तो उस की पत्नी के पूर्व पति से जन्मी संतान को गोद ले सकता है। तब वह सौतेला न हो कर गोद पुत्र हो जाएगा और उसे औरस पुत्र की तरह सभी अधिकार प्राप्त होंगे। यही नियम माँ के संबंध में भी है, यदि सौतेली माँ अपने वर्तमान पति की पूर्व पत्नी से जन्मी संतानों को गोद ले ले तो वे भी गोद पुत्र/पुत्री हो जाएंगे और सौतेली माँ जो अब दत्तक ग्रहण करने वाली माँ हो जाएगी उस से उत्तराधिकार प्राप्त कर सकेंगे।

सब को अपने तरीके से जीने का अधिकार है।

rp_rapevictim.jpgसमस्या-

धर्मपाल ने बुधना, तहसील नारनौद, जिला हिसार हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरा छोटा भाई परमपाल हिसार जिला कारागार में धारा 302 में बन्द है भाई की घर वाली मेरे पास रहती है। कुछ समय से उस के कुछ लोगों से गलत संबंध हैं। विरोध करने पर कानूनी कार्यवाही की धमकी देती है और जान से मारने की धमकी देती है। पुलिस वाले भी उस की बात मानते हैं। उस का एक तीन साल का बच्चा है वह उस की भी केयर नहीं करती है। हमें उस औरत से जान माल का खतरा है। मैं उस से बात करता हूँ तो वह कहती है कि वह मुझे झूठे केस में सजा करवा देगी। मुझे कोई उपाय बताएँ।

समाधान-

प की समस्या मात्र इतनी है कि आप अपने छोटे भाई की पत्नी की धमकी से डर गए हैं। आप को लगता है कि वह पुलिस को झूठी रिपोर्ट करवा कर आप को फँसा देगी। आप को इस डर से निकलने की जरूरत है। डर से तो बहुत सी चीजें खराब हो जाती हैं।

प के भाई की पत्नी की स्थितियों को भी आप को देखना चाहिए। उस का पति जेल में बन्द है उसे अपने पति की अनुपस्थिति में अपने बच्चे का पालन पोषण जैसे भी करना है कर रही है। यह उस का निजी जीवन है जिसे वह अपने तरीके से अपने हिसाब से जी रही है। उसे जीने दें। आप ने यह नहीं बताया कि उस के किसी भी तरीके से जीने से आप को क्या फर्क पड़ रहा है। यदि आप को किसी तरह का नुकसान उस के आचरण से पड़ रहा हो तो आप को शिकायत हो सकती है। यदि आप ने बताया होता कि आप को क्या नुकसान हो रहा है तो हम आप को सुझाव दे सकते थे कि आप को क्या करना चाहिए।

पुलिस को आप क्या शिकायत करेंगे? यही न कि उस औरत के अनेक लोगों से नाजायज संबंध हैं। लेकिन यदि कोई औरत अपने पति के सिवा किसी अन्य से संबंध रखती है तो केवल और केवल उस औरत का पति शिकायत कर सकता है। अन्य कोई नहीं। इस कारण पुलिस को उस के निजी जीवन में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। आप पुलिस में शिकायत करेंगे भी तो पुलिस के पास ऐसा कोई कारण नहीं है जिस से वह उस के विरुद्ध कार्यवाही कर सके।

दि वह औरत आप के किसी अधिकार को नुकसान पहुँचा रही हो तो आप उस के विरुद्ध दीवानी कार्यवाही कर सकते हैं और वह कोई अपराध कर रही हो तो पुलिस को शिकायत कर सकते हैं। पुलिस वाले न सुनें तो पुलिस अधीक्षक को शिकायत की जा सकती है और आगे भी न्यायालय को सीधे परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन यदि उस की जीवन शैली से आप के किसी अधिकार पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा और वह कोई अपराध भी नहीं कर रही है तो आप कुछ भी नहीं कर सकते।

औरत अगर गलती करे तो क्या कोई कानून नहीं है?

father & married daughter1समस्या-

शिवकुमार ने बहराइच, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2010 में हुई थी, तभी से मेरी बीवी अलग रहना चाहती थी पर मैं घर में अकेला कमाने वाला और सारा परिवार मेरे उपर निर्भर है। मेरे एक भाई और दो बहन हैं जो मुझ से छोटे हैं, मेरी माँ पिता जी और दादाजी सब मुझ पर निर्भर हैं। शादी के पहले महीने से घर मे क्लेश होता रहा और मेरे ससुराल वालों की नज़र मेरी प्रॉपर्टी पर थी। काफी बार झगडे हुए पर मैं ने संभाला। पर अक्सर वो मायके में ही रहना पसंद करती है और अपने माँ बाप की ही सुनती है। नतीजा यह हुआ कि मामला पुलिस तक पहुँच गया है और पिछले 4 महीनों से वह अपने मायके में रह रही है। परेशानी यह है कि मैंने उसे कई बार बुलाया पर वो आने से मना कर रही है और दहेज का केस करने को कह रही है। सब लोगों ने कहा था अगर एक बच्चा हो जायगा तो ये ठीक हो जाएगी। आज मेरे दो साल का एक सुन्दर बेटा है और वह भी सब कुछ झेल रहा है यहाँ तक कि झगड़े में मेरी बीवी ने काफी बड़ी ईंट मारी जो मेरे दो साल के बेटे के माथे में लगी। फिर भी उसे कोई गम नहीं है वह कहती कि सब आप की गलती है। अब वह अपने माँ और बाप के साथ रह रही है। मेरे अभी कुछ दिन पहले चोट लग गयी थी जब मैंने उसे बताया तो कहती कि मुझे कोई मतलब नहीं है। मैं अपना हिस्सा ले लूंगी। मैं उसे तलाक देकर अपने बेटे को पाना चाहता हूँ। क्यों कि मेरा बेटा अपनी माँ कि जगह मुझे और मेरी माँ को कि अपनी माँ कहता है। जब मेरा बेटा तीन महीने का था तब से मेरी माँ ने उसे ऊपर का दूध पिलाया और उसे संभाला। पर मेरी बीवी को तो उसकी लेट्रिन साफ़ करने में भी घिन आती थी और वो दो दो महीने तक बच्चे को छोड़ कर मायके में रहती थी। उस ने मेरे खिलाफ लगभग 6 महीने पहले वीमेन सेल में भी केस किया था। अब आप मुझे सलाह दीजिये कि किस तरह से मैं अपने बच्चे को पा सकता हूँ? क्या औरत अगर गलती करे तो कोई कानून नहीं है? सब कुछ आदमियों के लिए ही है।

समाधान-

प के परिवार में आप के सिवा आप के माताजी, पिताजी, दादाजी, भाई और दो बहनें तथा आप की पत्नी कुल आठ सदस्य हैं। आप की पत्नी को सारे घर के काम के साथ इन सब की सुनना, उन के आदेशों और इच्छाओं की पालना करना, फिर बच्चे को संभालने का काम करना है।आप यह कह सकते हैं कि सब मदद करते हैं, लेकिन फिर भी हमारे भारतीय परिवारों में इन सारे कामों का दायित्व एक बहू का ही समझा जाता है। लेकिन निर्णय करने की स्वतंत्रता सब से कम या नहीं के बराबर होती है। इस के अलावा उसे निजता (प्राइवेसी) लगभग बिलकुल नहीं मिलती। यहाँ तक कि पति के साथ बात करने का मौका रात को सोते समय मिलता है, तब तक वह इतना थक चुकी होती है कि उस स्थिति में नहीं होती। सूत्रों में बात करती है और अपनी बात तक ठीक से पति को बता तक नहीं सकती। यह मुख्य कारण है कि विवाह के बाद महीने भर बाद ही झगड़े आरंभ हो जाते हैं। ऐसे परिवारों की अधिकांश बहुएँ अलग रहने की सोचती हैं जहाँ वे हों उस का पति हो और बच्चा हो। वह केवल पति और बच्चे पर ध्यान दे। जब बहू मायके जाती है तो अपने ऊपर काम के बोझ, सुनने की बातें और भी बहुत कुछ बढ़ा चढ़ा कर बताती हैं जिस से माता पिता ध्यान दें और उस के साथ खड़े हों। फिर आप के जैसे विवाद सामने आते हैं। आप के जैसे परिवारों में इस का इलाज यही है कि परिवार को जनतांत्रिक तरीके से चलाया जाए।

मारे एक मित्र का परिवार भी इतना ही बड़ा है। यहाँ तक कि परिवार के दो सदस्य एक साथ व्यवसाय करते हैं जब कि एक सदस्य नौकरी करता है। लेकिन वे हर साल परिवार के 14 वर्ष से अधिक की उम्र के सदस्यों की एक बैठक करते हैं जिस में वे ये तय करते हैं कि कौन कौन क्या क्या काम करेगा जिस से सब को आवश्यकता के अनुसार आराम, प्राइवेसी मिल जाए। वे यह भी तय करते हैं कि परिवार की आमदनी कितनी है, उस में खर्च कैसे चलाना है, कैसे बचत करनी है। बचत में से नकद कितना कहाँ रखना है और कितना परिवार में नई वस्तुओं या स्थाई संपत्ति के लिए व्यय करना है। इस बैठक में बहुओं और बच्चों की जरूरतें और इच्छाएँ जानी जाती हैं, और उन से सभी बातों पर राय मांगी जाती है। उस के बाद लगभग सर्वसम्मति से तय होता है कि साल भर परिवार कैसे चलेगा। वर्ष के बीच आवश्यकता होने पर पूरा परिवार फिर से बैठ सकता है और महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार कर सकता है।

प के परिवार में भी ऐसी कोई पद्धति होती जहाँ सब अपनी बात रखते, नई बहू को भी परिवार के एक सदस्य के रूप में उस बैठक में समान महत्ता प्रदान की जाती तो शायद यह समस्या ही खड़ी नहीं होती। पर आप की पत्नी को लगता है कि परिवार में उस की महत्ता कुछ नहीं है। उस की इच्छा का कोई महत्व नहीं है। उस का काम सिर्फ लोगों के आदेशों, इच्छाओं, अपेक्षाओं की पालना करना मात्र है। सब की सारी अपेक्षाएँ उस से पूरी हो नहीं सकतीं। यही विवाद का मूल विषय है। आप की पत्नी को अपनी इस समस्या का कोई हल नहीं सूझ पड़ता है सिवा इस के कि आप, वह और बच्चा अलग रहने लगे। उस ने हल आप के सामने प्रस्तुत भी किया। आप को यह हल पसन्द नहीं। दूसरे किसी हल का प्रस्ताव आपने किया नहीं। तब उस ने अपने मायके में गुहार लगाई और मायके वालों की शरण में जा कर उस ने अपनी बात के लिए लड़ाई छेड़ दी। अब वह सारे हथियारों को आजमाने को तैयार है।

विवाह विच्छेद आप की समस्या का हल नहीं है। क्या करेंगे ऐसा कर के। बच्चा या तो आप से दूर हो जाएगा या उस की माँ से। दूसरा विवाह करेंगे, फिर एक स्त्री को पत्नी बनाएंगे। उस से भी वैसी ही अपेक्षाएँ परिवार के सब लोग रखेंगे। वह भी उन्हें पूरी नहीं कर पाएगी। फिर से एक नई जंग आप के सामने खड़ी होगी। आप की समस्या का हल है कि आप खुद समस्या के मूल को समझें फिर अपने परिवार को समझाएँ। फिर आप के मायके वालों को और सब से अन्त में अपनी पत्नी को। हमारा यह सुझाव आसान नहीं है। किसी परिवार में इस तरह का जनतंत्र पैदा करना किसी क्रांति से कम नहीं है।

प कहते हैं कि औरत की गलती के लिए कानून नहीं है। है, न वही कानून है कि यदि आप का पड़ौसी या भाई आप पर ईंट फैंकने के लिए जो कानून है वही पत्नी के लिए भी है। लेकिन एक स्त्री जो अपना परिवार छोड़ कर दूसरे परिवार को अपनाती है उसे उस परिवार में शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना मिलती है तो उस के लिए धारा 498ए आईपीसी है, उस में पति और उस के सम्बंधियों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है और सजा भी हो सकती है। आप कहेंगे कि पुरुष के लिए भी समान कानून होना चाहिए, लेकिन मैं आप से पूछूंगा कि हमारे समाज में कितने पुरुष अपने ससुराल में बहू बन कर जाते हैं। वे जाते भी हैं तो जमाई बन कर जाते हैं। उन के लिए ऐसे कानून की जरूरत नहीं जब कि स्त्रियों के लिए वास्तव में है।

स्वतंत्र स्त्री पर कानून का कोई जोर नहीं, तब किसी पुरुष का कैसे हो सकता है?

mother_son1समस्या-

हरीश शिवहरे ने ब्यावरा, जिला राजगढ़, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी रजनी मालवीया से मैं ने 8 -10. -2005 में नोटरी द्वारा 100 रु. के स्टाम्प पर लिखित रूप से विवाह संविदा किया गया था जिसे उस स्टाम्प पर गन्धर्व विवाह के नाम से लिखित किया गया था। 2005 के पहले मेरी पत्नी रजनी मालवीय पूर्व में कान्हा वर्मा के साथ पत्नी के रूप में निवास कर रही थी। परन्तु उन दोनों का कोई हिन्दू रीति रिवाज से विवाह संपन्न नहीं हुआ था, बस लिव इन रिलेशनशिप के तहत रह रहे थे। कान्हा वर्मा से रजनी मालवीया को कोई संतान भी नहीं थी। इसके बाद रजनी मालवीया और मुझ हरिश शिवहरे के मध्य प्रेम संबध स्थापित हुए और हम दोनों ने विवाह करने का फैसला किया। २००५ में हम तीनो पक्षों के बीच 100 के स्टाम्प पर एक समझौता हुआ जिस में कान्हा वर्मा ने रजनी मालवीय को मुझ हरीश शिवहरे के साथ विवाह करने की सहमति प्रदान की। जिस का 100 रु. के स्टाम्प पर नोटरी से प्रमाणित संविदा निष्पादित किया गया कि जिस मे हम तीनों पक्षकार हैं। कान्हा वर्मा रजनी मालवीया से विवाह विच्छेद होना स्वीकार करता है, उसी लेख पत्र में मेरे साथ रजनी मालवीया का गन्धर्व विवाह होना स्वीकार किया जाता है। कान्हा वर्मा द्वारा यहाँ भी लिखित किया जाता है कि हम दोनों के विवाह से और साथ रहने से उसे कोई आपत्ति नहीं होगी और नहीं किसी प्रकार की कोई पुलिस कार्यवाही की जायेगी, न ही किसी प्रकार का हम दोनों रजनी और हरीश के विरूद्ध न्यायालय में कोई वाद प्रस्तुत किया जाएगा। 8 -10 -2005 से ही रजनी मालवीय मुझ हरीश शिवहरे के साथ पत्नी के रूप में रह रही थी और मुझसे रजनी मालवीय को 11 -12 -2012 को एक बेटी का जन्म हुआ। अभी तक सब कुछ ठीक चल रहा था, पर बीच में कुछ बातो को लेकर हम दोनों में झगड़े होने लगे और वाद विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई। झगड़े जब ज्यादा बढ़ गए तब रजनी द्वारा मुझे बार बार आत्महत्या करने की धमकी दी जाने लगी और तलाक की मांग करने लगी। दो से तीन महीने तक मेरे घरवालो और पड़ोसियों द्वारा समझाए जाने पर कुछ समय तक सब ठीक रहा। पर फिर से रजनी द्वारा मुझ से तलाक की मांग की जाने लगी। इस बात से परेशान होकर दिनाक 30 -11 -2013 को हम दोनों के मध्य एक 100 रु. के स्टाम्प पर एक समझौता तलाक को लेकर किया गया जिस में हम दोनों पक्षों की आपसी सहमति से तलाक होना स्वीकार किया गया। उक्त समझौते की नोटरी करायी गयी। इस के एक माह बाद तक रजनी मेरे साथ निवास करती रही। दिनांक 9 -01 -2014 को मुझ से जिद कर के मेरे बार बार मना करने पर भी रजनी भोपाल अनाथ आश्रम में केयर टेकर के रूप में काम करने चली गई। अभी वहीं निवास कर रही है और मेरी बेटी भी उसके पास है। अब मैं अपनी बेटी के भविष्य को लेकर काफी चिंतित हूँ। मैं अपनी बेटी को किसी भी तरह से अपने पास रख उसका पालन पोषण करना चाहता हूँ। लेकिन रजनी मुझे मेरी बेटी से मुझे मिलने भी नहीं देती, ना मुझे उसे देखने देती है। अनाथ आश्रम में मेरी बेटी का भविष्य क्या होगा यह सोचकर में दुखी हो जाता हूँ। इस बारे में मैं ने रजनी को कई बार समझाने का प्रयास किया कि वह सब कुछ भूलकर मेरे साथ रहे। हम दोनों मिलकर हमारी बेटी की परवरिश अच्छे से करेंगे। वह मानने को तैयार नहीं है, अब में अपनी बेटी को किस तरह से अपने पास रख सकता हूँ उस की परवरिश कर सकता हूँ ताकि उसका उज्जवल भविष्य हो। मैं अपनी बेटी को अपने पास और रजनी को भी अगर वो तयार हो जाती है तो रखना चाहता हूँ। मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं किस तरह से अपनी बेटी की कस्टडी प्राप्त कर सकता हूँ और रजनी के साथ दाम्पत्य जीवन स्थापित कर सकता हूँ।

समाधान-

प का मानना और कहना है कि रजनी का पहला विवाह विवाह नहीं था, अपितु एक लिव इन रिलेशन था। जिस से उसे कोई सन्तान नहीं हुई। फिर उसी रिलेशन के दौरान आप दोनों के बीच प्रेम विकसित हुआ और उस के साथी के साथ एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद रजनी आप के साथ आ कर रहने लगी।

ब उस का पहला विवाह नहीं था तो आप के साथ जो संबंध रजनी का है वह विवाह कैसे हो गया। आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी होती है और सप्तपदी के बिना विवाह को संपन्न नहीं माना जाता है। इस तरह आप का और रजनी का संबंध भी लिव इन रिलेशन ही हुआ।

जनी एक स्वतंत्र स्त्री है। वह अपनी इच्छा से पहले अन्य व्यक्ति के साथ रही। जिस से उसे कोई सन्तान नहीं हुई। आप ने अपनी समस्या लिखने इस बात पर जोर दिया है। इस से प्रतीत होता है कि उस का आप के साथ सम्बन्ध बनाने में उस की माँ बनने की इच्छा की भूमिका अधिक थी। उस ने और आप ने किसी भी प्रकार के विवाद से बचने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौता करना उचित समझा। आप की संन्तान प्राप्ति की इच्छा आप की समस्या में कहीं दिखाई नहीं देती। आप के साथ रहने के बाद भी उसे संन्तान की प्राप्ति 7 वर्ष बाद हुई। निश्चित रूप से देरी से संन्तान होने के बाद रजनी का झुकाव और प्रेम अपनी बेटी की तरफ चला गया और आप ने इसे अलगाव समझा। रजनी की पुत्री के कारण आर्थिक जरूरतें बढ़ गईं और आप के साथ जो समय वह देती थी वह कम हो गया। आप ने यह नहीं बताया कि रजनी आप के साथ रहते हुए भी कोई काम कर के कुछ कमाती थी या नहीं। पर मुझे लगता है कि वह भी कुछ न कुछ अर्थोपार्जन करती रही होगी। जिस में बेटी के जन्म के समय जरूर कुछ व्यवधान आया होगा। हमारी नजर में यही कारण रहे होंगे जिन्हों ने आप के बीच विवादों को जन्म दिया।

प ने रजनी और आप के बीच विवाद का कारण नहीं बताया है और छुपाया है। इस का अर्थ है कि उन कारणों के पीछे आप का स्त्री पर संपूर्ण आधिपत्य का पुरुष स्वभाव अवश्य रहा होगा। पुत्री पर खर्चे के प्रश्न भी जरूर बीच में रहे होंगे। खैर, आप ने उन्हें बताए बिना समाधान चाहा है।

जनी लगातार आप से अलग होने का प्रयास करती रही और आप अन्यान्य प्रयासों से उसे रोकते रहे। जिस में परिवार और पड़ौसियों द्वारा उसे समझाने का काम भी सम्मिलित था। लेकिन उस केबाद भी विवाद बना रहा। अर्थात आप ने विवाद को समाप्त करने का प्रयत्न नहीं किया। आप ने समझने का प्रयास ही नहीं किया कि रजनी आखिर आठ वर्षों के दाम्पत्य जीवन के बाद अपनी बेटी को ले कर अलग क्यों होना चाहती है। यदि आप उस बात को समझने का प्रयास करते और कुछ खुद को भी बदलने का प्रयास करते तो शायद रजनी आप को छोड़ कर नहीं जाती और पुत्री भी आप के पास बनी रहती।

जनी जैसे समझौते के अन्तर्गत आप के साथ रहने आई थी वैसे ही समझौता कर के अलग हो गई। आप खुद भी जानते हैं कि उस पर आप का कोई जोर नहीं है। विधिपूर्वक हुए विवाह में भी पत्नी पर पति का इतना हक नहीं होता है कि वह उसे जबरन अपने साथ रख सके। अब आप को लगता है कि यदि किसी तरह बेटी को आप अपने साथ रख सकेंगे तो रजनी भी वापस लौट आएगी और बेटी के साथ रहने की इच्छा के कारण आप की सब बातों को उसे सहन करना होगा। रजनी एक स्वतंत्र स्त्री है उस पर आप का तो क्या कानून का भी कोई जोर नहीं है।

ह सही है कि बेटी आप की है लेकिन जितनी आप की है उतनी ही रजनी की भी है। संतान यदि पुत्र हो तो 5-7 वर्ष का होने पर पिता को उस की अभिरक्षा मिल सकती है वह भी तब जब कि बच्चे का हित उस में निहित हो। लेकिन बेटी की अभिरक्षा तो अत्यन्त विकट परिस्थितियों में ही पिता को मिल पाती है। आप के मामले में ऐसी कोई विकट परिस्थिति नहीं है कि बेटी की कस्टड़ी उस की माँ से उसे अलग करते हुए आप को मिल सके। आप जो अनाथ आश्रम का तर्क गढ़ रहे हैं कि वहाँ बेटी की परवरिश ठीक से न हो सकेगी। वह बहुत थोथा तर्क है। वह अनाथ आश्रम की निवासिनी नहीं है। बल्कि अनाथ आश्रम के केयर टेकर की बेटी है। अनाथ आश्रम के बच्चों का स्नेह और आदर भी उसे प्राप्त हो रहा होगा जो किसी भी स्थिति में आप के यहां प्राप्त नहीं हो सकता। रजनी की अनाथ आश्रम की केयर टेकर के रूप में इतनी आय है कि एक बेटी को पालने में वह समर्थ है। अनाथ आश्रम का नाम अनाथ आश्रम जरूर होता है लेकिन अनाथ आश्रम बनाए ही इस कारण जाते हैं कि अनाथ बच्चों को उचित संरक्षण मिल सके। वस्तुतः अनाथ आश्रम के बच्चे अनाथ नहीं रह जाते हैं।

प यदि रजनी को वापस अपने साथ रहने को तैयार करना चाहते हैं तो कोई न्यायालय आप की कोई मदद नहीं करेगा। आप यदि चाहते हैं कि बेटी आप के साथ रहे तो केवल एक ही विधि हो सकती है कि रजनी स्वेच्छा से आप के साथ रहने को तैयार हो जाए। लेकिन यह कार्य असंभव दिखाई पड़ता है। क्यों कि अब रजनी के पास आश्रय भी है और रोजगार भी है। वह क्यों फिर से परतंत्रता में पड़ना चाहेगी। फिर जो स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ समझ गई हो वह क्यों आप के अधीन रहना चाहेगी। उसे मातृत्व चाहिए था वह उसे मिल गया है। यदि उसे किसी पुरुष साथी का चुनाव करना होगा तो जो स्त्री अपनी स्वतंत्रता और मातृत्व की इच्छा के कारण एक पुरुष साथी को छोड़ कर आप के साथ संबंध बना सकती है वह अब किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध बनाना पसंद करेगी न कि आप के साथ।

प अपनी बेटी के पिता हैं। आप चाहें तो रजनी को यह भरोसा दे कर उस से मिलने की युक्ति कर सकते हैं कि आप न तो रजनी के जीवन में उस की इच्छा के विरुद्ध प्रवेश करेंगे और न ही बेटी पर अपना अधिकार जमाएंगे। आप केवल इतना चाहते हैं कि साल में दो चार बार उस से मिल लें और कुछ समय उस के साथ बिता सकें।

स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

कृष्णा नायडू ने कोरबा, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे नाना जी ने अपने जीवन काल मे दो जमीन खरीदी जिस में से एक उन के नाम है और उस में से उनकी बेटियों को हिस्सा मिल रहा है। दूसरी जमीन पर नानी जी का नाम है। क्या उस पर भी बेटियों को हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

नाना जी का देहान्त हो चुका है और उस के साथ ही उन का उत्तराधिकार तय हो गया है जिस में उन की बेटियों का हिस्सा मिल रहा है। नानी के नाम से जो जमीन है वह नाना जी द्वारा खऱीदी गई होने पर भी नानी की है। क्यों कि पत्नी के नाम खऱीदी गई जमीन के बारे में कानून यह है कि वह पत्नी के उपयोग और लाभ के लिए खरीदी गई थी और उसी की संपत्ति है।

ह संपत्ति नानी के जीवनकाल में नानी की रहेगी। नानी यदि उस संपत्ति की वसीयत कर देती हैं तो वह उन्हें मिलेगी जिन्हें नानी ने वसीयत की है। यदि वे निर्वसीयती रह जाती हैं तो फिर उन की संपत्ति उत्तराधिकार के नियमों के मुताबिक नानी के सभी उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी। इन उत्तराधिकारियों में बेटियाँ भी होंगी और उन्हें भी उन का हिस्सा मिलेगा।

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