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न्यायालय में लंबित किसी प्रकरण को दूसरे न्यायालय में कैसे स्थानान्तरित कराया जाए?

समस्या-

सुधा ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे पति द्वारा मुझ पर तलाक प्रकरण किया गया है मैं अपने गम्भीर रूप से बीमार एवं वृद्ध माता के घर पर हूँ। दो अलग-अलग न्यायालयों द्वारा स्वीकृत भरण पोषण एवं अंतरिम भरण पोषण की राशि मेरे पति द्वारा हीला हवाली करने और न्यायालय के दखल के पश्चात मुझे प्रदान की जाती है। उक्त भरण पोषण राशियों की स्वीकृति के सम्बन्ध में मेरे पति द्वारा एक प्रकरण के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय मैं चुनौती प्रस्तुत की थी, जिस में उच्च न्यायालय के आदेश द्वारा उक्त भरण पोषण राशियों को उचित एवं सही माना है। उक्त तलाक प्रकरण को मैं अपने घर से 300 कि.मी.दूर परिवार न्यायालय से स्थानीय ए डी.जे न्यायालय में स्थानांतरित करवाना चाहती हूँ, इसके लिये मुझे क्या करना होगा ?


समाधान-

प का विवाह विच्छेद का प्रकरण पति द्वारा हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है। इस अधिनियम की धारा 21-ए में इस अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत प्रकरणों के स्थानान्तरण के उपबंध हैं। इस के अतिरिक्त इस अधिनियम के प्रकरणों पर दीवानी प्रक्रिया संहिता प्रभावी है। धारा 21-ए में उपबंधित है कि यदि धारा 10 और 13 के प्रकरण अलग अलग स्थानों पर प्रस्तुत किए गए हों तो बाद वाले मुकदमे को पहले वाले मुकदमे के स्थान पर स्थानान्तरित किया जा सकता है। इस के लिए स्थानान्तरण चाहने वाले व्यक्ति को उच्च न्यायालय में आवेदन करना होगा। धारा 24 दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय किसी भी प्रकरण को किसी पक्षकार की सुविधा के लिए अपने अधीन किसी भी न्यायालय को स्थानान्तरित कर सकता है।

आप को चाहिए कि आप उक्त प्रकरण के स्थानान्तरण के लिए अपने उच्च न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत करें। जिस में वे कारण अंकित किए जाएँ जिनके आधार पर आप अपना प्रकरण किसी खास न्यायालय में स्थानान्तरित करना चाहती हैं। उच्च न्यायालय विपक्षी पक्षकार को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के उपरान्त स्थानान्तरण के सम्बंध में उचित आदेश पारित कर सकता है।

पुलिस द्वारा जब्त मोटरसायकिल कैसे छुड़वाएँ?

bike-Bhopalसमस्या-
भोपाल, मध्य प्रदेश से दीपक कुलश्रेष्ठ ने पूछा है –

मेरे पास एक मोटरसाईकिल है जो कि मैं ने मेरे मित्र से ली थी क्योंकि उसके पास ईएमआई  भरने के रुपये नहीं थे।  फिर मैं ने उससे वह मोटरसाईकिल खरीद ली और उसी के नाम के बैंक खाते में ईएमआई की रकम जमा करवाता रहा और सारी किश्तें चुका दीं परन्तु उसका पंजीकरण अपने नाम नहीं करवा सका। इसलिए मुझे उसका नंबर नहीं मिला तो मैं ने अपनी दूसरी मोटरसाईकिल का नंबर उस पर लगा लिया।  अब पुलिस ने यह मोटरसाईकिल जप्त कर ली है तो मैं उसे अब कैसे छुडवाऊँ?  कोई उपाय बताएँ।

समाधान-

प ने बहुत मूर्खताएँ की हैं। जब आप के दोस्त ने मोटरसाइकिल खरीदी होगी तो उस का पंजीकरण उस के नाम रहा होगा। आप को उसी पंजीकरण से उस वाहन को चलाना चाहिए था। केवल उस वाहन के संबंध में पावर ऑफ अटार्नी अपने नाम ले लेनी चाहिए थी। ईएमआई पूरी होते ही उस का पंजीकरण दोस्त से अपने नाम परिवर्तन करवा लेना चाहिए था।

कोई वाहन चोरी चला जाए तो पंजीकरण नंबर की प्लेट तो कोई भी वाहन से हटा सकता है और दूसरी लगा कर उसे चला सकता है। पंजीकरण नंबर किसी वाहन की पहचान नहीं होता है वह केवल स्वामित्व का प्रमाण होता है तथा इस नंबर से यह प्रदर्शित होता है कि वह किस प्रान्त के किस पंजीकरण कार्यालय में पंजीकृत है। एक तरह से आपने नंबर प्लेट बदल कर गैर कानूनी तरीके से वाहन का स्वामित्व बदला है। आप के विरुद्ध किसी व्यक्ति की कोई शिकायत नहीं है। केवल वाहन का स्वामित्व बदला हुआ पाया जाने या मोटर यान अधिनियम के प्रावधानों की पालना न करने के कारण आप का वाहन जब्त हुआ होगा।

प को पुलिस से पता करना चाहिए कि उक्त वाहन को किस कानून के किन उपबंधों के अन्तर्गत जब्त किया गया है। उसी से निर्धारित होगा कि वह आप को कैसे मिल सकता है।

वाहन की पहचान उस पर लिखे इंजन नम्बर और चेसिस नंबर होते हैं। यह प्रत्येक वाहन के पंजीकरण में भी लिखे होते हैं। आप की मोटरसाइकिल के इंजन नम्बर और चेसिस नं. आप के मित्र के नाम से पंजीकृत हैं। आप को अपने मित्र से उस का पंजीकरण का प्रमाण पत्र प्राप्त करना चाहिए तथा उस का एक विक्रय पत्र तथा पावर ऑफ अटार्नी अपने नाम प्राप्त करनी चाहिए। फिर पावर ऑफ अटार्नी के आधार पर आप को न्यायालय में उक्त वाहन को अपने में कब्जे में देने के लिए आवेदन करना चाहिए। रजिस्ट्रेशन और बीमा प्रमाण पत्र न्यायालय को दिखा कर तथा उन की प्रतिलिपि वहाँ प्रस्तुत कर के वाहन को अपने कब्जे में लेने का न्यायालय से आदेश प्राप्त कर उस के अनुसार वाहन को आप अपने कब्जे में ले सकते हैं। वाहन आप के कब्जे में आने के बाद तुरन्त उस का पंजीकरण अपने नाम हस्तान्तरित करवाएँ। इस सारे मामले में आप को किसी स्थानीय वकील और वाहन पंजीकरण अधिकारी के कार्यालय में वाहन रजिस्टर्ड कराने और स्थानान्तरण करवाने वाले किसी अच्छे एजेंट की मदद लेनी चाहिए।

शासकीय कर्मचारी वेतन अदा न करने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत कारण पूछें।

समस्या-

बलरामपुर, छत्तीसगढ़ से उत्तम साहू ने पूछा है-

मैं शिक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत हूँ। पति-पत्नी स्थानांतरण के तहत मेरा स्थानांतरण जिला कोरिया से जिला बलरामपुर के शासकीय प्राथमिक शाला केरा में हुआ है। स्थानांतरण पश्चात मैंने विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी कार्यालय में वेतन प्राप्त करने हेतु पासबुक की छायाप्रति जमा किये 6 माह से ज्यादा समय हो चुके है हर महीने कार्यालय के बाबुओं द्वारा शासकीय प्रक्रिया का हवाला देकर मेरा वेतन अब तक नही बनाया है। इसके लिए मुख्यकार्यपालन अधिकारी को प्रार्थना पत्र भी दिया था।  कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं।या किस तरह की लड़ाई लड़नी होगी बिना वेतन के मेरी स्थिति बहुत ख़राब है कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं?

समाधान-

सूचना का अधिकारशासकीय प्रक्रिया का केवल बहाना किया जाता है।  किसी स्थानान्तरित व्यक्ति का वेतन प्रदान करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पूर्व पदस्थापना कार्यालय से पद छोड़ने के साथ ही प्रदान कर दिए जाते हैं। आम तौर पर अवकाशों का विवरण तथा अंतिम वेतन प्रमाण पत्र पूर्व कार्यालय से नए कार्यालय को पहुँचना आवश्यक है। यदि वेतन बकाया होने पर नहीं दिया जाता है तो कार्यालय को कारण बताना चाहिए।

मेरी राय में आप को विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी से व्यक्तिगत रूप से मिल कर उन्हें अपनी शिकायत बताएँ। इस के अलावा आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर यह पूछें कि कर्तव्य पर उपस्थित होने व सभी दस्तावेज उपलब्ध करवा देने के बाद भी आप का वेतन समय पर क्यों अदा नहीं किया गया है और अब क्या कारण है कि आप का वेतन अदा नहीं किया जा रहा है। सूचना प्राप्त हो जाने पर यदि कोई आवश्यक दस्तावेज के अभाव में ऐसा हो रहा है तो उसे उपलब्ध करवाएँ।  सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन देने के पश्चात संभवतः आप के वेतन का भुगतान शीघ्र आरंभ हो जाएगा। यदि फिर भी न हो तो धारा-80 सीपीसी के अंतर्गत एक नोटिस वेतन अदा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी को दिलवाएँ। सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन का प्रारूप इसी वेबसाइट पर तलाशने से मिंल जाएगा।

विवाह विच्छेद का प्रकरण एक राज्य से दूसरे में स्थानान्तरित कराया जा सकता है।

समस्या-

ग्वालियर, मध्य प्रदेश ले चिंकी ने पूछा है –

मेरी शादी 19 फरवरी 2011 को ग्वालियर में हुई थी।  मैं ओर मेरे पति बॅंगलुर में रहते थे, शादी के 1  महीने बाद जब मैं अपने ससुराल ग्वालियर आई तो मेरे पति ने मुझे 15  दिन तक कोई कॉल नही किया और ना कोई फोन रिसीव किया।  जब सास ससुर ने कारण पूछा तो बोले कि जब तक ये जॉब नहीं करेगी मैं इसके साथ अच्छे से नहीं रहूँगा।  6  महीने तक यही चलता रहा, फिर घर वालों के समझाने पर मेरे पति में चालीस प्रतिशत परिवर्तन आया।  वो थोड़ा अच्छे से रहने लगे और बात भी करने लगे। पर अभी नवम्बर 2012 में मेरे पति ने कहा कि चलो ग्वालियर चलते हैं।  हम ग्वालियर आए। उसके बाद बोले कि चलो तुम्हारे घर से बुलावा आया है, चलो तुम्हारे घर चलते हैं।  फिर जब मैं ओर मेरे पति हमारे घर आए तो यहाँ अच्छे से सब से बात की और डिनर करके मेरे पति जाने लगे तो बोले कि तुम रुक जाओ मैं तुम्हे 2 दिन बाद लेने आ जाउंगा, तो मैंने कहा ठीक है।  लेकिन मुझे मेरे घर छोड़ने के बाद जब मैंने अपने पति को कॉल किया तो उन्होने 2 दिन कोई फोन नहीं उठाया और सास ससुर को कॉल किया तो उन्होंने भी फोन नही उठाया।  फिर मैं ने सोचा कि मैं खुद घर चली जाती हूँ।  मैं ससुराल गयी तो वहाँ घर पर ताला डाला हुआ था। और आज 3 महीने हो गये अभी तक कुछ नहीं पता कि सब कहाँ हैं।  पति ने भी बॅंगलुर में फ्लेट चेंज कर लिया है और कंपनी भी।  अभी 19 फरवरी को कोर्ट से एक नोटिस आया है जिस में लिखा है की मेरे पति ने वहाँ डाइवोर्स केस फाइल कर दिया है।  उनके घर से कोई बात करने को तैयार नहीं है।  अभी 1  महीने पहले तक मेरे पति के दादाजी कहते थे कि बेटा शांत रहो सब ठीक हो जाएगा।  अब पति की तरफ के सारे रिश्तेदार कहते हैं कि वो तुम्हें रखना नहीं चाहते।  जब मेरे घरवालो ने कारण पूछा तो नहीं बताया और ना ही मेरे सास ससुर और पति सामने आकर बात करने के लिए राज़ी हैं।  ये सब क्या है? कुछ समझ नहीं आ रहा है।  कृपया बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए?  मेरा और मेरे पति का घर भी यहीं ग्वालियर मैं हैं,  तो क्या यह केस ट्रान्सफर किया जा सकता है ओर इसकी प्रक्रिया क्या है?

समाधान-

Desertedप की पूरी समस्या पढ़ी। आप एक मनुष्य हैं या फिर एक मशीन। आप ने विवाह से ले कर आज का जो विवरण दिया है उस में कहीं भी यह तक नहीं है कि विवाह कैसे तय हुआ था? आप की विवाह से क्या अपेक्षाएँ थीं? क्या देख-सोच कर आप के परिवार और आपने यह विवाह किया था। विवाह के उपरान्त आप कितने समय अपने ससुराल में रहीं और कितने समय अपने पति के साथ बंगलुरू में? आप के पति का आप के साथ समय कैसा बीता, उन का व्यवहार क्या रहा? जितने दिन आप लोग साथ रहे आप दोनों के बीच रिश्ता कैसा रहा? क्या विवाह के पूर्व आप के पति और ससुराल वालों ने क्या यह प्रकट किया था कि आप को विवाह के बाद नौकरी करनी होगी? यह बात आप के पति ने आप को विवाह के बाद कब कही? आप की प्रतिक्रिया क्या थी? आप के पति का व्यवहार इस बात के बाद कैसा रहा? फिर लोगों के समझाने के बाद 40 प्रतिशत जो परिवर्तन आया वह क्या था? आप के पति आप को विवाह के एक माह बाद जब आप ससुराल आईं तो आप के पति आप को उस के बाद कब वापस ले गए? या कब आप उन के पास बंगलुरू गईं? इस बीच आप ग्वालियर में रही तो कितने समय अपने ससुराल में और कितने समय अपने मायके में रही? इतने सारे तथ्य आप ने अपने पेट में छुपा लिए हैं। इन सब को जाने बिना कोई आप को क्या राह सुझा सकता है? आप के पति ने आप को कुछ नहीं बताया और आप को ले कर ग्वालियर आए और आप के मायके में छोड़ गए। इस के पहले उन्हों ने अपनी कंपनी बदली और नया फ्लेट भी देख लिया। आप के सास-ससुर को अपने साथ ले जाने कहीं अन्यत्र रखने की योजना भी बना डाली। फिर आप को मायके में छोड़ कर गायब हो गए। निश्चित रूप से इस घटना से आप को अत्यन्त मानसिक संताप हुआ होगा और सदमा भी पहुँचा होगा।  विवाह से ले कर जो व्यवहार आप के पति का आप के साथ रहा उस में उस के व्यवहार से किसी तरह का शारीरिक या मानिसक कष्ट आप को हुआ होगा तो वह भी आपने नहीं लिखा है। ये सब तथ्य किसी समस्या का उपाय बताने के लिए आवश्यक हैं। खैर¡

प के पति ने किन परिस्थितियों में आप के साथ विवाह किया यह स्पष्ट नहीं है।  पर लगता है वे आप के साथ विवाह करना ही नहीं चाहते थे। कर लिया था तो आप के साथ जीवन बिताना नहीं चाहते थे। इस के कारणों में जाने का कोई अर्थ नहीं है। यह तो निश्चित है कि आप के पति आप को अपनी पत्नी के रूप में नहीं देखना चाहते हैं और आप के साथ विवाह के बंधन को समाप्त करना चाहते हैं।  इस संबंध को बनाए रखना संभव प्रतीत नहीं होता है। इस कारण से इस से छुटकारा प्राप्त करना ही बेहतर है। हालांकि इस उपाय से आप का या आप के परिवार के लोगों अभी सहमत होना संभव नहीं है।  लेकिन इस के सिवा कोई चारा नहीं है।

प को तुरन्त जीवन निर्वाह के लिए अपने पति से भरण पोषण राशि के लिए धारा -125 दंड प्रक्रिया संहिता और घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत आवेदन ग्वालियर में प्रस्तुत करने चाहिए।  यदि आप को किसी तरह की मानसिक और शारीरिक क्रूरता का सामना आप के पति और आप के पति के रिश्तेदारों की ओर से करना पड़ा है तो आप धारा 498-ए भारतीय दंड सहिंता की शिकायत ग्वालियर के उस थाना में कर सकती हैं जिस के क्षेत्र में आप का ससुराल पड़ता है।  जिन परिस्थितियों में आप के पति और सास-ससुर आप को अपने परिवार के साथ छोड़ कर गायब हुए हैं वह भी आप के साथ क्रूरता का व्यवहार करना है। आप को ये सब आवेदन तुरन्त करने चाहिए इस से उन्हें इन में अपनी प्रतिरक्षा के लिए ग्वालियर आना पड़ेगा। धारा 498-ए की शिकायत के साथ ही आप अपना स्त्री-धन जो बंगलुरू में या आप के ससुराल के घर में आप के पति व उस के परिवार के कब्जे में है उसे प्राप्त करने के लिए धारा -406 भा.दं.संहिता की शिकायत भी कर सकती हैं।

स के साथ ही साथ उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक आवेदन दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 25 के अंतर्गत आप के विरुद्ध बंगलुरू में प्रस्तुत किए गए विवाह विच्छेद के प्रकरण को ग्वालियर में स्थानान्तरित करने के लिए प्रस्तुत करना चाहिए तथा साथ में इस तरह के स्थगन आदेश के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए कि जब तक आप का प्रकरण को स्थानान्तरित करने का आवेदन का निर्णय न कर दिया जाए तब तक बंगलुरू में विवाह विच्छेद के प्रकरण की कार्यवाही को स्थगित रखा जाए।

स सब से उन्हें ग्वालियर आना पड़ेगा। तब दोनों के बीच बातचीत से या न्यायालय के माध्यम से बातचीत के माध्यम से ऐसा मार्ग तलाशा जा सकता है जिस से शीघ्र विवाह विच्छेद हो जाए तथा आप को अपना स्त्री-धन व पर्याप्त स्थाई पुनर्भरण राशि प्राप्त हो जाए। विवाह विच्छेद के उपरान्त आप तय कर सकती हैं कि आप को आगे के जीवन में क्या और कैसे करना है।

अपराधिक मामलों का स्थानान्तरण

समस्या-
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से अंबुज ने पूछा है-

क्या धारा 494, 495 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत किसी महिला के विरुद्ध चल रहे किसी अपराधिक मुकदमे को अन्य नगर में स्थानान्तरित करवाया जा सकता है?

समाधान-

प का मामला एक अपराधिक मामले का एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय को अंतरण का है। इस के लिए धारा 406, 407 व 408 दंड प्रक्रिया संहिता में उपबंध किए गए हैं। जिस न्यायालय में आप का मामला चल रहा है और जहाँ आप स्थानान्तरित करवाना चाहते हैं। यदि दोनों न्यायालय एक ही सेशन न्यायालय के अधीन हैं तो आवेदन धारा 408 में सेशन न्यायालय को प्रस्तुत किया जाएगा। यदि वे अलग अलग सेशन न्यायालय के अधीन हैं लेकिन एक ही उच्च न्यायालय के अधीन हैं तो आवेदन उच्च न्यायालय को किया जाएगा। यदि दोनों न्यायालय अलग अलग उच्च न्यायालयों के अधीन हैं तो फिर आप को यह आवेदन सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा।

कोई भी मामला उस न्यायालय में संस्थित होता है जिसे उस मामले में क्षेत्राधिकार हो। उसे किसी अन्य न्यायालय को तभी स्थानान्तरित किया जा सकता है जब कि उस न्यायालय में किसी प्रकार से उचित न्याय न मिलने की संभावना उत्पन्न हो गई हो या उस न्यायालय में पक्षपात किया जा रहा हो, या फिर पक्षकारों और साक्षियों के लिए स्थानान्तरण साधारणतः सुविधाप्रद हो अथवा न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन हो। यदि आप के उक्त मामले में आप ये तथ्य साबित कर सकते हों तो मुकदमे का स्थानान्तरण किया जा सकता है।

दंड प्रक्रिया संहिता का अध्याय 31 ‘अपराधिक मामलों का अन्तरण’ निम्न प्रकार है-

Chapter 31 – Transfer Of Criminal Cases

Section 406 – Power of Supreme Court to transfer cases and appeals

  1. Whenever it is made to appear to the Supreme Court that an order under this section is expedient for the ends of justice, it may direct that any particular case or appeal be transferred from one High Court to another High Court or from a Criminal Court subordinate to one High Court to another Criminal Court of equal or superior jurisdiction subordinate to another High Court.
  2. The Supreme Court may act under this section only on the application of the Attorney-General of India or of a partly interested, and every such application shall be made by motion, which shall, except when the applicant is the Attorney-General of India or the Advocate-General of the State, be supported by affidavit or affirmation.
  3. Where any application for the exercise of the powers conferred by this section is dismissed, the Supreme Court may, if it is of opinion that the application was frivolous or vexatious, order the applicant to pay by way of compensation to any person who has opposed the application such sum not exceeding one thousand rupees as it may consider appropriate in the circumstances of the case.

Section 407 – Power of High Court to transfer cases and appeals

  1. Whenever it is made to appear to the High Court-
    1. that a fair and impartial inquiry or trial cannot be had in any Criminal Court subordinate thereto, or
    2. that some question of law of unusual difficulty is likely to arise; or
    3. that an order under this section is required by any provision of this Code, or will tend to the general convenience of the parties or witnesses, or is expedient for the ends of justice,
      it may order-

      1. that any offence be inquired into or tried by any Court not qualified under sections 177 to 185 (both inclusive), but in other respects competent to inquire into or try such offence;
      2. that any particular case, or appeal, or class of cases or appeals, be transferred from a criminal Court subordinate to its authority to any other such Criminal Court of equal or superior jurisdiction;
      3. that any particular case be committed for trial of to a Court of Session; or
      4. that any particular case or appeal be transferred to and tried before itself.
  2. The High Court may act either on the report of the lower Court, or on the application of a party interested, or on its own initiative:Provided that no application shall lie to the High Court for transferring a case from one criminal Court to another criminal Court in the same sessions division, unless an application for such transfer has been made to the Sessions Judge and rejected by him.
  3. Every application for an order under Sub-Section (1) shall be made by motion, which shall, except when the applicant is the Advocate-General of the State, be supported by affidavit or affirmation.
  4. When such application is made by an accused person, the High Court may direct him to execute a bond, with or without sureties, for the payment of any compensation which the High Court may award under Sub-Section (7).
  5. Every accused person making such application shall give to the Public Prosecutor notice in writing of the application, together with a copy of the grounds on which it is made; and no order shall be made on the merits of the application unless at least-twenty-four hours have elapsed between the giving of such notice and the hearing of the application.
  6. Where the application is for the transfer of a case of appeal from any subordinate Court, the High Court may, if it is satisfied that it is necessary so to do in the interests of justice, order that, pending the disposal of the application, the proceedings in the subordinate Court shall be stayed, on such terms as the High Court may think fit to impose:Provided that such stay shall not affect the subordinate Court’s power of remand under section 309.
  7. Where an application for an order under Sub-Section (1) is dismissed, the High Court may, if it is of opinion that the application was frivolous or vexatious, order the applicant to pay by way of compensation to any person who has opposed the application such sum not exceeding one thousand rupees as it may consider proper in the circumstances of the case.
  8. When the High Court orders under Sub-Section (1) that a case be transferred from any Court for trial before itself, it shall observe in such trial the same procedure which that Court would have observed if the case had not been so transferred.
  9. Nothing in this section shall be deemed to affect any order of Government under section 197.

Section 408 – Power of Sessions Judge to transfer cases and appeals

  1. Whenever it is made to appear to a Sessions Judge that an order under this Sub-Section is expedient for the ends of justice, he may order that any particular case be transferred from one Criminal Court to another Criminal Court in his sessions division.
  2. The Sessions Judge may act either on the report of the lower Court, or on the application of a party interested or on his own initiative.
  3. The provisions of Sub-Sections (3), (4), (5), (6), (7),and (9) of section 407 shall apply in relation to an application to the Sessions Judge for an order under Sub-Section (1) as they apply in relation to an application to the High Court for an order under Sub-Section (1) of section 407, except that Sub-Section (7) of that section shall so apply as if for the words “one thousand” rupees occurring therein, the words “two hundred and fifty rupees” were substituted.

Section 409 – Withdrawal of cases and appeals by Sessions Judges

  1. A Sessions Judge may withdraw any case or appeal from, or recall any case or appeal which he has made over to, any Assistant Sessions Judge or Chief Judicial Magistrate subordinate to him.
  2. At any time before the trial of the case or the hearing of the appeal has commenced before the Additional Sessions Judge, as Sessions Judge may recall any case or appeal which he has made over to any Additional Sessions Judge.
  3. Where a Sessions Judge withdraws or recalls a case or appeal under Sub-Section(1) or Sub-Section (2) he may either try the case in his own Court or hear the appeal himself, or make it over in accordance with the provisions of this Code to another Court for trial or hearing, as the case may be.

Section 410 – Withdrawal of cases by Judicial Magistrates

  1. Any Chief Judicial Magistrate may withdraw any case from, or recall any case which he has made over to, any Magistrate subordinate to him, and may inquire into or try such case himself, or refer it for inquiry or trial to any other such Magistrate competent to inquire into or try the same.
  2. Any Judicial Magistrate may recall any case made over by him under Sub-Section (2) of section 192 to any other Magistrate and may require into or try such cases himself.

Section 411 – Making over or withdrawal of cases by Executive Magistrates

Any District Magistrate or Sub-divisional Magistrate may-

  1. make over, for disposal, any proceeding which has been started before him, to any Magistrate subordinate to him;
  2. withdraw any case from, or recall any case which he has made over to, any Magistrate subordinate to him, and dispose of such proceeding himself or refer it for disposal to any other Magistrate.

Section 412 – Reasons to be recorded

A Sessions Judge or Magistrate making an order under section 408, section 409, section 410 or section 411 shall record his reasons for making it.

औद्योगिक विवाद को स्थानान्तरित करवाने के लिए रिट याचिका प्रस्तुत की जा सकती है

सभी पाठकों और मित्रों का विधि और न्याय प्रणाली पर प्रथम हिन्दी जालस्थल तीसरा खंबा पर स्वागत है

सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ !

नया वर्ष सभी के लिए नयी खुशियाँ लाए !!

समस्या-

मैं एक समाचार पत्र में सीनियर एकजीक्यूटिव के पद पर सेवारत हूँ। मेरा कार्य विज्ञापन विभाग में आने वाले विज्ञापन आदेशों को प्राप्त करना आदि है। मुख्यतः मेरा काम लिपिकीय है। मुझे मेरी ट्रेड यूनियन गतिविधियों के कारण मेरे नियोजक ने मेरठ से पटना स्थानान्तरित कर दिया है। इस का विवाद मेरी यूनियन ने श्रम विभाग उत्तर प्रदेश के मेरठ कार्यालय में उठाया था। समझौता कार्यवाही असफल हो जाने पर रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रेषित की गई थी। इस पर राज्य सरकार ने मेरे स्थानान्तरण का विवाद श्रम न्यायालय लखनऊ को न्याय निर्णयन के लिए संप्रेषित कर दिया। जब कि मेरठ में भी उत्तर प्रदेश सरकार का श्रम न्यायालय मौजूद है। मेरी यूनियन राज्य सरकार को उक्त विवाद को श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करने के लिए आवेदन कर दिया है, तथा तीन बार उस का स्मरण पत्र लिख चुकी है। लेकिन राज्य सरकार कोई निर्णय नहीं कर रही है। मुझे अपना विवाद श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करवाने के लिए क्या करना चाहिए?

-दिनेश कुमार, मेरठ उत्तर प्रदेश

सलाह-

राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह राज्य में उत्पन्न ऐसे औद्योगिक विवाद को जिस पर उसे क्षेत्राधिकार प्राप्त है। राज्य के किसी भी श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण को न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित कर सकती है। लेकिन राज्य सरकार का यह अधिकार न्यायोचित होना चाहिए। आप विवाद के पूर्व मेरठ में नियोजित थे तथा मेरठ में आप के नियोजक का कार्यालय है। विवाद को मेरठ के श्रम विभाग के मेरठ कार्यालय में ही उठाया गया था और समझौता कार्यवाही भी वहीं संपन्न हुई थी। मेरठ में राज्य सरकार का श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण होने के कारण राज्य सरकार के लिए न्यायोचित यही होता कि वह आप के औद्योगिक विवाद को मेरठ के श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण को ही न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित करती। इस संदर्भ में राज्य सरकार के इस निर्णय को न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह आप की यूनियन के आवेदन पर उक्त विवाद को लखनऊ के न्यायालय से श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ को स्थानान्तरित कर दे।

मेरी राय में आप को राज्य के सचिव श्रम विभाग को व्यक्तिगत रूप से मिल कर अपनी बात कहनी चाहिए और उन्हें इस बात से संतुष्ट करना चाहिए कि आप का विवाद मेरठ स्थानान्तरित कर दिया जाए। व्यक्तिगत रूप से मिलने से यह काम हो जाएगा। यदि इस पर भी राज्य सरकार आप के विवाद को मेरठ स्थानान्तरित नहीं करती है तो आप न्याय प्राप्ति के लिए एक पंजीकृत नोटिस सचिव श्रम विभाग राज्य सरकार उत्तर प्रदेश को भिजवाएँ जिस में आप के स्थानान्तरण आवेदन पर निर्धारित समय (15 दिन) में निर्णय करने की बात कहें और यह अंकित करें कि इस अवधि में आप के आवेदन पर मामले को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ स्थानान्तरित नहीं किया गया तो आप उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करेंगे।

दि आप के इस नोटिस की अवधि के समाप्त होने तक भी आप का विवाद स्थानान्तरित नहीं किया जाता है तो आप को उच्च न्यायालय लखनऊ बैंच में अथवा उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए। उच्च न्यायालय आप के विवाद को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण में स्थानान्तरित करने का आदेश राज्य सरकार को दे सकता है।

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