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अज्ञात वाहन से दुर्घटना होने पर मुआवजे की व्यवस्था – सोलेशियम फंड

समस्या-motor accident

सूरज कुमार ने मंडावा, जिला झुंझुनूं से पूछा है-

मेरे रिश्तेदार की अज्ञात वाहन से पिलानी में दुर्घटन हो कर मौके पर मृत्‍यु हो गई क्‍या ऐसी स्थिति में क्‍लेम मिल सकता है?

 

 

समाधान-

किसी भी अज्ञात वाहन से होने वाली दुर्घटना में मारे जाने वाले व्यक्ति के आश्रितों व गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को सहायता प्रदान करने के लिए मोटर वाहन अधिनियम 1988 के अन्तर्गत सोलेशियम फंड की व्यवस्था की गयी है। इस अधिनियम की धारा 161 से 163 तक में इस फंड की स्थापना और इस के अंतर्गत मुआवजा देने के उपबंध किए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत मृतक के आश्रितों को 25 हजार रुपये तथा गम्भीर रूप से घायल व्यक्ति को 12,500 रुपये की क्षतिपूर्ति देने की व्यवस्था की गयी है।

यह मुआवजा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक जिले के कलेक्टर के कार्यालय में व्यवस्था है। वहाँ इस के लिए आवेदन प्राप्त किए जाते हैं। आवेदन के साथ प्रथम सूचना रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, चोट प्रतिवेदन, मर्ग सूचना, पंचनामा आदि दस्तावेजों की जरूरत होती है। सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन करने पर मुआवजा प्राप्त हो सकता है।

वाहन बेचना और कब्जा देना साबित करना होगा।

motor accidentसमस्या-

रविन्द्रसिंह ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मैं ने एक मोटरवाहन बेचा जिस का बीमा नहीं था। जिसने वाहन खरीदा उस ने स्टाम्प पर लिखित में खरीदना और कब्जा प्राप्त करना दे रखा है। 15 दिन बाद वाहन से दुर्घटना हो गयी। एक व्यक्ति को फ्रेक्चर हुआ है। वाहन अभी तक ट्रान्सफर नहीं हुआ था और बीमा भी नहीं कराया था। इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी है।

समाधान-

प इस बात से चिन्तित हैं कि आप दुर्घटना के दिन तक वाहन के पंजीकृत स्वामी थे इस कारण से आप पर क्षतिपूर्ति का दायित्व आएगा।

मोटर यान दुर्घटना में प्राथमिक दायित्व चालक और वाहन स्वामी का होता है, यदि दायित्व बीमित हों तो बीमा कंपनी इन दायित्वों को वहन कर लेती है।

आप के मामले में पुलिस वाहन के नंबर से आप तक पहुँचेगी और जानना चाहेगी कि दुर्धटना के समय वाहन कौन चला रहा था। आप उसे बता दीजिए कि यह आप नहीं बता सकते क्यों कि आप वाहन को बेच चुके थे। इस के साथ ही आप के पास वाहन प्राप्ति की जो रसीद स्टाम्प पर आप के पास है उस की स्वहस्ताक्षरित फोटो प्रति पुलिस को दे दें।

इस के बाद आप के विरुद्ध कोई मोटर दुर्घटना दावा होता है तो आप को वाहन का विक्रय और कब्जा हस्तान्तरित होना साबित करना होगा। आप वहाँ आप यह जवाब दे सकते हैं कि दुर्घटना से आप का कोई लेना देना नहीं था, आप पहले ही वाहन बेच चुके थे। स्टाम्प पर उपलब्ध रसीद के माध्यम से इसे साबित भी कर सकते हैं। इस से आप पर आ रहा दायित्व वाहन क्रेता पर पहुँच जाएगा।

मोटर यान दुर्घटना क्षतिपूर्ति दावे कहाँ प्रस्तुत किए जा सकते हैं?

 

rp_Car-accident.jpgसमस्या-

अंश प्रताप ने उन्नाव, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी टैक्सी से एक दुर्घटना हो गया था जिस में एक आदमी की मृत्यु हो गयी थी। उस के परिवार वालों ने क्षतिपूर्ति के लिए आवेदन दिल्ली में प्रस्तुत किया है जब कि मरने वाला और उस के क्लेम का दावा करने वाले और मैं सब एक ही शहर उन्नाव के हैं। वकील का कहना है कि दिल्ली में बीमा कंपनी का दफ्तर है इस लिए वहाँ मुकदमा बनता है। क्या दिल्ली में मुकदमा खारिज हो सकता है?

 

समाधान

मोटर व्हीकल एक्ट ने मोटर यान दुर्घटना दावों के संबंध में यह प्रावधान दिया गया है कि क्षतिपूर्ति का दावा करने वाला व्यक्ति उस की इच्छा से तीन तरह के स्थानों पर स्थित मोटर यान दुर्घटना दावा अधिकरणों में से किसी एक में अपना दावा प्रस्तुत कर सकता है। ये तीन स्थान निम्न प्रकार हैं-

  1. वहाँ जहाँ दुर्घटना घटित हुई हो;
  2. वहाँ जहाँ दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो; तथा
  3. जहाँ दावे के विरोधी पक्षकारों में से किसी एक का कार्यालय हो या जहाँ वह व्यापार करता हो।

स तरह यदि दिल्ली में बीमा कंपनी का दफ्तर है तो वहाँ क्षतिपूर्ति का दावा प्रस्तुत किया जा सकता है और यह दावेदार पर निर्भर करता है कि वह उक्त स्थानों में से कहाँ अपना दावा प्रस्तुत करना चाहता है। आप के मामले में वकील की सलाह उचित है।

प के पास यदि बीमा है तो आप बीमा कंपनी को लिख कर दे सकते हैं कि आप बीमा धारी हैं और इस बीमा क्लेम को लड़ने का दायित्व आप का है। बीमा कंपनी आप की ओर से मुकदमा लड़ेगी यदि आप ने बीमा पालिसी की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है। यदि बीमा कंपनी कहती है कि आप ने बीमा प्रमाण पत्र की किसी शर्त का उल्लंघन किया है और आप समझते हैं कि ऐसा हुआ है तो आप को फिर अपना वकील कर के अपना पक्ष अधिकरण के समक्ष रखना चाहिए।

बिना बीमा के मोटर वाहन चलाना अपराध है, परिणाम भुगतने होंगे।

motor accidentसमस्या-

विजय ने दिल्लीसे पूछा है-

मेरे उपर झूठा आरोप मोटर एक्सिडेंट का लगाया गया है।मैं ट्रैक्टर चला रहा थाकि अचानक शिकायतकर्ता का पैर मेरे पिछले पहिए पर उसके अचानक रुकने से आ गया।

पुलिस ने मेरा ट्रैक्टर जब्त किया और उसके बाद जमानत देने पर छोड़ दिया ट्रैक्टर का बीमा भी नहीं है। शिकायतकर्ता ने अपना डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट भी कोर्ट में लगाया है राशि सैटलमैंट के तौर पर बहुत ज़्यादा माँग रहा है। मैं क्या करूँ?

समाधान-

ब से पहली गलती तो आपकी यह है कि आप ने ट्रेक्टर का बीमा नहीं करवा रखा है। बिना बीमा के कोई भी मोटर वाहन सार्वजनिक स्थल पर चलाना गैरकानूनी है और अपराध भी है। पुलिस ने आप के विरुद्ध जो अपराधिक मुकदमा बनाया है उस में बिना बीमा के ट्रेक्टर चलाने का भी आरोप आप पर लगाया होगा। क्यों कि गलती आपकी है इस कारण से उस के परिणाम तो आप को भुगतने ही होंगे।

डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट चोटग्रस्त व्यक्ति ने लगाया है। तो आप को नोफाल्ट के आधार पर उसे 25000/- रुपए की क्षतिपूर्ति तो देनी ही होगी। उस से आप बच नहीं सकते। क्यों कि इस में यह नहीं देखा जाता है कि वाहन चालक की कोई गलती है या नहीं। केवल वाहन दुर्घटना में चोट लगना पर्याप्त है।

स के आगे यदि आप मोटर यान दुर्घटना दावा अधिकरण में अपनी साक्ष्य से यह साबित कर देते हैं कि दुर्घटना में आप का कोई दोष नहीं था तो आप बाद के दायित्व से बच सकते हैं। यदि आप खुद को निर्दोष और चोटग्रस्त व्यक्ति का दोष साबित नहीं कर सके तो आप को चोट की प्रकृति के आधार पर और क्षतिपूर्ति देनी पड़ सकती है। यदि आप को लगता है कि समझौते के माध्यम से आप कम राशि दे कर मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप न्यायालय में लगने वाली लोक अदालत में अपने मामले के निपटारे के लिए आवेदन दे सकते हैं।

दुर्घटना की प्राथमिक जिम्मेदारी वाहन चालक की

accident car animalसमस्या-
महेश पुरी, अराँई (अजमेर) राजस्थान से पूछते हैं-

दिनांक 13-09-2011 को मैं और मेरे साथ श्री सुरेश चन्‍द पारीक कार द्वारा इनके पुत्र श्री अवधेश पारीक से मिलने के लिए बीकानेर जा रहे थें। रास्‍ते में दिन के करीबन 1 बजे कार के रास्‍ते में नील गायों (रोजडों) के आ जाने से कार  दुर्घटनाग्रस्‍त हो गई। इस कार दुर्घटना में मैं और श्री सुरेश पारीक  बुरी तरह से घायल हो गये। अस्‍पताल में श्री सुरेश चन्‍द पारीक की मृत्यु हो गई। दुर्घटना के समय कार कों मैं ही चला रहा था। इसलिए इसका पुरा ही मामला मेरे उपर डाल दिया गया। श्री सुरेश चन्‍द पारीक की पत्‍नी श्रीमती निमला देवी पारीक ने यह सारा मामला मेरे पर ही लगा दिया है।  इस दुर्घटना का जिम्‍मेदार मुझे ठहराया गया है, जबकि इस कार दुर्घटना में मुझे भी घायल हो कर मौत से जूझना पड़ा था। इस समस्‍या से बचने का उपाय बताएँ।

 

समाधान-

दुर्घटना के समय कार आप चला रहे थे। कार दुर्घटना में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई तथा आप भी घायल हुए हैं। कार दुर्घटना के केवल दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण तो यह हो सकता है कि आप ने  कार चालन  में लापरवाही बरती, दूसरा कारण यह हो सकता है कि दैवीय संयोग से यह दुर्घटना हुई।

 इस मामले में एक मात्र प्रत्यक्षदर्शी साक्षी केवल आप हैं। पुलिस अवश्य किसी राह चलते व्यक्ति को प्रत्यक्षदर्शी साक्षी बना सकती है, और हो सकता है उस ने बनाया हो। यदि आप को पूरा विश्वास है कि यह दुर्घटना अचानक नील गायों के आप के सामने आने के कारण घटित हुई है और आप का कोई दोष नहीं है तब भी आप के विरुद्ध जो अपराधिक मुकदमा पुलिस द्वारा स्थापित किया है उस में आप को प्रतिरक्षा करनी पड़ेगी। यदि आपका वकील अच्छा हुआ तो आप को इस मामले से दोष मुक्त करवा देगा। आप को स्वयं ही साबित करना होगा कि आप का कोई दोष नहीं था और यह दुर्घटना एक दैवीय संयोग थी।

स दुर्घटना में आपके साथी सुरेश चन्द्र पारीक का देहान्त हुआ है। उस की पत्नी और बच्चों को उन की क्षति हो गई है। उन्हें इस दुर्घटना में पर्याप्त मुआवजा केवल तभी प्राप्त हो सकता है जब कि वे इस दुर्घटना का दोष चालक का बताएँ। एक यह भी कारण है कि वे आप को दोषी बता रहे हैं। इस में उन का कोई दोष नहीं है। यदि वाहन बीमित था और आप के पास पर्याप्त ड्राइविंग लायसेंस था तो आप को दुर्घटना के मुआवजे की चिन्ता नहीं करनी चाहिए उस का भुगतान बीमा कंपनी करेगी। यदि इन दोनों में कोई कमी होगी तो वह भुगतान भी आप को करना होगा।

स आप यह ध्यान रखें कि अपराधिक मुकदमे में वकील अच्छा करें जो आपकी प्रतिरक्षा ठीक से प्रस्तुत करे। जिस से आप दण्ड से बच सकें।

सच का साथ लिया है तो उस पर डटे रहें …

motor accidentसमस्या-

नांदेड़, महाराष्ट्र से साधना थोराट ने पूछा है-

नांदेड शहर में मेरे पति को चक्कर आने से चलती गाडी से गिरे और बेहोश हो गये। कुछ लोगों ने उन्हें उठा कर अस्पताल पहुँचाया। घटना होने के बाद दूसरे दिन एक आदमी ने हमारे मोबाईल पर संपर्क कर के कहा कि तुम्हारे पति ने हमारे रिश्तेदार को टक्कर मार दी है। अगर तुम हमें पैसे नहीं दोगे तो हम थाने में केस दर्ज करायेंगे तुम्हारे पति की नौकरी जायेगी। हम डॉक्टर को पैसे देकर झूठे बिल बनायेंगे और तुमसे पैसे लेंगे।  इस तरह उसने दस बारह दिन फोन किया। हम ने पैसे देने से इन्कार किया और थाने में उसके खिलाफ  केस दर्ज करा दिया। उस ने हमारे बाद मेरे पति के खिलाफ केस दर्ज कराया मेरे पति ने गाडी का तृतीय पक्ष बीमा नहीं कराया हुआ है। मेरे पति को जमानत मिली है और हमने गाड़ी भी छुडवा ली है। उन्होने झूठे गवाह खड़े कर के मेरे पति को सजा दिलायी तो उनकी नौकरी जा सकती है क्या? या उसे पैसे देकर उसे चुप करना चाहिये? अब हमें क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने यह सही किया कि उस ब्लेक मेलर को कोई धन न दे कर पुलिस में रिपोर्ट करवा दी। पुलिस ने उस व्यक्ति की रिपोर्ट पर आप के पति की जमानत थाने में ही ले ली होगी क्यों कि यह मामला जमानतीय अपराध का है। आप को तुरन्त एस.पी. पुलिस से मिल कर बात करनी चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि मामला क्या है और आप ने पहले रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी। आप के पति को जिन लोगों ने अस्पताल पहुँचाया था उन में से किसी को आप जानती हों तो उसे साथ ले जाइए या फिर उस का शपथ पत्र लगा कर एस.पी. को आवेदन दीजिए। आप की शिकायत की जाँच के बाद यदि आप की बात सही पायी जाती है तो हो सकता है पुलिस ही इस मामले मे अन्तिम रिपोर्ट में आरोप पत्र न्यायालय के सामने प्रस्तुत न करे और मामला यहीं निपट जाए।

दि पुलिस आप के पति के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो आप को चाहिए कि आप अच्छा वकील करें और मामले में अपनी प्रतिरक्षा प्रस्तुत करें। मेरी समझ में आप के पति को न्यायालय सही समझेगा और दोषमुक्त करार कर देगा। आप को सच के साथ डटना चाहिए और न्याय पर विश्वास करना चाहिए। वैसे भी आप को घबराने की जरूरत नहीं है। इस तरह के मामले में सजा हो जाने पर भी नौकरी नहीं जाती है। मजिस्ट्रेट अदालत के फैसले की अपील सेशन न्यायालय में की जा सकती है।

ज कल तृतीय पक्ष नाम का कोई बीमा नहीं होता है। केवल एक्ट बीमा होता है जो करवाना अनिवार्य है। यदि किसी भी तरह का वाहन का बीमा आप के पति ने करवा रखा है तो तीसरे पक्ष की हानि की क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की होती है।  इन दिनों यह बड़े पैमाने पर हो रहा है कि किसी व्यक्ति को एक्सीडेंट में चोट लग जाती है तो और एक्सीडेंट करने वाले का पता नहीं लगता है तो हर्जाना वसूल करने के लिए किसी भी व्यक्ति को फँसा देते है। लेकिन अदालतें भी इस बात को जानती हैं। आप के पति अपने बेकसूर होने की साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे तो उन्हें कुछ नहीं होगा।

लालच के शिकारों को बचाने के लिए कानून मे बदलाव निहायत जरूरी

ब जा कर यह स्थिति बनने लगी है कि निर्माण कंपनियाँ कानून के प्रति जो असावधानियाँ बरतती है उस के खिलाफ कार्यवाही होने लगी है। हालाँ कि इस स्थिति के निर्माण में मीडिया की भूमिका प्रमुख है, क्यों कि दुर्घटना होने के तुरंत बाद जिस तरह से मीडिया संवाददाता खोज बीन कर कानूनी कमियों को खोज निकालते हैं और पुलिस व अन्य एजेन्सियों के लिए कानूनी कार्यवाही करना आवश्यक हो जाता है अन्यथा ठेकेदारों, अफसरों और नेताओं के कृष्ण धनबंधन उजागर होने लगते हैं। लेकिन कानूनी कार्यवाही की जो तलवार लटकी है उस से निपटने के लिए अब अफसरों ने हड़ताल का सहारा लिया है कि उन के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही न की जाए। 

कुछ ही दिनों पहले राजस्थान के झालावाड़ जिले के नीमोदा के पास निर्माणाधीन 1200 मेगावाट के सुपर थर्मल पावर स्टेशन पर 6.7 टन की एल्बो उठाते समय रोप टूट जाने से हुए हादसे में तीन श्रमिकों की दब कर मृत्यु हो गई। बात राष्ट्रीय स्तर तक मीड़िया में गई तो पुलिस ने आनन फानन में सदोष मानव वध मानते हुए निर्माण उप कंपनियों के अफसरों को गिरफ्तार कर लिया और अदालत ने फिलहाल उन की जमानत लेने से इन्कार कर दिया। थर्मल के निर्माण में जुटे ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के अफसरों ने इस कदम के विरुद्ध हड़ताल कर दी है और थर्मल इकाई का निर्माण कार्य रुक गया है।

यह एक नई परिस्थिति है, और लगता है हमारे प्रशासन के पास इस नई परिस्थिति से निपटने के लिए केवल यही एक रास्ता बचा है कि कानून को अपना काम करने से रोक दिया जाए। वैसे भी जमीन के नीचे धन की जो नहरें बहती हैं उन के कारण कानून अपना काम कभी कभी ही कर पाता है। इस नई परिस्थिति का कारण यह है कि कानून ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के प्रबंधकों को इन लापरवाहियों के लिए दोषी मानता है। जब कि ये प्रबंधक वास्तव में साधारण वेतन पर रखे गए कर्मचारी होते हैं। उन की स्थिति मजदूरों की अपेक्षा कुछ ही बेहतर होती है और रोजगार बनाए रखने के लिए अपने नियोजक की हर अच्छी बुरे काम को अंजाम देते रहते हैं। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इस तरह की दुर्घटना होने पर मुख्य निर्माण कंपनी के निदेशकों/मालिकों और उप निर्माण कंपनी के मालिकों और ठेकेदारों को ही इस तरह की दुर्घटना के लिए जिम्मेदार मानने के लिए कानन बनना चाहिए। क्यों कि असल में सुरक्षा की आवश्यकता को दरकिनार करने का काम धन बचाने के लिए उन्हीं के निर्देशन पर संपन्न होता है औऱ बचे हुए धन के स्वामी भी वे ही बनते हैं। इस तरह यदि किसी दुर्घटना के लिए कोई अपराधिक लापरवाही का मामला बनता है तो सजा का भागी भी वस्तुतः उन्हीं लोगों को बनना चाहिए जो कि उस व्यवसाय से अधिक से अधिक धन कमाते हैं। उन्हीं की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि जिस कार्य से वे धन कमा रहे हैं उस से मनुष्य के प्रति कोई अपराध घटित न हो।

लेकिन अब तक जो कानून हैं उन में  हमेशा कुछ विशिष्ठ पदों पर नियुक्त अधिकारियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। ये अधिकारी बड़ी कंपनियों में तो बड़े वेतन पाते हैं लेकिन मंझोले कारोबारों और उद्योगों में ये अधिकारी बहुत मामूली वेतनों पर काम कर रहे होते हैं। यही वजह है कि जब ठेकेदार कंपनियों के अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया तो वे ही हड़ताल पर उतर आए। उन का हड़ताल पर जाना बहुत वाजिब लगता है। क्यों कि वे सारे काम तो अपने मालिकों के निर्देशो

हत्या भी मोटर यान दुर्घटना है यदि उस का संबंध किसी मोटर यान के उपयोग से संबंधित हो

ब्लागर और अधिवक्ता साथी श्री भुवनेश शर्मा ने एक बहुत ही दिलचस्प प्रश्न मुझे प्रेषित किया – 

दि किसी मोटर सायकिल सवार की कोई अपने चौपहिया वाहन से टक्कर मार कर हत्या कर देता है तो क्या मृतक के विधिक प्रतिनिधि मोटरयान दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष क्षतिपूर्ति के लिए दावा कर सकते हैं? यदि कर सकते हैं तो उन के पास दोनों वाहनों के बीमाकर्ता में से किस के विरुद्ध वाद प्रस्तुत करने का विकल्प है? हत्या के मामले में अदालत में प्रस्तुत आरोप पत्र और निर्णय का क्षतिपूर्ति दावे पर क्या असर होगा?
उत्तर —
भुवनेश जी ने जो प्रश्न सामने रखा है उस के कुछ मुख्य बिंदु हैं। इस में सब से पहले ध्यान देने वाली बात यह है कि हत्यारे ने चौपहिया वाहन का उपयोग हत्या के हथियार के रूप में किया है। दूसरी बात यह है कि क्या मोटर यान का हत्या के हथियार के रूप में उपयोग करने मात्र से एक हत्या को मोटर यान दुर्घटना कहा जा सकता है? यह प्रश्न अनेक मामलों में अदालतों के सामने आया है और उन के निर्णय उपलब्ध हैं।
स मामले में सब से दिलचस्प मामला मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के सामने खैरुन्निसा व अन्य बनाम सुभाष उर्फ पंजाबी व अन्य के मुकदमे में आया। इस मामले में दो ट्रकों में टक्कर हुई। एक ट्रके ड्राइवर ने दूसरे ड्राइवर को दोषी मानते हुए बंधक बना लिया। दोनों में झगड़ा हुआ और बंधक ड्राइवर को ट्रक से कुचल करक मार डाला गया। इस मामले में मृत्यु एक हत्या थी। लेकिन इस मृत्यु को प्रारंभिक दुर्घटना से संबंधित होने के कारण इस घटना को दुर्घटना-हत्या का मामला मानते हुए इस में मृत व्यक्ति के आश्रितों को तीन लाख साठ हजार रुपए मुआवजा देने का आदेश पारित किया और इस भुगतान के लिए बीमा कंपनी को जिम्मेदार माना।

क्सर इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं कि किसी वाहन को ड्राइवर सहित अगवा कर लिया गया और फिर ड्राइवर की हत्या कर के वाहन को ले भागे। ऐसे मामलों में चालक के आश्रितों को मुआवजा भुगतान की जिम्मेदारी वाहन स्वामी पर आ पड़ती है क्यों कि चालक तो अपनी ड्यूटी कर रहा होता है और इस तरह की हत्या को नियोजन के दौरान उस के क्रम में हुई दुर्घटना माना गया है। वाहन की कानूनन  आवश्यक बीमा पॉलिसी में चालक को हुई हानि और मृत्यु के लिए कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के अंतर्गत आने वाले क्षतिपूर्ति दायित्व सम्मिलित होते हैं और इस के लिए बीमा कंपनी प्रीमियम प्राप्त करती है। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने रीता देवी बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी के मामले में यह निर्धारित किया कि ऐसी हत्यायें मोटर यान के उपयोग के कारण हुई दुर्घटनाएँ मानी जानी चाहिए और मोटर यान अधिनियम के अंतर्गत भी मृतक के आश्रित मुआवजा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

बीमा कंपनी कार के बीमा मूल्य से कम और प्लास्टिक के सामानों पर मूल्य से कम क्षतिपूर्ति क्यों दे रही है?

 श्री बी. एस. मिश्रा पूछते हैं …….

कार का पूरा बीमा कराने के बाद दुर्घटना पर बीमा कंपनी का कहना है कि उन के द्वारा प्लास्टिक के सामान की पूर्ति नहीं की जाएगी।  कार का ऐस्टीमेट 4.78 लाख का बना है।  जब कि कार 4.32 लाख की है।  बीमा कंपनी का कहना है कि उन के द्वारा 2.50 लाख की राशि दी जाएगी।  क्या पूरी राशि पर प्रीमियम लेने के बाद बीमा कंपनी प्लास्टिक के सामानों की कीमत देने से इन्कार कर सकती है। 

उत्तर …….

कार का या किसी भी मोटर वाहन का बीमा कराते समय वाहन  की कीमत का मूल्यांकन होता है।  नए वाहन की स्थिति में जो मूल्य चुकाया जाता है उसी पर मूल्यांकन कर लिया जाता है।  उस के बाद उस मूल्यांकन के आधार पर बीमा का प्रीमियम लिया जाता है।  लेकिन प्रीमियम की दरें दुर्घटना होने पर हानि के बदले दी जानी वाली क्षतिपूर्ति की राशि के आधार पर दिया जाता है।  दुर्घटना होने पर किस तरह के सामान की हानि पर कितनी क्षतिपूर्ति दी जाएगी यह बीमा कंपनी द्वारा आप से किए गए कंट्रेक्ट पर निर्भर करती है।  बीमा करते समय आप को कवरनोट दिया जाता है। बाद में उस की बीमा पॉलिसी आप को भेजी जाती है।  यह बीमा पॉलिसी बीमा कंपनी के साथ हुआ आप का कंट्रेक्ट है।  बीमा पालिसी में क्षतिपूर्ति की दरें निर्धारित होती हैं।  और क्षतिपूर्ति उन्हीं शर्तों के आधार पर की जाती है।

आप ने जो ऐस्टीमेट दिया है वह तो कार की कुल कीमत से अधिक का है।  इस तरह एक तो आप के ऐस्टीमेट पर ही प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है।  ऐस्टीमेट से ऐसा लगता है कि कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी।  ऐसी अवस्था में पूर्ण क्षति आप को मिलनी चाहिए।  तथ्यों से  ऐसा भी लगता है कि आप की कार कुछ वर्ष पुरानी थी। ऐसी अवस्था में कार की कीमत पर घिसाई भी काटी गई होगी।  इसीलिए आप की कार की क्षतियों के लिए जो क्षतिपूर्ति करने का प्रस्ताव कंपनी द्वारा किया गया है वह शर्तों के अनुरूप ही प्रतीत होता है।

अधिक संभवना इस बात की है कि कार की पूर्णक्षति की स्थिति में जब कि कार को ठीक करने का ऐस्टीमेट ही कार की पूरी कीमत से अधिक का है बीमा कंपनी ने संपूर्ण कार का दुर्घटना के दिन का बाजार मूल्य निर्धारित किया हो और उस में से रबर, प्लास्टिक के सामानों की कीमत कम कर के उसे देने का प्रस्ताव किया हो।

आप को चाहिए कि आप अपनी बीमा पॉलिसी की सभी शर्तों को पढ़ लें और फिर बीमा कंपनी के शाखा प्रबंधक या मण्डल प्रबंधक से सीधे मिल कर अपना मामला समझ लें।  यदि फिर भी आप को लगता है कि बीमा कंपनी आप को क्षतिपूर्ति की राशि कम दे रही है तो आप बीमा कंपनी को लिखित प्रस्ताव दे दें कि आप विरोध के साथ और दावा करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखते हुए क्षतिपूर्ति की राशि प्राप्त कर सकते हैं।  बीमा कंपनी इस शर्त पर क्षतिपूर्ति राशि देने को सहमत हो तो आप उन से वह राशि प्राप्त कर लें और शेष राशि के लिए उपभोक्ता अदालत में शिकायत लगाएँ। यदि बीमा कंपनी दावा करने के आप के अधिकार को सुरक्षित रखते हुए क्लेम देने को तैयार न हो तो बीमा कंपनी को एक नोटिस दे दें और फिर उपभोक्ता अदालत में शिकायत प्रस्तुत करें।

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