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अपराधिक मुकदमे अभियुक्त की उपस्थिति के बिना आगे नहीं बढ़ते।

समस्या-

राधेश्याम गुप्ता ने इंदौर , मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैंने इंदौर जिला कोर्ट में २०१३ से धारा १३८ का परिवाद प्रस्तुत किया था, आरोपी ने मुझे २,१५०००/- का चेक दिया था जो बैंक में अनादरित हो गया था। उसके पश्चात मैंने केस दायर किया था, जो कि अभी तक चल रहा है। नोटिस, जमानती वारंट के बाद अब गिरफ्तारी वारंट तक जारी हो चुका है, परन्तु आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है।  मैंने परिवाद में आरोपी के दो पते दिए हुए हैं, एक उसका स्वयं का घर जहाँ उसकी माँ रहती है और दूसरा उसके ससुराल का जहाँ वह ज्यादातर रहता था। आरोपी कैसे पकड़ में आये और पुलिस और कोर्ट से मुझे कैसे राहत मिल सकती है, जिससे कि मेरा पैसा मुझे जल्द से जल्द मिल सके। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।


समाधान-

ह एक बड़ी समस्या है। कोर्ट में मुकदमा करने के बाद कोई भी व्यक्ति आप की तरह यह सोचता है कि अब तो पैसा वसूल हो ही जाएगा। वह हो  भी जाता है यदि अभियुक्त पकड़ में आ जाए। लेकिन इस के लिए कोर्ट केवल समन, जमानती या गैरजमानती वारंट जारी कर सकता है। पुलिस ही अभियुक्त को पकड़ कर लाएगी। पुलिस के पास पहले ही बहुतेरे काम हैं। अब 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अभियुक्तों को पकड़ने का काम भ ी उस के जिम्मे है। पुलिस की स्थिति आप जानते हैं कि यदि उसे पता हो कि किसी को गरज है तो अदना सा सिपाही भी अकड़ कर चलता है, जब तक उस की पर्याप्त फीस नहीं मिल जाती वह सरकता नहीं है या फिर ऊटपटांग रिपोर्ट लिख कर समन /वारंट अदालत को वापस लौटा देता है। इस मामले में आप अधिक से अधिक यह कर सकते हैं कि अदालत से वारंट दस्ती प्राप्त कर लें उस थाने के नाम पर जिस थाने के सिपाही को आप साथ ले जा सकें। जैसे ही आप को पता लगे कि अभियुक्त एक खास स्थान पर है तब आप सिपाही को ले जा कर उसे गिरफ्तार करवा सकते हैं।

इतना तो आप भी जानते होंगे कि यह एक अपराधिक मुकदमा होता है, अभियुक्त की उपस्थिति के बिना इस मेंं आगे कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। यदि एक बार पकड़ में आ कर अदालत से जमानत पर छूट जाने के बाद भी यदि अभियुक्त गैर हाजिर हो जाता है तो भी मुकदमा वहीं रुक जाता है,आगे नहीं बढ़ता है। यह एक प्रकार का छिद्र है जिस के कारण देश में हजारों मामलों की सुनवाई लटकी पड़ी है।

जमानत के बाद पेशी पर हाजिर न होने पर गिरफ्तारी वारंट जारी होना व गिरफ्तारी होना सामान्य प्रक्रिया है।

समस्या-

प्रियंका गौतम ने इस्लामपुरा, सोरन, जिला टोंक राजस्थान से पूछा है-

मेरे पापा को 20 अगस्त 2016 को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है दारू के केस में जो कि 2006 का केस है। मेरे पापा की पिछली बार हम ने जमानत पर छुड़वाया था उस के बाद ताऱीख पर न जाने के कारण कोर्ट ने उन को भगोड़ा घोषित कर दिया। कोर्ट ने उन को भगोड़ा घोषित क्यों किया? 2010 के बाद कोई पुलिस वाला हमारे पास नहीं आया, कोई नोटिस नहीं आया।

 

समाधान-

ब दारू के केस में आप के पापा पहली बार पकड़े गए तो अदालत ने उन की जमानत ले कर उन्हें छोड़ दिया क्यों कि जमानत इस बात की थी कि वे हर तारीख पर अदालत में हाजिर होते रहेंगे। लेकिन वे तारीख चूके और उन का गिरफ्तारी वारंट निकला। आप ने उन की जमानत करवा ली। वे फिर से तारीख पर नहीं गए तो फिर से जमानत जब्त हो गयी और फिर गिरफ्तारी वारंट निकल गया।

इस तरह यह जरूरी नहीं है कि गिरफ्तारी वारंट निकालने के लिए किसी मुलजिम को फरार या भगोड़ा घोषित किया ही जाए और उस के पहले उसे तथा उस के पते पर कोई नोटिस या समन भेजा ही जाए।

हमें नहीं लगता कि आप के पिताजी को भगोड़ा घोषित किया गया है।दो-तीन बार जमानत पर छोड़े जाने के बाद भी कोई अभियुक्त पेशी चूके तो उसे भगोड़ा घोषित किया जा सकता है उस के लिए उस की संपत्ति को कुर्क करना होता है। यदि उन की संपत्ति कुर्क की गयी होती तो संपत्ति पर नोटिस जरूर चस्पा होते।

आप अपने पापा की जमानत करवा सकते हैं, हालांकि यह आसानी से नहीं होगी। फिर भी एक दो सप्ताह जेल में रहने के बाद हो सकती है। आप को प्रयत्न करना चाहिए।

काउंसलिंग वैवाहिक विवादों का अच्छा समाधान प्रस्तुत कर सकती है

समस्या-

मेरी शादी 2008 में हुई थी।  दो साल बाद मेरी जुड़वाँ बेटियाँ हुई जिनको मेरी पत्नी पालना नहीं चाहती थी और 25 दिन के बच्चों को छोड़ कर घर में क्लेश कर के और मेरे ऊपर मिथ्या आरोप लगाते हुए दोनो बच्चों को मेरे पास छोड़ कर मायके चली गयी थी।  रिश्तेदारों से काफ़ी बात-चीत करने के बाद लगभग 8 माह बाद वह वापस आ गयी।  दो- चार दिन ठीक से रहने के बाद फिर से क्लेश करना शुरू कर दिया।  क्लेश की वजह से मैं तनाव में रहने लगा।  वह हर वक़्त तलाक लेने की धमकी, या फिर आत्महत्या लेने की या फिर जेल मे बंद कराने की धमकियाँ देने लगी।  चार माह तक मेरे घर में ज़बरदस्ती रहने के बाद एक बेटी को लेकर बिना कुछ कहे वापस अपने मायके चली गई।  इन 4 महीनों में एक बार भी मेरा उस के साथ शारीरिक संबंध नहीं हुआ।  पिछले 9 माह से मैं एक बेटी को पाल रहा हूँ और एक उसके पास है।  ना तो कोई उसने क़ानूनी कार्यवाही की है और ना ही संपर्क करने की कोशिश की है।  जिन रिश्तेदारों के माध्यम से मेरी बात होती थी अब उन लोगो ने कुछ भी कहना सुनना बंद कर दिया है।  मुझे ही अपने जीवन से नफ़रत होने लगी है।  मुझे कोई रास्ता नही दिखाई दे रहा है।  कोई वकील धारा-9 के मुकदमे की सलाह देता है, लेकिन उसमें खर्चे आदि के मुक़दमे हो सकते हैं।  कोई वकील केवल काउंसलिंग के लिए कहता है।  जिसका कोई लाभ नहीं।  समझ में नही आता मैं क्या करूँ?  मेरे घर में मेरी 58 वर्ष की माँ हैं जो अध्यापन करती हैं,  एक भाई ड्रग एडिक्ट है, एक बहिन है जो बैंक में नौकरी करती है और एक मेरी 2 वर्ष की बेटी है।  एक बेटी पत्नी अपने साथ ले गई है।  मेरी केवल मोबाइल रिपेयर की दुकान है।  जिससे महीने का खर्च भी मुश्किल से चलता है।  जैसे तैसे करके गुजारा करता हूँ।  तनाव काफ़ी होने के वजह से दुकान पर भी ध्यान नहीं दे पा रहा हूँ।  लेकिन बेटी को पालने में कोई कसर नही छोड़ता हूँ।

 1-मुझे क्या अपनी पत्नी से तलाक़ मिल सकता है?

2-क्या मैं दूसरी बेटी की माँग कर सकता हूँ?

3-क्या मुझे जेल में जाना पड़ सकता है?

4-क्या मुझे खर्चा आदि भी देना पड़ सकता है?

 –वरुण, बरेली, उत्तर प्रदेश

 समाधान-

प ने पूर्व में भी अपनी समस्या तीसरा खंबा को भेजी थी,  जिस का समाधान भी किया गया था।  आप को चाहिए था कि कम से कम आप उस तिथि का उल्लेख अवश्य करते जिस तिथि को आप ने अपना प्रश्न भेजा था या तीसरा खंबा ने समाधान प्रकाशित किया गया था।  इस से हमें पुराना सूत्र तलाशने में आसानी होती। खैर, हम आप की समस्या का पुनः समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के द्वारा दिए गए विवरण से पता लगता है कि आप की समस्या का आरंभ दो जुड़वाँ पुत्रियों के पैदा होने के साथ हुआ है।  हो सकता है आप की पत्नी संतान को जन्म देने के लिए ही तैयार नहीं रही हो और जब उसे पता लगा हो कि वह संतान को जन्म देने वाली है तो वह परेशानी में आ गई हो।  फिर किसी तरह उस ने एक संतान के लिए स्वयं को तैयार भी कर लिया हो। लेकिन जब जुड़वाँ बेटियाँ मिली हों तो वह परेशान हो गई हो और उस परेशानी से न निपट पाने के कारण अपनी ही संतानों को छोड़ कर चली गई हो। पत्नी के इस तरह चले जाने पर ही आप सब को पत्नी की समस्या के रूप में देखना चाहिेए था। लेकिन संभवत: उसे पत्नी के दोष के रूप में देखा गया।  अनेक बार ऐसा होता है कि हम किसी घटना को अपने जीवन में अभी नहीं देखना चाहते लेकिन वह अनायास आ पड़ती है तो घबरा उठते हैं।  लेकिन जीवन इस से तो नहीं चलता। जीवन तो आने वाली समस्याओं का सामना करने से चलता है।  मेरे विचार में आप को काउंसलिंग पर विचार करना चाहिए।  हो सकता है कि पहले जब आप की पत्नी आप के पास आई हो तो यह सोच कर आई हो कि जैसे भी हो वह अपनी संतानों को पालेगी।  हो सकता है आप ने और आप के रिश्तेदारों ने यह आश्वासन दिया हो कि सास और पति उसे इस काम में मदद करेगा।  लेकिन आप की माता जी अपने अध्यापन के कार्य के कारण और आप अपने व्यवसाय के कारण इस बात पर ध्यान ने दे सके हों। मुझे लगता है आप, आप की पत्नी और आप की माता जी तीनों को काउंसलिंग की आवश्यकता है।

प ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि मायके से लौट कर आने के बाद आप का पत्नी से कोई शारीरिक संपर्क नहीं हो सका है।  जो स्त्री एक बार में ही अनिच्छा से दो संतानें प्राप्त कर चुकी हो वह असुरक्षित यौन संबंध से तो निश्चित ही दूर रहेगी।  मुझे तो इस में कुछ भी गलत नहीं लगा।  इस के लिए आप को चाहिए कि आप सुरक्षित और स्थाई प्रकार के सुरक्षा उपाय कर सकते थे जिस से संतान उत्पन्न न हो।  यदि परिस्थितियाँ ऐसी ही रही हैं तो आप को काउंसलिंग पर ध्यान देना चाहिए। यदि परिस्थिति ऐसी ही रही है तो काउंसलिंग एक अच्छी चीज है आप को उस तरफ ध्यान देना चाहिए। अभी तक आप की पत्नी ने कोई कानूनी कदम नहीं उठाया है, इस स्थित में काउंसलिंग आप की समस्या का एक अच्छा समाधान प्रस्तुत कर सकती है।  मेरा मानना तो यह है कि आप को यह सोच कर कि पत्नी की परेशानियों का हल किस प्रकार निकाला जा सकता है, कोई योजना बनानी चाहिए।  फिर आप को अपनी ससुराल जा कर अपनी पत्नी से बात करनी चाहिए कि आप उस की परेशानी नहीं समझ सके थे, लेकिन अब आप की समझ में आ गया है कि उस की परेशानी क्या है। अब बच्चे तो हो ही गए हैं, उन का पालन पोषण करना तो माता-पिता का दायित्व है। दोनों किसी तरह संभालेंगे।  अपनी पत्नी को मनाइये और घर ले आइये।  निश्चित रूप से यह काम एक बार में सम्भव नहीं है। लेकिन तीन-चार बार में अवश्य हो जाएगा।  इस काम में आप किसी ऐसे व्यक्ति की भी मदद ले सकते हैं जिस पर आप की पत्नी विश्वास कर सके।  आप की पत्नी की कोई सहेली हो तो उस के माध्यम से यह काम आसानी से हो सकता है। लेकिन आप को पहले उसे समझाना पड़ेगा। एक बार वह समझ गई तो फिर आप को अपनी पत्नी को समझाना आसान हो जाएगा।

प ने पूछा है कि आप को तलाक मिल सकता है क्या?  तलाक के लिए किसी न किसी ऐसे आधार की आवश्यकता आप को होगी जो कि तलाक के लिए कानून द्वारा निर्धारित हैं।  मुझे अभी तो ऐसा कोई आधार दिखाई नहीं दे रहा है।  हाँ, जब आप की पत्नी को अंतिम बार आप का घर छोड़े एक वर्ष हो जाए तो आप एक वर्ष के लगातार दाम्पत्य त्याग के आधार पर आप तलाक की अर्जी लगा सकते हैं।  लेकिन उस में वही सब परेशानियाँ खड़ी होंगी।  आप को न केवल अपनी पत्नी के लिए अपितु अपनी पुत्री के लिए भी तुरंत उतना खर्चा देना होगा जितना अदालत निर्धारित कर देगी।  आप की क्षमता ऐसी नहीं कि आप निरंतर खर्चा दे सकें।

प अपनी बेटी की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।  लेकिन उस स्थिति में न्यायालय इस आधार पर निर्णय करेगा कि बेटी का हित कहाँ रहने में है। यह सब न्यायालय के समक्ष लाए गए तथ्यों और साक्ष्य पर निर्भर करेगा।

स विवाद के बीच यदि आप की पत्नी धारा 498क और 406 आईपीसी का मुकदमा दर्ज करवा दे या फिर धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में आवेदन प्रस्तुत करे उस में यह आदेश हो जाए कि पत्नी और पुत्री के लिए हर माह निश्चित खर्च देना होगा और आप वह खर्च न दे सकें तो आप को जेल भी जाना पड़ सकता है।

प को पत्नी और पुत्री का खर्चा देना पड़ सकता है।  एक बार पत्नी के भरण-पोषण की राशि अदा करने से आप को भले ही मुक्ति मिल जाए।  लेकिन पुत्री के भरण पोषण का खर्चा तो आप को देना ही होगा।

न तमाम परिस्थितियों में केवल एक मार्ग आप के सामने शेष रहता है कि आप पत्नी की मानिसिकता और परेशानी को समझें और उसे समझाएँ उस की मदद करें तो हो सकता है आप का और आप की पत्नी का यह गृहस्थ जीवन बच सके।  इन तमाम परिस्थितियों में आप यह भी सोचें कि आप को दोनों पुत्रियाँ मिल जाएँ और पत्नी से तलाक हो जाए तब भी आप क्या पुत्रियों को उन की माँ दे सकते हैं।  अभी भी आप की एक पुत्री माँ से वंचित है तो दूसरी पिता से वंचित है।  यदि आप प्रयास कर के दोनों को माता-पिता दे सकें तो यह सब से उत्तम होगा। आप की समस्या का हल भी इसी में से निकलेगा।  तीसरा खंबा आशा करता है कि आप अपनी समस्या को हल कर पाएंगे और अपना, अपनी पत्नी और अपनी पुत्रियों के पटरी पर से उतरे हुए जीवन को फिर से पटरी पर ला सकेंगे।

पुलिस लोगों को खेती नहीं करने दे रही है तो मानवाधिकार आयोग को शिकायत करें

समस्या-

गाँव में हुए दो गुटो की लडाई में 7 लोग मारे गये हैं। दुसरे गुट ने 56 लोगों के नाम इस केस में दर्ज कराए हैं।  एक परिवार के 5 लोग पिछले महीने से जेल में बंद है और दो लोग फरार हैं। पुलिस इसी बिना पर हमें खेती नहीं करने दे रही है कि जब तक दो लोग गिरफ्तार नहीं हो जाते हैं, आप लोग खेती नहीं कर सकते हैं। अब हम क्‍या करें कि इस मुसीबत से छुटकारा मिले और हम खेती का काम कर सकें।  जो लोग फरार हैं उनके नाम कोई खेती नहीं है।

-अमजद, विदिशा, मध्यप्रदेश

उत्तर-

प की समस्या कानूनी कम और प्रशासनिक अधिक है।  हमारी पुलिस के पास साधन कम हैं।  वे शेष अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के मुकदमे में चालान प्रस्तुत करना चाहते हैं।  वे अभियुक्तों को पकड़ नहीं पा रहे हैं। अब वे गाँव के उन लोगों पर दबाव बना रहे हैं जो उन के परिचित या रिश्तेदार हैं।  पुलिस की समझ यह है कि उन लोगों को परेशान करने से वे भी फरार अभियुक्तों की खोज में मदद करेंगे और जैसे ही उन का पता लगेगा उन्हें गिरफ्तार कर लेंगे।  उधर अभियुक्तों को भी जब यह सूचना मिलेगी कि उन के रिश्तेदारो को इस लिए परेशान किया जा रहा है कि वे गिरफ्तार नहीं हो रहे हैं, वे भी सोचेंगे कि एक दिन गिरफ्तार होना है तो कम से कम रिश्तेदारों को तो इस मुसीबत से बचाया जाए। पुलिस द्वारा आप लोगों को परेशान करने के पीछे यही मानसिकता है।

लेकिन यह भी सही है कि अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर पाना पुलिस की नाकामी है।  यदि वे उन की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने के लिए बेकसूर लोगों खेती नहीं करने दे रहे हैं तो यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है।  इस के लिए आप लोगों को जिन्हें खेती नहीं करने दी जा रही है, मानवाधिकार आयोग को शिकायत करनी चाहिए।  इस संबंध में आप अपने जिले में या उस के आसपास के जिलों में काम करने वाले मानवाधिकार संगठनों की मदद भी ले सकते हैं।  इस मामले में आप अपने यहाँ के विपक्षी राजनैतिक दल की भी मदद ले सकते हैं।  अक्सर यह भी होता है कि अनेक बार विपक्षी राजनैतिक दल भी इस तरह के मामलों में दखल नहीं देते।  वैसी स्थिति में आप आसपास काम करने वाले सामाजिक संगठनों की मदद ले कर राजनैतिक दबाव बना सकते हैं।  पुलिस पर राजनैतिक दबाव बनाने पर ही आप की समस्या का शीघ्र हल निकल सकेगा।

किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध हो जाने के बाद ही सजा दी जा सकती है

समस्या-

मैं ने अपने पति और सास, ससुर के विरुद्ध दहेज, मारपीट, गाली गलौच का मुकदमा पेश किया हुआ है। केस करते ही पति गिरफ्तार हो गया। लेकिन सास और ससुर को गिरफ्तार नहीं किया गया। ससुर पुलिस में हैं शायद इस लिए वे लोग जमानत पर छूट गए। मुकदमा कर देने के बाद भी अभी तक उन के खिलाफ कोई वारंट भी नहीं निकला है और वे सभी खुले आम घूम रहे हैं। आखिर उन्हें सजा कब मिलेगी? उन के खिलाफ मेरे पास रिकार्डिंग भी है। जिस में उन सब ने हमें जान से मारने की धमकी भी दी हुई है। ये एफ.आई.आर. मैं ने दिसम्बर 2009 में करवाई थी। अभी तक इस का कोई अता-पता नहीं है। क्या ये मुकदमा रद्द हो गया है?  मुझे अब उन्हें कैसे भी सजा दिलवानी है। उन्हों ने मुझ पर गंदे गंदे आरोप लगाना शुरु कर दिया था जिस से मेरी बदनामी भी हुई। क्या मैं उन पर मानहानि का मुकदमा भी दायर कर सकती हूँ। उन्हें क्या क्या सजा मिल सकती है।

 -सिम्मी नेगी, मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प ने जो प्रथमं सूचना रिपोर्ट  (एफआईआर) की थी उस पर पुलिस ने कार्यवाही की है. उसी के कारण आप के पति की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल में रहना पड़ा। बाद में उन की जमानत हो गई। शायद आप के सास और ससुर को भी अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी है। इस कारण से उन्हें भी गिरफ्तार नहीं किया गया। अब आप को यह पता नहीं है कि आगे क्या हुआ।

जिस मामले में आप के पति को 2009/2010 में गिरफ्तार किया गया है उस मामले में यह नहीं हो सकता है कि पुलिस ने न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल न किया हो। निश्चित रूप से पुलिस ने न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया होगा और आप के पति व सास, ससुर के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा चल रहा होगा। आप चाहें तो उस पुलिस स्टेशन से जिस में आपने रिपोर्ट दर्ज कराई थी जानकारी कर सकती हैं।

प की शिकायत आप के विरुद्ध क्रूरता का व्यवहार करने, मारपीट करने, गाली-गलौच करने और स्त्रीधन वापस न करने के बारे में होगी। इस मामले में धारा 498-ए, 406, 323, और 504 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत मुकदमा दर्ज हुआ होगा और आप का स्त्री-धन बरामद करने के लिए आप के पति की गिरफ्तारी हुई होगी। बाद में उन्हें जमानत दे दी गई होगी। यह सब स्वाभाविक है। क्यों कि जब तक मुकदमे के दौरान सबूतों और गवाहियों से यह साबित नहीं हो जाता कि अभियुक्तों ने उक्त धारा के अंतर्गत जुर्म किया है यही माना जाएगा कि वे निरपराध हैं। इस कारण से किसी को भी बिना साबित हुए जेल में रखना उचित नहीं है। किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध हो जाने के बाद ही सजा दी जा सकती है।  मुकदमे के दौरान वे जमानत पर रहते हैं और न्यायालय द्वारा दंडित होने के उपरान्त य़दि वे अपील करना चाहते हैं और अपील के निर्णय तक सजा को निलम्बित रखने का आवेदन करते हैं तो न्यायालय मामले की गंभीरता के आधार पर सजा को निलंबित रख सकता है। अपील में भी सजा बरकरार रहने पर दोषियों को जेल में सजा काटने के लिए भेजा जाता है।

मारी न्याय व्यवस्था की सब से बड़ी कमी यह है कि उस के पास जरूरत की 20 प्रतिशत अदालतें भी नहीं हैं। अदालतों में मुकदमों का अम्बार लगा है। इस के लिए राज्य सरकारें और केन्द्र सरकारें दोषी हैं कि वे पर्याप्त मात्रा में अदालतें स्थापित नहीं करती हैं। इस कारण से मुकदमों के फैसले में कई कई वर्ष लग जाते हैं।आप का मुकदमा भी न्यायालय में सुनवाई आरंभ होने के इन्तजार में रुका होगा। जब भी उस में गवाही की स्थिति आती है आप को न्यायालय से समन प्राप्त होगा तब आप गवाही के लिए प्रस्तुत होंगी तभी आप अपने पास के सभी सबूत न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती हैं। आप चाहें तो उक्त मुकदमे का पता कर के उस में अपनी ओर से वकील नियुक्त कर सकती हैं जो आप की ओर से मुकदमे की देखभाल करे और आप की पैरवी करे। वैसे आप की ओर से सरकारी वकील पैरवी कर रहा होगा।

प की बदनामी करने के लिए आप अलग से मुकदमा दायर कर सकती हैं। इस के लिए आप को स्वयं न्यायालय में शिकायत दर्ज करानी होगी और उस मुकदमे की हर तारीख पर उपस्थित होना पड़ेगा। इस के लिए आप किसी वकील से संपर्क कर के उस के माध्यम से धारा 500 भा.दं.संहिता के अंतर्गत न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत कर सकती हैं।

मेरे राय में जितना कुछ हो गया है उस के उपरान्त आप का यह विवाह अब बचे रहने के लायक नहीं रह गया है। आप को चाहिए कि आप विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें और विवाह विच्छेद करवा कर अपने जीवन का नया आरंभ करने की बात पर विचार करना चाहिए।

अपराधिक मुकदमे में आप दो साल से अदालत नहीं जा रहे हैं, आप निश्चित रुप से बड़े संकट में हैं

श्री आर.एस. यादव पूछते हैं —
मुझे और मेरे परिवार के खिलाफ मेरे चाचा ने पुलिस में झूठी अर्जी दी, उसके बाद कोर्ट में झूठी शिकायत पेश की। धारा ३२३, ५०६/३४ के अंतर्गत मुकदमा दर्ज हुआ। उसके बाद तारीखों का सिलसिला चालू हुआ। मैं दो साल से कोर्ट नहीं जा रहा हूँ। तारीख का पता नहीं। क्या भविष्य में नुकसान हो सकता है? मैं अपने बचाव के लिए क्या कर सकता हूँ? कृपया मार्गदर्शन करें। आपका आभारी रहूँगा, मै मुंबई में रहता हूँ। 

उत्तर —

यादव जी,
प तारीखों पर अदालत नहीं जा रहे हैं। निश्चित रूप से आप ऐसी मुसीबत में हैं जिस की आप को जानकारी नहीं है। ऐसा अक्सर उन लोगों के साथ होता है जो अदालती प्रक्रिया को नहीं जानते। यूँ तो अदालती प्रक्रिया को कोई नहीं जानता। लेकिन एक बार मुकदमा दर्ज हो जाने पर वकील से प्रक्रिया जान लेना चाहिए। वकील का भी दायित्व होता है कि वह अपने नए मुवक्किल को अदालत में मुकदमे की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दे। खैर आप ने यह सवाल पूछ कर अच्छा किया। इस से आप को तो जानकारी मिलेगी ही। तीसरा खंबा के पाठकों को भी यह जानकारी मिल जाएगी। 
प के विरुद्ध धारा 323, 506/34 भा.दं.संहिता का मुकदमा आप के चाचा ने किया है जो अदालत में चल रहा है। धारा 323 में स्वेच्छा से किसी व्यक्ति को शारीरिक चोट पहुँचाने का अपराध वर्णित है जिस में एक वर्ष तक की कैद या एक हजार रुपए जुर्माना, या दोनों दंड एक साथ दिए जा सकते हैं। दूसरा अपराध धारा 506 के अंतर्गत है इस में किसी व्यक्ति के शरीर को या उस की ख्याति को या उस की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकी दे कर उसे आतंकित करने का अपराध वर्णित है इस के लिए दो वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों प्रकार का दंड दिया जा सकता है। धारा 34 केवल इस बात के लिए है कि जितने व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया गया है उन सब का इस अपराध को करने का सामान्य आशय था। इस कारण से सभी लोग इन अपराधों के दोषी हैं।
प के विरुद्ध लगाए गए आरोप अत्यंत साधारण किस्म के हैं। पहली बार में यदि  ये अपराध साबित भी हो जाएँ तो भी इन में कोई बड़ी सजा नहीं होती। हो सकता है आप को केवल चेतावनी दे कर छोड़ दिया जाए, या फिर मामूली जुर्माने की सजा दी जाए या केवल अच्छे आचरण के लिए बंधपत्र भरवा कर छोड़ दिया जाए। लेकिन इन अपराधों के लिए प्रक्रिया वैसी ही है जैसी अन्य बड़े अपराधों के लिए होती है। आप के पहली बार अदालत में उपस्थित होने पर अदालत ने आप से मुकदमे की हर पेशी पर हाजिर होते रहने के लिए जमानत ली होगी। आप के अदालत में हाजिर न होने पर वह जब्त कर ली गई होगी और आप के नाम गिरफ्तारी या जमानती वारंट जारी कर दिए गए होंगे। कोई भी पुलिस वाला ये वारंट ले कर आप के पास कभी भी आ सकता है। वारंट यदि जमानती हुआ तो वह जमानत भरवा कर ले जाएगा और आप को आगामी पेशी पर उपस्थित होने की तारीख बता जाएगा। आप उस तारीख पर न गए तो फिर आप के नाम गिरफ्तारी वारंट ले कर आ सकता है।
दि आप के विरुद्ध अदालत ने गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए हैं तो पुलिस आप को कभी भी गिरफ्तार कर अदालत के सामने पेश कर सकती है। वैसी स्थिति में अदालत आप को जेल भेज देगी। यदि आप जमानत के लिए अर्जी देंगे तो अदालत उसे खारिज कर आप को जेल भेज सकती है या फिर जमानत पर छोड़ भी सकती है। यदि आप को अदालत से गैर हाजिर हुए काफी समय हो गया है तो आप को एक-दो सप्ताह जेल में बिताने पड़ सकते हैं।
प को करना यह चाहिए कि अदालत जा कर अपने वकील से मिल कर जमानत की अर्जी देनी चाहिए। जिस में कहा जाएगा कि आप के अदालत में न आ पाने का कारण क्या था। इस पर अदालत आप को जमानत पर छोड़ सकती है। लेकिन आप ने पहले पेश की जमानत का उल्लंघन किया है उस के लिए आप को जुर्माना करेगी वह भी आप को देना होगा। भविष्य में आप हर पेशी पर हाजिर होते रहिए जब तक कि मुकदमा समाप्त नहीं हो जाता है। किसी भी फौजदारी मुकदमे से अभियुक्त को तभी मुक्ति प्राप्त होती है जब वह मुकदमा समाप्त हो जाए।
वैसे आप के विरुद्ध चल रहा यह मुकदमा इस तरह भी समाप्त हो सकता है कि आप अदालत में हाजिर हो कर कह दें कि आप को आप के विरुद्ध लगाए गए आरोप स्वीकार हैं। लोक अदालत की भावना से आप के मुकदमे का फैसला कर दिया जाए। अदालत मामूली जुर्माना कर आप के विरुद्ध मुकदमा समाप्त कर दे। 

प के विरुद्ध चल रहा यह मुकदमा अदालत में केवल निजि रूप से प्रस्तुत की गई शिकायत पर ही चल सकता है और शिकायत कर्ता के अदालत में गैर हाजिर होने से भी खारिज हो सकता है। इस लिए कोई भी कार्यवाही करने के पहले पता कर लें कि आप के विरुद्ध अभी तक मुकदमा चल भी रहा है या नहीं, और चल रहा है तो उस में क्या कार्यवाही अपेक्षित है। यह पता हो जाने के उपरांत आप को यहाँ दी गई सलाह और अपने वकील की सलाह के आधार पर कार्यवाही करनी चाहिए।

घृणा फैलाने वाला ब्लागर गिरफ्तार

नायर समुदाय के विरुद्ध अपने ब्लाग के माध्यम से घृणा फैलाने के आरोप में केरल के एक ब्लागर के.वी. शाइन को गिरफ्तार किया गया। बाद में उसे प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया जहाँ उसे जमानत पर छोड़ दिया गया।

के.वी.शाइन जॉर्ज जोसेफ के छद्मनाम से विचित्र केरलम् नाम का ब्लाग चला रहा था जिस में वह नायर समुदाय की महिलाओं के संबंध में लगातार आपत्तिजनक लिख रहा था। उस के विरुद्ध सायबर पुलिस स्टेशन ने मुकदमा दर्ज किया और उस का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया।
समाचार चित्र पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है-

डी अजित के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का कोई निर्णय नहीं है

कल तीसरा खंबा पर आलेख नहीं था, केवल जनादेश में प्रकाशित आलेख ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में  की सूचना मात्र थी।  इस आलेख पर सात टिप्पणियाँ तीसरा खंबा पर तथा आठ टिप्पणियाँ जनादेश पर प्राप्त हुई हैं।  कुछ टिप्पणियों से पता लगता है कि पाठक मामले को समझ गए हैं, कुछ से लगता है कि अभी इस मामले पर संशय शेष हैं। 

डी अजित के मामले में मीडिया और ब्लाग में आयी सभी रपटें, आलेख और टिप्पणियाँ सर्वोच्च न्यायालय में जो कुछ भी डी अजित की याचिका पर हुआ उस का परिणाम हैं।  मीडिया में प्रकाशित सभी समाचारों में यह कहा गया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने कोई निर्णय पारित किया है।   मैं ने अपनी समझ के अनुसार उसे निर्णय न कहते हुए आदेश कहा था।  इस मामले पर मीडिया ने समाचार प्रकाशित कर एक बहस खड़ी की है जो चल रही है और जो पता नहीं कब तक चलती रहेगी।  लेकिन वास्तविकता कुछ और है। 

जब पहली बार यह समाचार मुझे पढ़ने को मिला तो मैं ने  अंतर्जाल पर इस से संबंधित सभी सूचनाएँ छान डालीं।  मैं मूल निर्णय को तलाशता रहा।  इस में मैं ने अपना बहुत समय जाया किया जिस का नतीजा यह हुआ कि जनादेश के लिए आलेख लिखने का आग्रह मिलने के उपरांत भी उसे लिखने में लगभग चौबीस घंटे गुजर गए।  तलाशने के उपरांत भी उक्त निर्णय कहीं नहीं मिला।  वास्तविकता तो यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कोई निर्णय पारित ही नहीं किया।  बिना किसी निर्णय के ही एक बवाल मीडिया और ब्लाग जगत में खड़ा कर दिया गया।  अब एक अंग्रेजी ब्लाग काफिया पर प्रकाशित एक आलेख पर एक पाठक अनुज भुवानिया की टिप्पणी से मामला कुछ हद तक साफ हुआ है। 

अनुज भुवानिया ने अपनी टिप्पणी में बताया है कि “इस मामले में कोई निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित नहीं किया गया है।  डी अजित की याचिका बिलकुल नई रिट याचिका थी जो दिनांक 23.02.2008 को भारत के  मुख्य न्यायाधीश की अदालत में  Admission stage पर सुनवाई किए जाने के लिए सूचीबद्ध की गई थी।”  (इस स्तर पर केवल मात्र यह निर्धारित किया जाता है कि  ‘याचिका स्वीकार करने योग्य भी है या नहीं’ ) डी अजित की याचिका इसी स्तर पर निरस्त कर दी गई और कोई नोटिस जारी नहीं किए गए।  इस स्तर पर कोई निर्णय पारित नहीं किया जाता, इस लिए कोई निर्णय पारित भी नहीं किया गया। केवल दो शब्दों का एक आदेश पारित किया गया …’Petition dismissed.’ कोई निर्णय पारित नहीं किए जाने से कोई बाध्यकारी न्यायिक सिद्धान्त भी स्थापित नहीं हुआ” 

.इस मामले में मीडिया द्वारा समाचार प्रकाशित कर जो कुछ भी बवाल खड़ा किया गया वह डी अजित के वकील की बहस के दौरान जो विचार मुख्य न्यायाधीश द्वारा अभिव्यक्त किए गए होंगे उन के आधार पर खड़ा किया गया।  

वास्तविकता यह है कि डी अजित के विरुद्ध एक मामला ठाणे (महाराष्ट्र) की अदालत में दर्ज हुआ है तथा उस में डी अजित वाँछित है।  केरल उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान
कर दी गई है।  अब उन्हें ठाणे की अदालत जिस के द्वारा उन के विरुद्ध अपराध का प्रसंज्ञान लिया है के प्रसंज्ञान लिए जाने के आदेश के विरुद्ध कोई आपत्ति है तो वे ठाणे के जिला न्यायालय या मुम्बई उच्च न्यायालय के समक्ष उस आदेश को चुनौती दे सकते हैं।  ऐसा नहीं कि डी अजित जो सर्वोच्च न्यायालय में अपने मामले की सुनवाई के लिए व्यवस्था बना सकते हैं और वकील कर सकते हैं, वे ठाणे की जिला अदालत या मुम्बई उच्चन्यायालय के समक्ष भी अपनी निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।  निगरानी की सुनवाई करने वाला न्यायालय यह निर्धारित कर सकता है कि तथ्यों के आधार पर ठाणे अदालत ने उन के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिए जाने का जो आदेश दिया है वह उचित है या निरस्त किए जाने योग्य है।  यदि वे निगरानी न्यायालय के निर्णय को भी उचित नहीं समझते हैं तो उस के विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं।  ठाणे के प्रसंज्ञान लिए जाने वाले न्यायालय के आदेश के विरुद्ध चुनौती उपस्थित करने के लिए उन के पास कम से कम दो अवसर तो उपलब्ध हैं ही। 



ऐसी अवस्था में जब कि सर्वोच्च न्यायालय का कोई निर्णय है ही नहीं तो उस पर चलाई जा रही सारी बहस बेमानी है।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में संशोधन के विरोध में वकील हड़ताल पर

आज कोटा संभाग के सभी वकील हड़ताल पर रहेंगे।   कारण है,  दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में हाल में हुआ संशोधन।  इसी कारण से 7 जनवरी को दिल्ली की जिला स्तर तक की अदालतों में पूरी तरह से ठप्प हो गया था।

इस संशोधन से ऐसे अपराधिक मामले जिन में सात वर्ष तक की सजा दी जा सकती है।  पुलिस द्वारा गिरफ्तारी को पुलिस के विवेक पर छोड़ दिया गया है।  अब पुलिस अधिकारी इस तरह के मामलों में अभियुक्त को गिरफ्तार करने के मामले में अपने विवेक का प्रयोग कर सकेंगे।

अब तक स्थिति यह थी कि पुलिस को यह अधिकार था कि दंड प्रक्रिया संहिता में जिन अपराधों को संज्ञेय अपराधों की श्रेणी में रखा गया था उन मामलों में पुलिस बिना किसी वारंट के अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकती थी।   लेकिन अब इस धारा के अंतर्गत पुलिस अधिकारियों पर गिरफ्तार करने की दशा में कुछ शर्तें लगा दी गई हैं।

अब पुलिस अधिकारी सात वर्ष तक की कैद की सजा के प्रावधान वाले मामलों में गिरफ्तार करने के पहले एक नोटिस गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को अपने समक्ष उपस्थित हो कर अन्वेषण में भाग लेने के लिए देगा।  यदि किसी भी व्यक्ति को ऐसा नोटिस भेजा जाता है तो इस नोटिस की पालना करना उस व्यक्ति का कर्तव्य होगा अन्यथा स्थिति में उस व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकेगा।

इस तरह सात वर्ष तक की कैद की सजा वाले अपराधों के मामलों में किसी मामले में गिरफ्तारी के पहले एक अधिकार पुलिस को और मिल गया है।  पहले जब पुलिस किसी को गिरफ्तार करती थी तो उस के पास गिरफ्तारी के लिए ठोस आधार का होना जरूरी था।  यह कानून तो यथावत है, लेकिन उस के पहले किसी व्यक्ति को थाने पर उपस्थित होने और अन्वेषण में सहयोग करने के लिए नोटिस जारी करने के मामले में किसी आधार की आवश्यकता ही नहीं रह गई है।  किसी भी व्यक्ति को नोटिस जारी किया जा सकता है।  वैसे भी पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का भय दिखा कर धन वसूल करने की शिकायतों की कमी नहीं है।  लेकिन अब नोटिस देने का प्रावधान जुड़ जाने से इस तरह की घटनाओं में वृद्धि की आशंका से नकारा नहीं जा सकता है।  बहुमत वकीलों का मानना है कि इस से पुलिस का भ्रष्टाचार और बढ़ेगा और पुलिस अधिकारी किसी भी व्यक्ति को नोटिस जारी कर उसे परेशान कर सकेंगे।

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