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अपराधिक केस फर्जी होने पर प्रतिरक्षा करना ही उपाय है।

समस्या-

जितेन्द्र ने शैखपुरा बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे विरुद्ध एक सरकारी कर्मचारी द्वारा धारा 341, 323, 353, 379, 504, 506/34 में एक फर्जी केस दर्ज करवा दिया है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

जितेन्द्र जी,

प के विरुद्ध मुकदमा हुआ है। केवल आप जानते हैं कि वह फर्जी है। बाकी पुलिस ने तो गवाही और सबूतों के आधार पर ही आरोप पत्र प्रस्तुत किया होगा। इस का एक ही इलाज है कि आप इस मुकदमे में अच्छा वकील करें और अपनी प्रतिरक्षा करें। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि यह एक फर्जी मुकदमा है तो आप न्यायालय से यह निवेदन कर सकते हैं कि उक्त मामले में फर्जी मुकदमा दर्ज कराने वाले कर्मचारी के विरुदध कार्यवाही की जा कर उसे सजा दी जाए।

यदि आप इस मुकदमे में बरी हो जाते हैं तो आप दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए हर्जाना प्राप्त करने के लिए उक्त सरकारी कर्मचारी के विरुदध दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

किसी के विरुद्ध मुकदमा प्रस्तुत हो जाने पर प्रतिरक्षा ही एक मात्र विकल्प है।

divorceसमस्या-

सौरभ ने प्रतापगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

कृपया मुझे बतायें कि. 1. धारा 125 दं.प्र.संहिता का केस पत्नी मायके में कर सकती है या पतिगृह? अगर पतिगृह नहीं करे और मायके कर दे तो क्या किया जाये? 2. धारा 498 ए का केस कहाँ कर सकती है पति गृह या मायके? और अगर मायके नहीं कर सकती हो फिर भी कर दे तो क्या करें जब पुलिस परेशान कर रही हो? मैं ने पहले आप को अपनी समस्या भेजी थी जिसका समाधान आप ने 25-११-१४ को दिया था आप के कहे अनुसार मैं ने किया परन्तु सफलता नहीं मिली। ना ही अभी तक पत्नी से उसके घर वालों ने मेरी बात होने दी। 4 बार मैं जा कर आया हूँ। मैं अपना घर किसी भी हालात में बिगाड़ना नहीं चाहता हूँ। जब कि मेरे ससुर मुझ से बडी रकम लेने के चक्कर में हैं। उन के मित्र का फोन आया था बोला 10 लाख देदो और तलाक ले लो।

समाधान-

धारा 125 दं.प्र.संहिता का केस पत्नी वर्तमान में जहाँ निवास कर रही है वहाँ कर सकती है। यदि आप के विरुद्ध मुकदमा कर दिया गया है तो आप के पास एक ही विकल्प है कि आप के विरुद्ध जिस अदालत में मुकदमा किया गया है वहाँ जा कर अपना प्रतिवाद प्रस्तुत करें और मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा करें।

धारा 498 ए आईपीसी का मुकदमा वास्तव में एक अपराधिक मुकदमा है। यह मुकदमा ऐसे किसी भी स्थान पर हो सकता है जहाँ वह अपराधिक परिघटना घटित हुई है जिस की शिकायत की जा रही है, या उस का कोई अंश घटित हुआ है। जब भी कोई पत्नी अपने मायके में ऐसी शिकायत प्रस्तुत करती है तो उस के विवरण में घटना का कोई एक अंश मायके के पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार में घटित हुआ बताया जाता है।

दि आप के विरुद्ध धारा 498 ए आईपीसी का मुकदमा दर्ज हुआ है और पुलिस परेशान कर रही है तो सब से अच्छा उपाय यही है कि आप अपनी गिरफ्तारी पूर्व जमानत करवा लें। जिस से आप गिरफ्तारी से बच सकें। यदि पुलिस ऐसे मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो फिर से आप के लिए यही विकल्प शेष रह जाता है कि आप अपने विरुद्ध मुकदमे में प्रतिरक्षा करें।

दि पत्नी आप के साथ रहना ही नहीं चाहती है तो आप उसे जबरन तो अपने साथ रख नहीं सकते। वैसी स्थिति में विवाह विच्छेद ही एक मात्र मार्ग शेष रह जाता है। आप घर बिगाड़ना नहीं चाहते तो आप जिला विधिक सहायता समिति में मुकदमा पूर्व समझौता कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत करें। वे आप की पत्नी को बुला कर आप से बातचीत करवा देंगे। यदि कोई हल निकलता है तो ठीक है वर्ना आप को समझौता कर के आपसी सहमति से विवाह विच्छेद कर लेना चाहिए। 10 लाख की तो मांग है इस से आधी या उस से कम राशि पर भी समझौता हो सकता है।

कोई अपनी पत्नी को उस की इच्छा के विरुद्ध रहने को बाध्य नहीं कर सकता।

husband wifeसमस्या-
छत्तीसगढ़ से बिजय कुमार ने पूछा है-

मेरी बहिन की शादी 11.03.2011 को हुई थी। शादी के 6 माह बाद पता चला कि लड़का काम पर आज तक नहीं जाता है और अगर मेरी बहिन सिलाई क्लास जाती है तो उसे भी काम पर नहीं जाने देता है। जिस के कारण घर का खर्चा चल नहीं पा रहा है। सिस्टर को मम्मी पापा से, भाई, बहिन से मिलने नहीं जाने देता है। जीजा धमकी देता है कि अगर तुम घर से बाहर निकलोगी तो मैं अपना एक्सिडेंट करवा कर तुम्हें और तुम्हारे परिवार को झूठे इल्ज़ाम मे फसा दूंगा। जीजा थोड़ा हाफ मेंटल लगता है। बहिन के साथ बहुत ही बुरा व्यहारा किया जाता है। अब मेरी बहिन माँ और पापा के पास जाना चाहती है। वापस फिर कभी नहीं आना चाहती है। क्या करें? हमारा आर्थिक हालत अच्छी नहीं है कि हम कोर्ट जाकर मुक़दमा लड़ें।

समाधान-

प की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है तो भी कोई बात नहीं है। आप की बहिन जब चाहे अपने पति को छोड़  कर अपने  माता पिता के घर आ सकती है। यदि संभव हो तो वह अपने ससुराल के थाने में यह रिपोर्ट दर्ज करवा कर आए कि वह अपने पति के परेशान करने और घर खर्च नहीं देने के कारण तंग आ कर अपने मायके जा रही है और अपने खुद के सामान के अतिरिक्त कुछ नहीं ले जा रही है।

प के जीजा की जो स्थिति आप ने बताई है वह बिलकुल सही है तो ऐसे व्यक्ति के साथ किसी भी स्त्री का जीवन बिता सकना दुष्कर है। कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी को जबरन अपने पास रोक कर नहीं रख सकता।

दि आप का जीजा पुलिस की कोई कार्यवाही करता है तो आप की बहिन बयान दे सकती है कि उस की हालत उस के पति ने खराब कर दी है इस कारण वह उस के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती है। यदि उस का पति चाहे तो उस से तलाक ले सकता है। यदि कोई अदालती कार्यवाही आप की बहिन के विरुद्ध होती है तो आप की बहिन अदालत को कह सकती है कि उस के पास मुकदमा लड़ने के लिए पैसा नहीं है। इस कारण उसे सरकारी खर्च पर वकील दिलाया जाए और अदालत आने जाने तथा अदालत का अन्य खर्च उस के पति से दिलाया जाए। आप की बहिन चाहे तो अपने भरण पोषण की मांग भी कर सकती है। यदि उस का पति किसी भी प्रकार का मुकदमा करता है तो उसी मुकदमे में वह यह आवेदन दे सकती है कि उसे उस के पति से अदालत का खर्च, आने जाने का खर्च और भरण पोषण दिलाया जाए।

फिसल कर बाइक का स्लिप होना बाइक चालक की खुद की गलती है . . .

motor accidentसमस्या-

आगरा उत्तर प्रदेश से वरुण गुप्ता ने पूछा है –

मेरा भाई कुछ दिन पहले रोडं पर जा रहा था कि अचानक उस की बाइक स्लिप हो गयी और वह रोड़ के रोंग साइड में बाइक के साथ गिर पड़ा।  उसी साइड से एक लड़की अपनी बाइक से तेज गति से बिना हेलमट के आ रही थी, वह ब्रेक नहीं लगा सकी और गिरे हुए लड़के से टकरा कर गिर गयी लेकिन उसके ज़्यादा चोट आई थी। पुलिस दोनों को उठा कर थाने ले आई। तब मेरे भाई ने घर फोन किया और मैं और मेरे घर वाले थाने पहुँच गये। वहाँ पुलिस लड़की की तरफ दा पोलाइट थे और मेरे भाई के लिए ज़्यादा एग्रेसिव थे। जब कि गलती लड़की की थी। हम ने लड़की को हॉस्पिटल ले जा कर अपनी तरफ से इलाज कराया। जिस में हमारे 7000 रुपये खर्च हो गये। कुछ देर बाद मेरे भाई को पसलियों मे दर्द उठा और हम ने भाई को भी हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया। भाई की बाइक और हमारी आई.डी. पुलिस थाने में जमा करा ली गयी। फिर अगले दिन लड़की के घर वालों का फोन आया और वो हम से लड़की की बाइक की कीमत के बराबर पैसा मांगने लगे। लेकिन हम ने  मना कर दिया। क्यूँकि हमारा भी बराबर का ही नुकसान हुआ था। इस के अलावा हम ने लड़की के लिए खर्च किया। तब लड़की के घर वालों ने मेरे भाई के खिलाफ थाने में रिपोर्ट कर दी और कोर्ट में मुक़दमा कर दिया। हमें क्या करना चाहिए? क्या मेरे भाई को सज़ा होगी?

समाधान –

प ने दुर्घटना का पूरा विवरण नहीं दिया है। फिर भी जो विवरण दिया गया है उस से लगता है कि या तो यह एक संयोगवश घटी घटना है या फिर आप के भाई की गलती है। एक लड़की अपने मार्ग पर अपनी गति से चली आ रही थी। अचानक उस के सामने एक मोटर सायकिल स्लिप हो कर गिर गई। वह चाह कर भी अपनी बाइक को रोक नहीं सकती थी। आप के भाई की मोटरसाइकिल किस कारण से स्लिप हुई है यह पता नहीं है। यदि वहाँ कोई भौतिक कारण नहीं हुआ तो यही माना जाएगा कि आप के भाई मोटरसाइकिल लापरवाही से चला रहे थे।

पुलिस वालों की लड़की से सहानुभूति होना अस्वाभाविक नहीं है। क्यों कि आप के भाई की गलती स्पष्ट दिखाई दे रही है। उन्हों ने रिपोर्ट भी तब तक नहीं लिखी जब तक कि लड़की ने खुद रिपोर्ट नहीं लिखा दी। अब फौजदारी मुकदमा तो आप के भाई के विरुद्ध चलेगा। उन्हें सजा होगी या नहीं होगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अभियोजन के साक्षियों की साक्ष्य से दुर्घटना में आप के भाई की लापरवाही साबित होती है या नहीं। आप के भाई को अपने बचाव के लिए अच्छा वकील करना चाहिए।

ह लड़की अभी आप के विरुद्ध मोटर यान दुर्घटना दावा अधिकरण में भी हर्जाने का दावा कर सकती है। यदि आप के भाई के पास वैध एवं प्रभावी ड्राइविंग लायसेंस था और बीमा कराया हुआ था तो आप के भाई को दुर्घटना से हर्जाने के दावे के बारे में बीमा कंपनी को सूचित करना चाहिए। बीमा कंपनी मुकदमा लड़ेगी और हर्जाना भी बीमा कंपनी ही अदा करेगी। लेकिन यदि आप के भाई के पास वैध एवं प्रभावी ड्राइविंग लायसेंस न हुआ या बीमा कराया हुआ नहीं था तो हर्जाने के दावे में अदालत जो भी हर्जाना लड़की को दिलाएगी वह आप के भाई को देना होगा। यदि ऐसा है तो आप ने लड़की के इलाज में जो खर्चा किया है उस के बिल आदि आप के पास होने चाहिए। वह खर्च उस में से कम हो जाएगा।

किसी गलत अपराधिक मामले से बचने के लिए सारे तथ्य अंकित करते हुए कानूनी नोटिस दिलवाएँ …

justiceसमस्या-

अजमेर, राजस्थान से सुरेश कुमार ने पूछा है –

मेरे एक दोस्त की माँ को उस की नानी की मृत्यु के बाद नानी की नॉमिनी होने के कारण सावधि जमा का धन मिल गया। माँ उसे दुबारा सावधि जमा करना चाहती थी, मगर पिता जी उस धन को खेत मे खर्च करना चाहते थे। माँ ने एक अकाउंट पेयी चैक से अपना धन मेरे दोस्त यानी अपने बेटे के बैंक अकाउंट में हस्तान्तरित करवा दिया। माँ के कहने पर बेटे ने अपने नामे से सावधि जमा करली। इस पर पिता ने अपने पुत्र की पत्नी के जेवरात अपने पास रख लिए। जब पुत्रवधु ने अपने जेवरात माँगे तो पिता ने कहा कि मैं ने तो अपने काम के लिए उन जेवरात को बेच दिया। अब माँ अपनी सावधि जमा का धन वापस लेना चाहती है। मेरा दोस्त अपनी पत्नी के जेवरात सावधि जमा का धन वापस लौटाने को सहमत है लेकिन मगर पिता जी जेवरात देने को सहमत नहीं हैं। अब माँ और पिता जी दोनों एक हो कर कहते है कि अगर सावधि जमा का पैसा नहीं दिया तो वे पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे कि उस ने धोखा देकर माँ के खाते से पैसा अपने खाते में हस्तान्तरित करवा कर सावधि जमा अपने नाम बनवा ली। दोस्त के पास किसी प्रकार की कोई लिखा-पढ़ी नहीं है। सावधि जमा की राशि और जेवरात की कीमत करीब बराबर ही है।  चैक माँ के खाते का था लेकिन चैक में विवरण दोस्त के हाथ से लिखा गया था। क्या माँ ओर पिता जी उस के नाम रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और क्या उस के खिलाफ कोई क़ानूनी धारा लग सकती है? उसे क्या करना चाहिए?

समाधान-

कोई भी व्यक्ति पुलिस में रिपोर्ट कराना चाहे तो कर सकता है उस पर किसी तरह की कोरई रोक नहीं है। यदि पुलिस समझती है कि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण कर सकती है और पर्याप्त सबूत होने पर अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकती है और न्यायालय में उस के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती है।

जिस तरह यह मामला माता-पिता और पुत्र-पुत्रवधु के बीच है, उस से नहीं लगता है कि कोई रिपोर्ट माता-पिता द्वारा दर्ज कराई जाएगी। लेकिन फिर भी सावधानी रखना जरूरी है। जिस तरह आप के दोस्त को डर लग रहा है कि माता-पिता रिपोर्ट दर्ज करवा देंगे जब कि कोई अपराध आप के दोस्त ने किया ही नहीं है।  उधर पिता द्वारा पुत्रवधु के जेवर रख लेना या उन्हें बेच देना तो गंभीर अपराध है। पुत्रवधु के जेवर उस का स्त्री-धन हैं। यदि ससुर उस के जेवर देने से इन्कार करता है या उन्हें बेच देता है तो यह धारा 406 आईपीसी के अन्तर्गत अमानत में खयानत का अपराध है। मेरे विचार में आप के दोस्त की पत्नी यदि रिपोर्ट दर्ज करवा दे तो दोस्त के माता-पिता दोनों ही मुकदमे में बुरी तरह से फँस जाएंगे। पुत्रवधु के प्रति मानसिक क्रूरता का बर्ताव करने के कारण धारा 498-ए के अपराध में भी उन के विरुद्ध मुकदमा बनेगा।

स स्थिति में आप के दोस्त के पास सब से अच्छा उपाय ये है कि वे किसी स्थानीय वकील से संपर्क कर के अपनी और अपनी पत्नी की ओर से एक संयुक्त विधिक नोटिस अपने माता-पिता को भिजवाएँ जिस में ऊपर वर्णित समूची स्थिति का उल्लेख करते हुए यह कहें कि वह अपनी माता को सावधि जमा का धन लौटाने को सदैव तैयार रहा है और अब भी है। लेकिन माता-पिता अपनी पुत्रवधु के जेवर नहीं लौटा रहे हैं जिस से पुत्रवधु को गहरा मानसिक संताप हुआ है जो कि क्रूरता की श्रेणी में आता है तथा माता-पिता दोनों धारा 406 तथा 498-ए के अपराध के दोषी हैं। यदि वे नोटिस मिलने के बाद एक निश्चित अवधि 15 या 30 दिनों में जेवर लौटा दें तो आप का मित्र उसी समय सावधि जमा की जो राशि उसे चैक द्वारा दी गई थी उसे लौटा देगा, यदि माता-पिता उक्त जेवरात नहीं लौटाते हैं तो वे दोनों कानूनी कार्यवाही करने को बाध्य होंगे।

स नोटिस से सारी बात स्पष्ट हो जाएगी तथा माता-पिता घर में बैठ कर ही सारे मामले को निपटा लेंगे। यदि फिर भी वे मामले को नहीं निपटाते हैं तो सारे तथ्य अंकित करते हुए आप का मित्र व उस की पत्नी एक संयुक्त रिपोर्ट पुलिस थाना को प्रस्तुत कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। इस तरह के मामलों में पुलिस भी पहले मामले को आपस में निपटाने को प्राथमिकता देती है। पुलिस के हस्तक्षेप से मामला निपट सकता है। इस नोटिस से कम से कम इतना तो होगा कि यदि माता-पिता कोई मामला दर्ज कराएंगे तो उस में आप के दोस्त व उस की पत्नी के पास पर्याप्त प्रतिरक्षा उपलब्ध रहेगी।

एक में सफलता पर अन्य मुकदमों में प्रतिरक्षा के मामले में अगंभीर न हों।

sexual-assault1समस्या-

रायपुर, छत्तीसगढ़ से गौतम ने पूछा है-

तीसरा खंबा को बहुत बहुत धन्यवाद कि आप की सलाह के अनुसार मेरे मित्र ने वकील के दबाव में लगाया गया आवेदन वापस ले लिया और विवाह को चुनौती देकर विजय प्राप्त की उस महिला का धारा 125 दं.प्र.संहिता का आवेदन निरस्त कर दिया गया।  उसने 498-ए व 294,323,506 भा.दं.सं. का  मिथ्या मामला भी 125 के आवेदन के तुरंत बाद लगाया था जिसमे अब उसकी गवाही होनी है। इस मामले में भी उसने स्वयं को पत्नी बताया है। क्या धारा 125 में जो आदेश हुआ है उस का इस मामले पर क्या असर होगा? क्या मेरा मित्र अब विवाह करने हेतु पूरी तरह स्वतंत्र है?

समाधान-

प को व आप के मित्र को बधाई कि उन्हों ने एक मुकदमे में सफलता प्राप्त की। किन्तु इस सफलता से आप को व आप के मित्र को निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। धारा 498-ए व 294,323,506 भा.दं.सं. में से केवल 498-ए ही एक धारा है जो विवाह पर आधारित है। यह एक अपराधिक मुकदमा है और इस में अपराध व उस से जुड़े तथ्यों को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की है। वे यह साबित नहीं कर सकते कि विवाह हुआ था। इस कारण से धारा 498-ए का अपराध तो आप के मित्र के विरुद्ध साबित नहीं होगा। लेकिन गवाहों के बयानों के समय गंभीरतापूर्वक और सावधानी से गवाहों का प्रतिपरीक्षण किया जाना आवश्यक है।

न्य धाराओं 294,323,506 भा.दं.सं. में वर्णित अपराध विवाह से संबंधित नहीं हैं। यदि गवाही में ये सब साबित हुए तो आप के मित्र को दंडित किया जा सकता है। इस कारण से इस मुकदमे को भी पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए और सभी आरोपों को मिथ्या साबित करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

घरेलू हिंसा की शिकायत से बचने के स्थान पर स्वयं अंतरिम सहायता प्रस्तुत कर प्रतिवाद करने का निश्चय करें।

समस्या-

हरिद्वार, उत्तराखंड से अमित ने पूछा है –

मेरे तथा मेरे परिवार के विरुद्ध मेरी पत्नी ने घरेलू हिंसा का एक केस अदालत में किया हुआ है जिस में कोर्ट ने हमारे विरुद्ध समन जारी किये हुए हैं। परन्तु  इसके विरुद्ध हमने जिला जज के यहाँ अपील की हुई है जो की एडमिट तो हो गयी है  परन्तु न तो जिला जज महोदय ने निचली अदलत से फाइल तलब की है और न ही निचली अदालत की कार्यवाही स्टे करने का कोई आदेश पारित किया जिस से हमें काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आप बताएँ हमें क्या करना चाहिए? कोई नजीर हो तो बताएँ।

समाधान-

sexual-assault1ब से पहले तो आप यह जान लें कि महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा से संरक्षण के कानून के अंतर्गत न्यायालय को किसी को पहली बार में दंडित करने का कोई अधिकार नहीं है। केवल उस न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश की पालना यदि नहीं की जाती है या उस का उल्लंघन किया जाता है तो न्यायालय आदेश की पालना न करने वाले या उल्लंघन करने वाले को दंडित कर सकता है। इस कारण यदि किसी के विरुद्ध इस कानून में कोई शिकायत होती है तो उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है उसे न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

प ने अपनी समस्या में कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है। न तो आप ने यह बताया कि क्या कारण है कि आप की पत्नी ने आप के व आप के परिवार के विरुद्ध घरेलू हिंसा की शिकायत की है। शिकायत में आप की पत्नी ने क्या लिखा है? यह भी आप ने नहीं बताया। पत्नी द्वारा उस की शिकायत में अंकित तथ्य सही हैं या नहीं हैं, और वे तथ्य सही नहीं हैं तो आप के अनुसार क्या कारण हैं जिस से आप की पत्नी ने आप के विरुद्ध यह शिकायत की है? आप ने यह भी नहीं बताया कि आप को काफी परेशानी क्या हो रही है।

वास्तविकता तो यह है कि देश में ऐसी महिला तलाश कर निकालना दुष्कर ही नहीं लगभग असंभव है जिसे कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार न होना पड़ा हो।  अहिंसा के पुजारियों के इस देश में इस हिंसा को जारी तो नहीं रखा जा सकता है न? तो महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा से संरक्षण का कानून इसीलिए बनाया है कि महिलाओं को घरेलू हिंसा से निजात मिल सके। अब एक महिला ने अपने पति के और उस के परिजनों के विरुद्ध घरेलू हिंसा की शिकायत न्यायालय ने प्रस्तुत की है। न्यायालय ने उस पर आप के विरुद्ध समन जारी किया है, इस लिए कि आप उस शिकायत का उत्तर प्रस्तुत करें। दोनों और के जो भी तथ्य शपथ पत्रों और दस्तावेजों से न्यायालय के समक्ष प्रकट हों उन के आधार पर यह निर्णय किया जा सके कि आप की पत्नी वास्तव में उस शिकायत पर अंतिम निर्णय होने तक किसी प्रकार की कोई अंतरिम राहत प्राप्त करने की अधिकारी है या नहीं? इस में क्या गलत है। शिकायतकर्ता आप की पत्नी ही तो है।  वह किन्हीं कारणों से आप से नाराज है और आप की अदालत को शिकायत करती है तो इस से उस का आप से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार या किसी स्थान में निवास करने का अधिकार तो छिन नहीं गया है। अंतरिम आदेश के रूप में न्यायालय अधिक से अधिक कुछ धनराशि उस महिला के भरण पोषण हेतु अदा करने का आदेश देगा जो उस के भरण पोषण के वास्तविक खर्चे से बहुत कम होगा, साथ में इतना आदेश दे सकता है कि वह पति या उस के परिवार के जिस मकान में रह रही है उसे शांतिपूर्वक निवास करने दिया जाए। यह तो उस का अधिकार है। यदि ऐसा आदेश होता है तो उस में गलत क्या है?

प ऐसा आदेश भी नहीं होने देना चाहते और पत्नी की शिकायत को सुना ही न जाए इस के लिए ऊँची अदालत में चले गए। ऊंची अदालत ने आप की निगरानी याचिका दर्ज कर ली उस मे कोई बड़ी बात नहीं है, इस तरह की सभी याचिकाएँ दर्ज कर ली जाती हैं। लेकिन आप का सोचना है कि बिना आप की पत्नी को आप की याचिका की सूचना मिले ही निचली अदालत की पत्रावली वहाँ मंगा ली जाए जिस से वह शिकायत जो आप की पत्नी ने की है उस में सुनवाई रुक जाए, या फिर उस सुनवाई को रोकने का आदेश ही दे दिया जाए। यदि ऊंची अदालत ऐसा करती है तो निश्चित रूप से वह न्याय करने के जिस उद्देश्य से स्थापित की गई है उस उद्देश्य के विरुद्ध ही काम करने लगेगी। ऐसा कैसे संभव है?

प को करना तो यह चाहिए था कि जो समन आप के विरुद्ध जारी हुए हैं उन्हें आप प्राप्त कर के न्यायालय में उपस्थित हों और शिकायत का प्रतिवाद प्रस्तुत करें। यदि आप की पत्नी ने किसी तरह की अंतरिम राहत भरण पोषण या निवास के लिए चाही है तो बिना न्यायालय के आदेश के स्वयं रखें कि वह आप की पत्नी है और आप उसे प्रतिमाह कुछ राशि और निवास की सुविधा प्रदान करने को तैयार हैं। आप के इस प्रस्ताव से आप की सदाशयता ही प्रकट होगी। इस के उपरान्त आप अपने विरुद्ध की गई शिकायत का प्रतिवाद कर सकते हैं। इस से बेहतर मार्ग कोई नहीं है। आप की निगरानी याचिका में कोई दम नजर नहीं आता है। उसे आप को निरस्त करा लेना चाहिए। अच्छा तो यह है कि आपसी बातचीत से या ऐसा संभव नहीं हो तो न्यायालय की मध्यस्तता से पत्नी से अपने विवाद को सुलझाएँ।

आप धारा 498-ए व 406 आईपीसी के मुकदमे में अपना बचाव कर सकते हैं

father daughterसमस्या-

पीलीभीत उत्तर प्रदेश से वरुण ने पूछा है –

मेरी शादी २००८ में हुई थी। दो वर्ष बाद जुलाई २०१० में मेरी दो जुड़वाँ बेटियों का जन्म हुआ। जुड़वाँ होने के कारण बच्चियां अविकसित थी।] काफी दिनों तक वेन्टीलेटर व अन्य मशीनों पर रही,  लाख कोशिशों के बाद उनको बचाया जा सका। जब लड़कियां हॉस्पिटल से घर आयी तो मेरी पत्नी ने अपनी माँ के बहकावे में आकर दोनों बेटियों को पालने से मना कर दिया। यहाँ तक की उन बच्चियों को अपना दूध भी नहीं पिलाया उनकी परवरिश करने के बजाये घर में पत्नी और सास ने घर में में खूब क्लेश किये और २५ दिन के नवजात बच्चों को छोड़ कर चुपचाप मायके चली गयी। हमने जब अपने सालो से इस बारे में बात की तो उन लोगो ने हम लोगों को धमकिय दी पत्नी भी साथ रहने को तैयार नहीं हुई। छह माह बाद मैं ने एक प्रार्थना पत्र जिला विधिक समझैता केन्द्र में दाखिल किया जिस बाद मेरे साले घर पर आये और हम लोगों को बहुत बुरा भला कहा। न्यायालय में भी मेरी पत्नी ने साथ रहने से मना कर दिया और प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया गया।  लगभग १५ दिन बाद अचानक पत्नी वापस घर आ गयी और रहने लगी मैं ने समझा अब ठीक से रहेगी लेकिन दो चार दिन बाद ही फिर से कलह करने लगी। लगभग ६ महीने घर पर रही इसके बाद एक बेटी को लेकर मेरी अनुपस्थिति में चुपचाप फिर मायके चली गयी। काफी प्रयास के बाद भी जब बात नहीं बनी तो हमने आपकी और अन्य वकील की सलाह पर १ अप्रैल २०१३ में तलाक का मुकदमा कर दिया है जिस में क्रूरता, किसी अन्य से सम्बन्ध , तीन वर्षों से कोई शारीरिक सम्बन्ध न होना और साथ साथ ना रहने  के आधार लिए गए हैं और जिसकी पहली तारीख पर पत्नी नहीं आयी थी। वर्तमान में एक बच्ची मेरे पास है और एक इंग्लिश मध्यम स्कूल में पिछले पांच माह से शिक्षा प्राप्त रही है। मैंने अपनी माँ के साथ दोनों बेटियों की बेहतर ढंग से परवरिश की। मेरी माँ प्राइवेट स्कूल में टीचर है और मेरी मोबाइल रिपेयरिंग की शॉप है जो कि बेटियों की परवरिश करने के कारण समय से नहीं खुलती थी और उस से मेरा व्यवसाय ठप्प हो गया, अब पूरी तरह से माँ पर ही निर्भर हूँ। मैं अपनी दोनों बेटियों से बहुत प्यार करता हूँ। कृपया मुझे ये बताएँ कि –

  1. दूसरी बच्ची जो मेरे पास है क्या पत्नी उसे पा सकती है?
  2. क्या मुझे दूसरी बच्ची की अभिरक्षा भी मिल सकती है?
  3. क्या हम लोगों का तलाक हो पायेगा?
  4. क्या मुझे मासिक खर्च पत्नी को देना पड़ सकता है?
  5. यदि हम पर दहेज़ आदि के मुक़दमे होते है तो क्या बचाव हो पायेगा?
समाधान-

प ने जो तथ्य यहाँ रखे हैं। उन तथ्यों के बारे में अपनी और माँ की गवाही के अतिरिक्त कम से कम दो विश्वसीय साक्षियों के बयान आप को अपने विवाह विच्छेद के प्रकरण में कराने चाहिए। आप के पास दस्तावेजी सबूत भी पर्याप्त मात्रा में प्रतीत होते हैं। आप को दुकान का व्यवसाय ठप्प होने संबंधित कुछ न कुछ दस्तावेजी सबूत भी प्रस्तुत करने होंगे। आप के तथ्यों को आप को ठीक से प्रमाणित करना होगा। इस के अतिरिक्त आप को पत्नी के बारे में तथा जो बालिका पत्नी के साथ है उस की परवरिश के बारे में तथ्य रखने होंगे। यदि उस की परवरिश आप के पास जो बालिका है उस से बेहतर नहीं हो रही है और उसे भविष्य में उस का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है, यह आप प्रमाणित कर सके तो आप को अपनी दूसरी बालिका की अभिरक्षा भी प्राप्त हो सकती है। तथ्यों से बिलकुल नहीं लगता कि जो बालिका आप के पास है उस की अभिरक्षा आप की पत्नी प्राप्त कर सकती है। आप को विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त हो सकती है।

प की दूसरी बालिका जो आप की पत्नी के साथ निवास कर रही है उस की अभिरक्षा आप को प्राप्त नहीं होती है तो आप को पत्नी और बेटी के लिए भरण पोषण का खर्चा देना पड़ सकता है। लेकिन यदि आप प्रमाणित कर सके कि आप की कोई आय नहीं है और पत्नी कमाती है तो उस से बच भी सकते हैं। यह भी हो सकता है कि पत्नी से विवाह विच्छेद की डिक्री के समय आप भरण पोषण के मामले में न्यायालय को कहें कि यदि भरण पोषण ही दिलाना है तो एक मुश्त दिला दिया जाए जिसे कैसे भी आप दे देंगे और बाद में उस के दायित्व से मुक्त हो सकते हैं। वैसे इस बात की संभावना कम है कि आप के विरुद्ध धारा 498-ए व 406 भा.दं.संहिता के मुकदमे आप पर होंगे। लेकिन यदि हुए तो आप ठीक से अपना बचाव कर सकते हैं।

अपराधिक मामले में आवश्यक होने पर न्यायालय कोई भी दस्तावेज मंगवा सकता है।

समस्या-

बनारस, उत्तर प्रदेश से अशोक तिवारी ने पूछा है-

किसी भी अपराधिक मुकदमे में जिरह के दौरान गवाह किसी ऐसी घटना से इन्कार करे जिस के दस्तावेज सरकारी रेकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं तो क्या उस सरकारी विभाग से जिरह पूर्ण होने के पहले दस्तावेज मंगाए जा सकते हैं?

समाधान-

दि किसी अपराधिक मामले में जिरह के दौरान गवाह किसी ऐसी घटना से इन्कार करे जिस के दस्तावेज सरकारी रेकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं तो क्या उस सरकारी विभाग से संबंधित दस्तावेज मंगाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 के अंतर्गत आवेदन किया जा सकता है। यदि मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश उचित समझता है तो ऐसा दस्तावेज जिरह पूरी होने के पहले मंगवा सकता है। लेकिन यदि आवश्यक न हुआ तो दस्तावेज मंगाए जाने की प्रार्थना को अभियोजन की साक्ष्य पूर्ण होने तक मुल्तवी कर सकता है। लेकिन ऐसी अवस्था में न्यायाधीश से आप यह प्रार्थना कर सकते हैं कि आप उस गवाह को पुनः जिरह के लिए बुलाने का अधिकार सुरक्षित रखना चाहते हैं। यदि इस संबंध में भी आप अपने आवेदन में या अन्य आवेदन प्रस्तुत कर उल्लेख कर दें तो उचित रहेगा।

दि न्यायालय आप के आवेदन को अभियोजन साक्ष्य पूर्ण होने तक मुल्तवी करता है और आप के गवाह को पुनः जिरह हेतु बुलाए जाने का अधिकार सुरक्षित नहीं रखता है तो आप इस आदेश को पुनरीक्षण याचिका द्वारा चुनौती दे सकते हैं।  इस बीच आप गवाह से वे सारे प्रश्न पूछ लें जो कि उस दस्तावेज के संबंध में हैं।  शेष तथ्य आप दस्तावेज से साबित कर सकते हैं। यदि दस्तावेज के रिकार्ड पर आने के उपरान्त आप को लगता है कि गवाह को जिरह के लिए बुलाना आवश्यक है तो आप उसे जिरह हेतु पुनः बुलाए जाने हेतु आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

चैक केवल वर्तमान दायित्व के भुगतान के लिए ही दें, किसी और उद्देश्य के लिए नहीं

समस्या-

मैं ने एक मकान बनवाया। ठेकेदार की सलाह से मैं ने ठेकेदार के जानकार दुकानदार से निर्माण सामग्री का क्रय किया।  मेरे ठेकेदार ने कहा कि मैं गारन्टी के रूप में अपना एक चैक दुकानदार को दे दूँ, जिस से निर्माण सामग्री सही समय पर मिलती रहे।  मैं दुकानदार को समय समय पर भुगतान करता रहा।  असल समस्या तब आरंभ हुई जब ठेकेदार ने मेरा काम पूरा किए बिना ही छोड़ दिया।  उस ने पूरी राशि की मांग की।  मैं ने उस से कहा कि वह काम पूरा कर दे और कान्ट्रेक्ट के मुताबिक पूरा रुपया ले ले।  मैं दुकानदार के पास अपना चैक वापस लेने गया तो उस ने वह चैक तो ठेकेदार को दे दिया है क्यों कि तुम ने उस का पूरा भुगतान नहीं किया है।  मैं ने दोनों से मेरा चैक वापस देने का आग्रह किया किन्तु उन्हों ने मेरा चैक नहीं लौटाया।  मैं ने तब बैंक से चैक का भुगतान रोकने के लिए कहा। बैंक ने भुगतान रोक दिया लेकिन चैक वापसी में यह रिमार्क लगा दिया कि बैंक में पर्याप्त निधि नहीं है।  तब दुकानदार ने धारा 138 का मुकदमा लगा दिया।  इस मुकदमे में मुझे 29,950/- रुपए भुगतान करने का आदेश हुआ तथा चार माह के कारावास की सजा हो गई।  दुकानदार ने उस के पास का विक्रय का पूरा असल रिकार्ड नष्ट कर दिया और फर्जी रिकार्ड प्रस्तुत किया है जिस पर मेरे हस्ताक्षर नहीं हैं।  लेकिन मजिस्ट्रेट ने इस रिकार्ड को सही मान कर उस के पक्ष में निर्णय दे दिया है।  क्या मैं सत्र न्यायालय में उक्त दंडादेश की अपील कर सकता हूँ?  क्या इस अपील में मुझे लाभ मिलेगा?

-कर्मवीर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा

समाधान-   

चैक अनादरण के मुकदमों में अभियुक्त के बचने के अवसर न के बराबर होते हैं।  क्यों कि इस मामले में केवल चैक का अनादरित होना, अनादरण के तीस दिनों में चैक की राशि के भुगतान का नोटिस चैक जारीकर्ता को दिया जाना, और नोटिस के पन्द्रह दिनों में उस के द्वारा चैक धारक को भुगतान न करना ही अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त होता है।  यह अवश्य है कि चैक किसी दायित्व के लिए दिया हुआ होना चाहिए।  लेकिन कानून ऐसा है कि यदि चैक दिया गया है तो यह माना जाता है कि चैक किसी दायित्व के लिए ही दिया गया होगा।  यदि चैक किसी दायित्व के अधीन न दिया गया हो तो इस तथ्य को साबित करने का दायित्व अभियुक्त पर डाला गया है।  अभियुक्त द्वारा यह साबित करना अत्यन्त कठिन या असंभव होता है कि उस ने चैक किसी दायित्व के भुगतान के लिए नहीं दिया था।

प के पास इस बात की कोई लिखत नहीं है कि आप ने चैक सीक्योरिटी के बतौर ही दिया था।  यदि लिखत होती तो आप साबित कर सकते थे कि चैक भुगतान के लिए नहीं अपितु सीक्योरिटी के बतौर दिया था।  जब भी चैक किसी वर्तमान दायित्व के भुगतान के लिए न दिया जा कर किसी और उद्देश्य से दिया जाए तो उस की लिखत अवश्य लेनी चाहिए।  लेकिन अक्सर लोग यही गलती करते हैं कि कोई लिखत नहीं लेते।  जब से चैक अनादरण को अपराधिक बनाया गया है तब से तो सभी बैक खाताधारियों को सावधान रहना आवश्यक हो गया है कि वे बिना किसी दायित्व के किसी को चैक नहीं दें।  बिना तिथि अंकित किए और बिना राशि भरे तो कदापि न दें।  इस के अतिरिक्त जब भी कोई दुकानदार माल भेजता है तो उस के साथ चालान भेजता है जिस पर हस्ताक्षर करवा कर वापस लेता है।  आप को भी चाहिए था कि आप ने जो रुपया उसे भुगतान किया उस की रसीद समय समय पर लेते।  लेकिन शायद आपने ऐसा भी नहीं किया।

स के अलावा जब दुकानदार ने आप को चैक वापस लौटाने से मना किया और कहा कि चैक तो ठेकेदार ले गया है।  उस का यह कहना ही अमानत में खयानत था।  साथ ही इस बात का अंदेशा उत्पन्न हो गया था कि आप के विरुद्ध चैक को ले कर मुकदमा किया जाएगा।  आप को तब भी सावधान हो जाना चाहिए था और उन के इस षड़यंत्र के विरुद्ध कार्यवाही आरंभ कर देनी चाहिए थी।  आप को पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट करनी चाहिए थी।  पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने पर आप को न्यायालय में तुरंत परिवाद दाखिल करना चाहिए था।  जब आप को चैक अनादरण का नोटिस प्राप्त हुआ तब आप को उस का उत्तर देना चाहिए था और साथ ही न्यायालय को तुरन्त परिवाद भी दाखिल करना चाहिए था।

वास्तविकता यह है कि आप ने चैक को ले कर लापरवाही बरती और उस की सजा आप को भुगतनी पड़ रही है।  आप ने जो तथ्य बताए हैं उस से नहीं लगता कि आप को सत्र न्यायालय से कोई राहत मिल पाएगी।  वैसे भी जब तक विचारण न्यायालय का निर्णय और वहाँ प्रस्तुत साक्ष्य का सूक्ष्म अध्ययन न कर लिया जाए कोई भी विधिज्ञ यह नहीं बता सकता कि  आप को अपील में लाभ मिलेगा या नहीं।  लेकिन फिर भी आप के पास अपील करने का एक अवसर उपलब्ध है।  यदि आप के वकील ने विचारण न्यायालय में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत की है तो हो सकता है सत्र न्यायालय में आप को लाभ मिल जाए।  आप को अपील का यह अवसर कदापि नहीं छोड़ना चाहिए और अपील कर के इस मुकदमे के माध्यम से आप के साथ जो अन्याय हुआ है उसे न्याय में परिवर्तित करने का प्रयत्न करना चाहिए।  अपील करने के पूर्व आप को चाहिए कि आप अपराधिक मामलों के किसी अच्छे वकील से सलाह लें और सत्र न्यायालय में उसी से पैरवी कराएँ।  सभी बैंक खाताधारियों को एक बात गाँठ बांध लेनी चाहिए कि वे जब किसी को चैक दें तो केवल तत्कालीन दायित्व के भुगतान के लिए ही दें और यह सुनिश्चित कर लें कि चैक अनादरित नहीं होगा।  अन्यथा ये अवश्य जान लें कि चैक अनादरण के बाद सजा से बचना लगभग असंभव होगा।

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