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तलाक का आधार हो तो दूसरे पक्ष की सहमति की जरूरत नहीं।

समस्या-

नवीन ने साईखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को एक  साल हो चुका है। मेरी पत्नी छत से कूदने की, फाँसी लगाने की धमकी देती है। काम करने की मना कर चुकी है। शादी से पहले उसका अफ़ेयर रह चुका है। घर से 2 बार व मायके से 1 बार भाग चुकी है। एक रात कहीं रह चुकी है। 4 माह से उसका मानसिक इलाज़ करा रहा हूँ। दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करती है। तलाक की याचिका लगा दी है पर वो तलाक देने को तैयार नहीं है। क्या करूँ?

समाधान-

प के सवाल का छोटा सा जवाब है कि “मुकदमा लड़िए”।

आप की ही तरह मेरे पास ऐसे बहुत लोग समस्या ले कर आते हैं, जो यही कहते हैं कि मेरी पत्नी या पति तलाक के लिए राजी नहीं है। 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट प्रभावी होने के पहले तो भारत में कोई भी इस बात पर राजी नहीं था कि हिन्दू विवाह में तलाक होना चाहिए।

फिर हिन्दू मैरिज एक्ट आया तो उस में तलाक के प्रावधान आए जिन के अनुसार कुछ आधारों पर पति या पत्नी तलाक की मांग कर सकते थे, कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर केवल पत्नी तलाक की मांग कर सकती थी। लेकिन कानून के अनुसार इस के लिए अदालत में आवेदन देना अनिवार्य था। पति की अर्जी पर पत्नी या पत्नी की मर्जी पर पति अदालत में सहमत भी होता था तो तलाक होना असंभव था। स्थिति यह थी कि जो भी तलाक लेना चाहता/ चाहती थी उसे जिस आधार पर तलाक चाहिए था उसे साक्ष्य के माध्यम से साबित करना जरूरी था। आधार मुकम्मल रूप से साबित होने पर ही तलाक मिल सकता था। तलाक का यह तरीका हिन्दू मैरिज में अभी भी मौजूद है।

फिर  1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान आया। पहले यदि पति पत्नी दोनों सहमत होते हुए भी तलाक लेने जाते थे तब भी कम से कम एक पक्ष को विपक्षी के विरुद्ध तलाक के आधार को साक्ष्य से साबित करना पड़ता था। अब दोनों पक्षों के सहमत होने पर इस की जरूरत नहीं रह गयी। बस सहमति से तलाक का आवेदन पेश करें और छह माह बाद भी सहमति बनी रहे तो अदालत तलाक की डिक्री प्रदान करने लगी।

तो नवीन जी¡ तो कुछ समझ आया? आप के पास तलाक के लिए आधार मौजूद है। आपने अपनी समस्या में जो बातें लिखी हैं उन में से शादी के पहले के अफेयर की बात के सिवा सारी बातें अदालत में साबित कर देंगे तो आप को तलाक की डिक्री मिल जाएगी। उस के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है। बस ये है कि कुछ समय अधिक लगेगा।

आपसी समझ बना कर वैवाहिक समस्या का समाधान तलाशने का प्रयत्न करें।

rp_play_habeas_rb.jpgसमस्या-

रितिक कौशिक ने गाजियाबाद से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी एक फीजियोथेरेपिस्ट है और दिल्ली के सरकारी अस्पताल में संविदा पर फीजियोथेरेपिस्ट की नौकरी (38,000/-प्रतिमाह) करती है। मैं भी श्रेणी प्रथम राजकीय अधिकारी हूँ। हम दोनों में मनमुटाव के कारण जीना दूभर हो गया है। विवाह को दो वर्ष हुए हैं एक दस माह की बेटी भी है। पत्नी चाहती है कि 30 लाख का मुकदमा कर के घरेलू हिंसा और 498ए में मुझे जेल भिजवा दे जिस से मेरी नौकरी भी चली जाए। कृपया सुझाव दें कि आपसी सहमति से तलाक में भी कामकाजी पत्नी को भी मेंटीनेंस देना होगा क्या? और तलाक के बाद बेटी की कस्टडी किस के पास रहेगी। क्या बेटी के लिए अलग से भत्ता देना पड़ेगा क्या? वह सुप्रीमकोर्ट के निर्णयों की प्रति अपने पास रखती है ताकि इस मामले में अच्छी राशि प्राप्त कर सके।

समाधान-

प ने मन मुटाव का कोई कारण यहाँ नहीं बताया है। मुझे लगता है कि आप दोनों को किसी काउंसलर की मदद लेनी चाहिए। अभी आप के विवाह को अधिक समय नहीं हुआ है। यदि किसी तरह आप लोगों में बात बन सकती है तो इस विवाह को बनाए रखें। इस से बच्चे पर बुरा असर नहीं होगा।

दि आप समझते हैं कि बात इतनी बिगड़ गयी है कि अब नहीं बन सकती तो बेहतर है कि आप दोनों आपस में सहमति से तलाक लें। तलाक की सहमति भी तभी संभव हो सकती है जब कि तलाक के फलस्वरूप आप की पत्नी के लिए स्थाई पुनर्भरण तथा बेटी के भरण पोषण की राशि तय हो जाए। यह राशि दोनों की मिला कर एक मुश्त तय हो सकती है। यदि ये सब बातें तय हो जाएंगी तभी सहमति से तलाक संभव हो सकेगा अन्यथा आप दोनों को बहुत सी मुकदमों को झेलना पड़ेगा। बेहतर है कि साथ रहने के संबंध में नहीं तो अलग होने के संबंध में ही सहमति बना ली जाए।

लाक की स्थिति में यदि पत्नी की खुद की पर्याप्त आय है तो उसे भरण पोषण राशि दिलाने का कोई अर्थ नहीं है लेकिन आप की आय और पत्नी की आय में बड़ा अन्तर है तो न्यायालय पत्नी को अपने स्तर से जीने के लिए कुछ भरण पोषण राशि आप से दिलवा सकता है।

बेटी की अभिरक्षा आप को प्राप्त नहीं हो सकेगी। बेहतर है कि वह अपनी माँ के साथ रहे। बाद में जब उस की उम्र अधिक हो जाए और यह लगे कि माँ के साथ उस का पालन पोषण ठीक से नहीं हो रहा है और आप के पास हो सकता है तो उस समय कस्टडी प्राप्त करने के लिए आवेदन किया जा सकता है।

प राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में निवास करते हैं। वहाँ बहुत अच्चे वकील उपलब्ध हैं। आप उन की फीस देने में भी सक्षम हैं आप को चाहिए कि किसी स्थानीय वकील से सारे तथ्य बता कर राय करें। वह सारे तथ्य जान लेने के बाद आप को उचित राय दे सकता है।

जब विवाह चल सकने लायक न रहे तो सहमति से तलाक ही उचित और आसान उपाय है।

erectile dysfunctionसमस्या-

जगन्नाथ राव ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पुत्री का विवाह 30 जनवरी 2015 को हुआ। लड़के के माता-पिता अभद्र भाषा और लड़ाई झगड़े द्वारा लड़की को परेशान करते थे। किसी पड़ौसी से बात नहीं करने देते थे। यहाँ तक कि मोबाईल पर की जा रही वार्ता भी छुप छुप कर सुनते थे। शादी अच्छे ढंग से धूम धाम से की गयी थी फिर भी वो बिटिया को सुनाते रहते थे। कई बार सामान की मांग की गयी जो हमने पूरी की। पुत्री कई बार घर आकर रो रोकर उनकी ज़्यादतियों के बारे में बताती थी, पर हम उसे समझाते कि नया घर है, धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा और वो वापस चली जाती। फिर उन्होंने मेरी पुत्री से उसकी सैलरी की मांग की। जिसके लिए हमीं ने अपनी बेटी को कहा की ना दे क्योंकि उन की मांगें कम नहीं हो रही थीं। एक दिन सुबह सुबह बेटी घर आई तो उस का रो रोकर बुरा हाल था। पत्नी से पता चला कि वो ससुराल में एक माह से सो नहीं पा रही थी और उसका डिप्रेशन का इलाज चल रहा था। हम तुरंत उसे डॉक्टर के पास लेकर गए जहां जांच के बाद डॉक्टर ने हमें साफ़ कहा कि उसे ससुराल ना भेजें। कुछ समय अपने पास रखें। तब से यानि अप्रैल के अंतिम सप्ताह से पुत्री मेरे घर है। २-३ दिन बाद मेरी पत्नी और पुत्री उसके कुछ रोज़मर्रा के कपडे लेने उसके ससुराल गए जहां उसके सास ससुर का असली विकराल रूप दिखा जिस के बारे में अपनी पत्नी से सुनकर मुझे लगा कि मेरी बच्ची अक्सर शिकायत करती थी, पर हम ही समझ नहीं पाये। अकेले में वो उस का क्या हाल करते होंगे! कुछ सप्ताह में वो डिप्रेशन से बाहर आई। वापस ऑफिस जाने लगी। तब मेरी पत्नी से उस की बात हुई की शादी के 3 माह तक भी मेरी पुत्री और दामाद में पति पत्नी के सम्बन्ध नहीं बने जिसका कारण शायद लड़के में इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या है पर इसका प्रुफ कैसे दिया जाये। उस की माँ और पिताजी को जब बताया तो माँ बिफर गयी और बोली, मेरे बेटे में कोई कमी नहीं है। जब कि हम ने कमी की बात की ही नहीं सिर्फ बताया था की क्या समस्या है। हमने लड़के वालों से बात की तो वो झगडे पर उतर आये। लड़का बोला कि मुझ पर कोई इलज़ाम लगाए बिना म्यूच्यूअल डाइवोर्स ले लो तो ठीक है, दे दूंगा। हमने राजीनामा किया जिसमें केवल लड़की के पीहर के गहने, कपडे और ससुराल पक्ष को दिए गहने वापस मिले। उसका स्त्री धन भी नहीं लिया। लड़की ने पारिवारिक न्यायालय में धारा 13 (B) व 14 के अंतर्गत जॉइंट एप्लीकेशन लगा दी। अभी तो न्यायाधीश के साथ पहली मीटिंग भी डेढ़ माह बाद की तारीख पर है। प्रार्थनापत्र स्वीकार हो गया है। सवाल ये है कि कम से कम कितने समय में तलाक संभव है? और क्या हम विधि रूप से सही दिशा में हैं?

समाधान

प बिलकुल सही राह पर हैं। पुरुष की यौन संबंध बना सकने की अक्षमता को इरेक्टाइल डिसफंक्शन कहा जाता है।  यह एक ऐसी अवस्था है जिसे साबित करना बहुत कठिन है। केवल चिकित्सकीय परीक्षणों से यह साबित करना लगभग दुष्कर है कि किसी पुरुष को इरेक्टाइल डिसफंक्शन है। यह शारीरिक और मानसिक कमी दोनों के कारण हो सकता है और कभी दोनों का सम्मिलित परिणाम भी हो सकता है। पुरुष कभी भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होता है कि वह इस रोग से पीड़ित है। अनेक बार यह रोग छोटी उम्र में या विवाह पूर्व हुई किसी दुर्घटना का परिणाम हो सकता है। चूंकि छोटी उम्र में इरेक्टाइल डिसफंक्शन स्वभावतः होता है इस कारण उस पर ध्यान नहीं जाता है। चिकित्सकीय परीक्षण में यह साबित हो जाता है कि इरेक्शन स्वाभाविक रूप से हो रहा है तथा शुक्राणु की संख्या भी पर्याप्त मात्रा में है। इस के आगे चिकित्सकीय परीक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। लेकिन वस्तुतः यह इरेक्शन यौन संबंध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होता है, जिस के कारण पुरुष विवाह का उपभोग नहीं हो पाता है।

वैसी स्थिति में यदि दोनों पक्ष तैयार हैं तो किसी भी पक्ष की किसी प्रकार कि कमजोरी को उजागर किए बिना हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 (बी) के अन्तर्गत सहमति से विवाह विच्छेद होना सब से बेहतर उपाय है। यह 6-8 माह में हो जाता है। आवेदन प्रस्तुत करने और न्यायालय में पंजीबद्ध हो जाने के उपरान्त छह माह का समय देना जरूरी है। यदि छह माह के उपरान्त भी दोनों यह बयान करते हैं कि वे स्वेच्छा से विवाह विच्छेद चाहते हैं तो न्यायालय दोनों के विवाह को विघटित करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर देता है।

हाँ धारा 14 के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि विवाह संपन्न होने के एक वर्ष की अवधि में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। लेकिन न्यायालय प्रार्थी को असाधारण कठिनाई होने अथवा असाधारण दुराचरण होने की विशिष्ट परिस्थितियों में इस अवधि के पूर्व भी विवाह विच्छेद के आवेदन को सुनवाई के लिए स्वीकार कर सकता है। आप के मामले में आवेदन स्वीकार कर लिया गया है यह अच्छी बात है। लेकिन यदि सुनवाई के समय न्यायालय यह महसूस करता है कि वैसी स्थिति नहीं थी और विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करता है तो वह यह शर्त लगा सकता है कि विवाह को एक वर्ष पूर्ण होने के पूर्व यह डिक्री प्रभावी नहीं होगी।

हाँ समय लगने की बात है तो यह मान कर चलें कि आवेदन स्वीकार होने के छह माह के बाद ही उक्त डिक्री पारित की जा सकती है। हम वकील मानते हैं कि इस तरह के मामले में 8 से 10 माह की अवधि में विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है।

विवाह विच्छेद पर दी जाने वाली राशि एक साथ न दें, अंतिम किस्त सारे काम पूरे होने पर ही दें।

sexual-assault1समस्या-
मृगेश रावल ने पाटन, गुजरात से पूछा है-

मेरे बड़े भाई का विवाह फऱवरी 2012 में हुआ था। आरंभ में दो माह सब कुछ ठीक ठाक रहा, पर बाद में मेरी भाभी छोटी छोटी बातों पर घर के सभी लोगों से लड़ने झगड़ने लगी। उस के बाद उन्हों ने एक बार जहर पीने की कोशिश की तो मेरे भाई ने उन्हेंअपने मायके भेज दिया। उस के बाद मेरे माता, पिता व भाई एक साथ जा कर भाभी को वापस ले आए। पर थोड़े दिन बाद फिर से वही पुरानी समस्या उठ खड़ी हुई। उन्हो ने मेरे भाई के साथ मारपीट की और गाली गलौच करने लगी। फिर मायके चली गई और अपने आप पर पेट्रोल छिड़क कर वहाँ के पुलिस स्टेशन में चली गई। हमारे घर के सभी लोगों पर 498 ए आईपीसी का मामला बना दिया। वह तो 307 आईपीसी का मुकदमा भी बनवाना चाहती थी पर हमारी किस्मत अच्छी थी कि पुलिस उस से सहमत नहीं हुई। हम लोग अदालत से जमानत पर हैं। अब भाभी मेरे भाई से तलाक चाहती है पर सात लाख रुपया भी चाहती है। हम देने को भी तैयार हैं लेकिन हम चैक से देना चाहते हैं, वह नकद चाहती है। हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि अब करें तो क्या करें? किसी तरह इस समस्या से निकलने का रास्ता बताएँ।

समाधान-

प की समस्या उस स्तर पर पहुँच गई है जिस स्तर पर आप के भाई व भाभी के बीच विवाह विच्छेद ही एक मात्र रास्ता रह गया है। बात सिर्फ इतनी है कि वह अपने स्त्री-धन व स्थाई पुनर्भरण के लिए सात लाख रुपया नकद चाहती है लेकिन आप उसे चैक से देना चाहते हैं। पर मामला इतना आसान भी नहीं है।

क तो अभी अभी आप के भाई के विवाह को एक साल होने जा रहा है। इस लिए सहमति से विवाह विच्छेद की अर्जी अब लगाई जा सकती है। विवाह विच्छेद तभी मंजूर होगा जब अर्जी लगाए जाने के छह माह के बाद आप की भाभी और भाई दोनों न्यायालय में अपना बयान दें और विवाह विच्छेद के लिए सहमत हों। इस कारण से अभी तो सात लाख रुपया पूरा देने का कोई प्रश्न नहीं है। यह तभी दिया जाना चाहिए जिस दिन तलाक की अर्जी मंजूर हो। ऐसे भी बहुत मामले सामने आए हैं जहाँ पत्नी को सारा रुपया अर्जी दाखिल करने के पहले या दाखिल करने के समय दे दिया गया। बाद में पत्नी ने विवाह विच्छेद के लिए इन्कार कर दिया। इस तरह रुपया देने पर भी तलाक नहीं हो सका। हमारा मत है कि आप के भाई और भाभी के बीच एक एग्रीमेंट लिखा जाना चाहिए जिस में यह तय हो कि दोनों साथ रहने में अक्षम हैं और गृहस्थी नहीं चला सकते इस कारण स्वेच्छा से विवाह विच्छेद करना चाहते हैं। दोनों मिल कर सहमति से विवाह विच्छेद की अर्जी दाखिल करेंगे। उस समय कुछ रुपया पत्नी को दे दिया जाएगा। कुछ रुपया तब दिया जाएगा जब पत्नी द्वारा दर्ज कराया गया 498 ए का मुकदमा खत्म हो जाएगा। उस के लिए आप को उच्च न्यायालय से अनुमति प्राप्त करनी होगी। उस में भी समय लगेगा। शेष रूपया तब दिया जाएगा जब न्यायालय विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करेगी।

स एग्रीमेंट की एक एक प्रति दोनों रखें और मूल प्रति को संलग्न करते हुए न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत करें उस समय सात लाख रुपयों में से पहली किस्त दे दी जाए। दूसरी किस्त 498 ए का मुकदमा खत्म हो जाने पर या विवाह विच्छेद की डिक्री पारित होने पर जो भी पहले हो तब तथा अंतिम किस्त तीसरा और अंतिम कार्य सम्पन्न होने पर दी जाए। यह नकद भी दिए जा सकते हैं और चैक से भी क्यों कि तीनों किस्तों को प्राप्त करने का सबूत किसी न किसी रूप में न्यायालय मे रहेगा इस कारण से आप को भी किसी तरह की आशंका नहीं रहेगी। यदि इस पर आप की भाभी व उस के माता पिता सहमत नहीं होते हैं तो आप के भाई को भी सहमत होने की जरूरत नहीं है।

धारा 498-ए आईपीसी के मुकदमे में सजा होना आसान नहीं है। कई वर्ष लग जाते हैं। फिर मान लो सजा हो भी जाए तो भी अपील की जा सकती है उस में भी समय लगेगा। समझौता किसी भी स्तर पर हो सकता है। आप के भाई अपनी बात पर दृढ़ रहें। हमारा अनुभव है कि आप के भाई अपनी शर्तों पर दृढञ रहेंगे तो आप की भाभी को कुछ समय लगा कर ही सही पर इन शर्तों पर मानना पड़ेगा।

सहमति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन से पूर्व एक वर्ष या अधिक अवधि से पृथक निवास आवश्यक . . .

hindu-marriage-actसमस्या –
बंगलुरू, कर्नाटक से नरेन्द्र तिवारी ने पूछा है –

मेरी एक मित्र है जिसका विवाह 10 वर्ष पूर्व हिन्दी रीतिरिवाज से बंगलौर में हुआ, उसके बाद वो दोनों नीदरलैंड रहने चले गये। वहाँ उनकी एक पुत्री भी हुई। लेकिन वहाँ रहते हुए मेरी मित्र को यह मालूम चला कि उसके पति का विवाह पूर्व एक महिला से अवैध संबध था जिस से उस की एक संतान भी है जिसका वह भरणपोषण भी करता आ रहा है। उस के बाद मेरी मित्र ने अपने पति को छोड कर नीदरलैंड में ही अलग रहना प्रारंभ कर दिया। अब दोनों तलाक चाहते हैं। मेरी मित्र और उसका पति पिछले 9 माह से अलग रह रहे है नीदरलैंड में 6 माह और अब भारत में 3 माह से है। क्या उन दोनों का सहमति से तलाक भारत में हो सकता है? और क्या यह अवधि सहमति से तलाक के 1 वर्ष की अवधी में गिनी जा सकती है।

समाधान –

प की मित्र व उस के पति का विवाह बंगलुरू में हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ था और वे हिन्दू हैं तो उन पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। इस अधिनियम की धारा 13 बी सहमति से विवाह विच्छेद के सम्बन्ध में है। विवाह विच्छेद के लिए आवेदन उस स्थान पर अधिकारिता रखने वाले न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है जिस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के अन्तर्गत विवाह सम्पन्न हुआ है या जिस की स्थानीय अधिकारिता के अन्तर्गत पति-पत्नी ने अन्तिम बार एक साथ निवास किया है। आप की मित्र और उस के पति का विवाह बंगलुरू में सम्पन्न हुआ है इस कारण सहमति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन बंगलुरू के न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है।

धारा 13 बी में यह उपबंध है कि आवेदन प्रस्तुत करने की तिथि के एक वर्ष या अधिक अवधि से पति पत्नी अलग रह रहे हों, उन का एक साथ रहना संभव नहीं रह गया हो और वे विवाह विच्छेद के लिए आपस में सहमत हो गए हों। आप की मित्र और उस के पति पिछले 9 माह से एक दूसरे से पृथक रह रहे हैं। इस में 3 माह की अवधि भारत में तथा 6 माह की अवधि नीदरलैंड में व्यतीत हुई है। यह 9 माह की अवधि पृथक निवास करने की अवधि में ही सम्मिलित होगी। आप की मित्र व उस के पति 3 माह के उपरान्त जब उन्हें पृथक पृथक निवास करते एक वर्ष की अवधि पूर्ण हो जाए तब वे बंगलुरू के न्यायालय में सहमति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

यदि वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना संभव न रह गई हो तो सहमति से विवाह विच्छेद श्रेयस्कर है।

liveinसमस्या-

जयपुर, राजस्थान से राजीव ने पूछा है –

मेरी शादी 2009 में हुई थी,  मेरी पत्नी अजमेर की रहने वाली हैं। हम ने प्रेम विवाह किया था। मैं ने तो अपने घर पर सब कुछ बता दिया था पर वो लड़की अपने घर वालों से अपनी शादी के बारे में बता नहीं पाई। उसकी नौकरी जयपुर में थी इसलिए उसे मेरे साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मेरे घर वालों ने उसे कहा कि तुम्हारे घर वालों से बात करे तो उसने कहा की वो टाइम आने पर खुद कर लेगी। पर मेरे चाचा जी ने उसके पापा से बात की तो उन्होंने कहा की मेरी बड़ी बेटी की शादी नहीं हुई है उसकी शादी हो जाएगी तब इनकी शादी की बात खोल देंगे । जब उनकी बड़ी बेटी की शादी हो गई तब हम ने उन्हें शादी की बाद सब को बताने को कहा तो उन होने 2011 में लड़की को घर भेजने को कहा और बोले तीन चार दिन बाद आकर ले जाना। में जब लेने गया तो लड़की ने कहा की मेरी मम्मी की तबीयत खराब हैं बाद में आउंगी।  कुछ टाइम बाद मुझे तलाक का नोटिस मिला , मैं ने जयपुर में धारा 9 के तहत वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना का केस किया। लड़की के न आने पर उसका फैसला मेरे हक में कर दिया गया। अजमेर में जो तलाक का केस लड़की ने मुझ पर किया उसका फैसला भी मेरा हक में हो गया।  अब लड़की ने हाईकोर्ट में अजमेर वाले फैसले के खिलाफ अपील की है। में ये जानना चाहता हूँ की आगे क्या होगा? एक बात और कि मैं अनुसूचित जाति का हूँ और लड़की सामान्य वर्ग की है।  इस बात को लेकर उसके पापा ने मुझ पर जाति सूचक शब्दों से संबोधित किया था जिस का मैं ने उन पर मुकदमा किया था, पर वो मुकदमा मैं ने वापस ले लिया था।  क्या अब मैं उन पर मानहानि का केस कर सकता हूँ। मैं एक व्यापारी हूँ मेरा सारा काम मेरी पत्नी के नाम की फर्म से चलता है। वो मेरी बहिन के साथ भी उसकी फर्म में पार्टनर है, मतलब कि वो मेरा साथ हर कागजी कार्यवाही में हैं। इन केस की वजह से मैं अपने काम में भी बराबर ध्यान नहीं दे पा रहा। हमारे बच्चे नहीं हैं, वो २ बार गर्भवती हुई थी, पर उसका दोनों बार गर्भपात हो गया था। उसने अपने तलाक के नोटिस में क्रूरता का या मारपीट का इल्जाम नहीं लगाया। न ही पैसे की लेन देन का बस वो बिना शर्त तलाक चाहती है। पर क्यों ये नहीं बताया। बाद में उसने अपने बयानों में पेसे का लेनदेन और मेरे द्वारा माँ बाप को डरना धमकाना बताया पर वो दोनों केस में जीत चुका हूँ। में ये जानना चाहता हो की अब हाईकोर्ट में क्या हो सकता है?

समाधान-

प के वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के मामले में आप के पक्ष में डिक्री हो चुकी है। जिस की कोई अपील नहीं हुई है तथा डिक्री की पालना में आप की पत्नी आप के साथ आ कर नहीं रहने लगी है। इस तरह आप के पास विवाह विच्छेद के लिए आधार मौजूद है। पत्नी द्वारा किए गए विवाह विच्छेद के मामले में आवेदन निरस्त हो गया। उस ने उच्च न्यायालय में अपील की है। उस मुकदमे में क्या आधार आप की पत्नी ने तलाक के लिए लिया था, क्या तथ्य वर्णित किए थे तथा उस पर क्या साक्ष्य ली गई थी यह तो आप के मामले की पूरी पत्रावली देखे बिना कोई भी वकील या विधिवेत्ता नहीं बता सकता। लेकिन जो तथ्य यहाँ आप ने प्रकट किए हैं उन से प्रतीत होता है कि आप की पत्नी के पास विवाह विच्छेद के लिए कोई मजबूत आधार नहीं है और उच्च न्यायालय भी इस मामले में विवाह विच्छेद की डिक्री पारित नहीं करेगा।

दि आप की पत्नी आप के साथ रहना नहीं चाहती है और विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करना चाहती है तो मेरे विचार से आप का संबंध अब बना नहीं रह सकता। जब संबंध के जल्दी ही पुनः स्थापित न होने की कोई संभावना न हो तो उसे बनाए रखने का कोई लाभ नहीं। वैसी स्थिति में सहमति से अलग हो जाना सब से श्रेयस्कर है। इस से दोनों पक्षों के बीच कोई कटुता उत्पन्न नहीं होती और कम से कम मानवीय संबंध बरकरार रह सकते हैं। आप अपनी पत्नी से खुल कर बात करें और पूछ लें कि क्या साथ रहने की तनिक भी संभावना है? यदि नहीं तो आप को पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हुए सहमति से विवाह विच्छेद की डिक्री हेतु आवेदन करने का प्रस्ताव अपनी पत्नी के समक्ष रखना चाहिए। इस के साथ आप शर्त ये रख सकते हैं कि आप के जिन जिन व्यवासायों में वह भागीदार है उन से वह बिना कुछ लिए दिए रिटायर हो जाएगी तथा भविष्य के लिए कोई खर्चे की मांग नहीं करेगी न भविष्य में कभी खर्चे की मांग करेगी।

विवाह विच्छेद का प्रकरण एक राज्य से दूसरे में स्थानान्तरित कराया जा सकता है।

समस्या-

ग्वालियर, मध्य प्रदेश ले चिंकी ने पूछा है –

मेरी शादी 19 फरवरी 2011 को ग्वालियर में हुई थी।  मैं ओर मेरे पति बॅंगलुर में रहते थे, शादी के 1  महीने बाद जब मैं अपने ससुराल ग्वालियर आई तो मेरे पति ने मुझे 15  दिन तक कोई कॉल नही किया और ना कोई फोन रिसीव किया।  जब सास ससुर ने कारण पूछा तो बोले कि जब तक ये जॉब नहीं करेगी मैं इसके साथ अच्छे से नहीं रहूँगा।  6  महीने तक यही चलता रहा, फिर घर वालों के समझाने पर मेरे पति में चालीस प्रतिशत परिवर्तन आया।  वो थोड़ा अच्छे से रहने लगे और बात भी करने लगे। पर अभी नवम्बर 2012 में मेरे पति ने कहा कि चलो ग्वालियर चलते हैं।  हम ग्वालियर आए। उसके बाद बोले कि चलो तुम्हारे घर से बुलावा आया है, चलो तुम्हारे घर चलते हैं।  फिर जब मैं ओर मेरे पति हमारे घर आए तो यहाँ अच्छे से सब से बात की और डिनर करके मेरे पति जाने लगे तो बोले कि तुम रुक जाओ मैं तुम्हे 2 दिन बाद लेने आ जाउंगा, तो मैंने कहा ठीक है।  लेकिन मुझे मेरे घर छोड़ने के बाद जब मैंने अपने पति को कॉल किया तो उन्होने 2 दिन कोई फोन नहीं उठाया और सास ससुर को कॉल किया तो उन्होंने भी फोन नही उठाया।  फिर मैं ने सोचा कि मैं खुद घर चली जाती हूँ।  मैं ससुराल गयी तो वहाँ घर पर ताला डाला हुआ था। और आज 3 महीने हो गये अभी तक कुछ नहीं पता कि सब कहाँ हैं।  पति ने भी बॅंगलुर में फ्लेट चेंज कर लिया है और कंपनी भी।  अभी 19 फरवरी को कोर्ट से एक नोटिस आया है जिस में लिखा है की मेरे पति ने वहाँ डाइवोर्स केस फाइल कर दिया है।  उनके घर से कोई बात करने को तैयार नहीं है।  अभी 1  महीने पहले तक मेरे पति के दादाजी कहते थे कि बेटा शांत रहो सब ठीक हो जाएगा।  अब पति की तरफ के सारे रिश्तेदार कहते हैं कि वो तुम्हें रखना नहीं चाहते।  जब मेरे घरवालो ने कारण पूछा तो नहीं बताया और ना ही मेरे सास ससुर और पति सामने आकर बात करने के लिए राज़ी हैं।  ये सब क्या है? कुछ समझ नहीं आ रहा है।  कृपया बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए?  मेरा और मेरे पति का घर भी यहीं ग्वालियर मैं हैं,  तो क्या यह केस ट्रान्सफर किया जा सकता है ओर इसकी प्रक्रिया क्या है?

समाधान-

Desertedप की पूरी समस्या पढ़ी। आप एक मनुष्य हैं या फिर एक मशीन। आप ने विवाह से ले कर आज का जो विवरण दिया है उस में कहीं भी यह तक नहीं है कि विवाह कैसे तय हुआ था? आप की विवाह से क्या अपेक्षाएँ थीं? क्या देख-सोच कर आप के परिवार और आपने यह विवाह किया था। विवाह के उपरान्त आप कितने समय अपने ससुराल में रहीं और कितने समय अपने पति के साथ बंगलुरू में? आप के पति का आप के साथ समय कैसा बीता, उन का व्यवहार क्या रहा? जितने दिन आप लोग साथ रहे आप दोनों के बीच रिश्ता कैसा रहा? क्या विवाह के पूर्व आप के पति और ससुराल वालों ने क्या यह प्रकट किया था कि आप को विवाह के बाद नौकरी करनी होगी? यह बात आप के पति ने आप को विवाह के बाद कब कही? आप की प्रतिक्रिया क्या थी? आप के पति का व्यवहार इस बात के बाद कैसा रहा? फिर लोगों के समझाने के बाद 40 प्रतिशत जो परिवर्तन आया वह क्या था? आप के पति आप को विवाह के एक माह बाद जब आप ससुराल आईं तो आप के पति आप को उस के बाद कब वापस ले गए? या कब आप उन के पास बंगलुरू गईं? इस बीच आप ग्वालियर में रही तो कितने समय अपने ससुराल में और कितने समय अपने मायके में रही? इतने सारे तथ्य आप ने अपने पेट में छुपा लिए हैं। इन सब को जाने बिना कोई आप को क्या राह सुझा सकता है? आप के पति ने आप को कुछ नहीं बताया और आप को ले कर ग्वालियर आए और आप के मायके में छोड़ गए। इस के पहले उन्हों ने अपनी कंपनी बदली और नया फ्लेट भी देख लिया। आप के सास-ससुर को अपने साथ ले जाने कहीं अन्यत्र रखने की योजना भी बना डाली। फिर आप को मायके में छोड़ कर गायब हो गए। निश्चित रूप से इस घटना से आप को अत्यन्त मानसिक संताप हुआ होगा और सदमा भी पहुँचा होगा।  विवाह से ले कर जो व्यवहार आप के पति का आप के साथ रहा उस में उस के व्यवहार से किसी तरह का शारीरिक या मानिसक कष्ट आप को हुआ होगा तो वह भी आपने नहीं लिखा है। ये सब तथ्य किसी समस्या का उपाय बताने के लिए आवश्यक हैं। खैर¡

प के पति ने किन परिस्थितियों में आप के साथ विवाह किया यह स्पष्ट नहीं है।  पर लगता है वे आप के साथ विवाह करना ही नहीं चाहते थे। कर लिया था तो आप के साथ जीवन बिताना नहीं चाहते थे। इस के कारणों में जाने का कोई अर्थ नहीं है। यह तो निश्चित है कि आप के पति आप को अपनी पत्नी के रूप में नहीं देखना चाहते हैं और आप के साथ विवाह के बंधन को समाप्त करना चाहते हैं।  इस संबंध को बनाए रखना संभव प्रतीत नहीं होता है। इस कारण से इस से छुटकारा प्राप्त करना ही बेहतर है। हालांकि इस उपाय से आप का या आप के परिवार के लोगों अभी सहमत होना संभव नहीं है।  लेकिन इस के सिवा कोई चारा नहीं है।

प को तुरन्त जीवन निर्वाह के लिए अपने पति से भरण पोषण राशि के लिए धारा -125 दंड प्रक्रिया संहिता और घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत आवेदन ग्वालियर में प्रस्तुत करने चाहिए।  यदि आप को किसी तरह की मानसिक और शारीरिक क्रूरता का सामना आप के पति और आप के पति के रिश्तेदारों की ओर से करना पड़ा है तो आप धारा 498-ए भारतीय दंड सहिंता की शिकायत ग्वालियर के उस थाना में कर सकती हैं जिस के क्षेत्र में आप का ससुराल पड़ता है।  जिन परिस्थितियों में आप के पति और सास-ससुर आप को अपने परिवार के साथ छोड़ कर गायब हुए हैं वह भी आप के साथ क्रूरता का व्यवहार करना है। आप को ये सब आवेदन तुरन्त करने चाहिए इस से उन्हें इन में अपनी प्रतिरक्षा के लिए ग्वालियर आना पड़ेगा। धारा 498-ए की शिकायत के साथ ही आप अपना स्त्री-धन जो बंगलुरू में या आप के ससुराल के घर में आप के पति व उस के परिवार के कब्जे में है उसे प्राप्त करने के लिए धारा -406 भा.दं.संहिता की शिकायत भी कर सकती हैं।

स के साथ ही साथ उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक आवेदन दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 25 के अंतर्गत आप के विरुद्ध बंगलुरू में प्रस्तुत किए गए विवाह विच्छेद के प्रकरण को ग्वालियर में स्थानान्तरित करने के लिए प्रस्तुत करना चाहिए तथा साथ में इस तरह के स्थगन आदेश के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए कि जब तक आप का प्रकरण को स्थानान्तरित करने का आवेदन का निर्णय न कर दिया जाए तब तक बंगलुरू में विवाह विच्छेद के प्रकरण की कार्यवाही को स्थगित रखा जाए।

स सब से उन्हें ग्वालियर आना पड़ेगा। तब दोनों के बीच बातचीत से या न्यायालय के माध्यम से बातचीत के माध्यम से ऐसा मार्ग तलाशा जा सकता है जिस से शीघ्र विवाह विच्छेद हो जाए तथा आप को अपना स्त्री-धन व पर्याप्त स्थाई पुनर्भरण राशि प्राप्त हो जाए। विवाह विच्छेद के उपरान्त आप तय कर सकती हैं कि आप को आगे के जीवन में क्या और कैसे करना है।

पत्नी और ससुर ने विवाह विच्छेद का मन बना लिया है तो सहमति से विवाह विच्छेद हेतु आवेदन कर दें।

समस्या-

गुजरात से शिशिर ने पूछा है –
मेरी शादी 13 एप्रिल 2012 को हुई, जुलाई में मेरी पत्नी अपने मायके चली गयी। और अब वापस नहीं आना चाहती।  मैंने उसे कई बार फोन किया तो बोलती है कि मैं आपकी माँ के साथ नही रहूंगी। मैं ने उसे हाँ कह दिया, फिर भी वो आने को तैयार नहीं है।  मैने उसे वापिस बात की तो बोलती है की मैं ने दूसरा तलाश कर लिया है।  ( हो सकता है कि उस ने ऐसा गुस्से में कहा हो) अभी उसके घर वाले मुझ पर विवाह विच्छेद के लिए दबाव डाल  रहे हैं।  इसी बीच मैं ने उसे दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन का नोटिस दे दिया है।  वे लोग मुकदमा करने की धमकी दे रहे हैं।  मुझे क्या करना चाहिए?  उसके पिताजी ने पूरे गावों मैं घूम कर मुझे बदनाम कर दिया कि लड़का ना मर्द है उस में दम नहीं है।  जबकि ऐसा नहीं है।  मैं यह  जानना चाहता हूँ कि क्या मैं उन लोगों पर इसके लिए मानहानि का केस कर सकता हूँ?

समाधान-

alimonyप का अनुमान है कि पत्नी ने गुस्से में कह दिया होगा कि मैं ने दूसरा तलाश कर लिया है।  इस से यह मैं भी यह अनुमान कर सकता हूँ कि आप दोनों के बीच कुछ तो ऐसा हुआ है जिस से आप की पत्नी गुस्सा है। इतना कि उस ने पिता को बताया कि अब वह आप के साथ नहीं रहेगी।  जिस की प्रतिक्रिया में उन्हों ने आप पर तलाक के लिए दबाव डालना आरंभ कर दिया और आप को बदनाम भी किया। आप की पत्नी और उस के पिता की ये गतिविधियाँ ऐसी हैं जिन से लगता है कि वे इस रिश्ते को बना कर रखना नहीं चाहते।

प ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए नोटिस दिया है। आप की पत्नी ने उस का कोई उत्तर नहीं दिया है तो आप दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए मुकदमा भी कर सकते हैं।  आप का विवाह 13 अप्रेल 2012 को ही हुआ है इस कारण से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन अभी 12 अप्रेल 2013 तक नहीं किया जा सकता है। मेरी राय में आप को दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए मुकदमा कर देना चाहिए और अपनी पत्नी व उन के पिता को बता देना चाहिए कि आप ये मुकदमा इस लिए कर रहे हैं क्यों कि विवाह विच्छेद का मुकदमा करना विवाह की तिथि से एक वर्ष तक संभव नहीं है। यह भी बता दें कि आप की मंशा तो यह है कि पत्नी आप के साथ आ कर रहे।

दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना की डिक्री प्राप्त कर लेने के उपरान्त भी यदि आप की पत्नी आप के साथ आ कर नहीं रहती है तो उसे जबरन इस के लिए मनाया नहीं जा सकता।  वह नहीं आती है तो आप को इसी आधार पर विवाह विच्छेद करने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी और उस के पिता विवाह विच्छेद के लिए मन बना चुके हैं।  वे फर्जी मुकदमे करें और आप परेशान हों इस से अच्छा है आप आपसी सहमति से विवाह विच्छेद करने की अर्जी दे दें।

दि आप के ससुर ने आप की बदनामी की है और उस से आप की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है और आप के पास इस के सबूत हैं तो आप मानहानि के लिए फौजदारी मुकदमा आप की पत्नी और उन के पिता के विरुद्ध कर सकते हैं। मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति हेतु दीवानी मुकदमा भी किया जा सकता है।  पर मुझे नहीं लगता कि उस से कुछ हासिल हो सकता है।

पत्नी के प्रस्ताव के अनुसार स्त्री-धन लौटा कर सहमति से तलाक के लिए आवेदन करें, लेकिन पहले दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन अवश्य प्रस्तुत कर दें

समस्या-

मेरी शादी जून 2009 में हुई।  शादी के बाद से ही पत्नी के मायके वालों के हस्तक्षेप के चलते हमारे वैवाहिक जीवन में कड़वाहट आने लगी।  मेरी पत्नी अपने मायके वालों के अनुसार ही चलती है और मेरे घर वालो को पसंद नहीं करती है।  मेरे घर वालों द्वारा कही गई छोटी से छोटी बात जो उसके हित के लिए कही जाती उस को भी वह बढ़ा चढ़ाकर अपनी मम्मी से कह देती।  फलस्वरूप हमारे दोनों परिवारों में टकराव कि स्थति आ गई।   पत्नी भी आये दिन झगड़ा करती है जिस वजह से कलह रहने लगी।  शादी के बाद पत्नी मुझे शहर से बाहर जैसे दिल्ली जाकर वहा जॉब तलाशने के लिए दबाव बनाने लगी।  मैंने उसकी बात मान कर घर छोड़ दिया और नॉएडा में जॉब करने लगा।  पत्नी भी साथ रहने लगी।  एक वर्ष तक नौकरी करता रहा।  लेकिन माँ कि बीमारी के चलते मुझे फिर से वापस आना पड़ा और हमेशा के लिए घर में रहने का निश्चय किया।  लेकिन पत्नी को यह बिलकुल मंजूर नहीं हुआ और झगड़कर अपने मायके चली गयी।  आज उसे मायके गए 4 महीने हो गए हैं।  तब से उसने न ही मेरी कोई खबर ली और न मेरे घर वालों की।  मेरी उससे कोई बात नहीं हुई तो मैं उससे मिलने ससुराल गया लेकिन वो मेरे पास नहीं आई और मिलने से इंकार कर दिया।  फिर दो दिन बाद मैं पिताजी और ताउजी के साथ गया।  उसे लेने के वास्ते तो उसने और उसके घर वालो ने भेजने से मना कर दिया और गलत आरोप लगाकर दहेज़ का मुकदमा लगाने कि धमकी देने लगे।  तलाक के लिए भी कहा रहे हैं।  हम लोग घर वापस आ गए लेकिन मेरी माँ और दीदी ने फ़ोन कर बात की तो उनका वही जवाब है कि मुझे मेरा सामान वापस कर दो और अब फैसला होगा।  घर आने के लिए बिलकुल भी राजी नहीं है।   मुकदमा कर के मेरे घर वालों को जेल भेजने कि धमकी दे रहे हैं।  मैं आपको बता दूँ कि शादी से लेकर अभी तक मेरी तरफ से या मेरे घर वालों की तरफ से दहेज़ के नाम पर एक रुपये की भी मांग नहीं कि गयी है।   आपसी कलह और झगड़े के चलते मैंने अपनी पत्नी को एक बार डाँटा जरूर था, वो भी तब जब उसने जिद में आकर अपने शरीर को नुक्सान पहुँचाने कि कोशिश की, जैसे दरवाजा बंद करके फांसी लगाने कि कोशिश,  ब्लेड से हाथ कि नस काटने कि कोशिश या फिर मेरे सामने अपना सर दीवार पर पटकने के कारण।  मेरे घर वाले और मैं अपनी पत्नी को बहुत चाहते थे।  लेकिन मेरी पत्नी ने उस चाहत को नहीं समझा।  वह सिर्फ अपने मायके वालों से मतलब रखती रही।  मैंने बहुत कोशिश की कि उसे मना लूँ, लेकिन वो नहीं मान रही है।  कृपया मार्गदर्शन करें कि कैसे मैं उस के द्वारा लगाये गए मुक़दमे से अपना और अपने परिवार वालों का बचाव कर सकता हूँ? जिस से हमें परेशानी और बदनामी का सामना न करना पड़े।

-विमल, कानपुर, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प की परिस्थितियाँ स्पष्ट और विकट हैं।  आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती और आप से वैवाहिक सम्बन्धों का विच्छेद अर्थात तलाक चाहती है।  उस के मायके वाले उस के साथ हैं।  हो सकता है अपने मायके वालों को उस ने मनगढ़न्त कहानियाँ सुना रखी हों।  आप के कथनों से लग भी रहा है कि उस ने पहले फाँसी लगाने, दीवार से सिर फोड़ने और हाथ की नस काटने की कोशिश की है।  ऐसी परिस्थिति में वह 498-ए भा.दं.संहिता के अन्तर्गत क्रूरता का व्यवहार करने का आरोप लगा सकती है।  उसे विवाह के समय मिला स्त्री-धन भी कुछ तो आप के पास होगा ही।  इस तरह वह आप के विरुद्ध धारा 406 भा.दं.संहिता का आरोप भी आप पर लगा सकती है।  इन दोनों आरोपों में आप की और आप के परिवार वालों की गिरफ्तारी भी हो सकती है।  बाद में भले ही जमानत पर आप लोग छूट जाएँ।  आप गिरफ्तारी पूर्व जमानत के प्रावधान का उपयोग भी नहीं कर सकते क्यों कि यह प्रावधान उत्तर प्रदेश में प्रभावी नहीं है।

सी स्थिति में आप के पास केवल यही मार्ग शेष रह जाता है कि आप उस की और उस के परिवार वालों की बात मान लें।  उस का जो भी स्त्री-धन है उसे लौटा दें तथा सहमति से विवाह विच्छेद का आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दें।  इस के लिए आप दोनों परिवार बैठ कर निर्णय कर सकते हैं कि क्या किया जाए और कैसे किया जाए? प्रारंभ में इस संबंध में एक समझौते पर आप दोनों पहुँच जाएँ और उस समझौते को स्टाम्प पेपर पर लिख कर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर करवा कर उसे नोटेरी पब्लिक के यहाँ तस्दीक करवा लिया जाए।

मझौते के लिए बातचीत करने के पहले एक काम अवश्य करें कि आप अपनी ओर से पारिवारिक न्यायालय के समक्ष एक आवेदन धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए अवश्य प्रस्तुत कर दें।  जिस से विकट परिस्थिति उत्पन्न होने पर आप यह कह सकें कि आप के मन में आज भी दुर्भावना नहीं है और आप पत्नी के साथ दाम्पत्य निर्वाह करने को तैयार हैं।

पिता से पुत्री के भरण पोषण की राशि प्राप्त करने के लिए माता कब कार्यवाही करे?

समस्या-

मैं मुम्बई में केन्द्र सरकार की नौकरी में हूँ। मेरा विवाह 2006 दिसम्बर में हुआ था। लेकिन मेरी कुछ गलतियों के कारण अब मेरे पति मुझ से तलाक चाहते हैं। मैं ने सब कुछ पति के सामने स्वीकार किया लिया और यह विश्वास दिलाया कि फिर भविष्य में कभी भी ऐसा नहीं होने दूंगी।  लेकिन पति मुझ पर विश्वास नहीं है और वे मुझ से अलग होना चाहते हैं।  मेरे एक चार वर्ष की पुत्री भी है। पति ने कहा है कि यदि मैं चाहूँ तो पुत्री को अपने संरक्षण में रख सकती हूँ।  मेरे पति ने सहमति से तलाक की कानूनी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।  मेरा सवाल यह है कि सहमति से तलाक के बाद यदि मैं पुत्री को अपने पास रखूँ तो क्या उस के पिता से भरण पोषण के लिए वित्तीय सहायता की मांग कर सकती हूँ?   कानूनी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के पहले मुझे क्या करना चाहिए।

-वृषाली, कल्याण, महाराष्ट्र

समाधान-

प ने साफगोई और साहस का परिचय दिया है। गलतियाँ इंसान से होती हैं और वही उसे सुधारता भी है। लेकिन यदि आप के पति आप से अलग होना ही चाहते हैं और आप तैयार हैं तो यह दोनों के लिए ठीक है। वैसे सहमति से तलाक के मामले में भी आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद ही तलाक की डिक्री पारित होगी। छह माह बाद पति व पत्नी दोनों से पूछा जाएगा कि क्या आप का इरादा अब भी तलाक लेने का है या बदल गया है। उस समय तक यदि पति-पत्नी के बीच पुनः विश्वास कायम हो जाए तो वे तलाक की अर्जी को खारिज करवा कर फिर से साथ रह सकते हैं। दोनों में से एक के भी सहमति को वापस ले लेने पर तलाक होना संभव नहीं है तब भी न्यायालय अर्जी को खारिज कर देगा।

हमति से तलाक के मामले में तलाक की सभी शर्तें दोनों पक्षों के बीच तय हो जानी चाहिए।  जैसे पत्नी का स्त्रीधन क्या है? जिसे वह अपने साथ रखेगी। संतान यदि माता के साथ रहेगी तो उस के भरण पोषण के लिए पिता क्या राशि प्रतिमाह देगा और भविष्य में यह राशि किस तरह बढ़ेगी या घटेगी।

भारतीय विधि में पुत्री को अपने माता पिता से उस का विवाह होने तक या आत्मनिर्भर होने तक भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है। यदि सहमति से तलाक की डिक्री में संतान के भरण पोषण के मामले में कोई शर्त तय नहीं भी होती है तब भी संतान अपनी माता के माध्यम से बाद में भी भरण पोषण, अध्ययन और विवाह आदि के खर्चों के लिए धनराशि की मांग कर सकती है। आप चाहें तो पुत्री के लिए पिता से जो भी भरण पोषण आदि खर्चे भविष्य में चाहिए उन्हें तलाक की अर्जी देने के पहले तय कर के उसे अर्जी में अंकित करवा सकती हैं। तलाक की डिक्री में उन का उल्लेख हो जाएगा। यदि ऐसा तलाक के समय न किया जा सके तो बाद में भी तय किया जा सकता है और पिता भरण पोषण से इन्कार करे तो भरण पोषण प्राप्त करने के लिए पुत्री की ओर से माता न्यायालय में भरण पोषण की राशि के लिए आवेदन या वाद प्रस्तुत कर सकती है।

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