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दहेज प्रताड़ना की एफआईआर निरस्त होने के आदेश की प्रतियाँ अन्य सभी मामलों में प्रस्तुत करें।

समस्या-

सुनील ने अहमदाबाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी फरवरी 2014 में हुई थी मेरी पत्नी को मिर्गी का रोग है। जो हमको बताए बिना शादी की थी। मुझे यह बात नवम्बर 2014 में पता चली। फिर मेरी पत्नी मायके गई तो मैंने उसे तलाक की नोटिस भेजी। तलाक की नोटिस भेजने के बाद में उसने मुझ पर दहेज का झूठा केस लगाया जिसके कारण मुझे और मेरी फैमिली को लॉकअप में रहना पड़ा। उस केस को हमने हाईकोर्ट में रखा मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने मेरी पत्नी की पूरी FIR रद्द की और हमको बरी कर दिया। मेरी वाइफ ने सूरत में 125 भरण पोषण के लिए और डोमेस्टिक वायलेंस का केस घरेलू हिंसा के लिए किया है वे अभी चल रहे हैं और अहमदाबाद में तलाक का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है अगर दहेज का केस झूठा निकलता है तो पति को तलाक का पूरा अधिकार है। उसके तहत और मेरी पत्नी को मिर्गी की बीमारी है उसको छुपाकर शादी की है उसके तहत में तलाक लेना चाहता हूं। लेकिन कोर्ट की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि मैं तलाक की प्रक्रिया फास्ट करने के लिए क्या कर सकता हूँ। जिसके कारण तलाक के केस की जल्दी तारीख पड़े मेरा केस जल्दी पूरा हो। हाई कोर्ट ने मेरी वाइफ की 498 की जो FIR रद्द की है उस पर मुझे डोमेस्टिक वायलेंस यानी घरेलू हिंसा अधिनियम में क्या फायदा हो सकता है? कृपया कर अपना सुझाव दीजिए। मैं नवंबर 2015 से अपने भाई, बुआ के लड़के के घर पर रह रहा हूँ और मेरी अभी पीएचडी की पढ़ाई चालू है। अगर कोर्ट भरण पोषण की रकम तय करती है तो मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी और कहीं जॉब ढूंढना पड़ेगा क्या? कोर्ट फैसला दे सकती है कि तुम अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठाओ? क्योंकि मैं अपने मम्मी पापा से अलग हो गया हूँ वह मुझे अपने घर में नहीं रखते, मेरी पढ़ाई लिखाई का खर्चा मेरे भाई उठाते हैं।

समाधान-

मुकदमा निपटने की प्रक्रिया फास्ट होने का कोई माकूल तरीका नहीं है। देरी इस कारण होती है कि देश में पर्याप्त मात्रा में न्यायालय नहीं हैं। न्यायालयों की कमी को केवल राज्य सरकारें ही पूरी कर सकती हैं। फिलहाल आप यह कर सकते हैं कि उच्च न्यायालय में रिट लगवा कर अदालत के लिए यह निर्देश जारी करवा सकते हैं कि आप के मुकदमे में सुनवाई जल्दी की जाए और नियत समय में आप के मुकदमे में निर्णय पारित किया जाए।

498 ए की प्रथम सूचना रिपोर्ट रद्द होने के निर्णय की प्रतियाँ आप अपने सभी मामलों में प्रस्तुत करें। वह आप को लाभ देगी। इस से यह साबित होगा कि आप की पत्नी की ओर से मिथ्या तथ्यों के आधार पर आप के विरुद्ध मुकदमे करने का प्रयत्न किया गया है। इस से आप को लाभ प्राप्त होगा।

न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकती है लेकिन इस के लिए वह आप को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह सकती। वह यह कह सकती है कि जब आप कमाते नहीं थे, अध्ययनरत थे और पत्नी का खर्च नहीं उठा सकते थे तो आप को विवाह नहीं करना चाहिए था। वैसे इस परिस्थिति में पत्नी का भरण पोषण इतना नहीं होगा कि उसे अदा करने के लिए आप को पढ़ाई छोड़नी पड़े।

मुस्लिम स्त्री क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है।

समस्या-

मोहम्मद असलम ने मया बाजार, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी बहन जिसका नाम काल्पनिक जोया की शादी 3 साल पहले अहमदाबाद निवासी फिरोज के साथ हुई थी, मेरी बहन की भी दूसरी शादी है और फिरोज की भी यह दूसरी शादी है, दोनों की एक-एक तलाक हो चुका है। पिछले 3 सालों से लगातार मेरी बहन के पति का व्यवहार क्रूरतम से क्रूरतम रहा है, उसका पति और उसके पूरे परिवार वाले उसको प्रतिदिन प्रताड़ित करते हैं, उन लोगों के मारपीट से तंग हो कर मेरी बहन अब उस घर में रहना नहीं चाहती और अपने पति से तलाक चाहती है। मेरा घर फैजाबाद उत्तर प्रदेश में है मेरी बहन के हस्बैंड का घर अहमदाबाद जिला गुजरात में है। अगर हम कानूनी रुप से तलाक लेना चाहें और मेरी बहन का हस्बैंड तलाकनामे पर साइन ना करें और वह जाकर दूसरी औरत के साथ शादी कर ले तो इस पोजीशन में मेरी बहन क्या कर सकती है? क्योंकि मुस्लिम में पुरुष तो शादी कर सकता है,  और मेरी बहन को जब तक तलाकनामा नहीं मिलेगा तब तक यह तीसरी शादी कर नहीं सकती ऐसी स्थिति में मेरी बहन के लिए क्या कानून है?


समाधान-

मुस्लिम समाज में यह अज्ञान है कि मुस्लिम महिला को विवाह विच्छेद कराने का अधिकार नहीं है। यह एक तरह का भ्रम है जो जानबूझ कर फैलाया जाता है। मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक लेने का हक है और वे कुछ निश्चित आधारों पर तलाक की डिक्री पारित करने के लिए दीवानी न्यायालय (जहाँ पारिवारिक न्यायालय हैं वहाँ पारिवारिक न्यायालय) के समक्ष विवाह  विच्छेद कराने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं और न्यायालय विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकता है।

दी डिसोल्यूशन ऑव मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 की धारा 2 में उन आधारों का वर्णन किया गया है जिन पर एक मुस्लिम महिला अपने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकती है। इन आधारों में एक आधार क्रूरतापूर्ण व्यवहार का भी है। आपकी बहिन के साथ क्रूर से क्रूरतम व्यवहार हुआ है तो वे इस आधार पर खुद विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस वाद में न्यायालय का क्षेत्राधिकार दो तथ्यों से तय होगा पहला यह कि जहाँ प्रतिवादी रहता है, दूसरा वहाँ जहाँ वाद कारण पूरी तरह व आंशिक रूप से उत्पन्न हुआ है। तो इस मामले में वाद कारण भी अहमदाबाद में ही उत्पन्न हुआ है। दोनों ही आधारो पर यह वाद अहमदाबाद में दाखिल करना पड़ेगा। लेकिन वाद दाखिल करने के उपरान्त सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा कर वाद को फैजाबाद स्थानान्तरित कराने का प्रयत्न किया जा सकता है।

हिन्दू विधि में तलाक/ विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

कानूनी आधार सिद्ध कर के विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त की सकती है।

rp_divorce-decree3.jpgसमस्या-

शिवकुमार शर्मा ने रावतसर राजस्थान से पूछा है-

मेरी पत्नी 15 वर्ष से मुझ से अलग अपने पिता के साथ रह रही है। मेरी दो संताने हैं, दोनों विवाहित हैं। जब से पत्नी ने घर छोड़ा है तब से मैं उसे भरण पोषण दे रहा हूँ। लेकिन वह हमेशा भरण पोषण की राशि बढ़ाने को आवेदन कर देती है। मैं ने न्यायालय में कहा है कि मैं चाहता हूँ कि वह मेरे साथ आ कर रहे लेकिन वह इसे स्वीकार नहीं करती और कहती है कि वह किसी भी कीमत पर मेरे साथ रहना नहीं चाहती है। मेरी उम्र हो चुकी है और मुझे किसी का साथ चाहिए। उस ने मेरे विरुद्ध दहेज का मुकदमा भी लगाया लेकिन उसे मेरे वकील ने मिथ्या सिद्ध कर दिया। पत्नी ने पुलिस थाने में लिखित में उस के लिए माफी भी मांगी। क्या में उस से तलाक ले सकता हूँ? मुझे ऐसे में क्या करना चाहिए?

समाधान-

मुझे लगता है कि आप ऐसा सोचते हैं कि विवाह विच्छेद (तलाक) केवल सहमति से ही हो सकता है। पर ऐसा नहीं है। हिन्दू विवाह विधि में पहले तो तलाक था ही नहीं। फिर उस में विवाह विच्छेद जोड़ा गया। जिस में कुछ खास आधारों पर विवाह विच्छेद के लिए पति या पत्नी आवेदन कर सकता था। आधारों की पुष्टि साक्ष्य से होने पर विवाह विच्छेद हो सकता था। सहमति से विवाह विच्छेद का कानून तो बहुत बाद में विवाह विधि में जोड़ा गया।

कोई भी पति या पत्नी यदि अपने जीवनसाथी से अलग रहता है तो उस का कोई उचित कारण होना चाहिए। अन्यथा वह अपने जीवनसाथी से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार खो देता है। पिछले 15 वर्षों में आप को चाहिए था कि आप धारा-9 के अन्तर्गत पत्नी के विरुद्ध वैवाहिक संबन्धों की प्रत्यास्थापना के लिए डिक्री हेतु आवेदन करते। यदि पत्नी फिर भी आप के साथ रहने से इन्कार करती तो आप उस से विवाह विच्छेद की डिक्री हेतु आवेदन कर देते। अब भी आप की पत्नी 15 वर्ष से आप से अलग रह रही है और वापस नहीं आना चाहती है। इस तरह उस ने आप के साथ वैवाहिक जीवन का परित्याग कर रखा है आप इसी आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं। आप को इसी आधार पर और यदि अन्य आधार भी हों तो विवाह विच्छेद हेतु आवेदन कर देना चाहिए।

यदि जीवनसाथी न चाहे तो उसे साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। आप भी अपनी पत्नी को साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। बड़ी उम्र में जीवनसाथी के साथ का अर्थ परस्पर एक दूसरे का ख्याल रखना होता है। लेकिन जो पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती वह आप के साथ रहेगी भी तो आप का ख्याल रखेगी यह सोचना भी बेमानी है। आप को अपनी इस उम्र में आप का ध्यान रखने के लिए अन्य कोई उपाय ही करना पड़ेगा। आप विवाह विच्छेद के उपरान्त दूसरा विवाह कर सकते हैं या बिना विवाह किए किसी के साथ लिव इन रिलेशन में निवास कर सकते हैं।

क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की अर्जी पेश करें।

rp_judicial-sep8.jpgसमस्या-

करणसिंह ने सागा, तहसील बुहाना, जिला झुन्झुनू, राजस्थान से पूछा है-

मेरी शादी को 10 साल हो चुके है लगभग शादी के दो साल बाद मुझे पता चला कि मैं पिता बनने में असमर्थ हूँ तो मैंने सभी परिवार वालों को ये बता दिया कि मेरी पत्नी को कोई कुछ न कहे कमी मेरे अंदर है। उस के बाद से मेरे ससुराल वाले मुझे परेशान करने लगे मेरी पत्नी जब तक मेरे साथ होती कुछ नहीं कहती। लेकिन अपने परिवार वालों के पास जाते ही वो भी मुझे टोर्चर करने लगती अब बात यहाँ तक आ पहुची है कि 2 महीने पहले मेरे ससुराल वाले मेरे घर आकर मेरे साथ मारपीट करने की कोशिश की। उसके कुछ दिन बाद मेरे पत्नी अपने घर चली गयी और अब सभी लोग मुझे डराते है मारने की धमकी देते है और सारे परिवार को जेल में डलवाने की बात कहते है। अब मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मैं क्या करूँ मै 5 साल पहले ये भी कह चुका  हूँ कि अगर आप लोग अपनी बेटी की कहीं और शादी करना चाहते हो तो कर सकते हो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। मैं अपने कारण उसकी लाइफ ख़राब नहीं करना चाहता था। लेकिन अब में परेशान हो चुका हूँ और उन लोगों से छुटकारा चाहता हूँ मेरी हेल्प करो और बताओ की मैं क्या करूँ?

समाधान-

पसी रिश्तों की स्थितियाँ इतनी खराब हो जाने के बाद इस संबंध का बना रहना हमें उचित प्रतीत नहीं होता। सब से महत्वपूर्ण तो यह है कि आप ने अपनी स्थिति को सब के सामने स्वीकार किया। इस का आप की पत्नी और आप के ससुराल वालों को सम्मान करना चाहिए था।

आप की पत्नी का यह व्यवहार क्रूरतापूर्ण व्यवहार की श्रेणी का है। इस के आधार पर आप तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। अर्जी में आप स्वयं कह सकते हैं कि आप संतान पैदा करने में अक्षम हैं और इस तथ्य की जानकारी होने पर पत्नी का व्यवहार बदला और धीरे धीरे क्रूरतापूर्ण हो चला है। साथ जीना संभव नहीं रहा है इस कारण आप को विवाह विच्छेद चाहिए। यह तो है कि आप को अपनी पत्नी को उस के पुनर्विवाह तक भरण पोषण राशि देनी होगी। इस के अतिरिक्त पत्नी के परिवार वाले उलटा आप पर 498ए, 406 की शिकायत भी कर सकते हैं। लेकिन यदि आप बिना किसी विलंब के विवाह विच्छेद की अर्जी प्रस्तुत कर देंगे तो इन समस्याओं का मुकाबला कर सकेंगे। अन्यथा ये आरोप तो आप पर कुछ दिन बाद वैसे भी लगाए जा सकते हैं।

यदि आप की पत्नी को समझ आए तो मामले को राजीनामे के आधार पर भी सुलझा सकती है। राजीनामे की एक कोशिश हर विवाह विच्छेद के प्रकरण में स्वयं न्यायालय द्वारा की जाती है। हो सकता है सारा मामला आपसी सहमति से निपट जाए। पर उस के लिए भी किसी को पहल करनी होगी। आप विवाह विच्छेद की अर्जी न्यायालय में प्रस्तुत कर इस की पहल कर सकते हैं।

आपसी समझ बना कर वैवाहिक समस्या का समाधान तलाशने का प्रयत्न करें।

rp_play_habeas_rb.jpgसमस्या-

रितिक कौशिक ने गाजियाबाद से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी एक फीजियोथेरेपिस्ट है और दिल्ली के सरकारी अस्पताल में संविदा पर फीजियोथेरेपिस्ट की नौकरी (38,000/-प्रतिमाह) करती है। मैं भी श्रेणी प्रथम राजकीय अधिकारी हूँ। हम दोनों में मनमुटाव के कारण जीना दूभर हो गया है। विवाह को दो वर्ष हुए हैं एक दस माह की बेटी भी है। पत्नी चाहती है कि 30 लाख का मुकदमा कर के घरेलू हिंसा और 498ए में मुझे जेल भिजवा दे जिस से मेरी नौकरी भी चली जाए। कृपया सुझाव दें कि आपसी सहमति से तलाक में भी कामकाजी पत्नी को भी मेंटीनेंस देना होगा क्या? और तलाक के बाद बेटी की कस्टडी किस के पास रहेगी। क्या बेटी के लिए अलग से भत्ता देना पड़ेगा क्या? वह सुप्रीमकोर्ट के निर्णयों की प्रति अपने पास रखती है ताकि इस मामले में अच्छी राशि प्राप्त कर सके।

समाधान-

प ने मन मुटाव का कोई कारण यहाँ नहीं बताया है। मुझे लगता है कि आप दोनों को किसी काउंसलर की मदद लेनी चाहिए। अभी आप के विवाह को अधिक समय नहीं हुआ है। यदि किसी तरह आप लोगों में बात बन सकती है तो इस विवाह को बनाए रखें। इस से बच्चे पर बुरा असर नहीं होगा।

दि आप समझते हैं कि बात इतनी बिगड़ गयी है कि अब नहीं बन सकती तो बेहतर है कि आप दोनों आपस में सहमति से तलाक लें। तलाक की सहमति भी तभी संभव हो सकती है जब कि तलाक के फलस्वरूप आप की पत्नी के लिए स्थाई पुनर्भरण तथा बेटी के भरण पोषण की राशि तय हो जाए। यह राशि दोनों की मिला कर एक मुश्त तय हो सकती है। यदि ये सब बातें तय हो जाएंगी तभी सहमति से तलाक संभव हो सकेगा अन्यथा आप दोनों को बहुत सी मुकदमों को झेलना पड़ेगा। बेहतर है कि साथ रहने के संबंध में नहीं तो अलग होने के संबंध में ही सहमति बना ली जाए।

लाक की स्थिति में यदि पत्नी की खुद की पर्याप्त आय है तो उसे भरण पोषण राशि दिलाने का कोई अर्थ नहीं है लेकिन आप की आय और पत्नी की आय में बड़ा अन्तर है तो न्यायालय पत्नी को अपने स्तर से जीने के लिए कुछ भरण पोषण राशि आप से दिलवा सकता है।

बेटी की अभिरक्षा आप को प्राप्त नहीं हो सकेगी। बेहतर है कि वह अपनी माँ के साथ रहे। बाद में जब उस की उम्र अधिक हो जाए और यह लगे कि माँ के साथ उस का पालन पोषण ठीक से नहीं हो रहा है और आप के पास हो सकता है तो उस समय कस्टडी प्राप्त करने के लिए आवेदन किया जा सकता है।

प राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में निवास करते हैं। वहाँ बहुत अच्चे वकील उपलब्ध हैं। आप उन की फीस देने में भी सक्षम हैं आप को चाहिए कि किसी स्थानीय वकील से सारे तथ्य बता कर राय करें। वह सारे तथ्य जान लेने के बाद आप को उचित राय दे सकता है।

आप को अब विवाह विच्छेद के बारे में सोचना चाहिए।

rp_judicial-sep4.jpgसमस्या-

नंद किशोर ने बरेली, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी वाइफ ने 498ए ओर 125(6) का केस किया हुआ है जिस में 125 का केस खारिज हो चुका है। इस के चार माह बाद 125(6) का केस मेरे विरुद्ध किया है। 125 के केस में मेरी वाइफ ने अपनी तरफ से कोई भी साक्ष्य नहीं दिया और हर तारीख पर टालमटौल की और गैर हाजिर होने से मुकदमा खारिज हो गया। 498ए में सभी की जमानत हो चुकी है। अभी पत्नी की तरफ़ से पत्नी और उसके पिता की गवाही हुई है। उसकी माता की रह गई है। इन दोनों की गवाही लगभग 1 साल में हुई है। इसके अलावा और कोई गवाह नहीं है। मेरी वाइफ मुझे छोड़ कर चली गई, उस समय मेरा एक्सीडेण्ड हो गया था, जिस में मेरा एक पैर टूट गया और उस में राड डाली गई है। मायके गई हुए 6 साल हो चुके हैं और केस किए हुए लगभग 2 साल हो चुके हैं। ये बताएं कि हम उस पर कोई केस फाइल कर सकते है क्या? और 125(6) के केस में वो क्या मेंटीनेंस देना पड़ेगा? मैं बेरोज़गार हूँ दाएँ पैर में रॉड पड़ी हुई है जिस से मूज़े भारी काम करने में परेशानी होती है।

समाधान

धारा 498ए आईपीसी के मुकदमे में सभी की जमानत हो चुकी है और दो गवाहों के बयान भी हो चुके हैं। कुछ बयान और होने हैं, इस में समय तो लगेगा। हमारे देश में जरूरत की एक चौथाई से भी कम अदालतें हैं। इस कारण सभी मुकदमों में बहुत समय लगता है। जिस के कारण हमारी न्याय व्यवस्था सभी के लिए एक पीड़ादायक अनुभव बन चुकी है। इस का कोई उपाय नहीं है। मुकदमा चलने दें। पैरवी में कोई कसर न रखें।

125(6) दं.प्र.सं. के केस के बारे में हमें आप के विवरण से कुछ समझ नहीं आया है। यह उपधारा (6) केवल उत्तरप्रदेश का प्रादेशिक संशोधन है और केवल उत्तर प्रदेश में प्रभावी है। इस में प्रावधान है यदि धारा 125 में कोई कार्यवाही चल रही हो तो अन्तरिम आदेश पारित किया जा सकता है जिस में 5000 रुपए तक का भरण पोषण और अदालती खर्च दिलाया जा सकता है। लेकिन यह आवेदन तभी चल सकता है जब कि धारा 125 का आवेदन न्यायालय में लंबित हो। आप के मामले में जब धारा 125 का आवेदन निरस्त हो चुका है तो धारा 125(6) का आवेदन कैसे चल रहा है? आप को अपने वकील से यह सब जानने की कोशिश करनी चाहिए।

मुझे लगता है कि आप की अपंगता और बेरोजगारी को आप साबित कर चुके हैं, इसी कारण धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण निरस्त हुआ है तो हमारी राय में ऐसी परिस्थिति में धारा 125(6) के मामले में भी कुछ नहीं हो सकता।

प की पत्नी आप को छोड़ कर जा चुकी है जिसे छह वर्ष हो चुके हैं, यह आप के विवाह विच्छेद का एक आधार हो सकता है। इस के अतिरिक्त क्रूरता आदि के आधार भी आप के मामले में हो सकते हैं। मुझे लगता है कि आप को अब विवाह विच्छेद के बारे में सोचना चाहिए और अपने वकील से राय करनी चाहिए। यदि आप के पास पर्याप्त आधार हो तो विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर देना चाहिए।

आप को अपने प्यार की अवश्य मदद करनी चाहिए।

handshakeसमस्या-

अनाम चंद ने बागपत, उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं एक लड़की को पिछले १२ सालो से प्यार करता हूँ और वो भी मुझे बेपनाह चाहती है। मगर गोत्र एक होने के कारण हमारी शादी नहीं हो पायी। तब हम दोनों ने अपने घर वालों की इज्जत के कारण एक दूसरे से अलग होने का फैसला किया। उसके बाद उस लड़की ने अपने बीमार पिता की इज्जत रखने के लिए कहीं और उनके कहने पर शादी कर ली। इस तरह हम दोनों अलग हो गए। मैंने कभी उससे कांटेक्ट करने की कोशिश नहीं की। मैं नहीं चाहता था कि मेरे कारण उसका वैवाहिक जीवन बाधित न। उसके माँ और पिताजी की मृत्यु हो गयी। इस बीच मेरे भी पापा जी भी नहीं रहे। मगर मैंने अपने से छोटी दोनों बहनों की शादी कर दी है। मगर मुझे अब पता चला कि उस लड़की की किस्मत खराब निकली। उसका पति पागल है कई बार उसे मारने की कोशिश कर चुका है। एक बार उसका गला घोंटकर और एक बार चाकू से, दोनों बार उसे उसके घरवालों ने बचाया। होने को तो उसके तीन बच्चे भी हैं मगर वो उसने ससुरालवालों के दबाव में किये थे। उन्हें डर था कि कहीं वो उन्हें छोड़कर न चली जाये। उस लड़की का नाम कविता है कविता बताती है कि उसका पति कई कई दिन बाहर घूमता रहता है, काफी इलाज भी करा लिया उसका मगर कोई फायदा नहीं है। जब भी घर आता है तब गाली गलौच करता है, मारपीट तो आम बात है। सास ससुर भी बाहर से दरवाजा बंद करके निकल जाते हैं। कोई छुड़ाने की कोशिश नहीं करता। क्योकि फिर वो उनके साथ भी मारपीट करता है। जब भी कोई मेहमान घर आता है तो उनसे पैसे मांगने लगता है। अगर कोई बच्चा कुछ चीज खाता हुआ मिल जाता है तो उससे छीन लेता है और न देने पर उसे मारता है। कविता बताती है कि वो अपने पति के घर आने पर डर जाती है कई बार वो डर के कारण पशुओं के कमरे में भी सोई है और एक बार जिंदगी से तंग आकर आत्महत्या की कोशिश भी कर चुकी है। मगर उसके ससुरालवालों ने उलटी करवाकर उसे बचा लिया। मुझ से ये सब नहीं देखा जाता। में उस से शादी करना चाहता हूँ। वो मेरे साथ कहीं भी चलकर रहने को तैयार है। मगर उस के पहले पति से बिना तलाक के ये सब नहीं हो सकता। और उसके मायके में कोई भी ऐसा नहीं है जो उसकी तलाक के मामले में मदद कर सके। क्यों कि वो सब अपनी झूठी इज्जत के कारण चुप रहेंगे। कविता ने अपने ताऊ और बाकी सब से भी बात करने की कोशिश की। मगर सब यही कहते है के जहाँ दस साल काट लिए वहाँ और वक़्त भी कट जायेगा। अभी एक महीने पहले कविता ने मायके आकर वापस जाने से मना कर दिया था। तब उसके ससुराल वालों ने उसके पति को पागलखाने एडमिट करने का वादा करके उसे नशा मुक्ति केंद्र में एडमिट करा दिया है और वो दो महीने से वहीं है। मगर लगता है वो लोग जल्दी ही उसकी छुट्टी कराकर उसे वापस ले आयेंगे और फिर से वही सब आरम्भ हो जायेगा। मुझे क्या करना चाहिए मुझे कुछ समझ नहीं आता मैं उसके लिए कुछ करना चाहता हूँ। मैंने आज तक शादी नहीं की और उसके अलावा किसी से करना भी नहीं चाहता। आप मेरी मदद करें। क्या उस की पहली शादी से तलाक लिए बिना मैं किसी तरीके से क़ानूनी रूप से उसे अपना बना सकता हूँ।

समाधान

नाम चन्द जी¡ आप उस महिला कविता से प्यार करते हैं तो आप को उस की मदद अवश्य करनी चाहिए। लेकिन तलाक लिए बिना कविता से विवाह नहीं कर सकते। इस कारण सब से पहला काम यह होना चाहिए कि आप उसे तलाक लेने में मदद करें। फिलहाल वह अपने मायके में रह रही है। आप उस से मिल कर उसे तलाक लेने के लिए तैयार करें। उसे क्रूरता और पति के पागलपन के कारण तलाक मिल सकता है। यदि तलाक की अर्जी लगाने के पहले या बाद में उस के मायके वाले भी उस का साथ देने या उस के तलाक लेने में अड़चन पैदा करें तो आप उसे अपने घर ला कर रख सकते हैं। लेकिन उस का यह रहना एक आश्रित का आप के साथ रहना होगा, एक पत्नी की तरह आप उसे नहीं रख सकेंगे।

प के घर या आप के साथ आ कर रहने के पहले उस का शपथ पत्र नोटेरी पब्लिक के पास जरूर करवा कर रख लें जिस में उस की सारी परिस्थितियों का संक्षेप में वर्णन करते हुए वह कहे कि पति के साथ ससुराल में रहना संभव नहीं रह गया है और मायके में कोई नजदीकी रिश्तेदार नहीं है। इस परिस्थिति में आप उस की मदद करते हुए एक आश्रित के रूप में उसे अपने पास रखने को तैयार हैं और वह स्वैच्छा से आप के साथ रह रही है।

ब कविता का तलाक हो जाए तो उस के बाद आप उस महिला से विवाह कर सकते हैं। सगोत्रीय विवाह आप के इलाके में बहुत खराब नजर से देखे जाते हैं। इस से आप को कुछ सामाजिक परेशानियाँ हो सकती हैं। उन का ध्यान रखें और उन का मुकाबला कर सकने की स्थिति हो तो यह सब करें।

इस विवाह से बाहर निकल जाना ही भला है।

rp_two-vives.jpgसमस्या-

राज ने जवाजा, ब्यावर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 6-6-2014 को हुई है। मेरे पति पुलिस कॉन्स्टेबल हैं। मेरे साथ ससुराल वाले मारपीट करते हैं और दहेज में कार माँगते हैं। सभी लालची हैं। पति का किसी और लड़की के साथ संबंध है, जिसे समाज के सामने बहन बताते हैं। लेकिन अंदर ही अंदर बंद कमरे में मुझे धीरे धीरे उस लड़की के बारे में बताया कि मैं उस से प्यार करता हूँ लेकिन मैं ने समाज से बचने के लिए तुझ से शादी की है। मैं पुलिस वाला हूँ तो मेरा कुछ भी नहीं कर सकती है। चुपके से मोबाइल में रेकॉर्डिंग करता है। क़ानून से बचने हेतु सबूत इकट्ठा कर रहे हैं। मैं ने और मेरे परिवार वालों ने उस लड़की का पता लगाया। वह एक रिलाइंस मोल में काम करती है। उसका पूरा खर्चा भी मेरे पति चलाते हैं। यह एक साजिश है जो कि उस लड़की के परिवार और मेरे पति के परिवार वालों ने मेरे साथ रची है। कोई कानूनी उपाय बताएँ।

समाधान

जो विवरण आप ने दिया है उस से लगता है कि आप का यह विवाह चल नहीं सकेगा और चला भी तो आप को पूरी तरह से एक दासी जैसा जीवन बिताना पड़ेगा। इस लिए हमारी सलाह तो यही है कि इस विवाह से जितना जल्दी हो छुटकारा पा लिया जाए। आप को चाहिए कि आप विवाह विच्छेद के लिए आवेदन जितना जल्दी हो सके कर दें। विवाह को एक वर्ष हो चुका है इस कारण आप विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं और साथ में स्थाई पुनर्भरण की मांग कर सकती हैं।

प का पति मारपीट करता है। दहेज में कार मांगता है। इस तरह उस ने धारा 498-ए का अपराध किया है और उस का ऐसा करना गंभीर क्रूरता है। इस आधार पर आप विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं।

पुलिस कांस्टेबल होने से कुछ नहीं होता। बल्कि पुलिस कांस्टेबल बहुत डरपोक होता है। आप धारा 498-ए और अपने स्त्री-धन की वापसी के लिए सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं जिसे 156 (3) दं.प्र.संहिता में पुलिस को अन्वेषण के लिए भिजवाया जा सकता है। आप चाहें तो न्यायालय में अपने और गवाहों के बयान करवा कर सीधे भी न्यायालय को प्रसंज्ञान लेने को कह सकती हैं बाद में न्यायालय उसे पुलिस को आगे के अन्वेषण हेतु भेज सकता है। यदि आप अपने मायके या पति से अलग रह रही हैं तो आप घरेलू हिंसा का परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं और अपने लिए निर्वाह भत्ते की मांग कर सकती हैं। निर्वाह भत्ते के लिए धारा 125 दं.प्र.संहिता में भी आप आवेदन कर सकती हैं।

हिन्दू विवाह केवल न्यायालय की विवाह विच्छेद डिक्री से ही विघटित हो सकता है।

rp_divorce-decree5.jpgसमस्या-

जी.आर. चौधरी ने जोधपुर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरा विवाह आज से 12 वर्ष पूर्व हिन्दू रीति रिवाज से हुआ था और हम पति और पत्नी दोनों ही हिन्दू धर्म से तालुकात रखते हैं। विवाह के बाद से ही मेरी पत्नी अपने पीहर में ही रह रही है और अब काफी समय के बाद मेरी पत्नी एवं उसके पीहर वालों द्वारा यह कहा जा रहा है कि मेरी पत्नी हम दोनों की आपसी सहमति से स्टाम्प पेपर पर शपथ पत्र के माध्यम से हिन्दू रीति रिवाजों के तहत समाज के पंचों के समक्ष लिखित में देकर तलाक देना चाहती है। उसके द्वारा दिये गये शपथ पत्र के आधार पर मुझे भी समाज के पंचों के समक्ष लिखकर पत्नी को देना है। मैं आपसे जानना चाहता हूं कि क्या हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत हुयी शादी में पंच/ पंचायत के समक्ष पत्नी द्वारा स्टाम्प पेपर पर लिखित में दिया गया तलाक मान्य है अथवा नहीं? क्या इस प्रकार के तलाक को भविष्य में सादे पेपर पर अंगूठा करवाने अथवा डरा धमकाकर लिखवाने का आरोप लगाकर मेरी पत्नी द्वारा न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है अथवा नहीं? न्यायालय समाज के पंच पटेलों के समक्ष लिखे गये तलाकनामे को कोर्ट में पंजीकृत करवाया जा सकता है अथवा नहीं। इसके साथ ही यदि महिला परामर्श केन्द्र पर आपसी सहमति से हुये इस प्रकार के तलाक को कोर्ट द्वारा जायज ठहराया जा सकता है अथवा नहीं?

समाधान-

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के प्रभावी होने तक हिन्दू विवाह में तलाक या विवाह विच्छेद जैसी कोई चीज नहीं थी। एक बार हुआ विवाह कभी विच्छेद नहीं हो सकता था। विवाह विच्छेद का प्रावधान पहली बार उक्त अधिनियम के माध्यम से हिन्दू विवाह में आया। इस अधिनियम में भी विवाह विच्छेद को अत्यधिक कठोर बनाया गया। एक हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की विवाह विच्छेद की डिक्री के द्वारा ही समाप्त हो सकता है। इस कारण पंचों या पंचायत या महिला परामर्श केन्द्र के समक्ष तस्दीक किए गए तलाकनामे का या विवाह विच्छेद के शपथ पत्रों या समझौते से विवाह को विघटित नहीं माना जा सकता। ऐसी किसी भी कार्यवाही के बाद भी कानून की दृष्टि में दोनों पति पत्नी बने रहेंगे

स तरह का कोई समझौता पंचों की उपस्थिति में, पंचायत में अथवा पुलिस परामर्श केन्द्र में होता है तो उस पर निश्चित रूप से गवाहों के हस्ताक्षर भी होंगे। इस तरह यह समझौता केवल यह प्रकट करेगा कि दोनों पति पत्नी साथ रहने में सक्षम नहीं थे और उन में अलग रहने और विवाह को समाप्त करने का समझौता हुआ है। इस समझौ ते को संलग्न करते हुए दोनों पति पत्नी हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 बी के अन्तर्गत न्यायालय के समक्ष सहमति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकते हैं तथा इस आवेदन पर दोनों आवेदक पक्षकारों के बयान ले कर आवश्यक अवधि आवेदन करने की तिथि के छह माह के पश्चात न्यायालय आवेदन को स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर विवाह को विघटित कर सकता है।

दि पत्नी की मंशा में कोई बद्यान्ति आ जाए तो पंचों, पंचायत या पुलिस परामर्श केन्द्र के समक्ष हुए समझौते को दबाव से हस्ताक्षर कराया गया कहा जा सकता है। लेकिन उस पर जिन गवाहों के हस्ताक्षर हैं उन की गवाही से यह साबित किया जा सकता है कि यह दबाव से नहीं किया गया था अपितु स्वयं पत्नी पक्ष की पहल पर हस्ताक्षरित किया गया था।

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