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पिता की स्वअर्जित संपत्ति में उन के जीवनकाल में किसी का अधिकार नहीं।

समस्या-

श्वेता ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है

मेरी बड़ी दीदी की शादी जबलपुर में हुई है उनको 25 साल हो गये। शादी के बाद से जीजाजी मज़दूरी करते हैं इसलिए ज़्यादा इनकम नहीं होती जिससे कि वो अपना स्वयं का घर बना सकें। लेकिन उनके फादर का बहुत बड़ा मकान है, उनकी 3 बेटियाँ हैं जिस में से एक बेटी ने शादी नहीं की हैं और वह जबलपुर हाईकोर्ट में एडवोकेट भी है। 4 बेटे हैं जिस में से किराए के मकान में रहते हैं। उनकी बेटी जो एडवोकेट है और 45 वर्ष  की है ने उनको घर से निकालने के लिए उच्च न्यायालय में  मुक़दमा कर दिया है की मेरी दीदी उनको गाली देती है, लड़ाई करती है इसलिए हम इनको अपनी प्रॉपर्टी से बेदखल करते हैं। इनसे हमारा कोई लेना देना नहीं है। मेरी दीदी हमेशा से ही अत्याचार सहते आई है, उसे कई बार मारा पीटा भी, लेकिन उसने कभी कोई एक्शन नहीं लिया। हमेशा इज़्ज़त को लेकर चलती थी जिसकी वजह से उन्हें आज ये सब देखना पड़ रहा है? क्या बेटे का अपने पिता की संपत्ति पर कोई हक नहीं होता? यदि पिता चाहे तो ही उसे हक मिलेगा और न चाहे तो नहीं? क्या फादर की इच्छा से ही प्रॉपर्टी का बटवारा हो सकता है।

समाधान-

प की बहिन की समस्या का हल आप को संपत्ति के बंटवारे में  नजर आता है। लेकिन यह संपत्ति तो आप के जीजाजी को तभी मिल सकती है जब कि वह संपत्ति सहदायिक हो और उस में आप के जीजाजी का हक हो। तीसरा खंबा पर आप सर्च करेंगी तो आप को यह मिल जाएगा कि संपत्ति सहदायिक कब हो सकती है। यदि यह संपत्ति 60-70 वर्ष पुरानी है और 17 जून 1956 के पूर्व आप के जीजाजी के पिता या उन के पिता या दादा जी को उन के पिता से उत्तराधिकार में  मिली हो तो ही वह सहदायिक हो सकती है।

यदि आप के जीजाजी के परिवार की यह संपत्ति सहदायिक है तो उस में जन्म से आप के जीजाजी का अधिकार हो सकता है और आप के जीजाजी उस का बंटवारा करने तथा अपने हिस्से की संपत्ति पर कब्जा प्राप्त करने का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप के जीजाजी को दीवानी कानून के जानकार किसी अच्छे वकील से मिल कर अपनी समस्या बतानी चाहिए।

लेकिन यदि उक्त संपत्ति आप के जीजाजी के पिता की स्वअर्जित संप्तति हुई तो उस में आप के जीजाजी का कोई हक नहीं है और उन्हें उस संपत्ति से पिता के जीवनकाल में कुछ नहीं मिलेगा। यदि पिता उन की संपत्ति की कोई वसीयत कर गए और उस में आप के जीजाजी को कुछ नहीं दिया तो उन्हें कुछ नही मिलेगा। यदि पिता की मृत्यु के उपरान्त कोई संपत्ति निर्वसीयती शेष रही तो उस में से आप के जीजाजी को कोई हिस्सा मिल सकता है।

 

सबूत मिल जाने पर अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र दुबाारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

सहदायिक संपत्ति में सन्तानों का जन्म से अधिकार है, पिता उसे किसी और को नहीं दे सकते।

समस्या-

नन्द किशोर ने देवरी, जिला सागर म.प्र. से समस्या भेजी है कि-


साल 1953 में मेरे पिताजी के पिताजी का देहांत होने के बाद पिताजी को दस एकड़ जमीन मिली। हम पांच भाई हैं, हमारे पिताजी ने उक्त जमीन हम तीन भाइयों में बराबर रजिस्टर्ड बटवारा द्वारा 2012 में बांट दी। मेरे दो भाईयों ने कोर्ट में केस लगाया है कि उक्त सम्पत्ति पैत्रिक है, मुझे भी हिस्सा चाहिए। पिताजी की कैंसर की बीमारी में हम तीनों भाइयों ने पैसा लगाया एवं सेवा की, मुझे सलाह दें।


समाधान-

प के पिताजी के इलाज में आप ने जो धन लगाया वह आप का कर्तव्य था। आप ने यह कर के कोई एहसान नहीं किया। वैसे भी आप जमीन पर काबिज हो कर उस का लाभ लेते रहे होंगे। इस कारण यह सोचना बन्द कर दें कि पिता  जी की बीमारी में धन लगाने से आप को कोई अधिकार उत्पन्न हो गया है।

1953 में परंपरागत हिन्दू अधिनियम प्रभावी था। इस कारण से आप को पिता को उन के पिता से मिली जमीन केवल आपके पिता की नहीं हुई अपितु वह एक सहदायिक संपत्ति हो गयी। जिस में आप के सभी भाइयों का जन्म से अधिकार उत्पन्न हो गया। इस कारण इस भूमि में आप के उन दो भाइयों का जिन्हें जमीन नहीं मिली है जन्म से अधिकार है। रजिस्टर्ड बँटवारे में आप के पिता ने उन के हिस्से की जमीन भी आप को दे दी है जो गलत है। आप के पिता केवल उन के हिस्से की जमीन का बंटवारा कर सकते थे। आप के दो भाई सही कर रहे हैं कि उन्हें पैतृक और सहदायिक भूमि में हिस्सा मिलना चाहिए।

पुश्तैनी संपत्ति जिस में संतानों का हक है, पिता द्वारा विक्रय किया जाना वैध नहीं है।

समस्या-

भोजपाल ने ग्राम पोस्ट धावरभाटा, मगरलोड, छत्तीसगढ़ समस्या भेजी है कि-


मैं एक बहुत बड़ी समस्या से जूझ रहा हूँ।  मेरे पिता के नाम की खेती की जमीन जो पैतृक थी उसे कुछ लोगों के द्वारा मेरे पिता की मानसिक स्थिति का फायदा उठकार बंधक की बात कहकर मेरे तथा परिवार के सदस्यों की बिना जानकारी व सहमति के रजिस्ट्री पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए गए हैं।  जिसकी जानकारी मुझे पंचायत के द्वारा प्रमाणीकरण सूचना पत्र प्रदान करने पर हुयी। उक्त रजिस्ट्री पत्र में 1.16 हेक्टेयर का प्रतिफल राशि को चेक के माध्यम से 1387000 रूपये देना दर्शाया गया है जो पूर्णतः कूटरचित व फर्जी है किसी प्रकार का चेक नहीं दिया गया है, न ही उनके खाते में पैसा डाला गया है। इसकी जानकारी होने पर मैंने पुलिस अधीक्षक कार्यालय में लिखित शिकायत की थी जिस पर प्रशासन ने चेक संबंधी कोई जाँच नहीं की और रजिस्ट्री पत्र को वैधानिक बताकर न्यायालय जाने हेतु पुलिस हस्तक्षेप अयोग्य पत्र दे दी। इस संदर्भ में मैंने पुलिस को वैधानिक बताये जाने का आधार व चेक संबंधी जानकारी आरटीआई के माध्यम से मांगा लेकिन मुझे कोई संतोसप्रद जानकारी नहीं मिली। मैंने कलेक्टर महोदय को पुनः जाँच के लिए शिकायत आवेदन किया। पुनः जाँच में अनावेदक क्रेता ने यह ब्यान दिया कि उसने 6 लाख रूपये में ये जमीन खरीदी है तथा पैसा नगद देना बताया।  चेक के माध्यम से नहीं। जबकि रजिस्ट्री पत्र में प्रतिफल राशि चेक के माध्यम से 1387000 रूपये मिलना दर्शया है जो कि कूटरचित है। लेकिन पुलिस विभाग द्वारा इस तरीके से धोखाधड़ी करने वालों पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गयी। सर मैं बहुत परेशान हूँ। मेरे पिता के नाम की सभी जमीन को धोखे से रजिस्ट्री करा लिए हैं क्योकि मैं, मेरा भाई और बहन बाहर पढाई करते थे इसलिए इसकी जानकारी हमें नहीं हुई। यदि जमीन उनके नाम हो गयी तो हम लोग रस्ते पर आ जायेंगे, मैं पूरी तरह से मानसिक रूप से परेशान हूँ और आर्थिक रूप से कमजोर भी। प्लीज सर मुझे सुझाव दे की मैं क्या करूँ?


समाधान-

पुलिस ने यदि जाँच करके मामले को पुलिस हस्तक्षेप योग्य नहीं माना है तो आप को चाहिए कि आप मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें।  रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रति प्राप्त करें तथा कलेक्टर के आदेश से जो जांच हुई है उस की तथा उस जाँच में दिए गए अनावेदक क्रेता के बयान की प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर उन्हें भी परिवाद के साथ प्रस्तुत करें। इस के लिए आप को स्थानीय किसी वकील की सेवाएँ प्राप्त करनी होंगी।

इस के अलावा समय रहते विक्रय पत्र की रजिस्ट्री को निरस्त करने के लिए आप को दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। क्यों कि कोई भी पिता पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में से अपनी संतानों के भाग को विक्रय नहीं कर सकता। इस आधार पर यह रजिस्ट्री निरस्त हो जाएगी। यही आपत्ति आप उक्त भूमि के राजस्व रिकार्ड के नामान्तरण की कार्यवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं।

पिता की संपत्ति में सन्तान का हिस्सा …

समस्या-

रश्मि ने भोपाल मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी को अपने पिता जी से संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी अब पिताजी उस की वसीयत सिर्फ मेरे भाई के नाम करना चाहते हैं। हम तीन बहनें हैं क्या इस संपत्ति में हम बहनों का भी अधिकार है।

 

 

समाधान-

दि आप के पिताजी को प्राप्त यह संपत्ति उन के पिताजी या दादा जी को उन के किसी पूर्वज से उत्तराधिकार में 17 जून 1956 के पूर्व प्राप्त हुई थी और तब से लगातार उत्तराधिकार में ही प्राप्त होती रही है तो वह संपत्ति सहदायिक हो सकती है और उस में आप का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन 17 जून 1956 के बाद कोई भी व्यक्तिगत संपत्ति उत्तराधिकार के आधार पर सहदायिक नहीं हो सकती। यदि ऐसा है तो आप के पिता जी को उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति उन की व्यक्तिगत हो सकती है, उस में उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होगा और उसे वे जिसे चाहें वसीयत कर सकते हैं। वैसी स्थिति में आप बहनों या भाई को कोई अधिकार उक्त संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। जिसे भी प्राप्त होगा वसीयत के कारण प्राप्त होगा।

पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति से पुनर्विवाह के कारण स्त्री को वंचित नहीं किया जा सकता

Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

दत्तक के सांपत्तिक अधिकार …

Hindu succession actसमस्या-

कृष्णगोपाल शर्मा ने देवगुढा बावडी, वाया जाहोता, तहसील आमेर,  जिला जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादाजी को उनके चाचाजी ने गोद ले रखा था। मेरे दादाजी की म़त्‍यु सऩ् 2003 में हो गई। हमने पंचायत से एक म़त्‍यु प्रमाण पत्र बनवाया जिसमें उनके दत्‍तक पिताजी का अंकन था,  कुछ समय बाद पता चला कि इनके (दादाजी के चाचाजी) पास कोई पैत़ृक जमीन नहीं है सो हमने अपने निज पिताजी के नाम से दूसरा म़ृत्यु प्रमाण पत्र बनवा लिया तथा उसके आधार पर हमारा जमीन में से नामांतकरण खुल गया। क्‍या इस तरह से एक ही व्यक्ति का म़त्‍यु प्रमाण पत्र दो अलग अलग पिताओं के नाम से बनना कानून की नजर में अपराध है? और क्‍या मेरे दादाजी को अपने वास्‍तविक पिताजी व दत्‍तक पिताजी दोनों की सम्‍पत्ति मिल सकती है या कानून केवल एक पिता की सम्‍पत्ति ही लेने के लिए कहता है।

समाधान-

जिस ने भी दादाजी की मृत्यु का प्रमाण पत्र बनवाया वह प्रक्रिया के अधीन बनवाया। इस प्रक्रिया में मृतक के संबंधी कुछ सूचनाएँ जन्म-मृत्यु पंजीयक को देते हैं उस के आधार पर मृत्यु दर्ज हो जाती है। जब उस से लाभ न हुआ तो कुछ सूचनाएँ परिवर्तित कर दूसरा प्रमाण पत्र बनाया इस का अर्थ है आप ने एक ही व्यक्ति की मृत्यु को दो बार रिकार्ड में अंकित करवाया। यह दंडनीय अपराध है और शिकायत होने पर इस मामले में कार्रवाई हो सकती है।

यदि कोई व्यक्ति गोद चला जाए और किसी सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में उस का कोई हिस्सा हो तो वह उसी का बना रहता है। गोद जाने से उस के उस हिस्से के स्वामित्व में कोई अंतर नहीं आता। लेकिन गोद जाने के बाद अपने मूल पिता से उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार खो देता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि गोद जाने वाला व्यक्ति दोनों तरह की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होता है। लेकिन ऐसा नहीं है।

हर व्यक्ति को ऐसा अधिकार होता है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति हो तो उस में तो किसी व्यक्ति का हिस्सा जन्म से ही मिल जाता है। जब कि उस के पिता, व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार का उस का अधिकार उन की मृत्यु पर उत्पन्न होता है। इसी तरह गोद गए व्यक्ति को जिस सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार मिल गया है वह तो उसी तरह बना रहता है। लेकिन उसे अपने गोद पिता व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार तो प्राप्त होता ही है लेकिन गोद पिता की सहदायिकी में भी हिस्सा प्राप्त करने का उस का अधिकार गोद लेते ही उत्पन्न हो जाता है।

पुश्तैनी संपत्ति में किसी को उस के हिस्से से बेदखल नहीं किया जा सकता।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

राहुल ने संजय नगर, बरेली, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता की मृत्यु सन 2015 में हुई है और अब मेरी माँ मुझे अपनी पुश्तैनी चल-अचल सम्पत्ति से बेदखल करना चाहती है। जबकि मेरे दादा जी जिन्दा है और उन्होंने न ही कोई वसीयत बनाई है और न ही उन्होंने मेरे पिता के नाम कोई जमीन की है।  मेरा मेरी मां से कोई झगड़ा नहीं है। मेरी माँ मेरी बहन के कहने पर ऐसा कर रही है हमारे परिवार में मेरी माँ, एक अविवाहित बहन, अविवाहित भाई, मैं स्वयं विवाहित हूँ। क्या मेरी माँ मुझे मेरी पुश्तैनी संपत्ति से बेदखल कर सकती है? कृपया कर मुझे समाधान अवश्य लिखे आपकी अति महान कृपा होगी।

समाधान-

बेदखल शब्द दखल से बना है। बेदखल करने का अर्थ है किसी के दखल को समाप्त करना। दखल शब्द का अर्थ संपत्ति के मामले में कब्जे से है न कि स्वामित्व से है।

पुश्तैनी या सहदायिक संपत्तियाँ बहुत कम अस्तित्व में रह गयी हैं। फिर भी जो भी पुश्तैनी और सहदायिक संपत्तियाँ हैं उन में किसी भी व्यक्ति को अधिकार कानून से मिलता है। सन्तान के जन्म लेते ही पुश्तैनी संपत्ति में उस का हिस्सा तय हो जाता है। इस हिस्से से उसे कोई भी बेदखल नहीं कर सकता है।

यदि कोई  पुश्तैनी संपत्ति है और उस में आप के पिताजी का कोई हिस्सा था तो उस का एक हिस्सा उत्तराधिकार में आप की माँ को भी प्राप्त हुआ होगा। वे अधिक से अधिक उस मां के पास जो हिस्सा है उस में से आप के उत्तराधिकार से आप को वंचित कर सकती हैं जो उन का अधिकार है। लेकिन आप को प्राप्त हुए हिस्से से आप को आप की माँ ही नहीं कोई भी वंचित नहीं कर सकता।

पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों को अधिकार

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

सुमन ने सोनीपत हरियाणा से पूछा है-

मैं 45 साल की विवाहित महिला हूँ। हम दो भाई व दो बहनें हैं।  मेरे पिता जी जीवित हैं। मेरे पिता के नाम गाँव कुण्डली में 20 एकड़ जमीन है जो कि मेरे पिता जी को मेरे दादा जी व दादा जी को उनके पिता जी से तथा आगे उनके पिता जी से उत्तराधिकार में मिली थी। ये पुश्तैनी जमीन है।  मैंने मेरे पिता जी व भाईयों को छ: साल पहले दस लाख रुपये उधार दिए थे। एक साल पहले मैंने मकान खरीदना था तब मैंने पिता जी व भाईयों से रुपये लौटाने को कहा तो उन्होंने मेरे रुपये देने से मना कर दिया तथा अब बोलचाल भी बन्द कर दी है। मेरे पति मुझे रुपये लाने को कहते है । परन्तु मैं मजबूर हूँ।  मैं बहुत दु;खी रहती हूँ। क्या पुश्तैनी जमीन में मेरा हिस्सा है?  यह जानना चाहती हूँ कि क्या मैं पिता के जीवित रहते पुश्तैनी जमीन में से मेरे हिस्से की जमीन ले सकती हूँ? मुझे क्या करना होगा तथा मुझे कितना हिस्सा मिल सकता है?  क्या मेरे पिता जी पुश्तैनी सारी जमीन मेरे भाईयों के नाम कर सकते है? कृपया उचित कानूनी सलाह दें।

समाधान-

दिनांक 09.09.2005 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के प्रभावी होने के पूर्व पुत्रियों को पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार नहीं था। किन्तु उक्त तिथि से सभी पुत्रियों को पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में उसी तरह अधिकार प्राप्त हो गया है जैसे कि पुत्रों को प्राप्त है। उक्त तिथि के उपरान्त जन्म लेने वाली पुत्रियों को यह अधिकार जन्म लेने के समय ही प्राप्त होने लगा है।

उक्त अधिनियम के अनुसार आप को भी अपने पैतृक परिवार की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में दिनांक 09.09.2005 से ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, अब आप भी उस सहदायिकी की एक सदस्य हैं। और आप अपने हिस्से को अलग करने की मांग कर सकती है। यदि उक्त तिथि के बाद सहदायिकी का कोई हिस्सा सहदायिकी से अलग किया गया हो तो उस में भी आप का अधिकार था।

आप तुरन्त बँटवारा कराने तथा अपना पृथक हिस्सा व उस पर कब्जा प्राप्त करने के लिए तुरन्त बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं।

पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार से वंचित करने के विरुद्ध वाद।

समस्या-

अखिल ने रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-rp_gavel5.jpg

कृपया हमारी शंका  का समाधान करें? क्या (1) यदि संपत्ति दादाजी के पिता की संपत्ति को बेचकर खऱीदी गयी थी तब वह संपत्ति पुश्तैनी मानी जायेगी। जिस पर हम सभी भाई बहनों का बराबर-बराबर अधिकार होगा (2) यदि संपत्ति  दादाजी ने अपनी कमाई से अर्जित की है तो क्या उस पर पिता का अधिकार है और वह चाहें तो उस संपत्ति को किसी को भी दे सकते हैं।

आशीष त्रिपाठी ने सिंगरौली मध्यप्रदेश से पूछा है-

क्या पिता के मृत्यु के पश्चात उस पुश्तैनी संपत्ति पर दावा किया जा सकता है जो पिता ने अन्य लोगों के नाम रजिस्ट्री कर चुका हो? यदि हाँ ! तो किस अधिनियम के तहत य

समाधान-

कोई भी संपत्ति पुश्तैनी या सहदायिक तभी मानी जाएगी जब कि वह 17 जून 1956 के पूर्व किसी पुरुष हिन्दू को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। यदि आप के दादा जी के पिता के पास वह संपत्ति उक्त तिथि से पूर्व उत्तराधिकार में आयी थी तो पुश्तैनी थी और उसे विक्रय कर के खरीदी गयी संपत्ति भी पुश्तैनी होगी और हर संतान का जन्म से उस में अधिकार होगा।

यदि संपत्ति दादा जी ने अपनी कमाई से खरीदी है और उन का देहान्त 17 जून 1956 के पूर्व हो गया था तो आप के पिता के पास वह संपत्ति पुश्तैनी होगी और उस में आप सभी भाई बहनों का भी अधिकार होगा। आप के पिता आप को उस अधिकार से वंचित कर के संपत्ति का विक्रय नहीं कर सकते थे। इस विक्रय को विक्रय की तिथि से 12 वर्ष की अवधि (मियाद) में दीवानी वाद कर के निरस्त कराया जा सकता है। यदि विक्रय के समय आप नाबालिग थे तो आप बालिग होने की तिथि से मियाद में ऐसा दावा कर सकते हैं। यदि आप को इस विक्रय की जानकारी न थी तो आप को जानकारी प्राप्त होने से मियाद में ऐसा वाद संस्थित कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी संपत्ति में उस के अधिकार से वंचित किए जाने के वि्रुद्ध वाद संस्थित करने की मियाद 12 वर्ष है। इसे मियाद अधिनियम में मिलने वाली छूटों के आधार पर कुछ और बढ़ाया जा सकता है। इस मामले में आप को किसी स्थानीय वकील से सलाह करना चाहिए।

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