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निस्सन्तान की मृत्यु पर क्या पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हिस्सा मिलेगा?

समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

कृषि भूमि के अतिरिक्त स्थाई संपत्ति के लिए बंटवारे का वाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

समस्या-

अनुराधा ने रायबरेली, उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-


मेरे पिता जी ने कोई भी संपत्ति खुद नही बनायी उनके पास जो भी कृषिभूमि व मकान हैं वह उन्होने क्रमश अपने पिता व चाचा से प्राप्त किया हैं , पिता जी का देहान्त जनवरी 2017 मे हुआ था,मेरा विवाह 1994 व छोटी बहन का विवाह 2007 मे हुआ था, कृषिभूमि आजादी से पहले से दादा के पास थी व एक मकान 19949-50 व दूसरा 1965-67 के आसपास पिता के चाचा ने बनवाया था क्या दावा कायम करने पर मुझे व मेरे बहन को हिस्सा मिलेगा.


समाधान-

प के अनुसार आप के पिताजी के पास जो भी खेती की जमीन व मकान आदि हैं वे पुश्तैनी संपत्ति थी। लेकिन पिता से प्राप्त संपत्ति तो पुश्तैनी /सहदायिक हो सकती है चाचा से प्राप्त संपत्ति सहदायिक है या नहीं वह तो संपत्ति के स्वामित्व के इतिहास से ही पता लग सकता है। आप ने यह भी नहीं बताया कि अन्य उत्तराधिकारी कौन कौन हैं?

बहरहाल कृषि भूमि के बारे में उत्तर प्रदेश में स्थिति यह है कि विवाहित पुत्रियों को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त नहीं है। इस कारण उस मामले में आप का दावा चल नहीं सकेगा। जहाँ तक मकान का प्रश्न है उस में आप का अधिकार है चाहे वह मकान पुश्तैनी हो या न हो। आप मकान के लिए बंटवारे और अपने हिस्से पर अलग कब्जे का दावा कर सकती हैं। कृषि भूंमि के मामले में यदि आप किसी स्थानीय वकील से सलाह प्राप्त करें तो बेहतर होगा।

संपत्ति के बँटवारे का वाद राजस्व न्यायालय में संस्थित करें।

agricultural-landसमस्या-

दिनेश ने भुवाना, उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादा जी की मृत्यु फरवरी 2001 में हो गयी थी। दादा जी ने अगस्त 2000 में सारी संपत्ति मेरे चाचा जी के नाम वसीयत कर दी थी। यह सारी संपत्ति पुश्तैनी है। पटवारी और तहसीलदार ने वसीयत खारिज करते हुए 3 भाई और 4 बहनों के नाम इन्तकाल में चढ़ा दिए हैं। मुझे क्या करना चाहिए?


समाधान-

जो भी संपत्ति पुश्तैनी होती है वह सदैव पुश्तैनी ही रहती है। लेकिन 2001 में प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार जिस व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में पुत्रियाँ भी हों पुश्तैनी संपत्ति में उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होगा। इस तरह राजस्व रिकार्ड में हुआ नामांतरण सही है। इस भूमि में आप के पिता का हिस्सा तो हैे ही आप का भी हिस्सा जन्म से ही है।

यदि आप चाहते हैं कि इस संपत्ति में आप के अपने हिस्से की संपत्ति पर आप को पृथक कब्जा मिल जाए तो आप उक्त भूमि के बंटवारे का वाद निकट के एसडीओ की अदालत में दाखिल कर सकते हैं।

खेत के रास्ते और फैक्ट्री के न्यूसेंस को हटवाने के लिए रिट याचिका प्रस्तुत करें.

agricultural-landसमस्या-

 

अरुण सेन ने पुर भीलवाड़ा, राजस्थान से पूछा है-

 

मारे खेत के पास बड़ी कम्पनी जिन्दल सॉ के आने से हमारे खेतों मे फसलों पर मिट्टी जम जाती है फसल नहीं होती है। खेत का रास्ता जिन्दल कंपनी ने रोक दिया है पूछ कर अन्दर जाना पड़ता है। कंपनी न तो मुआवजा देती है और न ही कंपनी में नौकरी देते हैं कोई सुनवाई नहीं होती क्या करें?

 

समाधान-

कंपनियाँ तो चाहती हैं कि आसपास के खेत वाले इसी तरह परेशान हों और उन्हें सस्ते में ये जमीनें खरीदने को मिल जाएँ। इस मामले में सरकार के स्थानीय अधिकारी भी उन की मदद करते हैं इस कारण शिकायत करने पर भी कोई कंपनी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करता।

कंपनी के पास जमीन जाने के पहले आप के खेत का रास्ता था जो कंपनी को जमीन मिलने से बंद हो गया है तो आप को सरकार से वैकल्पिक रास्ता मांगना चाहिए। यदि कंपनी के कारोबार से धूल उड़ कर फसलों पर जमती है तो कंपनी से नुकसान का मुआवजा मांग सकते हैं। यह एक तरह का कंटक (न्यूसेंस) भी है जिस की शिकायत आप स्थानीय एसडीएम से कर सकते हैं धारा 133 दंड प्रक्रिया संहिता में एसडीएम कंपनी के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है।

आप यह सब काम करें। यदि अधिकारी आप की न सुनें तो जिला कलेक्टर के माध्यम से राज्य सरकार को नोटिस दें और सीधे इन सभी राहतों के लिए उच्च न्यायालय में रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए बेहतर है कि उच्च न्यायालय के किसी वकील की सलाह लें और उस से पूछ लें कि रिट याचिका प्रस्तुत करने के और क्या क्या करना पड़ेगा।

हिस्से और बँटवारा कैसे होगा?

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

यशवन्त चौहान ने उज्जैन मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी उनके सात भाई और दादीजी के नाम से कृषि ज़मीन है। दादाजी का स्वर्गवास १९८० में हो गया था। ज़मीन दादाजी के नाम से थी। १९८२ में ज़मीन के खाते पटवारी रिकॉर्ड में पिताजी की ४ बहनों की सहमति से दादीजी एवं ८ भाई का समान भाग हो गया था। दादीजी का स्वर्गवास १ वर्ष पूर्व २०१५ में हो गया है। उक्त जमीन उज्जैन म.प्र. में है।  मेरा प्रश्न है कि क्या मेरे पिताजी की चार बहनों का जो अभी जीवित हैं। उक्त ज़मीन में बहनों का कानूनन क्या हक़ बनता है।  दादीजी के भाग पर या समस्त ज़मीन पर उक्त ज़मीन का बटवारा भी करवाना है, इस की क्या प्रक्रिया है?

समाधान-

मीन आप के दादा जी की थी। उन के देहान्त के उपरान्त आप के पिता, चाचा बुआएँ और दादी सभी समान रूप से उत्तराधिकारी थे। चूंकि नामान्तरण बुआओँ की सहमति से हुआ है तो उन्होंने रिलीज डीड निष्पादित करते हुए या अन्यथा अपना हक छोड़ते हुए नामान्तरण दर्ज करवा दिया। इस तरह उक्त भूमि में केवल नौ समान खातेदार हो गए।

अब दादी जी का भी स्वर्गवास हो चुका है। उक्त भूमि में 1/9 हिस्सा दादीजी का था। उन की मृत्यु के समय कुल 8 पुत्र तथा चार पुत्रियाँ उन की उत्तराधिकारी हुईँ इस तरह 1/9 हिस्से के भी 12 उत्तराधिकारी हुए। प्रत्येक को 1/108वाँ हिस्सा प्राप्त होगा। इस तरह आप के पिताजी की चार बहनों में से प्रत्येक का 1/108वाँ हिस्सा उक्त भूमि में है। इसी तरह आप के पिता व उन के भाइयों में से प्रत्येक को भी यह 1/108वाँ हिस्सा प्राप्त हुआ है। जो उन के 1/9वें हिस्से में सम्मिलित होने के उपरान्त उन का हिस्सा 13/108वाँ हो गया है। इसी तरह यह बँटवारा होगा।

बँटवारा आपसी सहमति से कराया जा सकता है या फिर कोई एक हिस्सेदार न्यायालय में बँटवारे का वाद संस्थित कर सकता है शेष हिस्सेदार सहमत हों तो सहमति का जवाब प्रस्तुत कर सकते हैं और उस आधार पर वाद डिक्री हो कर उस की पालना रिकार्ड में हो सकती है। बँटवारे के लिए आप को स्थानीय वकील से सलाह और मदद प्राप्त करना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में विवाहित पुत्रियों को कृषि भूमि में हिस्सा नहीं।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

अनिता तिवारी ने सोरों कासगंज, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

ग्रीकल्चर लैंड की 22 बीघा जमीन मेरे नाम ना आकर मेरे भाई के नाम आ गयी है। हम दो बहनें एक भाई शादी शुदा हैं ये जमीन मेरी माँ के पास थी मेरी माँ की म्रत्यु सन 2008 में हो चुकी है। मैं जानना चाहती हूँ की बेटी का हक माँ की जमीन पर क्यों नहीं? मेरा भाई उस जमीन को बेच बेच कर शराब व जुआ तथा अनैतिक कार्यों में लगा रहा है। कोई कानून है जिस से मैं अपने भाई को जमीन बेचने से रोक सकूँ या मैं अपना हिस्सा पाने के लिए किस कानून के तहत मुकदमा डालूं।

समाधान-

ह आप का दुर्भाग्य है कि आप की जमीन उत्तर प्रदेश में है। लगभग पूरे देश में कृषि भूमि पर हिन्दू उत्तराधिकार कानून प्रभावी है। लेकिन उत्तर प्रदेश इस मामले में आज के भारत में नहीं, 18वीं सदी के किसी राजा के राज्य में स्थित है। वहाँ कृषि भूमि के मामले में आज भी यही कानून है कि विवाहित पुत्रियों को कृषि भूमि पर हिस्सा तब मिलता है जब परिवार में दूर दूर तक कोई पुरुष ही नहीं हो। अविवाहित पुत्रियों को हिस्सा भी 2008 में किए गए संशोधन के बाद मिलने लगा है।

त्तर प्रदेश की महिलाएँ और कथित नारीवादी अभी तक सोए हुए हैं। उन्हें जागने और यह कानून बदलवाने की जरूरत है। आप आवाज उठाइए। अन्य लोगों के साथ मिल कर उठाइए। भाई यदि इस तरह संपत्ति को बर्बाद कर रहा है तो उस के पत्नी और बच्चे सवाल कर सकते हैं। इस मामले में आप किसी स्थानीय वकील से संपर्क कर सलाह लें तो हो सकता है वह आप से पूरी परिस्थितियाँ जान कर कोई उपाय बता सके।

संपत्ति पुश्तैनी हो तो पुत्र भी बँटवारे का वाद संस्थित कर सकता है।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राहुल राठौड ने थांदला, मध्यप्रदेश जिला झाबुआ से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी के दो भाई है जिसमे तीसरे नंबर पर मेरे पिताजी आते है जो सबसे छोटे है और मेरे दादाजी की मृत्यु हुए लगभग 10 साल हो गए है और उनकी जो जमीन थी उस का उन्होंने बंटवारा नहीं किया था। उनकी जमीन तीन अलग अलग स्थानों पर थी और जमीन का कोई बंटवारा नहीं होने के कारण तीनो स्थानों की जमीन मेरे दादाजी के तीनो लडको के नाम पर है। समस्या यह है कि जो मेरे पिताजी के दो भाई है उन्होंने मेरे पिताजी को बहला फुसलाकर दो स्थानों वाली अच्छी जमीन ले ली और जो जमीन तीसरे स्थान पर थी और जिसकी आज की तारीख में बहुत कम कीमत है वो हमें दे दी। ये मात्र मौखिक आधार पर हुआ है, अभी तक तीनों स्थानो की जमीन की अलग अलग रजिस्ट्री नही हुई है। लेकिन समस्या यह है कि मेरे पापा उनकी बातों में आ गये हैं और वो कुछ बोलते नहीं और हम चाहते है कि तीनों स्थानों की कुल जमीन का बंटवारा बराबर हो और तीनों को बराबर हिस्सा मिलना चाहिए। मुझे बताये की ऐसा कैसे हो सकता है जबकि पापा उनकी तरफ हो। क्या कोर्ट में इसका समाधान हो सकता है या नहीं?

समाधान-

प को सब से पहले यह जानना चाहिए कि आप की यह जमीन पुश्तैनी है या नहीं। पुश्तैनी का अर्थ यह है कि यह जमीन 17 जून 1956 के पहले आप के परिवार के किसी पुरुष पूर्वज को उत्तराधिकार में मिली थी या नहीं। यदि ऐसा है तो आप उक्त जमीन के बंटवारे का वाद राजस्व न्यायालय में दायर कर सकते हैं। बंटवारे के वाद में ठीक से बंटवारा हो सकता है जिस में सारी जमीनों की किस्म का भी ध्यान रखा जाए।

मौखिक बंटवारा केवल आपसी कब्जे का बंटवारा होता है वह राजस्व रिकार्ड में दर्ज नहीं होता। यह एक तरह से आपसी सहमति है जो तब तक जारी रहती है जब तक कानूनी रूप से बंटवारा न हो जाए। बंटवारा आपसी सहमति से बंटवारा नामा पंजीकृत कराने से भी हो सकता है और न्यायालय द्वारा भी हो सकता है।

राजस्व अर्थात खेती की जमीन के मामले राज्यों के कानून से शासित होते हैं और उन में बहुत विविधता होती है। दूसरी अचल संपत्तियों से खेती की जमीन भिन्न होती है। उस पर मालिकाना अधिकार सरकार का होता है कृषक केवल खातेदार होते हैं। इस कारण आप को चाहिए कि आप इस मामले में किसी स्थानीय राजस्व मामलों के वकील से सलाह करें और उस के अनुसार उपयुक्त कदम उठाएँ।

जमीन पर कब्जा प्राप्त करने के लिए राजस्व न्यायालय में वाद प्रस्तुत करें।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

दीप नवेरिया ने ग्राम रानेह, तहसील हट्टा, जिला दमोह, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने एक कृषि की जमीन दो एक साल पहले खरीदी थी। एक साल बाद उसका सीमांकन करवाया तो पता चला कि वह जमीन दूसरा ब्यक्ति दस साल से जोत रहा है, उसकी जमीन उसी क्षेत्र में दूसरी तरफ है और उसकी जमीन कोई दूसरा जोत रहा है लेकिन यह न तो अपनी जमीन का सीमांकन करवा रहा है और न ही हमारी जमीन जो माँ ने खरीदी थी उसे छोड़ रहा है। इसके लिये मैंने पुलिस के पास रिपोर्ट की थी कि मेरी क्रय जमीन दूसरा जोत रहा है। इसके लिये पुलिस कार्यवाही कर रही है जिसमें पुलिस सबके बयान ले रही है। उसके भी बयान लिये गये जिससे हम ने जमीन खरीदी है लेकिन वह महिला जिसकी जमीन थी पुलिस के पास यह कह रही है कि मैंने जमीन नही बेची। यह मुझसे धोका में विक्रय की गई है। मेरे पास जमीन के पूर्ण सरकारी कागज हैं रजिस्ट्री है, बही है, खसरा नक्शा है, इंटरनेट पर रिकार्ड है। फिर भी वह महिला उस ब्यक्ति के दबाब में बयान दे रही है जो उस महिला की जमीन दस साल से जोत रहा है। महिला 80 साल की है क्या सर पुलिस के पास यह केस सुलझ सकता है या कोर्ट में केस कर सकते हैं? किस कोर्ट में केस करना सही होगा? वह महिला दबाब में पलट रही है जिसने हमे जमीन बेची। क्या यह हमारे लिये नुकसान पहुँचा सकता है? क्या उस महिला के बयान से रजिस्ट्री फेल हो सकती है जो एक साल पहले हमने खरीदी थी कृपा मुझे सुझाव दीजिये।

समाधान

प को इस मामले में तुरन्त स्थानीय वकील से संपर्क करना चाहिए। कुछ तथ्य हैं जो आप की समस्या से गायब हैं। जमीन आप खरीद चुके हैं लेकिन जमीन पर कब्जा किसी और का है। आप जमीन के स्वामी तो हो गए हैं लेकिन आप को कब्जा नहीं मिला है। नपवाने पर पता लगा कि दूसरा उस पर काबिज है। दूसरा काबिज है यह बात आप को सरकारी सीमांकन से पता लगी है तो वह सही है। आप को उस जमीन पर अपने मालिकाना हक के आधार पर कब्जा प्राप्त करने के लिए राजस्व न्यायालय में वाद प्रस्तुत करना चाहिए। इस के लिए स्थानीय स्तर पर किसी राजस्व मामले देखने वाले अच्छे वकील से संपर्क कर के उस की मदद लेना उचित होगा।

प उस जमीन के स्वामी हैं। उस महिला द्वारा बयान दे देने मात्र से पंजीकृत विक्रय पत्र निरस्त नहीं होगा। इस के लिए उस महिला को विक्रय पत्र निरस्त करवाने के लिए दीवानी वाद रजिस्ट्री की तिथि से 3 वर्ष की अवधि में प्रस्तुत करना होगा। जिस में जमीन की रजिस्ट्री में अंकित कीमत पर उसे कोर्ट फीस अदा करनी होगी। यह कोर्ट फीस कोई दे सकेगा इस में संदेह है। इस कारण हमें लगता है कि आप का उस जमीन पर स्वामित्व सुरक्षित है। आप ने जो रिपोर्ट कराई है उस से आप को या किसी अन्य व्यक्ति को कुछ हासिल होगा यह संदेहास्पद है. ऐसे मामलों में पुलिस दीवानी या राजस्व मामला बता कर अन्तिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर देती है।

स कारण आप को चाहिए कि आप तुरन्त किसी राजस्व वकील से मिल कर अपने स्वामित्व की भूमि पर कब्जा प्राप्त करने हेतु कार्यवाही करें। देरी न करें।

उत्तर प्रदेश में विवाहित पुत्रियों को कृषि भूमि में उत्तराधिकार नहीं।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

अनीता तिवारी ने बदरिया, सोरों, कासगंज, उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ को उनके मौसिया ससुर ने 22 बीघा (एग्रीकल्चर लैंड) कृषि भूमि सन् 1988 में वसियत कर दी थी। मेरी माँ की मृत्यु सन 2008 में हो गयी। ये 22 बीघा जमीन के साथ एक मकान है। मेरी माँ के मरने के बाद जमीन व मकान लेखपाल ने मेरे भाई के नाम कर दिए। हम तीन भाई बहन हैं हम तीनों ही शादीशुदा व बाल बच्चेदार हैं। हम दो बहनें एक भाई है। क्या मुझे माँ की पुश्तैनी जमीन व मकान में से हिस्सा मिल सकता है? हम ने कोर्ट में मुकदमा डाला हमारे एडवोकेट ने हम से कहा कि शादी शुदा बेटी के लिए जमीन व मकान में हिस्सा नही मिल सकता। वकील ने कहा कि कौन से कानून के तहत व कौन सी धारा में मुकद्दमा डालूँ? मुझे हर हालत में अपनी माँ की पुश्तैनी एग्रीकल्चर लैंड की जमीन व मकान में हिस्सा चाहिए। एडवोकेट बार बार मना कर रहा है कि यह एग्रीकल्चर लैंड की जमीन में हिस्सा मिलना कानून में ही नहीं है। कृपया कर धारा व कानून बताएँ।

समाधान

ब से पहले तो हम आप को बताना चाहते हैं कि आप की कृषि भूमि और मकान पुश्तैनी संपत्ति नहीं हैं। पुश्तैनी संपत्तियाँ केवल वही हैं जो 17 जून 1956 के पूर्व किसी हिन्दू पुरुष को अपने पुरुष पूर्वज अर्थात् पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। आप की माताजी को संपत्ति वसीयत से प्राप्त हुई है जो कि पुश्तैनी नहीं है। वैसे भी 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होने के बाद से स्त्रियों की संपत्ति उन की व्यक्तिगत संपत्ति ही मानी जाती है वह पुश्तैनी नहीं होती।

भारत में कृषि भूमि राज्यों के कानूनों से शासित होती है। कृषि भूमि का स्वामित्व राज्य का होता है, तथा कृषक उस पर केवल एक खातेदार होता है अर्थात उस की हैसियत किराएदार जैसी होती है। उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि पर हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी न हो कर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है जिस में विवाहिता पुत्रियों को उत्तराधिकार में सम्मिलित नहीं किया गया है, अविवाहित बेटियों को भी 2008 में सम्मिलित किया गया है। इस तरह आप के वकील सही कहते हैं कि विवाहित पुत्री को कृषि भूमि में उत्तराधिकार प्राप्त नहीं है। इस कृषि भूमि में आप का और आप की बहिन का कोई हिस्सा नहीं है। आप को उन की बात पर विश्वास करना चाहिए। यदि आप को विश्वास न हो तो आप किसी दूसरे वकील से मिल कर बात कर सकते हैं। यदि दो राय हो जाएँ तो जरूर एक गलत होगी, उस की पुष्टि किसी तीसरे से की जा सकती है।

कान यदि कृषिभूमि का हिस्सा है तो वह भी इसी अधिनियम से शासित होगा और उस में भी आप का हिस्सा नहीं है। लेकिन यदि मकान आबादी भूमि पर है तो उस में आप का हिस्सा हो सकता है क्यों कि आबादी भूमि पर स्थित संपत्ति पर हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होगा। इस मामले में आप स्पष्ट रूप से स्थानीय वकील को बताएँ कि मकान आबादी भूमि पर है उस में आप का हिस्सा हो सकता है। वह आप को स्थानीय कानून के अनुसार राय दे देगा।

माता-पिता की सेवा करने मात्र से कोई पुत्र उन की संपत्ति का अधिकारी नहीं होता।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

सुरेश प्रजापत ने डूंगरपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी का देहांत करीबन १५ वर्ष पहले हो चुका है। हम तीन भाई हैं और हमारे पिताजी से प्राप्त सभी भूमि का बटवारा राजस्व के अनुसार हमारे तीनों भाइयों के नाम है। उक्त भूमि अपने अपने हिस्से का उपयोग या बेचान हेतु तीनों की बिना अनुमति से उपयोग लिए क्या करना चाहिए? क्योंकि मेरे दो भाई किसी भी मामले में साथ नहीं दे रहे हैं ओर मेरे हिस्से की जमीन भी मुझसे हस्तान्तरण नहीं करने दे रहे हैं और वक्त पर कहीं भी हस्ताक्षर नहीं करने आते हैं। मेरी माताजी अभी मेरे पास ही रहती हैं लेकिन वो हमेशा मेरे बड़े भाई का पक्ष लेती हैं। इस मामले में क्या हमारी माताजी किसी एक पुत्र को हमारी जमीन नाम कर सकती है ? उक्त मामले में मुझे क्या करना चाहिए? मेरे माताजी करीबन २० वषों से मेरे पास ही है उन का पालन पोषण मैं ही करता हूँ मेरे बड़े भाई अपनी अपनी शादी करके पहले से अलग हो गए हैं। आज से २० वर्ष पहले मुझे माँ के नाम अलग से हिस्सा देने की बात की थी लेकिन वो मोखिक बात थी। अभी बड़े भाई इस बात को मानने को राजी नहीं हैं, माताजी मेरे पास रहती है उसका प्रमाण मेरे पास अपना मुखिया का राशन कार्ड है। क्या मैं राशन कार्ड को आधार मानते हुए माँ का अलग से हिस्सा ले सकता हूँ? बल्कि हमारी माँ को मैं ने २० साल तक सेवा की है मगर फिर भी वे मेरे पक्ष में नहीं है उसका कारण मेरे बड़े भाई ने माँ को अभी विदेश घुमाने का लालच दे रखा है माँ अभी गुमराह हो रही है। बल्कि २० वर्ष पहले दोनों भाई हमें माता पिता की सम्पति से कुछ भी हिस्सा नहीं चाहिए एसा कह करके अपनी शादी करके माताजी को मेरे भरोसे छोड़ करके परिवार से अलग हो गए थे। मेरे पास लिखित प्रमाण नहीं होने का अभी वो फायदा उठा रहे हैं। आप बताएँ मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान

प के पिताजी के देहान्त के उपरान्त राजस्व विभाग में आप के पिता के भूमि के खाते का इन्तकाल, नामान्तरण हुआ होगा। जिस में आप तीनों भाइयों और आप की माताजी का नाम  हिस्से दर्ज हुए होंगे। लेकिन इसे बंटवारा नहीं कहा जा सकता। आज भी राजस्व रिकार्ड में जमीन संयुक्त होना चाहिए। यह आप खाते की नकल के माध्यम से या राजस्थान का अपना खाता इंटरनेट पर खोल कर खुद देख सकते हैं।

लग अलग खाते करने और अपनी अपनी जमीन पर पृथक कब्जा प्राप्त करने के लिए आप चारों को आपस में मिल कर पारिवारिक समझौता कर के बंटवारा करना होगा और उस के आधार पर अलग अलग खाते कराए जा सकते हैं या फिर बंटवारे का दावा कर के न्यायालय से निर्णय कराना पड़ेगा। लेकिन कोई भी खातेदार संयुक्त खाते में अपने हिस्से की जमीन को बिना बंटवारा किए भी हस्तान्तरित कर सकता है। उस में सहखातेदारों के हस्ताक्षर की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने हिस्से की जमीन या उस का कोई भी हिस्सा वह विक्रय कर सकता है इस के लिए वह विक्रय पत्र निष्पादित कर उसे पंजीकृत करवा सकता है और अपने कब्जे की जमीन में से विक्रय की गयी जमीन के बराबर जमीन क्रेता के कब्जे में दे सकता है।

स से क्रेता को जमीन पर कब्जा भी मिल जाता है और वह उस का टीनेंट भी हो जाता है। संयुक्त खाते में उस का नाम एक हिस्सेदार के रूप में दर्ज हो जाता है। बाद में क्रेता स्वयं या कोई भी हिस्सेदार संयुक्त खाते का बंटवारा करवा कर सब के खाते अलग अलग करवा सकता है।

हाँ तक माता जी और भाइयों का प्रश्न है वह भावनात्मक अधिक है। पुत्रों का फर्ज है कि वे माता पिता की उन के जीवन काल में उन की सेवा करें। आप कर रहे हैं और आप के भाई नहीं कर रहे हैं। फिर भी आप की माता जी बड़े भाई का पक्ष लेती हैं तो आप कुछ नहीं कर सकते। आप उन का भरण पोषण कर रहे हैं इस कारण माता जी का हिस्सा आप का नहीं हो सकता। कर्तव्य निभाने से अधिकार नहीं मिलता है। पहले भाई कुछ कहते थे अब कुछ कहते हैं इस से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। माताजी किसी भी पुत्र को अपना हिस्सा दे सकती हैं या फिर किसी को नहीं दे सकती हैं। यदि किसी को नहीं देती हैं या वसीयत भी नहीं करती हैं तो उन का हिस्सा उन के जीवनकाल के उपरान्त तीनों भाइयों को बराबर मिल जाएगा। लेकिन वह सारी भूमि को किसी एक को नहीं दे सकतीं क्यों कि वे भी एक हिस्से की ही टीनेंट हैं अर्थात यदि आप तीन भाई और माताजी के अलावा कोई हिस्सेदार नहीं है तो उन का हिस्सा भी चौथाई ही है और पास तीनों भाइयों के हिस्से भी चौथाई ही हैं। मेरा तो मानना है कि आप की माताजी समझदार हैं। वे आप के साथ रहती हैं। लेकिन आप को यह नहीं कहना चाहतीं कि उन का सारा हिस्सा आप का है। इस से वे अपने दो बेटों से सदा के लिए दूर हो जाएंगी जो कोई भी माँ नहीं चाहती। बल्कि आप को हमेशा चिन्ता में बनाए रखती हैं और दोनों बेटों को इस लालच में रखती हैं कि वे उन्हें भी हिस्सा दे सकती हैं।

म ने अपनी राय रख दी आगे आप को क्या करना है? यह निर्णय तो आप को खुद ही करना होगा।

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