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तीसरा खंबा को मिले 15 लाख विजिटर्स

हिन्दी ब्लागों को पढ़ते और टिपियाते हुए सुझाव आया कि मुझे भी ब्लाग लिखना चाहिए। 28 अक्टूबर 2007 को मेरा जो पहला ब्लाग सामने आया वह “तीसरा खंबा” था।

“तीसरा खंबा” के माध्यम से विधि के क्षेत्र में कुछ अलग करने का मन था। कुछ किया भी, लेकिन टिप्पणियों में यह फरमाइश होने लगी कि मैं लोगों को उन की समस्याओं के लिए कानूनी उपाय भी बताऊँ। मैं ने वह आरंभ किया तो। तीसरा खंबा पर समस्याएँ आने लगीं। तो मैं ने कम से कम एक समस्या का समाधान या उपाय हर रोज लिखना शुरू किया।  तो “तीसरा खंबा” नियमित ब्लाग हो गया।

उन्हीं दिनों बीएस पाबला जी ने “अदालत” ब्लाग शुरू किया था जिस में वे विधि से संबंधित समाचारों को लिखा करते थे। उन से संपर्क हुआ तो पक्की दोस्ती में बदल गया। 2011 की एक रात पाबला जी से फोन पर बात हो रही थी। उन का सुझाव था कि अपना डोमेन ले लिया  जाए। मैं ने कहा ले लो। पाबला जी से बात पूरी हुई थी कि 10 मिनट बाद फोन की घंटी बजी। पाबला जी थे बता रहे थे कि “तीसरा खंबा” के लिए  http://teesarakhamba.com/  डोमेन मिल गया है। अब उन का कहना था कि ब्लागर के स्थान पर वर्डप्रेस पर जा कर इसे एक वेबसाइट का  रूप दे दिया जाए। वह भी पूरा किया पाबला जी ने ही। आखिर वेबसाइट शुरू हो गयी। हम ने 1 जनवरी 2012 से उस का शुभारंभ मान कर उस की स्टेटिस्टिक्स शुरू की।

एक जनवरी 2012 से कल 15 जुलाई 2017 तक “तीसरा खंबा” ने 15 लाख विजिटर हासिल कर लिए हैं। बीते कल इस पर 4328 विजिटर थे। हिन्दी ब्लाग जगत के लिए इसे एक उपलब्धि तो कहा ही जा सकता है।

घृणा फैलाने वाला ब्लागर गिरफ्तार

नायर समुदाय के विरुद्ध अपने ब्लाग के माध्यम से घृणा फैलाने के आरोप में केरल के एक ब्लागर के.वी. शाइन को गिरफ्तार किया गया। बाद में उसे प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया जहाँ उसे जमानत पर छोड़ दिया गया।

के.वी.शाइन जॉर्ज जोसेफ के छद्मनाम से विचित्र केरलम् नाम का ब्लाग चला रहा था जिस में वह नायर समुदाय की महिलाओं के संबंध में लगातार आपत्तिजनक लिख रहा था। उस के विरुद्ध सायबर पुलिस स्टेशन ने मुकदमा दर्ज किया और उस का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया।
समाचार चित्र पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है-

500 वाँ आलेख, 50000 चटके और बेटी का जन्मदिन

28 अक्टूबर 2007 को जब तीसरा खंबा का पहला आलेख लिखा गया था तब सोचा भी न था कि ये तकरीबन ढाई वर्ष का समय यूँ ही निकल जाएगा। बस एक लक्ष्य था सामने कि मुझे देश को न्याय व्यवस्था की जरूरत और न्याय प्रणाली की जरूरतों के बारे में लिखना है। लोगों को बताना है कि  हम जिस न्याय प्रणाली पर गर्व करते हैं। उस की शासन को कोई परवाह नहीं है। वास्तव में वह इसे मजबूरी समझता है। इस बिंदु से आरंभ करने के उपरांत तीसरा खंबा बहुत सोपानों से गुजरा। इस में कानूनों की सरल व्याख्या करने का प्रयत्न किया गया। जरूरी और सामयिक प्रश्नों पर विधिक स्थितियों को रखने के प्रयास भी किए गए। फिर पाठकों ने कानूनी जिज्ञासाएँ रखना आरंभ किया तो इस के माध्यम से कानूनी सलाह देने का काम भी आरंभ किया गया। जिस का उद्देश्य किसी पाठक की वास्तविक समस्या के आलोक में विधिक स्थिति को ब्लाग पर रखना जिस से पाठकों की कानूनी जानकारी बढ़ सके। 
पाठकों ने तीसरा खंबा के माध्यम से जो कुछ भी किया गया उस की सराहना की और उस के कंधे से अपना कंधा मिलाया। उसी का नतीजा है कि तीसरा खंबा एक अकेले व्यक्ति का प्रयास होते हुए भी लगातार चलता रहा और उस ने अपना यह 500सौ वाँ आलेख पूरा किया। 
 

बीच में यह योजना भी बनी कि तीसरा खंबा को एक वेबसाइट का रूप दे दिया जाए। लेकिन मेरी स्वयं की व्यस्तता के कारण यह अभी तक संभव नहीं हो सका है। मैं ने कोशिश भी की लेकिन निश्चित रूप से एक अकेला व्यक्ति कोई गतिशील वेबसाइट नहीं चला सकता जब तक कि उस के साथ नियमित रूप से काम करने वाले लोग न हों। तीसरा खंबा को एक वेबसाइट का रूप देना मेरा सपना है जो शायद कभी पूरा हो सके। 

तीसरा खंबा आज जिस स्थिति में है वह पाठकों और साथी चिट्ठाकारों के सहयोग और सद्भावना के बिना नहीं पहुँच सकता था।  सभी के सहयोग और मुझ पर व्यक्त किए विश्वास ने ही उसे इस स्थान तक पहुँचाया है। मैं इस अवसर पर उन सभी साथियों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ जिन्हों ने इस काम को लगातार करते रहने की प्रेरणा और शक्ति मुझे प्रदान की और ढेर सारा प्यार, स्नेह और आदर प्रदान किया। तीसरा खंबा के पाठकों में आधे से अधिक हिन्दी चिट्ठाजगत से बाहर के सामान्य लोग हैं जो इस चिट्ठे पर विश्वास करते हैं और लगातार अपनी कानूनी समस्याओं को भेजते हैं। उन्हीं का स्नेह है कि 500वें आलेख के साथ ही इस पर लगने वाले चटकों की संख्या भी पचास हजार से ऊपर पहुँच गई है। मुझे आशा है कि पाठकों का यह विश्वास, स्नेह, प्यार, आदर और आशीर्वाद मुझे भविष्य में मिलता ही नहीं रहेगा अपितु इस में वृद्धि भी होगी। मुझे इस काम को जारी रखने की शक्ति मिलती रहेगी।
ज का दिन मेरे लिए केवल इस लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है कि आज तीसरा खंबा ने 500वाँ आलेख और 50,000 चटके पूरे किए हैं। मेरे लिए 24 मार्च का यह दिन इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि यह मेरी पुत्री पूर्वा का जन्मदिन भी है। हम चाहते थे कि इस दिन वह हमारे साथ हो। लेकिन मेरी और उस की अपने अपने काम  में व्यस्तता के कारण यह संभव नहीं हो सका। तीसरा खंबा अपने इस 500वें आलेख 50000 हजार से अधिक चटकों से पूर्वा को जन्मदिन की मुबारक बाद भी देना चाहता है। 
 
 
पू्र्वा को जन्मदिन पर बहुत तीसरा खंबा की  शुभकामनाएँ।

तीसरा खंबा तीसरे वर्ष में

ज सुबह गलती हो गई।  कानूनी सलाह का आलेख जो तीसरा खंबा पर पोस्ट होना था वह अनवरत पर पोस्ट हो गया। गलती पता लगने पर ठीक कर ली गई। गलती को ठीक करने पर पता लगा कि तीसरा खंबा के जन्म के और मेरी ब्लागरी के दो साल पूरे हो चुके हैं। तीसरा खंबा मेरा पहला ब्लाग है और इस पर पहला आलेख 28 अक्टूबर 2007 को आया था।  बहरहाल तीसरा खंबा का तीसरा साल आरंभ हो चुका है, यह  पोस्ट तीसरे साल तीसरी और तीसरा खंबा की 384वीं पोस्ट होगी। तीसरा खंबा को 35950 बार देखा जा चुका है।
ब तीसरा खंबा आरंभ किया था तो मन में यही था कि यह ब्लाग देश की न्याय प्रणाली और कानून पर केंद्रित रहेगा।  मैं वकालत के पेशे में लोगों को न्याय प्राप्त करने में सहयोग करने के साथ-साथ अपनी दाल-रोटी कमाने के उद्देश्य से आया था। पहले अपने जन्मनगर बाराँ में काम आरंभ किया। किन्तु एक वर्ष के अनुभव ने ही मुझे यह जता दिया कि यदि यहाँ वकालत कर के अपनी दाल-रोटी चलानी है तो अपराधियों की या फिर चंद धनिकों की पैरवी करनी पड़ेगी और वह भी उन्हें उन के खुद के दुष्कृत्यों के लिए दंडित होने से बचाने अथवा उन्हें मिलने वाली सजा को कम कराने के लिए। राजस्थान की उन दिनों की औद्योगिक नगरी कोटा हमारा जिला मुख्यालय था। वहाँ संभाग का श्रम न्यायालय स्थापित हुआ ही था। मैं श्रमिकों की पैरवी का सपना लिए कोटा चला आया।  किसी नौकरी से निकाले हुए श्रमिक का मुकदमा लड़ना और उसे फिर से नौकरी पर पहुँचा देना बहुत सकून का काम था। यहाँ पंद्रह वर्ष तक खूब काम किया। जिस ने दाल-रोटी भी दी, सर पर छत भी दी और  बहुत सारा सकून और सम्मान भी दिया। लेकिन इस बीच अदालत में क्षमता से कई गुना मुकदमो की संख्या ने न्याय को विलंबित कर दिया। आरंभ में जिस श्रमिक को दो-तीन वर्ष में निर्णय मिल जाता था, अब वह कम से कम दस साल विलंबित होने लगा। नतीजा यह हुआ कि परिस्थिति का मजबूर श्रमिक औनी-पौनी राहत पर समझौते करने लगा। यह न्याय की दुर्दशा थी कि न्याय देरी से न्याय मिलने पर विफल होने की परिस्थिति ने न्यायार्थी को अन्याय को स्वीकार करने पर विवश कर दिया था। इस से काम में कमी हुई। मैं ने दीवानी और फौजदारी वकालत की ओर भी रुख किया तो वहाँ भी कमोबेश यही हालत थी।  
न्यायार्थी कि अन्याय को स्वीकार कर लेने की विवशता ने मुझे इस बात के लिए प्रेरित किया कि किसी न किसी स्तर पर इस के लिए आवाज उठानी होगी और यह आवाज उठाने की पहल कोई वकील ही कर सकता है। वास्तव में यह सब इस लिए हो रहा था कि देश में विकास और जनसंख्या में वृद्धि के मुकाबले न्यायालय बहुत कम रह गए थे। मुझे हिन्दी ब्लाग जगत एक नया माध्यम मिला जहाँ से इस आवाज को उठाया जा सकता था और न्याय प्रणाली में हो रही इस गड़बड़ी की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया जा सकता था। तीसरा खंबा इस काम को विगत दो वर्षों में कितना कर पाया इस का मूल्यांकन तो इस के पाठक ही कर सकते हैं।  
स बीच पाठकों की प्रतिक्रियाओँ से लगा कि देश के कानूनों की जानकारी भी इस ब्लाग के माध्यम से दी जा सकती है। कानूनों की जानकारी देते देते लोगों की समस्याएँ सामने आने लगीं और कानूनी सलाह दिया जाना आरंभ किया गया। धीरे-धीरे कानूनी सलाह का यह काम बढ़ता चला गया। आज तीसरा खंबा के पास हमेशा दस से बीस कानूनी प्रश्न बने रहते हैं। अनेक लोगों को मेल द्वारा भी सलाह दी गई है। पाठकों में यह काम बहुत लोक

अन्तर्जाल और ब्लागिंग : वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार (6)

अंतर्जाल ने  सूचनाओं के आदान प्रदान की गति को तेज किया, तो इस सुविधा से युक्त लोगों को एक वैश्विक मंच भी प्रदान किया है। आज ई-मेल के माध्यम से तुरंत सूचनाएँ दुनिया के किसी भी कोने से दूसरे कोने तक पहुँचती हैं।  आप पानी का एक गिलास पिएँ इस के पहले उस का उत्तर मिल जाता है।  इस माध्यम पर धीरे धीरे महत्वपूर्ण सूचनाएँ एकत्र होने लगीं।  उन्हें तलाशने के लिए खोज यंत्र बने।  आज किसी भी सूचना को प्राप्त करने के लिए सब से पहले अन्तर्जाल को खोजा जाने लगा है। सामाजिक समूह बने और फिर ब्लागिंग होने लगी। ब्लागिंग के माध्यम से हर मिनट नई सूचनाएँ जाल पर आने लगीं। गूगल, वर्डप्रेस और अन्य अनेक संस्थाओं ने अंतर्जाल पर लोगों को ब्लागिंग के लिए स्थान और साधन निशुल्क उपलब्ध कराना आरंभ कर दिया।  इस से जिन लोगों को इस साधन की उपलब्धता है, वे अपने अपने ब्लाग के माध्यम से नई सूचनाएँ और विचार अंतर्जाल पर डालने लगे।  इन मंचों ने अंतर्जाल की सुविधाओं को आम लोगों में लोकप्रियता प्रदान की है।

आज दुनिया की सभी समृद्ध भाषाओं में ब्लागिंग हो रही है, जहाँ वाक् और अभिव्यक्ति की हर  कला और विधा को स्थान मिला है।  संगीत, चित्र, चलचित्र, पेंटिंग्स, गद्य और पद्य लेखन, समाचार, आलेख सब कुछ ब्लागिंग में मौजूद है।  वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार को जो ऊंचाई ब्लागिंग ने प्रदान की है वह आज तक के इतिहास में उपलब्ध नहीं हो सकी थी।  कोई भी व्यक्ति अब अपने विचारों को किसी भी रूप में ब्लागिंग के माध्यम से अभिव्यक्त कर सकता है।  इस के लिए मनुष्य जाति को इस नई तकनीक का आभारी होना चाहिए। 
पु्स्तकों को ज्ञान का वाहक माना जाता है।  लेकिन इस का अर्थ यह नहीं कि वे केवल ज्ञान का प्रकाश ही फैलाती हैं। बहुत बड़ी मात्रा में पुस्तकें अज्ञान की वाहक भी हैं।  उसी तरह अभिव्यक्ति का हर माध्यम ज्ञान के साथ साथ अज्ञान भी फैलाता है।   अज्ञान फैलाने वाली पुस्तकें रोज बड़ी मात्रा में प्रकाशित हो कर फुटपाथ पर बिकती हैं, लेकिन उन में शायद ही कोई स्थाई स्थान प्राप्त कर पाती हों। वे जुगनू की तरह चमकती हैं और फिर अपना प्रकाश खो देती हैं।  लेकिन ज्ञानवाहक पुस्तकें एक बार चमकना आरंभ करती हैं तो फिर उन की वह चमक तब तक बरकरार रहती है जब तक कि उस से अधिक प्रकाशवान कोई अन्य न आ जाए।  उस के उपरांत भी वे इतिहास में अदा की गई अपनी भू्मिका के रूप में मौजूद रहती हैं।  अनेक बार आवश्यकता होने पर उन्हें तलाश करने में मनुष्य को अथक श्रम करना पड़ा है।  इसी तरह ज्ञान की वाहक सूचनाओं और अभिव्यक्तियों की स्थिति ब्लाग जगत में भी रहेगी।
अंततः मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।  आरंभ में वह अत्यन्त छोटे-छोटे समूहों में रहता था।  जैसे जैसे तकनीक का विकास हुआ उस का यह समूह बढ़ता गया। आज के राष्ट्र वैसे ही सब से बड़े समूह हैं।  तकनीक इन समूहों को भी तोड़ रही है और एक विश्व समुदाय का निर्माण कर रही है।  मनुष्य का विश्व समुदाय भविष्य की वास्तविकता है।  उस की ओर से किसी भी स्थिति में आँखें बन्द नहीं की जा सकती हैं।  मनुष्य का इतिहास ही छोटे समूहों से वसुधैव कुटुम्बकम की ओर की यात्रा
है।  अंतर्जाल और ब्लागिंग ने इस यात्रा के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संवाद का मंच जुटा दिया है।  
जब मनुष्य एक विश्व समुदाय के निर्माण की ओर बढ़ रहा है तो उसे और अधिक सामाजिक होना पड़ेगा।  उसे उन मूल्यों की परवाह करनी पड़ेगी जो इस विश्व समुदाय के बनने और उस के स्थाई रूप से बने रहने के लिए आवश्यक हैं।  वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इन मूल्यों के परे नहीं हो सकती। हमें इन मूल्यों की परवाह करनी होगी।  संविधान ने इन मूल्यों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 19 (2) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाने की व्यवस्था की है।  ब्लागिंग सहित संपूर्ण अंतर्जाल पर वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी इन निर्बंधनों के अधीन हैं। 
संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के ये निर्बंधन क्या हैं? इस पर हम अगले आलेख में बात करेंगे। (क्रमशः जारी)

ब्लॉगिंग या चिट्ठाकारी : स्वतंत्रता का मूल अधिकार (5)

हम ने पिछले आलेखों में जाना कि प्रेस की स्वतंत्रता भी वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत ही एक अधिकार है। समाचार पत्र और अन्य माध्यमों का आज लवाजमा इतना भारी हो चुका है कि उस में बहुत बड़ी पूँजी का निवेश किए बिना उन्हें चला पाना संभव नहीं रहा है।  अधिकतर बड़े और मध्यम समाचार पत्र और माध्यम या तो सरकारी हैं अथवा उन पर किसी न किसी वाणिज्यिक घराने की पूँजी लगी है और वे दोनों ही अपने प्रायोजकों के प्रति अपनी वफादारी का पूरा सबूत देते हैं।  कुछ माध्यम और समाचार पत्र व्यावसायिक गतिविधि के रूप में ही चलते हैं उन पर विज्ञापन दाताओं का भारी प्रभाव रहता है।  इस कारण से उन्हें स्वतंत्र अभिव्यक्ति माध्यम कहने से स्वतंत्रता शब्द ही अपमानित हो जाएगा।  मध्यम और छोटे समाचार पत्र जिन्हें खुद पत्रकार लोग निकालते हैं वे भी सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापनों की आस और जुगाड़ में निष्पक्ष नहीं रह पाते। बहुत छोटे अनेक समाचार पत्र पीत पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं और उस के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। 

कुछ दिनों पहले एक ऐसा व्यक्ति गवाह के रूप में मेरे सामने आया जो अपने आप को पत्रकार और प्रेस का मालिक कहता था। वह अपनी आमदनी पचास हजार प्रतिमाह बता रहा था। जिस में से तकरीबन चालीस हजार की आमदनी उसने केवल समाचार पत्र से होना बताई थी।  वह मोटर एक्सीडेण्ट के एक मुकदमे में घायल दावेदार की ओर से घायल की आमदनी को प्रमाणित करने के लिए आया था और कह रहा था कि घायल उस के यहाँ वाहन चालक था और छह हजार रुपए प्रतिमाह उस का वेतन देता था। इस बात का एक प्रमाण पत्र भी उस ने जारी किया था।  मैं ने उस के अखबार को कभी देखा न था।  खैर उस से जिरह के बाद आमदनी तो वह साबित नहीं कर सका लेकिन बाद में मैं ने उस से उस का अखबार मुझे दिखाने को कहा तो उस ने 12 पृष्ठों का ग्लेज्ड पेपर पर छपा एक रंगीन अखबार उसने मुझे बताया।  जिस में अधिकांश समाचार इस तरह के थे जैसे उन के माध्यम से किसी को ब्लेक मेल किया जा रहा हो।  ऑफ द रिकॉर्ड उस ने बताया कि असली आमदनी ही आज अखबार की उन सरकारी अफसरों को ब्लेक मेल के जरिए होती है जो सरकार और जनता को हर माह करोड़ों का चूना लगाते हैं। 

इस तरह हम देखते हैं कि अखबार और माध्यम निष्पक्ष नहीं रह गए हैं।  वे प्रचार के माध्यम भर रह गए हैं। यह जरूर हुआ है कि आपसी प्रतियोगिता के कारण सूचना को पहुँचाने की गति बहुत तीव्र हो गई है। लेकिन उस में भी गलत सूचनाओं की भरमार रहती है।  मेरे नगर की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं जो हिन्दी टीवी माध्यमों पर घंटे भर में ही प्रमुख समाचार बन गई थीं, के बारे में अधिकांश सूचनाएं गलत थीं। यहाँ तक कि चैनल पर दिखाए जा रहे बिलकुल गलत थे।  इस तरह सूचनाएँ जो हड़बड़ी में आ रही थीं उन में गलत अधिक थीं। दूसरे ही दिन कोई अन्य ब्रेकिंग न्यूज मिल जाने पर उन का फॉलोअप गायब था।  हम राष्ट्रीय अखबार का  जो स्थानीय संस्करण देखते हैं उस में स्थानीय समाचार होते हैं और कुछ प्रान्तीय समाचार और कुछ राष्ट्रीय समाचार। बहुत से आवश्यक समाचार उन से छूट जाते हैं। 

इन सारी परिस्थितियों में इंटरनेट सूचनाओं के श्रेष्ठ साधन के रूप में उभऱ कर सामने आया है।  जिन लोगों के पास यह सुविधा है वे अन्य किसी भी साधन की अपेक्षा खोज के माध्यम  से समाचार को खोज निकालते हैं और उस में भी सच को निकालने की योग्यता भी कुछ ही दिनों में प्राप्त कर लेते हैं।  इस बीच ब्लागिंग या चिट्ठाकारी ने भी अपनी भूमिका अदा करना आरंभ कर दी है।  यह माध्यम एकदम व्यक्तिगत है और कोई भी व्यक्ति इस माध्यम से सूचनाएँ प्रकट कर सकता है।  सूचनाओं पर अपने विचार प्रकट कर सकता है।  और वे विचार कम से कम उस व्यक्ति की स्वयं की अभिव्यक्ति होते हैं। यह दूसरी बात है कि वह व्यक्ति जिन विचारों या विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करता है उस का प्रभाव उस में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।  लेकिन फिर भी वे उस के अपने विचार होते हैं।  इस तरह हम देखते हैं कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इंटरनेट ने और विशेष रूप से  ब्लॉगिंग या चिट्ठाकारी ने एक नई ऊँचाई प्रदान की है।  लेकिन यह ध्यान में रखने योग्य बात है कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल संविधान प्रदत्त मूल अधिकार में ही है। (क्रमशः जारी)

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