Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

निकट भविष्य में न्याय व्यवस्था में सुधार की कोई संभावना नहीं

न्यायालयों में लंबित प्रकरण और उन के निपटारे में देरी भारतीय न्याय व्यवस्था का कैंसर बनता जा रहा है। उड़ीसा के मुख्य न्यायाधीश वी.गोपाल गौडा ने मैंगलौर में क्षेत्रीय अधिवक्ता कॉन्फ्रेंस-2012 को संबोधित करते हुए कहा कि “देश में तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं।” प्रत्येक मुकदमे में औसतन कम से कम दो व्यक्ति संबन्धित होते हैं इस तरह देश में प्रत्येक बीसवाँ व्यक्ति किसी न किसी मुकदमे से संबंधित है। इस तरह यह संख्या एक महत्वपूर्ण संख्या है। लोगों को जल्दी न्याय दिलाने के लिए कुछ न कुछ तुरंत किया जाना आवश्यक है।

न्यायमूर्ति गौडा ने न्यायाधीशों और वकीलों से आग्रह किया कि वे तकनीकी चीजों में उलझने के स्थान पर लोगों के जल्दी न्याय प्रदान करने में अपना योगदान करें। लेकिन उन्हों ने केन्द्र और राज्य सरकारों के प्रति एक शब्द भी कहना उचित नहीं समझा। जब कि वास्तविकता यह है कि देश में न्यायाधीशों की संख्या देश की आबादी और लंबित मुकदमों के अनुपात में बहुत कम है। इस बात का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जहाँ अमरीका में प्रत्येक दस लाख की आबादी पर 111 न्यायाधीश नियुक्त हैं वहीं भारत मे इन की संख्या केवल 11 है। इस तरह हम अमरीका के मुकाबले केवल दस प्रतिशत न्यायाधीशों से काम चला रहे हैं।

र बार बात की जाती है कि मुकदमों के निपटारे की गति बढ़ानी चाहिए। लेकिन बिना न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या में वृद्धि किए यह किसी प्रकार से संभव नहीं है। एक मुकदमे में सुनवाई सिर्फ न्यायाधीश कर सकता है। इस के लिए उसे पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जिस में समय लगना स्वाभाविक है। गवाहों के बयान दर्ज करने की गति को तो किसी प्रकार से नहीं बढ़ाया जा सकता है। इस तरह मुकदमों के निपटारे के लिए सारा दबाव न्यायाधीशों और वकीलों पर बनाया जाता है और उस के खराब नतीजे सामने आ रहे हैं। हड़बड़ी में मुकदमों के निर्णय किए जाते हैं जो गलत होते हैं और उन से हमारी न्याय व्यवस्था की साख गिरती है।

न्यायमूर्ति गौडा ने बताया कि देश में सर्वाधिक मुकदमे मोटर दुर्घटना और औद्योगिक विवादों से संबंधित हैं। देश में इन दोनों प्रकार के मुकदमों के निपटारे के लिए न्यायालयो की स्थापना करने का काम राज्य सरकारों का है लेकिन राज्य सरकारों ने इस के लिए पर्याप्त संख्या मे न्यायालय ही स्थापित नहीं किए हैं। इस तरह के अनेक न्यायालयों में न्यायाधिशों की नियुक्ति समय से नहीं की जाती है और वे लम्बे समय तक खाली पड़े रहते हैं। जिस का नतीजा यह होता है कि लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है।

र्तमान में राज्य सरकारों का काम करने का तरीका यह हो चला है कि वे वही काम करती हैं जिस से जनता को अगले आम चुनाव में यह दिखाया जा सके कि उन्हों ने जनता के लिए कितना काम किया है। न्यायालयों की स्थापना और शीघ्र न्याय प्रदान करने की मांग अभी जनता की ओर से राजनैतिक मांग नहीं बन पायी है जिस के कारण राज्य सरकारें इस ओर से पूरी तरह उदासीन रहती हैं। अधिकांश राज्य सरकारों का तो यह सोचना हो गया है कि न्याय प्रदान करने की जिम्मेदारी उन की है ही नहीं। ऐसी स्थिति में इस बात की कोई संभावना नहीं है कि निकट भविष्य में देश की जनता को शीघ्र न्याय प्राप्त होगा। स्थिति में कोई सुधार होने के स्थान पर आने वाले सालों में न्याय व्यवस्था और खराब होती चली जाएगी। न्यायार्थियों को न केवल और देरी से न्याय मिलेगा अपितु निर्णयों की गुणवत्ता भी इस के साथ ही गिरती चली जाएगी।

क्यों नहीं मिलते न्यायाधीश पदों के लिए योग्य व्यक्ति ?

‘भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण-2022’ विषय पर अखिल भारतीय न्यायाधीश एसोसिएशन के दो दिवसीय अखिल भारतीय न्यायाधीश सम्मेलन के शुभारंभ के अवसर पर बोलते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमश कबीर ने स्वीकार किया किया कि राजस्थान में उच्च न्यायालय में नियु्क्ति हेतु योग्य व्यक्ति नहीं मिल रहे हैं। इसी अवसर पर राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने प्रदेश में अदालतों की संख्या को कम बताते हुए और अदालतें खोलने की जरूरत पर बल दिया है।

न्यायाधीश अल्तमश कबीर

च्च न्यायालयों में न्यायाधीश वकीलों से सीधी भर्ती द्वारा और उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों में से चयन के माध्यम से नियुक्त किए जाते हैं। वकीलों में से तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए योग्य व्यक्ति प्राप्त हो जाते हैं लेकिन उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों में से योग्य व्यक्तियों का मिलना कठिन हो रहा है तो इस के कारणों का अनुसंधान किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति अपने बीस-पच्चीस वर्ष न्यायिक सेवा में व्यतीत करता है उसे तो अधिक योग्य होना चाहिए। आखिर उस के पास मुकदमों की सुनवाई का अधिक अनुभव होता है। फिर क्या कारण है कि वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने योग्य योग्यता प्राप्त नहीं कर पाता है?

स्तुतः इस का प्रश्न का उत्तर राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा के वक्तव्य में छिपा है। उन का कहना है कि राजस्थान में पर्याप्त संख्या में न्यायालय नहीं है। उन्हों ने अपने वक्तव्य में एक तथ्य और नहीं बताया कि राजस्थान में जितने न्यायालय हैं उन में से बीस प्रतिशत न्यायालय न्यायाधीशों के अभाव में रिक्त पड़े हैं। एक और तो निम्नतम स्तर पर न्यायाधीशों की भर्ती की प्रक्रिया को नौकरशाही के हवाले कर दिया गया है कि वह आवश्यकता के अनुसार न्यायाधीशों की भर्ती नहीं कर पाती। जब तक वह रिक्त पदों को भरने लायक न्यायाधीशों को तैयार करती है तब तक उतने ही पद और रिक्त हो जाते हैं। न्यायायाधीशों की भर्ती की योजना इस तरह की होनी चाहिए कि योग्य व्यक्तियों के चयन और प्रशिक्षण के उपरान्त उन की नियुक्ति में लगने वाले समय में कितने पद और रिक्त हो जाएंगे इस का पहले से आकलन किया जाना चाहिए। इस आकलन के अनुरूप ही व्यक्तियों का चयन किया जाना चाहिए। जिस से कम से कम राज्य का कोई भी न्यायालय न्यायाधीश के अभाव में रिक्त न रहे। एक बार राज्य में यह स्थिति ले आई जाए तो राज्य में मुकदमों के निपटारे की गति को तीव्र किया  जा सकता है।

नेक न्यायालयों में न्यायाधीश का पद रिक्त हो जाने का असर यह होता है कि शेष न्यायालयों पर उन न्यायालयों के मुकदमों की सुनवाई का भार आ पड़ता है। इस तरह एक न्यायाधीश को एक से अधिक न्यायालयों का कार्य देखना होता है। पहले ही राजस्थान के अनेक न्यायालयों की स्थिति ऐसी है कि उन में चार से पाँच हजार मुकदमे लंबित हैं। पक्षकारों और वकीलों का न्यायालयों पर जल्दी जल्दी पेशियाँ देने का दबाव रहता है। जिस के कारण न्यायालयों की दैनिक कार्यसूची में तीन चार गुना मुकदमें लगते हैं। न्यायाधीशों का बहुत सारा समय केवल पेशियाँ बदलने के काम में जाया होता है। वे वास्तविक न्यायिक कार्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। उन पर कोटे के अनुसार मुकदमों के निपटारे का दबाव भी होता है। इस तरह अधीनस्थ न्यायालयों का प्रत्येक न्यायाधीश अत्यन्त दबाव में काम करता है। जिस से निर्णयों की गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। यह वैसी ही स्थिति है जैसी हम निर्माण के कार्य में लगे मजदूरों की देखते हैं। वहाँ ठेकेदार का मुंशी लगातार मजदूरों की छाती पर खड़ा रहता है और जल्दी जल्दी काम निपटाने के लिेए लगातार दबाव बनाए रखता है। इधर न्यायाधीशों के कार्य का आकलन उन के द्वारा निपटाए गए मुकदमों की संख्या के आधार पर होने लगा है। गुणवत्ता के आधार पर नहीं।  न्यायाधीश अपने द्वारा निर्णीत मुकदमों की संख्या बढ़ाते हैं लेकिन गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं देते। संख्या मुख्य हो गई है और गुणवत्ता गौण। ऐसे में किसी भी प्रकार यह आशा नहीं की जा सकती कि अधीनस्थ न्यायालयों में काम कर रहे न्यायाधीशों में से उच्च न्यायालय में नियुक्ति के योग्य व्यक्ति मिल सकेंगे। जिला और अपर जिला न्यायाधीश के पदों पर नियुक्त अनेक न्यायाधीश ऐसे हैं जो उन पदों के भी योग्य नहीं हैं।

ज जब न्यायपालिका के तुरंत विस्तार की आवश्यकता है। भारत में विकसित देशों की तुलना में आबादी के लिए केवल दस प्रतिशत न्यायाधीश नियुक्त हैं। हमें इस अनुपात को तुरंत सुधारना होगा। इस स्थिति को देश कब तक ढोता रहेगा कि कानून तो हैं लेकिन उन की पालना कराने के लिए न्यायालय नहीं हैं। मुकदमों का अंतिम निपटारा या तो होता ही नहीं है और होता है तो उस में 20-30-50 वर्ष तक लग रहे हैं। इस से हमारी न्याय व्यवस्था तेजी के साथ जन विश्वास खोती जा रही है। यही स्थिति बनी रही तो यह एक दिन जन विद्रोह का एक बड़ा कारण भी बन सकती है। इस स्थिति से न्यायपालिका में काम कर रहे न्यायाधीश चिंतित हैं। वकील चिंतित हैं। लेकिन यदि सब से कम चिंतित हैं तो हमारी राज्य सरकारें हैं। उन के माथे पर इस विषय पर कोई चिंता की लकीर तक दिखाई नहीं देती। सरकारों के प्रधान अगले चुनाव में वोट की व्यवस्था बनाने की ही चिंता करते दिखाई देते हैं। यह सब से बुरी स्थिति है। निकट भविष्य में इस स्थिति से निजात मिलती दिखाई नहीं देती और देश के न्यायिक परिदृश्य में निकट भविष्य में सुधार की कोई संभावना भी नजर नहीं आती।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada