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दहेज लेने देने की शिकायत केवल अपराध होने से एक वर्ष की अवधि में ही की जा सकती है।

समस्या-

मेरे ऊपर धारा 498a आईपीसी तथा घरेलू हिंसा अधिनियम में प्रकरण लंबित हैं, साक्ष्य हो चुकी है, साक्ष्य में उन्होंने दहेज देना स्वीकार किया है, दहेज देना अपराध है, कार्यवाही कैसे हो उन पर?

-रामकिशोर, मारवाड़ी का बाग, उनाव रोड, जिला दतिया, मध्य प्रदेश

समाधान-

हेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत दहेज लेना और दहेज देना तथा दहेज लेने या देने के लिए प्रतिज्ञा या संविदा करना अपराध है। इस अपराध के लिए अभियुक्त को अपराध साबित हो जाने पर छह माह तक का कारावास और 5 हजार तक के जुर्माने का दंड दिया जा सकता है। यह अपराध जमानतीय है और प्रसंज्ञेय नहीं है, अर्थात इस में प्रसंज्ञान लेने पर अभियुक्त को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए जमानती वारंट ही जारी किया जा सकता है तथा न्यायालय में उपस्थित होने पर उसे जमानत पेश करने पर हिरासत में नहीं लिया जा सकता है।

इस अपराध का परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में ही प्रस्तुत किया जासकता है और मजिस्ट्रेट को अपराध घटित होने के 1 वर्ष की अवधि में प्रसंज्ञान लेने का अधिकार है उस के पश्चात नहीं जिस का सीधा अर्थ है कि यह अपराध घटित होने के एक वर्ष की अवधि में यदि सक्षम न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत नहीं किया गया तो फिर इस अपराध के संबंध में कोई कार्यवाही किया जाना संभव नहीं है। आप के मामले में यदि दहेज देने की अभिस्वीकृति में एक वर्ष पूर्व दहेज देना स्वीकार किया गया है तो कोई कार्यवाही किया जाना संभव नहीं होगा।

दहेज प्रताड़ना की एफआईआर निरस्त होने के आदेश की प्रतियाँ अन्य सभी मामलों में प्रस्तुत करें।

समस्या-

सुनील ने अहमदाबाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी फरवरी 2014 में हुई थी मेरी पत्नी को मिर्गी का रोग है। जो हमको बताए बिना शादी की थी। मुझे यह बात नवम्बर 2014 में पता चली। फिर मेरी पत्नी मायके गई तो मैंने उसे तलाक की नोटिस भेजी। तलाक की नोटिस भेजने के बाद में उसने मुझ पर दहेज का झूठा केस लगाया जिसके कारण मुझे और मेरी फैमिली को लॉकअप में रहना पड़ा। उस केस को हमने हाईकोर्ट में रखा मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने मेरी पत्नी की पूरी FIR रद्द की और हमको बरी कर दिया। मेरी वाइफ ने सूरत में 125 भरण पोषण के लिए और डोमेस्टिक वायलेंस का केस घरेलू हिंसा के लिए किया है वे अभी चल रहे हैं और अहमदाबाद में तलाक का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है अगर दहेज का केस झूठा निकलता है तो पति को तलाक का पूरा अधिकार है। उसके तहत और मेरी पत्नी को मिर्गी की बीमारी है उसको छुपाकर शादी की है उसके तहत में तलाक लेना चाहता हूं। लेकिन कोर्ट की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि मैं तलाक की प्रक्रिया फास्ट करने के लिए क्या कर सकता हूँ। जिसके कारण तलाक के केस की जल्दी तारीख पड़े मेरा केस जल्दी पूरा हो। हाई कोर्ट ने मेरी वाइफ की 498 की जो FIR रद्द की है उस पर मुझे डोमेस्टिक वायलेंस यानी घरेलू हिंसा अधिनियम में क्या फायदा हो सकता है? कृपया कर अपना सुझाव दीजिए। मैं नवंबर 2015 से अपने भाई, बुआ के लड़के के घर पर रह रहा हूँ और मेरी अभी पीएचडी की पढ़ाई चालू है। अगर कोर्ट भरण पोषण की रकम तय करती है तो मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी और कहीं जॉब ढूंढना पड़ेगा क्या? कोर्ट फैसला दे सकती है कि तुम अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठाओ? क्योंकि मैं अपने मम्मी पापा से अलग हो गया हूँ वह मुझे अपने घर में नहीं रखते, मेरी पढ़ाई लिखाई का खर्चा मेरे भाई उठाते हैं।

समाधान-

मुकदमा निपटने की प्रक्रिया फास्ट होने का कोई माकूल तरीका नहीं है। देरी इस कारण होती है कि देश में पर्याप्त मात्रा में न्यायालय नहीं हैं। न्यायालयों की कमी को केवल राज्य सरकारें ही पूरी कर सकती हैं। फिलहाल आप यह कर सकते हैं कि उच्च न्यायालय में रिट लगवा कर अदालत के लिए यह निर्देश जारी करवा सकते हैं कि आप के मुकदमे में सुनवाई जल्दी की जाए और नियत समय में आप के मुकदमे में निर्णय पारित किया जाए।

498 ए की प्रथम सूचना रिपोर्ट रद्द होने के निर्णय की प्रतियाँ आप अपने सभी मामलों में प्रस्तुत करें। वह आप को लाभ देगी। इस से यह साबित होगा कि आप की पत्नी की ओर से मिथ्या तथ्यों के आधार पर आप के विरुद्ध मुकदमे करने का प्रयत्न किया गया है। इस से आप को लाभ प्राप्त होगा।

न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकती है लेकिन इस के लिए वह आप को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह सकती। वह यह कह सकती है कि जब आप कमाते नहीं थे, अध्ययनरत थे और पत्नी का खर्च नहीं उठा सकते थे तो आप को विवाह नहीं करना चाहिए था। वैसे इस परिस्थिति में पत्नी का भरण पोषण इतना नहीं होगा कि उसे अदा करने के लिए आप को पढ़ाई छोड़नी पड़े।

जब कोई पुलिस अदालत तक पहुँचता है तभी लोगों को कानून याद आता है।

rp_Hindu-marrige1.jpgसमस्या-

मनोज कुमार चौरसिया ने सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 28 मई 2013 को हुई। शादी के एक माह बाद मेरी पत्नी मानसिक रूप से बीमार हो गयी जिसका हमने मनोचिकित्सक इलाहाबाद से इलाज कराना शुरू किया और अभी भी इलाज चल रहा है। मेरे ससुराल वाले जबरन मेरी पत्नी को विदा कराकर ले जाते है और वापस विदा नहीं करते। चूँ कि मेरे ससुर वकील सुलतानपुर दीवानी में एवं ममिया ससुर भदोही में जज हैं। इसलिए मुझे झूठे मुकदमें में फँसाने की धमकी देते हैं। 07 फरवरी को मेरी पत्नी को जुड़वाँ बच्चे एक बेटा और एक बेटी आपरेशन से हुए। दवा का सारा पैसा हम ने दिया और हास्पिटल से पत्नी मायके चली गयी। जाते समय ससुराल वालों ने कहा कि तुम को तरसा लेगें। देखो अब हम क्या–क्या करते हैं? तुम्हे बच्चा पैदा करने की क्या जरूरत थी? अब 8 माह का समय बीत चुका है, ससुराल वाले से बात किया परन्तु भेजने को तैयार नहीं थे। मेरी माँ को अपने घर बुलाकर कहा कि अब मेरी लडकी नहीं जायेगी लड़ कर हिस्सा लेगी। इसपर हमने वकील से बात किया तो वकील ने धारा 13 के अन्तर्गत मानसिक बीमारी और जबरन ले जाने व धमकी देने को आधार बनाकर तलाक का मुकदमा कर दिया है। मानसिक बीमारी का लगभग एक वर्ष का पर्चा व कुछ डिलीवरी हास्पिटल का पर्चा मेरे पास है। क्या मुझे तलाक मिल जायेगा? और क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406‚ 125‚ 24 व अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड सकता है?

समाधान-

तीसरा खंबा को इस तरह की समस्याएँ रोज ही मिलती हैं। जिन में बहुत से पति यह पूछते हैं कि मुझे तलाक तो मिल जाएगा? क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406 या अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड़ सकता है? आदि आदि।

र कोई विवाह करने के पहले और विवाह करने के समय यह कभी नहीं सोचता कि कानून क्या है? और उन्हें देश के कानून के हिसाब से बर्ताव करना चाहिए। वह सब कुछ करता है। वह दहेज को बड़ी मासूमियत से स्वीकार करता है, वह मिले हुए दहेज की तुलना औरों को मिले हुए दहेज से करता है, वह उस दहेज में हजार नुक्स निकालने का प्रयत्न करता है।

ब विवाह के लिए लड़की देखी जाती है तो उस की शक्ल-सूरत, उस की पढ़ाई लिखाई, उस की नौकरी वगैरा वगैरा और उस के पिता का धन देखा जाता है। यह कभी नहीं जानने का प्रयत्न किया जाता कि लड़की या लड़के का सामान्य स्वास्थ्य कैसा है? वह किस तरह व्यवहार करता या करती है, विवाह के उपरान्त दोनों पति-पत्नी में तालमेल रहेगा या नहीं? क्यों कि यह सब जानने के लिए लड़के लड़की को कई बार एक साथ कुछ समय बिताने की जरूरत होती है। इसे पश्चिम में डेटिंग कहते हैं। भारतीय समाज डेटिंग की इजाजत कैसे दे सकता है? क्या पता लड़के-लड़की शादी के पहले ही कुछ गड़बड़ कर दें तो? या लड़का या लड़की रिश्ता के लिए ही मना कर दे तो दूसरे की इज्जत क्या रह जाएगी?

विवाह के बाद दहेज को दहेज ही समझा जाता है। पति और उस के रिश्तेदार उसे अपना माल समझते हैं। वे जानते हैं कि दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं। पर कौन देखता है? की तर्ज पर यह अपराध किए जाते हैं। दहेज के कानून में माता-पिता, रिश्तेदारों, मित्रों और अन्य लोगों यहाँ तक कि ससुराल से प्राप्त उपहारों को दहेज मानने से छूट दी गयी है। इस कारण जब कोई मुकदमा दर्ज होता है तो लोग उसे दहेज के बजाय उपहार कहना आरंभ कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि किसी स्त्री को मिले उपहार उस का स्त्री-धन है। उस के ससुराल में रखा हुआ यह सब सामान उस की अमानत है। उसे न लौटाएंगे तो अमानत में खयानत होगी। फिर जब आईपीसी की धारा 406 अमानत में खयानत का मुकदमा ही बनाना होता है तो बहुत सी काल्पनिक चीजें लिखा दी जाती हैं।

त्नी को मानसिक या शारीरिक क्रूरता पहुँचाना हमारे यहाँ पति और ससुराल वालों का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन कानून उसे 498-ए में अपराध मानता है, तो यह अपराध भी धड़ल्ले से देश भर में खूब चलता है। लोग ये दोनों अपराध खूब धड़ल्ले से करते हैं। समझते हैं कि इन्हें करने का उन्हें समाज ने लायसेंस दिया हुआ है। पर जब इन धाराओं में मुकदमा होने की आशंका होती है या धमकी मिलती है तो वही लोग बिलबिला उठते हैं। उन्हें कानून का यह पालन अत्याचार दिखाई देने लगता है।

म मानते हैं कि जब मुकदमा होता है तो बहुत से फर्जी बातें उस में जोड़ी जाती हैं। यह भी इस देश की प्राचीन परंपरा है। गाँवों में जब लड़ाई होती है तो इज्जत की रखवाली में हथियार ले कर बैठे परिवारों की स्त्रियों से पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट करा दी जाती है। लेकिन विवाह के रिश्ते में ऐसा फर्जीवाड़ा करना दूसरे पक्ष को नागवार गुजरता है।

ब अदालत में कोई भी पीड़ित हो या न हो। एक बार शिकायत कराए, या पुलिस को एफआईआर लिखाए तो उन का फर्ज है जाँच करना और जाँच करने का मतलब पुलिस के लिए यही होता है कि पीड़ित पक्ष और उस के गवाहों के बयान लिए जाएँ और उन से जो निकले उस के आधार पर अपराध को सिद्ध मानते हुए अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया जाए। एक बार आरोप पत्र पेश हो जाए तो जब तक उस मुकदमे का विचारण नहीं हो जाए तब तक अदालत के चक्कर तो काटने ही होंगे। सचाई पता लगाने की जरूरत पुलिस और अदालत को कभी नहीं होती। वैसे भी जो चीज पहले से ही पता हो उसे जानने की जरूरत नहीं होती। आखिर वह जान लिया जाता है जो पहले से पता नहीं होता।

प के सामने समस्या है। आप ने तलाक का मुकदमा कर दिया है। वकील की सहायता ली है। वकील को सारे तथ्य पता हैं। हमे तो आप ने पत्नी को मानसिक रोगी मात्र बताया है। उस का पागलपन या मानसिक रोग क्या है? वह रोग के कारण क्या करती या नहीं करती है? या चिकित्सक ने उसे क्या रोग बताया है? आपने हमें कुछ नहीं बताया है। जो मुकदमा किया है उस में क्या आधार किन तथ्यों पर लिए हैं? यह भी नहीं बताया है फिर आप हम से अपेक्षा रखते हैं कि तीसरा खंबा आप को बता देगा कि आप को तलाक मिलेगा या नहीं और आप को फर्जी मुकदमों में फँसा तो नहीं दिया जाएगा।

लाक का मिलना मुकदमे में लिए गए आधारों और उन्हें साक्ष्य से साबित करने के आधार पर निर्भर करता है। आप की पत्नी मुकदमा दर्ज कराएगी तो हो सकता है आप को गिरफ्तार भी कर लिया जाए। लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में जमानत हो जाती है और जल्दी ही पति और उसके परिवार वाले रिहा हो जाते हैं। ऐसे मामलों में चूंकि झूठ जरूर मिलाया जाता है इस कारण ज्यादातर पति इस मिलावट के कारण बरी हो जाते हैं। पर कभी कभी सजा भी हो जाती है। अगर आप ने कोई अपराध नहीं किया है। कभी पत्नी को गाली नहीं दी है, उस पर हाथ नहीं उठाया है, उस के उपहारों और स्त्री-धन को उस का माल न समझ कर अपना माल समझने की गलती नहीं की है तो आप को सजा हो ही नहीं सकती। पर यह सब किया है तो सजा भुगतने के लिए तैयार तो रहना ही चाहिए। अपराध की सजा हर मामले में नहीं तो कुछ मामलों में तो मिल ही सकती है।

भी तक कानून ने पत्नी को पति की संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं दिया है। पति की मृत्यु के बाद यदि पति ने कोई बिना वसीयत की संपत्ति छोड़ी हो तो उस का उत्तराधिकार बनता है जिसे वह ले सकती है। लेकिन जीते जी अधिक से अधिक अपने लिए भरण पोषण मांग सकती है। इस कारण जो यह धमकी दे रहे हैं कि पत्नी हिस्सा लड़कर लेगी वे मिथ्या भाषण कर रहे हैं। अभी तक कानून ने ही पति की संपत्ति में हिस्सा पत्नी को नहीं दिया है अदालत कैसे दे सकती है। इस मामले में आप निश्चिंत रहें। आज तीसरा खंबा की भाषा आप को विचित्र लगी होगी। पर इस का इस्तेमाल इस लिए करना पड़ा कि लोग ऐसे ही समझते हैं। आप इस बात को समझेंगे और दूसरे पाठक भी इस तरह के प्रश्न करना बन्द करेंगे। हम तो ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना बन्द कर ही रहे हैं।

वधु को दिए गए सभी उपहार दहेज नहीं, स्त्री-धन हैं।

hindu-marriage-actसमस्या-

 

प्रिया ने पटना, बिहार से पूछा है-
मैंने पिछले साल नवंबर में अपनी समस्या रखी थी जिसका समाधान भी आप ने दिया था। मैंनेअभी तक अपना स्त्रीधन वापस पाने के लिए धारा ४०६ के तहत अथवा अन्य कोई भीमुकदमा दायर नहीं किया है। कृपया मुझे बताएँ कि क्या ४०६ की कोई परिसीमनअवधि है? मेरे पास इस संबंध में फोन कॉल की आखिरी रिकॉर्डिंग २३ जून २०१३की है।इस कॉल में स्त्रीधन को वापस न करने की बात की गई है परंतुस्त्रीधन में कौन-कौन से गहने हैं तथा अन्य सामानों का विवरण नहीं है। क्याइससे मुझे दिक्कत हो सकती है?
मेरे पति ने अब मेरे विरुद्ध वैवाहिकसंबंधों की पुनर्स्थापना के लिए धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत मुकदमादायर कर दिया है जिसमें मुझ पर तथा मेरे माता-पिता पर उल्टे-सीधे आरोप लगाएगए हैं और यह कहा गया है कि समस्त स्त्रीधन मेरे पास है। सुनवाई की तिथि15 मई दी गई थी। लेकिन मेरा जाना संभव न हो पाने के कारण मैं नहीं जा सकी और मैं ने न्यायालय को एक प्रार्थना पत्र डाक से प्रेषित कर दिया है। यह मुकदमा उस नगर के पारिवारिक न्यायालय में दायर किया गयाहै जहाँ मेरी ससुराल है तथा जहाँ से हमारे विवाह को विशेष विवाह अधिनियम केअंतर्गत पंजीकृत किया गया था। इस नगर में फिलवक्त केवल मेरे सास ससुर रहतेहैं। जबकि मेरे पति म.प्र. के एक शहर में चले गए हैं। अलग होने के पूर्वमैं पति के साथ उ.प्र. में रह रही थी और हमारा विवाह हिंदू रीति रिवाजों सेपटना में हुआ था। तो क्या मैं यह मुकदमा अपने शहर पटना में स्थानांतरितकरवा सकती हूँ? मैं अभी यहीं पर कार्यरत हूँ।
मेरे पिताजी अवकाशप्राप्त सरकारी कर्मचारी हैं। यदि इस वाद के प्रत्युत्तर में हम विवाह केसंबंध में दिए गए दहेज का जिक्र करते हैं तो क्या इससे उन्हें परेशानी होसकती है?

 

समाधान-

 

धारा 406 आईपीसी में कोई लिमिटेशन नहीं है आप कभी भी इस की शिकायत पुलिस को दर्ज करवा सकती हैं या फिर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। यह वास्तव में स्त्री-धन जो कि पति या उस के परिजनो के पास है उसे मांगे जाने पर देने से इन्कार कर देने पर उत्पन्न होता है। आप के पति ने उसके पास जो आप का स्त्री-धन है उस के बारे में यह मिथ्या तथ्य अपने आवेदन में अंकित किया है कि वह आप के पास है। इस तरह वह आप के स्त्री-धन को जो पति के पास अमानत है उसे देने से इन्कार कर रहा है। इसी से धारा-406 आईपीसी के लिए वाद कारण उत्पन्न हो गया है। आप जितनी जल्दी हो सके यह परिवाद पुलिस को या फिर न्यायालय में प्रस्तुत कर दें। यह सारा स्त्री-धन आपके पति के कब्जे में आप के विवाह के समय पटना में सुपूर्द किया गया था इस कारण से उस का वाद कारण भी पटना में ही उत्पन्न हुआ है और आप यह परिवाद पटना में प्रस्तुत कर सकती हैं।

हेज के लेन देन पर पूरी तरह निषेध है तथा यह लेने वाले और देने वाले दोनों के लिए अपराध भी है। किन्तु पुत्री को या पुत्रवधु को उपहार दिए जा सकते हैं जो कि उस का स्त्री-धन हैं। आप के मामले में जो भी नकद या वस्तुएँ आप के पिता ने, आप के संबंधियों और मित्रों ने या फिर आप के ससुराल वालों ने आप को दी हैं। वे सभी स्त्री-धन है और वह आप के पति या ससुराल वालों के पास अमानत है। आप के मांगे जाने पर न देने पर धारा 406 आईपीसी का अपराध होता है।

प धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रकरण में आप के उपस्थित न होने से आप के विरुद्ध एक तरफा डिक्री पारित हो सकती है। यह डिक्री वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए होगी। जिस का मात्र इतना असर है कि यदि आप डिक्री होने के एक वर्ष तक भी आप के पति के साथ जा कर नहीं रहती हैं तो इसी आधार पर आप के पति को आप से विवाह विच्छेद करने के लिए आवेदन प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। इस कारण यदि आप इस मुकदमे में जा कर अपना प्रतिवाद प्रस्तुत नहीं करती हैं तब भी उस में आप को किसी तरह की कोई हानि नहीं होगी।

प यदि विवाह विच्छेद चाहती हैं तो आप उस के लिए तुरन्त पटना में विवाह विच्छेद की अर्जी प्रस्तुत कर दीजिए। इस अर्जी के संस्थित होने के उपरान्त आप धारा-9 के प्रकरण को पटना के न्यायालय में स्थानान्तरित करने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं।

बेहतर है आप न्यायालय में शिकायत दर्ज कराएँ!

husband wife
समस्या-
गुड़गाँव, हरियाणा से ममता ने पूछा है –

मेरा विवाह 14 जुलाई 2013 को संपन्न हुआ था। विवाह के दस दिन बाद ही मेरे पति और सास ने मुझे दहेज कम लाने के लिए कहना आरंभ कर दिया, मेरा पूरा वेतन उन्हें देने के लिए कहने लगे। मुझे खर्चों के लिए धन देने से मना कर दिया। इस के बाद पति ने गाली गलौच करना आरम्भ कर दिया। कुछ माह बाद मुझे पता लगा कि पति रोज शराब पीता है। शराब पीने के बाद मुझे गालियाँ देता है। कभी कभी मुझे पीटता भी है। इन तथ्यों की जानकारी मिलने पर मेरे पिता मुझे अपने घर ले जाने के लिए आए। उस समय भी ससुराल वालों ने गाली गलौच किया और बहुत नाटक किया। तब मेरे भाई ने 100 नंबर पर फोन किया। पुलिस ने आने के बाद परिस्थितियों पर नियंत्रण किया। पति के परिवार के साथ बहुत बहस के बाद भी वे मुझे अपने घर रखने को तैयार नहीं हुए तब मैं ने महिला शाखा में शिकायत की। वहाँ महिला थानेदार ने 3 सुनवाई तक मेरा पक्ष लिया लेकिन चौथी सुनवाई से ही वह यह कहने लगी कि आप पति पक्ष से 3 लाख रुपए तथा उपहार, फर्नीचर व अन्य दहेज का सामान ले लें। लेकिन मैं ने कहा कि हम विवाह में 9 लाख रुपया खर्च कर चुके हैं। जिस की पूरी विगत भी दे दी गई थी।  लेकिन वह 3 लाख से अधिक दिलाने को तैयार नहीं हुई और कहा कि आप को इतना पैसा लेने के लिए तो अदालत जाना होगा। मेरा परिवार पहले ही बहुत धन खर्च कर चुका है और पिताजी ने अपने रिटायरमेंट का सारा धन शादी में लगा दिया था। कृपया सुझाव दें कि मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

ति और सास के दुर्व्यवहार के कारण तथा दहेज की मांग को लेकर गाली गलौच करने व मारपीट करने का ज्ञान होने पर आप के पिता आप को अपने घर ले जाने को आए थे। जिस पर आप के ससुराल वालों ने नाटक किया और पुलिस बुलानी पड़ी। उस के बाद आप ने स्वयं किन परिस्थितियों में वापस अपनी ससुराल जाने का निर्णय किया यह बाद हमारी समझ से परे है। इतना कुछ हो जाने के बाद उन्हीं परिस्थितियों में पुनः लौटने का निर्णय तो एक तरह से पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। आप खुद नौकरी करती हैं और आत्मनिर्भर हैं। वैसी परिस्थिति में एक क्रूरतापूर्ण वैवाहिक जीवन का तो कोई अर्थ नहीं है। हाँ यदि परिस्थितियाँ सुधरने की कोई संभावना हो तो ऐसा सोचा जा सकता है।

विवाह के 10 दिन बाद दहेज कम लाने की शिकायत करना और दहेज की मांग को लेकर गाली गलौज व मारपीट करना तो धारा 498-ए भा.दं.संहिता के अन्तर्गत अपराध है और आप का स्त्री-धन न लौटाना धारा 406 भा.दं.संहिता में अपराध है। लेकिन आप ने इस की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई है या फिर पुलिस ने नहीं की है। पुलिस महिला सहायता केन्द्र ने आप की शिकायत को एक अपराध के रूप में दर्ज नहीं किया अपितु यह कोशिश की कि किसी तरह आप दोनों में समझौता हो जाए। उस के लिए भी शिकायत आप ने ही की थी।

ब आप के पति और सास आप को नहीं रखना चाहते हैं तो इस का सीधा अर्थ यही है कि उन की नीयत पहले से ही अच्छी नहीं थी। वे चाहते थे कि आप कमाती रहें, उन्हें देती रहें और घर में भी काम करती रहें। उन्हें लगा है कि उन की यह मंशा कभी पूरी नहीं होगी इस कारण से वे अब आप के साथ विवाह को जारी नहीं रखना चाहते हैं। आप के लिए भी वैसी परिस्थिति में उन के साथ विवाह को जारी रखना उचित नहीं है।

ब तक महिला थानेदार को लगा कि वह दोनों पक्षों में कोई समझौता करवा सकती है वह आप को उधर से मिला अधिकतम प्रस्ताव आप को बताती रही। लेकिन इस से अधिक संभव नहीं होने पर उस ने आप के सीधे यह कहा कि इस के लिए आप को न्यायालय जाना पड़ेगा। उस का सुझाव सही है। महिला सहायता केन्द्र इस से अधिक कुछ नहीं कर सकता। अब आप या तो संबंधित पुलिस थाने में उक्त दोनों अपराधों के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाएँ, या फिर न्यायालय में शिकायत करें। पुलिस आप को न्यायालय में शिकायत करने का सुझाव इस कारण दे रही है कि इस से आप को एक प्रोफेशन वकील की सहायता मिलेगी तो आप अपने मामले को ठीक से लड़ सकेंगी।

मारी राय में आप को न्यायालय में उक्त धाराओं के अन्तर्गत शिकायत प्रस्तुत कर देनी चाहिए। यह शिकायत न्यायालय द्वारा अन्वेषण हेतु पुलिस थाने को भेज दी जाएगी। तब आप के इस मामले में वकील की भूमिका समाप्त हो जाएगी। आ जाएगी और अन्वेषण के बाद उस पर पुलिस आप की सास व पति के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर देगी। तब आप को केवल अपने बयान देने के लिए ही न्यायालय में जाना पड़ेगा।

प चूंकि खुद कमाती हैं इस कारण भरण पोषण प्राप्त करने के लिए कोई आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप के विवाह को एक  वर्ष पूरा  होने तो आप विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत नहीं कर सकतीं। एक वर्ष हो जाने पर आप विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकती हैं। आप के स्त्री-धन का एक हिस्सा तो पुलिस उन से बरामद कर लेगी जो आप को न्यायालय से सुपूर्दगी पर वापस मिल जाएगा। बाकी राशि को आप जब विवाह विच्छेद का आवेदन करें तो स्थाई पुनर्भरण के रूप में मांग कर सकती हैं।

ह भी हो सकता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद आप का ससुराल पक्ष कुछ अधिक धन दे कर समझौता करने को तैयार हो जाए। तब बहुत सारी परेशानियों से बचने के लिए किसी ठीक ठाक समझौते पर पहुँचा जा सकता है।

मुस्लिम पत्नी की मृत्यु पर पति को संतान न होने पर उस की संपत्ति का आधा और संतान होने पर चौथाई हिस्सा उत्तराधिकार में प्राप्त होगा

muslim inheritanceसमस्या-

दिल्ली से मोहम्मद हबीब ने पूछा है –

मेरी पत्नी ने मुझ पर दहेज वापसी की मांग की और धारा 498-ए तथा 406 आईपीसी का मुकदमा चला दिया जो लंबित है। इस बीच मायके में रहते हुए पत्नी की मृत्यु हो गई। हमारी कोई सन्तान नहीं है। अब उस का भाई मुझ से दहेज वापस मांग रहा है, इस के लिए उस ने न्यायालय में आवेदन किया है। मुकदमा चलते 7 साल हो चुके हैं मेरी पत्नी की मृत्यु दो वर्ष पहले हो चुकी है। क्या मुझे दहेज वापस देना होगा?

समाधान-

मुकदमे में आप की पत्नी का बयान हो चुका था। बाकी गवाहों के भी हो चुके होंगे या फिर अब हो लेंगे। इस कारण मुकदमे में यदि यह सिद्ध होता है कि आप पर 498-ए व 406 भा.दं.संहिता के आरोप सिद्ध है तो आप को जो भी न्यायालय उचित समझेगा वह दंड भी देगा। यदि आरोप साबित नहीं होते हैं तो आप निर्दोष सिद्ध हो जाएंगे।

म तौर पर जो भी दहेज प्रथम सूचना रिपोर्ट में दर्ज कराया जाता है पुलिस उसे जब्त कर के अपनी अभिरक्षा में ले लेती है। उस के बाद न्यायालय अपने विवेक पर पत्नी के कब्जे में दे देती है। जब्त किया गया सामान किस के पास रहेगा यह वह मुकदमे के निर्णय के समय तय करती है। आप के मामले में आप की पत्नी ने रिपोर्ट में क्या दहेज लिखाया था और क्या पुलिस ने जब्त किया है यह स्पष्ट नहीं है। फिर भी जो कुछ जब्त किया था वह या तो आप की पत्नी को पहले ही दे दिया गया होगा, यदि नहीं दिया है तो उस के मामले में न्यायालय अपना निर्णय दे देगा।

स मामले में आप की पत्नी की मृत्यु हो चुकी है तो उस की मृत्यु के साथ ही दहेज जो कि  उस की संपत्ति थी वह भी मुस्लिम उत्तराधिकार की विधि के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों की हो चुकी है। संतान न होने के कारण उस की संपत्ति के आधे हिस्से के आप हकदार हैं। यदि आप की पत्नी के माता-पिता मौजूद हैं तो कुल संपत्ति का 1/3 उस की माता का और 1/6 उस के पिता का होगा। यदि माता-पिता नहीं होंगे तो उस की संपत्ति का आधा हिस्सा उस के भाई-बहनों को प्राप्त होगा।

प न्यायालय में भाई के आवेदन के उत्तर में यह आपत्ति प्रस्तुत कर सकते हैं कि पत्नी की संपत्ति के आधे के आप स्वामी हो चुके हैं शेष आधा हिस्सा उत्तराधिकार के अनुसार जिस के भी हिस्से में आए वह उस के उत्तराधिकारियों को दे दिया जाए, उस में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

बेटी को तुरन्त नर्क से निकालिए।

समस्या-

बहराइच, उत्तर प्रदेश से भुर्री ने पूछा है –

मैं ने अपनी पुत्री की शादी दो साल पूर्व की थी।  शादी में मैं ने अपने सामर्थ्य से बढ़ कर खर्च किया ताकि मेरी बेटी का जीवन खुशहाल रहे।  परन्तु शादी के तुरन्त बाद से ही मेरे बेटी के ससुराल वालों द्वारा उसे पैसों के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा।  मेरी बेटी के सास-ससुर आए दिन बेटी को प्रताड़ित करते हैं। मेरे दामाद तथा उसका भाई बेटी के साथ मारपीट भी करते हैं।  सामाजिक भय से मैं ने एक दो बार बात करने की कोशिश भी की किन्तु वे बार बार बेटी को बरबाद कर देने की धमकी देते हैं। वे अन्य परिवारी जनों से भी आए दिन बदतमीजी करते रहते हैं और कहते हैं कि तुम मेरा कुछ नहीं  कर सकते तथा पैसों की मांग करते रहते है।  कृपया कोई सुझाव दीजिए।

समाधान-

sexual-assault1दि आप ने अपनी समस्या में अपनी पुत्री के साथ ससुराल वालों के व्यवहार के बारे में जो कुछ लिखा है वह सब सच है तो फिर आप की बेटी का जीवन तो बरबाद हो ही चुका है।  आप की बेटी को उस के सास-ससुर प्रताड़ित करते हैं, पति व उस का भाई उस के साथ मारपीट करते हैं उस से पैसा मंगाने की बात करते हैं। इस से अधिक आप की बेटी का जीवन उस के ससुराल वाले क्या बिगाड़ेंगे? मुझे आश्चर्य है कि आप ने इन सब बातों को अब तक कैसे सहन किया? सारे अपराध आप की बेटी के ससुराल वालों ने किए हैं आप की बेटी और आप ने नहीं। सामाजिक भय उन्हें होना चाहिए आप को नहीं। आप को अपनी बेटी की तुरन्त मदद करनी चाहिए। यदि आप इतना होते हुए भी कुछ नहीं करते हैं तो निश्चित रूप से एक माता-पिता होने का हक भी खो देंगे। पैसों के लिए जो व्यवहार आप की बेटी के साथ उस के ससुराल वाले कर रहे हैं। यदि उन का चरित्र ऐसा ही है तो आप की बेटी जीवन में एक दिन भी प्रसन्न नहीं रह सकती।

प अपनी बेटी को ससुराल नाम के उस नर्क से निकाल कर ले आइये।  ऐसे ससुराल से तो अच्छा है कि वह जीवन भर अकेले जीवन गुजार दे। आप की बेटी के साथ जो अत्याचार हुए हैं वह सब क्रूरता है और धारा 498 ए भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध है। आप बेटी को उस की ससुराल से बाहर निकाल कर ससुराल के क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थाना में रिपोर्ट दर्ज कराइए। यदि पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस को अन्वेषण के लिए भिजवाइए। यदि वे विवाह के समय दिया गया दहेज और उसे सभी लोगों से मिले हुए उपहार चाहे वह ससुराल वालों और उन के संबंधियों व मित्रों से क्यों न मिले हों स्त्री-धन हैं। बेटी उन की मांग भी करे। स्त्री-धन न लौटाने पर धारा 406 भारतीय दंड संहिता का भी अपराध आप के ससुराल वालों ने किया है।

प बेटी को अपने यहाँ ले आएँ तब उस की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम में भी न्यायालय में परिवाद करवाएँ जिस में आप की बेटी  अपने लिए सुरक्षा और भरण पोषण के खर्चे की भी मांग करे। आप अभी इतना तो करें। बाद में जैसी परिस्थितियाँ बनें उस के अनुसार आगे कदम उठाएँ। उस समय पुनः आप तीसरा खंबा से सलाह कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध हो जाने के बाद ही सजा दी जा सकती है

समस्या-

मैं ने अपने पति और सास, ससुर के विरुद्ध दहेज, मारपीट, गाली गलौच का मुकदमा पेश किया हुआ है। केस करते ही पति गिरफ्तार हो गया। लेकिन सास और ससुर को गिरफ्तार नहीं किया गया। ससुर पुलिस में हैं शायद इस लिए वे लोग जमानत पर छूट गए। मुकदमा कर देने के बाद भी अभी तक उन के खिलाफ कोई वारंट भी नहीं निकला है और वे सभी खुले आम घूम रहे हैं। आखिर उन्हें सजा कब मिलेगी? उन के खिलाफ मेरे पास रिकार्डिंग भी है। जिस में उन सब ने हमें जान से मारने की धमकी भी दी हुई है। ये एफ.आई.आर. मैं ने दिसम्बर 2009 में करवाई थी। अभी तक इस का कोई अता-पता नहीं है। क्या ये मुकदमा रद्द हो गया है?  मुझे अब उन्हें कैसे भी सजा दिलवानी है। उन्हों ने मुझ पर गंदे गंदे आरोप लगाना शुरु कर दिया था जिस से मेरी बदनामी भी हुई। क्या मैं उन पर मानहानि का मुकदमा भी दायर कर सकती हूँ। उन्हें क्या क्या सजा मिल सकती है।

 -सिम्मी नेगी, मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प ने जो प्रथमं सूचना रिपोर्ट  (एफआईआर) की थी उस पर पुलिस ने कार्यवाही की है. उसी के कारण आप के पति की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल में रहना पड़ा। बाद में उन की जमानत हो गई। शायद आप के सास और ससुर को भी अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी है। इस कारण से उन्हें भी गिरफ्तार नहीं किया गया। अब आप को यह पता नहीं है कि आगे क्या हुआ।

जिस मामले में आप के पति को 2009/2010 में गिरफ्तार किया गया है उस मामले में यह नहीं हो सकता है कि पुलिस ने न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल न किया हो। निश्चित रूप से पुलिस ने न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया होगा और आप के पति व सास, ससुर के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा चल रहा होगा। आप चाहें तो उस पुलिस स्टेशन से जिस में आपने रिपोर्ट दर्ज कराई थी जानकारी कर सकती हैं।

प की शिकायत आप के विरुद्ध क्रूरता का व्यवहार करने, मारपीट करने, गाली-गलौच करने और स्त्रीधन वापस न करने के बारे में होगी। इस मामले में धारा 498-ए, 406, 323, और 504 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत मुकदमा दर्ज हुआ होगा और आप का स्त्री-धन बरामद करने के लिए आप के पति की गिरफ्तारी हुई होगी। बाद में उन्हें जमानत दे दी गई होगी। यह सब स्वाभाविक है। क्यों कि जब तक मुकदमे के दौरान सबूतों और गवाहियों से यह साबित नहीं हो जाता कि अभियुक्तों ने उक्त धारा के अंतर्गत जुर्म किया है यही माना जाएगा कि वे निरपराध हैं। इस कारण से किसी को भी बिना साबित हुए जेल में रखना उचित नहीं है। किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध हो जाने के बाद ही सजा दी जा सकती है।  मुकदमे के दौरान वे जमानत पर रहते हैं और न्यायालय द्वारा दंडित होने के उपरान्त य़दि वे अपील करना चाहते हैं और अपील के निर्णय तक सजा को निलम्बित रखने का आवेदन करते हैं तो न्यायालय मामले की गंभीरता के आधार पर सजा को निलंबित रख सकता है। अपील में भी सजा बरकरार रहने पर दोषियों को जेल में सजा काटने के लिए भेजा जाता है।

मारी न्याय व्यवस्था की सब से बड़ी कमी यह है कि उस के पास जरूरत की 20 प्रतिशत अदालतें भी नहीं हैं। अदालतों में मुकदमों का अम्बार लगा है। इस के लिए राज्य सरकारें और केन्द्र सरकारें दोषी हैं कि वे पर्याप्त मात्रा में अदालतें स्थापित नहीं करती हैं। इस कारण से मुकदमों के फैसले में कई कई वर्ष लग जाते हैं।आप का मुकदमा भी न्यायालय में सुनवाई आरंभ होने के इन्तजार में रुका होगा। जब भी उस में गवाही की स्थिति आती है आप को न्यायालय से समन प्राप्त होगा तब आप गवाही के लिए प्रस्तुत होंगी तभी आप अपने पास के सभी सबूत न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती हैं। आप चाहें तो उक्त मुकदमे का पता कर के उस में अपनी ओर से वकील नियुक्त कर सकती हैं जो आप की ओर से मुकदमे की देखभाल करे और आप की पैरवी करे। वैसे आप की ओर से सरकारी वकील पैरवी कर रहा होगा।

प की बदनामी करने के लिए आप अलग से मुकदमा दायर कर सकती हैं। इस के लिए आप को स्वयं न्यायालय में शिकायत दर्ज करानी होगी और उस मुकदमे की हर तारीख पर उपस्थित होना पड़ेगा। इस के लिए आप किसी वकील से संपर्क कर के उस के माध्यम से धारा 500 भा.दं.संहिता के अंतर्गत न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत कर सकती हैं।

मेरे राय में जितना कुछ हो गया है उस के उपरान्त आप का यह विवाह अब बचे रहने के लायक नहीं रह गया है। आप को चाहिए कि आप विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें और विवाह विच्छेद करवा कर अपने जीवन का नया आरंभ करने की बात पर विचार करना चाहिए।

विवाहिता की परेशानी समझने का प्रयत्न करें, और हल निकालें

पी.के. लहरी ने पूछा है –
मेरे साले की पत्नी अपने मायके गई हुई है और  आने से मना कर रही है। उसे लेने के लिए दो बार जा चुके हैं। एक बार पहले भी वह गई थी और बहुत समझाने पर आई थी। विवाह 19 अप्रेल 2010 को हुआ था। उन के मायके वाले कहते हैं कि लड़की वहाँ नहीं जाएगी। लड़का बहुत परेशान रहता है, बहुत रोता है। कहता है कहीं पति के सात पूरे रिश्ते वालों को दहेज प्रथा में ना फँसा दे। हमें क्या करना चाहिए?
 उत्तर –

लहरी जी,

मुझे लगता है यह मामला आपसी विश्वास-अविश्वास का है। साले की पत्नी को अपने पति पर और उस के परिवार पर विश्वास उत्पन्न नहीं हुआ है। वह खुद को पराए घर में समझ रही है। आप तो लड़के के बहनोई हैं। आप अपने साले की ससुराल जाइए, बिलकुल अकेले। हो सके तो दो एक  दिन के लिए वहाँ रहिए। यदि उन के परिवार में रहने की स्थिति न हो तो उस नगर में रहिए। साले की पत्नी की जो भी तकलीफ हो उसे समझने की कोशिश कीजिए। उस परिवार के साथ यह विश्वास पैदा कीजिए कि आप उन की समस्या को समझते हैं और उस का हल निकालेंगे। आप को समस्या का पता लग जाए तो उस का हल निकालने का प्रयत्न कीजिए। 
भी विवाह को एक  साल भी नहीं हुआ है। इतनी जल्दी पति-पत्नी में विश्वास पैदा होना आसान नहीं है। अक्सर होता यह है कि जैसे ही लड़की ससुराल पहुँचती है उसे उस के दायित्व बता दिए जाते हैं और सभी उस से उसी के अनुरूप अपेक्षा करते हैं, जिन्हें निभा पाने में वह स्वयं  को सक्षम नहीं पाती है। वह नए परिवार में आई है, उसे इस नए परिवार को समझने में समय लगता है। यदि ससुराल में एक भी व्यक्ति उस की बात को समझने और उसे अपना समझ कर समझाने वाला हो तो बात बन जाती है। यह काम आम तौर पर अच्छी सास कर सकती है। लड़की को लगे कि सास और उस की माँ में कोई अधिक अंतर नहीं है तो परेशानी हल हो सकती है। 
दि  आप के प्रयत्नों से बात बन जाए तो ठीक है, अन्यथा आप साले की पत्नी और मायके वालों से साफ बात करें कि विवाह के उपरांत तो लड़की को अपने पति के साथ ही रहना चाहिए और वह उन के साथ नहीं रहना चाहती है तो उस का कोई हल निकाला जाए। आपसी बातचीत से इस समस्या का हल निकालने का प्रयत्न करें। यदि इन सब प्रयत्नों का कोई हल नहीं निकलता है तो फिर आप अपने साले से हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 में दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत कराएँ जिस में सारे तथ्यों को बताते हुए अपनी आशंकाओं को भी अवश्य  अंकित कराएँ। 

पत्नी द्वारा दहेज प्रताड़न में मिथ्या शिकायत दर्ज कराने की आशंका है, मैं क्या करूँ?

 शिवेन्द्र सिंह पूछते हैं – – –
     मेरी पत्नी पिछले तीन महीने से अपने मायके भोपाल  में है।  मेरा उससे किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं है। दिन पहले उसने फोन  करके कहा की मै अब तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी और उसने मेरे से बात  करना बंद कर दिया है।  मेरा ३ साल का एक बच्चा है। मुझे डर है कि वह कहीं मुझे व मेरे परिवार को दहेज़-प्रताडन में पुलिस में झूठी शिकायत कर सकती है इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए मुझे क्या करना चाहिए।
  उत्तर – – –

शिवेन्द्र जी,

कोई तो बात है जिस के कारण आप की पत्नी ने ऐसा कदम उठाया है। अनेक बार होता यह है कि पत्नी एक अलग जीवन स्तर से आई होती है और पति का जीवन स्तर भिन्न होता है। सांस्कृतिक भिन्नताएँ भी होती हैं। पत्नी नए जीवन स्तर और सांस्कृतिक वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयत्न करती है। लेकिन यदि उस के मायके का जीवन स्तर अधिक भिन्न और अधिक स्वतंत्रता पूर्ण हुआ और सांस्कृतिक रुप से भिन्नता अधिक हुई तो पत्नी नए वातावरण में स्वयं को ढाल नहीं पाती है और घुटन महसूस करने लगती है। इस  घुटन को वह अपने पति और ससुराल वालों को बताती भी नहीं है जिस के कारण उन्हें इस की भनक तक भी नहीं लगती। इस बीच एक संतान भी हो जाती है। एक दिन वह अचानक इस तरह का निर्णय ले लेती है। मैं इस तरह के मामलों से पहले भी दो-चार हो चुका हूँ। इस तरह के मामलों में पत्नी किसी भी तरह का मुकदमा करने से भी कतराती है। इस कारण से आप को आशंकित होने की आवश्यकता नहीं है।
दि पत्नी आप से बात नहीं कर रही है तो बिना किसी उत्तेजना के मामले को समझने के लिए पत्नी के मायके जाइए और वहाँ उस के माता-पिता, भाई-भाभी और उस की बहन-बहनोई से बात करिए। आप को पता लग जाएगा कि मामला क्या है। एक संतान आप के है और यह रिश्ता बना रहे इस का प्रयत्न आप को करना होगा। इस के लिए आप को छोटा बनना पड़े तो बनिए। किसी रिश्ते को बचाने के लिए छोटा बनना भी बड़प्पन है। आप छोटा बन कर यह बड़प्पन दिखाइए। मुझे लगता है कि मामला समझ में आते ही समस्या को हल किया जा सकता है। 
हाँ तक 498-ए का मामला है तो आज कल पुलिस पहले सब जाँच करती है। पति-पत्नी  को बिठा कर बात करवा कर समझौता करवाने का प्रयत्न भी करती है। हालांकि पुलिस का रवैया वही पुलिस वाला होता है। उस के बाद ही इस तरह के मामले दर्ज किए जाते हैं। इस कारण से आप को घबराने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी आप अपने यहाँ के अथवा भोपाल के पुलिस परिवार सहायता केंद्र में अपना मामला प्रस्तुत कर सकते हैं। पुलिस मामला दर्ज किए बिना आपस में बात करवा कर उसे सुलझाने का प्रयत्न करेगी। हो सकता है वहीं मामला सही हो जाए। आप एक बार अपनी ससुराल हो कर आइए। अपनी पत्नी को अपने साथ उस की शर्तों पर रखने का प्रस्ताव रखिए। मेरा मानना है कि मामला हल हो जाएगा या फिर पता लगेगा कि मामला क

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