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धारा 9 का आवेदन लंबित होने पर संतान की कस्टडी के लिए धारा 26 में आवेदन प्रस्तुत करें

समस्या-

रणधीर सिंह ने गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम रणधीर है और मैं एक प्राइवेट जॉब करता हूँ। मेरी पत्नी सरकारी टीचर है हमारी शादी 20/05/2013 को हुई थी। हमारा एक ११ माह का बेटा भी है जिसे वो अपना साथ लेकर ८ माह से अपने मायके में रह रही है। शादी के बाद से ही उसका व्यवहार मेरे और मेरे घर वालो के प्रति ठीक नहीं था। शादी के १५ दिन बाद जब वो अपने घर गई और बाद में जब मैंने उसे आने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया । उस ने कहा कि जब आना होगा तो बता देंगे। फिर कुछ दिन बाद जब मैं उसके घर जा के बात किया तो वो आयी। कुछ दिन तक ऐसे ही चलता रहा वो हमेशा अपने घर चली जाती है और बार बार कहने पर ही आती है। जब वो मेरे घर पे रहते तो उसके घर से किसी न किसी बहाने लोग लेने चले आते थे जिस वजह से हम में कई बार झगड़ा भी हो जाता था। उसने बिना हमें बताये बच्चे का मुंडन करा दिया है। जब इस बात को ले कर हमारा झगड़ा हो गया जिसके बाद से वो और उसके भाई मुझे बच्चे से नहीं मिलने दे रहे हैं। जब मैं बच्चे से मिलने के लिए जाता हूँ तो वो गाली गलौज करते हैं और बच्चे को कमरे में बंद कर देते हैं। वे धमकी देते हैं कि वो मुझ पे पुलिस केस कर देंगे। अभी मैंने 20/11/2016 को हिन्दू विवाह अधिनियम से विदाई का दावा किया है जिसकी तारीख  03/02/2017 को है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि मैं अपने बच्चे से मिलने के लिए क्या कर सकता हूँ? जिससे मैं अपने बच्चे से कुछ समय के लिए मिल सकूँ? और यदि वो हम पे 498 और घरेलू हिंसा का केस करती है और हम उस से बरी हो जाते है तो मैं उस पे आपराधिक मानहानि का केस कर सकता हूँ या नहीं?

समाधान-

आप के मामले में सारा झगड़ा बराबरी के व्यवहार का प्रतीत होता है। आप की पत्नी स्वावलंबी है और आप से ही नहीं आप के परिवार के लोगों से भी समानता का व्यवहार चाहती है। लेकिन आप के पारिवारिक सेटअप में वह संभव प्रतीत नहीं हो रहा है। यदि आप और आप का परिवार समान व्यवहार की बात को स्वीकार कर ले तो आप दोनों के बीच की समस्या हल हो सकती है अन्यथा आप के पास विवाह विच्छेद का ही मार्ग रह जाएगा।

आप ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रकरण प्रस्तुत कर दिया है। इस कारण से आप को अधिकार है कि आप बच्चे की कस्टडी और उस से मिलने के लिए समय और तरीका निर्धारित करने हेतु न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

यदि आप के विरुद्ध आप की पत्नी घरेलू हिंसा में कोई आवेदन प्रस्तुत करती है और वह मिथ्या सिद्ध होता है तो आप उस के विरुद्ध अपराधिक मानहानि का मुकदमा कर सकते हैं साथ ही आप दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए वाद प्रस्तुत कर हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं।

बेटी की कस्टड़ी माँ के पास ही रहेगी।

mother_son1समस्या-

भाग्यश्री ने फरीदाबाद, हरियाणा से पूछा है-

शादी को 3 साल हो गये। दो साल की बेटी है। मरे पति पैसे के लिए मुझ से झगड़ा करते हैं। कई बार मारा भी। मैने इस की सूचना महिला थाने को दी। वो कई बार सुलह करा के जाते हैं। पर फिर वही बर्ताव। मुझे भूखा रखा जाता है सब के सामने हर बात मान लेते हैं जिस से मैं ही गलत लगती हूँ। अब मैं ने मुकदमे के लिए पत्र दिया है तो मुझे क्या करना होगा। क्या बच्ची मुझे मिल जाएगी। मेरे कितने पैसे खर्च होंगे इस में?

समाधान-

प की समस्या से स्पष्ट नहीं हुआ कि आप चाहती क्या हैं? यह तो सही है कि आप उस व्यक्ति के साथ जीवन निर्वाह नहीं कर सकतीं। पति से अलग रहने का आप के पास वाजिब कारण है। इस कारण आप अलग रह सकती हैं। अपने लिए भरण पोषण प्राप्त कर सकती हैं। बच्चों की कस्टड़ी का आधार बच्चों का हित है। बेटी की उम्र दो वर्ष की है, उस का हित आप के साथ रहने पर है और उसे आप से अलग नहीं किया जा सकता।  कोई भी अदालत उसे आप से अलग नहीं होने देगी। बेटी आप के साथ रहेगी तो आप उस के लिए भी भरण पोषण मांग सकती हैं और आप को यह सब मिलेगा।

आप तुरन्त अन्तरिम रूप से राहत मांग सकती हैं न्यायालय आप को दे सकता है। मुकदमों का खर्च स्थान भेद से भिन्न भिन्न होता है। फरीदाबाद दिल्ली से लगा हुआ है इस कारण उस पर महानगर का असर है इस कारण खर्च तो जो होगा वह होगा। वकील की फीस ही सब से अधिक होगी. वह आप को तय करनी पड़ेगी। लेकिन जैसे ही आप को अन्तरिम राहत प्राप्त होगी आप के लिए वकील की फीस देना उतना कठिन नहीं रहेगा। आप चाहें तो वकील को कह सकती हैं कि आप आरंभ में नोमिनल खर्चे की रकम दे पाएंगी।लेकिन जैसे ही भरण पोषण की राशि मिलने लगेगी नियमित किस्तों में फीस भी दे देंगी। वकील इस प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता है।

अन्त में आप को हमारी सलाह है कि आप को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। भरण पोषण के सहारे जीवन व्यतीत नहीं होता और व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है। आप इतना आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लें कि खुद ठीक से जी सकें और बेटी की परवरिश कर सकें। यदि आप ऐसा सोचती हैं तो आप अपने पति से तलाक ले कर अलग भी हो सकती हैं। आप चाहें तो किसी नए जीवन साथी के साथ अपना जीवन भी आरंभ कर सकती हैं।

खेती की जमीन में पुत्री का अधिकार

agriculture landसमस्या-

नीता ने दिल्ली से हरियाणा राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं ग्राम चरखी, तहसील दादरी, जिला भिवानी, हरियाणा से हूँ। मैं जानना चाहती हूँ कि क्या पिता जी के जीवित रहते बेटी पुश्तैनी जमीन में अपना हिस्सा ले सकती है? हम तीन भाई व दो बहनें हैं। हम सभी शादीशुदा हैँ। माता पिता जीवित हैं। मेरे पिता जी के पास ३२ एकड़ पुश्तैनी जमीन थी। जो कि मेरे पिता जी के पिता उनके पिता उन के फिर उन के पिता फिर उनके पिता से पीढियों से आई थी। लगभग २० साल पहले मेरे पिता जी ने हक त्याग कर के करके आठ-आठ एकड़ जमीन मेरे तीनों भाईयों के नाम करा दी तथा आठ एकड़ अपने नाम रख ली। हम दोनों बहनों से पूछा भी नहीँ गया। ऐसा करते समय पिता जी ने हमें बताया भी नहीं। हम दोनों बहनों के कहीं हस्ताक्षर भी नहीं हैं। हमें अन्धेरे मे रखा गया। हमें इस की जानकारी अभी एक महीना पहले लगी है। अब मैं मेरे हिस्से की जमीन लेना चाहती हूँ। क्या अब भाईयों के नाम की गई जमीन रद्द हो सकती है? क्या मुझे ३२ एकड़ में मेरा हिस्सा मिल सकता है? अब मुझे मेरे हिस्से की कितने एकड़ जमीन मिल सकती है? मेरे हिस्से की जमीन लेने के लिए मुझे क्या करना होगा? इस विषय में इस सन्दर्भ मे कोई सुप्रीम कोर्ट के आदेश हों तो उस की जानकारी दें। इस के साथ ही कानूनी कार्यवाही की जानकारी उपलब्ध कराएँ।

समाधान-

तीसरा खंबा किसी व्यक्ति का वकील नहीं है। हम केवल समाधान सुझाते हैं। यदि किसी को वह समाधान अच्छा लगता है तो वह आगे कार्यवाही कर सकता है। हम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला भी तभी देते हैं जब जरूरी हो जाता है। यह सब काम भी नहीं आता। जब समाधान के लिए आप अदालत जाएंगे तो आप को वकील करना ही होगा। तब जो विवाद बिन्दु निर्धारित होंगे उस के हिसाब से न्यायालयों के निर्णय वह खुद तलाश लेगा। इस के लिए अभी से सहेजे हुए निर्णय बेकार भी सिद्ध हो सकते हैं।

प के कथनों के अनुसार आप के पिता की जमीन पुश्तैनी थी। पुश्तैनी जमीन में 17 जून 1956 के पहले लड़कियों को अविवाहित रहने तक ही केवल जीवन निर्वाह का हक था। उन का कोई हिस्सा नहीं था। यदि आप के दादा जी का देहान्त उक्त तिथि के उपरान्त हुआ है और आप के बुआएँ भी हैं तो फिर आप के दादा जी की जमीन का उत्तराधिकार पुश्तैनी जमीन के हिसाब से नहीं अपितु उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार तय होना चाहिए था। यदि ऐसा हुआ है तो आप के पिता के हिस्से में जो जमीन आयी उस पर आप का कोई अधिकार पिता के जीवित रहते नहीं था। यदि उन्हों ने अपने और पुत्रों के बीच तब आपस में बँटवारा कर लिया और उस के हिसाब से हकत्याग कर के जमीन के हिस्से कर लिए तो उस पर अब आपत्ति उठाना संभव प्रतीत नहीं होता।

लेकिन वह बँटवारा या हकत्याग या रिकार्ड में कोई अन्य परिवर्तन कानून के हिसाब से गलत हो तो 2005 में बेटियों को जन्म से पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार प्राप्त हो गया है और आप बँटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं। इस के लिए आप को 17 जून 1956 के पूर्व से आज तक के राजस्व रिकार्ड को खंगालना होगा और उस में हुए परिवर्तनों की जाँच करनी होगी कि वे तत्कालीन कानून के हिसाब से हुए हैं या नहीं? उस जमीन में आप का हक बनता है या नहीं? इस के लिए आप को किसी अच्छे और विश्वसनीय स्थानीय वकील से मदद ले कर सारे रिकार्ड की जाँच करवानी चाहिए और फिर उस की राय के हिसाब से कार्यवाही करनी या नहीं करनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश में विवाहित पुत्रियों को कृषि भूमि में हिस्सा नहीं।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

अनिता तिवारी ने सोरों कासगंज, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

ग्रीकल्चर लैंड की 22 बीघा जमीन मेरे नाम ना आकर मेरे भाई के नाम आ गयी है। हम दो बहनें एक भाई शादी शुदा हैं ये जमीन मेरी माँ के पास थी मेरी माँ की म्रत्यु सन 2008 में हो चुकी है। मैं जानना चाहती हूँ की बेटी का हक माँ की जमीन पर क्यों नहीं? मेरा भाई उस जमीन को बेच बेच कर शराब व जुआ तथा अनैतिक कार्यों में लगा रहा है। कोई कानून है जिस से मैं अपने भाई को जमीन बेचने से रोक सकूँ या मैं अपना हिस्सा पाने के लिए किस कानून के तहत मुकदमा डालूं।

समाधान-

ह आप का दुर्भाग्य है कि आप की जमीन उत्तर प्रदेश में है। लगभग पूरे देश में कृषि भूमि पर हिन्दू उत्तराधिकार कानून प्रभावी है। लेकिन उत्तर प्रदेश इस मामले में आज के भारत में नहीं, 18वीं सदी के किसी राजा के राज्य में स्थित है। वहाँ कृषि भूमि के मामले में आज भी यही कानून है कि विवाहित पुत्रियों को कृषि भूमि पर हिस्सा तब मिलता है जब परिवार में दूर दूर तक कोई पुरुष ही नहीं हो। अविवाहित पुत्रियों को हिस्सा भी 2008 में किए गए संशोधन के बाद मिलने लगा है।

त्तर प्रदेश की महिलाएँ और कथित नारीवादी अभी तक सोए हुए हैं। उन्हें जागने और यह कानून बदलवाने की जरूरत है। आप आवाज उठाइए। अन्य लोगों के साथ मिल कर उठाइए। भाई यदि इस तरह संपत्ति को बर्बाद कर रहा है तो उस के पत्नी और बच्चे सवाल कर सकते हैं। इस मामले में आप किसी स्थानीय वकील से संपर्क कर सलाह लें तो हो सकता है वह आप से पूरी परिस्थितियाँ जान कर कोई उपाय बता सके।

राजस्थान में कृषि भूमि में बेटियों का अधिकार।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राजेश कुमार ने बाँसवाड़ा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी की दो पत्नियां थीं। जिस में से पहली पत्नी की एक पुत्री एव दूसरी पत्नी की दो संताने जिस में एक पुत्र एव एक पुत्री थी। मेरे दादाजी की मृत्त्यु 1982 में हुई। दादाजी की मृत्त्यु के बाद दिनांक 7/2/1983 को पहली पत्नी की पुत्री का नाम काश्तकार भूमि में दर्ज किया गया है जिस की जानकारी दादाजी की दूसरी पत्नी के पुत्र व पुत्री को नही थी। अब मेरे पिताजी एवं माता जी की मृत्यु दिनांक 11/11/2014 व 15/11/2014 को हुई व मेरी बुआजी की मृत्यु भी 2014 में हो गई हे अर्थात् मेरे दादाजी की दूसरी पत्नी के दोनों संतान पुत्र व पुत्री की मृत्यु हो चुकी हे तथा मेरे दादाजी की पहली पत्नी की सन्तान (पुत्री) जीवित है। भू-अभिलेख से रिकॉर्ड निकालने पर पता चला कि मेरे पिताजी एव मेरे पिताजी की सोतेली बहन (दादाजी की पहली पत्नी की पुत्री) का नाम दिनांक 7/2/1983 में दर्ज हे। लेकिन मेरे दादाजी की म्रत्यु 1982 में हो चुकी थी उनकी म्रत्यु के बाद केवल उनके पुत्र का नाम था किन्तु पिताजी की जानकारी के बिना सोतेली बहन का नाम भी दर्ज करवाया गया। क्या उनका इस भूमि में दादाजी की मृत्यु (1982) के बाद बिना किसी को जानकारी के (7/2/1983) को अपना नाम दर्ज करवाना कानूनन सही था। क्या मेरी सौतेली बुआजी का उस काश्तकार भूमि में या उनकी संतानो का हक होगा या नहीं और यदि होगा भी तो किस अनुपात में होगा। मेरे पिताजी की सगी बहन जिनकी भी मृत्यु हो गई हे क्या उनकी संताने भी हक मांग सकती हैं या नहीं जब कि इनका राजस्व रिकार्ड में नाम दर्ज नहीं है ।

समाधान-

प की समस्या यह है कि आप के पिता की सौतेली बहन का नाम तो राजस्व रिकार्ड में चढ़ा हुआ है लेकिन सगी बहन का नहीं। लगता है सारी भूमि का उपयोग आप के पिताजी करते आ रहे हैं और अब आप करना चाहते हैं। जब भी आप की सौतेली और सगी बुआएँ चाहेंगी अपना हिस्सा मांगेंगी आप को देना न पड़ जाए वरना आप के कब्जे की जमीन एक तिहाई रह जाएगी।

प का पहला प्रश्न यह है कि आप की सौतेली बुआ का नाम आप के पिता की जानकारी के बिना चढ़ा वह गलत था या सही। अब उसे गलत या सही बताने का कोई अर्थ नहीं है। वह नाम चढ़ा हुआ है।

प का दूसरा प्रश्न यह है कि उन का और आप की सगी बुआ के हिस्से बनते हैं या नहीं। 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हो गया था। राजस्थान में कृषि भूमि की खातेदारी का उत्तराधिकार इसी अधिनियम से तय होता है। इस अधिनियम की धारा-6 इस प्रकार थी कि यदि कोई पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति हुई और उस में हिस्सेदार किसी मृतक हिन्दू पुरुष के कोई पुत्री हुई तो उस के हिस्से का उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार होगा। यदि संपत्ति पुश्तैनी नहीं है तो भी धारा 8 के अनुसार ही होगा।

प के दादा के एक नहीं दो दो पुत्रियाँ थी इस कारण उन का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार होगा। जिस में पुत्रों और पुत्रियों को समान अधिकार दिया गया है। इस तरह आप के दादा जी की भूमि में तीनों संतानों अर्थात आप के पिता और उन की दोनों सौतेली और सगी बहनों को बराबर का हिस्सा प्राप्त हुआ। भले ही उक्त सारी जमीन आप के पिता के कब्जे में रही हो लेकिन उस में उन की दोनों बहनों का भी समान अधिकार है। आप के पिता की सगी बहिन की मृत्यु के बाद बहिन के उत्तराधिकारियों का उस एक तिहाई हिस्से पर हक है वे खातेदार के रूप में नाम दर्ज करवा सकते हैं और जब चाहें तब बंटवारा भी करवा सकते हैं।

प की सौतेली बुआ का नाम खाते में सही दर्ज हुआ था। गलती यह हुई कि आप की सगी बुआ का नाम दर्ज नहीं हो सका। लेकिन नामान्तरण किसी संपत्ति के हक का दस्तावेज नहीं है। संपत्ति का हक तो हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से ही तय होगा। यदि सारी जमीन आप के कब्जे में है तो आप की सौतेली बुआ और सगी बुआ के उत्तराधिकारी कभी भी अपना अलग हिस्सा बंटवारे के रूप में मांग सकते हैं। आप के पिता का हिस्सा एक तिहाई ही है। बाकी के व ट्रस्टी थे अब आप ट्रस्टी हैं।

दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के आवेदन के साथ बेटी की अभिरक्षा के लिए आवेदन किया जा सकता है।

Adoptionसमस्या-

संदीप ने गुड़गाँव, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मुझ पर पत्नी ने धारा 323, 406, 498ए, 506 व 120 बी का मुकदमा कर दिया है। मेरे विवाह को चार वर्ष हो गए हैं। मेरी पत्नी को थैलीसीमिया की बीमारी है जिस का मैं इलाज करवा रहा था, मेरे पास अस्पताल के इलाज के दस्तावेज भी हैं। मेरी एक दो वर्ष की बेटी भी है। मैं ने ना दहेज लिया न मांगा। मेरे ऊपर ये सारे गलत आरोप हैं। मुझे मेरी बेटी वापस चाहिए। हो सके तो पत्नी भी वापस आ जाए। पर वह मेरे साथ रहना नहीं चाहती। कोर्ट में मुकदमा चल रहा है वह आपसी समझौते के लिए एक लाख रुपया मांग रही है। आपसी सहमति से तलाक में मुझे धन नहीं देना भले ही मैं जेल चला जाउंगा पर गलत के आगे नहीं झुकूंगा। बेटी को अपनी अभिरक्षा में लेने का तरीका बताएँ।

समाधान-

जो व्यक्ति जेल जाने को तैयार हो उस का मिथ्या आरोप कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जो आरोप आप पर लगाए हैं वे आप की पत्नी को सिद्ध करने होंगे। उस मुकदमे में आप को अपनी प्रतिरक्षा ठीक से करनी चाहिए।

त्नी यदि एक लाख रुपया ही आपसी सहमति के लिए मांग रही है तो यह राशि अधिक नहीं है। यह राशि पत्नी के भरण पोषण के लिए बहुत कम है। हो सकता है आप दस लाख के स्थान पर एक लाख लिख गए हों। यदि वह एक लाख ही मांग रही है तो हमारी राय है कि आप को आपसी सहमति से तलाक ले लेना चाहिए। लेकिन उस में आप शर्त यह रखें कि बेटी आप के साथ रहेगी और बाद में पत्नी कोई भरण पोषण नहीं मांगेगी तथा जो अपराधिक मुकदमा उस ने किया है उसे खारिज कराएगी।

प की समस्या के विवरण से यह पता नहीं लगता है कि आप की पत्नी या आप ने हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कोई आवेदन दिया हुआ है। बेटी की अभिरक्षा के लिए आप तभी आवेदन कर सकते हैं जब कि पति पत्नी के मध्य हिन्दू विवाह अधिनियम का कोई प्रकरण न्यायालय में चल रहा हो। आप पत्नी के साथ दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और साथ में धारा 26 में पुत्री की अभिरक्षा के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन बेटी की अभिरक्षा उसी को प्राप्त होगी जो उस की देखभाल ठीक से करने में समर्थ हो और जिस के साथ रहने में बेटी का हित हो। यह तथ्य न्यायालय स्वयं दोनों पक्षों की साक्ष्य के आधार पर तय करेगा।

मुस्लिम विधि में बेटी को उत्तराधिकार

rp_muslim-women-common2.jpgसमस्या-

रशिद नाईकवाडे ने आआजरा, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता मुस्लिम है। क्या उन्हें उनके पिता की जमीन में हिस्सा मिल सकता है?

समाधान

मुस्लिम विधि में पुश्तैनी संपत्ति नाम की कोई संपत्ति नहीं होती। जो संपत्ति जिस की होती है उसी का उस पर स्वामित्व होता है और कोई भी उस की संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकता। यदि किसी संपत्ति के स्वामी की मृत्यु हो जाए तो मुस्लिम विधि के अनुसार मृतक के कर्जों, मेहर व अन्तिम संस्कार का खर्च चुकाने के उपरान्त जो संपत्ति बचे उस का उत्तराधिकार तय होता है। जिन जिन लोगों को विधि के अनुसार मृतक की संपत्ति का हिस्सा मिलता है उस का वे बँटवारा नहीं करें तब तक वह उन उत्तराधिकारियों की संपत्ति बनी रहती है। अनेक बार उत्तराधिकारियों में से कुछ का देहान्त बँटवारे हो जाता है। तब उस उत्तराधिकारी के हिस्से में उस के उत्तराधिकारियों के हिस्से निहित हो जाते हैं। इस कारण संयुक्त संपत्ति का जितनी जल्दी बँटवारा हो जाए अच्छा है।

कोई भी मुस्लिम वसीयत भी कर सकता है। लेकिन यह वसीयत उस की एक तिहाई संपत्ति की ही की जा सकती है तथा किसी भी उत्तराधिकारी के नाम नहीं की जा सकती, जब तक कि अन्य उत्तराधिकारियों से वसीयत करने वाला अनुमति प्राप्त नहीं कर ले।

मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार में बेटी का हिस्सा बेटे के हिस्से से आधा है। यदि आप की माता जी के पिता की मृत्यु हो चुकी है तो उन की संपत्ति में उन का हिस्सा है और वे इसे प्राप्त करने के लिए संयुक्त संपत्ति के बँटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं।

स्वयं को अपने वास्तविक पिता की पुत्री कैसे प्रमाणित करें?

rp_law-suit.jpgसमस्या-

रेनू ने जालोर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम रेनू है। मेरे पिताजी का स्वर्गवास मेरी 5 दिन की आयु में हो गया था। मैं उनकी इकलौती संतान हूँ। मेरी माँ मन्जू देवी मेरे साथ 7 वर्ष तक साथ रही बाद में उन्होंने मुझे ननिहाल छोड़कर नाता विवाह कर लिया। मेरी पढ़ाई कक्षा दूसरी तक मेरे पैतृक शहर ब्यावर में हुई थी। मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी ने मेरे स्कूल में दाखिला करवाते समय मेरे पिताजी ओम प्रकाश जी के स्थान पर खुद का नाम मदन लाल लिखवा दिया था। कक्षा 3 से 10 तक पढ़ाई मेरे ननिहाल सोजत सिटी में हुई। मेरे नानाजी ने कक्षा 10 बोर्ड के फॉर्म में मेरे वास्तविक पिताजी ओम प्रकाश जी का नाम लिखवाने के लिए मेरी माँ मन्जू देवी से उस समय शपथ पत्र भी लिखवाया। परन्तु स्कूल हेडमास्टर ने मेरे बड़े पिताजी मदन लाल जी से पिताजी के नाम परिवर्तन के लिए शपथ पत्र लिखवाने के लिए कहा, तब मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी ने शपथ देने से इनकार कर लिया। इस तरह मेरे वास्तविक पिताजी का नाम ओम प्रकाश मेरे शैक्षणिक दस्तावेजो में कहीं इन्द्राज नहीं हुआ। मैं कक्षा 11 व् 12 मेरे पैतृक शहर ब्यावर में मेरे दादाजी व् दादाजी के पास पढ़ी। मेरी शादी 1997 मेरे दादाजी और दादीजी ने मेरे पैतृक मकान ब्यावर में ही करवाई। मेरे विवाह कार्ड मेरे पिताजी का नाम ओम प्रकाश जी लिखवाया। मुझे 5 दिसम्बर 2009 को जानकारी मिली कि मेरे बड़े पिताजी ने मेरी पैतृक जायदाद बेचने का सौदा कर रहे है। उपरोक्त जायदाद के मालिक मेरे पिताजी के दादाजी हैं। कभी कानूनन बँटवारा भी नही हुआ है। मैं ने मेरे बड़े पिताजी स्व. मदनलाल जी की पत्नी यानि मेरी बड़ी माँ से व्यक्तिगत सम्पर्क कर उन से मेरे पिताजी के हिस्से की रकम की मांग रखी। तो उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया। तब मैं ने उक्त जायदाद पर मेरे अधिकार की आम सूचना 16 दिसम्बर 2009 को समाचार पत्र में प्रकाशित करवाई। 21 दिसम्बर 2009 को सिविल न्यायालय में बेचान पर रोक और परिवार की सदस्या होने की वजह से जायदाद को प्रथम खरीदने का अवसर मुझे मिले इस का वाद दायर किया। जिस के समन का जवाब मेरे बड़े पिताजी के परिवार ने 22 दिसम्बर 2009 को कोर्ट में दिया कि वो मुझे नहीं जानते हैं और मेरी पुश्तैनी जायदाद को मेरे परिवार वालों ने 30 दिसम्बर 2009 को ब्यावर के पास मसूदा जाकर रजिस्टर्ड बेचान कर लिया। मैं ने कोर्ट में मेरे स्व पिताजी ओम प्रकाशजी की हिस्से की अधिकारी बताते हुए वाद दायर किया। मेरे परिवार ने मेरे शैक्षणिक दस्तावेजो में मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी पुत्री लिखा है बताकर मुझे ओम प्रकाश जी की पुत्री होने का सबूत मांग रहे है। मेरे दादाजी दादीजी का स्वर्गवास हो चुका है। बाकी पूरा परिवार मेरे से विरोध में है। सम्पति पर कोर्ट आगे बेचान व् यथास्थिति का स्टे लग चुका है। स्टे की अपील भी ख़ारिज हो चुकी है। मैं ने स्टे के बाद कोर्ट में जायदाद की रजिस्ट्री की पूरी राशि की कोर्ट फीस जमा करवाकर हक शफा (परिवार की सदस्या होने के नाते पूरी जायदाद को खरीदने का) का वाद दायर किया। मेरी समस्या यह है कि मैं मुझे मेरे वास्तविक पिताजी ओम प्रकाश जी की पुत्री कोर्ट में कैसे साबित करूँ। मेरे नानाजी और मेरी वास्तविक माँ मन्जू देवी जीवित है और उनसे मेरे सम्बन्ध अच्छे है। मेरे स्व पिताजी का पूरा परिवार मेरे विरुद्ध है।

समाधान

में लगता है कि आप ने जो हक शफा का वाद प्रस्तुत किया है उस की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी यदि आपने वाद किया है तो उसे अन्तिम स्तर तक लड़ना चाहिए।

प को अपने आप को अपने पिता ओम प्रकाश जी की पुत्री साबित करने के लिए अपनी माता जी को ला कर न्यायालय में बयान कराना होगा। एक बार माता जी से मिल लेंगी तो हो सकता है आप का जन्म प्रमाण पत्र या फिर जिस अस्पताल में आप का जन्म हुआ हो उस का रिकार्ड भी मिल जाए। आप उस रिकार्ड के आधार पर अपने को ओम प्रकाश जी की पुत्री साबित कर सकती हैं।

प ने अपनी समस्या में यह उल्लेख किया है कि आप ने अपने पिता का नाम अपने शैक्षणिक रिकार्ड में दर्ज कराने के लिए अपनी माता जी का शपथ पत्र प्राप्त किया था। यदि वह वजूद में हो तो वह भी एक अच्छा दस्तावेजी साक्ष्य हो सकता है। जिन प्रधानाध्यापक जी ने मदन लाल जी का शपथ पत्र प्रस्तुत करने को कहा था उन का बयान भी इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकता है।

स के अलावा परिवार के मित्रों या रिश्तेदारों में कोई व्यक्ति हो सकता है जो आप के ओम प्रकाश जी की पुत्री होने की हकीकत से परिचित हो। आप ऐसे व्यक्ति का बयान करवा सकती हैं। यदि आप का जन्म अस्पताल में हुआ है और अस्पताल का रिकार्ड नहीं मिलता है तो आप के जन्म समय की डाक्टर या नर्स का बयान भी महत्वपूर्ण है। यदि आप का जन्म अस्पताल में न हो कर घऱ पर हुआ हो जिस दाई ने आप की माताजी का प्रसव कराया है उस का बयान अति महत्वपूर्ण है। जन्म के समय होने वाले औपचारिक समारोह जैसे सूरज पूजन आदि में उपस्थित महिलाओं, पुरुषों, नाइन और ढोली आदि का बयान भी महत्वपूर्ण हैं।

न सब साक्ष्यों पर डीएनए का साक्ष्य सब से बड़ा है। आप की वास्तविक माताजी उपलब्ध हैं आप उन का तथा अपना डीएनए टेस्ट करवा सकती हैं तथा आप की माताजी व डीएनए टेस्ट करने वाले विशेषज्ञ का बयान डीएनए रिपोर्ट प्रस्तुत कर उसे प्रदर्शित करवाने के साथ करवा सकती हैं। यह साक्ष्य सारे साक्ष्य पर भारी पड़ेगा।

म ने आप के लिए साक्ष्य के इतन स्रोत बता दिए हैं इन में से कोई दो-तीन स्रोतों से भी आप साक्ष्य ले आएंगी तो आप का मकसद पूरा हो जाएगा।

मुस्लिम विधि में पुत्री का उत्तराधिकार में हिस्सा …

lawसमस्या-

चमन ने बिहार , बिहार से बिहार राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना जी को पांच बेटे और एक बेटी है और नाना और नानी जी का इंतेक़ाल हो गया है। मेरी नानी की माँ ने अपनी जमीन मेरी नानी के नाम कर दी, और नानी मरने से पहले जमीन किसी के नाम कर के नही गयी है। मुझे पता करना है कि मुस्लिम लॉ के हिसाब से लड़की का हिस्सा अपनी माँ के जायदाद में कितना मिलेगा है और बाप के जायदाद में कितना हिस्सा मिलेगा।

समाधान-

मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार गणितीय तो है ही उस के साथ साथ अनेक प्रकार की शरायतें भी उस में हैं। एक खास परिस्थिति में किसी भी उत्तराधिकारी का शेयर बदल जाता है। उस में उत्तराधिकारियों की तीन श्रेणियाँ हैं। शेयरर, रेजिड्युअरी और डिस्टेंट किंड्रेड। सबसे पहले मृतक की संपत्ति से उस के अंतिम संस्कार का व्यय, मेहर, कर्जा आदि का भुगतान किया जाता है। इन के बाद बची हुई संपत्ति शेयरर के बीच उन के हिस्सों के हिसाब से बाँटी जाती है। उन के शेयर्स का भुगतान होने के बाद शेष संपत्ति या कोई भी शेयरर उपलब्ध न होने पर रेजीड्युअरियों के मध्य बाँटी जाती है। यदि किसी मृतक/ मृतका के कोई पुत्र नहीं है तो पुत्री शेयरर्स में सम्मिलित हो जाती है। लेकिन यदि पुत्र जीवित है तो फिर पुत्र और पुत्रियाँ दोनों ही शेयरर्स नहीं होते अपितु रेजिड्यूअरी हो जाते हैं। पुत्रों को जितना मिलता है उस का आधा पुत्री को प्राप्त होता है।

प के मामले में जैसा कि आप ने विवरण दिया है कोई शेयरर मौजूद नहीं है इस कारण पाँच पुत्रों के दस शेयर होंगे तथा एक शेयर पुत्री का होगा। इस तरह माता की संपत्ति में प्रत्येक पुत्र को 2/11 हिस्सा प्राप्त होगा और पुत्री (आप की माता जी) को 1/11 हिस्सा प्राप्त होगा।dA

बुआओँ को दादा-दादी की संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार है।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-
श्याम ने इन्दौर/ मऊ, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का देहान्त 1988 में हो चुका है उन के दो पुत्र और छह लड़कियाँ हैं। पिताजी उन में सब से बड़े हैं। दादी जी का देहान्त 2006 में हो चुका है। दादाजी की 64 बीघा जमीन है जिस का मौखिक बँटवारा दोनों भाइयों के बीच मौखिक रूप से मेरी बुआओं की उपस्थिति में 1988 में ही हो चुका था तभी से दोनों भाई अलग अलग खेती कर रहे हैं। मौखिक बँटवारे का कोई सबूत नहीं है केवल गाँव के लोग जानते हैं। अब बुआएँ जमीन में बराबर का हिस्सा मांग रही हैं। क्या वे सभी बुआएँ अपना हिस्सा ले सकती हैं दादाजी की मृत्यु के बाद पिताजी और चाचा जी का नाम राजस्व रिकार्ड में दर्ज हुआ था बाद में पटवारी ने बिना नोटिस बुआओँ का नाम भी खसरा में चढ़ा दिया।

समाधान-

दादा जी की मृत्यु के बाद हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी उन की आठ संतानें और दादी हुई। इस तरह संपत्ति में इन सब का 1/9 हिस्सा रहा। आप के पिता और चाचा ने जमीन के कब्जे का बँटवारा किया खेती करने के लिए। राजस्व रिकार्ड में यह बंटवारा दर्ज नहीं हुआ। आप की बुआओं ने जमीन में अपने स्वामित्व का कभी त्याग नहीं किया इस के कारण वे भी संपत्ति में समान रूप से हिस्सेदार हैं।

दादी के देहान्त के उपरान्त उन की संपत्ति भी समान रूप से शेष आठों को प्राप्त हो गई इस तरह आप के पिता, चाचा और बुआओं में से प्रत्येक का उस संपत्ति में 1/8 हिस्सा है। आप की बुआओं को संपत्ति के बँटवारे का वाद संस्थित करने और अपना हिस्सा प्राप्त करने का पूरा अधिकार है।

टवारी ने केवल आप के पिता और चाचा का नाम पहले राजस्व रिकार्ड में गलत लिखा था बाद में उस ने बुआओँ के नाम अंकित कर के अपनी गलती सुधार ली। यदि उस ने नोटिस नहीं दिया तो आप के पिता और चाचा को जब पता लगा तब उन्हें उस सुधार की अपील करनी चाहिए थी जिस का उन्हें अधिकार था, लेकिन वे अपील इस लिए नहीं कर सकते थे कि अपील में भी यही होता कि बुआओँ का हिस्सा दर्ज किया जाता।

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