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वीडियोग्राफ महत्वपूर्ण साक्ष्य

rp_rapevictim.jpgसमस्या-

किशन ने सिरसा, हरियाणा से पूछा है-

क्या एक वीडियोग्राफ किसी रिश्वत के मुकदमे में एक अधिकारिक रिकॉर्ड है?

समाधान-

क वीडियोग्राफ एक इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड है और इसे एक सबूत के रूप में साक्ष्य अधिनियम द्वारा मान्यता दी गयी है। इस कारण न केवल रिश्वत के मुकदमे में अपितु सभी अपराधिक मामलों में और दीवानी मामलों में भी कोई वीडियोग्राफ तथा अन्य कोई भी इलेक्ट्रानिक रिकार्ड एक दस्तावेज के रूप में ग्रहण किए जाने वाला दस्तावेजी सबूत है।

लेकिन आप को यह भी जान लेना चाहिए कि कोई भी रिकार्ड केवल मात्र एक सबूत है। उसे पहले साबित करना पड़ेगा कि किस इन्स्ट्रूमेंट द्वारा किस तरह और किस ने उसे रिकार्ड किया है, उस का समय क्या है आदि आदि। यह सब साबित करने के लिए विभिन्न साक्षियों के बयान भी कराने होंगे। एक मात्र सबूत से कभी अपराध साबित नहीं होता है। अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है और इस के लिए सभी जरूरी साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है। 

इस लिए यह कहा जा सकता है कि वीडियोग्राफ एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है लेकिन किसी भी मामले को अकेले इस साक्ष्य से साबित नहीं किया जा सकता।

आवाज की रिकार्डिंग कैसे प्रमाणित की जाए?

electronic recordsसमस्या-

रामेश्वर ने भरतपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरी शादी 26.06.2011 को हुई थी व हमदोनों लगभग एक डेढ़ वर्ष तक साथ रहे थे।इन एक डेढ़ वर्षो में मेरी पत्नी नेमुझे बहुत ही परेशान कर दिया था। मुझसे झगड़ा करती, गालियाँ देती और मरनेमारने की धमकियाँ देती। मैंने झगडेका कारण जानने के लिए मेरी पत्नी कोमोबाइल में कॉल रिकॉर्डिंग कासॉफ्टवेयर डलवा कर दे दिया, कॉलरिकॉर्डिंग के बारे में मेरी पत्नी को मालूम नहीं था।जब मैं ने रिकॉर्डिंगसुनी तो में अचंभित रह गया।क्योंकि रिकॉर्डिंग में मेरी पत्नी व मेरी पत्नीके जीजा काएक दूसरे को पति पत्नी मानने कासंवाद था। इसी प्रकार औरभी बहुत सारी बातें हैं।तब मैं ने मेरी पत्नी से तलाक लेने के लिए कोर्ट मेंफाइल लगा दी।और सारे सबूत पेश किये जैसे कि – कॉल डिटेल, कॉल रिकॉर्डिंगकी क्लिप (सी डी बना कर)। मैं यह जानना चाहता हूँ कि यदिमेरी पत्नी कोर्ट में कॉल रिकॉर्डिंग की क्लिप्स को झूठा बता कर कोर्ट कोगुमराह करती है तो मुझे उस की आवाज को सत्यापित करने के लिए क्या करना होगाया फिर कोर्ट की तरफ से क्या कार्रवाई की जाएगी, किस धारा के तहत जिससेसच्चाई सामने आ सके?

समाधान-

कॉल रिकॉर्डिंग को एक दस्तावेज जैसा सबूत माना जाता है और उस के माध्यम से किसी तथ्य को प्रमाणित किया जा सकता है। यह एक स्वाभाविक बात है कि जिस पक्ष के विरुद्ध आप किसी दस्तावेज को प्रस्तुत कर रहे हैं यदि वह उस के विरुद्ध जा रहा है तो वह उस दस्तावेज के असली होने से इन्कार कर सकता है। लेकिन न्यायालय में आरोपित व्यक्ति के मना कर देने से कोई तथ्य अप्रमाणित सिद्ध हो जाए तो फिर किसी भी मामले में निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता।

काल रिकार्डिंग का उपयोग भारतीय न्यायालयों में वर्षों से हो रहा है। इस संबंध में अत्यन्त स्पष्ट कानून है। राम सिंह व अन्य बनाम कर्नल रामसिंह (1986 AIR 3, 1985 SCR Supl. (2) 399) के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में मानदंड स्पष्ट किए हैं जो निम्न प्रकार हैं-

“We think that the High Court was quite right in holding that the tape records of speeches were “documents” , as defined by Section 3 of the Evidence Act, which stood on no different footing than photographs, and that they were admissible in evidence on satisfying the following conditions:

(a) The voice of the person alleged to be speaking must be duly identified by the maker of the record or by others who knew it.

(b) Accuracy of what was actually recorded had to be proved by the maker of the record and satisfactory evidence, DIRECT or circumstances, had to be there as to rule out possibilities of tampering with the record.

(c) The subject matter recorded had to be shown to be relevant according to rules of relevancy found in the evidence Act.” (Ephes ours)

Thus, so far as this Court is concerned the conditions for admissibility of a tape recorded statement may be stated as follows:

(1) The voice of the speaker must be duly identified by the maker of the record or by others who recognise his voice. In other words, it manifestly follows as a logical corollary that the first condition for the admissibility of such a statement is to identify the voice of the speaker. Where the voice has been denied by the maker it will require very strick proof to determine whether or not it was really the voice of the speaker.

(2) The accuracy of the tape recorded statement has to be proved by the maker of the record by satisfactory evidence – direct or circumstantial. .

(3) Every possibility of tampering with or erasure of a part of a tape recorded statement must be ruled out otherwise it may render the said statement out of con text and, therefore, inadmissible.

(4) The statement must be relevant according to the rules of Evidence Act.

(5) The recorded cassette must be carefully sealed and kept in safe or official custody.

(6) The voice of the speaker should be clearly audible and not lost or distorted by other sounds or disturbances.

स मामले में यह स्पष्ट किया गया है कि

1. जिस व्यक्ति की आवाज रिकार्ड की गयी है उसे रिकार्ड बनाने वाले द्वारा अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से पहचाना जाना चाहिए कि यह उसी व्यक्ति की आवाज है जिस की कथित की गई है।

2. इस बात की संभावना नहीं होनी चाहिए कि जो आवाज रेकार्ड की गई है उस में कोई गड़बड़ी उत्पन्न की गई है।

3. जो वार्तालाप रिकार्ड किया गया है वह मामले से सुसंगत है।

स तरह आवाज की रिकार्डिंग के मामले में सब से पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि जो आवाजें रिकार्ड की गई हैं वे उन्हीं व्यक्तियों की हैं जिन की बताई जा रही हैं। इस के लिए उन्हें संबंधित व्यक्तियों द्वारा न्यायालय के समक्ष पहचान किया जाना चाहिए कि उन्हों ने उन व्यक्तियों की आवाजें सुनी हैं और वे उन्हें पहचानते हैं और वे उन्हीं व्यक्तियों की हैं। विशेष रूप से जब कि जिस की आवाज बताई जा रही है वह खुद अपनी आवाज होने से मना करे तो बहुत ही स्पष्ट रूप से ऐसी साक्ष्य न्यायालय के समक्ष उपलब्ध होनी चाहिए और इस बात की संभावना समाप्त हो जानी चाहिए कि इस में कोई गड़बड़ी उत्पन्न की गई है।

प के मामले में रिकार्डिंग फोन में हुई है। वैसी स्थिति में वह फोन जिस में मूल रिकार्डिंग है न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह साबित किया जाना चाहिए कि उस का प्रयोग उस समय उसी व्यक्ति द्वारा किया गया था जिस के लिए बताया गया है। किसी अन्य दवारा उस के उपयोग की कोई संभावना नहीं थी। इस के अलावा आप का तथा कुछ अन्य व्यक्तियों के बयान न्यायालय के समक्ष कराने चाहिए कि वे उस आवाज को पहचानते हैं और वह आप की पत्नी और उस के जीजा की ही हैं।

दि आप निर्विवादित रूप से ऐसी साक्ष्य प्रस्तुत कर सके तो आप वह सब प्रमाणित कर सकेंगे जो करना चाहते हैं।

फोन रिकार्डिंग इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड है जिसे दस्तावेज की तरह, न्यायालय में प्रमाणित कराया जा सकता है।

electronic recordsसमस्या-
सादुल शहर, राजस्थान से हरिकृष्ण काँटीवाल ने पूछा है –

क्या फ़ोन रिकॉर्डिंग को न्यायालय में एक मजबूत साक्ष्य के तौर पर पेश किया जा सकता है? अगर हाँ, तो किस अधिनियम के अंतर्गत? कृपया इस विषय की विधि पर विस्तृत प्रकाश डालें।

समाधान-

किसी भी न्यायालय में सारी साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के अंतर्गत प्रस्तुत की जाती है। इस कारण से न्यायालय में प्रस्तुत की जाने वाली साक्ष्य के लिए आप को इस अधिनियम का अध्ययन करना चाहिए।

साक्ष्य अधिनियम में सूचना तकनीक अधिनियम 2008 के द्वारा कुछ संशोधन किए गए थे जो कि दिनांक 27.09.2009 से प्रभावी हो चुके हैं। इन संशोधनों के माध्यम से ‘इलेक्ट्रॉनिक सिगनेचर सर्टिफिकेट’, इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डस्, इन्फोर्मेशन, सीक्योर इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, सीक्योर इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर, व सबस्क्राइबर शब्दों की परिभाषा को जोडा गया है। इस में  से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डस् शब्द में टेलीफोन रिकॉर्डिंग सम्मिलित है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में धारा 65-ए तथा धारा 65-बी 2000 के अधिनियम से ही जोड़ी जा चुकी थीं जो कि दिनांक 17.10.2000 से प्रभावी हो गई थी। धारा 65-ए में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डस् को धारा 65-बी के अनुसार प्रमाणित किया जा सकता है। धारा 65-बी में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डस् को जिस में टेलीफोन रिकार्डिंग सम्मिलित है, एक दस्तावेज माना जाएगा तथा ऐसा रिकार्ड किसी भी कार्यवाही में स्वीकार्य होगा।

स तरह आप उक्त धाराओं के अन्तर्गत टेलीफोन रिकार्डिंग को एक दस्तावेज के रूप में किसी भी कार्यवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं, चाहे वह कार्यवाही किसी न्यायालय में हो या अन्यत्र। इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को दस्तावेजी साक्ष्य मानते हुए प्रमाणित किया जा सकता है।

इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार साबित की जा सकती है

समस्या-

क लड़की द्वारा मुझ पर अपहरण और बलात्कार का मुक़दमा किया गया।  प्रकरण का न्यायालय में विचारण चल रहा है।  वह लड़की मुझ से जैल में मिलने जाती थी और मेरे साथ मोबाइल पर बात भी करती थी जिसे मैंने रेकॉर्ड कर लिया है और उसकी सीडी बनवा ली।  अभी न्यायालय में लड़की के बयान में उस से जिरह चल रही है।  जिरह में उस ने कहा कि वह  जैल मे मुझ से मिलने नहीं जाती थी और मोबाइल पर बात भी नहीं करती थी।  मेरे वकील ने जज के सामने निवेदन किया कि जैल से मुझ से मिलने वालों का रिकार्ड मँगवाया जाए तो जज  ने कहा कि मुझे न्यायिक दृष्टान्त (रूलिंग) दीजिए की जिरह के दौरान ऐसे दस्तावेज मंगाए  जा सकते हैं।   मेरे वकील ने रूलिंग दी है लेकिन उस में केवल अंगूठे का निशान और हस्ताक्षर के बारे में उल्लेख है।  वॉयस रेकॉर्डिंग के बारे में उल्लेख नही है।  कृपया ये बताएँ कि साक्ष्य अधिनियम या किस अन्य अधिनियम के तहत वॉयस रिकॉर्डिंग को कोर्ट में रखा जा सकता है। यदि वह लड़की अपनी आवाज़ से मुकर जाती है तो उसका परीक्षण करने का क्या नियम है? कृपया विस्तार से बताएँ।  क्यों कि मेरे जज साहब को हर बात पर रूलिंग चाहिए।  मेरे वकील साहब को ये रूलिंग नहीं मिल रही है। कृपया मेरी मदद करें।

-अशोक तिवारी, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

प के प्रश्न से यह ठीक से पता नहीं लग रहा है कि वास्तव में आप की परेशानी क्या है और न्यायालय को किस कानूनी तथ्य के बारे में न्यायिक दृष्टान्त चाहिए।  हम आप के प्रश्न से केवल यह अनुमान लगा सके हैं कि क्या वॉयस रिकार्डिंग को एक साक्ष्य के बतौर ग्रहण किया जा सकता है या नहीं?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम आरंभ में 1872 में अधिनियमित किया गया था।  उस समय तक इलेक्ट्रोनिकी इतनी विकसित ही नहीं थी कि उस में इलेक्ट्रोनिक साधनों से उत्पन्न की हुए रिकार्ड को साक्ष्य के रूप में ग्रहण किए जाने के संबंध में उपधारणा की जाती।  लेकिन समय के साथ इस तरह के साधनों के माध्यम से उत्पन्न रिकार्ड को साक्ष्य के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता महसूस की गई और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में तदनुरूप अनेक संशोधन कर के नए उपबंध जोड़े गए हैं।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 क में यह उपबंध किया गया है कि इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार साबित की जा सकती है।

धिनियम की धारा 65ख में यह अधिनियमित किया गया है कि इलेक्ट्रोनिक अभिलेख में अन्तर्विष्ट कोई सूचना जो कागज पर मुद्रित है और कम्प्यूटर द्वारा उत्पादित प्रकाशकीय या चुम्बकीय माध्यम में भंडारित, अभिलिखित या नकल की गई है को दस्तावेज होना माना जाएगा तथा उसे साक्ष्य में ग्राह्य माना जाएगा। इस तरह के अभिलेख को साक्ष्य में प्रस्तुत करने के संबंध में कुछ शर्तें इस धारा में दी गई हैं। जिन की पालना किया जाना आवश्यक है।

स तरह आप के द्वारा अपने मोबाइल में रिकार्ड किया गया संदेश और उस से कंप्यूटर की सहायता से बनाई गई उस की प्रतिलिपि एक दस्तावेज है जो धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार न्यायालय के समक्ष साक्ष्य के रूप में ग्रहण की जा सकती है। इस सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा State (N.C.T. Of Delhi) vs Navjot Sandhu@ Afsan Guru के मामले में दिनांक 04.08.2005 को तथा Societe Des Products Nestle S.A. … vs Essar Industries And Ors के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 04.09.2006 को दिए गए निर्णय आप के काम के हो सकते हैं।  इन निर्णयों को आप उन के शीर्षकों पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं और प्रिंट कर के अपने काम में ले सकते हैं।

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