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वाद कारण उत्पन्न हुए बिना किया गए परिवाद पर प्रसंज्ञान लेना अवैध है।

rp_NIAct.jpgसमस्या-

एडवोकेट बृजेश पाण्डेय ने सतना, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट) के अंतर्गत चेक बाउंस के प्रकरण में परिवादी के द्वारा परिवाद न्यायालय मे प्रस्तुत करने की समय सीमा के सात दिन पहले ही दायर कर दिये जाने से माननीय न्यायालय ने प्री-मेच्योर प्रकरण होने के कारण प्रकरण को खारिज कर दिया। तब परिवादी ने जिला सत्र-न्यायालय में निगरानी प्रस्तुत की। परंतु न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय की पुष्टि कर के निर्णय यथावत रखा है। कृपया यह सलाह दें की अब परिवादी को क्या करना चाहिए। चेक बाउंस के इस प्रकरण मे आरोपी को क्या फायदा हो सकता है, या आरोपी को कुछ करने की आवश्यकता है।

समाधान

ब्रजेश जी,

प स्वयं वकील हैं। आप ने योगेन्द्र प्रताप सिंह बनाम सावित्री पाण्डे के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पढ़ा होगा। चैक बाउंस होने की सूचना प्राप्त होने के 30 दिनों में चैक धारक चैक जारीकर्ता को चैक की राशि अदा करने हेतु लिखित नोटिस देगा। यह नोटिस मिलने की तिथि से 15 दिन की अवधि में चैक जारीकर्ता को चैक की राशि चैक धारक को अदा करनी है, यदि वह 15 दिन की अवधि में इस राशि का भुगतान नहीं करता है तो 15 दिन की इस अवधि के समाप्त होने पर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत वाद कारण उत्पन्न होता है। वाद कारण उत्पन्न हो जाने के उपरान्त एक माह की अवधि में इस अपराध का परिवाद लिखित में मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत किया जा सकता है। इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया है कि यदि वाद कारण उत्पन्न होने के पूर्व कोई शिकायत प्रस्तुत की जाती है तो वह अवैध होगी और ऐसी शिकायत पर प्रसंज्ञान लेना भी अवैध होगा चाहे प्रसंज्ञान लेने के समय तक वाद कारण उत्पन्न क्यों न हो गया हो। इस परिवाद को दुबारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। हाँ, एक नया परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन उसे भी कानून के अनुसार मियाद में होना चाहिए।

स निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने सभी तब तक लंबित मुकदमों में यह राहत प्रदान कर दी थी कि यदि इस तरह का कोई प्रीमेच्योर प्रकरण लंबित है तो परिवादी नया परिवाद प्रस्तुत कर सकता है जिस में गलत परिवाद प्रस्तुत करने में व्यतीत समय को माफ करते हुए परिवाद को मियाद में मान लिया जाए। इस तरह आप के मामले में परिवाद के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में लंबित रहते हुए अथवा उस की निगरानी के लंबित रहते हुए प्रीमेच्योर परिवाद को वापस लेते हुए नया परिवाद प्रस्तुत कर दिया जाता तो वह मियाद में होता और मुकदमे को बचाया जा सकता था। लेकिन अब तो निगरानी का निर्णय हो चुका है और नया परिवाद प्रस्तुत नहीं हुआ है तो उस का लाभ नहीं लिया जा सकता।

च्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है कि नया परिवाद प्रस्तुत होने पर उस में मियाद की जांच की जाएगी और उचित कारण होने पर मियाद के बाहर हुई देरी को माफ किया जा सकता है। हमारी राय में जिस चैक के बारे में आप ने राय पूछी है उस चैक का मामला तो समाप्त हो चुका है। कोई परिवाद अब दुबारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यदि परिवादी यह प्रमाणित करे कि चैक वास्तव में किसी विशिष्ट दायित्व के लिए दिया गया था और उस दायित्व के संबंध में धन की वसूली के लिए कोई दीवानी वाद अब भी लाया जा सकता है तो दीवानी वाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

स मामले में जो भी करना है वह परिवादी को ही करना है। आरोपी के लिए करने को कुछ नहीं है। आरोपी को तो परिवादी या उस के वकील की जल्दबाजी के कारण जो लाभ मिलना है वह मिल चुका है। अब यह परिवाद दुबारा पुनर्जीवित हो सकना संभव नहीं है।

पुलिस अपराध का संज्ञान न ले तो मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करें।

rp_MANREGA-KE-EMPOLYS-PER-LATHI-CHARGE5-300x204.jpgसमस्या-

लेखराज ने जमवारामगढ़ जयपुर, राजस्‍थान से समस्या भेजी है कि-

दिनांक 09/04/2015 को सांय 6 बजे के लगभग पडौसियों से रंजिस के चलते हमारे घर की महिलाओं (एक विकलांग है) व लडकियों पर पडौसियों व उनके साथ के अन्य लोगों द्वारा गंदे गंदे गाली गलौच किए गए तथा मारने पीटने व लज्जा भंग करने की कोशिश की गई। विपक्षी लोगों में पुरूष महिलाएं एवं उनके नाबालिग बच्चे भी शामिल थे तथा लगभग 50-60 लोग थे जबकि हमारे घर पर मेरी दो बहिने, माताजी तथा विकलांग बुआ के अलावा कोई नहीं था। इन लोगों से किसी तरह जान बचाकर वे मकान के अंदर चली गई व अंदर से ताला लगाकर बैठ गई। इसके बावजूद विरोधियों द्वारा मकान की दीवार के सहारे सीढी लगाकर छत के रास्ते से अंदर आने की कोशिश की गई लेकिन मेरी बहिन ने पहले ही छत के रास्ते मकान में अंदर आने वाला गेट बंद कर दिया था जिससे विपक्षी मकान के अंदर आने में कामयाब नहीं हो पाए तथा उन्हों ने गेट को तथा ताले को तोडने की कोशिश की। तब मेरी माताजी ने मेरे पिताजी (जो बाहर रहकर नौकरी करते हैं) को फोन कर सारी बात बताई। मेरे पिताजी ने पुलिस थाने में फोन करके शिकायत की तो पूलिस के आने के कुछ ही समय पहले वे लोग शांत हो गए तथा पुलिस के आते ही ऐसी माहौल बना दिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। रात लगभग 9 बजे जब पुलिस हमारे मकान पर आई तो हमारी माताजी ने उनसे बयान लिखने को कहा तो पुलिस वालों ने उनके बयान लेने से मना कर दिया। उसी समय विपक्षीगण का एक व्यक्ति ने जो राजस्थान पुलिस में नौकरी करता है तथा पुलिस वालों से मिला हुआ था, पुलिस वालों के सामने ही मेरी बहनों व माताजी से गाली गलौच किया तथा मेरी बहनों के अवैध संबंध होने के मिथ्या आरोप लगाए लेकिन तब भी पुलिस ने पीडित पक्ष के बयान दर्ज नहीं किए तथा वापस थाने जाकर एसएचओ व डीएसपी को मेरी माताजी व बहनों द्वारा पुलिस वालों को ही अपशब्द कहने का आरोप लगा दिया। पीड़ित पूरी रात भर मकान के अंदर बंद रहे तथा परेशान एवं घबराए हुए से रहे। सुबह होने पर मेरे पिताजी ने गांव के वरिष्ठ लोगों को फोन कर ताला खुलवाने तथा उन लोगों से बचाकर बाहर निकालने के लिए कहा। तब गांव के 5-7 वरिष्ठ लोगों ने आकर ताला खुलवाया व पीडिताओं को बाहर निकाला। तब विपक्षीलोगों ने गांव वालों के साथ भी अभद्र व्यवहार एवं गाली गलौच किया एवं उनको देख लेने की धमकी दी। पडौसियों से रंजिस के चलते इस तरह की घटना की यह चौथी बार पुनरावृति थी तथा पुलिस के आला अधिकारियों को बार बार शिकायती पत्र लिखने के बावजूद भी उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही तथा ना ही मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। पुलिस वाले इन लोगों से पहले से ही मिले हुए हैं तथा विपक्षीगण के भी कुछ लोग पुलिस सेवा में कार्यरत हैं तथा पुलिस के वरिष्ठ अफसरों व बडी राजनीतिक पार्टी के नेताओं के साथ उनकी अच्छी जान पहचान होने के कारण व राजनीतिक दखल के कारण पुलिस मुकदमा दर्ज करने से बच रही है तथा उन लोगों के खिलाफ कोई एक्श्न नहीं ले रही है और ना ही अभी तक पुलिस द्वारा पीडित पक्ष्‍ के बयान दर्ज किए गए हैं तथा ना ही किसी महिला पुलिसकर्मी को अभी तक जांच के लिए भेजा है। पुलिस से न्याय की उम्मीद न होने के कारण हमने राजस्थान महिला आयोग को इस मामले की शिकायत की। लेकिन महिला आयोग द्वारा भी अभी तक कोई बयान नहीं दर्ज किया गया है और ना ही पुलिस पर कार्यवाही करने का दबाव बनाया जा रहा है। शायद महिला आयोग ने भी राजनीतिक दखल के कारण कोई एक्शन नहीं लिया हो। 1. यदि महिला आयोग या पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज नहीं किया जा रहा हो तो इसकी शिकायत कहां की जा सकती है। 2. इस तरह की घटना की यह चौथी बार पुनरावृति हुई है, तथा इस तरह की भावी घटनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता। यदि कभी कोई अनहोनी हो गयी तो वह किसकी जिम्मेदारी होगी जबकि हमारे द्वारा पुलिस के एसएचओं से लेकर डीजीपी तक पत्राचार के माध्यम से एवं व्यक्तिगत रूप से भी कार्यवाही करने और उन लोगों को पाबंद करवाने के लिए अनेक बार निवेदन किया जा चुका है। क्या हम सीधे उच्च न्यानयालय या उच्चदतम न्यायालय की शरण ले सकते हैं। यदि हां तो कृपया पूरी प्रक्रिया बतावें। 4. विपक्षी लोगों द्वारा पुलिस वालों के सामने भी अपशब्द कहे गए लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने बयान दर्ज नहीं किए। क्या इस मामले में पुलिसकर्मी भी दोषी हो सकते हैं तथा उनके खिलाफ भी मुकदमा दायर किया जा सकता है। यदि हां तो कैसे और कहां? 5. राजनीतिक दखल के कारण पुलिस एक्शन नहीं ले रही। पुलिस कार्यप्रणाली से राजनीतिक दखल या पुलिस के ही वरिष्ठ अधिकारियों के दखल को कैसे दूर किया जा सकता है तथा इसकी शिकायत कहां की जावे। 6. पूरे मामले में पीडित पक्ष में महिलाएं है लेकिन इसके बावजूद भी पुलिस थाने द्वारा महिला पुलिसकर्मी को जांच के लिए नहीं भेजा गया। क्या सूचना के अधिकार के तहत इस बात का जवाब मांगा जा सकता है। 7. विपक्षीगण द्वारा मेरी बहनों के अवैध संबंध होने के मिथ्या आरोप पुलिस के सामने लगाए गए हैं जिसका कोई प्रमाण विपक्षीगण के पास नहीं हैं, ऐसे में उनके खिलाफ महिला आयोग के अलावा कहां शिकायत दर्ज की जा सकती है तथा यह किस प्रकारका अपराध कारित होता है। 8. क्या इस तरह के महिला दुराचार से जुडे मामलों की जांच के लिए सीधे उच्चतम या उच्‍च न्यायालय में अपील की जा सकती है। 9. यदि कहीं से भी न्यारय की उम्मीद ना हो तो ऐसे मामलों में महिलाएं अपने स्वयं के स्तर पर अपनी सुरक्षा के लिए क्‍या एक्शन ले सकती हैं जो गैरकानूनी ना हो। 10. क्या मामले में गांव के उन 5-7 लोगों को गवाह बना सकते हैं जिन्होंने सुबह आकर ताला खुलवाया व विपक्षियों के चंगुल से मुक्ता करवाया तथा बाद में विपक्ष ने उनके साथ भी अभद्र व्यहवहार किया। इसके अलावा विपक्षीगण के द्वारा प्रयोग किए गए अपशब्दों तथा मिथ्या आरोपों, जिनकी आडियो रिकार्डिंग हमारे पास है, को भी सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है।

समाधान-

मूह एकत्र कर के गाली गलौच, मारपीट और लज्जा भंग करने का प्रयत्न करना तीनों ही अपराध हैं। पुलिस इस के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर रही है तो आप को चाहिए कि किसी स्थानीय वकील से संपर्क करें और ऐसा कृत्य करने वालों के विरुद्ध सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें वहाँ आप के व गवाहों के बयान कराएँ और ऑडियो रिकार्डिंग की प्रतिलिपि प्रस्तुत करें। मजिस्ट्रेट इस मामले में स्वयं प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्तों के विरुद्ध अभियोजन आरंभ कर सकता है अथवा पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण के लिए आदेश दे सकता है। यदि फिर भी पुलिस कोई आरोप पत्र अभियुक्तों के विरुद्ध प्रस्तुत न करे तो आप न्यायालय में सभी गवाहों के बयान करवा कर तथा सबूत प्रस्तुत कर अभियोजन आरंभ करवा सकते हैं। इस के लिए महिला आयोग, उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय जाने की आवश्यकता नहीं है। जो भी गवाह हैं उन के बयान कराए जा सकते हैं ऑडियो रिकार्डिंग को सबूत के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

पुलिस मिली हुई हो सकती है और उस पर राजनैतिक दबाव भी हो सकता है। यदि आप को लगता है कि इस कारण से पुलिस कार्यवाही करने से बचती है तो आप उच्च न्यायालय में पुलिस, प्रशासन और राज्य सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को उच्च न्यायालय के किसी वकील की सहायता लेनी होगी।

पुलिस को मिथ्या शिकायत करने वाले के विरुद्ध क्या कार्यवाही करें?

rp_police-station8.jpgसमस्या-

पवन ने प्रतापगढ़ राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारे भवन निर्माण कार्य चल रहा था ! जिस में पडोसी ने आपति लगाई, वह हम से उस की दीवार बनवाना चाहता था! लेकिन हमने ऐसा नहीं किया तो उस ने हमारे पूरे परिवार के 7 सदस्यों पर नारी लज्जा भंग का झूठा केस लगा दिया है! हम ने हमारी और से 4 गवाह पेश किये कि यह केस झूठा है! अभी तक पुलिस द्वारा हमें किसी प्रकार से परेशान नहीं किया गया है! अब आगे क्या हो सकता है?! केस को लगे मात्र 10 दिन हुए हैं! हम उस के ऊपर कैसी क़ानूनी कार्यवाही कर सकते हैं! हमें समाधान दीजिये!

समाधान –

क्त प्रकरण में पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज की है या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। पुलिस कुछ मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर लेती है, लेकिन कुछ मामलों में उसे प्राप्त हुई रिपोर्ट की जाँच पहले ही कर लेती है जिस में वह यह जानना चहती है कि वास्तव में कथित अपराध हुआ भी है या नहीं। यदि पुलिस को लगता है कि कोई अपराध घटित नहीं हुआ है तो वह जाँच कर के वहीं शिकायत को समाप्त कर देती है। इस का कारण यह है कि लोग किसी भी व्यक्ति को परेशान करने की नीयत से भी मिथ्या शिकायतें पुलिस के पास करते हैं।

प को चाहिए कि थाने से संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय से यह पता करें कि क्या प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है। यदि रिपोर्ट दर्ज हुई होगी तो वह 24 घंटों की अवधि में मजिस्ट्रेट के न्यायालय में पहुँच चुकी होगी। आप स्वयं जाँच करने वाले पुलिस अधिकारी से पूछ कर भी पता कर सकते हैं। यदि कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है तो आप सूचना के अधिकार के अन्तर्गत एसपी कार्यालय को आवेदन प्रस्तुत कर के इस शिकायत तथा उस पर की गयी जाँच से संबंधित दस्तावेज की प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर लें और उन्हें किसी स्थानीय वकील को दिखाएँ। उन की प्रतियाँ देख कर ही वकील यह बता सकेगा कि कोई कार्यवाही आप के पड़ोसी के विरुद्ध की जा सकती है अथवा नहीं।

दि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी हो तो पुलिस या तो आप के विरुद्ध कोई आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी तो वह आप को बता देगी। वैसी स्थिति में आप को आप के विरुद्ध मुकदमे को लड़ कर समाप्त कराना होगा। यदि वह आरोप पत्र के स्थान पर अन्तिम प्रतिवेदन प्रस्तत करती है तो फिर अन्तिम प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रतियाँ न्यायायलय से प्राप्त कर लें और उन्हें किसी स्थानीय वकील को दिखा कर कार्यवाही करें।

किराएदार उस की सुविधा बन्द करने के लिए मकान मालिक के विरुद्ध शिकायत कर सकता है।

court-logoसमस्या-

अशोक एम. जैन ने मगदी रोड़, बैंगलोर, कर्नाटक से समस्या भेजी है कि-

मैं एक अपार्टमेंट में रहता हूँ जिस में 26 मकान हैं। मैं दूसरे माले पर रहता हूँ। हमारे यहाँ पिछले दो वर्ष से पानी की बहुत दिक्कत थी मगर अब बहुत ज्यादा हो गई है। सुबह में सिर्फ 10 मिनट के लिए पानी आता है। हम मकान मालिक सको पूछने जाते हैं तो वह एक ही बात बोलता है कि रहना है तो रहो नहीं तो मकान खाली कर दो। क्या वह इस तरह मकान खाली करवा सकता है? जब कि पानी की व्यवस्था भी नहीं करता है।

समाधान-

शोक जी आप की समस्या लगता है जानबूझ कर पैदा की हुई है। समस्या आप की नहीं है बल्कि मकान मालिक की है कि वह किसी वैधानिक तरीके से आप से मकान खाली नहीं करवा सकता। इसीलिए उस ने किराएदारों की पानी की सप्लाई कम कर के उन्हें परेशान करना आरंभ कर दिया है। उस ने पानी बन्द भी नहीं किया है जिस से यह नहीं कहा जा सके कि आप ने एमिनिटीज को बन्द कर दिया है।

किराएदारी कानून सभी राज्यों के भिन्न भिन्न हैं। हमें कर्नाटक के किराएदारी कानून की जानकारी नहीं है। लेकिन एमिनिटीज में कमी करने या उन्हें बन्द करने के लिए उपाय सभी राज्यों के किराएदारी कानून में मौजूद हैं। आप उस कानून का सहारा ले कर मकान मालिक को पानी की सप्लाई दुरुस्त रखने को बाध्य कर सकते हैं। इस के लिए आप को न्यायालय में आवेदन करना होगा। आप किसी स्थानीय वकील से इस मामले में मशविरा कर सकते हैं। यदि कर्नाटक में इस तरह के आवेदनों पर सुनवाई में बहुत समय लगता हो तो फिर पानी की सुविधा प्राप्त करने में आप को भी कम परेशानी नहीं होगी।

मायके वाले बहन-बेटी के गहनों पर कब्जा कर लें तो वह अमानत में खयानत की रिपोर्ट दर्ज करवाए।

police station receptionसमस्या-

माँगी लाल चौहान ने ग्राम-पोस्ट गोयली, जिला सिरोही, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

 मेरी पत्नी ने मुझ पर अपने घरवालों के बहकावे मे आ कर हम से पैसे ऐंठने के मक़सद से मुझ पर और मेरे माता-पिता पर जूठा 498 ए का मुक़ुदमा किया था। लेकिन गुजरते वक़्त (2-3 साल) के साथ मेरी पत्नी को अपनी ग़लती का एहसास हो गया और उस ने पेशी के दौरान चुप-चाप अपने घर से बिना बताए अदालत के समक्ष आ कर मेरे साथ जाने का निवेदन किया। मैं भी अपनी बेटी के खातिर उस को अपनाने को राज़ी हो गया और उसे घर ले आया। लेकिन मेरी पत्नी के इस कदम से उसके घर वालों ने सारा रिश्ता उनसे तोड़ दिया और कहा कि आज से तू मेरे लिए मर गई। मैं आप से ये पूछना चाहता हूँ कि हमारे घर से जो भी चीज़ें बनाई गई थीं (सोने,चाँदी की वस्तुएँ) वो मेरे ससुराल वालों के पास हैं और वो देने के लिए मना कर रहे हैं तो मैं उन को कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? हमारे फ़ैसले की तारीख 22-01-2015 है. और फ़ैसले के बाद उस फ़ैसले की प्रमाणित कॉपी कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

समाधान-

प को बहुत बधाई कि आप की पत्नी को समझ आ गई और वह खुद आप के पास चली आई। एक बार 498 ए का मुकदमा समाप्त हो जाने दीजिए। उस के बाद आप अपने वकील के माध्यम से या स्वयं फैसले की प्रमाणित प्रतिलिपि के लिए आवेदन कर सकते हैं, उस के लिए आवेदन व प्रतिलिपि शुल्क के कुछ रुपये के टिकट आप को लगाने होंगे।

प ने जो गहने अपनी पत्नी के लिए बनवाए थे वे तो आप तभी अपनी पत्नी को उपहार स्वरूप दे चुके थे। इस कारण से वे आप की संपत्ति नहीं हैं। वे अब आप की पत्नी की संपत्ति हैं और उस का स्त्री-धन है। उन गहनों के लिए आप को कार्यवाही करने का कोई अधिकार नहीं है।

लेकिन वे गहने आप की पत्नी का स्त्री-धन होने के कारण वे उन गहनों के लिए कार्यवाही कर सकती हैं। आप की पत्नी के मायके वालों के पास वे गहने अमानत थे। इस तरह उन गहनों को देने से इन्कार करने के कारण उस के मायके वालों ने अमानत में खयानत का धारा 406 आईपीसी के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध किया है। आप की पत्नी उक्त अपराध के लिए उस के मायके वालों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है। पुलिस इस प्रथम सूचना रिपोर्ट पर अन्वेषण के दौरान उन गहनों को बरामद कर जब्त कर सकती है। तथा इस अपराध को करने वालों को गिरफ्तार भी कर सकती है। बाद में आप की पत्नी उक्त गहनों को अदालत में आवेदन कर उन का कब्जा प्राप्त कर सकती है। यदि पुलिस इस तरह की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने या उस पर कार्यवाही करने से इन्कार करे तो वह सीधे न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर अदालत से निवेदन कर सकती है कि पुलिस को मामला दर्ज कर अनुसंधान करने का आदेश प्रदान किया जाए।

दि पुलिस उक्त सारे गहनों को या कुछ को बरामद न कर सके तो आप की पत्नी उक्त गहनों को प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकती है।

मानवाधिकार आयोग को आवेदन दस्तावेजों के साथ करें।

कानूनी सलाहसमस्या-

पवन जैन ने बारोसी बाजार, जिला कटिहार, बिहार से समस्या भेजी है कि-

माज द्वारा असामाजिक बताते हुवे अनाधिकृत रूप से बहिष्कृत करने के कारण न्याय हेतु कई पदाधिकारियों को आवेदन भेजा था और स्थानीय थाना और अनुमंडल पदाधिकारियों को भी न्याय हेतु गुहार लगाई। लेकिन अनुमंडल पदाधिकारी ने जाँच हेतु स्थानीय थाना को आवेदन भेज दिया लेकिन स्थानीय थाना ने अभी तक इस पर कोई FIR दर्ज नहीं की और अभी तक कोई अनुसन्धान नहीं किया है। सूचना का अधिकार से पता चला कि अभी अनुसन्धान अंतर्गत है। अनुसन्धान के बाद अग्रतर कार्रवाई की जायगी लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे गंभीरता से लेते हुवे मामला दर्ज किया जिस का फाइल नंबर 4549/4/16/2014 है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वेब साइट (http://nhrc.nic.in/) पर स्टेटस देखा तो पता चला कि( The complaint is addressed to other authority with only copy sent to this Commission. The authority is expected to take appropriate action in this matter. Hence, no action is called for. File.) मेरी समझ से उनके द्वारा कहा गया है कि आपने किसी और विभाग में आवेदन दिया है उसकी कॉपी ही हमें दी है। इसलिए हम कोई कार्यवाही नहीं कर सकते क्या मैं पुनः राष्ट्रीय मानवाधिकार के समछ आवेदन देकर उनसे ही न्याय की गुहार लगाऊ जानकारी देने की कृपा करे और क्या इस संबंध में मानवाधिकार आयोग संज्ञान लेगा? मुझे जल्द सुझाव देने की कृपा करे ताकि में जल्द आवेदन पुनः भेज सकूँ।

समाधान-

प ने बिलकुल ठीक समझा है। आप ने मानवाधिकार आयोग को कोई शिकायत भेजी ही नहीं है। केवल अन्य अधिकारी को जो शिकायत भेजी है उस की प्रतिलिपि भेजी है। इस कारण आप की डाक वहाँ जरूर दर्ज है लेकिन शिकायत न होने से कोई कार्यवाही नहीं की गई है।

प को चाहिए कि आप घटना के सम्बन्ध में एक शिकायत सिर्फ मानवाधिकार आयोग को प्रेषित करें और साथ में घटना को प्रमाणित करने वाले जो भी दस्तावेज हों वे भी संलग्न करें। आप की शिकायत पहुँचने पर उसे दर्ज कर आगे कार्यवाही की जा सकती है।

स्वयं अपनी उपस्थिति में दावे को रेस्टोर कराएँ और प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराएँ।

lawसमस्या-

दीपक सिन्हा ने सी-39 सेक्टर ई लखनऊ, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने अपनी कृषि भूमि का कुछ हिस्सा पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से बेचा था। गाँव के कुछ आपराधिक प्रवत्ति के लोगों ने मिलीभगत से एक फर्जी नाम की पॉवर ऑफ अटॉर्नी तैयार कर उन की शेष भूमि भी अपने नाम रजिस्टर करा ली। जानकारी मिलने पर पिताजी ने सभी दोषियों के खिलाफ केस कर दिया। निवास स्थान से दूरी ज्यादा होने की वजह से वे अपने अधिवक्ता को हर तारीख पर पैरवी के लिए भेजते रहे। इस के लिए अधिवक्ता महोदय उनसे फीस भी लेते रहे। अचानक उन्हे गाँव के ही एक शुभचिंतक से पता लगा कि उनका केस लगातार तीन बार कोर्ट में हाज़िर न होने की वजह से खारिज हो गया है एवं दूसरे पक्ष ने भूमि किसी और से पैसा लेकर उसके नाम रजिस्टर करा दी है। अपने अधिवक्ता से पूछने पर उन्होने अपनी गलती स्वीकार की और केस को दुबारा चलाने के लिए अर्जी लगाने का आश्वासन दिया। भूमि वापस पाने के लिए हमें क्या करना चाहिये

समाधान-

प ने यह विवरण नहीं दिया है कि यह किस प्रकार का मुकदमा था। आप अपने पिताजी के जिस मुकदमे का उल्लेख कर रहे हैं वह संभवत विक्रय पत्र को निरस्त करने का दीवानी मुकदमा होगा। यदि अधिवक्ता ने अपनी गलती स्वीकार की है और उसे दुरुस्त करने को तैयार है तो उस के आश्वासन पर रहना गलत है। आप के पिताजी को स्वयं अपनी उपस्थिति में मुकदमे को रेस्टोर कराने का आवेदन देना चाहिए और जल्दी से जल्दी उसे रेस्टोर कराना चाहिए।

क बार मुकदमा रेस्टोर हो जाए तो जिस पक्षकार के नाम इस बीच विक्रय पत्र पंजीकृत कराया गया है उसे भी इस मुकदमे में पक्षकार बनाने के लिए आवेदन करना चाहिए तथा आगे विक्रय पर रोक के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन दे कर आदेश पारित कराना चाहिए।

स तरह फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी बना कर जमीन को बेचना फ्राड और छल दोनों है। आप के पिताजी को चाहिए कि वे इस अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाएँ। यदि पुलिस इस तरह की रिपोर्ट दर्ज करने से इन्कार करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर इसे धारा 156 (3) में पुलिस थाने को अन्वेषण हेतु भिजवाना चाहिए। ये लोग केवल दीवानी मुकदमे से काबू में न आएंगे। हालांकि आप को जमीन अपने कब्जे में बनाए रखने और स्वामित्व पुनः प्राप्त करने के लिए राहत दीवानी और राजस्व न्यायालयों से ही प्राप्त होगी।

न्यायालय में मिथ्या साक्ष्य के लिए उस न्यायालय का न्यायाधीश ही परिवाद कर सकता है।

Lawyers in courtसमस्या-

औंकार वैष्णव ने बेमेतरा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी विवाह के पूर्व से मानसिक रोग से ग्रस्त है, वर्तमान में भी इलाज चल रहा है। मेरी पत्नी ने मारपीट कर घर से निकाल देने का झूठा आरोप लगाते हुए धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में आवेदन प्रस्तुत कर दिया है। मैंने भी विवाह शून्य करने का केस दर्ज किया है। मेरी पत्नी ने शपथ पत्र में झूठी बात लिखकर पेश की है, जिसे स्वयं उस ने व उस के गवाह ने झूठा स्वीकार किया है। क्या मैं उस के झूठे शपथ पत्र के लिए केस दर्ज करवा सकता हूँ? मेरे पास पर्याप्त सबूत हैं कि उस का शपथ पत्र १००%झूठा है। स्वयं साक्ष्य के समय उस ने शपथ पत्र को झूठा स्वीकार किया है। क्या मैं फैसला आने के पूर्व भादंसं के तहत केस दर्ज करवा सकता हूँ? कर सकता हूँ तो कैसे?

समाधान-

न्यायालय की किसी कार्यवाही में झूठा शपथ पत्र प्रस्तुत करना झूठी साक्ष्य प्रस्तुत करना है और ऐसा करना भारतीय दंड संहिता की धारा 193 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है, जिस में अभियोग साबित हो जाने पर तीन वर्ष तक के कारावास के दण्ड से दण्डित किया जा सकता है। लेकिन इस तरह के मामलों में आप या कोई भी व्यक्ति सीधे मजिस्ट्रेट को परिवाद प्रस्तुत नहीं कर सकता।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 की उपधारा (1) (ख) में यह उपबंध किया गया है कि जब मिथ्या साक्ष्य देने का कार्य किसी न्यायालय की कार्यवाही में किया जाता है तो केवल उस न्यायालय का न्यायाधीश अथवा उस न्यायाधीश द्वारा अधिकृत उस न्यायालय का कोई अन्य अधिकारी की शिकायत पर ही अधिकारिता रखने वाला मजिस्ट्रेट मामले में प्रसंज्ञान ले सकता है।

स तरह आप स्वयं इस मामले में किसी तरह का कोई परिवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते। केवल वह न्यायालय ही जहाँ मिथ्या शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया है इस मामले में अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर सकता है। आप इतना कर सकते हैं कि धारा 340 में एक आवेदन जहाँ धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता का प्रकरण लंबित है उस न्यायालय को प्रस्तुत करें और उस न्यायालय से निवेदन करें कि मिथ्या शपथ पत्र प्रस्तुत करने वाले के विरुद्ध परिवाद प्रस्तुत किया जाए। वह न्यायालय मामले पर विचार कर के अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को परिवाद प्रस्तुत कर सकता है।

असंज्ञेय अपराधों के लिए सीधे मजिस्ट्रेट को परिवाद प्रस्तुत करें

Havel handcuffसमस्या-

समीर मलहोत्रा ने जबलपुर मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

क व्यक्ति जो कि मेरा पड़ौसी होने के साथ-साथ परिवार का भी है वह आए दिन अकारण ही हमारे खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करता है और झगड़ा करने का प्रयास करता है। हम झगड़े से बचने का प्रयास करते हैं लेकिन उसको बिल्कुल भी शर्म नहीं आती है। वह बहुत ही बदतमीज किस्म का व्यक्ति है। अगर हम उस आदमी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करना चाहे तो किन-किन धाराओं के अंतर्गत कानून हमारी मदद कर सकता है और उस पर कार्यवाही की जा सकती है जिस से कि वह आगे से किसी के खिलाफ झगड़ा करने का प्रयास न करें और न ही दूसरे व्यक्ति को परेशान करने का प्रयास करें।

समाधान-

प ने जितना विवरण दिया है उस से हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि वह व्यक्ति जो व्यवहार/ कृत्य आप के साथ कर रहा है वह सब भारतीय दंड संहिता की धारा 504 के अन्तर्गत दंडनीय अपराध है। धारा 504 निम्न प्रकार है-

  1. लोकशांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से साशय अपमान–जो कोई किसी व्यक्ति को साशय अपमानित करेगा और तद्द्वारा उस व्यक्ति को इस आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए, प्रकोपित करेगा कि ऐसे प्रकोपन से वह लोक शान्ति भंग या कोई अन्य अपराध कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

क्यों कि उक्त अपराध संज्ञेय अपराध नहीं है इस कारण पुलिस को रिपोर्ट करने पर भी वह कोई कार्यवाही स्वयं नहीं कर सकती। इस मामले में प्रसंज्ञान आप के क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाला न्यायिक मजिस्ट्रेट ही ले सकता है। इस कारण आप को इस धारा के अन्तर्गत स्वयं परिवाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ेगा तथा आप को अपने बयान व गवाहों के बयान कराने होंगे। इस के उपरान्त ही मजिस्ट्रेट इस मामले पर प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त को समन से बुलाएगा और उस के विरुद्ध कार्यवाही करेगा। सभी असंज्ञेय अपराधों के लिए सीधे मजिस्ट्रेट को ही परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

दि आप की शिकायत पर उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिया जा कर कार्यवाही होती है और उस के दौरान वह दुबारा या तिबारा या कभी भी ऐसी हरकत करता है तो आप हर बार उस के विरुद्ध एक नया परिवाद प्रस्तुत करें। एकाधिक परिवादों में उस के विरुद्ध कार्यवाही होने पर निश्चित रूप से उस व्यक्ति को सबक प्राप्त होगा। वास्तविकता तो यह है कि अदालत में कार्यवाहियों पर जाने की परेशानी के कारण इस तरह के मामलों में अधिकांश लोग कार्यवाही करने से बचते हैं और इस कारण से ऐसे लोग अपनी मनमानी करते रहते हैं। यदि ऐसे लोगों की हर हरकत पर कार्यवाही होने लगे तो उस का सामान्य प्रभाव समाज पर यह हो सकता है कि कोई भी व्यक्ति ऐसी हरकत करने से डरने लगेगा।

न्यायिक कार्यवाही में कूटकरण के अपराध का परिवाद मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करें।

Havel handcuffसमस्या-

ए के शुक्ला ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे ससुराल पक्ष ने मेरे खिलाफ जो घरेलू हिंसा का वाद लगाया था उसे मजिस्ट्रेट कोर्ट ने संभावना के आधार पर कहकर मेंटेनेंस बाँध दिया था। मैं ने कोई अपील नहीं लगाई। लेकिन मेरे ससुराल पक्ष ने फैसले के खिलाफ अपील लगाई। जिसपर मेरी पत्नी के फर्जी हस्ताक्षर थे। मैं ने हस्तलिपि विशेषज्ञ से जांच करवाकर उसी अदालत में उनकी अपील इस आधार पर खारिज करने का आवेदन मय हस्तिलिपि विशेषज्ञ के प्रमाण पत्रों के लगाया। हस्ताक्षर विशेषज्ञ ने स्थापित किया कि अपील मेमो पर हस्ताक्षर नकली हैं। वो मेरी पत्नी के द्वारा बनाये गये नहीं हैं उसी के साथ ही साले के भी हस्ताक्षर उसी आदेशिका पर मेंटेनेंस के चेक और पेशी की तारीखों पर थे। जिस से विशेषज्ञ द्वारा पाया गया कि अपील मेमो पर उक्त नकली हस्ताक्षर मेरे साले द्वारा ही बनाए गये हैं। लेकिन जज ने अचानक फैसला देने की जिद की। जब कि हम ने जवाब पेश ही नहीं किया था ना ही नकली साईन के आवेदन पर कोई फैसला ही हुआ था। जज ने प्राथमिता मेरे उस नकली हस्ताक्षर वाले आवेदन को देना था, लेकिन पिछले महीने इस फैसले में जज ने मेरे इस नये आवेदन का मात्र जिक्र भर किया। और पूर्ववर्ती मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले की समीक्षा करते हुए पत्नी की ओर से उक्त मेरे खिलाफ लगाई गयी अपील को खारिज कर दिया। अब में पशोपेश मे हूँ कि क्या करूं? वकील साहब से भी कोई सही मार्गदर्शन मिल नहीं रहा है। मैं परेशान हूँ जबलपुर में मुकदमा होने से अच्छे वकील को ढूंढ़ना मेरे लिये मुश्किल है। मुझे लगा था ससुराल पक्ष इस आवेदन के कारण फंसने से अपनी कुचक्र और कुत्सित हरकतें बंद कर देगा। लेकिन मौका हाथ से निकल गया। पत्नी से भी किसी तरह संपर्क होने नहीं देते और उनके दबाव मे वो कुछ कह नहीं पाती। मेरे एक छोटी चोटी बच्ची जो 9 महीने की थी अब 7 वर्ष की हो गयी। मैं देख नहीं पाया आज तक। कृपया उचित परामर्श दें। मेरे सामने अब क्या रास्ता है ?? क्योंकि यही एक तरीका है जिससे ससुराल पक्ष को निष्प्रभावी करके ही मैं अपने परिवार को बचा सकता हूँ। मुझे किस न्यायालय में इसे प्रस्तुत करना चाहिये अथवा पुलिस की सहायता लेनी होगी?

समाधान-

प की पत्नी के भाई ने जो कुछ किया और जिस में आप की पत्नी की मौन सहमति रही वह सब भारतीय दंड संहिता की धारा 465, 466, 471 व 474 के अन्तर्गत गंभीर अपराध है। इस संबंध में संबंधित पुलिस थाना को रिपोर्ट भी दर्ज कराई जा सकती है और यदि पुलिस थाना रिपोर्ट दर्ज करने से इन्कार करे तो संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद भी दर्ज कराया जा सकता है।

पील न्यायालय को अपील सुनना था। अपील में दम नहीं था इस कारण उसे मेरिट पर निरस्त कर दिया गया। एक अपील के मेमो पर कूटकृत हस्ताक्षर बनाए गए यह केवल एक अपराधिक मामला है जिसे अपराधिक न्यायालय में ही साबित किया जा सकता था। अधिक से अधिक अपील न्यायालय यह कर सकता था कि कूटकरण की शिकायत को पुलिस या किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष जाँच के लिए भेज देता। उस ने वह उचित नहीं समझा। किसी कूटकरण की शिकायत को संबंधित मजिस्ट्रेट या थाने को भेजना उस अदालत का ऐच्छिक कार्य था जो उस ने नहीं किया। इस काम का कोई क्रेडिट अपील अदालत को नहीं मिलता। आज कल अदालतों के समक्ष वैसे ही काम की कमी नहीं है। वे अपने काम को बढ़ाना नहीं चाहते। इस से हतोत्साहित होने का आवश्यकता नहीं है।

प को चाहिए कि आप संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आप की पत्नी और उस के भाई दोनों के विरुद्ध इस कूटकरण और उस के उपयोग के संबंध में परिवाद प्रस्तुत करें। आप के पास सबूत हैं आप इस मामले को दर्ज करवा पाएंगे। जबलपुर में आप को वकील तलाशने में परेशानी हो तो आप वहाँ श्री राजेन्द्र जैन एडवोकेट से मिल सकते हैं शायद वे आप की मदद कर सकें।

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