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जमानत के बाद पेशी पर उपस्थित न होने पर अभियुक्त को क्या नुकसान हो सकता है?

समस्या-

गोपाल ने पूना, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरे एक मित्र का एक मैसेज एक अज्ञात मोबाइल नंबर पर 2015 में गया था। जो कि मोबाइल में नंबर गलत सेव होने से हो गया था। लेकिन वह जिस का नंबर था वह एक किसी विवाहित महिला का था जिस से मेरे मित्र का कोई संबंध नहीं था। उस महिला ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जिस के कारण 354 डी आईपीसी में मुकदमा कायम हुआ और अदालत में जमानत हुई। फिर धारा 107 दंड प्रक्रिया संहिता में भी पाबंद किया गया। लेकिन मेरा मित्र जमानत के बाद अदालत में हाजिर न हुआ क्यों कि वह किसी दूसरे गाँव में रहता है। इस से मेरे मित्र को क्या नुकसान हो सकता है?

समाधान-

प के मित्र की 354 आईपीसी के प्रकरण में जमानत हुई थी इस का सीधा अर्थ है कि पुलिस ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। जमानत इसी बात की थी कि आप का मित्र सुनवाई के लिए हर पेशी पर अदालत में हाजिर होता रहेगा। अब आप का मित्र अदालत में पेशियों पर हाजिर नहीं हुआ है तो उस के द्वारा पेश किए गए जमानत व मुचलके की राशि को जब्त कर के उस के नाम से गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका होगा। आप के मित्र का वर्तमान पता न्यायालय के रिकार्ड पर न होने से वारंट उस तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई पेशी पर भी वारंट तामील न होने पर आप के मित्र को फरार घोषित कर उस की संपत्ति को कुर्क करने का आदेश तथा स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है। आप के मित्र के मिल जाने पर पुलिस गिरफ्तार कर के अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है जहाँ से अदालत यदि फिर से जमानत पर न छोड़े तो जेल भेजा जा सकता है। जब तक मुकदमे का निर्णय न हो या वही अदालत या उस से ऊँची अदालत जमानत पर छोड़े जाने का आदेश पारित न करे और जमानत पेश न हो तब तक जेल में रहना पड़ सकता है।

इस का समाधान ये है कि आप के मित्र को जमानत कराने वाले वकील से मिलना चाहिए और उस अदालत में जहाँ उस की जमानत हुई थी जा कर उस मुकदमे में फिर से जमानत करानी चाहिए। पुरानी जमानत जब्ती का जुर्माना जो भी हो वह जमा करना चाहिए और पेशियों पर हाजिर हो कर मुकदमे को समाप्त कराना चाहिए। इस तरह के मुकदमे लोक अदालत में गलती स्वीकार करने पर मामूली जुर्माना जमा कर के भी समाप्त कराए जा सकते हैं।

अभियुक्त पेशी पर अनुपस्थित हुआ तो जमानत जब्त होगी और दुबारा जमानत करानी होगी।

Havel handcuffसमस्या-

राजवीर तनेजा ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं, मेरे दोस्त और 4 लोगों के खिलाफ 2008 में जयपुर में धारा 323, 341, 354 IPC के तहत रात्रि गृह अतिचार की रिपोर्ट दर्ज हुई थी। उस में हमें जमानत भी मिल गयी थी। कुछ समय तक तो हम जमानत की तारीख पर जाते रहे। परंतु 2011 के बाद सभी लोग अलग अलग हो गए। हम ने शिकायतकर्ताओं को राजीनामे के लिए भी खूब तलाश किया। पर उन का भी अता पता नहीं। 2011 के बाद आज तक हम तारीख पर नहीं गए, न ही कोई शिकायतकर्ता का पता है। कृपया बताएँ कि अब हम क्या करें? मैं ने कई बार अदालत से भी मालूम किया, पर कुछ पता नहीं चला। क्या ऐसा हो सकता है कि अब मैं अकेला ही सही अपनी रेगुलर तारीख पर जा सकता हूँ।

समाधान-

ब भी किसी अपराध में किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज होता है तो पुलिस उस मुकदमे में न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत करती है। यदि मुकदमा केवल जमानतीय धाराओं में हुआ तो जमानत पुलिस ले लेती है और आरोप पत्र प्रस्तुत होने के दिन न्यायालय में उपस्थित होने को कहती है। न्यायालय में उपस्थित होने पर वहाँ दुबारा जमानत मांगी जाती है जिस की शर्त यह होती है कि अभियुक्त मुकदमे की प्रत्येक पेशी पर उपस्थित होगा, अन्यथा उस के द्वारा प्रस्तुत जमानत, मुचलके जब्त कर लिए जाएंगे।

प को अपनी जमानत की शर्त के अनुसार मुकदमे की हर पेशी पर उपस्थित होना था और आप 2011 से पेशी पर उपस्थित नहीं हुए हैं। इस कारण यह स्वाभाविक है कि आप द्वारा प्रस्तुत जमानत मुचलके जब्त कर लिए गए होंगे और न्यायालय आप के गिरफ्तारी वारंट जारी कर चुका होगा। आप को चाहिए कि आप ने जमानत के वक्त जिसे अपना वकील नियुक्त किया था उस से मिलें और मुकदमे की स्थिति जानने का प्रयत्न करें। यदि वह वकील उपलब्ध न हो सके तो आप किसी दूसरे वकील की सेवाएँ प्राप्त कर सकते हैं। वकील की सहायता से आप को स्वयं न्यायालय में उपस्थित हो कर फिर से जमानत का आवेदन प्रस्तुत कर जमानत करा लेनी चाहिए।

प के मामले में तीनों अपराध तब जमानतीय थे और जमानत हो ही जानी थी। लेकिन अब 354 को अजमानतीय बना दिया गया है। इस कारण अब यह गंभीर अपराधों की श्रेणी में आ चुका है। दूसरे आप को अदालत में उपस्थित हुए चार साल हो गए हैं, हो सकता है तुरन्त जमानत न हो सके और कुछ दिन न्यायिक हिरासत में जेल भी जाना पड़े। दुबारा जमानत हो जाने के बाद आप को मुकदमे की हर पेशी पर उपस्थित होना पड़ेगा या फिर आप जिस पेशी पर उपस्थित न हो सकें आप को वकील के माध्यम से उपस्थिति से छूट के लिए आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करवाना होगा जिस से दुबारा आप की जमानत जब्त न हो।

जमानत क्या है? कौन दे सकता है? कितने लोगों की दे सकता है? और इस के लिए किन दस्तावेजों की आवश्यकता होती है?

समस्या-

बागपत, उत्तर प्रदेश से बिजेन्द्र कुमार ने पूछा है-               

मानत का क्या मतलब होता है? कौन आदमी जमानत दे सकता है? जमानत देने वाले व्यक्ति के पास क्या, क्या दस्तावेज़ होना जरूरी होते हैं? क्या अलग अलग केस के लिये,  किस प्रकार के जमानतदार की जरूरत होती है? क्या एक केन्द्र सरकार का कर्मचारी भी जमानत दे सकता है? अगर दे सकता है तो किस-किस केस मे कितने-कितने व्यक्तियों की जमानत एक साथ दे सकता है?

समाधान-

arrested-man-in-handcuffsमानत का अर्थ है कि किसी व्यक्ति पर जो दायित्व है उस दायित्व की पूर्ति के लिए बंधपत्र देना कि यदि उस व्यक्ति ने अपने दायित्व का कार्य नहीं किया तो बंधपत्र में जो राशि तय की गयी है उस की वसूली जमानतदार से की जाएगी। आम तौर पर जमानत का अर्थ किसी अपराध के लिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिरासत से मुक्त कराने के लिए दिए जाने वाले बंधपत्र से लिया जाता है। जब भी किसी मामले में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। तब यदि न्यायालय किसी अभियुक्त के आवेदन पर उसे अपनी हिरासत से मुक्त करने का आदेश देता है तो वह कुछ शर्तें लगाता है। इन शर्तों में आम तौर पर यह शर्त भी होती है कि वह किसी एक व्यक्ति का इस बात का बंधपत्र प्रस्तुत करे कि जरूरत होने पर या निर्देशित तिथि पर अभियुक्त उपस्थित नहीं हुआ तो उस से किसी निश्चित राशि की वसूली की जाएगी। यह अभियुक्त को मुकदमे के विचारण के दौरान उपस्थित रहना सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है। बंधपत्र सदैव ही आदेशित न्यायालय की संतुष्टि का होना आवश्यक है। बंधपत्र प्रस्तुत होने पर न्यायालय उस की जाँच करता है और संतुष्ट होने पर अभियुक्त को रिहा कर देता है।

कोई भी व्यक्ति जिस की हैसियत बंधपत्र की राशि चुकाने की हो और जिस से आसानी से उतनी राशि वसूल की जा सके वह किसी व्यक्ति की जमानत दे सकता है। इस के लिए जमानतदार के स्वामित्व की उतनी संपत्ति का कोई प्रमाण होना चाहिए जिस से बंधपत्र की राशि की वसूली की जा सके। जैसे किसी वाहन का रजिस्ट्रेशन, मकान या जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज आदि।  जमानतदार की फोटो आईडी भी होनी चाहिए जिस से पता लग सके कि जमानतदार वही व्यक्ति है जो वह खुद को बता रहा है, साथ ही उस के पते का भी प्रमाण होना चाहिए। जमानतदार का एक फोटो भी होना चाहिए जिसे आजकल बंधपत्र के साथ लगाया जाने लगा है।

कोई व्यक्ति कितनी भी जमानतें दे सकता है मगर शर्त यही है कि उस के द्वारा प्रस्तुत बंधपत्र और उस की हैसियत से न्यायालय की संतुष्टि हो जाए। केन्द्रीय या राज्य सरकार का कर्मचारी जमानत दे सकता है। आम तौर पर एक मुकदमे में एक जमानतदार एक ही अभियुक्त की जमानत दे पाता है क्यों कि न्यायालय एक से अधिक लोंगों के लिए एक ही जमानतदार होना पसंद नहीं करते। एक जमानतदार ने पूर्व में किसी की जमानत दे रखी हो और उसी अदालत में दुबारा किसी दूसरे मुकदमे  में जमानत देने पहुँच जाए तो न्यायालय को पता लगने पर उस व्यक्ति के बंधपत्र को न्यायालय अस्वीकार कर सकता है।

किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध हो जाने के बाद ही सजा दी जा सकती है

समस्या-

मैं ने अपने पति और सास, ससुर के विरुद्ध दहेज, मारपीट, गाली गलौच का मुकदमा पेश किया हुआ है। केस करते ही पति गिरफ्तार हो गया। लेकिन सास और ससुर को गिरफ्तार नहीं किया गया। ससुर पुलिस में हैं शायद इस लिए वे लोग जमानत पर छूट गए। मुकदमा कर देने के बाद भी अभी तक उन के खिलाफ कोई वारंट भी नहीं निकला है और वे सभी खुले आम घूम रहे हैं। आखिर उन्हें सजा कब मिलेगी? उन के खिलाफ मेरे पास रिकार्डिंग भी है। जिस में उन सब ने हमें जान से मारने की धमकी भी दी हुई है। ये एफ.आई.आर. मैं ने दिसम्बर 2009 में करवाई थी। अभी तक इस का कोई अता-पता नहीं है। क्या ये मुकदमा रद्द हो गया है?  मुझे अब उन्हें कैसे भी सजा दिलवानी है। उन्हों ने मुझ पर गंदे गंदे आरोप लगाना शुरु कर दिया था जिस से मेरी बदनामी भी हुई। क्या मैं उन पर मानहानि का मुकदमा भी दायर कर सकती हूँ। उन्हें क्या क्या सजा मिल सकती है।

 -सिम्मी नेगी, मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प ने जो प्रथमं सूचना रिपोर्ट  (एफआईआर) की थी उस पर पुलिस ने कार्यवाही की है. उसी के कारण आप के पति की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल में रहना पड़ा। बाद में उन की जमानत हो गई। शायद आप के सास और ससुर को भी अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी है। इस कारण से उन्हें भी गिरफ्तार नहीं किया गया। अब आप को यह पता नहीं है कि आगे क्या हुआ।

जिस मामले में आप के पति को 2009/2010 में गिरफ्तार किया गया है उस मामले में यह नहीं हो सकता है कि पुलिस ने न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल न किया हो। निश्चित रूप से पुलिस ने न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया होगा और आप के पति व सास, ससुर के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा चल रहा होगा। आप चाहें तो उस पुलिस स्टेशन से जिस में आपने रिपोर्ट दर्ज कराई थी जानकारी कर सकती हैं।

प की शिकायत आप के विरुद्ध क्रूरता का व्यवहार करने, मारपीट करने, गाली-गलौच करने और स्त्रीधन वापस न करने के बारे में होगी। इस मामले में धारा 498-ए, 406, 323, और 504 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत मुकदमा दर्ज हुआ होगा और आप का स्त्री-धन बरामद करने के लिए आप के पति की गिरफ्तारी हुई होगी। बाद में उन्हें जमानत दे दी गई होगी। यह सब स्वाभाविक है। क्यों कि जब तक मुकदमे के दौरान सबूतों और गवाहियों से यह साबित नहीं हो जाता कि अभियुक्तों ने उक्त धारा के अंतर्गत जुर्म किया है यही माना जाएगा कि वे निरपराध हैं। इस कारण से किसी को भी बिना साबित हुए जेल में रखना उचित नहीं है। किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध हो जाने के बाद ही सजा दी जा सकती है।  मुकदमे के दौरान वे जमानत पर रहते हैं और न्यायालय द्वारा दंडित होने के उपरान्त य़दि वे अपील करना चाहते हैं और अपील के निर्णय तक सजा को निलम्बित रखने का आवेदन करते हैं तो न्यायालय मामले की गंभीरता के आधार पर सजा को निलंबित रख सकता है। अपील में भी सजा बरकरार रहने पर दोषियों को जेल में सजा काटने के लिए भेजा जाता है।

मारी न्याय व्यवस्था की सब से बड़ी कमी यह है कि उस के पास जरूरत की 20 प्रतिशत अदालतें भी नहीं हैं। अदालतों में मुकदमों का अम्बार लगा है। इस के लिए राज्य सरकारें और केन्द्र सरकारें दोषी हैं कि वे पर्याप्त मात्रा में अदालतें स्थापित नहीं करती हैं। इस कारण से मुकदमों के फैसले में कई कई वर्ष लग जाते हैं।आप का मुकदमा भी न्यायालय में सुनवाई आरंभ होने के इन्तजार में रुका होगा। जब भी उस में गवाही की स्थिति आती है आप को न्यायालय से समन प्राप्त होगा तब आप गवाही के लिए प्रस्तुत होंगी तभी आप अपने पास के सभी सबूत न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती हैं। आप चाहें तो उक्त मुकदमे का पता कर के उस में अपनी ओर से वकील नियुक्त कर सकती हैं जो आप की ओर से मुकदमे की देखभाल करे और आप की पैरवी करे। वैसे आप की ओर से सरकारी वकील पैरवी कर रहा होगा।

प की बदनामी करने के लिए आप अलग से मुकदमा दायर कर सकती हैं। इस के लिए आप को स्वयं न्यायालय में शिकायत दर्ज करानी होगी और उस मुकदमे की हर तारीख पर उपस्थित होना पड़ेगा। इस के लिए आप किसी वकील से संपर्क कर के उस के माध्यम से धारा 500 भा.दं.संहिता के अंतर्गत न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत कर सकती हैं।

मेरे राय में जितना कुछ हो गया है उस के उपरान्त आप का यह विवाह अब बचे रहने के लायक नहीं रह गया है। आप को चाहिए कि आप विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें और विवाह विच्छेद करवा कर अपने जीवन का नया आरंभ करने की बात पर विचार करना चाहिए।

राजद्रोह पर बहस, लेकिन बिनायक सेन के जमानत आदेश में कुछ नहीं

र्वोच्च न्यायालय ने बिनायक सेन को जमानत देना उचित समझा। जमानत की बहस के दौरान छत्तीसगढ़ सरकार के वकीलों के तर्कों को खारिज करते हुए न्यायालय ने उन पर राजद्रोह (Sedition) के आरोप को सिद्ध नहीं माना और यह भी कहा कि कानून की व्याख्या समकालीन परिस्थितियों में की जानी चाहिए। इस से देश भर में इस औपनिवेशिक कानून को बदलने के पक्ष में चर्चा आरंभ हो गई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने परंपरा को निभाते हुए जमानत के आदेश में किसी भी तरह के विचार अभिव्यक्त नहीं किए हैं जिस से अपील की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय प्रभावित हो। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश इस तरह है … 

S U P R E M E   C O U R T  O F  I N D I A

RECORD OF PROCEEDINGS

Petition(s) for Special Leave to Appeal (Crl) No(s).2053/2011

(From the judgement and order dated 10/02/2011 in IA No. 1/2011 in
CRLA No. 20/2011 of The HIGH COURT OF CHATTISGARH AT BILASPUR)

BINAYAKSEN Petitioner(s)

VERSUS

STATE OF CHHATISGARH Respondent(s)

(With appln(s) for exemption from filing O.T.,bail,BRINGING ON
RECORD ADDL. FACTS and office report )

Date: 15/04/2011 This Petition was called on for hearing today.

CORAM :
HON’BLE MR. JUSTICE HARJIT SINGH BEDI
HON’BLE MR. JUSTICE CHANDRAMAULI KR. PRASAD

For Petitioner(s) Mr. Ram Jethmalani,Sr.Adv.
M/s. lata Krishnamurthy,R.N.Karanjawala,
Manik Karanjawala, Sandeep Kapur,
Shivek Trehan, Udit Mendiratta,
Nitya Ramakrishnan and Rahul Kripalani
and Akhil Sachar,Advs.for
M/S. Karanjawala & Co.

For Respondent(s) Mr. Mukul Rohtagi,Sr.Adv.
Mr. U.U.Lalit,Sr.Adv.
Mr. Atul Jha,Adv.
Mr. Sandeep Jha,adv.
Mr. D.K.Sinha,Adv.

Mr. R.S.Suri,Sr.Adv.
Mr. Rana Mukherjee,Adv.
Mr. Merusagar Samantaray,Adv.
Mr. Vikramjit Banerjee,Adv.
Mr. Rajiv Singh,adv.
Mr. S.Shamshery,Adv.

UPON hearing counsel the Court made the following

O R D E R

We have heard the learned counsel for the parties at very great length. Lest we should prejudice any party. We are not giving any reasons for our order. We however direct that the sentence on the petitioner be suspended, and he be released on bail to the satisfaction of the Trial Court.

The SLP is disposed of.

[SUMAN WADHWA]             [VINOD KULVI]
COURT MASTER               COURT MASTER

गिरफ्तारी पूर्व (अग्रिम) जमानत की सुविधा

दंड प्रक्रिया संहिता व अन्य कानूनों से प्राप्त अधिकारों के अंतर्गत पुलिस अधिकारी अपराधियों, संदिग्ध अपराधियों और कुछ अन्य कारणों से किसी व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकते हैं। जब भी किसी संज्ञेय मामले की सूचना पुलिस को प्राप्त होती है और पुलिस समझती है कि अपराध घटित हुआ है तो वह उस सूचना को प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप में अपने यहाँ पंजीकृत करती है तथा अन्वेषण आरंभ करती है। यदि उसे किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना हुआ तो जमानतीय अपराधों के मामले में उस से स्वयं पुलिस जमानत पर छूटने के लिए पूछती है और उस व्यक्ति द्वारा जमानत प्रस्तुत कर देने पर उसे रिहा कर देती है। लेकिन जो मामले अजमानतीय हैं, उन में वह किसी भी अभियुक्त को जमानत पर रिहा नहीं कर सकती। गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटों की अवधि में किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और वहाँ वह यह निर्णय करता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा में रखा जाए अथवा नहीं। यदि उसे पुलिस अभिरक्षा में रखना उचित नहीं पाया जाता है तो उसे फिर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया जाता है। न्यायिक अभिरक्षा में भेजने के आदेश के तुरंत बाद गिरफ्तार व्यक्ति मजिस्ट्रेट से जमानत पर छोड़ने का आवेदन कर सकता है।
दि किसी व्यक्ति को यह आशंका हो कि किसी शत्रुता, प्रतिद्वंदिता और किसी अन्य कारण से कोई मिथ्या या बनावटी मामला बनाया जा कर पुलिस द्वारा उसे किसी मामले में गिरफ्तार किया जा सकता है, इस तरह उसे परेशान किया जा सकता है, उसे आर्थिक और मानसिक क्षति पहुँचाई जा सकती है, उस को अपमानित किया जा सकता है या उस की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचाई जा सकती है तो दं.प्र.संहिता की धारा 438 में यह प्रावधान है कि ऐसा व्यक्ति सेशन न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर गिरफ्तारी पूर्व जमानत के लिए निवेदन कर सकता है। गिरफ्तारी पूर्व जमानत के किसी आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय को अभियोग की प्रकृति और गंभीरता, आवेदक का इतिहास कि उस का पूर्व रिकॉर्ड कैसा रहा है, कहीं वह किसी संज्ञेय अपराध में पहले कभी दोषी तो सिद्ध नहीं हुआ है, उस की न्याय से भागने की संभावना तो नहीं है आदि तथ्यों पर विचार करने के उपरांत यह आदेश दे सकता है कि यदि पुलिस को आवेदक को गिरफ्तार करने की आवश्यकता हो तो वह आदेश में वर्णित राशि के जमानत मुचलकों व शर्तों पर आवेदक को रिहा कर दे। जब भी कोई आवेदन गिरफ्तारी पूर्व जमानत के लिए सेशन न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के समक्ष आता है और उस में यह कथन होता है कि उसे अनावश्यक गिरफ्तार कराकर क्षति पहुँचाई जा सकती है और उसे अपमानित व बदनाम किया जा सकता है तो न्यायालय वैसी परिस्थिति में या तो आवेदन को तत्काल अस्वीकार कर देता है अथवा अंतरिम रूप से गिरफ्तारी पूर्व जमानत का आदेश पारित करता है।
गिरफ्तारी पूर्व जमानत लिए जाने का आदेश पारित करने वाला न्यायालय इस आदेश में कुछ शर्तें आवेदक पर लगा सकता है। जैसे वह अनुसंधान

वकील अपने मुवक्किल के हक में बेहतर उपाय करता है

रमेश कुमार जैन ने जानकारी चाही है कि-

क्या धारा 498a और 406 में सरकारी (विधिक सहायता के अंतर्गत नियुक्त) वकील अपने मुवक्किल की अग्रिम जमानत याचिका नहीं लगाता है और गिरफ्तार (जब मान-सम्मान ही चला जायेगा) होने पर ही जमानत कराता है या आत्मसमपर्ण करने में मदद करता है? क्या आरोपी को पुलिस द्वारा रिमांड लेने से भी बचाता है? क्या बेकसूर व्यक्ति का धारा 498a और 406 में अग्रिम जमानत लेना संविधान के अनुसार मौलिक अधिकार है?

उत्तर –

ग्रिम जमानत किसी भी व्यक्ति का अधिकार नहीं है, मौलिक अधिकार होना तो बहुत दूर की बात है। भारत के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन यह मौलिक अधिकार असीमित नहीं है। इस अधिकार को कानून के द्वारा सीमित किया जा सकता है। गिरफ्तारी पूर्व जमानत का प्रावधान धारा 438 दंड प्रक्रिया संहिता में दिया गया है।

प ने जिस सरकारी वकील का उल्लेख अपने प्रश्न में किया है वह सरकारी वकील नहीं है,  वह विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आप को विधिक सहायता के अंतर्गत उपलब्ध कराया गया वकील है, विधिक सेवा प्राधिकरण से सरकार का कोई सम्बन्ध नहीं है। उस का नियंत्रण सीधे न्यायपालिका के अंतर्गत होता है। विधिक सेवा वाले वकील को  आप का काम करने के लिए एक निश्चित शुल्क विधिक सेवा प्राधिकरण से प्राप्त होती है। यदि वकील ने आप का मामला देखा है और वह समझता है कि आप को अग्रिम जमानत मिलना संभव नहीं है तो फिर वह क्यों आप की गिरफ्तारी पूर्व जमानत का आवेदन प्रस्तुत करेगा। उसे इस काम के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण ने नियुक्त भी नहीं किया है, उसे इस की शुल्क भी किसी से नहीं मिलेगी। यदि आप स्वयं अपने लिए वकील करते हैं, वह एक बार मना करता है कि आप की अग्रिम जमानत संभव नहीं है, और आप जिद करते हैं कि जमानत का आवेदन तो प्रस्तुत करें तो वह कर देता है क्यों कि उसे तो फीस मिलनी है। 406 भा.दं.संहिता के मामले में स्त्री-धन तो रहता है, उस की बरामदगी तो जरूरी है, वैसी स्थिति में अग्रिम जमानत संभव नहीं होती है। मेरी राय में आप को वकील ने सही सलाह दी थी कि अग्रिम जमानत लेने के स्थान पर आ खुद को पुलिस को सौंप दें।

क बार गिरफ्तार हो जाने के उपरांत गिरफ्तार व्यक्ति को जब मजिस्ट्रेट के सामने लाया जाता है तो आम तौर पर पुलिस अन्वेषण के लिए पुलिस अभिरक्षा की अवधि बढ़ाने के लिए जोर देती है।  तब एक वकील उसे बढ़ाए जाने का विरोध कर सकता है। लेकिन पुलिस अभिरक्षा बढ़ानी है या नहीं इस बात का निर्णय मजिस्ट्रेट निर्धारित मानकों के हिसाब से करता है। उस समय वकील जो कुछ कहता है वस्तुतः उस का कोई अर्थ नहीं होता। हाँ, उस के मुवक्किल की संतुष्टि अवश्य हो जाती है। वैवाहिक विवाद जब सामने आते हैं तो आम तौर पर पति और पत्नी दोनों ही स्वयं को बेकसूर बताते हैं और समझते भी हैं। लेकिन वास्तव में दोनों ही बहुत गलतियाँ कर चुके होते हैं, और कानून की निगाह में कसूरवार ही होते हैं। मैं दावे से कह सकता हूँ कि आप ने भी कभी न कभी आपा खो कर ऐसी गलती जरूर की होगी जो कानून की निगाह में अपराध है। यही कारण है कि 498ए व 406 के मामले में कम से कम पति की अग्रिम जमानत लगभग असंभव होती है। पुलिस अभिरक्षा भी कम से कम दो दिन की तो अवश्य ही हो जाती है।

म तौर पर लोग आ कर वकील को कहते हैं, वकील साहब अग्रिम जमानत करानी है, नोटिस देना है या कुछ और। लेकिन एक अच्छा वकील सब से पहले अपने मुवक्किल से यही कहता है कि तुम अपनी परेशानी बताओ, जमानत कैसे करानी है ? नोटिस देना है या नही? या बिना नोटिस दिए ही वाद संस्थित करना  है यह तो मैं तय करूंगा। वास्तव में मुवक्किल हो या रोगी उसे अपने वकील या चिकित्सक को अपनी परेशानी बतानी चाहिए। उस का उपाय क्या करना है यह वकील  या चिकित्सक पर छोड़ना चाहिए। क्यों कि अच्छा वकील और चिकित्सक तो वही करेगा जो उस के मुवक्किल या रोगी के हक में बेहतर उपाय होगा।

एक अभियुक्त की जमानत देने पर आप के क्या दायित्व होंगे?

 श्री नरेश सिह राठौड़  तीसरा खंबा के स्थाई पाठक हैं। पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्हों ने पूछा है- 

ब हम किसी व्यक्ति के न्यायिक हिरासत में होने पर उसे जमानत पर रिहा होने के लिए किसी की जमानत देते हैं, तब उस परिस्थिति में जमानतदार की क्या स्थिति रहती है ?

 उत्तर –
 नरेश भाई का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। कभी भी किसी भी व्यक्ति या उस के मित्र या रिश्तेदार द्वारा आप से यह कहा जा सकता है कि आप न्यायालय के समक्ष उस की जमानत दे दें जिस से बंदी न्यायिक हिरासत से रिहा हो सके। आप नजदीकी मित्र होने या रिश्तेदार होने के कारण मना भी नहीं कर सकते। अब प्रश्न यह है कि आप के जमानत दे देने पर क्या क्या दायित्व हो सकते हैं? या क्या क्या परिणाम हो सकते हैं?
आप से जमानत जब भी मांगी जाती है तो एक जमानत प्रपत्र पर आप के हस्ताक्षर लिए जाते हैं और आप को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने को कहा जाता है। न्यायालय में स्वयं मजिस्ट्रेट या जज या न्यायालय का रीडर आप को यह बताता है कि आप किस बात की जमानत दे रहे हैं। लेकिन यह भी हो सकता है कि वहाँ आप को यह सब न बताया जाए। इस लिए यह आवश्यक है कि जमानत का प्रपत्र जो कि एक बंधपत्र होता है उस पर हस्ताक्षर करने के पहले आप यह अवश्य पढ़ लें कि उस में क्या लिखा है? यह बंधपत्र दंड प्रक्रिया संहिता के प्ररूप सं. 45 में दिया गया है जो निम्न प्रकार है –

प्ररूप सं. 45
थाने या न्यायालय के भारसाधक अधिकारी के समक्ष हाजिर होने के लिए बंधपत्र और जमानत पत्र
(धारा 436, 437,438(3) और 441 देखिए)
मुचलका
मैं  …………………………..(नाम)………………………….पुत्र श्री …………………………. जाति…………… निवासी …………………………………… हूँ तथा ……………………… थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा बिना वारंट गिरफ्तार या निरुद्ध कर दिए जाने पर (या ………………. न्यायालय के समक्ष लाए जाने पर) अपराध अंतर्गत धारा ……………………………………… से आरोपित किया गया हूँ तथा मुझ से ऐसे अधिकारी या न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए प्रतिभूति देने की अपेक्षा की गई है, मैं स्वयं को इस बात के लिए आबद्ध करता हूँ कि मैं ऐसे अधिकारी या न्यायालय के समक्ष ऐसे प्रत्येक दिन, हाजिर होऊंगा, जिस में ऐसे आरोप की बाबत कोई  अन्वेषण या विचारण किया जाए, तथा मैं अपने को आबद्ध करता हूँ कि यदि इस में चूक करूँ तो मेरी ……………………………….. रुपए की राशि समपहृत हो जाएगी। 
तारीख …………………                                               हस्ताक्षर
जमानत-पत्र
मैं …………………………..(नाम)………………………….पुत्र श्री …………………………… जाति……….. निवासी ………………………………………………………..स्वयं को अभियुक्त …………………………………. के लिए, इस बात के लिए प्रतिभू घोषित करता हूँ कि वह …………………………….. थाने के भार साधक अधिकारी या ……………………………… न्यायालय के समक्ष ऐसे अन्वेषण के प्रयोजन के लिए या उस के विरुद्ध आरोप का उत्तर देने के लिए उपस्थित होगा औऱ मैं इस बंध-पत्र के द्वारा अपने को आबद्ध करता हूँ कि इस में उस के द्वारा चूक किए जाने की दशा में मेरी रुपए ………………………… की राशि समपहृत हो जाएगी।
तारीख …………………  &nb
sp;                                                       
हस्ताक्षर

 स प्रपत्र के दो भाग हैं। प्रथम भाग व्यक्तिगत बंध-पत्र है जिसे मुचलका लिखा गया है और दूसरा भाग प्रतिभू का बंधपत्र है जिसे जमानत लिखा गया है। प्रथम भाग पर बंधपत्र की राशि अकित की जा कर स्वयं अभियुक्त के हस्ताक्षर कराए जाते हैं और दूसरे भाग पर जमानत की राशि अंकित की जा कर अभियुक्त की जमानत देने वाले जमानती के हस्ताक्षर कराए जाते हैं। इस प्रपत्र की भाषा से ही प्रथम दृष्टया समझा जा सकता है कि जमानत पर छूटने वाले अभियुक्त और उस की जमानत देने वाले जमानती के दायित्व क्या हैं?
मानत देते समय जमानती का एक शपथ पत्र इस आशय का भी लिया जाता है कि उस की आर्थिक हैसियत कितनी है? आज कल कुछ न कुछ दस्तावेज जमानती को इस बात का भी दिखाना पड़ता है जिस से यह पता लग सके कि उस की आर्थिक हैसियत क्या है। इस के लिए जमानती के मकान या जमीन के दस्तावेज, या किसी वाहन के स्वामित्व के दस्तावेज देख कर संतुष्ट हो जाती है कि जमानती पर्याप्त राशि की जमानत देने लायक है। इस के अतिरिक्त अदालत आज कल जमानती की फोटो आई.डी. अर्थात सचित्र परिचय-पत्र भी देखती है कि वास्तव में जमानत देने वाला व्यक्ति वही तो है जो वह स्वयं को घोषित कर रहा है। जो राशि जमानत पत्र में भरी जाती है उसे जमानती को देख लेना चाहिए जिस से उसे पता रहे कि उस ने कितनी राशि की जमानत दी  है। क्यों कि यह राशि अक्सर जमानत-प्रपत्र को भरते समय पता नहीं होती और अदालत उसी समय बताती है। तब इस बात की तसल्ली कर लेनी चाहिए कि कितनी राशि की जमानत आप दे रहे हैं। किसी राशि विशेष की जमानत देने का अर्थ है कि आप थाने को या अदालत को यह आश्वासन दे रहे हैं कि अभियुक्त मुकदमे के अनुसंधान के दौरान बुलाये जाने पर पुलिस थाने पर या अदालत में मुकदमे की हर सुनवाई के दिन उपस्थित होता रहेगा और यदि वह आवश्यक होने पर उपस्थित नहीं होगा तो उस के जमानत मुचलके की राशि जब्त कर ली जाएगी। 
ब भी कोई अभियु्क्त न्यायालय में अपेक्षित होने पर उपस्थित नहीं होता है तो उस की जमानत और मुचलका जब्त कर लिए जाते हैं और अभियुक्त की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर दिया जाता है। साथ ही अभियुक्त और जमानती के विरुद्ध एक नयी कार्यवाही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 446 के अंतर्गत संस्थित की जा कर दोनों को सूचना भेजी जाती है कि क्यों न उन से जमानत और मुचलके की राशि वसूल की जाए।  आम तौर पर वारंट पर गिरफ्तार किए जाने से बचने के लिए अभियुक्त स्वयं ही अदालत के सन्मुख उपस्थित हो कर अपनी जमानत का आवेदन देता है तब न्यायालय अभियुक्त की जमानत ले ने के अवसर पर इस धारा 446 की कार्यवाही की भी सुनवाई करता है और उस का निर्णय करता है। अभियुक्त के न्यायालय में उपस्थित हो जाने के कारण न्यायालय जमानत या मुचलके की जब्त की गई राशि में क

जमानत के लिए कितनी बार आवेदन किया जा सकता है ?

रमेश जैन ने पूछा है …
धारा 498ए व 406 में किन-किन न्यायालयों में कितनी-कितनी बार जमानत के लिए आवेदन किया जा सकता है? क्या इसके लिए भी कोई सीमा तय होती है।
 क्या किसी भी अपराध के तहत लगाई जमानत याचिका ख़ारिज होने पर भी कोर्ट से कोई दस्तावेज मिलता है? अगर हाँ तो कब? इसकी सूचना किस-किस को भेजी जाती है?
 
उत्तर- – –
रमेश जी,
धारा  498ए व 406 भा.दं.संहिता ही नहीं, किसी भी मामले में जब भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो उस के लिए सब से पहले जमानत का आवेदन उस मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा जहाँ उसे गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने प्रस्त्तुत किया है। यदि वह न्यायालय जमानत का आवेदन निरस्त कर देता है तो जमानत का आवेदन उस न्यायालय पर क्षेत्राधिकार रखने वाले सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि आवेदन सत्र न्यायालय द्वारा भी अस्वीकार कर दिया जाए तो फिर उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। एक बार किसी न्यायालय द्वारा जमानत आवेदन निरस्त कर दिए जाने के उपरांत जब तक परिस्थितियों में कोई वस्तुगत परिवर्तन नहीं होता है उस न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा उसे प्रथम दृष्टया ही निरस्त कर दिया जाएगा। जमानत के आवेदन में यह अंकित किया जाना चाहिए कि पहले कितनी बार और कहाँ कहाँ जमानत का आवेदन किया जा चुका है और पूर्व का जमानत आवेदन निरस्त हो जाने के बाद मामले में क्या वस्तुगत परिवर्तन हुए हैं। कानून में एक से अधिक जमानत आवेदन प्रस्तुत करने में कोई बाधा नहीं है। इस कारण से किसी भी न्यायालय में जमानत आवेदन कितनी भी बार प्रस्तुत किया जा सकता है। 
तो जमानत का आवेदन स्वीकार होने पर और न ही  अस्वीकार होने पर न्यायालय से कोई दस्तावेज नहीं मिलता है। हाँ, जमानत आवेदन पर हुए आदेश की प्रतिलिपि उस के लिए प्रतिलिपि प्राप्त करने का आवेदन प्रस्तुत कर के प्राप्त की जा सकती है। इस के लिए आवश्यक शुल्क निर्धारित है। लेकिन यदि अभियुक्त जिस की ओर से प्रतिलिपि के लिए आवेदन किया गया है न्यायिक या पुलिस अभिरक्षा में है तो प्रतिलिपि निशुल्क दी जाएगी। यदि किसी अभियुक्त की जमानत का आवेदन स्वीकार कर लिया जाता है तो सत्र न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय मजिस्ट्रेट के न्यायालय को अपने आदेश की प्रति प्रेषित करता है। यदि आदेशानुसार मजिस्ट्रेट के न्यायालय में जमानत प्रस्तुत कर दी जाती है और उसे मजिस्ट्रेट स्वीकार कर लेता है तो अभियुक्त को अभिरक्षा से छोड़े जाने का आदेश जेल को मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा स्वयं प्रेषित किया जाता है जिसे प्राप्त होने पर जेल अधिकारी संबंधित अभियुक्त को अपनी अभिरक्षा अपनी अभिरक्षा से मुक्त कर देता है।

अपराधिक मुकदमे में आप दो साल से अदालत नहीं जा रहे हैं, आप निश्चित रुप से बड़े संकट में हैं

श्री आर.एस. यादव पूछते हैं —
मुझे और मेरे परिवार के खिलाफ मेरे चाचा ने पुलिस में झूठी अर्जी दी, उसके बाद कोर्ट में झूठी शिकायत पेश की। धारा ३२३, ५०६/३४ के अंतर्गत मुकदमा दर्ज हुआ। उसके बाद तारीखों का सिलसिला चालू हुआ। मैं दो साल से कोर्ट नहीं जा रहा हूँ। तारीख का पता नहीं। क्या भविष्य में नुकसान हो सकता है? मैं अपने बचाव के लिए क्या कर सकता हूँ? कृपया मार्गदर्शन करें। आपका आभारी रहूँगा, मै मुंबई में रहता हूँ। 

उत्तर —

यादव जी,
प तारीखों पर अदालत नहीं जा रहे हैं। निश्चित रूप से आप ऐसी मुसीबत में हैं जिस की आप को जानकारी नहीं है। ऐसा अक्सर उन लोगों के साथ होता है जो अदालती प्रक्रिया को नहीं जानते। यूँ तो अदालती प्रक्रिया को कोई नहीं जानता। लेकिन एक बार मुकदमा दर्ज हो जाने पर वकील से प्रक्रिया जान लेना चाहिए। वकील का भी दायित्व होता है कि वह अपने नए मुवक्किल को अदालत में मुकदमे की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दे। खैर आप ने यह सवाल पूछ कर अच्छा किया। इस से आप को तो जानकारी मिलेगी ही। तीसरा खंबा के पाठकों को भी यह जानकारी मिल जाएगी। 
प के विरुद्ध धारा 323, 506/34 भा.दं.संहिता का मुकदमा आप के चाचा ने किया है जो अदालत में चल रहा है। धारा 323 में स्वेच्छा से किसी व्यक्ति को शारीरिक चोट पहुँचाने का अपराध वर्णित है जिस में एक वर्ष तक की कैद या एक हजार रुपए जुर्माना, या दोनों दंड एक साथ दिए जा सकते हैं। दूसरा अपराध धारा 506 के अंतर्गत है इस में किसी व्यक्ति के शरीर को या उस की ख्याति को या उस की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकी दे कर उसे आतंकित करने का अपराध वर्णित है इस के लिए दो वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों प्रकार का दंड दिया जा सकता है। धारा 34 केवल इस बात के लिए है कि जितने व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया गया है उन सब का इस अपराध को करने का सामान्य आशय था। इस कारण से सभी लोग इन अपराधों के दोषी हैं।
प के विरुद्ध लगाए गए आरोप अत्यंत साधारण किस्म के हैं। पहली बार में यदि  ये अपराध साबित भी हो जाएँ तो भी इन में कोई बड़ी सजा नहीं होती। हो सकता है आप को केवल चेतावनी दे कर छोड़ दिया जाए, या फिर मामूली जुर्माने की सजा दी जाए या केवल अच्छे आचरण के लिए बंधपत्र भरवा कर छोड़ दिया जाए। लेकिन इन अपराधों के लिए प्रक्रिया वैसी ही है जैसी अन्य बड़े अपराधों के लिए होती है। आप के पहली बार अदालत में उपस्थित होने पर अदालत ने आप से मुकदमे की हर पेशी पर हाजिर होते रहने के लिए जमानत ली होगी। आप के अदालत में हाजिर न होने पर वह जब्त कर ली गई होगी और आप के नाम गिरफ्तारी या जमानती वारंट जारी कर दिए गए होंगे। कोई भी पुलिस वाला ये वारंट ले कर आप के पास कभी भी आ सकता है। वारंट यदि जमानती हुआ तो वह जमानत भरवा कर ले जाएगा और आप को आगामी पेशी पर उपस्थित होने की तारीख बता जाएगा। आप उस तारीख पर न गए तो फिर आप के नाम गिरफ्तारी वारंट ले कर आ सकता है।
दि आप के विरुद्ध अदालत ने गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए हैं तो पुलिस आप को कभी भी गिरफ्तार कर अदालत के सामने पेश कर सकती है। वैसी स्थिति में अदालत आप को जेल भेज देगी। यदि आप जमानत के लिए अर्जी देंगे तो अदालत उसे खारिज कर आप को जेल भेज सकती है या फिर जमानत पर छोड़ भी सकती है। यदि आप को अदालत से गैर हाजिर हुए काफी समय हो गया है तो आप को एक-दो सप्ताह जेल में बिताने पड़ सकते हैं।
प को करना यह चाहिए कि अदालत जा कर अपने वकील से मिल कर जमानत की अर्जी देनी चाहिए। जिस में कहा जाएगा कि आप के अदालत में न आ पाने का कारण क्या था। इस पर अदालत आप को जमानत पर छोड़ सकती है। लेकिन आप ने पहले पेश की जमानत का उल्लंघन किया है उस के लिए आप को जुर्माना करेगी वह भी आप को देना होगा। भविष्य में आप हर पेशी पर हाजिर होते रहिए जब तक कि मुकदमा समाप्त नहीं हो जाता है। किसी भी फौजदारी मुकदमे से अभियुक्त को तभी मुक्ति प्राप्त होती है जब वह मुकदमा समाप्त हो जाए।
वैसे आप के विरुद्ध चल रहा यह मुकदमा इस तरह भी समाप्त हो सकता है कि आप अदालत में हाजिर हो कर कह दें कि आप को आप के विरुद्ध लगाए गए आरोप स्वीकार हैं। लोक अदालत की भावना से आप के मुकदमे का फैसला कर दिया जाए। अदालत मामूली जुर्माना कर आप के विरुद्ध मुकदमा समाप्त कर दे। 

प के विरुद्ध चल रहा यह मुकदमा अदालत में केवल निजि रूप से प्रस्तुत की गई शिकायत पर ही चल सकता है और शिकायत कर्ता के अदालत में गैर हाजिर होने से भी खारिज हो सकता है। इस लिए कोई भी कार्यवाही करने के पहले पता कर लें कि आप के विरुद्ध अभी तक मुकदमा चल भी रहा है या नहीं, और चल रहा है तो उस में क्या कार्यवाही अपेक्षित है। यह पता हो जाने के उपरांत आप को यहाँ दी गई सलाह और अपने वकील की सलाह के आधार पर कार्यवाही करनी चाहिए।

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