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बिना सूचना के खाते में आयी पूरी सैलरी काट लेना बैंक की सेवा में त्रुटि है।

consumer protectionसमस्या-

प्रशान्त चौहान ने इन्दौर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मैं रक्षा मन्त्रालय अधीनस्थ अर्ध-शासकीय निकाय में स्थायी कर्मचारी के रूप में कार्यरत होकर वेतनभोगी कर्मचारी हूँ। मेरे द्वारा एक राष्ट्रीयकृत जहाँ मेरा वेतन प्रतिमाह जमा होता है, उस बैंक से जून-2012 में रु.1,50,000/- का व्यक्तिगत ऋण 48 माह की समयावधि हेतु ग्राह्य किया गया था। तत्समय बैंक द्वारा की गणना अनुसार बैंक द्वारा मेरी EMI रु.3850/- निर्धारित की गई थी।  तदुपरांत से मेरे बचत खाते से उक्त ऋण-राशि की मासिक किश्त बिना किसी गैप/अन्तराल के नियमित रूप से लोन खाते में समायोजित होती रही है एवं समय-समय पर EMI के अतिरिक्त राशि भी मैंने सीधे अपने लोन खाते में जमा की है। विगत दिनांक 01-07-16 को बैंक के मोबाइल से आये मेसेज से ज्ञात हुआ कि मेरा वेतन (लगभग-21,100/- रु.) बैंक में मेरे बचत खाते में जमा होते ही सीधे मेरे लोन खाते में समायोजित कर लिया गया है एवं इसके उपरांत 5000/- का डेबिट बेलेंस हो गया है। याने कुल 26,000/- कि राशि एक मुश्त बैंक द्वारा बिना किसी नोटिस/ सूचना के मेरे बचत खाते से लोन खाते में समायोजित कर ली गई। बैंक में अधिकारियों से चर्चा पश्चात बताया गया कि बीता माह आपकी लोन अवधि का अंतिम माह था एवं लोन ग्राह्य समय से आज तक ब्याज के उतार चडाव इत्यादि से जो राशि का फर्क है वो कम्प्यूटर ने अपने आप काट लिया है। चूँकि मैं एक वेतन भोगी कर्मचारी हूँ, एवं उक्त कार्यवाही से मेरे सामने अपने परिवार सहित सम्पूर्ण माह के निर्वाह का प्रश्न उत्पन्न हो गया है, एवं मानसिक रूप से व्यथित हूँ। अतः आपसे स-निवेदन पूछना चाहूँगा कि क्या बैंक का लोन वसूली का उक्त तरीका सही है?  क्या एक वेतनभोगी कर्मचारी का पूरा वेतन इस प्रकार से लोन खाते में समायोजित किया जा सकता है? जबकि उक्त सम्बन्ध में मुझे कोई पूर्व-सूचना नहीं दी गई।  यदि समय पर मेरा लोन चुकता नहीं हो रहा था तो ये राशि बीच अवधि से ही मेरी मासिक किश्त में वृद्धि कर के भी वसूली की जा सकती थी? इस प्रकार की घटना मेरे अन्य साथी कर्मचारियों के साथ भी हो चुकी है, एवं सभी मानसिक आर्थिक रूप से आहत हो चुके हैं। कृपया मार्गदर्शन देवें कि चूँकि मैं उक्त बैंक का ऋणी होकर आभारी भी हूँ कि तत्समय बैंक ने मुझे ऋण प्रदाय कर अनुग्रहित किया, तो इस स्थिति में भी क्या मुझे मेरे मौलिक एवं मानवीय अधिकारों के तहत उक्त सम्बन्ध में बैंक प्रबंधन को अपनी आपत्ति दर्ज कराने, शिकायत  अथवा अन्य विधिक कार्यवाही सम्पादित कर सकता हूँ अथवा नहीं?

समाधान-

ब से पहले तो आप बैंक के आभारी होना बन्द कीजिए। बैंक ने ऋण दे कर आप पर कोई अनुग्रह नहीं किया था। ऋण देना बैंक का धंधा है उसी से बैंक के मुनाफे निकलते हैं। वे ऋण दे कर व्यवसाय कर रहे हैं किसी पर कोई कृपा नहीं कर रहे।

बैंक ने जब ईएमआई तय कर रखी थी तो ईएमाई से अधिक राशि बैंक किसी भी सूरत में आप के बचत खाते से बिना सूचना दिए नहीं काट सकता था। बैंक ने आप की पूरी सैलरी काट कर आप को शारीरिक मानसिक पीड़ा पहुँचाई है। बैंक आप को सेवाएँ प्रदान करता है इस कारण उस ने सेवा में त्रुटि की है। यह बैंक का अनुचित व्यवसायिक कृत्य भी है। आप को पूरी सैलरी कटने से जो पीड़ा हुई है उस की कीमत लाखों से कम नहीं है और आप इस शारीरिक मानसिक पीड़ा के लिए बैंक से क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

आप को बैंक को नोटिस दे कर इस मानसिक शारीरिक पीड़ा के लिए क्षतिपूर्ति की मांग करनी चाहिए, उस के लिए नोटिस देना चाहिए और बैंक द्वारा सुनवाई न किए जाने पर आप को उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के परिणाम नागरिकों को ही भुगतने पड़ेंगे।

rp_police-station2.jpgसमस्या-

नितिन अग्रवाल ने सतना मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक बैंक खाता श्री बालाजी अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में एवम् एक खाता I.D.B.I. बैंक में भी है । 28.02.15 को श्री बालाजी बैंक ने मुझसे कहा कि आपके खाते में गलती से 198000/- (एक लाख अन्ठानवे हजार रुपये) आज से 9 माह पहले जमा हो गये थे, जो आप जमा करवा दीजिये । (28.05.14 को मैंने 2000 I.D.B.I. बैंक से ट्रांसफर किये थे तो उन्होंने 200000 रु. चढ़ा दिये थे ।) तब मैंने कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिये, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम कठिन है । तब बैंक ने कहा कि क्लोजिंग चल रही है, आपको तुरंत पैसा जमा करना पड़ेगा 15 दिनों के अंदर । मैंने उनको एक आवेदन पत्र भी दिया था कि मेरी एफ.डी. परिपक्व करके मेरे खाते में राशि जमा कर दी जाये और मेरा जो लोन चल रहा है उसको समाप्त कर दिया जाये, जो राशि खाते में जमा है उसको भी लोन में समायोजित करने के बाद जो भी राशि बचती है उसको मैं जमा करने को तैयार हूँ । लेकिन उन्होंने उस आवेदन को स्वीकार नहीं किया । और न ही पावती दी । 19.03.15 को मैं बैंक 2000/- (दो हजार रुपये) जमा करने गया और जमा करने के बाद पासबुक में इंट्री करवाई तो पता चला कि बैंक ने मेरे खाते से दिनांक 28-02-2015 को 198000/- एवं दिनांक 03-03-2015 को 25/- निकाल लिये थे वो भी मेरे साईन और अनुमति के बगैर । 23.03.15 को मैंने मान्यनीय उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक को नोटिस भी भिजवाया कि बैंक ने मेरे खाते से मेरी अनुमति के बिना ही 198000/- और 25/- निकाल लिये हैं । 11.04.15 को बैंक द्वारा सतेंद्र मोहन उपाध्याय टी. आई. सिटी कोतवाली सतना को प्रभाव में लेकर मुझे दोपहर 12 बजे से शाम 06:30 बजे तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया एवं पैसे जमा करवाने के दवाब बनाया गया, बिना कोई F.I.R. के ही एवं बिना अदालत की अनुमति के हथकड़ी लगवाकर कैदियों के साथ बैठा दिया गया, और मेरी मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नष्ट किया गया । 13.04.15 को मैंने टी. आई. सिटी कोतवाली सतना एवं बैंक प्रबंधन के खिलाफ एस.पी. साहब के नाम सी.एस.पी. आफिस में लिखित आवेदन हथकड़ी लगी हुयी फोटो के साथ दिया एवं साथ में मानवाधिकार न्यायालय में भी याचिका दर्ज़ करवाई और मानवाधिकार न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी हुआ । और साथ में उच्चाधिकारियों को भी मैंने इस बात की लिखित सूचना भेजी । हथकड़ी लगाने के 18 दिन बाद, दिनांक 29-04-15 को श्री बालाजी बैंक के साथ मिलकर बदले की भावना से टी.आई. सत्येंद्र मोहन उपाध्याय और एस.आई. शत्रुघन वर्मा द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज़ की गयी और धारा 403 व 406 लगा दी गयी । जबकि मैंने उन लोगों को पहले भी सूचित किया था कि मैंने सिर्फ अपने खाते में ही जमा रकम निकाली थी । चूंकि बैंक ने पैसा लेने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था । इसलिये आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आगे मैं क्या करूं, क्या करना सही होगा ।

समाधान-

बैंक ने आप के खाते में अधिक धन चढ़ा कर गलती की है। इस गलती को सुधारने का सही तरीका यह था के बैंक उस धन को जमा कराने के लिए आप को लिखित नोटिस देता और आप की जो धनराशियाँ बैंक में जिन जिन खातों में हैं उन्हें सीज कर लेता। इस के साथ ही उस धन को जमा कराने के लिए आप के विरुद्ध दीवानी अदालत में दीवानी वाद संस्थित करता। लेकिन बैंक ने इस गलती को सुधारने के लिए गलत तरीका अपनाया और आप को पुलिस की सहायता से अपमानित किया और मानसिक व शारीरिक संताप पहुँचाया। इस मामले में गलती पुलिस की है जिस ने अवैध रीति अपनाई। आप इस के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुलिस/सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। बैंक की अनियमितता के विरुद्ध आप पहले ही उपभोक्ता अदालत में जा चुके हैं।

प के विरुद्ध जो धारा 403 व 406 का मुकदमा बनाया गया है वह बनता ही नहीं है। उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कराने के लिए भी आप उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करवा सकते हैं।

दालतों की स्थिति सरकार ने ऐसी बना रखी है कि वहाँ न्याय मिलना अनन्त काल तक लंबित रहता है इस बीच न्यायार्थियों को जो तकलीफ भुगतनी पड़ती है उस का कोई हिसाब ही नहीं है। इस स्थिति ने पुलिस, सार्वजनिक व निजि संस्थाओं और सरकारी अमले को निरंकुश बनाया है। उसी का फल आप को भुगतना पड़ा है। इस तरह की स्थितियों से तभी समाज को बचाया जा सकता है जब कि एक त्वरित और उचित न्याय व्यवस्था देश में स्थापित हो। पर वह तो अभी एक सपना लगता है। अभी तो हमारी सरकारों ने जरूरत के केवल 15 प्रतिशत न्यायालय स्थापित किए हुए हैं। इस न्याय व्यवस्था को एक गुणवत्ता वाली त्वरित न्याय व्यवस्था में परिवर्तित होना देश की समूची राजनैतिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए बिना संभव नहीं लगता। तब तक इस अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के दु्ष्परिणाम नागरिकों को भुगतने होंगे।

बैंक सेवा में कमी या त्रुटि एक उपभोक्ता मामला है . . .

SBIसमस्या-
बारसी, जिला शोलापुर, महाराष्ट्र से रमण कारंजकर ने पूछा है-

मेरी कपडे की दुकान है। मैंने जिस पार्टी से माल उधार लिया था, उसे पेमेन्ट के रुप में बैंक का चेक दिया था। बैंक ने मेरा सीसी खाता रिन्युअल नहीं किया इस गलती की वजह से वह चेक बाऊंस हो गया है। मैंने बैंक हेड ऑफिस पूना में शिकायत की तो बैंक मैनेजर ने अपनी गलती मान ली। शिकायत में मैंने शारीरिक, मानसिक नुकसान एवं बेइज्जती के लिए क्षतिपूर्ति की माँग की है। उस में क्षितपूर्ति की राशि नहीं बतायी है। अब बैंक मैनेजर बार बार मेरी दुकान पर चक्कर काटकर मामला रफा दफा करने की विनती कर रहा है और मेरी मांग पूछ रहा है। मैं उनसे कितनी रकम मांग सकता हूँ?  कृपया बतायें और अगर मुझे बैंक के खिलाफ केस दायर कर के क्षतिपूर्ति वसूल करनी हो तो मैं ज्यादा से ज्यादा कितनी रकम की मांग कर सकता हूँ। मेरा यह केस अदालत में किया जा सकता है या कंज्युमर फोरम में?

समाधान –

प बैंक के ग्राहक हैं, उपभोक्ता हैं इस कारण से आप के बैंक द्वारा जो गलती की है वह सेवा में त्रुटि/कमी है। आप का यह मामला उपभोक्ता मंच के दायरे में आता है। आप अपनी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए उपभोक्ता मंच के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।

हाँ तक सेवा में कमी के कारण क्षतिपूर्ति की राशि का मामला है कोई भी न्यायालय वही क्षति आप को दिला सकता है जो कि आप को वास्तविक रूप में हुई है। आप को बैंक की इस गलती के कारण जो भी क्षतियाँ हुई हैं। मसलन आने-जाने, भाग-दौड़ में हुआ खर्च, आप को जो नुकसान या ब्याज पार्टी को देना पड़ा हो। आप के धन्धे पर जो आर्थिक असर पड़ा हो और उस से जो नुकसान हुआ हो। और मानसिक व शारीरिक कष्ट के लिए जो भी नुकसान आप उचित समझते हों उस का आकलन तो सिर्फ आप ही कर सकते हैं। यह आकलन बहुत अधिक या बहुत कम नहीं होना चाहिए। कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति यह समझ सके कि इतना पैसा मिलने से आप को नुकसान की भरपाई हो सकती है उतनी ही क्षतिपूर्ति आप को मिल सकेगी।

बैंक का मैनेजर इस मामले को आपस में निपटाने को इसलिए कह रहा है कि जब आप बैंक के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा करेंगे तो जो न्यायालय आप को दिलाएगा उस राशि को बैंक उसी कर्मचारी से वसूल कर सकता है और उसे इस गलती के लिए दंडित भी कर सकता है। इस तरह वह बैंक कर्मचारी उतनी राशि आप को आपसी निपटारे में दे सकता है जितना उसे नुकसान हो रहा हो। मेरा भी यह मानना है कि आप को आप की संतुष्टि की राशि मिल जाए तो उस कर्मचारी से आपस में बैठ कर निपटारा कर लेना चाहिए। क्यों कि उपभोक्ता न्यायालय से भी आप को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने में कम से कम दो-चार वर्ष तो लग ही जाएंगे।

ओवरराइट चैक का भुगतान करना बैंक का उपभोक्ता की सेवा में दोष है

 
 पीलीभीत (उ.प्र.) से वरुण सक्सेना ने पूछा है-
 
 
मेरा एक खाता पंजाब एण्ड सिंध बैंक की पीलीभीत (उ.प्र.) शाखा में है मैं ने अपने खाते में रुपए 7850 जमा किए थे, लेकिन जब मैं 5000 रुपए निकालने गया तो पाया कि मेरे खाते में केवल 3650 रुपए ही हैं। मैं ने अपने खाते की विगत बैंक से निकलवाई तो पता लगा कि मैं ने अपने एक ग्राहक को एक हजार रुपए का चैक दिया था, उस ग्राहक ने उसे ओवरराइटिंग कर के चार हजार का बना लिया और बैंक ने ओवर राइटिंग स्पष्ट होते हुए भी 4000 रुपए का उस ग्राहक को भुगतान कर दिया। मैं उस ग्राहक को जानता नहीं हूँ। मैं ने चैक को निकलवा कर देखा तो उस में बहुत ओवरराइटिंग हो रही है जो साफ नजर आ रही है। यदि मैं स्वयं भी इस तरह का चैक बैंक में प्रस्तुत करूँ तो बैंक मुझे उस चैक पर राशि न देकर दूसरा चैक देने या फिर ओवरराइटिंग पर प्रतिहस्ताक्षर करने को कहता है। बैंक का मैनेजर कहता है कि वह कुछ नहीं कर सकता। मैं जरूरतमंद हूँ, यह नुकसान बर्दाश्त नहीं कर सकता। मुझे अपना पैसा वापस लेने के लिए क्या करना चाहिए?

 सलाह –
 
रूण जी की समस्या ऐसी है जो किसी भी बैंक के किसी भी उपभोक्ता के साथ घट सकती है। यहाँ तो केवल मात्र 3000 रुपए का मामला है। लेकिन यह मामला 30000 या 300000 रुपयों का भी हो सकता है। इस मामले में स्पष्ट रूप से बैंक की गलती या लापरवाही है। यह भी हो सकता है कि यह गलती या लापरवाही न हो कर जानबूझ कर की गई धोखाधड़ी हो और इस मामले में बैंक का कोई कर्मचारी भी सम्मिलित रहा हो। पिछले कुछ वर्षों से बैंकों के पास काम बढ़ा है लेकिन उस के अनुपात में श्रमशक्ति का नियोजन नहीं किया गया है। इस कारण से बैंक कर्मचारियों पर दबाव बढ़ा है और वे तनाव में रहते हैं हो सकता है बैंक में कार्याधिक्य होने और भुगतान करने वाले कर्मचारी ने काम के दबाव से उत्पन्न तनाव के कारण ऐसा किया हो।यह उसी का नतीजा हो। लेकिन यह तो बैंक का अन्दरूनी मामला है। यदि कर्मचारियों पर काम का इतना दबाव है तो उन्हें अपने प्रबंधन को बाध्य करना चाहिए कि वे कर्मचारियों की संख्या बढ़ाएँ। 
रुण जी बैंक के एक उपभोक्ता हैं। उन के साथ बैंक द्वारा सेवा में दोष किया गया है। इस दोष की शिकायत जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती है। इस के लिए वरूण जी को सब से पहले अपनी शिकायत बैंक के शाखा प्रबंधक को दे कर उस की प्राप्ति स्वीकृति शिकायत की प्रतिलिपि पर प्राप्त करनी चाहिए। यदि बैंक इस तरह की प्राप्ति स्वीकृति देने से इन्करा करे तो यह दूसरा सेवा दोष होगा। तब वरूण जी को बैंक के क्षेत्रीय प्रबंधक को लिखित में शिकायत रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से प्रेषित करनी चाहिए। यदि उन की शिकायत बैंक दूर नहीं करता है और उन के खाते में 3000 रुपए वापस नहीं करता है तो उन्हें बैंक के विरुद्ध उपभोक्ता अदालत में अपना परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए। इस तरह के मामलों में उपभोक्ता न्यायालयों ने न केवल उपभोक्ता का धन वापस दिलाया है अपितु परेशानी, मानसिक
संताप और परिवाद व्यय के रूप में क्षतिपूर्ति भी दिलायी है।

बैंक द्वारा ग्राहक सेवा में कमी के लिए उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करें

 मुजफ्फरनगर, उ.प्र. से मनु त्यागी ने पूछते हैं –

मेरा एक चैक जिस की वैधता की छह माह की अवधि 13 फरवरी को समाप्त होनी थी, मैं ने बैंक में 9 फरवरी को प्रस्तुत किया था। बैंक ने चैक जमा कर के मुझे रसीद प्रदान की थी।   बाद में बैंक ने मुझे चैक इस टिप्पणी के साथ वापस किया कि यह अवधिपार हो चुका है। आठ सौ रुपए के इस चैक पर बैंक ने 250 रुपए भी काट लिए। मुझे क्या करना चाहिए?

 उत्तर –

मनु जी,

दि आप के चैक की अवधि 13 फरवरी को समाप्त होने वाली थी और आप ने उसे 9 फरवरी को प्रस्तुत कर दिया था तो आप सही हैं। आपने अवधि के अंतर्गत ही वह चैक बैंक में प्रस्तुत कर दिया था। आप के द्वारा बैंक को चैक प्रस्तुत कर दिए जाने पर आप के बैंक को वह चैक समाशोधन गृह को भेजा जाना था जहाँ संबंधित बैंक को उस का धन आप के बैंक को हस्तांतरित करना था। यह भी हो सकता है कि यह चैक आप के नगर के बाहर का हो औऱ डाक द्वारा चैक के जारी करने वाले बैंक की शाखा को भेजा गया हो। दूसरी स्थिति में आप के बैंक द्वारा भेजा गया चैक चैक जारीकर्ता बैंक की शाखा में देरी से पहुँचा हो और उन्हों ने अवधिपार होने के कारण चैक की राशि देने से इन्कार कर दिया हो। दोनों ही स्थितियों में त्रुटि आप के बैंक की है। आप के बैंक ने चार दिन की अवधि होने के बाद भी चैक जारीकर्ता बैंक को देरी से प्रस्तुत किया है। इस तरह बैंक ने आप को ग्राहक सेवाएँ प्रदान करने में सेवा में कमी की है और इस के साथ ही आप के खाते से 250 रुपए की भी कटौती कर ली है।

प अपने बैंक को लिख कर दें कि बैंक ने सेवाएँ प्रदान करने में त्रुटि की है और आप सेवा में की गई इस त्रुटि के लिए जो भी हानियाँ आप को हुई हैं वे और जो मानसिक संताप हुआ है उस की क्षतिपूर्ति बैंक से प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप इस पत्र में जो भी हानियाँ इस सेवा में कमी के कारण आप को हुई हैं और जो मानसिक संताप आप को हुआ है उस का मूल्यांकन कर बैंक से मांग करें कि वह इस क्षतिपूर्ति राशि का वह आप को निश्चित समय में ( इस के लिए एक-माह का समय बैंक को दिया जा सकता है) भुगतान करे। यदि आप का बैंक इस मामले में आप के साथ वार्ता करता है और आप की क्षतियों की समुचित पूर्ति करने को तैयार हो जाता है तो आप बैंक के साथ इस मामले को आपसी सहमति से निपटा सकते हैं। यदि आप का बैंक आप की क्षतियों की पूर्ति के लिए तैयार नहीं होता है तो आप को चाहिए कि आप अपने जिले के उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत करें। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच आप को बैंक से उचित क्षतिपूर्ति दिलाएगा।

बैंकों की उपभोक्ताओं के प्रति जिम्मेदारी और सूचना का अधिकार अधिनियम

 रोमी ने पूछा है – – – 
क्या बैंक की आम लोगों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं होती  है? मैं जब भी बैंक जाता हूँ वहाँ के लोग हमेशा हम से गलत और गंदा व्यवहार करते हैं। क्या बैंक के कर्मचारियों के लिए भी कोई कानून होते हैं? क्या बैंक में सूचना अधिकार नियम लागू होता है अगर हाँ तो किस हद तक?
 उत्तर – – –
रोमी भाई!
बैंक की आम लोगों के प्रति जिम्मेदारी की तो मैं बात नहीं करूंगा। क्यों कि किसी बैंक की राह चलते व्यक्ति या ऐसा व्यक्ति जो कभी बैंक गया ही नहीं उस के प्रति क्या जिम्मेदारी हो सकती है। मुझे लगता है कि आप यह जानना चाहते हैं कि बैंक की उस के उपभोक्ताओं के प्रति क्या जिम्मेदारी होती है? यदि आप का प्रश्न यही है तो उस का उत्तर भी यही है कि एक सेवा प्रदाता की जो जो जिम्मेदारियाँ हो सकती हैं वे सब एक बैंक की भी होती हैं। जिन में यह भी सम्मिलित है कि बैंक के कर्मचारियों को उन से सद्व्यवहार करना चाहिए। उन से जो जानकारी मांगी जाए वह उन्हें देना चाहिए। यदि कर्मचारी गलत और गंदा व्यवहार करते हैं तो यह सेवा में गंभीर त्रुटि है और कर्मचारी के लिए एक गंभीर दुराचरण भी है। आप इस तरह के व्यवहार की शिकायत बैंक के उच्चाधिकारियों को कर सकते हैं। आप की शिकायत के आधार पर संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध अवश्य ही अनुशासनिक कार्यवाही की जाएगी। यदि आप को इस व्यवहार से कोई शारीरिक या मानसिक या दोनों तरह का संताप हुआ हो तो आप जिला उपभोक्ता समस्या निवारण मंच को शिकायत कर समुचित हर्जाने की मांग कर सकते हैं। 
मस्या यह है कि हम गंदे और गलत व्यवहार का उत्तर गाली-गलौच से देते हैं और हमारा जो अहम् आहत होता है उस की तुष्टि हो जाती है। हम दयावान भी बहुत हैं सोचते हैं कि गाली दे कर हमने उसे दंडित कर ही दिया है, बेचारे की नौकरी में क्यूँ पंगा किया जाए। लेकिन कर्मचारी को इस से कोई सबक नहीं मिलता। उस ने अनुशासनहीनता की है तो निश्चित ही उसे अनुशासनिक कार्यवाही के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन जब शिकायत ही नहीं होती है तो अनुशासनिक कार्यवाही कहाँ होगी? कोई शिकायत करता भी है और उस पर अनुशासनिक कार्यवाही होती भी है तो संबंधित कर्मचारी उस के पैर जा पकड़ता है। अनेक लोगों से आप पर सिफारिशें पहुँचाता है। अपने बाल-बच्चों पर रहम की भीख मांगता है। आप फिर द्रवित हो उठते हैं। आप या तो अनुशासनिक कार्यवाही में बयान देने नहीं जाते, या फिर उस के बहुत पहले ही अनुशासनिक अधिकारी को लिख देते हैं कि उन के बीच गलतफहमी हो गयी थी जिस के कारण आप ने शिकायत कर दी। अब गलतफहमी दूर हो गई है इस लिए आप कोई कार्यवाही नहीं चाहते। 
ब आप ही बताइए कि इन हालातों में कैसे कर्मचारियों को अनुशासन में रखा जा सकता है। इस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जनता में जागरूकता होनी चाहिए कि व

तीसरे पक्ष का चैक भुगतान नहीं हुआ है, मैं क्या कर सकता हूँ?



श्री प्रेम सारस्वत ने पूछा है — 
सर!
मेरी समस्या ये है कि मैं एक छोटा सा दुकानदार हूँ, सूरत में मेरी एक दुकान है। एक माह पहले मैं ने  एक मिस्त्री के हस्ते माल बेचा था। उस मिस्त्री ने मुझे एक चैक दिया था जो कि तीसरे पक्ष का था। यह चैक बाउंस हो गया है। चैक देने वाला पक्ष चार पाँच दिन से मुझे और उस मिस्त्री को पैसे देने के वायदे कर के घुमा रही है, मेरा चैक देने वाले पक्ष से कोई सीधा संबंध नहीं है, इस लिए मेरे बिल पर तीसरे पक्ष के नाम के साथ हस्ते मिस्त्री का नाम है। अब मैं परेशान हूँ कि मैं क्या करूँ? आप कोई रास्ता बताएँ?
उत्तर —
प्रेम जी,
प बेकार ही परेशान हो रहे हैं। बिल के अनुसार आप ने तीसरे पक्ष को ही मिस्त्री के हस्ते माल बेचा है। यहाँ मिस्त्री तीसरे पक्ष का अभिकर्ता/एजेंट था। उस के अभिकर्ता होने का सब से बड़ा साक्ष्य यह है कि मिस्त्री के पास तीसरे पक्ष का चैक था जो कि भुगतान के रूप में उस ने आप को दिया। इस तरह आप किसी परेशानी में नहीं हैं। 
रक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत आप तीसरे पक्ष को नोटिस दे सकते हैं कि आप के चैक को बैंक में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन बैंक ने उस का भुगतान नहीं किया है। यह नोटिस आप को बैंक से चैक के भुगतान न होने की लिखित सूचना (वह पर्ची जिस पर चैक के भुगतान न होने का कारण लिखा होता है) मिलने की तारीख से तीस दिन की अवधि में दिया जा सकता है। इस में एक विकल्प यह भी है कि चैक की वैधता साधारणतः छह माह की होती है यदि उस पर उस से कम अवधि अंकित न हो तो, और चैक को उस की वैधता की अवधि में कितनी ही बार बैंक में पेश किया जा सकता है। 
दि आप को विश्वास हो कि तीसरा पक्ष कुछ दिनों में आप की बकाया राशि का भुगतान कर देगा तो आप प्रतीक्षा कर सकते हैं कि वह नकद भुगतान कर दे। यदि वह नकद भुगतान कर दे तो आप उस का चैक वापस लौटा दें। यदि वह कहे कि चैक दुबारा बैंक में पेश किया जाए तो आप वैधता की अवधि के अंतर्गत दुबारा तिबारा भी उसे बैंक में पेश कर सकते हैं और उस का भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। यदि चैक का भुगतान फिर भी न मिले तो अंतिम बार बैंक द्वारा चैक का भुगतान न करने की सूचना प्राप्त होने के दिन के तीस दिन के भीतर आप तीसरे पक्ष को रजिस्टर्ड डाक से नोटिस भेज सकते हैं कि आप का चैक बैंक द्वारा बिना भुगतान के वापस कर दिया गया है, आप पंद्रह दिनों में चैक की राशि का भुगतान कर दें अन्यथा आप के विरुद्ध परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा। यदि वह नोटिस मिलने के पंद्रह दिनों में चैक की राशि का भुगतान आप को नहीं करता है तो पंद्रह दिनों की अवधि समाप्त होने के उपरांत अगले तीस दिनों में आप न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। आप नोटिस देने के लिए और परिवा

एटीएम से पैसा निकला, क्या उपभोक्ता अदालत में जाया जाए?

जलालुद्दीन खान पूछते हैं-
मैं स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का खाताधारक हूँ.जुलाई माह में मैं एटीएम से पैसा निकालने गया तो एटीएम में रसीद उप्लब्ध नहीं थी, मैने पैसा नहीं निकाला और ऑन स्क्रीन बैलेंस देख कर चला आया। लेकिन पैसे कि सख्त ज़रुरत थी.इसलिए दोबारा गया और रसीद ना होने के बाद भी 2000 रुपया निकाला। इसके बाद फिर मैने ओन स्क्रीन अपना बैलेंस चेक किया तो पता चल कि 2000 के अलवा भी 20000 रुपया बैलेंस से कम है। मैं ने उसी बैंक को इस की लिखित शिकायत दी। बैंक ने इस शिकायत का जवाब तीन माह बाद दिया जिस में लिखा था कि आप के खाते से पैसा निकल गया है। अपना पासवर्ड और एटीएम कार्ड संभाल कर रखें। मैं ने आज तक अपना पासवर्ड और एटीएम कार्ड किसी को नहीं दिया और न बताया। फिर बैंक स्टेटमेंट 20000 रुपए की निकासी उसी समय दिखा रहा है जब मैं ने सिर्फ बैलेंस चैक किया था। जब मैं ने संबंधित अधिकारी का ध्यान इस तरफ दिलाया तो वह कहने लगा कि चेक करते समय जो आप के पीछे आदमी था उसी ने आप का पैसा निकाला है। जब मैं ने पैसा निकालने का ऑप्शन सेलेक्ट ही नहीं किया तो आखिर मेरे पीछे वाला मेरा पैसा कैसे निकाल सकता है? यह मेरी समझ में नहीं आया। बैंक का लिखित उत्तर प्राप्त होने से पहले मैं बैंक जा कर बार बार इस बारे में पूछताछ करता था। बैंक का जो अधिकारी इस तरह के मामले देखता है उस ने मुझे बताया कि इस की जाँच मुम्बई के अधिकारी करेंगे और सुनवाई के लिए आप को बुलाया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं कुछ नहीं हुआ। बैंक ने इस मामले को हल्के से लेते हुए सिर्फ एक पत्र लिख कर निपटा दिया।
मैं ने इस मामले को कंजुमर फोरम में ले जाने के संबंध में एक वकील साहब से बात की तो वह बोले कि आप साबित नहीं कर पाएंगे कि पैसा आपने नहीं निकाला है। कुछ फायदा नहीं होगा। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ? मेरा पैसा तो गया ही यदि किसी ने निकाला है तो उसे अपराध की सजा नहीं मिली और अगर मेरा पैसा बैंक के खजाने में ही है तो मैं इस का पता कैसे लगा सकता हूँ? क्या उपभोक्ता अदालत में मुझे इस मामले को ले जाना चाहिए

 

उत्तर-

जलालुद्दीन भाई !

प की शिकायत जायज है। आप जानते हैं कि एक अपराध हुआ है। उस की शिकायत होनी चाहिए और आप को पुलिस को दर्ज करानी चाहिए। यदि आप की शिकायत पुलिस दर्ज नहीं करती है तो आप अदालत में शिकायत प्रस्तुत कर के निवेदन कर सकते हैं कि इस शिकायत को पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने और अन्वेषण करने के लिए भिजवाएँ।
बैंक द्वारा इस तरह के मामले को तीन माह तक लटकाना और जवाब नहीं देना सेवा में त्रुटि है। फिर उन्हों ने जो जवाब दिया है वह बहुत अजीब है उस का अर्थ तो यह निकलता है कि आप ने ही पैसा निकाला है। प्रत्येक एटीएम उस का उपयोग करने वाले का चित्र लेता है। उस से पता लगाया जा सकता है कि उस समय कौन आप के पहले और बाद आया था। उस से पूछताछ की जा सकती है। लेकिन बैंक ने जवाब देने में अपरिमित देरी की है यह भी सेवा में कमी और त्रुटि है। आप इस के लिए उपभोक्ता अदालत के समक्ष शिकायत कर सकते हैं। बैंक को सेवाएँ प्रदान करने में त्रुटि करने तथा कमी करने के

बैंक का ऋण चुकाने से बचने का कोई कानूनी मार्ग नहीं

विनोद कुमार ओझा पूछते हैं –

मैं ने कारपोरेशन बैंक की आसनसोल शाखा से 2004 में एक लाख रुपए का सीसी लोन लिया था। 2005 तक सब कुछ ठीक था, लेकिन एक पारिवारिक दुर्घटना के बाद व्यापार से मेरा मन टूट गया। मेरे एक मात्र 20 वर्षीय पुत्र के निधन से हम पूरी तरह जीने की तमन्ना तोड़ दिए। 2009 अगस्त तक मैं किसी तरह खाते में ब्याज जमा कराता रहा। पर अब ये भी संभव  नहीं हो पा रहा है। बैंक से एक नोटिस मिला है, जिस में मेरे खाते को एनपीए घोषित कर दिया है। बैंक मैनेजर भी सहयोगी नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए?

उत्तर – 

ओझा जी,
आप की समस्या कानूनी नहीं है। आप ने बैंक से ऋण लिया है और ब्याज भर चुकाते रहे हैं। आप को मूल तो चुकाना ही पड़ेगा। बैंक से ऋण की शर्तों में यह लिखा होता है कि आप ब्याज न चुकाएंगे तो वह हर तिमाही या छमाही पर मूल में जुड़ता रहेगा। यानी तब आप को ब्याज जुड़े हुए मूल पर ब्याज देना होगा। जो अगली तिमाही या छमाही पर उस में जुड़ जाएगा।  जब आप अपने बैंक खाते में एक निश्चित अवधि तक कोई लेन-देन नहीं करते और न ही ब्याज जमा कराते हैं तो वह एन.पी.ए. अर्थात नॉन परफोरमेंस एसेट घोषित कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में बैंक वसूली की कार्यवाही आरंभ कर देता है।  आप का व्यापार से दिल हट गया है। लेकिन बैंक तो एक वित्तीय संस्था है जिस के दिल बिलकुल नहीं होता। कोई भी वित्तीय पूंजी साहुकार से भी अधिक क्रूर होती है। अच्छा यह है कि आप किसी भी तरह से बैंक का ऋण जल्दी से जल्दी चुका दें। यदि उस के लिए अपनी मौजूदा संपत्ति को विक्रय भी करना पड़े तो भी। क्यों कि हर माह बैंक का ब्याज लग लग कर आप की कुल संपत्ति तो घट ही रही है। 
आप ने बैंक का ऋण नहीं चुकाया तो बैंक मुकदमा कर के वह राशि आप की संपत्ति से वसूल कर लेगा। आप के पास उस से बचने का कोई मार्ग शेष नहीं है।
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