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वकील का चुनाव ठीक से करें।

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

रविन्द्र कुमार ने दिल्ली से पूछा है-

मेरे छोटे भाई का विवाह 2012 में हुआ। वो और उसकी पत्नी हमारे साथ 3 महीने रहे फिर भाई की पत्नी को को शक होने लगा की उसके सम्बन्ध भाभी के साथ है, जिस कारण मेने भाई को अलग कर दिया और अख़बार में भी निकलवा दिया कि हमारा उनसे कोई लेने देना नही है। वो तक़रीबन 3 साल अलग किराये पर रहे। दोनों का आपस में कोई विवाद हो गया और 498, 406 आईपीसी  में प्रथम सूचना रिपोर्ट हुई। अभी ये केस कोर्ट में नही लगा है। पर स्त्री धन वापसी का चल रहा है और दोनों केसों में मेरे पूरे परिवार का नाम है। सामान कोर्ट के आदेश पर वापस हो गया है। पर वो कहते हैं कि हमारा सामान लड़के के परिवार के पास है जो कि दिया ही नही गया। उन ने झूठे बिल बना के जाँच अदिकारी को दिए। विवाह में कोई वीडियो फोटो नहीं हुआ। वो और हम दोनों गरीब परिवार हैं। फिर भी तक़रीबन 10 लाख का स्त्री धन लिखा रखा है जो कि दिया ही नहीं गया।  अब मैं क्या करूँ समझ नहीं आता? हमारी अग्रिम जमानत हो चुकी है। क्या मुझे और मेरे परिवार को अरेस्ट किया जा सकता है? अगर हाँ तो मुझे क्या करना चाहिए? जो लिया ही नहीं वापस कैसे करूँ कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

ति-पत्नी में विवाद हो जाने पर 498 ए व 406 आईपीसी की शिकायत दर्ज कराना आम बात हो गयी है। ऐसी शिकायतों में कई बार केवल 10 प्रतिशत सचाई होती है। लेकिन शिकायत की है और प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होगी तो उस का अन्वेषण पुलिस को करना पड़ेगा। पुलिस अन्वेषण के दौरान जान जाती है कि कितनी सचाई है और कितनी नहीं। आम तौर पर केवल पति के विरुद्ध ऐसा मुकदमा प्रमाणित दिखाई देता है और आरोप पत्र भी उसी के विरुद्ध प्रस्तुत होता है। आप को अभी चाहिए कि आप पुलिस अन्वेषण में पूरा सहयोग करें और पुलिस को आरोप पत्र प्रस्तुत करने दें। पुलिस भी नहीं चाहती कि जिस मुकदमे में वह आरोप पत्र प्रस्तुत करे उस में अभियुक्त बरी हो जाए।

आप ने खुद लिखा है कि आप की अग्रिम जमानत हो चुकी है। इस का अर्थ है कि पुलिस आप को गिरफ्तार नहीं करेगी। बस जिस दिन आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी उस की सूचना आप को देगी और आप को न्यायालय में उपस्थित हो कर जमानत करानी पड़ेगी। उस के बाद मुकदमा चलता रहेगा।

झूठे आरोपों को साबित करना आसान नहीं होता। यदि आरोप झूठे हैं तो पुलिस ही आरोप पत्र सब के विरुद्ध प्रस्तुत नहीं करेगी। यदि पुलिस ने आरोप पत्र प्रस्तुत कर भी दिया तो तो भी अभियोजन पक्ष मुकदमे को साबित नहीं कर पाएगा तो सभी लोग बरी हो सकते हैं।

आप की जरूरत सिर्फ इतनी है कि आप कोई वकील ऐसा करें जो आप के मुकदमे की पैरवी मेहनत से करे, मुकदमे पर पूरा ध्यान दे। यदि वकील ठीक हुआ तो यह झूठा मुकदमा समाप्त हो जाएगा। इस लिए आप वकील का चुनाव करने में पूरा ध्यान दें। जब भी आप को लगे कि आप का वकील लापरवाही कर रहा है या मेहनत नहीं कर रहा है तो वकील बदल लें।

झूठ तब तक ही असर दिखाता है जब तक सत्य को मजबूती के साथ साबित नहीं कर दिया जाता

rp_law-suit.jpgसमस्या-

प्रकाश पुरोहित ने सूरत, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

म तीन भाई हैं। मेरी शादी 2005 में, दूसरे भाई कि 2013 में और सबसे छोटे भाई की शादी फरवरी 2015 में हुई है। सब से छोटे भाई की पत्नी को जन्म से ही दिल के वॉल्व की बीमारी है, यह बात छुपा कर उस के सास ससुर ने मेरे भाई और मेरे परिवार के साथ धोखाधड़ी की है। सितम्बर 2015 में मेरे भाई को इस बीमारी का पता चला तो हम सब को बताया। 14 अक्टूबर को उसके ससुर जी हमारे घर आकर कुलदेवी मंदिर जाने के बहाने से अपनी पुत्री को ले गये! 4 नवंबर के अखबार में खबर आई कि उसने मेरे भाई और परिवार पे 498ए का केस कर दिया है। अब हमे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के भाई को तुरन्त बिना कोई नोटिस दिए धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम में उस की पत्नी को लाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर उस में न्यायालय से नोटिस जारी कराना चाहिए।

छोटे भाई की पत्नी को दिल के वाल्व की जन्म से बीमारी है यह एक तथ्य है जिसे छुपाया नहीं जा सकता। मुकदमा दर्ज हुआ है तो अन्वेषण अधिकारी आप से भी पूछताछ करेंगे। आप सारी बात उन्हें बताइए और तथ्यों को साबित करने के लिए गवाहों के बयान कराइए। इस से भी पुलिस न मानती लगे तो तुरन्त 438 दंड प्रक्रिया संहिता में अपनी अग्रिम जमानत कराने का प्रयत्न करिए।

दि धारा 438ए का मुकदमा फिर भी चलता है तो आप उसे लड़िए और तथ्यों को मजबूत सबूतों के साथ रखिए। सत्य तो सत्य रहता है। वह साबित हो जाता है। लेकिन झूठ तब तक अपना असर दिखाता है जब तक कि मजबूती से सत्य को साबित नहीं किया जाता। इस कारण आप को इस लड़ाई को लड़ने में सत्य को मजबूती के साथ साबित करना होगा।

498ए में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने या उस की धमकी से परेशान होने या घबराने की जरूरत नहीं।

two wives one husbandसमस्या-1

रवि ने द्वारका, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई के विवाह को 4 साल हो गए है वो अपनी पत्नी के साथ 3 साल से हम से अलग रहता है। 1 महीना पहले पति पत्नी में झगड़ा हो गया। उस की पत्नी केस कर दिया, जिस में हमें भी आरोपी बनाया गया है कि हम ने 3 साल पहले उसके साथ मरपीट की और दहेज़ के लिए घर से निकाल दिया। उस का पति उसे लेजाने को तैयार है पर वो कहती है कि मैं सास ससुर के घर में ही जाउंगी पति के साथ किराए के मकान में नहीं। मेरे माता पिता दोनों को घर में नहीं रखना चाहते अभी उनके कोई बच्चा नहीं है। अब हम क्या करें? क्या हमारे खिलाफ कोई क़ानूनी केस बनता है? जब कि हमारे साथ दोनों में से कोई भी नहीं रहता। अगर बनता है तो अब क्या करें?

समस्या- 2

विकास ने चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 14 फरवरी 2014 को हुई। उस के बाद मेरी पत्नी बस चार माह मेरे साथ रही फिर वह चली गई। ये बोली कि उस के एक्जाम हैं अब जब मैं उसे लेने गया तो उस के पिताजी ने मुझे कफी कुछ गलत बोला और मुझे माँ व भाई से दूर रहने के लिए बोला। जब वह अपनी लड़की को मेरे साथ बेज देंगे। अब एक साल बाद 498ए का मुकदमा करने की धमकियाँ दे रही है और मेरी बहन जो 5 वर्ष से विवाहित है उसे व जीजाजी का भी नाम उस में लिखवा देने की धमकियाँ दे रही है। मैं क्या करूँ?

समाधान-

प दोनों की समस्याएँ एक जैसी हैं। असल में दोनों समस्याएँ पत्नी-पती और पति के रिश्तेदारों के बीच सामंजस्य न बैठने की समस्या है और समाज की एक आम समस्या है। यह हर उस परिवार में आती है। जिस में सब के सब ये सोचते हैं कि उन्हें नहीं अपितु दूसरे को उस के हिसाब से सामंजस्य बिठाना चाहिए। पहले छोटी छोटी बातें होने लगती हैं। उस में हर कोई दूसरे को दोष देता रहता है। फिर वे ही बड़ी बनने लगती हैं और अन्त में यह परिणाम सामने आता है।

धारा 498ए से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। इस तरह के मामलों में केन्द्र सरकार और उच्चतम न्यायालय ने जो निर्देश दे रखे हैं उन में पति के सिवा अन्य लोगों को गलत रीति से अभियुक्त बनाया जाना अब संभव नहीं रहा है। पुलिस एक बार प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पति और उस के रिश्तेदारों से पूछताछ करती है और जब लगता है कि 497ए का ठोस मामला बन रहा है तभी उसे आगे चलाती है। जो मामले बनते हैं उन में भी अधिकांश पति के विरुद्ध ही आरोप पत्र प्रस्तुत हो रहा है। इन दोनों मामलों में पति-पत्नी अलग रह रहे थे। इस कारण यदि पति और रिश्तेदारों की ओर से इस बात के सबूत और गवाह पुलिस के सामने प्रस्तुत किए गए तो पति के सिवा अन्य जिन लोगों के नामजद रिपोर्ट कराई गई है उन के विरुद्ध मामला नहीं बनना चाहिए। फिर भी आप को लगता है कि मामला बनाया जा सकता है तो अग्रिम जमानत के लिए आवेदन प्रस्तुत कर अग्रिम जमानत प्राप्त की जा सकती है।

दि इस तरह का मामला दर्ज कराने की धमकी ही दी जा रही है तो उस मामले में आप को चाहिए कि धमकी दिए जाने के सबूत इकट्ठे करें और पुलिस को रिपोर्ट करें। यदि पुलिस कोई कार्यवाही न करे तो सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत करें। यदि आप की रिपोर्ट या परिवाद पर कोई कार्यवाही नहीं भी होगी तब भी रिपोर्ट या परिवाद एक सबूत के तौर पर आपके बचाव में काम आ सकेंगे।

क बार 498ए में आरोप पत्र प्रस्तुत हो जाए तो उस के बाद किसी तरह की बड़ी परेशानी नहीं होती है। अब यदि पत्नी ने मुकदमा किया है तो ऐसा करना उस का अधिकार है। लेकिन यदि उस में कोई तथ्य नहीं हैं तो ये सब मामले न्यायालय से निरस्त भी हो जाते हैं। भारत में न्यायालयों की संख्या जरूरत की चौथाई से भी कम होने के कारण यहाँ किसकी भी मामले में निर्णय जल्दी नहीं होते। कई बरस लग जाते हैं, इस कारण होने वाली परेशानी से बचना संभव नहीं है। उस का तो एक ही इलाज है कि दोनों पक्ष आपस में बैठें और बातचीत करें। यदि लगता है कि विवाह आगे चल सकता है तो वैसा और नहीं चल सकता है तो सहमति से विवाह विच्छेद की राह निकाली जा सकती है। पर इस तरह पत्नी द्वारा मुकदमा कर देने या उस की धमकी देने मात्र से घबरा जाना ही इस तरह के मामलों को तरजीह देता है। या तो मुसीबत खुद बुलाई हुई होती है या फिर वह अचानक टपक पड़ती है। दोनों ही स्थितियों में घबराहट से कुछ नहीं होता है। समझ बूझ कर शान्त चित्त से उस का मुकाबला करना ही उस के हल की दिशा में सब से अच्छा कदम होता है।

क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत करें.

divorceसमस्या-

समीर गुप्ता ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेराविवाह 02-03-2008 को हुआ था। शादी के बाद मेरी पत्नी केवल पंद्रह दिन हीमेरे साथ थी, और शुरु से ही योन संबंध बनाने के लिये आनाकानी करती थी कारणपुछने पर कहती थी कि “मैं धार्मिक स्वभाव की हूं, यह सब अच्छा नहीं लगता, मैतो साध्वी बनना चाहती थी”।इसके बाद मेरी पत्नी मायके चली गई और दो महिनेबाद वह मेरे साथ रहने आई तो गर्भवती होने की जानकारी मिलने पर वह फिर सेमायके चली गई। मायके में ही उसने एक पुत्री को जन्म दिया और लगातार एक सालतक मायके मे रहने के बाद एक महिने के लिये ही मेरे साथ रही। उस के बाद से वह मायकेमें ही रहकर क्रमशः B.Ed., M.Sc. एवं PGDCA की नियमित पढ़ाई कर रही है।पढ़ाई के बाद उसका इरादा मायके में रहकर नौकरी करने का है| इस बीच वह सालमें एक बार केवल एक या दो हफ्ते के लिये मेरी पुत्री को मायके में छोड़कर मेरेसाथ रहने आ जाती है। परंतु दाम्पत्य संबंध बनाने में आनाकानी करती है। इसबारे में जब भी मैं ससुराल वालों से बात करता हूं वो लोग मेरे साथदुर्व्यवहार करते हैं और जिंदगी भर तुमको ऐसे ही रखेंगे कहते हैं। तलाकके लिये कहने पर मुझे व मेरे परिवार वालों को झूठा आरोप लगाकर दहेजउत्पीड़न अपराध 498(A) में फंसाने की धमकी देते हैं। वह मुझे तलाक भी नहींदेना चाहती और अपनी मां को भी छोड़ना नहीं चाहती। साल में केवल एक-दो हफ्ते हीमेरे साथ रहती है। मैं केन्द्रीय शासन के सार्वजनिक उपक्रम मे उच्चअधिकारी के पद पर हूं, अतः मेरी नौकरी में गलत प्रभाव ना पड़े एवं लोकलाज केभय से मैं अभी तक चुप हूं, मुझे तालाक कैसे मिल सकता है?कृपया विस्तृतमार्गदर्शन करें।

समाधान-

प अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद चाहते हैं। जिन परिस्थितियों का आप ने उल्लेख किया है उन में आप का इस के लिए सोचना गलत भी नहीं लगता। किसी भी हिन्दू विवाह का विच्छेद केवल हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 में वर्णित आधारों पर ही हो सकता है। आप को स्वयं देखना होगा कि उन में क्या क्या आधार आप को उपलब्ध हैं। इस के अतिरिक्त धारा-13 बी के अन्तर्गता सहमति से विवाह विच्छेद हो सकता है, पर इस के लिए आप की पत्नी और उस के परिवार के लोग तैयार नहीं हैं। वैसी अवस्था में आप को खुद ही विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करना होगा।

प ने जो परिस्थितियाँ बताई हैं उन में आप के साथ लगातार न रहना और यौन संबंध स्थापित करने के लिए इन्कार करना क्रूरता है। यदि आप यह साबित कर सके कि आप की पत्नी वर्ष में केवल एक सप्ताह के लिए आप के साथ रहती है उस में भी वह यौन संबंध से इन्कार करती है तो आप क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद प्राप्त कर सकते हैं।

स के अतिरिक्त यदि आप की पत्नी एक वर्ष से अधिक समय से आप को अपने से अलग रखती है तो आप इस आधार पर भी विवाह विच्छेद प्राप्त कर सकती है। वर्ष में एक सप्ताह के लिए आप के साथ आ कर रहने का कारण भी यही हो सकता है कि वह एक वर्ष का अलगाव पूरा नहीं होने देना चाहती है। इस कारण से आप को क्रूरता के आधार पर ही विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करना होगा।

त्नी और उस के मायके के लोग आप को धमकी देते हैं कि आप ने कोई कार्यवाही की तो वह धारा 498-ए और 106 आईपीसी में आप के विरुद्ध कार्यवाही करेगी। इस धमकी से डर कर अपना जीवन खराब करना कतई उचित नहीं है। आप इन धमकियों के तथ्य को अच्छी तरह अपने आवेदन में अंकित करते हुए न्यायालय में प्रस्तुत करते हैं। इस आवेदन की न्यायालय से भेजी गई सूचना मिलने पर यदि आप की पत्नी कोई कार्यवाही करती भी है तो उस में आप स्पष्ट रूप से अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं कि यह पहले धमकी देती थी और अब विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत करने के कारण ही उस ने मिथ्या अभियोजन चलाया है। यदि फिर भी आप के विरुद्ध कोई अपराधिक प्रकरण संस्थित हो जाए तो आप अपनी अग्रिम जमानत कराएँ और मुकदमे का सामना करें।

विवाहेतर शारीरिक संबंध साबित कर सकते हों तो इस आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें।

divorceसमस्या-
रायपुर, छत्तीसगढ़ से सुजीत कुमार मिश्रा ने पूछा है-

मेरी चाची ने मुझे और मेरे चाचा को 498 के तहत झूठे प्रकरण में फँसाया है। चाची के नाजायज संबंध किसी अन्य व्यक्ति के साथ हैं, जिसका पर्याप्त सबूत है।  उस ने पहले स्वयं इस बात को स्वीकारा स्थानीय लोग हमारे साथ हैं। उसके द्वारा अपने प्रेमी को लिखा गया पत्र मेरे पास है। दोनों की शादी 25 वर्ष पहले 1988-1989 में हुई थी। अब चाची के परिवार वालों से हम तंग आ गये। बार बार धमकी व मानसिंक प्रताडना से तलाक हेतु उपाय बताएँ।  क्या नाजायज सबंध के बाद भी भरण पोषण देना होगा। मैं ने पहले से 10-08-2013 को राष्ट्रीय मानवाधिकार, महिला आयोग, राज्य महिला आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग में आवेदन कर सूचित किया है। इस के द्वारा 20-10-2013 को बाद में महिला थाने में हमारे विरूद्ध रिपोर्ट दर्ज कराई गयी है। उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प के विरुद्ध धारा 498-ए के अन्तर्गत रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। इस में गिरफ्तारी संभव है। सब से पहला काम तो आप यह करें कि अपने सारे सबूतों की फोटो प्रतियाँ तथा आप के साथ के स्थानीय लगों जिन के सामने चाची ने अवैध संबंध स्वीकार किए हैं उन के शपथ पत्र तैयार करवा कर उन की मदद से सत्र न्यायालय में धारा 438 दं.प्र.संहिता के अन्तर्गत अग्रिम जमानत का आवेदन प्रस्तुत कर अपनी और अपने चाचा की जमानत का आदेश प्राप्त करें। इस के बाद सारे सबूत पुलिस को प्रस्तुत करें तथा अपने पक्ष के व्यक्तियों के बयान करवाएँ। कोशिश करें कि पुलिस आप के विरुद्ध मुकदमे में आरोप पत्र प्रस्तुत न कर केवल इस बात की रिपोर्ट करे कि आप दोनों के विरुद्ध इस तरह का कोई मामला नहीं बनता है। फिर भी यदि आप दोनों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत होता है तो उस में किसी अच्छे वकील के माध्यम से मुकदमा लड़ें। आप दोनों निर्दोष सिद्ध हो सकते हैं।

दि आप की चाची के विवाह के उपरान्त किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक संबंध होना आप साबित कर सकते हैं तो आप के चाचा इसी आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन दे सकते हैं और इस आधार पर तलाक हो सकता है। लेकिन तलाक के अन्य आधार भी उपलब्ध हों तो उन का चाचा के आवेदन में वर्णन करते हुए उन्हें भी आधार बनाएँ।

प ने राष्ट्रीय मानवाधिकार, महिला आयोग, राज्य महिला आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग को जो आवेदन प्रस्तुत किए हैं उन पर कोई कार्यवाही नहीं होगी क्यों कि ये सब उन के कामकाज से संबंधित नहीं हैं। वे आवेदन सिर्फ यही साबित कर सकते हैं कि आप की शिकायत के कारण ही आप पर झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया है।

रण पोषण एक बिलकुल अलग मामला है। जब तक वह पत्नी है तब तक वह भरण पोषण मांग सकती है और वह देना होगा। लेकिन विवाह विच्छेद के समय परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय यह तय करेगा कि पत्नी को भरण पोषण मिलना चाहिए या नहीं।

पत्नी से खुद या मध्यस्थ के माध्यम से बात करें, राह निकल सकती है।

divorce hinduसमस्या-

ब्यावर, राजस्थान से सांवेरनाथ ने पूछा है-

मैं एक गरीब परिवार का सदस्य हूँ। मेरे माता पिता अनपढ़ हैं, मेरी शादी 17.05.2011 को हुई। शादी के बाद मेरी पत्नी एक महीना मेरे पास रही। तब मैं सूरत में जॉब करता था, मेरी पत्नी भी मेरे पास थी।  एक दिन घर में आटा ख़त्म हो गया तो मैं ने मेरी पत्नी से आटा पीसने को कहा, तो वो बोली की मेरे को आता पीसने में शर्म आती है।  वो बीए तक पढ़ी हुई है और मे एम.ए. पढ़ा हूँ।  इतनी से बात को लेकर उस ने अपने पापा को फ़ोन किया जो की आर्मी के रिटायर्ड फोजी हैं। उस के पापा ने मुझे धमकाया कि तुम मेरी बेटी को तुरंत लेकर आ जाओ।  मैं लेकर गया तो उन्हों ने बोला कि तुम 3 महीना बाद लेने आ जाना।  उसके दो महीना बाद ही उन्हों ने 498 का मुक़दमा लगा दिया और हमें रोड पर लाने की धमकी दी। जब से केस लगा है तब से मेरा जॉब बंद हो गया है और उन्होने 125 के तहत मेरी होल्सेल की दुकान बताकर मंथली 20000 रुपयों की माँग की है। जो मरा पूरा परिवार भी नहीं कमाता है।  अब मेरी पत्नी ना तो आना चाहती है और न ही कोई फैसला करना चाहती है।  अब मैं दूसरी शादी भी नहीं कर सकता।  और तारीखों की वजह से काम भी नहीं कर पा रहा हूँ। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

मुझे लगता है कि आप की पत्नी या तो आप के साथ नहीं रहना चाहती है या फिर कुछ शर्तों के साथ। मामला तो पत्नी से बार बार बात करने पर ही सुलझेगा। आप पत्नी से बात करने की कोशिश कीजिए। अपनी नहीं उस की शर्तें जानने का प्रयत्न करिए। एक बार नहीं कई बार। उस से मामला सुलझ सकता है।

दि ऐसे बात न बने तो पत्नी और आप के बीच मध्यस्थता से भी बात बन सकती है। आप को चाहिए कि आप तुरन्त धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम में दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना का आवेदन प्रस्तुत करें। इस आवेदन की सुनवाई में न्यायालय अनिवार्य रूप से आप दोनों के बीच मध्यस्थता कराएगा। मध्यस्थता के लिए आप जिला न्यायाधीश के यहाँ स्थापित मध्यस्थता केन्द्र में भी आवेदन कर सकते हैं।

498-अ और धारा 125 के मुकदमों से घबराने की जरूरत नहीं है। फैसला तो जो सच होगा उसी के अनुसार होगा। तारीख पेशी पर तो जाना होगा। कोशिश करें को दोनों –  तीनों मुकदमों की तारीखें एक ही दिन पड़ें। इस से आप की समय की बचत होगी। धारा 125 में कोई कितना भी भरणपोषण मांग सकता है। लेकिन उस में आप की आय और पारिवारिक सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखा जाएगा।

सहमति से विवाह विच्छेद ही सही उपाय है, उस के लिए प्रयत्न करें।

समस्या-

बरवाला, जिला-हिसार हरियाणा से हेमन्त ने पूछा है –

मेरी शादी २२-०४-२००४ को राजस्थान के पिलानी में हुई थी।  मेरी पत्नी घर आते ही मेरे परिवार से ईर्ष्या करने लगी। परिवार में माता पिता भाई बहन हम चार सदस्य हैँ। सबसे पहले वो मेरी बहन को परेशान करने लगी।  हमने बहन की शादी २२-०२-२००८ को पंजाब में कर दी।  उसके बाद वह मेरी माँ से चिढ़ने लगी। क्योंकि मेरी माँ शुरू से ही मानसिक बीमार है।  मैंने पत्नी को उससे अलग रखने की कोशिश की।  हमारा घर बड़ा है। उस में  दो पोर्शन हैं।  एक में हम और एक में मम्मी पापा रहने लगे।  परन्तु मेरी पत्नी को अब मेरे पापा से चिढ़ पैदा हो गई।  उसने घर में बहुत झगडा पहले भी किया था। जिससे वो रुष्ट होकर मायके चली गई थी।  इस दौरान पंचायत भी हुई थी।  इसके बाद भी वह मायके चली गयी थी।  मैं उसको किसी तरह मना के ले आया था।  परन्तु वो अब फिर से चली गई है।  उसका कहना है कि आप कहीं दूसरी जगह रह लो।  परन्तु मैं चाहता हूँ की माँ बाप के और परिवार के बीच रहूँ।  वो मुझे अलग रखकर मेरे बूढ़े माँ बाप से दूर रखना चाहती है।  जबकि मेरी माँ मानसिक बीमार है।  जब मेरी शादी हुई थी तो वह बीए पास थी और मैं १०+२ था।  हम ने उसको यहाँ एमए भी करवाई। इसके बाद हम उसे पढ़ाना नहीं चाहते थे।  हम चाहते थे कि वो घर को संभाल ले क्योंकि घर को संभालने वाला कोई नहीं था।  लेकिन वो इतनी जिद्दी थी कि हमारी मर्जी के बिना वह अपने मायके वालों से कहकर बीएड भी कर के मानी। लेकिन फिर भी वो घर में झगडा करती थी और अपने मायके चली जाती थी। अंत में हमने परेशान होकर पहले धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम का नोटिस दिया। लेकिन उन्होंने नोटिस का जवाब नोटिस से दिया कि मेरी पत्नी को मेरी मम्मी से प्रोब्लम है और मुझे अलग घर में रखे तो ही मैं रहूंगी।  फिर मैंने जिला संरक्षण अधिकारी को चिट्ठी लिखी।  अधिकारी ने मेरे ससुराल वालों को कई बार बुलाया परन्तु वो नहीं आये। ४ महीने तक मैंने प्रोटेक्शन ऑफिस के धक्के खाए और अंत में मैंने तलाक का केस १८-०८-२०१२ को डाल दिया।  केस की पहली तारीख ११-१०-२०१२ को वो लोग नहीं आये।  उन्होंने कोर्ट का कागज लेने से मना कर दिया था।  जज साहब ने राजस्थान पत्रिका में नोटिस निकलवाने को कहा और आगे तारीख रख दी। वहाँ से मेरे ससुराल वालों ने १६-११-२०१२ को मुझ पर दहेज का केस कार दिया।  उन्होंने धारा ४९८ ए , ४०६ और ३२३ लगायी है।  उसने ५ लोगों के नाम लिखवाए हैं। जिसमे मेरा, मेरे पापा का, चाचा का, चाचा के लड़के का, जो कि हमारे से ५ किलोमीटर दूर गांव में रहते है और मेरी बहन का जो पंजाब में रहती है नाम है। हमें तफ्तीश के लिए पिलानी थाना में बुलाया गया था। जहाँ हम गए थे और लोगों को भी साथ में ले कर गए थे। जिन्होंने अपने बयान पुलिस को दे दिए थे।  अब आप मुझे बताइए की इसमें आगे क्या हो सकता है।  मेरी बहन के ससुराल वाले कह रहे हैं कि हम उन लोगों पर मानहानि का केस करेंगे।  क्या ये संभव है। मेरी पत्नी ने मुझ पर झूठा केस किया है तो मैं उसके विपरीत कुछ कर सकता हूँ?

समाधान-

ब भी कभी ऐसा लगता है कि पत्नी के प्रति पति या उस के संबंधियों द्वारा शारीरिक या मानसिक क्रूरता का व्यवहार किया गया है तो धारा 498 ए का अपराध होता है।  लेकिन यदि पत्नी पति के या उस के संबंधियों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करे तो कोई अपराध नहीं होता। वह एक दुष्कृत्य जरूर होता है जो दंडनीय नहीं है लेकिन ऐसा तथ्य है जिस के आधार पर विवाह विच्छेद हो सकता है। लगभग सभी भारतीय पति पुरुष प्रधानता की मानसिकता से ग्रस्त हैं। ऐसे में वे ऐसा व्यवहार कर बैठते हैं जो क्रूरतापूर्ण परिभाषित होता है। यदि पत्नी अड़ ही जाए तो 498-ए का मुकदमा बनता है और साबित भी हो जाता है।

विवाह के समय आप की पत्नी स्नातक थी, आप ने उसे स्नातकोत्तर होने दिया और फिर उस ने आप से छुपा कर अपने मायके जा कर बी.एड. कर लिया। जिस का स्पष्ट निहितार्थ है कि वह आरंभ से ही नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। एक ऐसा जीवन चाहती थी जो आप के व आप के परिवार के साथ रहते संभव नहीं। वह नहीं चाहती कि वह आप की मानसिक रूप से रुग्ण माँ की सेवा करे। उस ने आप को अपने परिवार से अलग करना चाहा जो आप नहीं चाहते।  आप चाहते हैं कि वह नौकरी न करे और आप के घर को संभाले। दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े हैं।  आप अपने माता-पिता को देखते हैं जो आप की जिम्मेदारी है। संभवतः वह अपने और अपने बच्चों के भविष्य को देखती है। यही आप के मध्य विवाद का विषय है।

प दोनों के मध्य समझौते की एक ही राह है कि दोनों में से कोई अपनी बात से हट जाए। वह अपनी राह पर इतना अधिक बढ़ चुकी है कि वहाँ से लौटना कठिन प्रतीत होता है।  लगता है आप को ही पत्नी की बात माननी होगी अन्यथा कोई समझौता संभव नहीं है।  विवाह विच्छेद निश्चित लगता है।  ऐसी स्थिति में समझदारी यही है कि पत्नी और उस के परिवार वालों से बात की जाए कि वह किन शर्तों पर समझौता करने को तैयार है। यदि वे मान जाते हैं तो समझौता कर मुकदमों को समाप्त कीजिए और दोनों अपनी अपनी राह पर चलिए। यदि विवाह विच्छेद होता है तो आप को स्त्री-धन और स्थाई पुनर्भरण की राशि पत्नी को देनी होगी। उस का प्रस्ताव रखिए समझौता संपन्न हो सकता है। यही एक मात्र राह आप के मामले में दिखाई पड़ती है।

प की बहिन के ससुराल वाले मानहानि के मुकदमे के लिए कह रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि मानहानि का मुकदमा करने से कोई लाभ होगा। यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट में उन का नाम है और पुलिस उन के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत नहीं करती है तो वे मानहानि का मुकदमा कर सकते

अपराधिक मुकदमे में गवाह उपस्थित न होने पर क्या होगा ?

समस्या-

क लड़की से मेरी केवल बातचीत होती थी।  17 जनवरी 2010 को मेरी अनुपस्थिति में वह अचानक मेरे घर पर आई और कहा कि मैं ने उस के साथ शादी की है।  मेरी पत्नी में और उस के बीच झगड़ा हुआ और आपस में मारपीट हो गई। उस लड़की ने थाने में जा कर मामला दर्ज कराया तो पुलिस ने 498-ए का मुकदमा बना दिया जिस में घर के सभी लोगों का नाम लिखा दिया।  किसी तरह उस से समझौता किया तो उस आधार पर हमारी गिरफ्तारी पूर्व जमानत हुई।  पुलिस ने मेरे और मेरी पत्नी के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया लेकिन घऱ के अन्य लोगों के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं पाना लिखा।  हमारे वकील ने आरोप विरचित होने के समय आरोप मुक्ति के लिए बहस की।  लेकिन न्यायालय ने कहा कि समझौते के आधार पर जमानत हुई है इस कारण से आरोप मुक्ति नहीं हो सकती।  अब गवाही के लिए उस लड़की का समन निकला है।  उस ने मेरे घर का पता दे रखा था इस कारण से वह मेरे घर पर आया।  हम ने मना कर दिया कि वह यहाँ नहीं रहती है और न कभी यहाँ रही है।  बाकी सभी गवाह मेरे मोहल्ले के हैं जो सच बोलेंगे।  वह लड़की गवाही देने नहीं आ रही है।  तो ऐसे में क्या हमारी जमानत खारिज हो जाएगी? इस मामले में न्यायालय का क्या निर्णय होना चाहिए?

-महाबली, सासाराम, बिहार

समाधान-

प ने अपने मुकदमे में वकील किया हुआ है।  आप को अपने मुकदमे के बारे में जो भी शंकाएँ हों  उन के बारे में अपने वकील से जानकारी करना चाहिए।  वे अधिक बेहतर तरीके से बता सकते हैं क्यों कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी होती है।

प के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र राज्य सरकार के लिए पुलिस द्वारा प्रस्तुत किया गया है।  उस मामले को साबित करने का दायित्व राज्य सरकार का है।  आप पर लगाए गए आरोप को बिना किसी युक्तियुक्त संदेह के साबित करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है।  यदि अभियोजन पक्ष किसी भी कारण से आप पर आरोप साबित नहीं कर पाता है तो आप निर्दोष करार दिए जाएंगे और मुकदमा समाप्त हो जाएगा।  उस लड़की को गवाही के लिए प्रस्तुत करना भी पुलिस की जिम्मेदारी है आप की नहीं।  यदि पुलिस उस लड़की को गवाही में नहीं ला पाती है तो गवाही के अभाव में कोई भी बात आप के विरुद्ध साबित नहीं की जा सकती।  आप बेफिक्र रहें।  आप की जमानत केवल जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने पर रद्द की जा सकती है।  यदि आप प्रत्येक पेशी पर अदालत में उपस्थित होते रहें तो आप की जमानत भी खारिज नहीं की जा सकती है।  इतना हो सकता है कि मुकदमे में सुनवाई में देरी हो जाए।

स मामले में आरोप 498-ए भा.दंड संहिता का है जिस में प्राथमिक रूप से यह साबित किया जाना आवश्यक है कि परिवादी आप की पत्नी है।   यह साबित करने के लिए क्या सबूत पुलिस प्रस्तुत करेगी यह तथ्य मेरे सामने नहीं है।  मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि जो विवाह हुआ ही नहीं उसे पुलिस ने साबित कैसे मान लिया।  इस के लिए भी पुलिस ने कुछ गवाह अवश्य नकली बनाए होंगे।  यदि उस लड़की के साथ आप का विवाह ही साबित नहीं होगा तो इस मामले में आप को दोषी साबित किया जान संभव नहीं है।  जो तथ्य आप ने मेरे सामने रखे हैं उन के आधार पर मुकदमा झूठा सिद्ध होगा और न्यायालय को चाहिए कि वह उस लड़की के विरुद्ध धारा 182 भा. दंड संहिता में मुकदमा चलाए कि उस ने मिथ्या रिपोर्ट कर के पुलिस को आप को क्षति पहुँचाने के लिए गुमराह किया।  इस मुकदमे में उस लड़की को दंडित किया जा सकता है।

पति के विरुद्ध 498-ए का मुकदमा दर्ज करवा दिया है, मेरा दो साल का बच्चा किस के पास रहेगा?

समस्या-

मेरे ससुराल वाले मुझे बहुत तकलीफ देते थे।  बाद में पति ने भी मारना और घर से निकालना शुरु कर दिया। मैं मायके आई तो वहाँ भी शराब पी कर आने लगा और झगड़ा करने लगा। मेरे पिता को जान से खत्म करने की धमकी भी दी। मैं ने पुलिस स्टेशन में धारा 498-ए में रिपोर्ट करवा दी है। मेरे एक दो साल का बच्चा भी है। मैं क्या कर सकती हूँ? मेरा बच्चा दो वर्ष का है वह मेरे पास रहेगा या फिर उस के पिता के पास रहेगा।

-रानी, लातूर, महाराष्ट्र

प के साथ ससुराल में क्रूरतापूर्ण व्यवहार हुआ और मारपीट भी। इस मामले में आप का कहना है कि आप ने धारा 498-ए का प्रकरण पुलिस ने दर्ज कर लिया है। यदि ऐसा है तो आप के पति और ससुराल वालों के विरुद्ध एक अपराधिक मुकदमा तो दर्ज हो ही गया है। पुलिस इस मुकदमे में गवाहों के बयान ले कर और अन्य सबूत जुटा कर न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत कर देगी। अभियुक्तों को आरोप सुनाने के उपरान्त न्यायालय में सुनवाई आरंभ होगी जहाँ आप के और गवाहों के बयानों पर निर्भर करेगा कि आप के पति और अन्य अभियुक्तों को उक्त प्रकरण में दंड मिलेगा अथवा नहीं।

ब आप अपने मायके में रह रही हैं। 498-ए के प्रकरण के दर्ज हो जाने के उपरान्त आप के पति ने आप के मायके आ कर परेशान करना बंद कर दिया होगा। यदि यह बदस्तूर जारी है तो आप महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। इस आवेदन पर आप के पति को पाबंद किया जा सकता है कि वह आप के मायके न आए और आप को तंग करना बंद करे। इसी आवेदन में आप अपने पति से अपने बच्चे और स्वयं अपने लिए प्रतिमाह भरण पोषण के लिए आवश्यक राशि दिलाने की प्रार्थना भी कर सकती हैं। न्यायालय ये सभी राहतें आप को दिला सकता है।

दि आप अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती हैं तो आप उस से विवाह विच्छेद के लिए परिवार न्यायालय में और आप के जिले में परिवार न्यायालय स्थापित न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष आवेदन कर सकती हैं। साथ ही साथ धारा-125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रतिमाह अपने और अपने बच्चे  के लिए भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए अलग से आवेदन कर सकती हैं।

हाँ तक बच्चे की अभिरक्षा/ कस्टडी का प्रश्न है, बच्चा आप के पास ही होगा और उसे आप के पास ही रहना चाहिए। उसे आप का पति जबरन आप से नहीं छीन सकता। यदि वह बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन करता है तो आप उस का प्रतिरोध कर सकती हैं। जिस उम्र का बालक है उस उम्र में उसे उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। इस तरह बालक भी आप के पास ही रहेगा। यदि आप दोनों के बीच विवाह विच्छेद होता है तो आप यह तय कर सकती हैं कि आप बच्चे को अपने पास रखना चाहती हैं या नहीं। यदि आप बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहती हैं और बच्चे का पिता उसे अपने पास रखना चाहता है तो आप इस विकल्प को चुन सकती हैं।

पति पत्नी व बच्चों को छोड़ कर दूसरा विवाह कर ले तो पत्नी क्या-क्या कर सकती है?

समस्या – 

मारी शादी को 7 साल हुए हैं। मेरा पति दो साल से भागा हुआ है और अलग रह रहा है,  उस ने तलाक का केस फाइल कर रखा है। लेकिन मैं उस से किसी भी कीमत पर तलाक नहीं देना चाहती हूँ। क्यों कि मेरे दो बच्चे हैं एक लड़का और एक लड़की। मैं अभी मायके में रह रही हूँ और हमारा सारा खर्चा मेरा और मेरे बच्चों का मेरे माता पिता ही उठा रहे हैं। मुझे अब पता चला है कि उस ने (पति ने) दूसरी शादी कर ली है, जिस में उस के माता-पिता का हाथ भी है। लेकिन बिना तलाक दिए कोई दूसतरी शादी कैसे कर सकता है? क्या उस की दूसरी पत्नी उस की जायज पत्नी हो सकती है? मैं उसे और उस के घरवालों को कानून के द्वारा सजा दिलाना चाहती हूँ और अपने बच्चों का हक लेना चाहती हूँ। इस के लिए मुझे क्या करना होगा?

-राखी उनियाल, देहरादून, उत्तराखंड

समाधान-

कोई भी व्यक्ति स्त्री या पुरुष अपने विवाहित पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकता। ऐसा विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत एक अवैधानिक विवाह है। ऐसा करना धारा 494 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध भी है जिस के लिए ऐसा विवाह करने वाले व्यक्ति को सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने के दण्ड से दण्डित किया जा सकता है। इस धारा के अंतर्गत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है और पुलिस अन्वेषण कर के ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर सकती है। ऐसे मामले में पुलिस द्वारा रिपोर्ट दर्ज न किए जाने पर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है जिसे न्यायालय पुलिस को अन्वेषण के लिए प्रेषित कर सकता है या स्वयं भी जाँच कर के ऐसे व्यक्ति को अभियुक्त मानते हुए उस के विरुद्ध समन या गिरफ्तारी वारण्ट जारी कर सकता है। लेकिन इस मामले में आप को या पुलिस को न्यायालय के समक्ष यह प्रमाणित करना होगा कि आप के पति ने वास्तव में विधिपूर्वक दूसरा विवाह किया है इस संबंध में आप को दूसरे विवाह का प्रमाण पत्र तथा उसे जारी करने वाले अधिकारी की गवाही करानी होगी अथवा ऐसे प्रत्यक्षदर्शी गवाह प्रस्तुत करने होंगे जिन के सामने विवाह संपन्न हुआ हो।

प दो वर्ष से अपने माता पिता के साथ रह रही हैं। आप को चाहिए था कि आप अपने पति के विरुद्ध धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की प्रत्यास्थापना के लिए अथवा उस के दूसरा विवाह करने की सूचना मिल जाने पर धारा 10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत न्यायिक पृथ्थकरण के लिए आवेदन करतीं। आप अब भी इन दोनों धाराओँ में से किसी एक के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं।  आप अपने लिए और अपने बच्चों के भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन कर सकती हैं। आप इस के साथ ही महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत भी अपने लिए और अपने बच्चों के लिए भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। आप के पति ने आप के विरुद्ध तलाक का जो मुकदमा चलाया है उस मुकदमें में भी आप हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत मुकदमे पर आने जाने और वकील की फीस व मुकदमे के खर्चे और अपने व अपने बच्चों के भरण पोषण के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस धारा के अंतर्गत आप के पति से मुकदमे के लंबित रहने के दौरान उक्त राहत दिलाई जा सकती है, लेकिन यह राहत मुकदमा समाप्त होने के बाद जारी नहीं रहेगी।
प के पति ने जिस महिला के साथ दूसरा विवाह किया है वह विवाह अवैधानिक है और वह स्त्री वैध रूप से आप के पति की पत्नी नहीं है, वह किसी भी रूप में आप के पति की जायज पत्नी नहीं है। इस मामले में हो सकता है आप के पति के माता पिता ने आप के पति का सहयोग किया हो आप उन के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सकती। यदि आप के पति के माता पिता व अन्य संबंधियों ने आप के प्रति कोई क्रूरता की हो तो उन के विरुद्ध आप पुलिस में धारा 498-ए भा.दं. संहिता के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करवा सकती हैं। इसी के साथ यदि आप का कोई स्त्री धन आप के पति या उस के किसी रिश्तेदार के पास हो और वह आप को वापस नहीं लौटा रहा हो तो धारा 406 अमानत में खयानत का आरोप भी जोड़ सकती हैं। इस मामले में पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने पर आप न्यायालय में भी शिकायत कर सकती हैं। इस मामले में आप के पति के रिश्तेदारों को सजा हो सकती है।
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