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जिस भूमि पर आप 15 वर्ष से मकान बना कर काबिज हैं उस से आप को बेदखल नहीं किया जा सकता।

rp_property.jpgसमस्या-

हितेश शर्मा ने दवाना, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी द्वारा 1997 में 40×108 का प्लाट ख़रीदा गया था और उसकी रजिस्ट्री भी करवा ली गई किन्तु प्लाट सीधा न होने की वजह से सन 2000 में मकान बनाते वक़्त 743 वर्ग फीट जमीन और खरीदनी पड़ी जिसका सिर्फ 50 रूपए के स्टाम्प पर विक्रय अनुबंध हुआ था जिसकी नोटरी भी नहीं की गई थी। किन्तु आज सन 2015 में प्लाट मालिक के मन में बेईमानी आ गई है और वह कहता है कि यह 743 वर्ग फीट जगह मेरी है। क्या मेरे द्वारा न्यायालय में केस दायर किया जा सकता है? क्या उक्त जमीन की रजिस्ट्री विक्रय पत्र के आधार पर मेरे नाम से हो सकती है? यहाँ मैं आपको इस बात से अवगत करना चाहूँगा कि सन २०१२ में मेरे पिताजी की म्रत्यु हो चुकी है और उक्त पूरी जमीन पर मेरे पिताजी द्वारा सन 2000 में ही मकान बनाकर कब्ज़ा ले लिया गया था और पिछले 15 वर्षो से हम यहाँ निवास कर रहे हैं।

समाधान

वैसे तो आप के पास एक विक्रय अनुबंध है। हम ने वह देखा नहीं है। लेकिन उस विक्रय अनुबंध में यह तो अंकित होगा कि जमीन का स्वामी इतने रुपए में अमुक जमीन आप के पिता को विक्रय कर रहा है और उस की कीमत उस ने प्राप्त कर ली है और कब्जा दे दिया है, जब भी आप के पिता चाहेंगे वह विक्रय पत्र की रजिस्ट्री करवा देगा। उस के बाद आप के पिता जी ने उस जमीन पर सन् 2000 में ही मकान बना लिया।

ब स्थिति यह है कि जमीन का मालिक रजिस्ट्री कराने से इन्कार कर रहा है। उस विक्रय अनुबंध के आधार पर जो कि सन् 2000 का है अब विक्रय पत्र निष्पादित कर उस की रजिस्ट्री कराने का विशिष्ट अनुपालन का वाद आप नहीं कर सकते क्यों कि उस की मियाद निकल चुकी है। यदि वाद करेंगे तो वह मियाद के आधार पर निरस्त हो जाएगा।

लेकिन उक्त जमीन पर आप का कब्जा है। जमीन की कीमत अदा करना अनुबंध में लिखा तो ठीक है न लिखा है तब भी ठीक है। उस अनुबंध का आंशिक पालन आप के पिता को जमीन का कब्जा सौंप कर कर दिया गया है। विगत 15 वर्ष में कोई आपत्ति भी उस पर नहीं हुई है, आप 15 वर्षों से उस जमीन पर मकान बना कर रह रहे हैं और काबिज हैं। संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53 ए में यह प्रावधान है कि यदि संविदा का आंशिक पालन हो गया हो और स्थाई संपत्ति का कब्जा दे दिया गया हो तो उस के कब्जे में दखल नहीं दिया जा सकता। यह एक तरह की प्रतिरक्षा का सिद्धान्त है। अर्थात यदि कोई आप के विरुद्ध कब्जे का दावा करे तो आप अपनी प्रतिरक्षा में इसे काम में ले सकते हैं। इस तरह जमीन का विक्रेता आप के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही करे तो आप इस प्रतिवाद के साथ अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं। हमारे विचार में आप को कोई वाद नहीं करना चाहिए और जो उस जमीन पर अपना हक बता रहा है उसे कानूनी कार्यवाही करने देनी चाहिए। आप यह मजबूत प्रतिवाद कर सकते हैं।

दि किसी तरह से यह प्रतिवाद असफल होता दिखे तो भी आप 15 वर्ष से उस जमीन पर मकान बना कर रह रहे हैं। किसी ने आपत्ति नहीं की है। यदि यह मान लिया जाए कि कोई संविदा नहीं हुई थी तो भी आप के मकान का बनना उस जमीन के मालिक की अनुमति से था। जो एक तरह का लायसेंस है। यदि कोई लायसेंस वाली भूमि पर स्थाई निर्माण करवा लेता है तो वह लायसेंस अनिरस्तनीय (irrevocable) है। इस आधार पर भी आप से उस जमीन का कब्जा वापस नहीं लिया जा सकता।

दि जमीन का मालिक कोई जोर जबर वाला व्यक्ति हो जबरन कुछ करने की संभावना हो तो आप इस आधार पर इस आशय की निषेधाज्ञा का वाद कर सकते हैं कि आप15 वर्ष से उस जमीन पर मकान बना कर रह रहे हैं और वह आप को बेदखल करना चाहता है इस कारण वह बिना किसी कानूनी तरीके से आप को जबरन बलपूर्वक बेदखल न करे। इस वाद में आवेदन प्रस्तुत करने पर आप को इसी आशय की निषेधाज्ञा भी मिल सकती है।

नियमित पद के लिए चयन में संविदा नियुक्ति का कोई लाभ नहीं मिल सकता।

rp_empcontract.jpgसमस्या-

कमल ने उदयपुर, राजस्‍थान से समस्या भेजी है कि-

मैं वर्तमान में नगर पालिका में 06 वर्षो से कम्‍प्‍यूटर ऑपरेटर के पद पर कार्यरत हूँ तथा अभी 02 माह के बाद स्‍वायत शासन विभाग द्वारा क0 लिपिक की भर्ती निकाली जा रही है। जिस में हमारी सेवा का हमें कोई लाभ नहीं दिया गया है। उक्‍त भर्ती एक्‍जाम के द्वारा होगी। इस सन्‍दर्भ में मार्गदर्शन प्रदान करें कि भर्ती पर मेरे द्वारा न्‍यायालय से स्‍थगन प्राप्‍त किया जा सकता है या नहीं? अगर स्‍थगन लगाया जा सकता है तो क्‍या विधि रहेगी?

समाधान

प ने यह स्पष्ट नहीं किया कि आप पिछले छह वर्ष से किस तरह सेवा में हैं। हमारा सोचना है कि आप की यह नियुक्ति संविदा नियुक्ति रही होगी। संविदा नियुक्ति में स्पष्ट होता है कि उन्हें संविदा पर निश्चित अवधि तक के लिए काम करने को रखा गया है। यह निश्चित अवधि समाप्त होने पर नयी संविदा नियुक्ति दे दी जाती है। संविदा नियुक्ति में नियुक्ति पत्र में ही यह अंकित होता है कि कर्मचारी की नियुक्ति एक निश्चित अवधि के लिए है और उस के बाद सेवाएँ स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। इस कारण से आपको इस नौकरी का कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलेगा। इतना अवश्य है कि साक्षात्कार में यह ध्यान रखा जा सकता है कि आप के पास छह वर्ष तक कार्य करने का अनुभव है।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि सभी सरकारी और अर्ध सरकारी सेवा में स्थाई कर्मचारियों को नियम के अनुसार परीक्षा ले कर तथा साक्षात्कार ले कर नियोजन देना चाहिए। सरकारी नौकरियों पर सभी का अधिकार है और उन नौकरियों के लिए चयन प्रतियोगिता के माध्यम से ही होना चाहिए। इस कारण से यदि आप ने संविदा नियुक्ति पर कार्य किया है तो उस का लाभ स्थाई सरकारी सेवा के लिए नहीं दिया सकता है। हमारी राय में आप को चयन प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए और स्वयं को प्रतियोगिता में योग्य सिद्ध करते हुए यह नौकरी हासिल करनी चाहिए। उस के अलावा कोई मार्ग शेष है। इन नियुक्तियों पर आप के द्वारा स्थगन लेना लगभग असंभव है।

लीज अवधि समाप्त होने के पहले नई संविदा कर लीज की अवधि बढ़वाएँ।

housing colonyसमस्या-

श्रीकान्त वाजे ने इन्दौर मध्य प्रदेश से पूछा है-

हमारे मकान के भूखंड की लीज 99 वर्ष की है जो 8 वर्ष बाद समाप्त हो जाएगी।  उस के बाद क्या होगा?  बाद में भी यह हमारा बना रहे इस के लिए क्या करना चाहिए?

समाधान-

लीज का अर्थ है, किराएदारी। आप जब किसी भी अवधि के लिए किसी संपत्ति को चाहे वह भूखंड हो, फ्लेट हो या फिर कोई अन्य चल अचल संपत्ति, लीज पर दिया और लिया जाता है तो लीज की अवधि तक यह संपत्ति किराए पर दी और ली गई होती है। लीज पर किसी संपत्ति के प्राप्त हो जाने पर लीज पर लेने वाले का अधिकार केवल लीज की अवधि तक ही सीमित रहता है।

लेकिन अचल संपत्तियों के लिए लीज के सम्बन्ध में संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम स्पष्ट उपबंध करता है अचल संपत्ति के लिए लीज किसी एक अवधि के लिए साम्पत्तिक अधिकारों का हस्तान्तरण है। लीज मासिक और वार्षिक हो सकती है। वार्षिक लीज का आरंभ केवल एक पंजीकृत दस्तावेज के माध्यम से ही हो सकता है। जब लीज की अवधि समाप्त हो जाती है तो संपत्ति को लीज पर लेने वाले व्यक्ति का उस संपत्ति पर अधिकार समाप्त हो जाता है। लीज अवधि की समाप्ति के उपरान्त संपत्ति का स्वामी कभी भी लीज पर लेने वाले व्यक्ति को लीज की संपत्ति से बेदखल कर सकता है।

वार्षिक लीज के मामले में संपत्ति को लीज पर लेने वाले व्यक्ति को छह माह पूर्व नोटिस दे कर संपत्ति पर से आधिपत्य त्यागने को कहा जा सकता है। इस नोटिस की अवधि समाप्त होने तक लीज पर लेने वाला व्यक्ति यदि संपत्ति पर अपना आधिपत्य नहीं छोड़ता और संपत्ति के स्वामी को नहीं लौटाता है तो संपत्ति का स्वामी उसे उस अचल संपत्ति से बेदखल करने के लिए न्यायालय में बेदखली और संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने का दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकता है।

देश में अधिकांश संपत्ति राज्य सरकारों द्वारा 99 वर्ष की लीज पर दी गई। है इस अवधि के समाप्त हो जाने के उपरान्त राज्य सरकार या उस की उपयुक्त एजेंसी लीज पर दिए गए व्यक्ति से संपत्ति से बेदखल करने की कार्यवाही कर के बेदखल कर सकती है।

लीज पर ली गई संपत्ति को पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए सब से उत्तम उपाय यह है कि आप राज्य सरकार की संबंधित एजेंसी को संपत्ति की लीज समाप्त होने के चार-पाँच वर्ष पहले ही आवेदन कर दें कि आप की लीज की अवधि समाप्त होने जा रही है उसे पुनः लीज पर दिया जाए। इस तरह कोई भी व्यक्ति लीज पर ली गई संपत्ति की अवधि नई लीज संविदा के माध्यम से अपनी लीज की अवधि को बढ़ा सकता है।

प को भी एक दो वर्ष के बाद ही या अभी से ही संपत्ति के स्वामी को आवेदन कर देना चाहिए कि आप की लीज की अवधि समाप्त होने की तिथि से अगले दिन से लीज की अवधि बढ़ाई जाए। यदि आप लीज ली हुई संपत्ति पर अपना आधिपत्य बनाए रखना चाहते हैं तो लीज की अवधि समाप्त होने के पहले आप को नई लीज संविदा करवा कर अपनी लीज अवधि बढ़वा लें।

अमानत को निज-उपयोग में ले लेना अमानत में खयानत का अपराध है।

समस्या-

करनाल, हरियाणा से अमरजीत ने पूछा है-

Havel handcuffमेरे पास किसी से कुछ पैसे अमानती तौर पर रखे हुए हैं।  मैंने उन्हें लिखित में दे रखा है कि- ” मैंने राजीव (काल्पनिक नाम) से 50,000.00 रूपये अमानती तौर पर लिए है और ये मेरे पास अब नहीं होने के कारन में इन्हें वापिस नहीं कर सकता लकिन मैं ये मेरे पास होने पर राजीव को लौटा दूंगा”। इस दस्तावेज पर मेरे, राजीव तथा दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं। मैं इस बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूँ-

1- क्या भुगतान के समय राजीव मुझ से ब्याज की मांग कर सकता है?

2- क्या राजीव मुझ पर किसी एक तारीख को पैसे लौटने का दबाव बना सकता है?

3-मेरे लिए पैसे लौटाने का कितना समय है?

4-मुझे पैसे किस तरीके से वापिस करने चाहिए नगद या चेक और भुगतान के समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए ताकि वह कल को मुझ से दोबारा पैसे न वसूल सके।

समाधान-

प ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि आप के पास राजीव की उक्त 50,000.00 रुपए की राशि अमानत के बतौर रखी है।  अमानत का अर्थ अमानत होता है। उसे सुरक्षित रखना होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की अमानत को व्यक्तिगत उपयोग में ले लेता है तो यह धारा 405 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत एक अपराध है जो धारा 406 के अंतर्गत दंडनीय है। ये दोनों उपबंध निम्न प्रकार है-

405. आपराधिक न्यासभंग–जो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अखत्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किए जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसको विहित करने वाली विधि के किसी निदेश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गई किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैघ संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराधिक न्यास भंग” करता है ।

1[2[स्पष्टीकरण 1–जो व्यक्ति 3[किसी स्थापन का नियोजक होते हुए, चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 17) की धारा 17 के अधीन छूट प्राप्त है या नहीं, तत्समय प्रवॄत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य-निधि या कुटुंब पेंशन निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किए गए अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है ।]

4[स्पष्टीकरण 2–जो व्यक्ति, नियोजक होते हुए, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राज्य बीमा निगम निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में, उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है ।]

दृष्टांत

(क) एक मॄत व्यक्ति की विल का निष्पादक होते हुए उस विधि की, जो चीजबस्त को विल के अनुसार विभाजित करने के लिए उसको निदेश देती है, बेईमानी से अवज्ञा करता है, और उस चीजबस्त को अपने उपयोग के लिए विनियुक्त कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(ख) भांडागारिक है । यात्रा को जाते हुए अपना फर्नीचर के पास उस संविदा के अधीन न्यस्त कर जाता है कि वह भांडागार के कमरे के लिए ठहराई गई राशि के दे दिए जाने पर लौटा दिया जाएगा । उस माल को बेईमानी से बेच देता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(ग) , जो कलकत्ता में निवास करता है, का, जो दिल्ली में निवास करता है अभिकर्ता है । और के बीच यह अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा है कि द्वारा को प्रेषित सब राशियां द्वारा के निदेश के अनुसार विनिहित की जाएगी । , को इन निदेशों के साथ एक लाख रुपए भेजता है कि उसको कंपनी पत्रों में विनिहित किया जाए । उन निदेशों की बेईमानी से अवज्ञा करता है और उस धन को अपने कारबार के उपयोग में ले आता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(घ) किंतु यदि पिछले दृष्टांत में बेईमानी से नहीं प्रत्युत सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि बैंक आफ बंगाल में अंश धारण करना के लिए अधिक फायदाप्रद होगा, के निदेशों की अवज्ञा करता है, और कंपनी पत्र खरीदने के बजाए के लिए बैंक आफ बंगाल के अंश खरीदता है, तो यद्यपि को हानि हो जाए और उस हानि के कारण, वह के विरुद्ध सिविल कार्यवाही करने का हकदार हो, तथापि, यतः ने, बेईमानी से कार्य नहीं किया है, उसने आपराधिक न्यासभंग नहीं किया है ।

(ङ) एक राजस्व आफिसर, के पास लोक धन न्यस्त किया गया है और वह उस सब धन को, जो उसके पास न्यस्त किया गया है, एक निश्चित खजाने में जमा कर देने के लिए या तो विधि द्वारा निर्देशित है या सरकार के साथ अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा द्वारा आबद्ध है । उस धन को बेईमानी से विनियोजित कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(च) भूमि से या जल से ले जाने के लिए ने के पास, जो एक वाहक है, संपत्ति न्यस्त की है । उस संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

406. आपराधिक न्यासभंग के लिए दंड–जो कोई आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

स तरह आप ने जो कुछ लिख कर राजीव को दिया है उस में अमानत होना और उसे अपने स्वयं के उपयोग में परिवर्तित कर लेने की आत्मस्वीकृति दी हुई है।  आप ने यह भी लिखा है कि अभी मैं लौटा नहीं सकता लेकिन मेरे पास होने पर लौटा दूंगा।  इस तरह आप ने धारा 406 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध स्वीकार किया हुआ है। राजीव आप पर अमानत में खयानत अर्थात अपराधिक न्यास भंग के मामले में पुलिस को या न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत कर सकता है जिस में धारा 406 भा.दं.संहिता का मामला दर्ज किया जा सकता है। आप की गिरफ्तारी हो सकती है और आप के विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है जिस में आप को सजा हो सकती है।

लेकिन इस का बचाव भी है। बचाव यह है कि अपराध आप ने किसी एक व्यक्ति के प्रति किया है जिस ने उसे क्षमा कर दिया है। राजीव ने उक्त लिखत के माध्यम से आप के साथ एक संविदा की है जिस के द्वारा अमानत को उधार में बदल दिया गया है तथा उस राशि को लौटाने के लिए तब तक की छूट आप को दी है जब तक कि उतना पैसा आप के पास न हो। यदि आप के विरुद्ध कोई फौजदारी मुकदमा दर्ज हो ही जाए तो उक्त तर्क के आधार पर न्यायालय आप को जमानत प्रदान कर देगा।  इसी आधार पर प्रथमसूचना रिपोर्ट भी रद्द हो सकती है।

ह आप से ब्याज नहीं ले सकता।   क्यों कि इस लिखत में ब्याज लेने की कोई बात नहीं है।  वह आप से रुपए मांग सकता है और कह सकता है कि आप निर्धारित समय में उक्त रुपया लौटाएँ अन्यथा वह आप पर धारा 406 का परिवाद करेगा और रुपया वसूलने की कार्यवाही अलग से करेगा।

मेरी आप को सलाह है कि इस जिम्मेदारी को जितना जल्दी हो आप पूरा कर दें। राजीव का पैसा लौटा दें और उस की रसीद ले लें तथा आप के द्वारा लिखा गया उक्त दस्तावेज अवश्य वापस ले लें।  रसीद और उक्त दस्तावेज लौटाए जाने की स्थिति में रुपये का भुगतान किसी भी प्रकार से चैक या नकद किया जा सकता है।  पर यदि आप यह भुगतान अकाउण्ट पेयी चैक से करें तो सब से बेहतर है। यदि वह अकाउंट पेयी चैक से भुगतान प्राप्त करने को तैयार न हो तो उसे बैंक ड्राफ्ट से भुगतान कर सकते हैं।

संविदा के आंशिक पालन में दिया गया अचल संपत्ति का कब्जा वापस नहीं लिया जा सकता।

समस्या-

साजा, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ से बबलू ने पूछा है-

मेरे पिताजी ने अपनी जमीन 12 वर्ष पूर्व बेच दी है लेकिन अभी तक रजिस्ट्री नहीं कराई है। क्या मैं अपनी जमीन को फिर से पा सकता हूँ? इस के लिए मुझे क्या करना होगा।

समाधान-

क्सर ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति अपनी अचल संपत्ति को किसी संविदा के अंतर्गत विक्रय कर देता है।  क्रेता उस संपत्ति का संपूर्ण विक्रय मूल्य अदा कर के संपत्ति पर कब्जा प्राप्त कर लेता है।  इस तरह से किसी भी अचल संपत्ति के स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं होता।  अचल संपत्ति का हस्तांतरण केवल विक्रय पत्र का पंजीयन कराने पर ही संभव है। इस तरह रेकॉर्ड में विक्रेता ही संपत्ति का स्वामी चला आता है। इस से विक्रेता के उत्तराधिकारियों में यह धारणा बनती है कि वे अपनी संपत्ति को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।

लेकिन संपत्ति का मूल्य विक्रेता को अदा कर दिए जाने और उस से कब्जा प्राप्त कर लेने से संविदा का आंशिक पालन हो चुका होता है। इस तरह के आंशिक पालन हो जाने पर संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 53-ए के अंतर्गत कब्जा लिए हुए क्रेता के पक्ष में यह उपबंध है कि संपत्ति को हस्तांतरित करने वाला व्यक्ति (विक्रेता) और उस के स्वत्व के अंतर्गत दावा करने वाले व्यक्ति क्रेता से उस संपत्ति का कब्जा प्राप्त नहीं कर सकते।

प के पिता ने जमीन क्रेता को हस्तांतरित कर दी है, कब्जा दे दिया है तो अब आप के पिता या उन के स्वत्व के अंतर्गत दावा करने वाले आप क्रेता को उस जमीन के कब्जे से बेदखल नहीं कर सकते। वैसे भी क्रेता का कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो चुका है तथा अवधि अधिनियम के अनुसार अब आप का कब्जा वापस प्राप्त करने का दावा अवधि बाधित हो चुका है। आप अपनी जमीन वापस प्राप्त नहीं कर सकते।

अनुबंध (Agreement) कितने रुपए के स्टाम्प पर होना चाहिए?

समस्या-

भोपाल, मध्यप्रदेश से राजेश ने पूछा है-

मैं ने एक व्यक्ति के साथ कोई इकरारनामा (एग्रीमेंट) किया है।  लेकिन यह सादा कागज पर है और उस में उस व्यक्ति के, मेरे तथा एक साक्षी के हस्ताक्षर हैं। आगे चल कर कोई विवाद होने पर क्या यह अनुबंध मान्य होगा? क्या इसे स्टाम्प पर कराना जरूरी है? यह कितने रुपए के स्टाम्प पर होना चाहिए? क्या इस के अलावा भी कुछ कराना होगा।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया है कि यह अनुबंध किस काम के लिए किया गया है और लिखत का विषय क्या है?  यूँ मध्यप्रदेश स्टाम्प अधिनियम में अनुबंध पर कोई स्टाम्प ड्यूटी नहीं लगाई गई है।  लेकिन अनेक अनुबंध अन्य लिखतों की श्रेणी में आते हैं। जिन पर स्टाम्प ड्यूटी लगानी आवश्यक है। जब तक आप ये न बताएँ कि अनुबंध किस विषय से संबंधित है और उस लिखत को क्या कहा जा सकता है? तब तक यह बताना संभव नहीं है कि कितनी स्टाम्प ड्यूटी अदा करनी होगी? कितने मूल्य के स्टाम्प पर इसे लिखा जाना चाहिए और इस के अतिरिक्त क्या करना चाहिए। वैसे कोई भी लिखत नोटेरी से सत्यापित करवा लेनी चाहिए। इस से विवाद के समय उसे साबित करना आसान होगा। यदि आप लिखत ले कर सत्यापन के लिए किसी नोटेरी से संपर्क करेंगे तो वही बता देगा कि उसे कितने रुपए के स्टाम्प पर होना चाहिए। मध्यप्रदेश में किन किन लिखतों पर स्टाम्प ड्यूटी लगाई गई है और कितनी लगाई गई है यह आप यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

बिजली का कनेक्शन जिस के नाम है बकाया राशि का भुगतान भी उसी को करना होगा

समस्या-

मेरे पिताजी ने दुकान किराए पर दी थी।  जिसे किराएदार ने किसी और को आगे किराए पर दे दिया।  हम ने दुकान तो कोर्ट केस कर के खाली करवा ली।  लेकिन उस दुकान पर बिजली का बिल बकाया था।  जिस का हमें कुर्की का नोटिस आ रहा है।  बिजली कंपनी कहती है कि ये आप को भुगतान करना है।  आप बताएँ कि हम क्या कर सकते हैं?

-गुरविंदर सिंह, कोटा, राजस्थान

समाधान-

मुझे लगता है कि आप की समस्या यह है कि दुकान में बिजली का कनेक्शन आप ने लिया था और किराएदार को किराए पर परिसर देते समय आप ने उस के साथ जो कंट्रेक्ट किया उस में यह शर्त रख दी कि बिजली के बिलों का भुगतान वह स्वयं करेगा।  लेकिन किराएदार ने बिजली के बिलों का भुगतान नहीं किया और अब कंपनी आप से बिलों की बकाया राशि का भुगतान मांग रही है।

दि स्थिति ऐसी ही है कि आप की दुकान में कनेक्शन आप के नाम था तो बिजली कंपनी ने कनेक्शन आप को दिया था और बिजली कंपनी की संविदा आप के साथ थी।  ऐसी स्थिति में बिजली कंपनी आप के किराएदार को नहीं जानती थी।  वह तो आप को ही बिजली सप्लाई कर रही थी।  उस कनेक्शन के बिलों के भुगतान की जिम्मेदारी भी आप की ही थी, आप को बिजली की बकाया राशि का भुगतान करना ही होगा।  आप उस भुगतान की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।

लेकिन यदि बिजली का कनेक्शन आप के नाम न हो कर किराएदार के नाम था तो फिर बिजली कंपनी आप से बिजली के बकाया की राशि का भुगतान नहीं मांग सकती।   क्यों कि बिजली सप्लाई की संविदा किराएदार के साथ थी और बिजली के बकाया बिलों का भुगतान किराएदार ही करेगा।   आप पर उस का कोई दायित्व नहीं है।  आप उस दुकान में नया कनेक्शन ले सकते हैं।  यदि बिजली कंपनी नया कनेक्शन देने से इन्कार करती है तो इस के लिए न्यायालय से आदेश प्राप्त किया जा सकता है।  आप ने किराएदार के विरुद्ध दुकान को खाली कराने का मुकदमा जीता है और दुकान खाली कराई है।  इस काम के लिए आप ने अवश्य ही किसी वकील की सेवाएँ प्राप्त की होंगी।  आप को उन्हीं वकील से इस मामले में सलाह करनी चाहिए।

फर्जी मुकदमों का मुकाबला करें? और दोषी को दंडित कराएँ?

समस्या-

तीन वर्ष पहले एक प्लाट खरीदने के लिये मैं ने अपने ससुर के कहने में आकर उनके एक परिचित विक्रेता को ढाई लाख रूपये अग्रिम दिये।  6 महीने तक प्लाट ना मिलने पर पता चला कि हमारे साथ धोखा हुआ है। परिचितों  द्वारा दबाव बनाने पर जनवरी 2011 में विक्रेता ने हमें ढाई लाख रूपये के पचास पचास हजार रूपये के पांच चैक जून 2011 के दिये जो कि मेरे ससुर जी के नाम के थे,  साथ में नोटेरी भी करा ली जिसमें मै गवाह हूं।  जून 2011 में चैक का समय आने पर भी जब पैसा नही ​मिला तो मेरे ससुर ने चैक बैंक में डाले जो बाउंस हो गये। ससुर जी बताते हैं कि उन्हों ने अपने परिचित पर चैक बाउंस के पांच मुकदमे कर दिये हैं जो विचाराधीन हैं पर, उन्होने हमें मुकदमे लडने या दिखाने और बताने से भी इंकार कर दिया।  चैक और ओरिजनल नेाटेरी ससुर जी के पास थी। अब हमें ये अंदेशा हो गया कि उनके मन में बेईमानी आ गयी है और हमारी स्थिति आसमान से गिरा खजूर में अटका वाली हो गयी है। इस के बाद में हमारे बीच में झगडा हुआ जिसमें हमने कोर्ट की शरण ली और ससुर जी के विरूद्ध कोर्ट के माध्यम से रिपोर्ट दर्ज करा दी, जिससे बचने के लिए उन्हों ने हमसे फैसला किया कि हमारे ढाई लाख रूपये के मुकाबले वो हमें एक लाख रूपया देंगे और उसके बाद हमारा उस रूपये से कोई वास्ता नही रहेगा। इसकी बाकायदा नोटेरी हुई कचहरी में दो गवाहों के सामने और उन्होने हमें एक लाख रूपये दे दिये । हमने आपसी सहमति बनाते हुए उक्त मुकदमें मे आगे कोई कार्यवाही नही की और उसमें एफ आर लग गयी। जिसकी कापी मिलते ही मेरे ससुर साहब ने हम पर दो तीन फर्जी मुकदमे मारपीट और मेरी साली के अपहरण के प्रयास का दर्ज करा दिए और उनकी मंशा अब उन दिये गये एक लाख रूपये को वापस लेने की है जिसके कारण वे मुझे परेशान करने के लिये फर्जी मुकदमें दर्ज करा रहे हैं। क्या मैं उस समझौते से मुकरते हुए अपने बाकी डेढ लाख रूपये के लिये केस कर सकता हूं? नो​टरी की क्या अहमियत है? 100 रुपए के स्टांप पर जबकि उसी दिन दो नेाटरी हुई एक साथ, एक जगह जिसमें उनके पूरे परिवार के दस्तखत हैं।

सी मसले से जुडा एक और सवाल है कि मेरे ससुर ने मेरे खिलाफ अखबारो में उल्टी सीधी खबरें छपवाई जैसे कि मेरे कोई लडका ना होने के कारण मैं उनकी छोटी लडकी से शादी करना चाहता हूँ।  मैं ने नौकरी पाने के लिए अपने पिता का कत्ल किया शक है, मैने अपने भाई की जायदाद बेचकर उनके बच्चो को कुछ नहीं दिया, आदि अर्नगल बातें । ये सब मेरे विभाग में लिखित में दी गयी हैं और मुझे उनकी कापी मिली है और वे सब बिना सबूत के मिथ्या हैं और उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि उन्होने ऐसा क्यों कहा। मैं ने उन पर मानहानि का दावा करने के लिये नोटिस भेजा जो उन्होने लिया पर जबाब नही दिया।  मेरे पास पर्याप्त सबूत हैं कि उन्होने ये सब जान बूझकर मेरी समाज में इज्जत खराब करने के लिये किया है। मैं यदि मानहानि का मुकदमा करूँ तो उस में क्या हो सकता है? दूसरा मानहानि के दावो में दीवानी और फोजदारी का क्या प्रोसेस है?

सी से जुडा एक और सवाल ………..मेरी शादी 2004 में हुई और मेरी एक छोटी साली की 2007 में। मेरे ससुर ने अपने विभाग में शादी के लिये अनुदान पाने के लिये 2008 में आवेदन किया।  जिसमें दोनेा के शादी के फर्जी कार्ड और सभासदो की मोहर लगे कागज दिये।  अनुदान का आवेदन निरस्त हो गया पर क्या जो फर्जी कूटरचना करके उन्होने धोखाधडी का प्रयास​ किया क्या इसके लिये उन पर कोई कार्य वाही हो सकती है?

स सारे प्रकरण में मेरी धर्मपत्नी मेरे साथ है और अपने पिता से वही लड़ रही है। मैं ने विश्वास के कारण जो ग​लतियां की हैं उन्हें पढकर लोग संभल जायें और मुझे भी कानूनी प्र​क्रिया में कुछ सहारा मिले।  जिस से मेरे ससुर जो फर्जी मुकदमें कर रहे हैं उन में मै अपनी सच्चाई के साथ खडा रह कर मुकाबला कर सकूं और उन्हें उनके किये की सजा दिलवा सकूं। मेरे पास जो नेाटरी है उसमें उन्होने स्वीकार किया है कि किस तरीके से उन्होने मध्यस्थता करते हुए चैक अपने नाम कटवा लिये और अब उनके बदले मुझे एक लाख दे रहे हैं।

-राम प्रकाश, जगाधरी, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प ने जिस व्यक्ति को भूखंड खरीदने के लिेए ढाई लाख रुपए दिए उस से भूखंड खरीदने का या रुपए एडवांस प्राप्त करने का कोई एग्रीमेंट जरूर लिखा होगा और वह आप के पास होना चाहिए। यदि ऐसा एग्रीमेंट या उस की रसीद और यदि ढाई लाख रुपए चैक से दिए हैं तो उस का आप के बैंक खाते में इंद्राज अवश्य होगा। उक्त राशि में से एक लाख रुपया आप को वापस मिल चुका है लेकिन अभी डेढ़ लाख रुपया बकाया है। आप उस व्यक्ति तथा आप के ससुर के विरुद्ध एक मुकदमा उक्त डेढ़ लाख रुपए की वसूली के लिए दीवानी वाद दायर कर सकते हैं। इस तरह आप के ससुर ने और उस व्यक्ति ने मिल कर आप से धोखाधड़ी कर के जो रुपए ऐंठें हैं उस के लिए भी आप उक्त दोनों के विरुद्ध न्यायालय में धारा 420 भा.दं.संहिता के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

नोटेरी के यहाँ जो भी दस्तावेज निष्पादित किया जाता है उस का सत्यापन मात्र होता है। नोटेरी का महत्व सिर्फ इतना ही होता है कि पक्षकारों के मध्य जो भी अनुबंध लिखा गया है वह दोनों के बीच एक सच्चा अनुबंध है। एक नोटेरी के समक्ष एक ही दिन एक ही समय कई दस्तावेज सत्यापित किए जा सकते हैं। उन सब दस्तावेजों में जो कुछ अंकित है उसी से पता लगाया जा सकता है कि मामला क्या है? और यदि अनुबंध के अनुसार किसी पक्षकार ने बर्ताव नहीं किया है तो क्या कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। यदि ऐसी कानूनी कार्यवाही संस्थित होती है तो न्यायालय में नोटेरी के समक्ष सत्यापित दस्तावेजों को नोटेरी और दस्तावेज के गवाहों के माध्यम से उन्हें प्रमाणित किया जा सकता है।

प के ससुर जी ने अखबार में जो खबरें छपवाई हैं वे अपमान जनक हैं। उन के आधार पर मानहानि के संबंध में फौजदारी और दीवानी दोनों कार्यवाहियाँ संस्थित की जा सकती हैं। मानहानि के दीवानी वाद में आप हर्जाने के रूप में धन मांग सकते हैं जिसे न्यायालय आप को दिला सकता है।मानहानि का दीवानी दावा कर ने के लिए आप को न्यायालय में हर्जाने का दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं, वहीं फौजदारी प्रकरण चलाने के लिए आप न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप के बयान लेने के उपरांत आप के ससुर को समन भेज कर न्यायालय में बुलाया जाएगा और उन्हें जमानत करवानी पड़ेगी। उस के बाद विचारण आरंभ होगा जिस में आप के ससुर को कारावास और जुर्माने के दंड से दंडित किया जा सकता है।

प के ससुर द्वारा उन के विभाग से अनुदान या ऋण प्राप्त करने के लिेए आवेदन के साथ जो फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं, उस के लिए आवेदन निरस्त हो जाने के बाद भी विभाग उन के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकता है तथा उन के विरुद्ध फर्जी दस्तावेज बनाने के लिए पुलिस में भी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। अनुशासनिक कार्यवाही और फौजदारी प्रकरण दोनों में आप के ससुर को दंड मिल सकता है।

प के पास जो भी दस्तावेज और साक्षी हैं उन के आधार पर आप ससुर द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमें में अपना बचाव कर सकते हैं और उन के विरुद्ध कार्यवाही कर के उन्हें दंडित भी करवा सकते हैं और अपना रुपया भी वसूल कर सकते हैं।

अचल संपत्ति क्रय करने पर क्रेता को क्या खर्चे देने होंगे?

समस्या-

मैं एक मकान खरीदना चाहता हूँ। उस मकान की कीमत अदा करने के अतिरिक्त मुझे और क्या क्या खर्चे देने होंगे? कृपया बताएँ?

-प्रमोद कुमार, पानीपत, हरियाणा

समाधान-

ब भी किसी संपत्ति के क्रय विक्रय का सौदा होता है तो दोनों पक्ष क्रेता और विक्रेता मिल कर तय करते हैं कि लेन-देन क्या होगा और किस तरह होगा?   मकान, दुकान, खेत आदि अचल संपत्ति के क्रय विक्रय का सौदा करना हो तो यह देखा जाना चाहिए कि बेची-खरीदी जा रही संपत्ति पर कोई भार तो नहीं है, जैसे, उस संपत्ति पर कोई कर्ज तो नहीं ले रखा है, किसी सरकारी विभाग का कोई टेक्स आदि तो बकाया नहीं है। जब भूमि फ्री-होल्ड की होती है तो उसे बिना किसी की अनुमति के बेचा जा सकता है। लेकिन यदि पट्टे (लीज होल्ड) की संपत्ति हो तो उस में पट्टाकर्ता (लेसर) की अनुमति लिया जाना आवश्यक है। यदि पट्टाकर्ता ऐसी अनुमति प्राप्त न की गई हो तो खरीददार विक्रय पत्र के पंजीयन के बाद जब उस संपत्ति का नामान्तरण अपने नाम कराने जाएगा तो उसे भारी जुर्माना राशि अदा करनी पड़ सकती है।

ब भी संपत्ति का मूल्य तय करने की बात होती है तो आम तौर पर उस का बाजार मूल्य ही तय होता है।  यदि संपत्ति पर किसी तरह का भार हो और उस भार की अदायगी विक्रेता को करनी होती है, तब विक्रय मूल्य उस के बाजार मूल्य के समान तय होता है। लेकिन यदि किसी संपत्ति पर भार हो और उस की अदायगी क्रेता को करनी हो तो संपत्ति का क्रय मूल्य उसी अनुपात में कम हो जाता है। इस तरह यह दोनों पक्षों के बीच हुई विक्रय की संविदा पर निर्भर करता है कि किसे क्या देना और करना है। किसी भी सौदे में संपत्ति पर भारों की समस्त देनदारी विक्रेता की ही मानी जाएगी। क्यों कि क्रेता तो संपत्ति को समस्त भारों से रहित ही खरीदता है और विक्रेता को केवल संपत्ति का मूल्य और विक्रय पत्र के पंजीयन का खर्च अदा करता है। इस के अलावा जो भी खर्चे होते हैं उन की अदायगी विक्रेता का दायित्व है। यदि विक्रय पत्र के पंजीयन के लिए किसी तरह का कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था से प्राप्त करना आवश्यक हो तो उसे प्राप्त करने की जिम्मेदारी भी विक्रेता की है। लेकिन यदि विक्रय संविदा में यह तय हो गया हो कि यह खर्च क्रेता वहन करेगा तो यह सब खर्च फिर क्रेता का दायित्व हो जाता है।  यदि सौदे में कुछ भी न लिखा हो तो फिर यह सब खर्चे विक्रेता की जिम्मेदारी होंगे। वैसे भी किसी क्रेता को इसी शर्त पर ही कोई सौदा करना चाहिए कि वह केवल विक्रय मूल्य अदा करेगा तथा विक्रय पत्र के पंजीयन का खर्च उठाएगा, शेष सभी जिम्मेदारियाँ विक्रेता पर छोड़नी चाहिए। इसी के आधार पर संपत्ति का विक्य मूल्य तय करना चाहिए।

ब क्रेता विक्रेता की किसी जिम्मेदारी को ले लेता है तो अक्सर वह फँस जाता है। उसे वह जिम्मेदारी पूरी करनी होती है और विक्रेता निर्धारित अवधि में पूरा विक्रय मूल्य अदा करने पर दबाव डालता है। लेकिन यदि जिम्मेदारी विक्रेता की हो तो वह सारी जिम्मेदारियाँ पूरी करने  के उपरान्त ही क्रेता से पूरा मू्ल्य वसूल करने और विक्रय पत्र का निष्पादन करने की बात कह सकेगा। यदि तय समय में विक्रेता संपत्ति के विक्रय से पूर्व की सारी औपचारिकताएँ पूर्ण नहीं कर पाता है तो क्रेता सौदा निरस्त कर के क्रेता से उसे अदा कर दी गई अग्रिम राशि और हर्जाना वसूल करने की स्थिति में होता है। यदि किसी क्रय-विक्रय संविदा में अनापत्ति प्रमाण पत्र सहित समस्त खर्चो के मामले में कुछ भी नहीं तय हुआ है तो वे सभी खर्च उठाने की जिम्मेदारी विक्रेता की है।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती : सर्वोच्च न्यायालय

ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन अधिनियम 1970 के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इस कानून का निर्माण उद्योगों में ठेकेदार श्रमिकों को नियोजित करने की प्रथा का उन्मूलन करने के लिए हुआ है। यह सही है कि इस का उपयोग इस काम के लिए किया जा सकता है। लेकिन उस के लिए प्रक्रिया इतनी दुष्कर बना दी गई है और निर्णय करने का अधिकार केन्द्र/राज्य सरकारों को प्रदान किया गया है कि इस प्रथा का उन्मूलन किया जाना असंभव जैसा हो चुका है। सब से पहले तो कोई इस के लिए तथ्य एकत्र करे, फिर राज्य सरकार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। फिर राज्य सरकार इस प्रश्न पर आवेदनकर्ता और उद्योग के स्वामियों/प्रबंधकों की सुनवाई करे। आवेदक का उद्योग के श्रमिकों का उचित प्रतिनिधि होना भी आवश्यक है। कानून बना कर ठेकेदार श्रमिक प्रथा का उन्मूलन करने की शक्तियाँ सरकार को प्रदान कर देने के कारण न्यायालय भी इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकते क्यों कि उन्हें इस का क्षेत्राधिकार ही नहीं है।
स कानून का उपयोग नियोजकों द्वारा श्रमिकों के विरुद्ध किया जा रहा है। नियोजक अपनी प्रत्येक स्थाई और नियमित प्रकृति की आवश्यकताओं के लिए श्रमिकों को नियोजित करते हैं, उन का चयन स्वयं करते हैं, उन्हें वेतन भी नियोजक का कार्यालय ही देता है और उन के कार्यों पर नियंत्रण भी नियोजक का ही होता है। लेकिन कागजों में उन्हें ठेकेदार का कर्मचारी बताया जाता है। ऐसे श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तक प्राप्त नहीं होती, यदि वे कानूनी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं तो नियोजक तुरंत कहते हैं कि श्रमिक उन के कर्मचारी न हो कर ठेकेदार के कर्मचारी हैं। विवाद बढ़ता दिखाई देता है तो ठेकेदार का ठेका समाप्त कर दिया जाता है और उस के साथ ही इन श्रमिकों का नियोजन समाप्त हो जाता है।
क सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति बनाम विनोद कुमार शर्मा के मामले में निर्णय पारित करते हुए कहा है कि न्यायालय कानून के इस तरह के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं कर सकता वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती। इस मामले में नियोजक द्वारा ठेकेदार के कर्मचारी घोषित किए गए श्रमिकों को मूल उद्योग के कर्मचारी घोषित करते हुए उन्हें मूल उद्योग में मिलने वाली सुविधाएँ दिलाने के श्रम न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराया गया है।
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