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बालक और उस की संपत्ति का संरक्षक नियुक्त करने हेतु जिला कलेक्टर का आवेदन।

rp_CUSTODY-OF-CHILD-254x300.jpgसमस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने चिड़ावा, राजस्थान समस्या भेजी है कि-

गार्जियन्स एण्ड वार्ड एक्ट 1890 की धारा 8 बी के अन्तर्गत अवयस्क बच्चे के लिए जिसे गोद लेने वाले माँ और बाप दोनों की मृत्यु हो गई है उस की संपत्ति का कस्टोडियन और सरंक्षक तथा अवयस्क स्वयं का संरक्षक नियुक्त करने का प्रार्थना पत्र जिला कलेक्टर संबंधित जिले जहाँ उसकी संपत्ति है उसके जिला एवं सत्र न्यायाधीश को किन परिस्थितियो में भिजवा सकता है? ऐसा करने के लिए नाबालिग को स्वयम् कलेक्टर को आवेदन करना होगा या अन्य व्यक्ति द्वारा कलेक्टर को उस की सूचना देने पर सूचना के आधार पर भी कलेक्टर एक व्यक्ति को कस्टोडियन एवं संरक्षक नियुक्त करने का पत्र धारा 10(2) के तहत भिजवा देना चाहिए?

समाधान-

संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा-8 व 10 में जो प्रावधान दिए गए हैं उन में एक जिला कलेक्टर को यह सुविधा दी गयी है कि किसी बालक और उस की संपत्ति का संरक्षक नियुक्त करने हेतु वह आवेदन कर सकता है। पूरा कानून इस मामले में मौन है कि वह ऐसा कब कर सकता है? वैसी स्थिति में यह कलेक्टर की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह स्वतः ऐसा कर सकता है या किसी भी व्यक्ति अथवा स्वयं बालक के आवेदन पर ऐसा कर सकता है। लेकिन कलेक्टर को ऐसा आवेदन जिला न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने को बाध्य नहीं किया जा सकता।

स तरह के मामलों में कलेक्टर के कर्तव्यो को निर्धारित करने वाला कोई निर्णय किसी न्यायालय का उपलब्ध नहीं है। किन्तु इस कानून से यह स्पष्ट है कि जब भी कलेक्टर को यह जानकारी हो कि उस के जिले में कोई बालक और उस की संपत्ति का कोई वैध संरक्षक नहीं है तो उस की जिम्मेदारी है कि ऐसा प्रार्थना पत्र वह जिला न्यायाधीश को प्रस्तुत करे।

स तरह के मामलों में बेहतर है कि जो व्यक्ति स्वयं स्वेच्छा से संरक्षक बनना चाहता है वह स्वयं ही ऐसा आवेदन प्रस्तुत करे। राजस्थान में अब ऐसा आवेदन जिला न्यायालय के स्थान पर परिवार न्यायालय को प्रस्तुत किया जानि चाहिए।

बेटी की कस्टड़ी के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन किया जा सकता है।

Muslim-Girlसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से पुनः समस्या भेजी है कि-

मुझे लड़की की कस्टड़ी कितने दिनों में मिल सकती है। मैं क्या कर सकती हूँ? मैं उन की दूसरी पत्नी हूँ, पहली ने विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर ली थी। मैं ने भरण पोषण का मुकदमा किया था। उन्हों ने मुझे अपने साथ रखने को कहा तो मैं ने केस वापस ले लिया। लेकिन उन्होने बच्चा छीन कर मुझे फिर निकाल दिया। अब 498ए का मुकदमा चल रहा है अभी तारीख नहीं पड़ी है। मुझे अपनी बेटी चाहिए। बहुत छोटी है वो। मेरा समाधान करें।

समाधान-

कंचन जी, आप की समस्या को देखते हुए हम ने तुरन्त आप को समाधान दिया था। आप ने पूरा विवरण दिया होता तो हम तभी आप का समाधान उसी तरह देते। हम यहाँ समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। नियमित वकालत नहीं करते। फिर भी आप की समस्या को देखते हुए समाधान बता रहे हैं। कृपया आगे कोई कार्यवाही किए बिना कोई प्रश्न हम से न करें। करें तो इसी पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में करें आप को यहीं उत्तर दिया जा सके।

प को कस्टड़ी जल्दी मिल सकती है। क्यों कि छोटी उम्र की बच्ची को उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। आप को तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन देना चाहिए और अपने व बच्ची के खर्चे के साथ बच्ची की कस्टडी की राहत मांगनी चाहिए। उस में मजिस्ट्रेट धारा 21 के अन्तर्गत तुरन्त कस्टड़ी के लिए आदेश कर सकता है। बस आप को एक अच्छा स्थानीय वकील करना होगा।

498ए के मामले में आप शिकायतकर्ता हैं, मुकदमा पुलिस ने चलाया है और सरकारी वकील उस की पैरवी करेगा। जब उस में साक्ष्य ली जाएगी तब आप को केवल बयान के लिए समन आएगा। उस के पहले आप को कोई सूचना प्राप्त नहीं होगी।

प चाहें तो परिवार न्यायालय में धारा-9 या धारा-10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना या न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए आवेदन कर सकती हैं। उस के साथ ही बच्ची की कस्टड़ी प्राप्त करने के लिए भी आवेदन कर सकती हैं। लेकिन यह बताना कठिन है कि बच्ची की कस्टड़ी कितने दिन में मिल सकती है।

आप को बेटी की कस्टडी मिल सकती है।

born after faild tubectomyसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मैं ने लव मैरिज की है और मेरा पति मुझे मारता है, मेरी 18 माह की बेटी है जो उस ने मेरे से छीन ली है और मुझे घऱ से बाहर निकाल दिया है। मैं ने 498ए का केस किया था लेकिन उस में उन लोगों ने जमानत ले ली। मेरे से नोटेरी करवाई है कि लड़की पर मेरा कुछ भी हक नहीं होगा। क्या लड़की मैं नहीं ले सकती? कृपया समाधान करें।

समाधान-

ति से विवाद होने पर सब से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि आप के पास सपोर्ट क्या है? यदि आप आत्मनिर्भर हैं, अर्थात आप स्वयं अपना खर्च उठा सकती हैं और बेटी की देखभाल कर सकती हैं तो सब से बेहतर है। यदि नहीं है तो सब से पहले आप को यह सोचना चाहिए कि आप का अकेले जीवन गुजारने का साधन क्या बनेगा और मुकदमा लड़ने के लिए आप का सपोर्ट क्या होगा।

धारा 498ए में जमानत तो हो ही जाती है। मुकदमा चलेगा और उस का साबित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि आप खुद न्यायालय के समक्ष क्या बयान करती हैं। आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत कार्यवाही कर के सुरक्षा, निवास की सुविधा, बच्चे की कस्टडी और अपने और बच्चे के लिए भरण पोषण का खर्च मांगना चाहिए। दूसरी ओर पारिवारिक न्यायालय में आवेदन दे कर न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए साथ में बच्चे की कस्टडी के लिए भी आवेदन करना चाहिए। आप को बच्चे की कस्टडी मिल सकती है। विशेष रूप से तब जब कि वह बालिका है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप के पति ने आप से कुछ लिखवा कर नोटेरी करवा लिया है। वह सब कुछ दबाव में भी हो सकता है जैसा कि प्रतीत होता है।

प जान लें विवाह किसी भी रीति से हो कानून के समक्ष वह विवाह होता है और उस के दायित्व और कर्तव्य समान होते हैं। हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है और किसी भी तरह से स्त्री को अधीन बनाने के रास्ते तलाशता रहता है। आप बच्चे के साथ प्रेम के कारण अपने पति के साथ बनी रहेंगी और जीवन भर यातनाएँ सहन करती रहेंगी। इसी कारण आप से बच्चे को छीन लिया गया है। आप यदि आत्मनिर्भर नहीं हैं तो उस तरफ कदम रखिए। एक स्त्री का सम्मान जनक स्थान समाज में इसी बात पर निर्भर करता है कि वह आत्मनिर्भर है या नहीं।

सहमति से विवाह विच्छेद हो तो संतान की कस्टडी और खर्चे के बारे में भी आपसी सहमति बनाएँ …

mother_son1समस्या-

संध्या ने भोपाल, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2012 में हुई थी। मेरा 8 महीने का एक बेटा है। शादी के बाद से ही पति मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर थे, मैं ने तंग आकर महिला हेल्प लाइन में कंप्लेंट कर दी। अब मैं अपनी माँ के पास रह रही हूँ। मैं ने तलाक़ लेने का निर्णय किया है। पर मैं सहमति से तलाक़ चाहती हूँ। जब मेरे वकील ने मेरे पति से पूछा तो उन्होने भी सहमति व्यक्त की है। मैं केन्द्रीय सरकार की सेवा में हूँ और पति प्राइवेट बिजनेस करते हैं। ससुराल में एक घर जो सास ने बनाया है, 10 बीघा ज़मीन जो ससुर के नाम है और एक दुकान मेरे पति के नाम है। यही संपत्ति है। अभी लीगली बटवारा नहीं हुआ है। सहमति से तलाक़ होने पर मैं अपने पति से अपने लिए या मुझे ना भी मिले तो अपने बेटे के लिए उक्त संपत्ति में हिस्सा माँग सकती हूँ। अगर हाँ तो उस का निर्धारण किस प्रकार से होगा?

समाधान-

प स्वयं केन्द्रीय सरकार की नौकरी में हैं वैसी स्थिति में कानूनन आप कितना प्राप्त करने की स्थिति में हैं यह तभी बताया जा सकता है जब कि यह तथ्य ज्ञात हो कि आप के पति की आय कितनी है और आप खुद कितना कमाती हैं। फिर भी इस बात की संभावना कम है कि आप को कुछ आर्थिक सहायता प्राप्त हो।

प का विवाह विच्छेद हो जाने पर भी आप के पुत्र का संबंध तो सदैव ही उस के पिता से बना रहेगा। इस कारण उस के पिता से जो अधिकार हैं वे भी सदैव बने रहेंगे। पुत्र की कस्टडी और उस के पालन पोषण के खर्चों के लिए धनराशि जो पति आप को निरन्तर देते रहें आपसी सहमति से निर्धारित की जा कर आवेदन में अंकित की सकती है और न्यायालय इसे विवाह विच्छेद की डिक्री में अंकित कर सकता है।

जो भी संपत्ति आप की सास, ससुर व पति के नाम है उस पर उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार नहीं है। हाँ पुत्र का भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है जिस के लिए जब भी आवश्यकता हो तब यदि पुत्र आप की कस्टडी में रहता है तो आप के माध्यम से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। न्यायालय आप दोनों की आय और संपत्ति को ध्यान में रखते हुए पुत्र के लिए भरण पोषण की राशि निर्धारित कर सकता है।

दि आप के और आप के पति के बीच सहमति बनी है तो आप पति के साथ बातचीत कर के इन मसलों पर पहुँच सकती हैं। यदि आप के पति आप से विवाह विच्छेद के लिए सहमत हैं तो पुत्र की कस्टडी और भविष्य के खर्चों पर भी आपसी सहमति बन सकती है। बेहतर यही है कि यह सब आपसी सहमति से तय हो और विवाह विच्छेद की डिक्री में सम्मिलित कर लिया जाए।

सब से पहले दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत कराएँ…

father daughterसमस्या-

अनाम अग्रवाल ने होशंगाबाद मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे दोस्त की शादी जुलाई 2012 में हुई। उस की पत्नी का पहले से किसी और से अफेयर था। दोस्त की सास उन के घर में ज़्यादा इंटरफेयर करती थी। इसी बात में एक दिन उसकी पत्नी 12 जुलाई 2013 को अपने माँ बाप के घर चली गई। वहीं 3 महीने बाद सितम्बर 2013 में एक बेटे को जन्म दिया। दोस्त के घर वाले और दोस्त पत्नी को देखने भी गये और लाने की कहने पर भी पर दोस्त की सास ने नहीं लाने दिया। फिर करीब 6 महिने बाद दोस्त और उसकी पत्नी की बात शुरू हुई और वो अपने पति की शर्तों पर आने तो तैयार हो गई। दोस्त बच्चे के खातिर सब बातें भुला के उस को वापस ले आया। फिर अगस्त 2014 में राखी पर उसके मायके गई और वहाँ उसके एक्स-ब्वायफ्रेंड से मिलने के लिए रुक गई। मन से झूठी कहानी बना कर कह दिया कि मुझे ससुराल में पति मारते हैं और परेशान करते हैं, वह पति के साथ नहीं चाहती। मेरे दोस्त ने अपने बेटे के जन्म दिन पर उसे फ़ोन लगाया तो उस ने बेटे से नहीं मिलने दिया। दो दिन पहले ही उसकी बड़ी बहन के घर बेटे को ले कर चली गई और कहा कि यदि तुमने किसी को मेरे अफेयर का बताया तो मैं बेटे को जान से मार दूँगी। मेरे दोस्त ने उस की ये बातें अपने घर वालों को बता दीं लेकिन बदनामी के दर से उस के अफेयर का किसी को कुछ नहीं बता पा रहा है क्यों कि उसके पास कोई पक्का सबूत नहीं है। ना कोई कॉल रिकॉर्डिंग है। वह बहुत डिप्रेस्ड है किसी से कुछ बोल नहीं पा रहा है। वो क्या करे जिस से कि उस का एक वर्ष दो माह का बच्चा उसके पास आ जाए।

समाधान-

र्तमान परिस्थिति में किसी भी प्रकार से यह संभव नहीं है कि आप के मित्र का पुत्र उसे मिल जाए।

प के मित्र केवल संतान को चाहते हैं। लेकिन पत्नी को वह भी अपने पास नहीं रखना चाहते। पत्नी स्वयं भी नहीं आना चाहती है। स्थिति ऐसी है कि दोनों का संबंध टूटने की तरफ बढ़ रहा है। ऐसी अवस्था में आप के मित्र को तुरन्त दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए।

स के प्रतिवाद में पत्नी 406, 498 ए आईपीसी के अपराधों के लिए मिथ्या परिवाद प्रस्तुत कर सकती है और आप के मित्र कुछ परेशानी में पड़ सकते हैं। लेकिन केवल इन धाराओं में मुकदमा और गिरफ्तारी के भय से पुरुष कोई कार्यवाही नहीं करते हैं और देर हो जाती है। देर सबेर पत्नियाँ इन धाराओं के अंतर्गत कार्यवाही करती हैं तो तब बचाव करना भी कठिन हो जाता है। बचाव में सब से पहले धारा 9 का आवेदन प्रस्तुत करने की जरूरत पड़ती है। इस कारण यह अधिक अच्छा है कि धारा 9 का आवेदन तुरन्त प्रस्तुत किया जाए। उस का परिणाम देखा जाए। अभी आप के मित्र के पास पत्नी से विवाह विच्छेद का कोई आधार नहीं है। लेकिन यदि धारा 9 के आवेदन स्वीकार हो कर डिक्री मिल जाने के बाद भी एक वर्ष तक पत्नी और पति के बीच कोई संपर्क नहीं होता है तो उसी आधार पर विवाह विच्छेद भी हो सकता है। एक बार धारा 9 का आवेदन लंबित हो जाने पर पुत्र की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

सामान्य परिस्थिति में संतान की अभिरक्षा वयस्क होने तक माता को ही प्राप्त होती है।

mother_son1समस्या-

सारिका ने मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल से समस्या भेजी है कि


मेरे पति डिलिवरी के पहले से ही मुझे धमकी देते थे कि मेरा बच्चा मुझे दे दो और तुमको जहाँ जाना हो चली जाओ। इसके अलावा वो शराब पीकर मेरे बच्चे के पास आते हैं जिससे उस पर बुरा असर पड़ता है। वो अभी छोटा है और उल्टियाँ करने लगता है।  हमारी विचारधारा में बहुत अंतर है और हमारे बहुत झगडे होते हैं। मेरे पति अक्सर मुझे कहते हैं की अगर मुझे अलग होना है तो वो आसानी से मुझको तलाक दे देंगे। शादी के वक्त उन्होंने अपनी असली उम्र छुपा ली थी। बाद में मुझे पता चला कि वो मुझसे 15 साल बड़े हैं। जनरेशन गैप के कारण वो चाहते हे की मैं उनके पैर के निचे रहूँ।  कहते हैं कि हम तुम्हे मारेंगे भी पीटेंगे भी, अगर रहना है तो रहो वर्ना मत रहो। मेरे परिवार में मेरी माँ अकेली है और कोई नहीं है जो मेरा साथ दे सके। मेरे पति को अगर मैं सहमति से तलाक का आवेदन लगाती हूँ और उन्होंने सहमति से तलाक नहीं लिया मुकर गए तो में अगला स्टेप क्या उठा सकती हूँ? मेरा बच्चा 5 महीने का है और मैं सेंट्रल की जॉब में हूँ और मेरे पति प्राइवेट जॉब में। मैं चाहती हूँ कि न केवल मेरा बच्चा 7 साल के लिए बल्कि हमेशा के लिए मेरे पास रहे। मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे पति से अलग हो जाना चाहिए या उनकी गाली गलौच बर्दाश्त करके रहना चाहिए क्यों कि मेरा बच्चा बहुत छोटा है।

समाधान-

पका विवाह बेमेल विवाह है। आप के पति ने अपनी उम्र छुपा कर आप से विवाह तो कर लिया लेकिन उन्हें अब अहसास है कि उन्हों ने गलती की है। वे खुद उस विवाह को संभाल नहीं पा रहे हैं। वे आप से अलग होना चाहते हैं। लेकिन वे चाहते हैं या तो तलाक सहमति से हो या फिर आप खुद उस के लिए पहल करें।

प का बच्चा छोटा है केवल इस आधार पर आप का इस बेमेल विवाह में रहना उचित नहीं है। यह न केवल आप के लिए अपितु आप की संतान के लिए भी ठीक नहीं है।जरा आप सोचिए बच्चे को पालने में सर्वाधिक बल्कि लगभग पूरा योगदान आप का है। आप के पति का योगदान नहीं के बराबर रहा होगा। यदि आप खुद इस संबंध से खुश और सुखी नहीं है तो आप की संतान जिसे पालने की सर्वाधिक जिम्मेदारी आप उठा रही हैं, उस का पालन पोषण भी आप ठीक से नहीं कर सकतीं और नही उसे पालन पोषण के लिए अच्छा वातावरण दे सकती हैं।

प जिन परिस्थितियों में हैं उन में हमारी राय में आप को तुरन्त पति का घर छोड़ कर अलग अथवा अपनी माता जी के साथ रहना आरंभ कर देना चाहिए। उस के बाद आप अपने पति से बात करें कि क्या वह सहमति से विवाह विच्छेद के लिए तैयार है या नहीं। तब आप अपनी शर्त स्पष्ट कर दें कि बच्चा वयस्क होने (18 वर्ष की उम्र) तक आप के साथ रहेगा। वयस्क होने के बाद न्यायालय यह तय नहीं करेगा कि बच्चा किस के पास रहेगा। तब बच्चा खुद निर्णय करेगा कि वह किस के साथ रहे। बच्चे के भरण पोषण के लिए पिता का क्या योगदान होगा यह भी आप सहमति  से विवाह विच्छेद के समय तय कर सकते हैं।

दि आप के पति सहमति से विवाह विच्छेद के लिए तैयार न हों या ऐसी संभावना हो कि वे प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही अपनी सहमति वापस ले सकते हैं तो आप सहमति से विवाह विच्छेद के स्थान पर हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-13 के अन्तर्गत अपनी ओर से विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के लिए पति का जो व्यवहार है वह क्रूरतापूर्ण व्यवहार की श्रेणी का है और उस आधार पर आप को आसानी से विवाह विच्छेद मिल जाएगा।

हाँ तक बच्चे की अभिरक्षा का प्रश्न है तो वह निर्णय न्यायालय बच्चे के हित को देखते हुए करता है। सामान्य परिस्थितियों में बच्चे का हित उस की माँ के साथ ही होता है इस कारण से अधिकांश निर्णय यही होता है कि बच्चा माँ के साथ रहेगा। आप की परिस्थितियों में भी इस बात की संभावना अत्यधिक है कि बच्चे की अभिरक्षा उस के वयस्क होने तक आप के पास ही रहे।  इस मामले में आप को चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है।

विवाह और संतान की वैधता

adoptionसमस्या-
विजय कुमार ने उदयपुर राजस्थान से पूछा है-

2008 में विवाह के समय हिन्दू वर की आयु 20 वर्ष एवं वधु की आयु 21 वर्ष थी। विवाह के समय वर की जन्‍म तिथि जुलाई 1989 व वधु की 1988 थी।  जुलाई 2009 में शादी के एक साल बाद एक संतान जिसका जन्‍म पंजीयन भी करवाया हुआ है।  जून 2010 में वर के 21 वर्ष पूर्ण होने के दो चार दिन बाद की तिथि पर शादी का पंजीयन करवाया गया। यदि संतान की वास्‍तविक जन्‍म तिथि ही कहीं उल्‍लेख करें तो, वास्‍तविक शादी एवं शादी प्ंजीयन के बीच संतान पैदा होना, शादी की पुष्टि के रूप में एवं 21 वर्ष से कम उम्र में शादी के कारण या शादी से पूर्व संतान उत्‍पन्‍न करना। किसी प्रकार की जनप्रतिनिधित्‍व या राजकीय सेवा में अयोग्‍यता का आधार तो नहीं होगा? या फिर लिव इन रिलेशनशिप के तर्क से यह बात तो पैदा नहीं होगी कि जिस वधु से संतान हैं उसी के नाम का शादी पंजियन है। क्‍या यह शादी अमान्‍य है। क्‍या यह शादी कानूनी रूप से उचित है। कानूनी रूप से क्‍या सही होगा?

समाधान-

स विवाह में एक ही त्रुटि है कि विवाह के समय वर की आयु विवाह योग्य आयु से कम थी। विवाह का पंजीयन तब कराया गया जब वर की आयु विवाह योग्य हो गयी। अब पंजीयन के हिसाब से विवाह विवाह योग्य उम्र में हुआ है। विवाह पहले भी वैध था और अब भी वैध है। विवाह योग्य उम्र न होने से विवाह अवैध नहीं होता केवल वह कानून का उल्लंघन है तथा अपराध है। किन्तु अब उस विवाह को हुए इतना समय हो चुका है कि उस अपराध के लिए अब न तो कोई अभियोजन चलाया जा सकता है और न ही दंडित किया जा सकता है।

स मामले में अन्तर्विरोध बस इतना है कि संतान का जन्म पंजीकृत विवाह की तिथि के पहले हो गया है। यदि यह मान लिया जाए कि विवाह पूर्व संतान उत्पन्न हो गई है तो भी कभी कोई सन्तान अवैध नहीं होती वह सदैव वैध ही होती है।

स विवाह से न माता-पिता को और न ही संतान को किसी प्रकार की कोई समस्या होगी। केवल यह प्रश्न कभी भी और कहीं भी पूछा जा सकता है कि विवाह के पूर्व संतान कैसे उत्पन्न हो गई? उस के उत्तर में स्पष्ट बता दें कि वास्तविक विवाह तो जल्दी ही हो गया था। लेकिन रजिस्ट्रेशन बाद में कराया गया। इस से परेशानी कुछ भी नहीं होगी।

पत्नी से तलाक नहीं हुआ तो उस का दूसरा विवाह अवैध है।

alimonyसमस्या-

दिल्ली से मोहम्मद नसीम ने पूछा है –

मेरी शादी 15.05.1990 को हुई थी,  हमारे एक बेटा भी हुआ। उसके बाद हम दोनों में झगड़े होने लगे मेरी पत्नी 1993 में अपनी माँ के पास चली गई। वहीं से महिला समिति में केस कर दिया महिला समिती में एक साल तक केस चला।  हमने 1994 में दहेज का सारा सामान महिला समिति में पत्नी को दे दिया और केस वही खतम हो गया।  लेकिन तलाक नहीं हुआ था। सामान लेकर मेरी पत्नी अपनी माँ के साथ ही वापस चली गई।  फिर 1995 में मेरी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली।  वह तभी से दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही है। मेरा बेटा भी मेरी पत्नी के पास है। पत्नी से मेरा तलाक नहीं हुआ है तो क्या वो आज भी कानूनन मेरी पत्नी है?  मेरी पत्नी ने जो दूसरी शादी की है क्या उस शादी की कानूनी मान्यता है? और क्या मैं अदालत से अपने बेटे को अपनी अभिरक्षा में ले सकता हूँ?

समाधान-

प की शादी अपनी पत्नी से हुई थी और तलाक नहीं हुआ है तो आप की पत्नी अभी भी आप की पत्नी है। उस ने जो दूसरी शादी की वह अवैध है जो कि धारा 494 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है। जिस व्यक्ति ने आप की पत्नी के साथ शादी की है वह जार-कर्म का दोषी है। जो कि धारा 497 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत अपराध है।  यदि आप साबित कर सकते हों कि आप की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है तो आप अपनी पत्नी के विरुद्ध धारा 494 भा.दं.संहिता तथा उस के साथ विवाह करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध धारा 497 भा.दं.संहिता के अंतर्गत पुलिस थाना में रिपोर्ट लिखा सकते हैं या फिर सीधे न्यायालय में शिकायत कर के मुकदमा कर सकते हैं।

दि आप पत्नी का दूसरा विवाह साबित कर सकते हैं तो आप उसे इस आधार पर तलाक भी दे सकते हैं और अपने बेटे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर उस की अभिरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

पत्नी सही प्रतीत होती है, अपना मामला उस के साथ मिल बैठ कर या काउंसलर के माध्यम से निपटाएँ।

समस्या-

सांगरिया, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से लोनाराम ने पूछा है –

मेरी शादी 1998 में हुई थी। हमारे दो संताने हैं। जून 2007 से पत्नी बच्चों के साथ घर छोड़ कर सुनाम चली गई जहाँ वह सरकारी नौकरी करती है। उस का वेतन 40,000/- रुपए प्रतिमाह है।  2007 के बाद हम कभी भी नहीं मिले न ही वे लोग मुझे बच्चों से मिलने देते हैं। मैं ने 2009 से सुनाम कोर्ट में बच्चों की कस्टडी के लिए मुकदमा कर रखा है पर न्यायालय में मेरी कोई बात नहीं बनी। न ही मुझे बच्चों से मिलवाया गया है। न्यायालय ने मेरे से 3000/- रुपए प्रतिमाह का खर्च पत्नी को देने को बोला है। मैं अब पत्नी से तलाक लेना चाहता हूँ। पत्नी और उस के माता-पिता और वह और रुपए की मांग कर रहे हैं मुझे पत्नी से तलाक और बच्चे कैसे मिल सकते हैं?

समाधान-

Counsellingप ने अपनी पत्नी के बारे में मामूली सूचनाएँ यहाँ दी हैं। अपने और अपने बच्चों के बारे में कोई सूचना नहीं दी है। बिना किन्हीं तथ्यों के तलाक और बच्चों की कस्टडी के बारे में क्या कोई किसी को राय दे सकता है?

प ने अपने बारे में कुछ नहीं बताया। आप क्या करते हैं? क्या कमाते हैं? परिवार में कौन कौन साथ रहता है। आप की पत्नी की शिकायत क्या है? वह आप को छोड़ कर जाने की बात क्यों करती है? बच्चों से न मिलने देने के कारण क्या बताती है? और आप बच्चों को माँ के पास रखने के स्थान पर अपने पास क्यों रखना चाहते हैं?

प की पत्नी 40,000/- रुपए प्रतिमाह वेतन पाती है, सरकारी सेवा में है जिस में सामाजिक सुरक्षा अधिकतम है। वह क्यों अपना रोजगार छोड़ेगी? अदालत को भी बच्चों का भविष्य उसी के पास नजर आएगा। इस कारण से आप को बच्चों की कस्टडी मिलने का मार्ग तो न्यायालय से नहीं ही खुलेगा। आप तलाक लेना चाहते हैं और आप की पत्नी व उस के माता-पिता इस के लिए धन चाहते हैं तो गलत क्या है? आखिर आप की संतानें आप की और आप की पत्नी की हैं और यदि बालिग होने तक उन की परवरिश के खर्चे में आप के योगदान के रूप में वे कुछ धनराशि चाहते हैं तो यह तो आप को देना होगा। वर्तमान में जो 3000 रुपया प्रतिमाह खर्च अदालत ने निर्धारित किया है वह भी बच्चों के लिए है। उसे देने में आप को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि इसी राशि को किसी राशि का ब्याज मानें तो भी वह राशि भी चार लाख रुपया होती है। बच्चों की उम्र् बढ़ने के साथ उन का खर्च भी बढ़ेगा।

प तलाक ही चाहते हैं तो अपनी पत्नी और उस के माता-पिता से बात करें। जरूरत हो तो किसी काउंसलर की मदद लें या अदालत को ही बीच में डालें और समझौते व सहमति से विवाह विच्छेद प्राप्त कर लें।

अवयस्क की अभिरक्षा के लिए उस स्थानीय क्षेत्र के न्यायालय को क्षेत्राधिकार है, जहाँ अवयस्क निवास करता है।

समस्या-

सीतापुर, उत्तर प्रदेश से आकाश ने पूछा है –

मेरी पत्नी लखनऊ में मेरे बेटी के साथ रहती है। मैं सीतापुर में रहता हूँ। मैं एक बार लखनऊ में अपनी बेटी से मिलने गया तो मेरी पत्नी ने मुझे मारपीट कर झूठे मुकदमे में फँसा दिया। मुझे लखनऊ में जान का खतरा है। मैं ने सीतापुर में संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 25 में बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए मुकदमा किया है। पत्नी के वकील ने अदालत में कहा है कि मुकदमा सीतापुर न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है, यह लखनऊ की अदालत के क्षेत्राधिकार में है। क्या मैं इस मुकदमे को सीतापुर में लड़ सकता हूँ? पत्नी मुकदमे को लखनऊ ले जाना चाहती है। कोई ऐसा केस पहले हुआ हो जिस में बच्चे के पिता के यहाँ मुकदमा चला हो तो बताएँ। उचित सलाह दें।

समाधान –

widow daughterकिसी भी बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन पर सुनवाई का अधिकार किस न्यायालय को हो यह इस बात से निर्धारित नहीं होता कि आवेदक कहाँ रहता है। न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस बात से निर्धारित होता है कि बालक कहाँ रहता है या रह रहा है। जब आप स्वयम् ही कह रहे हैं कि बेटी पत्नी के साथ लखनऊ में निवास करती है। तो इस तरह सीतापुर के न्यायालय को उक्त मामले में क्षेत्राधिकार नहीं है। इस आधार पर आप का मुकदमा सीतापुर के न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है। आप की पत्नी के वकील ने सही आपत्ति उठाई है। इस आपत्ति के आधार पर न्यायालय यह निर्णय देगा कि मामला उस के क्षेत्राधिकार का नहीं है और वह उसे नहीं सुन सकता। इस स्थिति में आप चाहें तो मुकदमा वापस ले कर पुनः लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। या क्षेत्राधिकार के आधार पर निरस्त होने के उपरान्त लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं।

प की मुख्य परेशानी ये है कि लखनऊ में आप को जान का खतरा है। ये जान का खतरा तो सीतापुर में भी हो सकता है। आप उस खतरे के बारे में पुलिस, प्रशासन और न्यायालय से अलग से राहत प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन इस आधार पर उक्त मुकदमे का क्षेत्राधिकार नहीं बदल सकता। आप को उक्त आवेदन सीतापुर न्यायालय से वापस ले कर लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए। बाद में आप उसी न्यायालय से जान के खतरे की बात कर सकते हैं या फिर उच्च न्यायालय के समक्ष उक्त मुकदमे को लखनऊ से अन्यत्र जहाँ आप को खतरा न हो स्थानान्तरित करने हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

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