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शिकायत के लिए भी समय सीमा है, देरी करने पर शिकायत कर्ता खुद संदेह के घेरे में होता है।

समस्या-

अभी जैसवाल ने 14/459,भोली नगर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

ड़की का परिवार अपनी जाति (जब रिश्ता लेकर आते हैं तब खुद को लड़के का जाति का ही हूँ कहते हैं), धर्म (शायद आदिवासी क्रिश्चियन होते हुए सब छुपाते हैं, खुद को हिन्दू कहते हैं। बाद में लड़के द्वारा लड़की की माँ (नानाजी का नाम और उनका गाँव आदि तथा रिश्तेदार आदि) और पिताजी के रिश्तेदार कहाँ हैं पूछने पर कुछ बताने के जगह लड़की धमकी देती है टार्चर करने का केस कर दूंगी तथा उसके घर वाले गाली गलोज करते हैं जिसका आडिओ रिकार्डिंग भी है! जन्मपत्री में उम्र कम बताते हैं मगर बाद में लड़के को पता चलता है की लड़की लड़के से बड़ी है। साथ ही लड़का जब उनके यहाँ लड़की देखने गया था तब 4 दिन लड़के को रोके रहे तथा दबाव देकर अकेले लड़के (लड़के का परिवार से कोई नहीं था) को रिंग सेरामनी करने को को विवेश किये थे जहाँ सिर्फ लड़की परिवार ही था बाकी और कोई नहीं। एक तरह से लड़के को फंसा दिए थे और उसी दवाब में लड़का मजबूर हो शादी को बाध्य हुआ था। शादी को 10 साल से ऊपर हो गया है उन दोनों के एक लड़का भी है और लड़की यहीं ससुराल में ही रहती है। बातें तो बहुत लम्बी हैं। मगर यहाँ संक्षेप में सारी बात कह चुका अब इसमें लड़की के परिवार पर किस तरह और क्या केस किया जा सकता है?

समाधान-

प की समस्या है कि भिन्न जाति, धर्म, जन्मपत्री में कम उम्र बताना, लड़के से लड़की का बड़ा होना, रिंग सेरेमनी दबाव से करवा देना जिस के दबाव में विवाह कर लेना, विवाह से एक संतान पैदा होना, अभी तक लड़की का ससुराल में रहते रहना फिर भी विवाह के 10 वर्ष बाद तक किसी अदालत में किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं उठाना।

महोदय, आप किस दुनिया में रहते हैं? विवाह के लिए कानूनन जाति, धर्म, उम्र का कोई बंधन नहीं है इन के आधार पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। फिर 10 वर्ष तक लड़की विवाहित जीवन निबाह कर अपनी ससुराल में रह रही है, उस से एक संतान पैदा हो जाती है। आप आपत्ति नहीं करते। अब आपत्ति का कोई नया कारण नहीं है। भाई क्या अब एक स्त्री से मन  भर गया है या कोई दूसरी भा गयी है?

आप रुपया उधार देते हैं और तीन साल तक अदालत में कोई दावा नहीं करते तो फिर अदालत में दावा नहीं कर सकते। अब विवाह पर दस साल बाद आपत्तियाँ उठा रहे हैं इस दुनिया की तो कोई अदालत आप को सुनेगी नहीं। बल्कि यह कहेगी कि आप खुद दोषी हैं। आप के लिए इस शादी से निकल भागने का कोई रास्ता नहीं है। आपकी हर कोशिश आ बैल मुझे मार वाली होगी।

आरक्षण लाभ के लिए जाति का निर्धारण जन्म से होगा न कि विवाह से

 मथुरा (उ.प्र.) से नेम प्रकाश ने पूछा है –
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नुसूचित जाति की कोई लड़की किसी सामान्य जाति के पुरुष से विवाह करती है, तो क्या उस लड़की की जाति शादी के बाद बदल जाती है? क्या वह सरकारी नौकरियों के लिये अपनी जाति का प्रयोग कर सकती है? कृपया उचित सलाह दें।
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 उत्तर –
नेम प्रकाश जी,
मारे देश में जिस तरह से जातिवाद ने समाज को विभाजित किया है यह भारतीय समाज के लिए कोढ़ रोग से कम नहीं है। आजादी के आंदोलन ने समाज के इस विभाजन को कम किया था। लेकिन उसी आजादी के आंदोलन से आरक्षण की जो चिकित्सा उपजी उस ने इस कोढ़ को स्थायित्व भी प्रदान कर दिया। धीरे-धीरे जैसे जैसे आबादी बढ़ी, बेरोजगारी भी बढ़ी। जैसे ही आरक्षण रोजगार और शिक्षा से जुड़ा उस ने निम्न जातियों को लाभ पहुँचाया। अब हर कोई जाति अनुसूचित, जनजाति या पिछड़ी हो जाना चाहती है। राजस्थान में गुर्जर अनुसूचित होना चाहते हैं तो हरियाणा के जाट खुद को पिछड़ी जाति सूचि में देखना चाहते हैं. आरक्षण की मांग करने में राजपूत और ब्राह्मण भी पीछे नहीं हैं।
यूँ तो संविधान कहता है कि जाति, धर्म और लिंग आदि के आधार पर भेदभाव गलत है। लेकिन जब लोगों तो जाति के आधार पर लाभ मिल रहा हो तो लोग उसे क्यों न चाहेंगे? इस तरह इस रोग का जड़मूल से समाप्त होना तो दूर रहा उसे जीवनदान प्राप्त हो गया है। अनुसूचित, जनजाति, और पिछड़ी जातियों के लिए जो आरक्षण है उस का आधार ही यह है कि इन जातियों में जन्म के कारण किसी व्यक्ति को सामाजिक भेदभाव और पिछड़ेपन का दोष झेलना पड़ा है। इस कारण से किसी व्यक्ति की जाति उस के जन्म से निर्धारित होती है और उसे विवाह और दत्तक ग्रहण के आधार पर बदला नहीं जा सकता।
प की जिज्ञासा के संबंध में 2 जुलाई 2010 को उत्तरप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा श्रीमती राना निगम बनाम उत्तरप्रदेश राज्य एवं अन्य के मुकदमे में पारित ताजा निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मामले में आवेदिका श्रीमती राना निगम का जन्म मध्यप्रदेश में हुआ और उस ने बीएएमएस की डिग्री प्राप्त की थी और वह एक आयुर्वेदिक पंजीकृत चिकित्सक थी। उस का जन्म जाटव जाति में हुआ था जिसे मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश राज्यों में अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है। उस का विवाह उत्तरप्रदेश के एक सामान्य जाति के युवक से हुआ। उस ने उत्तरप्रदेश में आयुर्वेदिक चिकित्सक के पद के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। साक्षात्कार के दौरान उस ने जो जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया उस में उस के पति का नाम दर्ज था जो कि सामान्य श्रेणी से था। उसे अपने पिता के नाम सहित प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा जो उस ने प्रस्तुत कर दिया। इस पर उस का मामला राज्य सरकार को प्रेषित कर दिया गया। राज्य सरकार ने उसे नौकरी देने से मना कर दिया। इस पर उस ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को रिट याचिका प्रस्तुत की।
लाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यू.पी. पब्लिक सर्विस कमीशन बनाम संजय कुमार तथा स्वयं इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत डॉ. मधु राणा बनाम उत्तरप्रदेश राज्य के मामलों का उल्लेख करते हुए निर्णय दिया कि किसी व्यक्ति की जाति का निर्धारण उस के जन्म से होगा न कि इस आधार पर कि उस का विवाह किस जाति के व्यक्ति से हुआ है। इस मामले में यह भी निर्धारित किया गया है कि जिस व्यक्ति का जन्म जिस राज्य में हुआ है, तो उस राज्य में वह जाति जिस श्रेणी में है, सभी राज्यों में उसी श्रेणी में मानी जाएगी और उसे उस का लाभ प्राप्त करने से वंचित नहीं किया जा सकता।


क्या अंतर्जातीय विवाह में माता की जाति के आधार पर संतान का जाति प्रमाण पत्र बन सकता है?


ल के आलेख बिना विवाह किए एकल माता की संतान क्या अवैध होगी? पर पल्लवी त्रिवेदी ने प्रश्न पूछा- “क्या एक शादीशुदा महिला जिसने की शादी के बाद उपनाम नहीं बदला है….अपने जाति प्रमाण पत्र के आधार पर अपने पुत्र का जाति प्रमाण पत्र बनवा सकती है? क्या बच्चे के पिता के जाति प्रमाण पत्र के अभाव में बच्चा सामान्य वर्ग में ही आ पायेगा”?

पल्लवी जी का प्रश्न बहुत ही सामयिक है, इस तरह के मामलों में कानूनी स्थिति इस तरह है…

जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता इस लिए होती है कि भारत का संविधान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और अब अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को उन के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण अनेक स्तरों पर अधिमान्य उपचार (preferential treatment) प्रदान करता है। इसी अधिमान्य उपचारों की सुविधा प्राप्त करने के लिए जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने केरल राज्य बनाम चंद्रमोहनम के मुकदमे { [2004] 3 SCC 429} में अपनी राय इस तरह रखी है…

1.3. The object of Articles 341, 342, 15(4), 16(4) and 16(4A) of the Constitution of India is to provide preferential treatment for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes having regard to the economic and educational backwardness and other disabilities wherefrom they suffer. So also considering the typical characteristic of the tribal including a common name, a contiguous territory, a relatively uniform culture, simplistic way of life and a tradition of common descent, the transplantation of the outsiders as members of the tribe or community may dilute their way of life apart from such persons do not suffer any disabilities. Therefore, the condition precedent for a person to be brought within the purview of the Constitution (Scheduled Tribes) Order, 1950, one must belong to a tribe and suffer disabilities wherefrom they belong.
स तरह किसी भी व्यक्ति को अनुसूचित जाति का होने के कारण प्राप्त होने वाले लाभों का हकदार होने के लिए यह आवश्यक है कि वह वास्तव में अनुसूचित जाति का सदस्य हो। समस्या तब उठ खड़ी होती है, जब कि माता-पिता में से कोई एक किसी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग से होता है और दूसरा सामान्य वर्ग से। ऐसी स्थिति में यह करना कठिन होता है कि संतान को उस के पिता की जाति का माना जाए अथवा माता की जाति का। इस तरह के एक मामले { अंजन कुमार बनाम भारत संघ ( 2006 एआईआर सु.को. 1177} में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी को भी जाति के आधार पर लाभ प्राप्त करने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि उस ने उस जाति का सदस्य होने के कारण उस जाति के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक अभावों और अयोग्यताओं को भुगता हो। इस मामले में अनुसूचित जनजाति की एक महिला ने एक सामान्य वर्ग के पुरुष के साथ विवाह किया था। न्यायालय ने कहा कि यह एक प्रेम विवाह का मामला था और महिला अपने वर्ग को छो़ड़ कर चली गई थी। इस कारण उस की संतान उस जाति की नहीं कही जा सकती।
स निर्णय के बाद यह माना जाने लगा कि केवल किसी भी व्यक्ति की जाति का निर्धारण केवल पिता की जाति के आधार पर ही किया जा सकता है। यह मुकदमा मेघालय के किसी व्यक्ति के संबंध में था। मेघालय में स्थिति यह है कि अनेक जनजातियों में उत्तराधिकार मातृसत्तात्मक है। इस संबंध में वहाँ की सरकार ने विचार किया और उस के उपरांत यह राय प्रकट की कि उक्त निर्णय केवल एक व्यक्ति के संबंध में दिया गया है और वह उसी मामले में लागू होगा।
दि हम सुप्रीमकोर्ट के इस निर्णय का अवलोकन करें तो पाएँगे कि किस व्यक्ति द्वारा जाति आधारित संवैधानिक अधिमान्य उपचारों का लाभ प्राप्त करने के लिए दिया जाने वाला जाति प्रमाण पत्र प्रदान करने के लिए निम्न प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए….

1. जहाँ माता-पिता दोनों की जाति एक ही है वहाँ संतान की जाति भी वही होगी जो उन के माता-पिता की होगी।
2. जहाँ माता-पिता भिन्न जाति के हैं वहाँ यह देखना होगा कि उन के विवाह के उपरांत उन की संतान किस परिवार, कुटुंब या जाति के सदस्य बनी है।
3. जहाँ माता अविवाहित है और उस ने संतान को जन्म दिया है वहाँ माता की जाति ही संतान की जाति मानी जाएगी।

स तरह हम देखते हैं कि अंतर्जातीय विवाह की संतानों के मामले में जाति प्रमाणपत्र जारी करना एक जटिल प्रक्रिया हो गई है। ऐसे व्यक्ति को जाति प्रमाण पत्र जारी करने के लिए विस्तृत प्रक्रिया अपनानी होगी। जाति प्रमाण प्राप्त करने के लिए सक्षम अधिकारी के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करनी होगी कि वह व्यक्ति अपने जन्म के उपरांत विशिष्ट अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य रहा है, और उसे उस जाति के परिवार, कुटुंब या समूह ने अपना सदस्य मान लिया है।

आशा है पल्लवी जी, को उन के प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा।

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