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परित्याग व अन्य आधारों पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें।

समस्या-

मनोज ने भोपाल, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे मित्र का विवाह 30 अप्रेल 2005 को चित्तौड़गढ़ राजस्थान में हुआ था। मित्र मध्य प्रदेश का है, बारात राजस्थान गई थी। उसकी पत्नी 2006 में बिना कारण उसे छोड़ के अपने मायके चली गई। मेरे मित्र ने वहाँ जाकर उसे समझाने का बहुत प्रयास किया, पर वह अपनी ज़िद्द पर अड़ी रही। उसकी ज़िद्द थी कि वह घर दामाद बनकर रहे। पर मेरा मित्र ये बात नही माना, क्योंकि वह सेना में सेवारत है और उसके भी मां, बाप, बहन है जिसकी जिम्मेदारी उस पर है। इसी बीच 2007 में मेरे मित्र का एक बेबी हो गया अब बच्चा होने के बाद मेरे मित्र के सास, ससुर, साला बच्चे से मिलने नहीँ देते थे। पर उसने बार बार मिलने का प्रयास किया पर उसे  मिलने नही दिया जाता, जब वह छुट्टियां खत्म होने के बाद वह सेना में बापिस आ जाता। इसी बीच उसकी पत्नी ने 2010 में भाग कर रायपुर छत्तीसगढ़ में एक युवक से विवाह कर लिया। पर मेरे मित्र को मालूम नहीं चला। जब वह 6 माह में छुट्टी ले के जाता तो उसे ये कहा कर लौटा देते कि वह नही मिलना चाहती और वह जॉब करने लगी है। ये सिलसिला चलता रहा जब मित्र ने वहाँ के थाने में रिपोर्ट दर्ज करने गया तो वहाँ के एसएचओ ने रिपोर्ट दर्ज नही की। वह बोला वह जॉब करती है उसे परेशान मत करो नहीं उसकी कंप्लेन में बंद हो जाओगे और कोई छुड़ाने नहीं आएगा, और army की नौकरी चली जायेगी। वह वापिस गया अभी मई 2017 में उसे मालूम पड़ा कि उसने दूसरा विवाह कर लिया है। रायपुर में किसी अजय नाम के व्यक्ति से और मित्र के बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट में दूसरे पति अजय का नाम डलवा दिया है। मित्र का लड़का 5वीं में पढ़ता है और उन दोनो का रायपुर में वोटर आई डी बना हुआ है जो कि वोटर लिस्ट में है, और उन दोनों के कुछ फोटो मिले है गले मे हाथ डाले हुए और मांग में सिन्दूर है। उधर पुछा गया तो मालूम पड़ा कि उन दोनों ने प्रेम विवाह किया है। आप बताइए कि मेरा मित्र क्या करे? जिससे उसकी समस्या हल होजाये उन दोनों को सबक सिखाया जाए उसे सजा मिल सके साथ मे मित्र का बच्चा भी मिल जाये मित्र की पत्नी के दूसरी शादी का बस फ़ोटो और वोटर लिस्ट का सबूत है इन के आधार पर क्या कार्यवाही करें?

समाधान-

प के मित्र की पत्नी को छोड़ कर गए हुए 11 वर्ष हो चुके हैं और आप के मित्र ने अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है। 11 वर्ष से आप के मित्र की पत्नी अलग रहती है और उस ने घर भी बसा लिया है। आप का मित्र चाहता तो अभी तक परित्याग के आधार पर तलाक ले सकता था।  देरी से न्यायालय तक जाने पर राहत मिलना कठिन होता है। अब भी आप के मित्र को सभी संभव आधारों पर तलाक के लिए आवेदन करना चाहिए।

आप का मित्र फौज में है, केवल अवकाश में घर आता है। एक लंबे समय तक उस की पत्नी को अकेले उस के ससुराल में रहना होता था। जब पत्नी को अकेले ही रहना होता था तो वह आप के मित्र के परिवार के साथ क्यों रहती? अपने मायके में क्यों नहीं। यही दोनों के बीच विवाद है।

मित्र की पत्नी सैटल हो चुकी है। बच्चा अब तक उस के साथ रहा है, वह अपने पिता को नहीं जानता या पिता के रूप में किसी दूसरे व्यक्ति को जानता है। ऐसी स्थिति में बच्चे की कस्टडी मिलना कठिन है जब कि आप का मित्र खुद फौज में रहता है।

आप के मित्र को पत्नी के विरुद्ध तलाक की और बच्चे की कस्टडी का मुकदमा करना चाहिए। इन मुकदमों के दौरान अदालत दोनों के बीच राजीनामा कराने की कोशिश करेगी। दोनों का साथ रहना तो मुमकिन नहीं फिर भी जो भी आपसी रजामंदी से हो सके वह करना चाहिए। कम से कम तलाक ले लेना चाहिए जिस से आप का मित्र दूसरा विवाह कर सके। पत्नी को सबक सिखाने की बात मन से निकाल दें। कानूनी स्थिति जो भी है वह ऐसी है कि सबक सिखाने के चक्कर में आप के मित्र ही कहीं चकरी न हो जाएँ।

 

बेटी की कस्टड़ी माँ के पास ही रहेगी।

mother_son1समस्या-

भाग्यश्री ने फरीदाबाद, हरियाणा से पूछा है-

शादी को 3 साल हो गये। दो साल की बेटी है। मरे पति पैसे के लिए मुझ से झगड़ा करते हैं। कई बार मारा भी। मैने इस की सूचना महिला थाने को दी। वो कई बार सुलह करा के जाते हैं। पर फिर वही बर्ताव। मुझे भूखा रखा जाता है सब के सामने हर बात मान लेते हैं जिस से मैं ही गलत लगती हूँ। अब मैं ने मुकदमे के लिए पत्र दिया है तो मुझे क्या करना होगा। क्या बच्ची मुझे मिल जाएगी। मेरे कितने पैसे खर्च होंगे इस में?

समाधान-

प की समस्या से स्पष्ट नहीं हुआ कि आप चाहती क्या हैं? यह तो सही है कि आप उस व्यक्ति के साथ जीवन निर्वाह नहीं कर सकतीं। पति से अलग रहने का आप के पास वाजिब कारण है। इस कारण आप अलग रह सकती हैं। अपने लिए भरण पोषण प्राप्त कर सकती हैं। बच्चों की कस्टड़ी का आधार बच्चों का हित है। बेटी की उम्र दो वर्ष की है, उस का हित आप के साथ रहने पर है और उसे आप से अलग नहीं किया जा सकता।  कोई भी अदालत उसे आप से अलग नहीं होने देगी। बेटी आप के साथ रहेगी तो आप उस के लिए भी भरण पोषण मांग सकती हैं और आप को यह सब मिलेगा।

आप तुरन्त अन्तरिम रूप से राहत मांग सकती हैं न्यायालय आप को दे सकता है। मुकदमों का खर्च स्थान भेद से भिन्न भिन्न होता है। फरीदाबाद दिल्ली से लगा हुआ है इस कारण उस पर महानगर का असर है इस कारण खर्च तो जो होगा वह होगा। वकील की फीस ही सब से अधिक होगी. वह आप को तय करनी पड़ेगी। लेकिन जैसे ही आप को अन्तरिम राहत प्राप्त होगी आप के लिए वकील की फीस देना उतना कठिन नहीं रहेगा। आप चाहें तो वकील को कह सकती हैं कि आप आरंभ में नोमिनल खर्चे की रकम दे पाएंगी।लेकिन जैसे ही भरण पोषण की राशि मिलने लगेगी नियमित किस्तों में फीस भी दे देंगी। वकील इस प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता है।

अन्त में आप को हमारी सलाह है कि आप को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। भरण पोषण के सहारे जीवन व्यतीत नहीं होता और व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है। आप इतना आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लें कि खुद ठीक से जी सकें और बेटी की परवरिश कर सकें। यदि आप ऐसा सोचती हैं तो आप अपने पति से तलाक ले कर अलग भी हो सकती हैं। आप चाहें तो किसी नए जीवन साथी के साथ अपना जीवन भी आरंभ कर सकती हैं।

दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के आवेदन के साथ बेटी की अभिरक्षा के लिए आवेदन किया जा सकता है।

Adoptionसमस्या-

संदीप ने गुड़गाँव, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मुझ पर पत्नी ने धारा 323, 406, 498ए, 506 व 120 बी का मुकदमा कर दिया है। मेरे विवाह को चार वर्ष हो गए हैं। मेरी पत्नी को थैलीसीमिया की बीमारी है जिस का मैं इलाज करवा रहा था, मेरे पास अस्पताल के इलाज के दस्तावेज भी हैं। मेरी एक दो वर्ष की बेटी भी है। मैं ने ना दहेज लिया न मांगा। मेरे ऊपर ये सारे गलत आरोप हैं। मुझे मेरी बेटी वापस चाहिए। हो सके तो पत्नी भी वापस आ जाए। पर वह मेरे साथ रहना नहीं चाहती। कोर्ट में मुकदमा चल रहा है वह आपसी समझौते के लिए एक लाख रुपया मांग रही है। आपसी सहमति से तलाक में मुझे धन नहीं देना भले ही मैं जेल चला जाउंगा पर गलत के आगे नहीं झुकूंगा। बेटी को अपनी अभिरक्षा में लेने का तरीका बताएँ।

समाधान-

जो व्यक्ति जेल जाने को तैयार हो उस का मिथ्या आरोप कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जो आरोप आप पर लगाए हैं वे आप की पत्नी को सिद्ध करने होंगे। उस मुकदमे में आप को अपनी प्रतिरक्षा ठीक से करनी चाहिए।

त्नी यदि एक लाख रुपया ही आपसी सहमति के लिए मांग रही है तो यह राशि अधिक नहीं है। यह राशि पत्नी के भरण पोषण के लिए बहुत कम है। हो सकता है आप दस लाख के स्थान पर एक लाख लिख गए हों। यदि वह एक लाख ही मांग रही है तो हमारी राय है कि आप को आपसी सहमति से तलाक ले लेना चाहिए। लेकिन उस में आप शर्त यह रखें कि बेटी आप के साथ रहेगी और बाद में पत्नी कोई भरण पोषण नहीं मांगेगी तथा जो अपराधिक मुकदमा उस ने किया है उसे खारिज कराएगी।

प की समस्या के विवरण से यह पता नहीं लगता है कि आप की पत्नी या आप ने हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कोई आवेदन दिया हुआ है। बेटी की अभिरक्षा के लिए आप तभी आवेदन कर सकते हैं जब कि पति पत्नी के मध्य हिन्दू विवाह अधिनियम का कोई प्रकरण न्यायालय में चल रहा हो। आप पत्नी के साथ दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और साथ में धारा 26 में पुत्री की अभिरक्षा के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन बेटी की अभिरक्षा उसी को प्राप्त होगी जो उस की देखभाल ठीक से करने में समर्थ हो और जिस के साथ रहने में बेटी का हित हो। यह तथ्य न्यायालय स्वयं दोनों पक्षों की साक्ष्य के आधार पर तय करेगा।

बच्चे की अभिरक्षा के लिए न्यायालय बच्चे का हित देखेगा।

father daughterसमस्या-

युवराज ने बर्दमान, पश्चिम बंगाल से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 8 साल पहले हुई थी। मेरा एक 7 वर्ष का पुत्र भी है। पिछले तीन सालों से मेरी पत्नी मेरे बेटे को ले कर अपने मायके में निवास कर रही है क्यों कि उस के मायके में सिर्फ माँ अकेली है, पिता का देहान्त हो चुका है। और भाई शहर के बाहर नौकरी करता है। उस की माँ अपने गृहनगर में ही राज्य सरकार की नौकरी करती है। अब पत्नी मेरे साथ नहीं आना चाहती और आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है। उस के लिए मैं भी तैयार हूँ। लेकिन मैं अपने पुत्र की कस्टड़ी लेना चाहता हूँ। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

वास्तव में आप की कोई समस्या ही नहीं है। यदि आप की पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है तो आप उस के सामने शर्त रख सकते हैं कि आप तभी तलाक देंगे जब वह स्वेच्छा से आप के पुत्र की कस्टड़ी आप को दे देगी। इस के लिए यदि वह तैयार हो जाती है तो आप सहमति से तलाक लेंगे तब तलाक की अर्जी में लिख सकते हैं कि पुत्र आप के साथ रहेगा। वैसे भी सहमति से तलाक की अर्जी में आप दोनों को बताना पड़ेगा कि पुत्र किस के पास रहेगा।

पुत्र किस की कस्टड़ी में रहेगा या तो आप दोनों सहमति से तय कर सकते हैं, या फिर न्यायालय तय कर सकता है। यदि न्यायालय कस्टड़ी की बात तय करता है तो वह आप दोनों की इच्छा से तय नहीं करेगा बल्कि  देखेगा कि उस का हित किस के साथ रहने में है। यह तथ्यों के आधार पर ही निश्चित किया जा सकता है कि बच्चे की कस्टड़ी किसे प्राप्त होगी। वैसे पुत्र 7 वर्ष का हो चुका है और आप आवेदन करेंगे तो उस की कस्टड़ी आप को मिल सकती है। क्यों कि आप की पत्नी के पास आय का अपना साधन है यह आप ने स्पष्ट नहीं किया। जहाँ तक देख रेख का प्रश्न है तो निश्चित रूप से चाहे लड़का हो या लड़की माँ अपने बच्चों का पालन पोषण पिता से अधिक अच्छे से कर सकती है।

मारी राय है कि आप को बच्चे की कस्टड़ी के सवाल को अभी त्याग देना चाहिए और आपसी सहमति से तलाक ले लेना चाहिए। उस से आप एक नए जीवनसाथी के साथ अपना नया दाम्पत्य आरम्भ कर सकते हैं। बाद में आप को लगता है कि बच्चे का भविष्य माँ से बेहतर आप के साथ हो सकता है तो आप बाद में भी इस के लिए आवेदन कर सकते हैं।

बेटी की कस्टड़ी के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन किया जा सकता है।

Muslim-Girlसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से पुनः समस्या भेजी है कि-

मुझे लड़की की कस्टड़ी कितने दिनों में मिल सकती है। मैं क्या कर सकती हूँ? मैं उन की दूसरी पत्नी हूँ, पहली ने विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर ली थी। मैं ने भरण पोषण का मुकदमा किया था। उन्हों ने मुझे अपने साथ रखने को कहा तो मैं ने केस वापस ले लिया। लेकिन उन्होने बच्चा छीन कर मुझे फिर निकाल दिया। अब 498ए का मुकदमा चल रहा है अभी तारीख नहीं पड़ी है। मुझे अपनी बेटी चाहिए। बहुत छोटी है वो। मेरा समाधान करें।

समाधान-

कंचन जी, आप की समस्या को देखते हुए हम ने तुरन्त आप को समाधान दिया था। आप ने पूरा विवरण दिया होता तो हम तभी आप का समाधान उसी तरह देते। हम यहाँ समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। नियमित वकालत नहीं करते। फिर भी आप की समस्या को देखते हुए समाधान बता रहे हैं। कृपया आगे कोई कार्यवाही किए बिना कोई प्रश्न हम से न करें। करें तो इसी पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में करें आप को यहीं उत्तर दिया जा सके।

प को कस्टड़ी जल्दी मिल सकती है। क्यों कि छोटी उम्र की बच्ची को उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। आप को तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन देना चाहिए और अपने व बच्ची के खर्चे के साथ बच्ची की कस्टडी की राहत मांगनी चाहिए। उस में मजिस्ट्रेट धारा 21 के अन्तर्गत तुरन्त कस्टड़ी के लिए आदेश कर सकता है। बस आप को एक अच्छा स्थानीय वकील करना होगा।

498ए के मामले में आप शिकायतकर्ता हैं, मुकदमा पुलिस ने चलाया है और सरकारी वकील उस की पैरवी करेगा। जब उस में साक्ष्य ली जाएगी तब आप को केवल बयान के लिए समन आएगा। उस के पहले आप को कोई सूचना प्राप्त नहीं होगी।

प चाहें तो परिवार न्यायालय में धारा-9 या धारा-10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना या न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए आवेदन कर सकती हैं। उस के साथ ही बच्ची की कस्टड़ी प्राप्त करने के लिए भी आवेदन कर सकती हैं। लेकिन यह बताना कठिन है कि बच्ची की कस्टड़ी कितने दिन में मिल सकती है।

आप को बेटी की कस्टडी मिल सकती है।

born after faild tubectomyसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मैं ने लव मैरिज की है और मेरा पति मुझे मारता है, मेरी 18 माह की बेटी है जो उस ने मेरे से छीन ली है और मुझे घऱ से बाहर निकाल दिया है। मैं ने 498ए का केस किया था लेकिन उस में उन लोगों ने जमानत ले ली। मेरे से नोटेरी करवाई है कि लड़की पर मेरा कुछ भी हक नहीं होगा। क्या लड़की मैं नहीं ले सकती? कृपया समाधान करें।

समाधान-

ति से विवाद होने पर सब से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि आप के पास सपोर्ट क्या है? यदि आप आत्मनिर्भर हैं, अर्थात आप स्वयं अपना खर्च उठा सकती हैं और बेटी की देखभाल कर सकती हैं तो सब से बेहतर है। यदि नहीं है तो सब से पहले आप को यह सोचना चाहिए कि आप का अकेले जीवन गुजारने का साधन क्या बनेगा और मुकदमा लड़ने के लिए आप का सपोर्ट क्या होगा।

धारा 498ए में जमानत तो हो ही जाती है। मुकदमा चलेगा और उस का साबित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि आप खुद न्यायालय के समक्ष क्या बयान करती हैं। आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत कार्यवाही कर के सुरक्षा, निवास की सुविधा, बच्चे की कस्टडी और अपने और बच्चे के लिए भरण पोषण का खर्च मांगना चाहिए। दूसरी ओर पारिवारिक न्यायालय में आवेदन दे कर न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए साथ में बच्चे की कस्टडी के लिए भी आवेदन करना चाहिए। आप को बच्चे की कस्टडी मिल सकती है। विशेष रूप से तब जब कि वह बालिका है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप के पति ने आप से कुछ लिखवा कर नोटेरी करवा लिया है। वह सब कुछ दबाव में भी हो सकता है जैसा कि प्रतीत होता है।

प जान लें विवाह किसी भी रीति से हो कानून के समक्ष वह विवाह होता है और उस के दायित्व और कर्तव्य समान होते हैं। हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है और किसी भी तरह से स्त्री को अधीन बनाने के रास्ते तलाशता रहता है। आप बच्चे के साथ प्रेम के कारण अपने पति के साथ बनी रहेंगी और जीवन भर यातनाएँ सहन करती रहेंगी। इसी कारण आप से बच्चे को छीन लिया गया है। आप यदि आत्मनिर्भर नहीं हैं तो उस तरफ कदम रखिए। एक स्त्री का सम्मान जनक स्थान समाज में इसी बात पर निर्भर करता है कि वह आत्मनिर्भर है या नहीं।

सहमति से विवाह विच्छेद हो तो संतान की कस्टडी और खर्चे के बारे में भी आपसी सहमति बनाएँ …

mother_son1समस्या-

संध्या ने भोपाल, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2012 में हुई थी। मेरा 8 महीने का एक बेटा है। शादी के बाद से ही पति मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर थे, मैं ने तंग आकर महिला हेल्प लाइन में कंप्लेंट कर दी। अब मैं अपनी माँ के पास रह रही हूँ। मैं ने तलाक़ लेने का निर्णय किया है। पर मैं सहमति से तलाक़ चाहती हूँ। जब मेरे वकील ने मेरे पति से पूछा तो उन्होने भी सहमति व्यक्त की है। मैं केन्द्रीय सरकार की सेवा में हूँ और पति प्राइवेट बिजनेस करते हैं। ससुराल में एक घर जो सास ने बनाया है, 10 बीघा ज़मीन जो ससुर के नाम है और एक दुकान मेरे पति के नाम है। यही संपत्ति है। अभी लीगली बटवारा नहीं हुआ है। सहमति से तलाक़ होने पर मैं अपने पति से अपने लिए या मुझे ना भी मिले तो अपने बेटे के लिए उक्त संपत्ति में हिस्सा माँग सकती हूँ। अगर हाँ तो उस का निर्धारण किस प्रकार से होगा?

समाधान-

प स्वयं केन्द्रीय सरकार की नौकरी में हैं वैसी स्थिति में कानूनन आप कितना प्राप्त करने की स्थिति में हैं यह तभी बताया जा सकता है जब कि यह तथ्य ज्ञात हो कि आप के पति की आय कितनी है और आप खुद कितना कमाती हैं। फिर भी इस बात की संभावना कम है कि आप को कुछ आर्थिक सहायता प्राप्त हो।

प का विवाह विच्छेद हो जाने पर भी आप के पुत्र का संबंध तो सदैव ही उस के पिता से बना रहेगा। इस कारण उस के पिता से जो अधिकार हैं वे भी सदैव बने रहेंगे। पुत्र की कस्टडी और उस के पालन पोषण के खर्चों के लिए धनराशि जो पति आप को निरन्तर देते रहें आपसी सहमति से निर्धारित की जा कर आवेदन में अंकित की सकती है और न्यायालय इसे विवाह विच्छेद की डिक्री में अंकित कर सकता है।

जो भी संपत्ति आप की सास, ससुर व पति के नाम है उस पर उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार नहीं है। हाँ पुत्र का भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है जिस के लिए जब भी आवश्यकता हो तब यदि पुत्र आप की कस्टडी में रहता है तो आप के माध्यम से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। न्यायालय आप दोनों की आय और संपत्ति को ध्यान में रखते हुए पुत्र के लिए भरण पोषण की राशि निर्धारित कर सकता है।

दि आप के और आप के पति के बीच सहमति बनी है तो आप पति के साथ बातचीत कर के इन मसलों पर पहुँच सकती हैं। यदि आप के पति आप से विवाह विच्छेद के लिए सहमत हैं तो पुत्र की कस्टडी और भविष्य के खर्चों पर भी आपसी सहमति बन सकती है। बेहतर यही है कि यह सब आपसी सहमति से तय हो और विवाह विच्छेद की डिक्री में सम्मिलित कर लिया जाए।

सब से पहले दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत कराएँ…

father daughterसमस्या-

अनाम अग्रवाल ने होशंगाबाद मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे दोस्त की शादी जुलाई 2012 में हुई। उस की पत्नी का पहले से किसी और से अफेयर था। दोस्त की सास उन के घर में ज़्यादा इंटरफेयर करती थी। इसी बात में एक दिन उसकी पत्नी 12 जुलाई 2013 को अपने माँ बाप के घर चली गई। वहीं 3 महीने बाद सितम्बर 2013 में एक बेटे को जन्म दिया। दोस्त के घर वाले और दोस्त पत्नी को देखने भी गये और लाने की कहने पर भी पर दोस्त की सास ने नहीं लाने दिया। फिर करीब 6 महिने बाद दोस्त और उसकी पत्नी की बात शुरू हुई और वो अपने पति की शर्तों पर आने तो तैयार हो गई। दोस्त बच्चे के खातिर सब बातें भुला के उस को वापस ले आया। फिर अगस्त 2014 में राखी पर उसके मायके गई और वहाँ उसके एक्स-ब्वायफ्रेंड से मिलने के लिए रुक गई। मन से झूठी कहानी बना कर कह दिया कि मुझे ससुराल में पति मारते हैं और परेशान करते हैं, वह पति के साथ नहीं चाहती। मेरे दोस्त ने अपने बेटे के जन्म दिन पर उसे फ़ोन लगाया तो उस ने बेटे से नहीं मिलने दिया। दो दिन पहले ही उसकी बड़ी बहन के घर बेटे को ले कर चली गई और कहा कि यदि तुमने किसी को मेरे अफेयर का बताया तो मैं बेटे को जान से मार दूँगी। मेरे दोस्त ने उस की ये बातें अपने घर वालों को बता दीं लेकिन बदनामी के दर से उस के अफेयर का किसी को कुछ नहीं बता पा रहा है क्यों कि उसके पास कोई पक्का सबूत नहीं है। ना कोई कॉल रिकॉर्डिंग है। वह बहुत डिप्रेस्ड है किसी से कुछ बोल नहीं पा रहा है। वो क्या करे जिस से कि उस का एक वर्ष दो माह का बच्चा उसके पास आ जाए।

समाधान-

र्तमान परिस्थिति में किसी भी प्रकार से यह संभव नहीं है कि आप के मित्र का पुत्र उसे मिल जाए।

प के मित्र केवल संतान को चाहते हैं। लेकिन पत्नी को वह भी अपने पास नहीं रखना चाहते। पत्नी स्वयं भी नहीं आना चाहती है। स्थिति ऐसी है कि दोनों का संबंध टूटने की तरफ बढ़ रहा है। ऐसी अवस्था में आप के मित्र को तुरन्त दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए।

स के प्रतिवाद में पत्नी 406, 498 ए आईपीसी के अपराधों के लिए मिथ्या परिवाद प्रस्तुत कर सकती है और आप के मित्र कुछ परेशानी में पड़ सकते हैं। लेकिन केवल इन धाराओं में मुकदमा और गिरफ्तारी के भय से पुरुष कोई कार्यवाही नहीं करते हैं और देर हो जाती है। देर सबेर पत्नियाँ इन धाराओं के अंतर्गत कार्यवाही करती हैं तो तब बचाव करना भी कठिन हो जाता है। बचाव में सब से पहले धारा 9 का आवेदन प्रस्तुत करने की जरूरत पड़ती है। इस कारण यह अधिक अच्छा है कि धारा 9 का आवेदन तुरन्त प्रस्तुत किया जाए। उस का परिणाम देखा जाए। अभी आप के मित्र के पास पत्नी से विवाह विच्छेद का कोई आधार नहीं है। लेकिन यदि धारा 9 के आवेदन स्वीकार हो कर डिक्री मिल जाने के बाद भी एक वर्ष तक पत्नी और पति के बीच कोई संपर्क नहीं होता है तो उसी आधार पर विवाह विच्छेद भी हो सकता है। एक बार धारा 9 का आवेदन लंबित हो जाने पर पुत्र की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

झूठ के पैर नहीं होते

hindu-marriage-actसमस्या-

दिनेश ने  नैनीताल, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरा विवाह 10 मई 2006 को हिंदू रीति रिवाज से हुआ था। , मेरे दो पुत्रियाँ हैं, एक 7 साल की है ओर एक 5 साल की हो चुकी है। मेरी पत्नी अपने पिता के कहने पर चलती है और नवम्बर 2006 से अपने मायके में रह रही है जब कि दोनों बेटी मेरे पास है जो स्कूल में पढ़ती हैं, मेरी पत्नी ने मुझ पर सीजेएम कोर्ट में एक वकील से आवेदन प्रस्तुत करवा कर मुझ पर 498ए, 323, 504 आईपीसी का मुक़दमा दर्ज करवाया। जिस में मुझे पुलिस के दवाब में सरेंडर करना पड़ा और मैं 3 दिन हिरासत में रहा। जब कि मैं मार्च में फॅमिली कोर्ट में धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम का आवेदन प्रस्तुत कर चुका था। क्या मुझ को कोर्ट हिरासत में भेज सकती थी जब कि चार्ज शीट अभी प्रस्तुत नहीं हुई है? ये एक महीने पहले की बात है। क्या मेरी पत्नी मुझ से हर्जे खर्चे की अधिकारी है? क्या वो मुझ से मेरी पुत्रियों की कस्टडी ले सकती है? जब कि मैं उस को बच्चे नहीं देना चाहता। मेरी पत्नी खुद मुझ को छोड़ कर अपने मायके में अपने पिता के साथ अपनी मर्ज़ी से गई है। लेकिन इस का कोई भी सबूत मेरे पास नहीं है।

समाधान-

प ने जो समस्या लिख कर भेजी है उस में कोई गलती है। 10 मई 2006 को आप का विवाह हुआ और पत्नी नवम्बर 2006 से मायके में रह रही है। फिर आप के सात और पाँच वर्ष की दो बेटियाँ कैसे हो गईं? यदि 2006 से आप की पत्नी मायके में है तो फिर 498-ए का मुकदमा कैसे हुआ? क्यों कि उस में तो घटना के तीन वर्ष बाद प्रसंज्ञान नहीं लिया जा सकता। ऐसा लगता है कि आप के विरुद्ध मिथ्या प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई गई है। आप चाहें तो इस प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त करवाने के लिए उच्च न्यायालय में निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। जब तक प्रथम सूचना रिपोर्ट न पढ़ी जाए और उस पर आप से बात न की जाए तब तक उस के बारे में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। यह काम आप के स्थानीय वकील बेहतर कर सकते हैं।

जिस्ट्रेट आप को हिरासत में भेज सकता था इस कारण ही उस ने हिरासत में रखा। जब न्यायालय को लगा कि आप को हिरासत में रखा जाना उचित नहीं है तो उस ने आप की जमानत ले ली।

झूठ के पैर नहीं होते। यदि आप के विरुद्ध मामला बनावटी और मिथ्या है तो यह न्यायालय में नहीं टिकेगा। आप को एक ही भय हो सकता था कि आप को हिरासत में न भेज दिया जाए। अब आप वहाँ हो कर आ चुके हैं इस कारण डरने का कोई कारण नहीं है। आप मुकदमे में प्रतिरक्षा करें। यदि आप के वकील ने ठीक से मामले में प्रतिरक्षा की तो मामला मिथ्या सिद्ध हो जाएगा।

प की पत्नी जब तक विवाह विच्छेद न हो जाए और दूसरा विवाह न कर ले तब तक आप से भरण पोषण का खर्च मांग सकती है। पत्नी होने के नाते उसे यह अधिकार है आप उस के लिए तभी मना कर सकते हैं जब कि आप की पत्नी के पास आय का कोई स्पष्ट साधन हो।

दि आप की पत्नी बच्चियों की कस्टडी के लिए आवेदन करती है तो न्यायालय इस तथ्य पर विचार करेगा कि बच्चियों की भलाई किस में है और उन का भविष्य कहाँ सही हो सकता है। आप की छोटी बेटी 5 वर्ष की हो चुकी है। मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी उन की कस्टड़ी आप से ले सकती है।

पकी पत्नी स्वयं आप को छोड़ कर गई है इस का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं हो सकता। लेकिन आप गवाहों के बयानों से साबित कर सकते हैं कि ऐसा हुआ है।

सामान्य परिस्थिति में संतान की अभिरक्षा वयस्क होने तक माता को ही प्राप्त होती है।

mother_son1समस्या-

सारिका ने मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल से समस्या भेजी है कि


मेरे पति डिलिवरी के पहले से ही मुझे धमकी देते थे कि मेरा बच्चा मुझे दे दो और तुमको जहाँ जाना हो चली जाओ। इसके अलावा वो शराब पीकर मेरे बच्चे के पास आते हैं जिससे उस पर बुरा असर पड़ता है। वो अभी छोटा है और उल्टियाँ करने लगता है।  हमारी विचारधारा में बहुत अंतर है और हमारे बहुत झगडे होते हैं। मेरे पति अक्सर मुझे कहते हैं की अगर मुझे अलग होना है तो वो आसानी से मुझको तलाक दे देंगे। शादी के वक्त उन्होंने अपनी असली उम्र छुपा ली थी। बाद में मुझे पता चला कि वो मुझसे 15 साल बड़े हैं। जनरेशन गैप के कारण वो चाहते हे की मैं उनके पैर के निचे रहूँ।  कहते हैं कि हम तुम्हे मारेंगे भी पीटेंगे भी, अगर रहना है तो रहो वर्ना मत रहो। मेरे परिवार में मेरी माँ अकेली है और कोई नहीं है जो मेरा साथ दे सके। मेरे पति को अगर मैं सहमति से तलाक का आवेदन लगाती हूँ और उन्होंने सहमति से तलाक नहीं लिया मुकर गए तो में अगला स्टेप क्या उठा सकती हूँ? मेरा बच्चा 5 महीने का है और मैं सेंट्रल की जॉब में हूँ और मेरे पति प्राइवेट जॉब में। मैं चाहती हूँ कि न केवल मेरा बच्चा 7 साल के लिए बल्कि हमेशा के लिए मेरे पास रहे। मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे पति से अलग हो जाना चाहिए या उनकी गाली गलौच बर्दाश्त करके रहना चाहिए क्यों कि मेरा बच्चा बहुत छोटा है।

समाधान-

पका विवाह बेमेल विवाह है। आप के पति ने अपनी उम्र छुपा कर आप से विवाह तो कर लिया लेकिन उन्हें अब अहसास है कि उन्हों ने गलती की है। वे खुद उस विवाह को संभाल नहीं पा रहे हैं। वे आप से अलग होना चाहते हैं। लेकिन वे चाहते हैं या तो तलाक सहमति से हो या फिर आप खुद उस के लिए पहल करें।

प का बच्चा छोटा है केवल इस आधार पर आप का इस बेमेल विवाह में रहना उचित नहीं है। यह न केवल आप के लिए अपितु आप की संतान के लिए भी ठीक नहीं है।जरा आप सोचिए बच्चे को पालने में सर्वाधिक बल्कि लगभग पूरा योगदान आप का है। आप के पति का योगदान नहीं के बराबर रहा होगा। यदि आप खुद इस संबंध से खुश और सुखी नहीं है तो आप की संतान जिसे पालने की सर्वाधिक जिम्मेदारी आप उठा रही हैं, उस का पालन पोषण भी आप ठीक से नहीं कर सकतीं और नही उसे पालन पोषण के लिए अच्छा वातावरण दे सकती हैं।

प जिन परिस्थितियों में हैं उन में हमारी राय में आप को तुरन्त पति का घर छोड़ कर अलग अथवा अपनी माता जी के साथ रहना आरंभ कर देना चाहिए। उस के बाद आप अपने पति से बात करें कि क्या वह सहमति से विवाह विच्छेद के लिए तैयार है या नहीं। तब आप अपनी शर्त स्पष्ट कर दें कि बच्चा वयस्क होने (18 वर्ष की उम्र) तक आप के साथ रहेगा। वयस्क होने के बाद न्यायालय यह तय नहीं करेगा कि बच्चा किस के पास रहेगा। तब बच्चा खुद निर्णय करेगा कि वह किस के साथ रहे। बच्चे के भरण पोषण के लिए पिता का क्या योगदान होगा यह भी आप सहमति  से विवाह विच्छेद के समय तय कर सकते हैं।

दि आप के पति सहमति से विवाह विच्छेद के लिए तैयार न हों या ऐसी संभावना हो कि वे प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही अपनी सहमति वापस ले सकते हैं तो आप सहमति से विवाह विच्छेद के स्थान पर हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-13 के अन्तर्गत अपनी ओर से विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के लिए पति का जो व्यवहार है वह क्रूरतापूर्ण व्यवहार की श्रेणी का है और उस आधार पर आप को आसानी से विवाह विच्छेद मिल जाएगा।

हाँ तक बच्चे की अभिरक्षा का प्रश्न है तो वह निर्णय न्यायालय बच्चे के हित को देखते हुए करता है। सामान्य परिस्थितियों में बच्चे का हित उस की माँ के साथ ही होता है इस कारण से अधिकांश निर्णय यही होता है कि बच्चा माँ के साथ रहेगा। आप की परिस्थितियों में भी इस बात की संभावना अत्यधिक है कि बच्चे की अभिरक्षा उस के वयस्क होने तक आप के पास ही रहे।  इस मामले में आप को चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है।

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