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दत्तक के सांपत्तिक अधिकार …

Hindu succession actसमस्या-

कृष्णगोपाल शर्मा ने देवगुढा बावडी, वाया जाहोता, तहसील आमेर,  जिला जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादाजी को उनके चाचाजी ने गोद ले रखा था। मेरे दादाजी की म़त्‍यु सऩ् 2003 में हो गई। हमने पंचायत से एक म़त्‍यु प्रमाण पत्र बनवाया जिसमें उनके दत्‍तक पिताजी का अंकन था,  कुछ समय बाद पता चला कि इनके (दादाजी के चाचाजी) पास कोई पैत़ृक जमीन नहीं है सो हमने अपने निज पिताजी के नाम से दूसरा म़ृत्यु प्रमाण पत्र बनवा लिया तथा उसके आधार पर हमारा जमीन में से नामांतकरण खुल गया। क्‍या इस तरह से एक ही व्यक्ति का म़त्‍यु प्रमाण पत्र दो अलग अलग पिताओं के नाम से बनना कानून की नजर में अपराध है? और क्‍या मेरे दादाजी को अपने वास्‍तविक पिताजी व दत्‍तक पिताजी दोनों की सम्‍पत्ति मिल सकती है या कानून केवल एक पिता की सम्‍पत्ति ही लेने के लिए कहता है।

समाधान-

जिस ने भी दादाजी की मृत्यु का प्रमाण पत्र बनवाया वह प्रक्रिया के अधीन बनवाया। इस प्रक्रिया में मृतक के संबंधी कुछ सूचनाएँ जन्म-मृत्यु पंजीयक को देते हैं उस के आधार पर मृत्यु दर्ज हो जाती है। जब उस से लाभ न हुआ तो कुछ सूचनाएँ परिवर्तित कर दूसरा प्रमाण पत्र बनाया इस का अर्थ है आप ने एक ही व्यक्ति की मृत्यु को दो बार रिकार्ड में अंकित करवाया। यह दंडनीय अपराध है और शिकायत होने पर इस मामले में कार्रवाई हो सकती है।

यदि कोई व्यक्ति गोद चला जाए और किसी सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में उस का कोई हिस्सा हो तो वह उसी का बना रहता है। गोद जाने से उस के उस हिस्से के स्वामित्व में कोई अंतर नहीं आता। लेकिन गोद जाने के बाद अपने मूल पिता से उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार खो देता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि गोद जाने वाला व्यक्ति दोनों तरह की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होता है। लेकिन ऐसा नहीं है।

हर व्यक्ति को ऐसा अधिकार होता है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति हो तो उस में तो किसी व्यक्ति का हिस्सा जन्म से ही मिल जाता है। जब कि उस के पिता, व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार का उस का अधिकार उन की मृत्यु पर उत्पन्न होता है। इसी तरह गोद गए व्यक्ति को जिस सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार मिल गया है वह तो उसी तरह बना रहता है। लेकिन उसे अपने गोद पिता व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार तो प्राप्त होता ही है लेकिन गोद पिता की सहदायिकी में भी हिस्सा प्राप्त करने का उस का अधिकार गोद लेते ही उत्पन्न हो जाता है।

पुश्तैनी संपत्ति में किसी को उस के हिस्से से बेदखल नहीं किया जा सकता।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

राहुल ने संजय नगर, बरेली, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता की मृत्यु सन 2015 में हुई है और अब मेरी माँ मुझे अपनी पुश्तैनी चल-अचल सम्पत्ति से बेदखल करना चाहती है। जबकि मेरे दादा जी जिन्दा है और उन्होंने न ही कोई वसीयत बनाई है और न ही उन्होंने मेरे पिता के नाम कोई जमीन की है।  मेरा मेरी मां से कोई झगड़ा नहीं है। मेरी माँ मेरी बहन के कहने पर ऐसा कर रही है हमारे परिवार में मेरी माँ, एक अविवाहित बहन, अविवाहित भाई, मैं स्वयं विवाहित हूँ। क्या मेरी माँ मुझे मेरी पुश्तैनी संपत्ति से बेदखल कर सकती है? कृपया कर मुझे समाधान अवश्य लिखे आपकी अति महान कृपा होगी।

समाधान-

बेदखल शब्द दखल से बना है। बेदखल करने का अर्थ है किसी के दखल को समाप्त करना। दखल शब्द का अर्थ संपत्ति के मामले में कब्जे से है न कि स्वामित्व से है।

पुश्तैनी या सहदायिक संपत्तियाँ बहुत कम अस्तित्व में रह गयी हैं। फिर भी जो भी पुश्तैनी और सहदायिक संपत्तियाँ हैं उन में किसी भी व्यक्ति को अधिकार कानून से मिलता है। सन्तान के जन्म लेते ही पुश्तैनी संपत्ति में उस का हिस्सा तय हो जाता है। इस हिस्से से उसे कोई भी बेदखल नहीं कर सकता है।

यदि कोई  पुश्तैनी संपत्ति है और उस में आप के पिताजी का कोई हिस्सा था तो उस का एक हिस्सा उत्तराधिकार में आप की माँ को भी प्राप्त हुआ होगा। वे अधिक से अधिक उस मां के पास जो हिस्सा है उस में से आप के उत्तराधिकार से आप को वंचित कर सकती हैं जो उन का अधिकार है। लेकिन आप को प्राप्त हुए हिस्से से आप को आप की माँ ही नहीं कोई भी वंचित नहीं कर सकता।

पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों को अधिकार

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

सुमन ने सोनीपत हरियाणा से पूछा है-

मैं 45 साल की विवाहित महिला हूँ। हम दो भाई व दो बहनें हैं।  मेरे पिता जी जीवित हैं। मेरे पिता के नाम गाँव कुण्डली में 20 एकड़ जमीन है जो कि मेरे पिता जी को मेरे दादा जी व दादा जी को उनके पिता जी से तथा आगे उनके पिता जी से उत्तराधिकार में मिली थी। ये पुश्तैनी जमीन है।  मैंने मेरे पिता जी व भाईयों को छ: साल पहले दस लाख रुपये उधार दिए थे। एक साल पहले मैंने मकान खरीदना था तब मैंने पिता जी व भाईयों से रुपये लौटाने को कहा तो उन्होंने मेरे रुपये देने से मना कर दिया तथा अब बोलचाल भी बन्द कर दी है। मेरे पति मुझे रुपये लाने को कहते है । परन्तु मैं मजबूर हूँ।  मैं बहुत दु;खी रहती हूँ। क्या पुश्तैनी जमीन में मेरा हिस्सा है?  यह जानना चाहती हूँ कि क्या मैं पिता के जीवित रहते पुश्तैनी जमीन में से मेरे हिस्से की जमीन ले सकती हूँ? मुझे क्या करना होगा तथा मुझे कितना हिस्सा मिल सकता है?  क्या मेरे पिता जी पुश्तैनी सारी जमीन मेरे भाईयों के नाम कर सकते है? कृपया उचित कानूनी सलाह दें।

समाधान-

दिनांक 09.09.2005 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के प्रभावी होने के पूर्व पुत्रियों को पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार नहीं था। किन्तु उक्त तिथि से सभी पुत्रियों को पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में उसी तरह अधिकार प्राप्त हो गया है जैसे कि पुत्रों को प्राप्त है। उक्त तिथि के उपरान्त जन्म लेने वाली पुत्रियों को यह अधिकार जन्म लेने के समय ही प्राप्त होने लगा है।

उक्त अधिनियम के अनुसार आप को भी अपने पैतृक परिवार की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में दिनांक 09.09.2005 से ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, अब आप भी उस सहदायिकी की एक सदस्य हैं। और आप अपने हिस्से को अलग करने की मांग कर सकती है। यदि उक्त तिथि के बाद सहदायिकी का कोई हिस्सा सहदायिकी से अलग किया गया हो तो उस में भी आप का अधिकार था।

आप तुरन्त बँटवारा कराने तथा अपना पृथक हिस्सा व उस पर कब्जा प्राप्त करने के लिए तुरन्त बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं।

पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार से वंचित करने के विरुद्ध वाद।

समस्या-

अखिल ने रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-rp_gavel5.jpg

कृपया हमारी शंका  का समाधान करें? क्या (1) यदि संपत्ति दादाजी के पिता की संपत्ति को बेचकर खऱीदी गयी थी तब वह संपत्ति पुश्तैनी मानी जायेगी। जिस पर हम सभी भाई बहनों का बराबर-बराबर अधिकार होगा (2) यदि संपत्ति  दादाजी ने अपनी कमाई से अर्जित की है तो क्या उस पर पिता का अधिकार है और वह चाहें तो उस संपत्ति को किसी को भी दे सकते हैं।

आशीष त्रिपाठी ने सिंगरौली मध्यप्रदेश से पूछा है-

क्या पिता के मृत्यु के पश्चात उस पुश्तैनी संपत्ति पर दावा किया जा सकता है जो पिता ने अन्य लोगों के नाम रजिस्ट्री कर चुका हो? यदि हाँ ! तो किस अधिनियम के तहत य

समाधान-

कोई भी संपत्ति पुश्तैनी या सहदायिक तभी मानी जाएगी जब कि वह 17 जून 1956 के पूर्व किसी पुरुष हिन्दू को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। यदि आप के दादा जी के पिता के पास वह संपत्ति उक्त तिथि से पूर्व उत्तराधिकार में आयी थी तो पुश्तैनी थी और उसे विक्रय कर के खरीदी गयी संपत्ति भी पुश्तैनी होगी और हर संतान का जन्म से उस में अधिकार होगा।

यदि संपत्ति दादा जी ने अपनी कमाई से खरीदी है और उन का देहान्त 17 जून 1956 के पूर्व हो गया था तो आप के पिता के पास वह संपत्ति पुश्तैनी होगी और उस में आप सभी भाई बहनों का भी अधिकार होगा। आप के पिता आप को उस अधिकार से वंचित कर के संपत्ति का विक्रय नहीं कर सकते थे। इस विक्रय को विक्रय की तिथि से 12 वर्ष की अवधि (मियाद) में दीवानी वाद कर के निरस्त कराया जा सकता है। यदि विक्रय के समय आप नाबालिग थे तो आप बालिग होने की तिथि से मियाद में ऐसा दावा कर सकते हैं। यदि आप को इस विक्रय की जानकारी न थी तो आप को जानकारी प्राप्त होने से मियाद में ऐसा वाद संस्थित कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी संपत्ति में उस के अधिकार से वंचित किए जाने के वि्रुद्ध वाद संस्थित करने की मियाद 12 वर्ष है। इसे मियाद अधिनियम में मिलने वाली छूटों के आधार पर कुछ और बढ़ाया जा सकता है। इस मामले में आप को किसी स्थानीय वकील से सलाह करना चाहिए।

भूमि/ संपत्ति विवादों में पहले जानें की वह पुश्तैनी है या नहीं।

rp_land-demarcation.jpgसमस्या-

संजीव कुमार ने समस्तीपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पास 20 कट्ठा पुश्तैनी भुमि है, जो मेरे स्व0 दादाजी (मृत्यु वर्ष 1975) की स्वअर्जित संपत्ति है। मेरे स्व. पिताजी (मृत्यु वर्ष 2003) एंव मेरी बुआ अपने ससुराल में अभी जीवित है। मेरे पिताजी का एक पुत्र मैं स्वंय एंव चार विवाहित पुत्रियॉँ हैं। साथ ही मेरी एक विधवा मॉं भी है जो सरकारी पेंशनधारी महिला है। जब 16 अक्टूबर, 2015 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘‘प्रकाश वर्सेस फुलावती‘‘ एंव अन्य मामलों के संज्ञान में यह निर्णय सुनाया गया कि जिन के पिता की मृत्यु 9 सितंबर, 2005 से पहले हो गई है उनकी बेटियों को पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा नहीं मिलेगा।‘‘ सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले के बाद मेरे दादाजी की पुश्तैनी भुमि में मेरा, मेरी चार विवाहित बहनों, मेरी बुआ एंव मेरी विधवा माँ की क्या हिस्सेदारी होगी, जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु वर्ष 2003 में ही हो गई थी?

 

समाधान-

प की यह भूमि पुश्तैनी नहीं है। 17 जून 1956 के पूर्व किसी हिन्दू पुरुष को अपने तीन पीढ़ी पूर्व तक के पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति ही पुश्तैनी है। 17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हो गया और उस समय तक जो स्वअर्जित संपत्तियाँ थीं उन का उत्तराधिकार इस अधिनियम की धारा 8 के अनुसार होने लगा। इस अधिनियम से उत्तराधिकार मिलने पर कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। हिस्से पर जिस का स्वामित्व स्थापित होता है वह उस की निजी संपत्ति होती है। उस में पुत्र पौत्र आदि का कोई अधिकार नहीं है। उस का उत्तराधिकार उस हिस्सेदार की मृत्यु पर खुलता है।

प की भूमि दादा जी की स्वअर्जित थी। उन का देहान्त 1975 में हुआ। इस तरह आप के पिता व बुआ दोनों 50-50 प्रतिशत भूमि के हिस्सेदार हुए। आप के पिता जी का देहान्त 2003 में हुआ। इस समय 20 प्रतिशत अर्थात 10 कट्ठा जमीन पर उन का स्वामित्व था। इस समय माँ व चार बहनों सहित आपके पिता के आप छह उत्तराधिकारी थे इस कारण आप का इस जमीन पर 1/6 हिस्सा हुआ। आप का अधिकार सिर्फ 10/6 कट्ठा जमीन पर है।

प्रकाश बनाम फूलवती के मामले का निर्णय उन संपत्तियों के संबंध में है जो 1956 के पूर्व ही पुश्तैनी संपत्ति थीं। वह आप के मामले में प्रभावी नहीं होगा।

विलेख को उस की जानकारी होने की तिथि से मियाद मानते हुए चुनौती दी जा सकती है।

rp_kisan-land.jpgसमस्या-

राकेश ने दिल्ली से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता और दादा जी का जन्म 17.06.1956 से पहले का है। मेरे पिता के सभी भाई (तीन) बहन (दो) का जन्म 1960 के बाद का है। पैतृक संपत्ति में 105 बिस्वा ज़मीन है जो कि चार खेतो में है। रेवेन्यू के अभिलेख में आज भी ज़मीन मेरे के दादा जी नाम है। 1982 में मेरे दादा जी ने मेरे दो चाचा को 28 बिस्वा ज़मीन गिफ्ट डीड दवारा दे दी। 2013 में मेरे दादा जी ने 42 बिस्वा मेरे पिता और तीसरे चाचा के नाम सेल डीड कर दी। मेरे पिता को उनके हक़ 52.5 बिस्वा में से मात्र 21 बिस्वा जमींन अभी तक मिली हैं। मेरा जन्म 1973 का है। मुझे 2013 में गिफ्ट डीड के बारे मे पता चला। क्या मैं गिफ्ट डीड के खिलाफ दावा कर सकता हूँ। मेरा 105 बिस्वा में क्या हक हैं, और मेरे हित में मैं क्या करूँ?

समाधान

दि यह कृषि भूमि पुश्तैनी है अर्थात आपके दादा जी को यह भूमि उन के पिता जी से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो जैसे ही आप के पिता जी का जन्म हुआ वे भी उस के हिस्सेदार हो गए। शेष भाई भी उसी प्रकार उस पुश्तैनी संपत्ति में जन्म से हिस्सेदार होते गए। 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 प्रभावी होने पर आप के पिता की बहनें भी उस में भाइयों के समान ही हिस्सेदार हो गयीं। आप के पिता और उन के सभी भाइयों की संतानें भी उसी तरह उस की हिस्सेदार होती गयीं।

1982 में आप के पिता की बहनें उक्त पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सेदार नहीं थीं। इस कारण उस समय आप के दादा जी उक्त संपत्ति में से जो उन का हिस्सा था उतनी संपत्ति की गिफ्ट डीड कर सकते थे। यदि उस के उपरान्त भी दादाजी का कोई हिस्सा उस संपत्ति में शेष रहा होगा तो वे 2013 में अपने हिस्से की सीमा तक भूमि का विक्रय पत्र निष्पादित कर सकते थे। लेकिन इन दोनों विलेखों के निष्पादन के समय वे अपने हिस्से से अधिक की भूमि हस्तान्तरित नहीं कर सकते थे। यदि उन्हों ने अपने हिस्से की संपत्ति से अधिक संपत्ति हस्तान्तरित की है तो उन विलेखों को चुनौती दी जा सकती है।

2013 के विलेख को चुनौती देने की समय सीमा अभी है। 1982 में जो विलेख निष्पादित हुआ है उसे चुनौती देने के लिए वाद आप केवल तब संस्थित कर सकते हैं जब कि उक्त विलेख की जानकारी होने के दिन से 3 वर्ष की अवधि समाप्त नहीं हुई हो।

आपको चाहिए कि आप तुरन्त किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और जितना जल्दी हो सके अपने हिस्से को प्राप्त करने के लिए उक्त दोनों विलेखों को चुनौती देते हुए संपत्ति का बंटवारा करने और आप के हिस्से पर आप को पृथक कब्जा दिलाए जा का वाद संस्थित करें।

मुस्लिम विधि में कोई पैतृक या सहदायिक संपत्ति नहीं।

muslim inheritanceसमस्या-

आर एस ध्रुव ने धमतरी, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

क्या एक मुस्लिम अपने जीवनकाल में अपनी सारी संपत्ति का बँटवारा कर सकता है? उसे संपत्ति अपने पिता से वसीयत में मिली है।

समाधान

मुस्लिम विधि में कोई भी संपत्ति पैतृक या सहदायिक नहीं होती। केवल संयुक्त संपत्ति हो सकती है। लेकिन उस संयुक्त संपत्ति में किसी भी व्यक्ति का हिस्से पर उस का संपूर्ण अधिकार होता है न की उस में किसी अन्य का कोई अधिकार। इस तरह किसी भी मुस्लिम की संपत्ति उस की निजि संपत्ति होती है। इसी तरह किसी भी व्यक्ति को वसीयत में मिली संपत्ति उस की निजि संपत्ति होती है।

पिता से किसी मुस्लिम को वसीयत में प्राप्त संपत्ति उस की व्यक्तिगत संपत्ति है न कि संयुक्त या पैतृक या सहदायिक संपत्ति। इस कारण उस का बँटवारा किया जाना संभव नहीं है। हाँ एक मुस्लिम अपनी संपत्ति को दान कर सकता है, या विक्रय कर सकता है। यदि किसी मुस्लिम को अपनी संपत्ति का बँटवारा कुछ लोगों में करना है तो वह ऐसा केवल संपत्ति हस्तान्तरण की किसी विधि द्वारा कर सकता है। जब कि वह केवल अपने अंतिम संस्कार के खर्च और कर्जों को चुकाने के बाद बची हुई संपत्ति का एक तिहाई ही उन लोगों को वसीयत कर सकता है जो उस के उत्तराधिकारी नहीं हों। यदि किसी उत्तराधिकारी को वसीयत करना हो तो उस के शेष सभी उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक होगी। इस तरह एक मुस्लिम द्वारा अपनी संपत्ति का बँटवारा किया जाना संभव नहीं है।

एक बार जो संपत्ति पुश्तैनी हो गई वह जब तक हस्तान्तरित नहीं होगी पुश्तैनी ही रहेगी।

समस्या-

दीपक ने झलनिया, फतेहाबाrp_कानूनी-सलाह.jpgद, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मैं ने आपका पिछला लेख पढा जिसको लेकर मेरे मन मे कुछ प्रश्न हैं। मान लीजिए एक व्यक्ति जिसका नाम नानक है को 1950 में अपने पिता के देहांत के बाद सम्पत्ति प्राप्त हुई अर्थात् पुश्तैनी जायदाद हुई। इसके बाद1955 में उस का एक पुत्र कमल का जन्म हुआ जिस से उसकी सम्पत्ति सहदायिक हो गई। 1960 में नानक का देहान्त हो गया और सम्पति कमल को हस्तांतरित हो गई। लेकिन देहान्त के आठ महीने बाद उसका एक और पुत्र भीम का जन्म हुआ, तब क्या भीम अपने पिता की सम्पत्ति में सहदायिक होगा या नहीं? इसके अलावा मान लीजिए1980 में कमल के एक पुत्र दिनेश का जन्म हुआ और तब क्या दिनेश अपने दादा की सम्पत्ति में सहदायिक बनेगा या नहीं क्योंकि सम्पति पुश्तैनी है? और सहदायिक बनेगा तो उसे अपना हिस्सा कैसे प्राप्त होगा क्योंकि सम्पति तो कमल के नाम है और कमल अपनी जायदाद में दिनेश को कुछ नही देना चाहता? इसके अलावा ये बताए कि दिनेश के लिए अपने दादा की सम्पत्ति तो पुश्तैनी कहलाएगी लेकिन अपने पिता कमल की सम्पत्ति पुश्तैनी बनेगी या नहीं।

समाधान-

प के प्रश्न बहुत वाजिब हैं। नानक की मृत्यु के उपरान्त उस के पुत्र कमल को संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है इस कारण वह पुश्तैनी है। एक बार यह संपत्ति पुश्तैनी हो जाने पर हमेशा पुश्तैनी रहेगी। उस का चरित्र तब तक नहीं बदल सकता जब तक कि वह किसी अन्य को हस्तान्तरित नहीं हो जाती है। जैसे ही नानक के देहान्त के उपरान्त उस के पुत्र भीम का जन्म हुआ तो पुश्तैनी संपत्ति में उस का भी हिस्सा है। क्यों कि वह संपत्ति पुश्तैनी है इस तरह भीम के जन्म के साथ ही वह संपत्ति सहदायिक भी हो गयी। पिता की मृत्यु से कमल संपत्ति का स्वामी बना है लेकिन पुश्तैनी संपत्ति का वह उस की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है। न ही स्वामित्व के दस्तावेज या रिकार्ड में उस का नाम चढ़ा है। भीम या तो स्वयं या फिर अपनी माता के माध्यम से अपने अधिकार को प्राप्त कर सकता है। यदि कमल देने से इन्कार करता है तो बंटवारे का वाद संस्थित कर सकता है।

दि कमल के 1980 में पुत्र होता है तो भी उस के जन्म के साथ ही कमल की पुश्तैनी संपत्ति में उस का अधिकार उत्पन्न हो जाएगा और वह संपत्ति सहदायिक हो जाएगी। इस पुश्तैनी संपत्ति की आय से अर्जित संपत्ति भी पुश्तैनी होगी। लेकिन जो भी कमल की स्वअर्जित संपत्ति होगी उस में कमल के पुत्र का कोई अधिकार नहीं होगा। वह कमल की व्यक्तिगत संपत्ति रहेगी और उसे वह वसीयत कर सकता है या दान, विक्रय आदि के दवारा हस्तान्तरित कर सकेगा। यदि वह कुछ नहीं करता है तो उस की मृत्यु पर हिन्दू उत्तराधिकार के नियम के अनुसार उस की स्वअर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार तय होगा। इस में कमल के पुत्र दिनेश को जो हिस्सा मिलेगा वह पुश्तैनी नहीं होगा। वह उस के जीवन काल तक उस की निजि संपत्ति रहेगा।

कृषि भूमि से संबंधित कानूनी मामलों में स्थानीय वकीलों से परामर्श करें।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

रवि शर्मा ने हाथरस, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मारी कुछ जमीन रेलवे ने अधिग्रहीत की है और हमें मुआवजा भी मिला है। रेलवे अब कुछ एक मुश्त राशि का भुगतान कर रहा है जो केवल उन को मिलेगी जिन का नाम जमीन में है, अधिग्रहण नोटिस से पहले कुछ लोगों ने अपनी संतान का नाम जमीन में जोड़ द्या था। इस कारण से वे कानूनी रूप से मालिक हो गए। यह एक मुश्त राशि उन के पिता और संतान दोनों को मिल रही है। क्या मैं जिस जमीन में मेरा नाम नहीं है उस मामले में कोर्ट में जा सकता हूँ क्यों कि ये पुश्तैनी जमीन है जिस में संतान का भी हक होता है, मैं और पिता अल रह रहे हैं।

समाधान-

मुआवजा देने वाला कभी इस झगड़े में नहीं पड़ता कि जमीन पुश्तैनी है या नहीं। वे तो जिस के नाम जमीन है उसे ही मालिक मान कर मुआवजा देंगे। वैसे भी उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के मामले में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम या हिन्दू परंपरागत विधि प्रभावी नहीं है। खेती की जमीन की स्वामी तो सरकार है। कृषक की हैसियत किराएदार जैसी होती है। इस अधिनियम में जो भूमि का कृषक है उस का नाम राजस्व विभाग के खाते में दर्ज है। उसी को मुआवजा मिलेगा। कृषि भूमि के मामले में उत्तर प्रदेश में पुश्तैनी या सहदायिक स्वामित्व की क्या स्थिति है इस मामले में आप के यहाँ के स्थानीय वकील स्पष्ट कानूनी स्थिति बता सकते हैं।

दि उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के मामले में पुश्तैनी या सहदायिक स्वामित्व को मान्यता हो तो आप अपने पिता, राज्य के राजस्व विभाग और मुआवजा वितरण करने वाले विभाग को पक्षकार बनाते हुए न्यायालय में यह दावा कर सकते हैं कि जो भी मुआवजा मिले उस का एक हिस्सा आप को भी दिया जाए। क्यों कि अधिग्रहीत जमीन पुश्तैनी होने के कारण उस में आप का भी हिस्सा है। आप यह दावा कर के स्थगन प्राप्त कर लेंगे तो जब तक यह प्रश्न तय न हो जाएगा कि मुआवजे में आप का हक है या नहीं, तब तक मुआवजा मिलने से रुका रहेगा। जब भी अन्तिम निर्णय होगा तब मिलेगा और इतने समय का ब्याज नहीं मिलेगा। लेकिन इस मामले में स्थानीय वकील से स्पष्ट राय कर के ही आगे बढ़ें।

पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय।

rp_law-suit.jpgसमस्या-

दीपक ने भिरङाना , फतेहाबाद से हरियाणा राज्य की समस्या भेजी है कि-

पने अपने पिछले लेखों मे पुश्तैनी ओर सहदायिक सम्पत्ति में अन्तर बताया। मेरे मन मे पुश्तैनी सम्पत्ति को लेकर कुछ प्रश्न हैं। 1. आपने बताया कि 1956 से पहले तीन पीढ़ी में से किसी पुरुष पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्ति पुश्तैनी है यदि वह सम्पत्ति पुरुष पूर्वजों से प्राप्त न हो कर स्त्री पूर्वज से प्राप्त हुई हो और स्त्री पूर्वज को अपने पति से प्राप्त हुई हो तब क्या होगा? 2. अब जैसे भारत पाकिस्तान का बटवारा हुआ ओर पूर्वज पाकिस्तान से भारत आए और उन्हें 1956 से पहले जमीन अलॅाट हुई तब वह सम्पत्ति क्या कहलाएगी? क्योंकि वह सम्पत्ति तो उन्हे न तो किसी पूर्वज से मिली न ही उनकी स्वार्जित हुई भले ही पाकिस्तान में उन के पूर्वजों की सम्पत्ति के बदले भारत में सम्पति उन्हे मिली हो? 3. मान लीजिए, अ व्यक्ति को 1956 से पहले अपने पिता से सम्पति मिली तो वह सम्पत्ति पुश्तैनी हो गई। और अ की मृत्यु 1956 के बाद हो गई ओर वह सम्पत्ति उसके पुत्र ब को 1956 के बाद प्राप्त हुई तो क्या वह सम्पत्ति पुश्तैनी नहीं रही? इस प्रकार से ब के पुत्र स. के लिए अपने पिता ब की सम्पति तो पुश्तैनी नहीं कहलाई। लेकिन क्या स के लिए उसके दादा अ की सम्पत्ति पुश्तैनी हो जाएगी? 4. आपने कहा कि पुश्तैनी जायदाद का बंटवारा उतरजीविता के अधार पर होता है अगर किसी सहदायिक का जन्म होता है तो पहले के सभी सहदायिकों का हिस्सा कट कर जन्म लेने वाले सहदायिक को मिलता है, मेरा प्रश्न है कि जिस व्यक्ति के नाम पुश्तैनी सम्पति उसके जीवित रहते किसी सहदायिक का जन्म लेना जरूरी है या उसके मरने के बाद भी अगर किसी का जन्म होता है तो वह भी उस में हिस्सेदार बनेगा? 5. आपने कहा कि पुश्तैनी सम्पति मे तीन पीढ़ी यानि पुत्र पोत्र, प्रपोत्र तक का हिस्सा होता है लेकिन जब तक प्रपोत्र का जन्म होता है समझदार बनता है तब तक वो सम्पत्ति कई व्यक्ति को हस्तांतरित हो चुकी होती है, तब वह प्रपोत्र क्या कर सकता है? तब वह अपना हिस्सा कैसे प्राप्त कर सकता है? 6. आप ने पुश्तैनी व सहदायिक में अन्तर बताया, इसलिए सहदायिक सम्पत्ति की अलग परिभाषा होगी।

समाधान-

ब से पहले तो आप समझें कि पुश्तैनी संपत्ति क्या है। यदि किसी पुरुष को अपने परदादा, दादा या पिता से उत्तराधिकार में कोई संपत्ति प्राप्त होगी तो वह पुश्तैनी संपत्ति कहलाएगी। यदि पुरुष अकेला है अर्थात उस के कोई पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र नहीं है तो इस संपत्ति का स्वामी वह पुरुष होगा। लेकिन उस संपत्ति का चरित्र पुश्तैनी ही होगा व्यक्तिगत नहीं। यदि वह व्यक्ति उस समय उस संपत्ति को विक्रय या हस्तान्तरित करना चाहता है तो कर सकता है क्यों कि उस संपत्ति का वह अकेला स्वामी है। लेकिन उक्त संपत्ति उस के स्वामित्व में रहते हुए उस के एक पुत्र का जन्म हो जाता है तो इस संपत्ति का चरित्र पुश्तैनी होने के कारण पुत्र को उस संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त हो जाएगा। पुत्र के जन्म के साथ ही उसे पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार मिलते ही इस संपत्ति के दो स्वामी हो जाएंगे और यह संपत्ति सहदायिक हो जाएगी। जब दूसरा पुत्र जन्म लेगा तो इस सहदायिक संपत्ति में उसे भी जन्म से स्वामित्व प्राप्त होगा। इस तरह उस सहदायिकी में 3 व्यक्ति हो जाएंगे। पुश्तैनी संपत्ति और सहदायिक संपत्ति में यही अन्तर है। यह अन्तर इतना महीन है कि अक्सर इस में कोई अन्तर दिखाई ही नहीं देता है। वस्तुतः एक व्यक्ति जिस के कोई पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र जीवित नहीं है उसे जब कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो उत्तराधिकारी उस का अकेला स्वामी होता है इस कारण उसे सहदायिक संपत्ति नहीं कह सकते। इसी कारण उसे पुश्तैनी संपत्ति कहा जाता है।

17 जून 1956 एक विशिष्ट तिथि है क्यों कि इस दिन हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभाव में आया है। इस अधिनियम की विशिष्ट बात यह थी कि इस में यह तो उपबंध था कि जो संपत्ति पहले से सहदायिक है उस में उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर होगा। लेकिन यदि कोई संपत्ति इस अधिनियम के प्रभावी होने के समय सहदायिक नहीं थी। पुश्तैनी या स्वअर्जित थी तो वह इस अधिनियम के प्रभावी होने के बाद उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होगी। इस अधिनियम में पुत्रों, पुत्रियों, पत्नी और माता को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त हुआ था। इस कारण गैर सहदायिक संपत्ति का उत्तराधिकार इस प्रकार से होने लगा।

स नए उत्तराधिकार कानून से पुरुष वंशजों को मिलने वाली संपत्ति अब स्त्रियों को भी मिलने लगी। पुत्रों और पुत्रियों को समान भाग प्राप्त होने लगा। अब यह तो नहीं हो सकता था कि पुत्र को मिली संपत्ति तो पुश्तैनी हो जाए और पुत्री को मिली संपत्ति उस की व्यक्तिगत हो जाए। दूसरे इस अधिनियम की अनुसूची में पुत्र तो उत्तराधिकारी है लेकिन जीवित पुत्र का पुत्र या जीवित पुत्र के जीवित पुत्र का पुत्र इस में कहीं सम्मिलित नहीं है। इन कारणों से इस नए कानून से पुत्र को प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी संपत्ति होना बन्द हो गई। हालांकि न्यायालय अब भी पुत्र को पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति को पुश्तैनी मान कर निर्णय करते रहे। बाद में जब उच्चतम न्यायालय ने इस गुत्थी को सुलझाया तो यह स्पष्ट हुआ कि गैर सहदायिक संपत्ति जो उत्तराधिकार में पुरुष को अपने पुरुष पूर्वजों को प्राप्त होती है वह न पुश्तैनी हो सकती है और न ही सहदायिक हो सकती है। यही कारण है कि 17 जून 1956 के पहले तक जो संपत्ति सहदायिक हो चुकी थी वही सहदायिक रही और नयी पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति का अस्तित्व में आना बन्द हो गया।

स्त्रियों को प्राप्त संपत्ति उन की व्यक्तिगत संपत्ति होती है और उन से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति भी व्यक्तिगत ही होगी।

जो भूमि पाकिस्तान से आने पर व्यक्तियों को आवंटित हुई है वह न पुश्तैनी है और न ही सहदायिक। वह संपति जिसे आवंटित हुई थी उस की व्यक्तिगत संपत्ति है। उस का उत्तराधिकार उत्तराधिकार अधिनियम के शासित होगा। यदि किसी को ऐसी भूमि आवंटित हुई है और आवंटी की मृत्यु 17 जून 1956 के पूर्व हो गयी तो ऐसी आवंटित भूमि जिन पुरुष उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई वे पुश्तैनी या सहदायिक हो गई होंगी। जो संपत्ति 17 जून 1956 तक पुश्तैनी या सहदायिक नहीं थी वह बाद में किसी भी भांति पुश्तैनी या सहदायिक नहीं हो सकती।

दि किसी के पास पुश्तैनी संपत्ति है तो वह उस की मृत्यु तक पुश्तैनी ही रहेगी। यदि एक सहदायिक उस संपति का उस के जीवनकाल में जन्म लिया तो वह संपत्ति पुश्तैनी न रह कर सहदायिक हो जाएगी और उस का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर होगा। जैसे ही उस का देहान्त होगा उस का उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार तय हो कर वह उत्तराधिकारियों की हो जाएगी। क्यों कि संपत्ति पुश्तैनी रही और उस व्यक्ति के जीवनकाल में कोई सहदायिक जन्म नहीं लिया तो उस के देहान्त के बाद उस का कोई भ सहदायिक नहीं हो सकता।

पौत्र के जन्म लेने तक संपत्ति का अनेक स्थानों तक हस्तांतरित होना स्पष्ट नहीं है। सहदायिक संपत्ति का केवल एक ही सहदायिक जीवित बचे तो वह संपत्ति पुश्तैनी हो जाएगी। लेकिन किसी अन्य सहदायिक के उत्पन्न होते ही वह पुनः सहदायिक हो जाएगी। कोई भी सहदायिक यदि अपना हिस्सा बेचता है या हस्तान्तरित करता है तो वह हिस्सा सहदायिक संपत्ति से अलग हो जाएगा। तब हिस्सा बेचने वाले के बाद में कोई पुत्र, पौत्र या प्रपोत्र होने पर उस का सहदायिक संपत्ति में कोई भाग नहीं होगा। यदि सहदायिक संपत्ति का बँटवारा हो जाता है तो बंटवारे के उपरान्त जिन व्यक्तियों को हिस्सा मिलेगा उन के पास वह हिस्सा पुश्तैनी संपत्ति के रूप में रहेगा। उन के यहाँ पुत्र, पौत्र या प्रपोत्र जन्म लेने पर वह पुन सहदायिक हो जाएगी।

डिसक्लेमर : यहाँ जितने निष्कर्ष हम ने प्रस्तुत किए हैं। वे हमारे स्वयं की विश्लेषण के आधार पर हैं। यदि किसी को इस में कोई निष्कर्ष गलत लगता है तो उसे अपने निष्कर्ष का आधार बताते हुए अपना मत प्रस्तुत कर सकता है। उस में विमर्श का अवसर बना रहेगा। बिना किसी आधार के कोई नया निष्कर्ष प्रस्तुत न करें।

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