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अंतिम प्रसव में जुड़वाँ जन्म लेने से तीन संताने हो जाने के कारण माता पिता को किसी सुविधा से वंचित नहीं होना पड़ता।

समस्या-

दीपक के. बगौरिया ने श्रीमाधोपुर, सीकर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मैं अनुसूचित जाति से हूँ।  मेरे 4 साल का बेटा है और मेरी बीवी 4 माह की गर्भवती है जिसके गर्भ में जुड़वाँ बच्चे (twins) हैं। इस तरह मेरे 3 बच्चे हो जाएंगे। मैं राजनीति में भी सक्रिय हूँ तथा सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रहा हूँ।  3 बच्चे होने की वजह से मुझे कोई दिक्कत तो नही होगी न? कृपया मार्गदर्शन करें।


समाधान-

स मामले में आप को बिलकुल भी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को एक संतान है और एक संतान के होते हुए उसे या उस की पत्नी को कोई प्रसव होता है और उस से जुड़वाँ बच्चों का जन्म होता है जिस से उस के तीन संतानें हो जाती हैं तो उन्हें राजनीति में चुनाव लड़ने अथवा इसी कारण से सरकारी नौकरी से वंचित नहीं होना पड़ेगा।

आप के दिमाग में जो प्रश्न है वही प्रश्न उक्त कानून और नियम बनाने वाले विधायकों के मन भी रहा होगा। इस कारण उन्होंंने इस नियम को  इस तरह बनाया है कि इस तरह अंतिम प्रसव से यदि जुड़वाँ सन्तानें जन्म लेती हैं तो इस तरह के जन्म से हुई तीसरी संतान का कोई असर इस कानून पर नहीं होगा।

मतदाताओं को बहुत बहुत बधाइयाँ

देश के उन करोड़ों मतदाताओं को तीसरा खंबा की बहुत बहुत बधाइयाँ जिन्हों ने अपने अपने मत का प्रयोग कर देश को एक स्थिर और पाँच साल चलने वाली सरकार बनाने का निर्देश दिया है।  सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ भी कि नई बनने वाली सरकार जनता की समस्याओं के निराकरण पर पूरी तरह से ध्यान दे और उन्हें हल करने के लिए आवश्यक और प्रभावी कदम उठाए और देश की जनता को राहत पहुँचाए।

पिछली संघीय सरकार ने देश में न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाए थे।  लेकिन वे नाकाफी थे।  देश में 10 लाख की जनसंख्या पर 50 अदालतें स्थापित करने का जो लक्ष्य सरकार ने स्वतः ही निर्धारित किया हुआ है।  उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार शीघ्र कदम उठाए।  इस लक्ष्य की पूर्ति में देश की न्यायपालिका और राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।  तीसरा खंबा यह आशा कर सकता है कि वे भी इस मामले में अपने अपने दायित्वों को अवश्य ही निभाएँगे।

स अवसर पर मैं यह स्मरण कराना चाहता हूँ कि किसी भी न्यायपूर्ण समाज में व्यक्ति अभावों में जीने की क्षमता विकसित कर लेते हैं।  लेकिन अभाव न होते हुए भी अन्याय को सहन नहीं किया जा सकता।  समाज में न्याय की स्थापना अभावों से जूझने के लिए शक्ति प्रदान करता है।  इन तथ्यों पर ध्यान दे कर सरकारें न्याय व्यवस्था को शीघ्र पटरी पर लाने का काम करेंगी जिस से सस्ता और शीघ्र न्याय जनता को सुलभ हो सके।

न्याय में देरी : लोकसभा चुनाव में कोई मुद्दा ही नहीं

जब भी कोई मुवक्किल मुकदमा करने के लिए या कानूनी सलाह हासिल करने के लिए मेरे पास आता है तो वह यह प्रश्न जरूर करता है, कि उस को कब तक राहत मिल सकेगी?  लेकिन इस का जवाब मैं नहीं दे सकता। यदि मैं इस का कोई भी जवाब दे भी दूँ तो वह सिरे से ही मिथ्या होगा।  मैं किसी मुकदमे की उम्र का हिसाब नहीं लगा सकता और न यह कह सकता हूँ कि उस के मुकदमे का निर्णय पहली अदालत से कब हो जाएगा। ऐसे में मैं यह तो बिलकुल भी नहीं बता सकता कि उस व्यक्ति को कब राहत मिल सकेगी?

मैं रोज अदालत में किसी न किसी मुवक्किल को अपने वकील से इस बात के लिए उलझते देखता हूँ कि  मुकदमा पाँच साल गिरह मना चुका है, मुकदमे का अब तक फैसला क्यो नहीं हुआ है? जब कि मुकदमा करते समय वकील साहब ने कहा था कि दो साल में मुकदमा निपट जाएगा।  कई बार तो हाथापाई भी हो जाती है और दूसरे वकीलों को बीच बचाव भी करना पड़ जाता है।

सब को और खास तौर पर वकीलों को पता है कि मुकदमो की उम्र बढ़ने के क्या कारण हैं? वे जानते हैं कि एक एक अदालत में उस की शक्ति से चार से दस गुना तक मुकदमे हैं। उसे सब मुकदमों और न्यायार्थियों से समान व्यवहार करना पड़ता है। नतीजा यह है कि मुकदमों की सामान्य उम्र बहुत अधिक बढ़ गई है।  इस का एक नतीजा यह भी हुआ है कि अब महज न्याय पाने के लिए कोई मुकदमा नहीं करता, बल्कि तब करता है जब उस के लिए मुकदमा करना एक मजबूरी हो जाती है।  पाँच-दस हजार की रकम की वसूली के लिए तो मुकदमा करने के लिए कोई वकील तक तैयार नहीं होता। वह जानता है कि इस मुकदमे में उसे जितना श्रम करना पड़ेगा उस के मुकाबले उसे फीस नहीं मिलेगी।  इस स्थिति से न्यायार्थियों की संख्या भी घटी है।  जिस का प्रभाव यह भी है कि वकीलों को अब कम मुकदमे मिल रहे हैं।  मेरा अनुमान है कि आधे से अधिक मुकदमे तो अदालत तक पहुँचते ही नहीं हैं।

इस स्थिति से वकीलों के व्यवसाय पर भी विपरीत असर हुआ है।  लेकिन इस के बावजूद यह देखने में आता है कि इस समस्या से निपटने के लिए वकील खुद सजग नहीं हैं।  एक तरह से वे इस के विरुद्ध आवाज न उठा कर वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।  खुद विधि मंत्री संसद में स्वीकार कर चुके हैं कि देश में प्रति 10 लाख आबादी पर 50 न्यायालय होने चाहिए। जब कि वर्तमान में इन की संख्या मात्र 11-12 है। यह एक अत्यन्त दयनीय स्थिति है।  अदालतों की संख्या बढ़ाने की जिम्मेदारी सरकारों की है जो उस के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था कर सकती है।  लेकिन सरकारें इस ओर से उदासीन रही हैं।

सरकारों की उदासीनता का जो प्रमुख कारण है वह यह कि न्याय का विषय सरकार के चुने जाने पर कोई प्रभाव नहीं डालता।  कोई दबाव समूह नहीं है जो लोकसभा या विधान सभा चुनाव के समय राजनीति और वोटों को प्रभावित करता हो।  वर्तमान में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं।  एक चौथाई इलाकों में वोट डाले जा चुके हैं और कल तक देश का आधा मतदान संपन्न हो चुका होगा।  लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान एक बार भी यह मुद्दा नहीं उठा कि कोई उम्मीदवार या पार्टी देश में न्याय व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए अदालतों की संख्या में वृद्धि करेगी।  वास्तविकता तो यह है कि इस चुनाव में
जनता के हितों से सम्बन्धित मुद्दे सिरे से गायब हैं।  जब तब इस मुद्दे पर लिखते रहने और हल्ला करते रहने वाले पत्रकार और मीडिया भी चुनाव में चुप हैं।

मुझे लगता है कि आने वाली लोकसभा में भी यह विषय कभी चर्चा का विषय नहीं बनेगा और सरकार भी जनता की उदासीनता को देख कर इस मुद्दे पर चुप्पी ही साधे रहेगी।  जब तक वकील समुदाय खुद इस मुद्दे पर किसी संघर्ष में नहीं उतर आती है। तब तक दशा में कोई भी सुधार होने की संभावना तक नजर नहीं आती है।

चुनाव के बहाने – अपने ब्लॉग के सेल्फ प्रमोशन की कोशिश

आप ने पिछले चार आलेखों में निर्वाचन अपराधों के बारे में जाना। हो सकता है इन्हें पढ़कर आप में से अनेक ने यह सोचा हो कि आप को इस जानकारी से क्या लेना देना? आप थोड़े ही चुनाव  लड़ रहे हैं? इन की जानकारी तो उन्हें होनी चाहिए जो चुनाव लड़ रहें हैं या फिर उम्मीदवारों का प्रचार कर रहे हैं।  लेकिन उन लोगों को तो इस तरह की जानकारी पहले से होती है।  वे तो इन अपराधों को जानबूझ कर इस तरह करते हैं कि अपना मतलब भी हल कर लें और इन में फँसने से भी बचे रहें।

जब से चुनाव की दुंदुभी बजी है तभी से रोज अखबारों में खबरें आ रही हैं कि फलाँ नेता ने चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया।  सारे राजनैतिक दलों की फौजी टुकड़ियों में से एक इसी काम में लगी है कि किस तरह से विपक्षी द्वारा की जा रही चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की घटनाओं के सबूत इकट्ठे किए जाएँ?  फिर चुनाव आयोग को उस की शिकायत की जाए, और फिर उस का प्रचार में इस्तेमाल किया जाए।  यह भी खबर है कि मंदी के इस दौर में भी देश की नामी गिरामी जासूसी एजेंसियाँ इस काम से खूब कमाई कर रही हैं।  यह भी हो सकता है कि एक ऐजेंसी की ही विभिन्न टीमें एक ही क्षेत्र के विपक्षी उम्मीदवारों के लिए काम कर रही हों।  इधर से भी कमाई और उधर से भी कमाई। चलिये कुछ स्किल्ड लोगों को कुछ दिन के लिए रोजगार मिला।

लेकिन यह सब धंधा जो चल रहा है,  आप को रिझाने और नाराज करने के लिए किया जा रहा है। जैसे कोई लाइव कम्पीटीशन हो रहा हो।  आप के वोट से ही यह निर्णय होना हो कि अच्छे और सब से घटिया रिझाउना कौन है? इस काम में कौन सी पार्टी या उम्मीदवार खरा उतरा।  लेकिन इतना होने पर भी आप हैं कि चुपचाप तमाशा देखे जा रहें हैं।  जरा कानूनी जानकारी हासिल कर लीजिए।  जिस से आप जान सकें कि आचार संहिता का उल्लंघन कौन कर रहा है? और कितना कर रहा है?  क्यों कि अखबार और मीडिया वाले जितना अपने चैनलों पर दिखा रहे हैं वे सब वास्तविक उल्लंघन नहीं हैं।  यह भी कि जितनी शिकायतें की जा रही हैं उतनी दर्ज भी नहीं हो रही हैं क्यों कि कोई प्रथम दृष्टया प्रकरण ही नहीं बनता है।

आप ने तीसरा खंबा की पिछली चारों कडि़याँ (1)  (2)  (3)  (4)  पढ़कर जान लिया होगा कि क्या क्या ऐसे अपराध हैं जो लोग कर रहे हैं?  इसे इसलिए भी जानना जरूरी है कि कहीं आप भावुकता में आ कर किसी उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करते समय दस रुपए से अधिक खर्च नहीं कर दें,  वरना आप पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है  और सजा भी हो सकती है।  पर ज्यादा न घबराएँ ! इस की सजा  में जेल नहीं जाना पड़ेगा, जुरमाना भी पाँच सौ रुपए मात्र होगा।  यह भी हो सकता है कि बहुत से लोग हमारी विलम्बित न्याय व्यवस्था के कष्टों से बचने के लिए आरोप स्वीकार कर लें और पाँच सौ रुपया जुर्माना अदा कर जान छुड़ाएँ।  अभी तक यदि पिछली चारों कड़ियाँ न पढी़ हों, या कोई कड़ी छूट गई हो तो अब पढ़ लीजिए।  अभी तो चुनाव में बहुत समय है।  कुछ काम

निर्वाचन अपराधों केलिए दण्ड (4)

हम पिछली तीन कडि़यों में भा.दं.सं. की धारा 171ख, 171ग और 171घ में वर्णित तीन प्रकार के निर्वाचन अपराधों के बारे में जान चुके हैं कि क्या क्या कृत्य निर्वाचन अपराध हो सकते हैं। अब हम जानेंगे कि न्यायालय के समक्ष ये अपराध साबित हो जाने पर अभियुक्त को क्या क्या दंड दिए जा सकते हैं। 

धारा 171 ङ रिश्वत के लिए दंड
-जो कोई रिश्वत का अपराध करेगा, वह दोनो में से किसी एक प्रकार के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
परन्तु सत्कार के रुप में रिश्वत केवल जुर्माने से ही दण्डित  की जाएगी।
स्पष्टीकरण- “सत्कार” से रिश्वत का वह रूप अभिप्रेत है जो परितोषण खाद्य, पेय, मनोरंजन या रसद के रुप में है।

Section 171E. Punishment for bribery

    Whoever commits the offence of bribery shall be punished with imprisonment of either description for a term which may be extend to one year, or with fine, or with both:

    Provided that bribery by treating shall be punished with fine only.

    Explanation-“Treating” means that form of bribery where the gratification consists in food, drink, entertainment, or provision.



धारा 171च. निर्वाचनों में अनुचित प्रभाव डालने या प्रतिरूपण के लिए दण्ड-
जो कोई किसी निर्वाचन में अनुचित प्रभाव डालने या प्रतिरूपण का अपराध करेगा, वह दोनों में से किसी एक प्रकार के कारावास से जिस की अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुरमाने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

Section 171F. Punishment for undue influence or personation at an election

    Whoever commits the offence of undue influence of personation at an election shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one year or with fine, or with both.

धारा 171छ. निर्वाचन के संबंध में मिथ्या कथन-
जो कोई निर्वाचन के परिणाम पर प्रभाव डालने के आशय से किसी  अभ्यर्थी के वैयक्तिक शील या आचरण के सम्बन्ध में तथ्य का कथन तात्पर्यित होने वाला कोई ऐसा कथन करेगा या प्रकाशित करेगा, जो मिथ्या है, और जिस का मिथ्या होना वह जानता या विश्वास करता है  अथवा जिस के सत्य होने का वह विश्वास नहीं करता है वह जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

Section 171G. False statement in connection with an election

Whoever with intent to affect the result of an election makes or publishes any statement purporting to be a statement of fact which is false and which he either knows or believes to be false or does not believe to be true, in relation to the personal character or conduct of any candidate shall be punished with fine.

धारा 171ज. निर्वाचन के सिलसिले में अवैध संदाय-
जो कोई किसी अभयर्ती के साधारण या विशेष लिखित प्राधिकार के बिना ऐसे अभ्यर्थी का निर्वाचन अग्रसर करने या निर्वाचन करा देने के लिए कोई सार्वजनिक सभा करने में या किसी विज्ञापन, परिपत्र या प्रकाशन पर या किसी भी अन्य ढंग से व्यय करेगा या करना प्राधिकृत करेगा, वह जुर्माने से, जो पाँच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा।
 परन्तु यदि कोई व्यक्ति, जिस ने प्राधिकार के बिना कोई ऐसे व्यय किए हों, जो कुल मिला कर दस रुपए से अधिक के न हों, उस तारीख से जिस तारीख को ऐसे व्यय किये गए हों,  दस दिन के भीतर उस अभ्यर्थी का लिखित अनुमोदन अभिप्राप्त कर ले, तो यह समझा जाएगा कि उस ने ऐसे व्यय उस अभ्यर्थी के प्राधिकार से किए हैं।

Section 171H. Illegal payments in connection with an election
 
Whoever without the general or special authority in writing of a candidate incurs or authorizes expenses on account of the holding of any public meeting, or upon any advertisement, circular or publication, or in any other way whatsoever for the purpose of promoting or procuring the election of such candidate, shall be punished with fine which may extend to
five hundred rupees:

    Provided that if any person having incurred any such expenses not exceeding the amount of ten rupees without authority obtains within ten days from the date on which such expenses were incurred the approval in writing of the candidate, he shall be deemed to have incurred such expenses with the authority of the candidate.

धारा 171झ.निर्वाचन लेखा रखने मे असफलता-
जो कोई किसी तत्समय प्रवृत्त विधि दावारा या विधि का बल रखने वाले किसी नियम द्वारा इस के लिए अपेक्षित होते हुए कि वह निर्वाचन मे या निर्वाचन के सम्बन्ध में किए गए व्ययों का लेखा रखे, ऐसा लेखा रखने में असफल रहेगा, वह जुर्माने से, जो पाँच सौ रुपये तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा।

Section 171I. Failure to keep election accounts 

Whoever being required by any law for the time being in force or any rule having the force of law to keep accounts of expenses incurred at or in connection with an election fails to keep such accounts shall be punished with fine which may extend to five hundred rupees.

निर्वाचन अपराध क्या हैं? (3) निर्वाचनों में प्रतिरूपण

कल हमने भा.दं.सं. की धारा 171ग के अन्तर्गत निर्वाचनों में अनुचित प्रभाव डालने से संबंधित अपराध के बारे में जाना।  जिस में प्रत्यर्थी और मतदाता और उन से हितबद्ध किसी व्यक्ति नुकसान पहुँचाने की धमकी देने और उसे दैवीय कोप या आध्यात्मिक बदनामी का भाजन बनने का विश्वास दिलाने को अपराध बताया गया था।  आज हम भा.दं.सं. की धारा 171घ के बारे में जानेंगे।

भा.दं.सं. की धारा 171घ. निर्वाचनों में प्रतिरूपण-
जो कोई किसी निर्वाचन में किसी अन्य व्यक्ति के नाम से, चाहे वह जीवित हो या मृत, या किसी कल्पित नाम से, मत-पत्र के लिए आवेदन करता है या मत देता है, या ऐसे निर्वाचन में एक बार मत दे चुकने के पश्चात उसी निर्वाचन में अपने नाम से मत-पत्र आवेदन करता है,और कोई किसी व्यक्ति द्वारा किसी ऐसे प्रकार से मतदान को दुष्प्रेरित करता है, अर्जित करता है या अर्जित करने का प्रयत्न करता है वह निर्वाचन में प्रतिरूपण का अपराध करता है।



 परन्तु, एक व्यक्ति को जो एक मतदाता के लिए प्रतिनिधि के रूप में मतदान करने के लिए प्राधिकृत किया गया ह, तत्समय में प्रवृत्त होने के कारण किसी कानून के अधीन जहाँ तक कि वह एक प्रतिनिधि के रूप में ऐसे मतदाता के लिए मतदान करता है उस पर इस धारा का कुछ भी लागू न होगा।

अंग्रेजी पाठ

Section 171D. Personation at elections

    Whoever at an election applies for a voting paper or votes in the name of any other person, whether living or dead, or in a fictitious name, or who having voted once at such election applies at the same election for a voting paper in his own name, and whoever abets, procures or attempts to procure the voting by any person in any such way, commits the offence or personation at an election.

  Provided that nothing in this section shall apply to a person who has been authorised to vote as proxy for an elector under any law for the time being in force in so far as he votes as a proxy for such elector.

निर्वाचन अपराध क्या हैं? (2) निर्वाचनों मे अनुचित प्रभाव डालना

कल हमने भा.दं.सं. की धारा 171 ख के बारे में जाना था। जिस में किसी व्यक्ति को उस के अथवा किसी अन्य व्यक्ति के मताधिकार का प्रयोग करने के लिए या कर लेने के बाद ईनाम के बतौर रिश्वत देने को अपराध घोषित किया गया था। आगे आने वाली धारा 171 ग इस प्रकार है……

171ग. निर्वाचनों में अनुचित प्रभाव  डालना
(1) जो कोई किसी निर्वाचन अधिकार के निर्बाध प्रयोग में स्वेच्छया हस्तक्षेप करता है या हस्तक्षेप करने का प्रयत्न करता है, वह निर्वाचन में अनुचित प्रभाव डालने का अपराध करता है।

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो कोई-
(क) किसी अभ्यर्थी या मतदाता को, या किसी ऐसे व्यक्ति को जिस से अभ्यर्थी या मतदाता हितबद्ध है, किसी प्रकार की क्षति करने की धमकी देता है, अथवा
(ख) किसी अभ्यर्थी या मतदाता को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करता है या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करता है कि वह या कोई व्यक्ति, जिस से वह हितबद्ध है, दैवी अप्रसाद या आध्यात्मिक परिनिन्दा का भाजन हो जाएगा या, बना दिया जाएगा,
यह समझा जाएगा कि वह उपधारा (1) के अर्थ के अन्तर्गत ऐसे अभ्यर्थी या मतदाता के निर्वाचन अधिकार के निर्बाध प्रयोग में हस्तक्षेप करता है।

(3) लोक नीति की घोषणा या लोक कार्यवाही का वचन या किसी वैध अधिकार का प्रयोग मात्र, जो किसी निर्वाचन अधिकार मे हस्तक्षेप करे के आशय के बिना है, इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत हस्तक्षेप करना नहीं समझा जाएगा।

अंग्रेजी पाठ….

Section 171C. Undue influence at elections

 (1) Whoever voluntarily interferes or attempts to interfere with the free exercise of any electoral right commits the offence of undue influence at an election.

 (2) Without prejudice to the generality of the provisions of sub-section (1), whoever-

 (a) Threatens any candidate or voter, or any person in whom a candidate or voter is interested, with injury of any kind, or

 (b) Induces or attempts to induce a candidate or voter to believe that he or any person in whom he is interested will become or will be rendered an object of Divine displeasure or of spiritual censure,

 shall be deemed to interfere with the free exercise of the electoral right of such candidate or voter, within the meaning of sub-section (1).

(3) A declaration of public policy or a promise of public action or the mere exercise of a legal right without intent to interfere with an electoral right shall not be deemed to be interference within the meaning of this section.

जानिए निर्वाचन अपराध क्या हैं? (1)

 कल कानूनी सलाह के बक्से में किसी पाठक जतिन का एक पत्र मिला कि धारा-170 ख की जानकारी चाहिए।  इस पत्र में न तो संदर्भ था और न ही कानून का
उल्लेख तो मैं ने उन्हें पूछा कि आप को किस कानून की धारा्-170 ख की जानकारी चाहिए।  अभी तक जतिन का उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है।  लेकिन मुझे लगता है वे 171 के स्थान पर 170 लिख गए हैं।  भारतीय दंड संहिता की धारा-171 क से ले कर धारा-171झ तक निर्वाचन अपराधों के संबंध में है। ये सब धाराएँ मिल कर भारतीय दंड संहिता का अध्याय 9क गठित करती हैं।  लोकसभा निर्वाचन के काल में इस अध्याय के अपराधों के संबंध में जिज्ञासा होना स्वाभाविक है।  वैसे भी प्रत्येक नागरिक को इन अपराधों की जानकारी होना चाहिए।  हम आज से इन अपराधों के संबंध में बात करना प्रारंभ कर रहे हैं। 


धारा-171 क.”अभ्यर्थी”, “निर्वाचन अधिकार” परिभाषा– इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए-
(क) “अभ्यर्थी” से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी के रूप में नामनिर्दिष्ट किया गया है;
(ख) “निर्वाचन अधिकार” से किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी  के रूप में खड़े होने या खड़े न होने या अभ्यर्थना से अपना नाम वापस लेने या मत देने या मत से विरत रहने का किसी व्यक्ति का अधिकार अभिप्रेत है। 

171A. “Candidate”, “Electoral right” defined 

For the purposes of this Chapter- 

(a) “Candidate” means a person who has been nominated as a candidate at any election;

(b) “Electoral right” means the right of a person to stand, or not to stand as, or to withdraw from being, a candidate or to vote or refrain form voting at an election.

धारा-171 ख. रिश्वत- (1) जो कोई –
(।) किसी व्यक्ति को इस उद्देश्य से परितोषण देता है कि वह उस व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को किसी निर्वाचन अधिकार का प्रयोग करने के लिए उत्प्रेरित  करे या किसी व्यक्ति को इसलिए इनाम दे कि उसने ऐसे अधिकार का प्रयोग किया है; अथवा
(।।) स्वयं अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई परितोषण ऐसा किसी अधिकार को प्रयोग में लाने के लिए या किसी अन्य को ऐसे किसी अधिकार को प्रयोग में लाने के लिए उत्प्रेरित करने या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करने के लिए इनाम के रूप में प्रतिग्रहीत करता है।
वह रिश्वत का अपराध करता है;
परन्तु लोक नीति की घोषणा या लोक कार्यवाही का वचन इस धारा के अधीन अपराध न होगा।
(2) जो व्यक्ति परितोषण देने की प्रस्थापना करता है या देने को सहमत होता है या उपाप्त करने की प्रस्थापना या प्रयत्न करता है, यह समझा जाएगा कि वह परितोषण देता है।
(3) यो व्यक्ति परितोषण प्राप्त करता है या प्रतिग्रहीत करने को सहमत होता है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करने के लिए, जिसे करने का उस का आशय नहीं है, हेतु स्वरूप, या जो बात उसने नहीं की है उसे करने के लिए इनाम के रूप में परितोषण प्रतिग्रहीत करता है, यह समझा जाएगा कि उस ने परितोषण को इनाम के रूप में प्रतिग्रहीत कर लिया है।

Section 171B. Bribery 

(1) Whoever

(i) Gives a gratification to any person with the object of inducing him or any other person to exercise any electoral right or of rewarding any person for having exercised any such right; or

(ii) Accepts either for himself or for any other person any gratification as a reward for exercising any such right or for inducing or attempting to induce any other person to exercise any such right;

commits the offence of bribery:

Provided that a declaration of public policy or a promise of public action shall not be an offence under this section.

(2) A person who offers, or agrees to give, or offers or attempts to procure, a gratification shall be deemed to give a gratification.

(3) A person who obtains or agrees to accept or attempts to obtain a gratification shall be deemed to accept a gratification, and a person who accepts a gratification as a motive for doing what he does not intend to do, or as a reward for doing what he has not done, shall be deemed to have accepted the gratification as a reward.

 कानून की इन धाराओं की व्याख्या की आवश्यकता नहीं है।  फिर भी कोई बात समझ न आए अथवा कोई प्रश्न उत्पन्न हो तो बिना झिझक टिप्पणी में उसे लिखें। उस का उत्तर देने का प्रयत्न किया जाएगा।

भारतीय दंड संहिता के अध्याय 9क की सभी धाराओं को यहाँ प्रस्तुत किए जाने तक यह श्रंखला जारी रहेगी। 

अदालतों में सन्नाटा व्याप्त है, सकून है ,शांति है।

कल सोमवार था और वकीलों के न्यायिक कामकाज के बहिष्कार का समाचार अखबार में छप चुका था। इस लिए जब अदालत में रोज ही आने वाले लोगों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम नजर आयी तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। केवल वकील, मुंशी, टाइपिस्ट, दुकानदार, पुलिस वाले और अदालती स्टाफ के अलावा वहाँ इक्का-दुक्का व्यक्ति ही नजर आ रहे थे। हालत ऐसी थी जैसे ईद के अवकाश के दिन ईद न होने के कारण काम का दिन निकल आया हो।

लेकिन आज उस से भी बदतर स्थिति थी। कल जितने लोग अपने कामों के लिए नजर आ रहे थे उन से भी कम लोग अदालत में थे और दोपहर के समय जब आधे घंटे का अवकाश होता है तो चाय-पान के क्षेत्र में तलाशने पर ही मुवक्किल लगने जैसा कोई व्यक्ति दिखाई पड़ रहा था। यह एक आश्चर्यजनक बात थी। वकीलों के बीच चर्चा भी हुई। मैं ने जानबूझ कर इस चर्चा को अनेक लोगों तक चलाया। एक मत से जो कारण निकल कर आया वह आप सब से बांटना मैं ने जरूरी समझा।

मेरे एक साथी वकील फौजदारी के मशहूर वकील हैं और आज कल सब से अधिक फौजदारी मुकदमें उन्हीं की डायरी में दर्ज हैं। मैं ने उन से बात की तो सीधे सीधे शब्दों में उन्हों ने बताया कि दीवानी और दीगर मामलों में तो केवल गवाही आदि के लिए ही लोग आते हैं। बाकी पेशियों पर तो वकील ही सब काम संभाल लेता है। एक फौजदारी मामले ऐसे हैं जिन में अभियु्क्तों का आना जरूरी होता है। नहीं आने पर अदालत को वाजिब और विश्वसनीय कारण बताते हुए हाजरी मुआफ करने के लिए अदालत को दरख्वास्त देनी पड़ती है। वे सब लोग जो अपराधिक मामलों में अदालतों में आते हैं इन दिनों चुनाव में इस या उस प्रत्याशी के लिए प्रचार में व्यस्त हैं। आज ही लगभग सभी फौजदारी मुकदमों में उन्हें हाजरी मुआफी की दरख्वास्तें पेश करनी पड़ी हैं। फिर नज़दीक आ कर फुसफुसाया कि “सारे गुंडे मवाली चुनावों में व्यस्त हैं”

कुछ अन्य लोगों से बात करने पर एक तथ्य और सामने आया कि बहुत से लोग जेल से पेशी पर आए लोगों से मिलने और अभियुक्तों को देखने के लिए अदालत आते हैं। क्यों कि उन्हें अदालत परिसर में स्थित हवालात से अदालत तक लाने ले जाने के वक्त उन से बात करने का अवसर मिल जाता है। कभी कभी भारी अपराधी व्यक्ति फंस जाता है तो उस के तमाम समर्थक वहाँ उस का हौसला या ठसका बढ़ाने के लिए भी अदालत आते हैं। वे सब भी आज कल चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं।

मुझे यदि अदालत पहुँचने में 11 बजे से ऊपर का समय हो जाता है तो अक्सर मुझे अपनी कार खड़ी करने के लिए स्थान तलाशना पड़ता है। लेकिन दो दिनों से उस के लिए स्थान खाली मिल रहा है। इस से यह भी लगने लगा है कि वे रसूख वाले लोग जो अदालत में कारें ले कर आते हैं वे भी आज कल इसी लिए अदालत का रुख नहीं कर रहे हैं क्यों कि वे भी चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं।

अदालतें जैसी ही हालत इन दिनों कलेक्ट्री और उस के साथ अनिवार्य रूप से जुड़े दफ्तरों की है। वहाँ भी अदालतों जैसा ही माहौल है।  कुल मिला कर अदालतों में सन्नाटा व्याप्त है, सकून है, शांति है। अदालतें चल रही हैं, काम बिना किसी रुकावट के चल रहा है और तेजी से भी चल रहा है। और दिनों की अपेक्षा अधिक काम हो रहा है।

जनता के धन के अपव्यय के सवाल पर कोई ध्यान देता है?

कल जिला उपभोक्ता मंच में एक मुकदमे में अंतिम बहस थी। लगभग डेढ़ वर्ष से मंच में सदस्यों की नियु्क्ति न होने से काम नहीं हो रहा था। डेढ़ वर्ष तक मंच का खर्च बिना किसी उपयोगिता के चलता रहा, जज साहब और सारा स्टाफ खाली बैठा रहा। जनता का लाखों रुपया पानी में बह गया। यह राज्य सरकार का काम था लेकिन राज्य सरकार ने इसे त्वरित गति से क्यों नहीं किया? इस सवाल को राज्य सरकार से कौन पूछे? और पूछ भी ले तो राज्य सरकार इस का उत्तर क्यों दे? जिस राजनैतिक दल (भाजपा) की सरकार है वह राज्य में चुनाव लड़ रहा है। उस के किसी उम्मीदवार से पूछा जाए तो उस का जवाब यही होगा कि यह मुख्यमंत्री के स्तर का मामला था वे क्या कर सकते थे? फिर चुनाव में इस प्रश्न और इस तरह के अनेक प्रश्नों का क्या महत्व है?

ये नियुक्तियाँ क्यों नहीं हुईं? सब जानते हैं कि ये नियुक्तियाँ राजनैतिक आधार पर होती हैं। सत्ता दल के कार्यकर्ताओं को इन पदों पर स्थान मिलता है। चुनाव के वक्त बहुत से कार्यकर्ताओं को इन पदों का लालच दिया जाता है और वे दलों के लिए काम करते हैं। हालत यह है कि एक एक पद के लिए अनेक कार्यकर्ता जोर लगाते हैं। अब मुख्यमंत्री किसे खुश रखे और किसे नाराज करे? राजस्थान में सैंकड़ो पद इसी लिए खाली रहे और जनता का करोड़ों रुपया बरबाद किया गया।  चुनाव के ठीक दो-चार माह पहले इन पदों में से कुछ पर नियुक्तियाँ कर दी गई हैं। इस तरह जनता के धन के का अपव्यय करने वाली राज्य सरकार के मुख्यमंत्री को किसी भी चुनाव में भाग लेने के अयोग्य ठहराने संबंधी संशोधन संविधान में नहीं किया जा सकता है?

कल भी मंच में बहस नहीं सुनी गई। मामला हाउसिंग बोर्ड से संबंधित था। किसी को 1987 में मकान आवंटित हुआ। 1999 में जब उस मकान का सारा पैसा जमा कर दिया गया और 2004 में जब मकान की लीज डीड का पंजीयन कराने का अवसर आया तो बताया गया कि गलती से 1983 की दर से कीमत ले ली गई है जब कि कीमत आवंटन की तारीख से लेनी चाहिए थी। कीमत में 15000 रुपयों का फर्क आ गया लेकिन 1999 वर्षों का ब्याज जोड़ कर वह पचपन हजार हो गया। अब तक तो वह लाख से ऊपर जा चुका है। सवाल था कि क्या इस तरह से कीमत बढ़ा कर इतने दिनों के उपरांत धन ब्याज सहित वसूल किया जा सकता है।

जज साहब ने कहा हाउसिंग बोर्ड सारे हिसाब का चार्ट बना कर पेश करे। जो हिसाब पेश है वह उन की समझ में नहीं आ रहा है। इस के लिए एक माह की तारीख पड़ गई क्यों कि बीच में चुनाव है और हाउसिंग बोर्ड का स्टॉफ चुनाव की ड़्यूटी पर है।  मेरा मुवक्किल अदालत के बाहर आ कर फट पड़ा कि मुझे तारीख जल्दी लेने के मामले में अदालत से तकरार करनी चाहिए थी। मुझे उस मुवक्किल को समझाना पड़ा जिस में मेरा आधा घंटा खर्च हो गया। अब मुकदमे की बहस एक माह बाद होगी। तब तक नई सरकार चुनी जा चुकी होगी।  मुझे पता है कि वह खुद वर्तमान मुख्यमंत्री के दल का समर्थक है और संभवतः इस चुनाव में भी वह उसी दल को मत देगा। क्यों कि उस के उसी दल में संपर्क हैं और उसे यह विश्वास है कि उस के किसी भी बुरे वक्त में उसी दल के लोग काम आ सकते हैं। चाहे वे बुरा वक्त आने पर वे सब मुहँ ही क्यों न फेर लें।

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