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किशोरों को अपनी समस्याएँ अपने अभिभावकों को बतानी चाहिए, न कि खुद समाधान खोजने में लगना चाहिए।

private schoolसमस्या-

रूपबास, भरतपुर, राजस्थान के एक किशोर भुवनेश्वर शर्मा ने तीसरा खंबा को समस्याएँ भेजी हैं-

1- हम एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं सभी बच्चे कक्षा टेंथ में पढ़ते है। हमारे यहां पर सामाजिक का कोई टीचर नहीं है क्या यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है या नहीं? कक्षा 10 राजस्थान बोर्ड की बोर्ड क्लास है, बच्चे सामाजिक में फेल भी हो सकते है। वहां पर सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाला कोई टीचर नहीं है, प्रधानाध्यापक से कहते हैं तो कहती हैं कोई बुराई नहीं, इस टीचर से सामाजिक विज्ञान पढ़ने में। इस के लिए कहां शिकायत करनी चाहिए?

2- एक व्यक्ति ऑफिस में लिपिक के पद पर कार्यरत है उसे उस की जाति से जाना जाएगा अथवा नाम से?

3- एक मास्टर है जो बच्चों के चूतड़ पर डंडा मारता है उस पर कोई कार्यवाही हो सकती है?

4- मिनरल वाटर का पानी खराब आने की सूचना हम कहां दे वाटर प्लांट सरकारी है?

5- हमने एक दुकानदार से एक नया सिम कार्ड खरीदा अब उसी पहचान पत्र की फोटो कॉपी करवाकर दुकानदार ने हमारे आईडी कार्ड और फोटो से अन्य सिम खरीद रखी है। उस के लिए क्या करना चाहिए? हमें कहां दावा पेश करना चाहिए?

6- हमने दुकानदार से नया मोबाइल खरीदा था। अब मोबाइल खराब हो गया है और वह गारंटी में है। वह दुकानदार उस मोबाइल को सर्विस सेंटर पर नहीं ले जा रहा है इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

7- हमने दुकानदार से एशियन पेण्ट  की पांच किलो की बाल्टी खरीदी अब उस बाल्टी में ऊपर पानी निकल आया है, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

8- मेरे दादा जी ने एक व्यक्ति के गाल पर थप्पड़ मार दिया था वह जाति से जाट है क्या वह हम पर दावा कर सकता है?

समाधान-

कुछ दिन पहले इस किशोर ने तीसरा खंबा के ई-मेंल बाक्स में प्रश्नों की लाइन लगा दी और उसे भर दिया। हम इस किशोर की अपनी, अपने साथियों, परिवार और समाज की चिन्ता करने की प्रवृत्ति की सराहना करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान खुद खोजने की प्रवृत्ति एक अच्छा गुण है। आगे चल कर यह प्रवृत्ति इस किशोर में नेतृत्वकारी गुण पैदा कर सकती है। लेकिन इस उम्र में जब कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी है उसे इन चिन्ताओं से मुक्त होना चाहिए। उसे ये चिन्ताएँ अपने अभिभावकों को बतानी चाहिए और स्वयं इन चिन्ताओं से मुक्त हो जाना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे इन चिन्ताओं को दूर करने के लिए प्रयास करें। किशोरों का काम है कि वे अपने अध्ययन पर अधिक ध्यान दें। पहले ही उन के स्कूल में सामाजिक विज्ञान का शिक्षक नहीं है। इस समस्या को बच्चो ने अपनी प्रथानाध्यापिका को बताया लेकिन लगता है इस समस्या का हल उन के पास नहीं है। उन्हों ने एक अन्य विषय के अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगाया है लेकिन लगता है वह ठीक से बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहा है। जिस से बच्चों को कष्ट हो रहा है। यह बात प्रधानाध्यापिका को समझनी चाहिए और स्कूल में उपलब्ध ऐसे अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगा देना चाहिए जो बच्चों को संतुष्ट कर सके। यदि यह भी संभव नहीं हो तो यह काम खुद प्रधानाध्याप्क को करना चाहिए।

1- राजस्थान में शिक्षकों की बहुत कमी है। सरकार नए शिक्षक भर्ती नहीं रही है। उस के स्थान पर उस ने सैंकड़ों विद्यालयों को बन्द कर के उन्हें समामेलित कर दिया है। इस से बच्चों को दूर दूर स्कूलों में जाना पड़ रहा है। फिर भी समस्या का अन्त नहीं हुआ है। इस से स्पष्ट है कि राज्य का धन बचाने का जो जुगाड़ सरकार ने निकाला था वह ठीक नहीं था। बच्चों के अध्ययन का पैसा बचा कर आप कैसा भारत बनाना चाहते हैं? ऐसा भारत या तो अशिक्षित होगा या फिर अर्ध शिक्षित, न घर का न घाट का।

स समस्या का कानूनी हल यह है कि बच्चे राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को जो कि जोधपुर में बैठते हैं एक पत्र लिख कर स्कूल के अधिक से अधिक बच्चों के हस्ताक्षर करवा कर भेजें और उन से प्रार्थना करें कि वे राज्य सरकार के शिक्षा विभाग को रिट जारी कर यह निर्देश दें कि बच्चों की इस कमी को पूरा किया जाए। यदि स्कूल सरकारी न हो कर प्राइवेट है तो सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। क्यों कि यह सरकार का कर्तव्य है कि उस के राज्य में ऐसा निजी स्कूल संचालित न हो जिस में विषयों को ठीक से पढ़ाने वाले अध्यापक ही न हों।

2- किशोर ने दूसरी समस्या लिखी है कि कोई व्यक्ति अपने नाम से जाना जाएगा या उस की जाति से? हालांकि हमारे संविधान ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का अधिकार दिया है। लेकिन यह अधिकार उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए दिया है, इस लिए नहीं कि यह उन की पहचान बन जाए। सही बात तो यह है कि किसी भी व्यक्ति को उस की जाति से नहीं पहचाना जाना चाहिए। उसे उस के नाम से ही पहचाना जाना चाहिए। लेकिन यह सब बातें समाज के समक्ष धरी की धरी रह जाती हैं। समाज में एक व्यक्ति अन्ततः अपने काम से पहचाना जाता है। भले ही लोगों को यह पता हो कि गांधी, नेहरू, अम्बेडकर, भगतसिंह आदि की जाति क्या है। लेकिन वे अपनी अपनी जातियों से नहीं अपितु अपने अपने कामों से जाने जाते हैं। इस कारण दीर्घकाल तक लोग केवल उन के काम से पहचाने जाते हैं।

3- अध्यापक का काम बच्चो को शिक्षा प्रदान करना है। उन्हें दंडित करना नहीं। किसी भी स्थिति में किसी भी विद्यार्थी को शारीरिक या आर्धिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। यदि शिक्षक की उचित बात को बच्चे नहीं मानते हैं तो कमी शिक्षक में है, बच्चो में नहीं। यह शिक्षक का कर्तव्य है कि वह ऐसे तरीकों की खोज करे जिस से बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान की जा सके। ऐसे शिक्षक की शिकायत बच्चों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। अभिभावक इस मामले में स्कूल के प्रधानाध्यापक से और जिला शिक्षाधिकारी से शिकायत कर सकते हैं। यदि समस्या का समाधान फिर भी न हो तो अभिभावक सीधे पुलिस या न्यायालय में परिवाद संस्थित कर सकते हैं।

4- मिनरल वाटर खराब आने की शिकायत भी किशोरों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। इस मामले में अभिभावक अपने इलाके के खाद्य विभाग के निरीक्षक और अधिकारी को लिखित में शिकायत कर सकते हैं। यह उस का दायित्व है कि वह उचित कार्यवाही करे। यदि वह कार्यवाही नहीं करता है तो जिला कलेक्टर को शिकायत लिखी जा सकती है और मिनरल वाटर खरीदने वाला व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय में भी परिवाद प्रस्तुत कर सकता है।

5-किशोर कोई सिम कार्ड नहीं खरीद सकता। सिम कार्ड अवश्य ही किसी वयस्क ने खरीदा होगा। उस वयस्क को चाहिए कि वह इस की शिकायत पुलिस को करे। किसी व्यक्ति की आई डी से स्वयं कोई सिम खरीद लेना अत्यन्त गंभीर अपराध है। लेकिन शिकायत करने के पहले यह शिकायतकर्ता को चाहिए कि वह जाँच ले कि ऐसी गलत सिम का फोन नं. क्या है?

6-मोबाइल खराब हो जाने पर उपभोक्ता को सीधे सर्विस सेन्टर जाना चाहिए जो मोबाइल बनाने वाली कंपनी का होता है। इस मामले में दुकानदार की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह मोबाइल को सर्विस सेन्टर नहीं ले जाएगा।

7-एशियन पेंट्स खऱाब निकलने पर दुकानदार से बदल कर नया डब्बा देने का आग्रह करना चाहिए। यदि वह सुनवाई न करे तो दुकानदार और कंपनी के विरुद्ध उपभोक्ता न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

8- आप के दादा जी ने किसी व्यक्ति को थप्पड़ मार दिया था तो उस के परिणाम की चिन्ता भी दादा जी को करनी चाहिए, उन के पोते को नहीं। पोते को सिर्फ उस की पढ़ाई करनी चाहिए। थप्पड़ खाया हुआ व्यक्ति चाहे तो न्यायालय में परिवाद कर सकता है और अपमान के लिए क्षतिपूर्ति चाहने के लिए दीवानी वाद भी कर सकता है। लेकिन पुलिस इस मामले में कार्यवाही नहीं कर सकती। थप्पड़ खाने वाला जाट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि वह व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति या जनजाति का होता तो पुलिस इस मामले में कार्यवाही कर सकती थी। जिस में दादा जी को गिरफ्तार किया जा सकता था। हाँ, आप दादाजी को समझा सकते हैं कि लोगों के साथ मारपीट करने और उन्हें गालियों से नवाजने का जमाना कब का समाप्त हो चुका। अब हर एक को सभ्यता से एक इन्सान की तरह पेश आना चाहिए। समाज में औरों से सभ्यता से पेश आने वालों का ही सम्मान होता है।

विवाह या दत्तक ग्रहण से जाति नहीं बदलती।

rp_indian-lawyer.jpgसमस्या-

राजकुमार शर्मा ने इन्द्रा कालोनी, काठघर, गुलाबबाड़ी, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं सामान्य श्रेणी में हूँ, लेकिन मेरी पत्नी ओबीसी श्रेणी से है। क्या उसे ओबीसी होने का लाभ शिक्षा विभाग में मिल सकता है? उस के जाति प्रमाण पत्र में पति के स्थान पर मेरा नाम है।

समाधान-

ब आप अपनी पत्नी के पति हैं तो जाति प्रमाण पत्र में पति के स्थान पर आप का ही नाम होगा। लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि जाति प्रमाण पत्र ओबीसी जाति के लिए बना है अथवा नहीं। क्यों कि ओबीसी श्रेणी में आरक्षण का लाभ लेने के लिए यह जरूरी है कि जो व्यक्ति लाभ लेना चाहता है उस का ओबीसी श्रेणी का प्रमाण पत्र बना हुआ हो।

किसी भी व्यक्ति की जाति जन्म से होती है और विवाह तथा दत्तक ग्रहण से वह नहीं बदलती है। आप की पत्नी की जाति आज भी ओबीसी ही है। उस की जाति केवल इस आधार पर बदल सकती है कि उसे दूसरी जाति ने अपनी जाति में शामिल कर लिया हो,  उसे वे अपनी जाति का सदस्य मानते हों और उस जाति ने उसे पूरी तरह से अपना लिया हो। इस संबंध में पूर्व में आलेख लिखे गए हैं आप तीसरा खंबा पर सर्च कर के उन्हें पढ़ें।

सरकारी नौकरी चाहते हैं तो दूसरी संतान के उपरान्त किसी संतान को जन्म न दें।

rp_judge-caricather11.jpgसमस्या-

दारा सिंह ने तारानगर, चूरू, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दो लड़कियाँ हैं, मेरे घर वाले चाहते हैं कि एक लड़का जरूर हो। मैं सरकारी अध्यापक बनना चाहता हूँ। अगर मैं अपनी एक लड़की को किसी को गोद दे दूँ तो यह संभव है क्या? या दो लड़कियों के साथ मैं अपने साले का लड़का गोद ले लूँ तो। मेरे बच्चे कितने कितने गिने जाएंगे? गोद लिए गए बच्चे को काउंट किया जाता है या नहीं?

समाधान-

पुत्र होने की अनिवार्यता की मानसिकता से आप स्वयं भी मुक्त नहीं हो सके हैं। अन्यथा परिवार के कहने मात्र से इतना सोचने की आवश्यकता नहीं थी। वैसे अब युग आ गया है जब इस मानसिकता से मुक्त हो जाना चाहिए। मेरी नजर में तो ऐसे अनेक लोग हैं जो एक पुत्री को जन्म देने के उपरान्त अब कोई और संतान को ही जन्म नहीं देना चाहते।

राजस्थान सरकार द्वारा दो संतानों के संबंध में नियुक्ति संबंधी जो नियम बनाया गया है वह निम्न प्रकार है-

“No candidate shall be eligible for appointment to the service who has more than two children on or before 1-6-2002.

Provided that where a candidate has only one child from earlier delivery but more than one child are born out of a single subsequent deliver, the children so born shall be deemed to be one entity while counting the total number of children.”

स नियम में दत्तक गए या लिए गए बालक के संबंध में कोई विवरण नहीं दिया गया है। इस तरह इस मामले में निश्चयात्मक रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

स नियम में मात्र इतना कहा गया है कि जिस व्यक्ति के दिनांक 01.06.2002 के बाद दो से अधिक संतानें होंगी वे नियुक्ति के योग्य नहीं होंगे। स्पष्टीकरण में केवल यह छूट दी गयी है कि यदि किसी व्यक्ति के पहली संतान होने के बाद दूसरे प्रसव में एक से अधिक संतानें उत्पन्न होती हैं तो उन्हें एक ही संतान माना जाएगा।

स नियम का उद्देश्य दो से अधिक संतान जन्म देने से रोकना है। इस कारण यह समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति की उन्हीं संतानों को इस मामले में गिना जाएगा जो कि उसे स्वयं या उस की पत्नी से उत्पन्न हुए हैं। दो लड़कियों में से एक को दत्तक दे कर तथा एक संतान को दत्तक ग्रहण कर के आप एक पुत्र के पिता बन सकते हैं। लेकिन आप को फिर भी सरकारी नौकरी से बाधित न किया जाए इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, जब तक कि ऐसे मामलों में निश्चित रूप से किसी न्यायालय का निर्णय सामने न आए या सरकार स्वयं नियम का स्पष्टीकरण न करे।

स मामले में उत्तम यह होगा कि आप स्वयं राजस्थान सरकार के विधि विभाग से सूचना के अधिकार के अन्तर्गत स्पष्टीकरण मांगें और मिल जाए। लेकिन यदि आप सरकारी नौकरी के इच्छुक हैं तो अब कोई संतान उत्पन्न न करें। जब नौकरी मिल जाए तो स्वयं इस मामले में सरकार से अनुमति ले कर एक पुत्री को दत्तक ग्रहण कराने के उपरान्त अनुमति प्राप्त कर एक पुत्र को दत्तक ग्रहण कर सकते हैं।

बच्चों की जाति क्या हो?

mother_son1समस्या-

सुरेश ने सुन्दरबनी, जम्मू और कश्मीर से समस्या भेजी है कि-

मेरी माताजी ने दूसरी जाति में शादी की है और दो बच्चे हैं। मेरी माताजी की जाति अलग है, लेकिन दोनों जाति पिछड़ी जाति हैं। कुछ साल के बाद एक विवाद हुआ और वो अलग हो गये। जिसके बाद कोर्ट में केस भी चला लेकिन मेरे पिता ने उस में नहीं माना कि मेरे दो बच्चे हैं। लेकिन बाद में सभी दस्तावेज के बाद कोर्ट ने फैसला दिया कि इनको पालन-पोषण के लिए हर माह कुछ पैसे दिए जाएँ। मेरी माताजी ने वो पैसा नही लिया। अब जब बच्चें बड़े होकर शादी भी हो गई। उसके बाद हम चाहते हैं कि मेरे बच्चों का जाति मैं वो ही रखूँ जो कि मेरी माताजी की हैं क्योंकि समाज में मेरे पिताजी ने हमें कुछ भी नहीं दिया है। क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ?

समाधान-

दि आप को आरक्षण से संबंधित कोई लाभ नहीं लेना है तो आप कोई भी जाति रखें किसी को क्या फर्क पड़ता है? जाति की जरूरत तब पड़ती है जब कोई प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आवेदन देता है।

न्यायालयों के समक्ष भी इस तरह के विवाद आए हैं कि किसी व्यक्ति की जाति क्या होनी चाहिए? इस विषय पर न्यायालयों के जो निर्णय हुए हैं उन में जाति को एक सामाजिक समूह माना है जो भारत में विद्यमान हैं। इन सामाजिक समूहों में केवल वे ही लोग नहीं शामिल होते जो उन समूहों में जन्म लेते हैं, अपितु वे लोग भी सम्मिलित होते हैं जिन्हें ये समूह अपना लेते हैं। मसलन एक लड़की के विवाह के बाद यदि उस के पति का जातीय समूह उसे स्वीकार कर ले तो उस की जाति बदल जाती है। एक व्यक्ति अन्य जाति के बच्चे को गोद ले ले तब भी उस की जाति बदल जाती है। एक पुरुष किसी दूसरी जाति की महिला से विवाह कर ले और उस की खुद की जाति उसे बहिष्कृत कर दे और पत्नी की जाति उसे स्वीकार कर ले तो भी जाति परिवर्तित हो जाती है।

प का मामला कुछ भिन्न है। आप की माताजी का विवाह हुआ लेकिन फिर पति से विवाद हो गया। वे अलग हो गयीं और बच्चे भी उन के साथ ही रहे। पिता पर खर्चा देने का आदेश अदालत से जरूर हुआ लेकिन पत्नी ने खर्चा नहीं लिया और बच्चों का पालन पोषण खुद किया।

स परिस्थिति में जरूरी बात यह है कि आप की माताजी पति से विवाद होने पर कहाँ रहीं। क्या वे मायके लौट आयीं? क्या वे अपने मायके वाले लोगों और मायके वाली जाति के साथ ही रहीं? ऐसा है तो बच्चे भी अपने मामा नाना के साथ ही रहे हैं और उन की जाति ने उन्हें स्वीकार किया है। यदि इस तरह के तथ्य हों तो आप को मानना चाहिए कि आप की और आप की माताजी की जाति वही है जो आप के मामा और नाना की है। आप खुद को माता जी की जाति का बता सकते हैं।

स्वयं से संबंधित नियमों का स्वयं अध्ययन कर अपने हितों को सुरक्षित रखें।

lawसमस्या-

अंकित ने मेड़ता, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम अंकित है म्रेरी उम्र 26 वर्ष है मेरे दो पुत्र है मेरी सरकारी नौकरी अभी तक नही लगी है लेकिन मै एक लड़की गोद लेना चाहता हू मै ये जानना चाहता हू कि कानूनन रूप से दो से ज्यादा बच्चे 2002 के बाद होने पर सरकारी नौकरी मे तथा यदि हम चुनाव लड़ना चाहे तो भी कई समस्याए आती है मै जानना चाहता हू कि क्या मै लड़की को गोद ले सकता हू ये जो नियम है दो से ज्यादा बच्चो का यह किन किन जगहो पर लागू होता है क्या यह नियम (दो से अधिक बच्चो का)सिर्फ राजस्थान की स्टेट लेवल की नौकरी मे ही लागू है या ये केन्द्र की नौकरी मे भी लागू है क्या यह नियम केवल दो से ज्यादा प्रसव होने पर ही लागू होता है यानि यदि दो प्रसव बाद हम किसी को गोद लेते है तो क्या यह नियम लागू नही होता है कृपा करके मेरी समस्या पर ध्यान दे

समाधान-

केन्द्र, राज्य सरकार व सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के सेवा नियमों में इस तरह के प्रावधान हैं कि 2002 के बाद से जिन लोगों ने तीसरा बच्चा पैदा किया हो वे सेवा ग्रहण करने के अयोग्य होंगे तथा जो सेवा में हैं वे अगले पाँच वर्ष तक पदोन्नति से वंचित रहेंगे। लेकिन हर राज्य, केन्द्र और संस्थानों के नियम भिन्न हैं। उन सब का निहितार्थ अलग अलग हो सकता है। इस कारण जिस सेवा से आप का तात्पर्य हो उस सेवा के सेवा नियमों का आप को अध्ययन करना चाहिए और स्वयं ही उस का तात्पर्य समझने की कोशिश करना चाहिए। यह ठीक से समझ लेना चाहिए कि आप के क्या करने के? क्या परिणाम? हो सकते हैं। हम यहाँ उन सब नियमों की व्याख्या नहीं कर सकते। अभी तक इन नियमों की कोई न्यायिक व्याख्या भी उपलब्ध नहीं है, जिस से दिशा प्राप्त की जा सके। यदि किसी खास नियम को संदर्भ बना कर यहाँ समस्या प्रस्तुत की जाती तो उस नियम की व्याख्या करने की कोशिश की जा सकती थी।

सामान्य रूप से इन नियमों में तीसरी संतान होने पर असुविधाएं खड़ी की गई हैं। इन नियमों में संतान शब्द का प्रयोग किया गया है और औरस व दत्तक संतानों में विभेद नहीं किया गया है। संतान में भेद नहीं किया दत्तक संतान को भी उस में सम्मिलित मानना चाहिए। इस कारण आप के दृष्टिकोण से इस का अर्थ यही लेना उपयुक्त होगा कि दत्तक संतान भी उस की संतानों में सम्मिलित होगी। क्यों कि इस से विपरीत अर्थ लेने से आप तीसरी संतान गोद लेने पर राजकीय सेवा से वंचित हो जाएंगे। इस तरह की स्थितियों में स्वयं से संबंधित नियमों का स्वयं ही अध्ययन कर उस का तात्पर्य समझ कर अपने हितों को सुरक्षित करना चाहिए।

अवेैध संबंध से उत्पन्न संतानों को पिता के उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार है।

widow daughterसमस्या-

सचिन सरोडे ने मंजरी, तालुका राहुरी, जिला अहमदनगर, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी के मेरी माँ के साथ ही दूसरी औरत के साथ संबंध रखने के कारण झगडे होते थे। माँ मुझे और मेरी बहन को साथ ले कर मायके में रहने आ गई। पिताजी ने १९८३ में तलाक लिया। और जिस औरत से संबंध थे उसके साथ रहने लगे। उन्हें उस से लडका और लडकी हुई लेकिन उसका पूर्व पति था और उन्हों ने तलाक नहीं लिया था। मेरे पिता को अपघात हो के ६ महिने बाद २००६ में मृत्यु हो गई। उन्होने उनके privdent fund में उस औरत को नोमेनी लिखा था। मैं ने अदालत मे उसके खिलाफ दावा दाखिल किया है कि वो मेरे पिता कि पत्नी नहीं है और उसका पहले विवाह हो चुका है। यदि वह अदालत को उसके पहले पति का तलाक और मेरे पिता के साथ हुई शादी दोनो साबित नहीं कर सकी तो क्या उसके बच्चे नाजायज होते हैं क्या? वो मेरे बाप के नाजायज बच्चे होने से उन्हे संपत्ति में वारिस हो सकते हैं क्या? अभी वो पिताजी के बंगले में रहते हैं। उन के कब्जे मे पूरी जायदाद है तो क्या उन का उस पर हक है क्या? मैं मेरी जायदाद किस प्रकार से हासिल कर सकता हूँ?

समाधान-

बिना विवाह के यदि कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ रहती है तो वह पत्नी नहीं हो सकती। उसे पत्नी से संबंधित कोई भी अधिकार नहीं मिलेंगे। उस का आप के पिता की जायदाद में कोई हक नहीं है।

प ने यह नहीं बताया कि आप के पिता किस तरह के प्रोविडेण्ट फण्ड के अधिकारी थे? वह जीपीएफ था या ईपीएफ था या किसी अन्य योजना के अन्तर्गत था? खैर¡ किसी भी मामले में किसी को नामांकित कर नॉमिनी बना देने का अर्थ केवल यह होता है कि नामित करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त उन लाभों को नॉमिनी प्राप्त कर सकता है। लेकिन नॉमनी केवल ट्रस्टी होता है। वह धन प्राप्त तो कर सकता है लेकिन उस का यह दायित्व है कि वह उस धन को मृतक के विधिक उत्तराधिकारियों के बीच उत्तराधिकार के कानून के अनुसार बांट दे। लेकिन होता यह है कि नौमिनी इस धन को प्राप्त कर उस पर कब्जा कर लेता है और उत्तराधिकारियों को वितरित नहीं करता। उन्हें इस के लिए लड़ाई लड़नी पड़ती है और अनेक बार उत्तराधिकारियों को लम्बी लड़ाई के बाद कुछ भी हाथ नहीं लगता। इस कारण यदि उत्तराधिकारियों को लगे कि नॉमिनी न्याय नहीं करेगा। तो जहाँ भी मृतक का धन है वहाँ उस के उत्तराधिकारियों को यह आपत्ति करनी चाहिए कि नॉमिनी धन को प्राप्त कर गायब हो सकता है या उस का गबन कर सकता है जिस से वह उत्तराधिकारियों को प्राप्त नहीं हो सकेगा। इस आपत्ति करने के साथ ही तुरन्त जिला न्यायालय को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करना चाहिए और न्यायालय से यह निवेदन करना चाहिए कि वह उस धन का भुगतान नॉमनी को न करने के लिए देनदार को अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कर रोके। उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की कार्यवाही में अस्थाई निषेधाज्ञा जारी न करने की स्थिति में दीवानी वाद दाखिल कर के भी अस्थाई निषेधाज्ञा हासिल की जा सकती है। आप के पिता की मित्र स्त्री नॉमिनी के रूप में उक्त राशि को प्राप्त कर सकती है और आप को अस्थाई निषधाज्ञा प्राप्त करने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए।

स स्त्री से आप के पिता को दो संताने हैं, जिन्हें आप अवैध कह रहै हैं। लेकिन संतान कभी भी अवैध नहीं होती वह सदैव ही जायज होती हैं। उन्हें पिता की संपत्ति के उत्तराधिकार का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने Revanasiddappa & Anr vs Mallikarjun & Ors के प्रकरण में दिनांक 31 मार्च 2011 को पारित निर्णय में कहा है कि अवैध संबंध से उत्पन्न संतानों को भी उन के माता पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्ति का अधिकार है चाहे वह उन की स्वअर्जित संपत्ति हो या फिर पुश्तैनी संपत्ति में उन का हिस्सा हो। इस तरह आप के पिता के जिस स्त्री से संबंध थे वह किसी प्रकार से आप के पिता की उत्तराधिकारी नहीं है। लेकिन उस स्त्री से जन्मी संताने उसी प्रकार उन की संपत्ति के अधिकारी हैं जैसे कि आप हैं। आप की माता का पिता से तलाक हो चुका था। इस कारण आप की माता भी उत्तराधिकारी नहीं रह गयी है।

ब आप के पिता की संपत्ति के उत्तराधिकारी आप, आप की बहिन और आप के सौतेले भाई बहिन हैं जिन्हे समान अधिकार प्राप्त है। पिता की संपत्ति संयुक्त है इस कारण उस का विभाजन होना चाहिए। ऐसी स्थिति में आप पिता की मृत्यु के कारण संयुक्त हुई इस संपत्ति का विभाजन करने और प्रत्येक को उस के हिस्से की संपत्ति का अलग कब्जा दिए जाने की प्रार्थना करते हुए संपत्ति के विभाजन का वाद प्रस्तुत करना चाहिए। पिता का प्रोविडेण्ट फंड भी संपत्ति है इस कारण इस वाद में उस का भी उल्लेख किया जाएगा। आप इसी वाद में वाद के निर्णय तक प्रोविडेण्ट फंड को नॉमनी को दिए जाने पर रोक लगाने हेतु अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

आप के पिता की पूरी संपत्ति आप के सौतेले भाई बहन के कब्जे में है इस कारण आप इस विभाजन के वाद के निर्णय तक संपत्ति के लिए रिसीवर नियुक्त करने और संपत्ति को उस के कब्जे में दिए जाने के लिए भी आवेदन इसी वाद में प्रस्तुत कर सकते हैं।

झूठ के पैर नहीं होते

hindu-marriage-actसमस्या-

दिनेश ने  नैनीताल, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरा विवाह 10 मई 2006 को हिंदू रीति रिवाज से हुआ था। , मेरे दो पुत्रियाँ हैं, एक 7 साल की है ओर एक 5 साल की हो चुकी है। मेरी पत्नी अपने पिता के कहने पर चलती है और नवम्बर 2006 से अपने मायके में रह रही है जब कि दोनों बेटी मेरे पास है जो स्कूल में पढ़ती हैं, मेरी पत्नी ने मुझ पर सीजेएम कोर्ट में एक वकील से आवेदन प्रस्तुत करवा कर मुझ पर 498ए, 323, 504 आईपीसी का मुक़दमा दर्ज करवाया। जिस में मुझे पुलिस के दवाब में सरेंडर करना पड़ा और मैं 3 दिन हिरासत में रहा। जब कि मैं मार्च में फॅमिली कोर्ट में धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम का आवेदन प्रस्तुत कर चुका था। क्या मुझ को कोर्ट हिरासत में भेज सकती थी जब कि चार्ज शीट अभी प्रस्तुत नहीं हुई है? ये एक महीने पहले की बात है। क्या मेरी पत्नी मुझ से हर्जे खर्चे की अधिकारी है? क्या वो मुझ से मेरी पुत्रियों की कस्टडी ले सकती है? जब कि मैं उस को बच्चे नहीं देना चाहता। मेरी पत्नी खुद मुझ को छोड़ कर अपने मायके में अपने पिता के साथ अपनी मर्ज़ी से गई है। लेकिन इस का कोई भी सबूत मेरे पास नहीं है।

समाधान-

प ने जो समस्या लिख कर भेजी है उस में कोई गलती है। 10 मई 2006 को आप का विवाह हुआ और पत्नी नवम्बर 2006 से मायके में रह रही है। फिर आप के सात और पाँच वर्ष की दो बेटियाँ कैसे हो गईं? यदि 2006 से आप की पत्नी मायके में है तो फिर 498-ए का मुकदमा कैसे हुआ? क्यों कि उस में तो घटना के तीन वर्ष बाद प्रसंज्ञान नहीं लिया जा सकता। ऐसा लगता है कि आप के विरुद्ध मिथ्या प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई गई है। आप चाहें तो इस प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त करवाने के लिए उच्च न्यायालय में निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। जब तक प्रथम सूचना रिपोर्ट न पढ़ी जाए और उस पर आप से बात न की जाए तब तक उस के बारे में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। यह काम आप के स्थानीय वकील बेहतर कर सकते हैं।

जिस्ट्रेट आप को हिरासत में भेज सकता था इस कारण ही उस ने हिरासत में रखा। जब न्यायालय को लगा कि आप को हिरासत में रखा जाना उचित नहीं है तो उस ने आप की जमानत ले ली।

झूठ के पैर नहीं होते। यदि आप के विरुद्ध मामला बनावटी और मिथ्या है तो यह न्यायालय में नहीं टिकेगा। आप को एक ही भय हो सकता था कि आप को हिरासत में न भेज दिया जाए। अब आप वहाँ हो कर आ चुके हैं इस कारण डरने का कोई कारण नहीं है। आप मुकदमे में प्रतिरक्षा करें। यदि आप के वकील ने ठीक से मामले में प्रतिरक्षा की तो मामला मिथ्या सिद्ध हो जाएगा।

प की पत्नी जब तक विवाह विच्छेद न हो जाए और दूसरा विवाह न कर ले तब तक आप से भरण पोषण का खर्च मांग सकती है। पत्नी होने के नाते उसे यह अधिकार है आप उस के लिए तभी मना कर सकते हैं जब कि आप की पत्नी के पास आय का कोई स्पष्ट साधन हो।

दि आप की पत्नी बच्चियों की कस्टडी के लिए आवेदन करती है तो न्यायालय इस तथ्य पर विचार करेगा कि बच्चियों की भलाई किस में है और उन का भविष्य कहाँ सही हो सकता है। आप की छोटी बेटी 5 वर्ष की हो चुकी है। मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी उन की कस्टड़ी आप से ले सकती है।

पकी पत्नी स्वयं आप को छोड़ कर गई है इस का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं हो सकता। लेकिन आप गवाहों के बयानों से साबित कर सकते हैं कि ऐसा हुआ है।

सहमति से विवाह विच्छेद का मार्ग बनाएँ।

husband wifeसमस्या-
अनुराग ने बरेली, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मैं मूलतः बरेली जिले का रहने वाला हूँ व अपने ही कार्यक्षेत्र (प्राइवेट) से सम्बंधित एक सजातीय वर्ग की लड़की से मेरी मुलाकात 2006 में हुई। मैं उसे प्रेम करने लगा क्यों कि कुछ समय बाद उसने अपने अतीत के बारे में मुझे लगभग काफी कुछ बता दिया जो कि आम लड़कियां कम ही बताती हैं।  उसके एक वर्ष के उपरांत दोनों ही पक्षों की पारिवारिक सहमति से मेरा विवाह 21 अप्रैल 2007 को लखनऊ में संपन्न हुआ। मेरी पत्नी अपने माँ-बाप कि इकलौती संतान है तथा शादी के कुछ महीनों के बाद हम दोनों अपने कार्य क्षेत्र दिल्ली में आकर रहने लगे। शादी के एक वर्ष बाद हम दोनों को पारिवारिक व आर्थिक स्थितियों के कारण दिल्ली से बरेली आना पड़ा। यहाँ पर मेरी पत्नी की मेरी माँ से कहा-सुनी हो जाने के कारण वो 2008 में लखनऊ जाने लगी। वह एक बार दिल्ली में भी ऐसा कर चुकी थी और मैं उसके गुस्से व स्वछंद विचारों को जान चुका था और ये भी जानता था को वो दिल की बुरी नहीं है ऊपर से वो गर्भवती भी थी। इस कारण मुझे भी उसके साथ जाना पड़ा। उस समय मेरे घर पर मेरे दो छोटे भाई मेरी माँ के साथ रहते थे व मेरी माँ एक सरकारी टीचर थी। मेरे पिता का देहांत काफी पहले हो चुका था। लखनऊ जाने के बाद मेरे दो पुत्र हुए जिन की उम्र आज क्रमशः 5.5 व 4 वर्ष है। मेरी सास का देहांत 2009 में हार्टअटैक से हो चुका है व ससुर जी अक्टूबर 2014 में अपनी सरकारी नौकरी  से रिटायर होने वाले हैं और एक किराये के मकान में रहते हैं। मेरी समस्या जनवरी 2012 से शुरू हुई जब मेरे एक मित्र की शादी थी और वो अपने भाई के साथ कुछ दिन खरीददारी के लिए मेरे घर पर रुका। उस समय मै एक टूरिंग जॉब करता था। वापस आने पर एक बार फिर से वो लोग खरीदारी के लिए लखनऊ आये। उस समय मुझे मेरी पत्नी के व्यवहार में परिवर्तन महसूस हुआ जिसे मेरी पत्नी ने ज्यादा थकान को वजह बताया। पर चंद दिनों के बाद मेरी जानकारी में कई चीजे आयीं जैसे असमय फोन पर बात करना, बातों को छिपाना व झूठ बोल देना जिसके लिए मैंने उसको काफी दिनों तक उसे समझाया कि उसे मुझसे ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने उस मित्र की शादी में मैं अपनी पत्नी व बच्चो के साथ फरवरी 2012 में बरेली गया तथा इस समय के दौरान मुझे इस बात का पूर्ण अहसास होगया कि मेरी पत्नी मेरे दोस्त के भाई को पसंद करने लगी है। वहां पर एक रात किसी कारणवश उसके ऊपर मैंने शराब के नशे में हाथ उठा दिया और उस गलती का अहसास मुझे आज तक है। उसके बाद से मेरी पत्नी ने शादी से वापस आने के बाद मेरे सामने ही उस लड़के से फोन पर बातें करना चाहे वो दिन हो अथवा रात, मैं सामने रहूँ या घर पर ना रहूं, करने लगी। दो अलग-२ बार मार्च व अगस्त में उस लड़के को मेरे कई बार मना करने के बाबजूद बरेली से लखनऊ बुलाया और वो मेरे ही घर पर रुका। इस समय तक मेरे ससुर जी अथवा किसी भी दूसरे सदस्य को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पर इन बातों के बाद एक दिन जब मैं और अधिक बर्दास्त नहीं कर सका तो मैंने इन बातों का खुलासा अपने ससुर जी को पत्नी के सामने कर दिया। और जो साक्ष्य थे उनको बताया व दिखाया भी। पर मेरी पत्नी ने उन सभी बातों को अपने पिता के सामने नकार दिया और मेरे लिए कहा कि मैं उसको परेशान करता हूँ व उस पर शक करता हूँ। ससुर जी ने यहाँ अपनी बेटी को सही माना और मुझसे कहा कि मैं उनकी बेटी पर गलत इल्जाम लगा रहा हूँ। इन बातों से परेशान हो कर मैं लखनऊ से बरेली अपने घर पर सितम्बर 2012 में वापस आगया और फोन से अपनी पत्नी के संपर्क में रहा। मैंने इस दौरान अपनी पत्नी को वो बातें बोली जो उसने मुझसे शादी से पहले अपने बारे में कही थी। जिस पर आपस में काफी झगडा हो गया तथा अक्तूबर 2012 में मै वापस गया और अपनी पत्नी से व ससुर जी से अपनी गलतियों की माफ़ी भी मांगी। पर पत्नी ने ससुर जी से ये बोल दिया कि अगर में उस घर में रुका तो वो घर से बच्चो को लेकर चली जाएगी। तब ससुर जी ने मुझे अपने एक दोस्त के पास कुछ दिन रुकवाया (लगभग 1 हफ्ता)। उसके बाद मैं उनके कहने पर ससुर जी के बड़े भाई के पास 1 महीना रहा और अपनी पुरानी जॉब को करने लगा। इस दौरान अपने बीच में अपने बच्चो से मिलता रहा। पर मेरी पत्नी का ससुर जी की इस बात पर गुस्सा बढ़ गया। और एक दिन ससुर जी ने अपने भाई से कहा कि वो मुझे अब अपने घर पर ना रखे। इस पर उनके बड़े भाई ने मुझे समझाया और मुझे प्रेरित किया कि मैं अपने घर जाऊँ और अपने आप को आत्मनिर्भर बनाऊँ और कुछ समय अपनी पत्नी को दूँ। समय के साथ शायद मेरी पत्नी इन बातो को भुला दे जो कि मुझे भी सही लगी। मैं जनवरी 2013 में बरेली वापस आ गया उस लड़के व उसके परिवार से सारे सम्बन्ध समाप्त कर लिये। कुछ समय के बाद अपना कारोबार शुरू किया। इसके बाद मेरी पत्नी से बातचीत कम हो गयी क्योकि फोन पर जब भी उससे बात करता तो बातचीत एक झगडे का रूप ले लेती। जून 2013 में मैं एक बार फिर से अपनी पत्नी को मनाने गया वहां एक दिन रुका भी पर मेरी कोशिशें बेकार होती गयी। वो मेरी माँ और भाई को उल्टा सीधा कहने लगी और मेरे उपर इल्जाम लगाये कि मैं उसे बार बार  फोन करके परेशान करता हूँ और उसके चरित्र के बारे में ख़राब बोलता हूँ। जब कि वो ऐसा कुछ नहीं करती है मेरे इस तरह बोलने के कारण अब वो किसी दोस्त या रिश्तेदार से कोई मतलब नहीं रखती है, एक प्राइवेट स्कूल में अपनी जॉब करती है और खाली समय में कांट्रेक्ट बेस काम करती है। वह मेरे साथ नहीं रहना चाहती है। मेरे ससुर जी ने मुझसे यह बोला कि मै मासिक रूप से 10000 रू बच्चो की परवरिश हेतु उनको दूँ। जिससे शायद मेरी पत्नी का भी दिल बदल जाये।  अपने बच्चों से मैं उन की परमीशन के बाद मिल सकता हूँ या फोन पर बात कर सकता हूँ। पर मैंने ये कहकर उनकी बात नहीं मानी कि मैं अपने परिवार को अपने साथ रख कर अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखभाल करना चाहता हूँ। जिस पर वो राजी नहीं हुए और कई महीने निकल जाने के बावजूद तक ऐसी ही स्थिति बनी रही। बच्चों के लिए भी अगर कुछ करना हो या बात करनी हो तो उन दोनों की परमिशन लेनी होती थी। जनवरी 2014 में जब ससुर जी के बड़े भाई द्वारा कोई बात नहीं बनी तो तो ससुर जी के बड़े भाई ने पत्नी की एक चाची जी को मध्यस्थ बनाया और चाची जी ने मुझे अपनी माँ के साथ आने को बोला। वहां अपनी माँ के साथ जाने पर मेरी पत्नी ने सभी के सामने कई तरह के झूठे इल्जाम लगाये व पुलिस, कानून की धमकी दी कि वो चाहे तो मेरे परिवार को जेल भी करा सकती है। ससुर जी ने कहा कि अभी 2 साल का समय है, मेरे पास अपने रिश्तो को सुधारने के लिए।  2 साल के बाद जब बच्चे बड़े हो जाएंगे तो तय होगा कि हम दोनों लोग साथ में रह सकते है या नहीं। मेरी पत्नी का कहना था कि वो अपने आप को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है और मैं चाहूँ तो बच्चो से लखनऊ आकर मिल सकता हूँ। पर उन्हें अपने साथ अकेले कहीं भी नहीं ले जा सकता हूँ और वो बरेली आकर नहीं रहना चाहती है, ना ही तलाक देना चाहती है। उसकी चाची जी ने कहा कि मै कुछ महीने यहाँ आता जाता रहूँ जिससे स्थिति में परिवर्तन हो और उनका प्रयास रहेगा कि वो मेरी पत्नी को साथ रहने को मना सके। कुछ समय उनकी बात को मानकर मेरी माँ व मैं वापस आ गये और अपनी ओर से मैंने सार्थक पहल करनी चाही और मै वहां पर गया भी 1-2 दिन के लिए इस उम्मीद से कि शायद मेरी पत्नी मुझसे अलग रहने की डेढ़ साल पुरानी जिद्द को छोड़ दे। पर इस दौरान मेरे प्रति पत्नी ने अपना कोई रवैया नहीं बदला। जैसे मेरे सामने फोन को साइलेंट करना या फिर उसको बंद कर देना। मुझे वहाँ उन दिनों में कुछ फोटोग्राफ मिले जो कि मेरे ही घर (जहाँ पर मेरी पत्नी इस समय रहती है) के हैं। जो उसके स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर के अर्धनग्न अवस्था में अकेले के है और उस समय के जब मैं वहां पर नहीं था। क्योकि पुराने वाले मकान को बदल कर मेरे ससुर जी पिछले लगभग 1 साल से दूसरे घर में रहते हैं  और मै ये भी नहीं जानता हूँ कि मेरे ससुर जी को इन बातों पता है भी या नहीं।
इस बात को अभी तक किसी को नहीं बताया है क्योकि मै पुराने इतिहास को दोहराकर अपने बच्चो के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता हूँ। मेरी पत्नी अभी भी अपनी आर्थिक स्थिति व आत्मनिर्भरता का हवाला देते हुए 2 साल तक साथ में रहने को तैयार नहीं हो रही है। जब कि मैं अपने परिवार की बेहतर तरीके से देखभाल कर सकता हूँ। ये भी जानता हूँ कि अपनी पत्नी अथवा बच्चों को तब तक नहीं ला सकता हूँ जब तक कि पत्नी खुद ना चाहे। वो इस बारे में कुछ नहीं सोच रही है अब जब कि ससुर अपनी जॉब पर जाते हैं और पत्नी अपनी जॉब पर, दोनों बच्चे सुबह क्रच में जाते हैं (बड़ा बेटा वहीँ से अपने स्कूल जाता है वैन द्वारा) और शाम को पत्नी या ससुर अपनी जॉब से आने के बाद बच्चो को क्रच से लेकर आते हैं। आप मुझे ये सलाह दें कि मुझे क्या उपय़ुक्त कार्यवाही करनी चाहिए जिससे मै अपने परिवार के भविष्य को संभाल सकूँ? मैं अपने कारोबार को छोड़ कर लखनऊ जा कर नहीं रहना चाहता हूँ क्यों कि मुझे या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को स्त्रियों के बाहर काम करने या आने जाने अथवा बात करने पर कोई आपति नहीं है। पर वो अमर्यादित न हो।  अभी तक मैंने कोई भी कानूनी कार्यवाही नहीं की है और दूसरे पक्ष के बारे में मैं नहीं जानता हूँ कि उन्होंने ऐसा कुछ किया है अथवा नहीं। मैं केवल यही चाहता हूँ कि मेरा परिवार मेरे साथ रहे। अगर मेरी पत्नी मेरे साथ बरेली नहीं रहती है तो ऐसी स्थिति में मैं उससे तलाक लेना चाहूँगा।

समाधान-

मित्र, हो सकता है आप बुरा मान जाएँ। पर सचाई तो सचाई है। आप ने अपनी पत्नी को केवल चाहा, उस से प्रेम नहीं किया। आप चाहत भी इतनी थी कि वह आप की वफादार भारतीय पत्नी बनी रहे। लगता है आप प्रेम का अर्थ अभी तक जानते ही नहीं। आप की पत्नी ने जब जरा सी स्वतंत्रता लेनी चाही तो आप के मन में संदेह पनपने लगा। तब आप को अपनी पत्नी की मामूली व्यवहारिक बातें भी आप को बेवफाई लगने लगी। आप को लगा कि आप की पत्नी किसी और को चाहने लगी है। आप को गुस्सा भी आया और आप ने पत्नी पर हाथ उठा दिया। आप के लिहाज से आप की इतनी सी हरकत पत्नी के लिए तो बहुत बड़ी थी। उस ने आप को त्याग दिया। आप की पत्नी समझती थी कि आप उसे प्यार करते हैं, उसे सम्मान देते हैं। लेकिन उस की निगाह में आप वही भारतीय परंपरागत पति निकले।

प जिन सबूतों की बात कर रहे हैं, वे कोई सबूत नहीं हैं, उन से आप की पत्नी की बेवफाई साबित नहीं होती है। आप के मन में अभी भी सन्देह का कीड़ा विराजमान है। आप के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया है। जो तगड़ा सदमा आप ने अपनी पत्नी को दिया है, वह उस से बाहर नहीं निकल पाई है। वह अब आत्मनिर्भर जीवन जीना चाहती है। उस के जीवन में आप का कोई स्थान नहीं है। यहाँ तक कि वह उस के साथ जो आप का नाम जुड़ा है उसे छोड़ना भी नहीं चाहती। जब कि आप को फिर पत्नी की जरूरत है। आप एक पत्नी चाहते हैं। वह नहीं तो उस से छुटकारा प्राप्त कर के कोई और।

त्नी आप से सिर्फ अपने बच्चों का खर्च चाहती है। आज के जमाने में दो बच्चों का खर्च 10000 रुपया प्रतिमाह अधिक नहीं है। निश्चित रूप से उसे इस से अधिक खर्च करने पड़ेंगे। उस की यह मांग वाजिब है।

दि आप की पत्नी नहीं चाहती है तो आप उसे अपने साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकते। यह बात आप खुद अच्छी तरह जानते हैं। मेरे विचार में आप को अपनी पत्नी को प्रतिमाह खर्च देना चाहिए। यदि 10000 रुपए दे सकने की स्थिति में न हों तो कम दीजिए पर दीजिए। आप की पत्नी तपस्या पर उतर आई है। जब कि जो गलतियाँ आप ने की हैं उन में तपस्या आप को करनी चाहिए।

प विवाह विच्छेद चाहते हैं, फिलहाल उस का आप के साथ रहने से मना करना ही एक मात्र विवाह विच्छेद का आधार हो सकता है। लेकिन अलग रहने की उस की वजह अभी तो वाजिब लगती है। आप यदि कोई कार्यवाही करेंगे तो हो सकता है वह भी कानूनी कार्यवाही करे। उस के पास उस के ठोस कारण भी हैं। उस परिस्थिति में आप को परेशानी हो सकती है। कुछ दिन पुलिस और न्यायिक हिरासत में भी काटने पड़ सकते हैं।

मेरी राय में फिलहाल आप के पास कोई रास्ता नहीं है। आप चुपचाप बच्चों का खर्च देते रहें। समय समय पर बच्चों से मिलते रहें। उन्हें एक पिता का स्नेह देते रहें। बच्चों में आप के प्रति स्नेह पनपने लगे तो हो सकता है कि आप की पत्नी भी अपने बच्चों के पिता के प्रति नरम पड़े और आप का मसला हल हो जाए। मुकदमेबाजी से तो कुछ भी आप को हासिल नहीं होगा।

क काम और कर सकते हैं, आप अपने ससुर से बात कर सकते हैं कि जब उन की पुत्री आप के प्रति इतनी कठोर हो गई है तो उसे आप से विवाह विच्छेद की कर स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। वह बच्चों के लिए जितना हो सके एक मुश्त भरण पोषण राशि प्राप्त कर ले और विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करवा ले। यह काम दोनों की सहमति से हो जाए तो ही अच्छा है। अन्य कोई मार्ग आप के पास नहीं है। बच्चों की अभिरक्षा आप को कानूनी रूप से भी नहीं मिल सकेगी।

पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह अवैध, लेकिन उस से उत्पन्न संतान वैध है और उत्तराधिकार में अन्य संतानों को समान अधिकार भी

समस्या-

पटना, बिहार से अमित कुमार पूछते हैं-

मेरी पहली शादी 2001 में हुई थी।  मेरी पहली पत्नी को 8 साल तक कोई सन्तान नहीं हुई। हम ने बहुत जगह दिखाया। पर कुछ नहीं हुआ।  तब मैं ने पत्नी और परिवार के कहने पर दूसरी शादी 2009 में कर ली।  दूसरी पत्नी से मुझे 1 लडका है।  अब मेरी पहली पत्नी को भी 1 लडका हो गया है जो 6 माह का है।  सभी का कहना है कि अब मेरी दूसरी पत्नी से हुए लडके को मेरी सम्पत्ति से कुछ नहीं मिलेगा।  अभी तो मेरी दोनों पत्नी साथ रहती हैं, पर मैं अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हूँ।  मेरी समझ में नही आ रहा है कि मैं क्या करुँ जिससे मेरे दोनो बच्चों को उनका हक मिले और भविष्य में कोई विवाद न हो। क्या मैं अपनी संम्पत्ति वसीयत करवा कर दोनों संतानों को अपनी जायदाद का मालिक बना सकता हूँ? क्या मेरी पहली पत्नी या मैं अपनी संम्पत्ति का आधा भाग दूसरी पत्नी के बच्चे को दान में दे सकता हूँ? क्या मैं अपनी सम्पत्ति का आधा भाग दूसरी पत्नी को बेच सकता हूँ? या और क्या हो सकता है जिससे मेरे दोनो बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाये? कोई तो उपाय होगा? मैं बहुत चिंतित हूँ, मेरी मदद करें।

समाधान-

justiceप को जो सूचना दी गई है वह पूरी तरह सही नहीं है। आप की सारी संपत्ति जो आप के नाम है वह आप के जीवनकाल में आप की है उस पर जीवनकाल में आप का अधिकार है आप उसे विक्रय, दान या वसीयत कुछ भी कर सकते हैं। इसी तरह आप की पहली या दूसरी पत्नी के नाम जो संपत्ति है वह उन की अपनी अपनी है वे उसे का साथ कुछ भी कर सकती हैं।

दि आप कोई वसीयत करते हैं तो वह आप के जीवन काल में कोई प्रभाव नहीं रखेगी। और आप के देहान्त के उपरान्त तुरन्त प्रभावी हो जाएगी आप जिसे जो संपत्ति वसीयत कर देंगे और वह उन्हें प्राप्त हो जाएगी। यदि आप कोई वसीयत नहीं करते हैं तो आप की सम्पत्ति के तीन हिस्से होंगे एक आप की पहली पत्नी को मिलेगा और शेष हिस्से दोनों संतानों को बराबर प्राप्त होगा। इस तरह यदि कोई वंचित रहेगा तो आप की दूसरी पत्नी वंचित रहेगी न कि आप की दूसरी पत्नी से उत्पन्न संतान। क्यों कि आप का दूसरा विवाह वैध नहीं है लेकिन संतान कभी अवैध नहीं होती। वह तो आप की है। उसे तो आप की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त होगा। केवल ऐसी संपत्ति जो सहदायिक संपत्ति है। उस में आप की दूसरी पत्नी से उत्पन्न पुत्र सहदायिक नहीं बन सकेगा। उसे उस तरह की संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं होगा। लेकिन मुझे संदेह है कि आप का किसी सहदायिक संपत्ति में कोई अधिकार होगा। क्यों कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में लागू हुआ था और उस के बाद सहदायिक संपत्ति का निर्माण होना बंद हो गया था। सहदायिक संपत्ति वह है हो सकती थी जो आप को अपने पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। लेकिन ऐसी संपत्ति का 1956 के बाद आप के पिता के जीवनकाल में या उस के बाद कोई विभाजन हो चुका है तो वह भी सहदायिक संपत्ति नहीं है। वैसे भी सहदायिक संपत्ति को न तो आप बेच सकते हैं न वसीयत कर सकते हैं। क्यों कि उस सम्पत्ति में तो पहली पत्नी का पुत्र जन्म से ही सहदायिक बन चुका है। अधिक से अधिक सहदायिक संपत्ति में अपने हिस्से को वसीयत कर सकते हैं।

प अपनी स्वअर्जित संपत्ति को वसीयत कर सकते हैं। यह वसीयत आप के देहान्त के उपरान्त प्रभावी होगी। लेकिन इस वसीयत को आप अपने जीवन काल में बदल भी सकते हैं और दूसरी कर सकते हैं। किसी भी संपत्ति के संबंध में आप की अन्तिम वसीयत ही प्रभावी होगी। आप अपनी संपत्ति का आधा भाग दूसरी पत्नी की संतान को दान कर सकते हैं। लेकिन दान करते ही आप का उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहेगा। वैसे भी दूसरी पत्नी की संतान को तो आप की संपत्ति में आप की पहली पत्नी की संतान के बराबर उत्तराधिकार मिलने वाला है। उस के लिए आप को चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में आप की दूसरी पत्नी को आप की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है। यदि चिन्ता करनी है तो उस की करनी है। आप उस के नाम कुछ संपत्ति कर सकते हैं जिस से उस की सुरक्षा हो सके। लेकिन यदि उसे कोई संपत्ति दान या विक्रय करते हैं तो वह उस की हो जाएगी और उस पर आप का कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा। जब कि आप की पहली पत्नी के पास उसी समय कोई संपत्ति नहीं रहेगी और यह परिवार में क्लेश का कारण बनेगा। यदि आप को किसी एक पत्नी के नाम संपत्ति दान या विक्रय या वसीयत करनी है तो दूसरी पत्नी के नाम भी उतनी ही संपत्ति दान या विक्रय या वसीयत करनी होगी। तभी परिवार में सुख शान्ति बनी रह सकती है।

पैतृक संपत्ति न होने पर संतानों को परिजनों की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं

समस्या-

जौनपुर, उत्तर प्रदेश से अलका सिंह ने पूछा है-

मैंने दो साल पांच माह पहले एक पंडित लड़के से शादी की थी।  जिस से परिवार वाले सहमत नहीं थे धीरे धीरे पति के घर के लोग जहाँ हम रहते है वहाँ आने लगे हैं।  लेकिन वो मुझे घर नहीं आने देते हैं और न ही संपत्ति में हक देना चाहते।  इन परिस्थितियों में क्या वहाँ जाने का मेरा हक है? क्या संपत्ति में मेरा या मेरे बच्चों का कोई हक बनेगा?

समाधान-

Shopsप ने स्वयं अपनी इच्छा से और परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह किया है तो नाराजगी तो झेलनी पड़ेगी। आप के पति के घर के लोग आप के पास आने लगे हैं यह अच्छी बात है। परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह करने पर परिवार की जो नाराजगी है वह आसानी से तो खत्म होगी नहीं पर उन के आने जाने से विरल होगी और धीरे धीरे समाप्त भी होगी। इस में उन लोगों के प्रति आप का व्यवहार भी अच्छी खासी भूमिका अदा करेगा। आप का अपने पति के परिवार में जाने या साथ रहने का कोई कानूनी हक नहीं है। जब तक आप को न लगे कि नाराजगी समाप्त हो गयी है या अत्यन्त कम हो गई है वहाँ न जाएँ तो ही ठीक है। जाएँ तो भी बिना परिवार के किसी बुजुर्ग का बुलावा पाए न जाएँ।

संपत्ति के मामले में भारतीय हिन्दू परिवारों में बहुत भ्रांतियाँ हैं, विशेष रूप से पुश्तैनी/ पैतृक संपत्ति को ले कर।  1956 के पूर्व परंपरागत हिन्दू विधि में इस तरह की संपत्ति का अस्तित्व तब बनता था जब संपत्ति बनाने वाले व्यक्ति का बिना कोई वसीयत किए ही देहान्त हो जाता था। तब जिन वंशजों को संपत्ति मिलती थी उस में उन के वंशजों का भी अधिकार होता था, लेकिन बेटियों और पत्नी का अधिकार जीवनकाल तक सीमित होता था। 17 जून 1956 के पहले जो संपत्तियाँ पैतृक संपत्ति हो चुकी थी केवल वे ही अब पैतृक रह गई हैं। उन में भी एक बार विभाजन हो चुका है तो उन का भी पैतृक संपत्ति जैसा चरित्र समाप्त हो चुका है। अब संपत्तियाँ जिस की हैं जीवनकाल में उसी का उन पर स्वामित्व है। वह या तो उन के संबंध में वसीयत कर सकता है या फिर उस के देहान्त के उपरान्त वह संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार हस्तांतरित हो जाती है। इस कारण आप के पति को जब तक कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त न हो जाए उन का भी किसी संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। आप का या आप की संतानों का तो होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। हाँ पत्नी का पति से व अवयस्क संतानों का अपने माता-पिता से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार अवश्य है।  यदि कोई पुरानी पैतृक संपत्ति अभी आप के पति के परिवार में मौजूद है जिस में आप के पति सहदायिक हैं तो उस में आप की संतानों को जन्म से अधिकार मिल सकता है लेकिन ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता कि आप के पति के परिवार में अब भी कोई सहदायिक/ पैतृक/ पुश्तैनी संपत्ति मौजूद हो।

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