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धमकी दे कर धन संपत्ति की वसूली उद्दापन का अपराध है।

समस्या-

मन मोहन ने पूर्वी जोहरीपुर पूर्वी दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

पिछले दो महीने पूर्व मेरी रिश्ता पक्का हो गया था, पर इस रिश्ते से मेैं खुश नहीं था। मुझ पर रिश्ते के लिए कई माह से दबाव बनाया गया था। जिस में लड़की वालों की तरफ से बिचौलिए शामिल हैं। पर अब रिश्ते के लिए मेैंने किसी प्रकार लड़की के भाई से मना कर दी है,पर वो रिश्ता तोड़ने को तेयार नहीं हैं और शादी का दबाव बना रहा है। हमारे फ़ोटो लड़की के घर पर गोद भराई की रस्म में खींचे हुए हैं जिस से वे अब रिश्ता तोडने के लिए तीन लाख की मांग कर रहे हैं। जबकि मुश्किल से उनका ख़र्चा 20 से 30 हज़ार हुआ है, लेकिन लड़की का भाई कह रहा है शादी न होने के कारण पिताजी बीमार हो गए थे और डेढ़ लाख पिताजी की बीमारी में, और डेढ लाख प्रोग्राम मे लग गया,  इतनी रकम दो वर्ना हम आदमी इकट्ठा कर के तुम्हारे घर पर हंगामा करेंगे।

समाधान-

गाई या गोद भराई विवाह का अनुबंध हो सकता है विवाह नहीं। विवाह का अनुबंध तोड़ा जा सकता है। इस अनुबंध को तोड़ने वाले से दूसरा पक्ष खर्चा और हर्जाना मांग सकता है। पर मुझे नहीं लगता कि आप के मामले में खरचा और हरजाना इतना अधिक हो सकता है। आप दूसरे पक्ष को कह सकते हैं कि वे बहुत अधिक मांग रहे हैं जो आप को मंजूर नहीं है। वे चाहें तो खर्चे और हर्जाने के लिए अदालत में दावा कर सकते हैं।

उन्हों ने आप के घर पर हंगामा करने की धमकी दी है। यह धमकी है। इस तरह किसी को धमका कर उस से धन वसूल करना उद्दापन का अपराध है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 383 में दण्डनीय है। इस कारण इस धमकी की सूचना आप अपने इलाके के पुलिस थाने को दें और कहें कि वे इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करें। इस की सूचना लिखित में एस पी को भी दें। यदि आप को लगे कि पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही है तो आप धमकी देने वाले और उस के परिवार के वे लोग जो इस धमकी में शामिल हैं के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को जाँच के लिए भिजवाने हेतु निवेदन करें।

 

मुकदमा करने की धमकी दे कर धन एँठने के अपराध के लिए पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराएँ या न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करें।

Havel handcuffसमस्या-

लोकेश तुशावदा ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी ने उसके पहले पति के खिलाफ 498ए, 406 का मुक़दमा कर 75,000/- ले कर आपसी समहति से राजीनामा कर लिया। उसके बाद मेरे साथ नाता विवाह किया फिर मेरे ओर मेरे परिवार के खिलाफ 498ए, 406 का मुक़दमा कर मुझ से 75,000/- लेकर आपसी राज़ी नामा कर लिया। अभी वो लोग मुझसे 1,20,000 रुपयों की मांग कर रहे हैं, मेरे द्वारा पैसे नहीं देने पर उन्होने मेरे ओर मेरे परिवार के खिलाफ फिर से 498ए, 406 का मुक़दमा दर्ज करवा दिया है। मेरे पास निम्न दस्तावेज़ हैं-

1, पूर्व पति पर किए गया 498ए, 406 के मुक़दमे की प्रतिलिपि,

2, पूर्व पति से 75000/- लेकर आपसी छोड़ छुट्टी की प्रतिलिपि,

3, वर्तमान पति पर किए गये 498ए, 406 की प्रतिलिपि,

4, मुझसे 75000/- लेकर किए गये राज़ीनामे की प्रतिलिपि,

5, मेरे ससुर द्वारा 1,20,000/- की डिमांड की रेकॉर्डिंग ओर पैसे नहीं देने पर केस करने की धमकी,

6, फोन पर बात की कॉल डीटेल्स,

7, पैसे नहीं देने पर किया गया 125 आईपीसी का मुक़दमा, तथा

8, पैसे नहीं देने पर किया गया 498ए, 406 के मुक़दमे की प्रतिलिपि।

इन लोगों ने व्यापार बना रखा है, इस में मेरा ससुर, मेरी पत्नी, मेरा साला सभी शामिल हैं।

समाधान-

प के द्वारा बताए गए दस्तावेजों के आधार पर आप की पत्नी, ससुर और साले के विरुद्ध धारा 384,388,503 तथा 120 बी का अपराध बनता है। ये धाराएँ निम्न प्रकार हैं-

  1. उद्दापन–जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उस व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को कोई क्षति करने के भय में साशय डालता है, और तद््द्वारा इस प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को, कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज, जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके, किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, वह “उद्दापन” करता है।
  2. उद्दापन के लिए दंड–जो कोई उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
  3. आपराधिक अभित्रास–जो कोई किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, ख्याति या सम्पत्ति को या किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर या ख्याति को, जिससे कि वह व्यक्ति हितबद्ध हो कोई क्षति करने की धमकी उस अन्य व्यक्ति को इस आशय से देता है कि उसे संत्रास कारित किया जाए, या उससे ऐसी धमकी के निष्पादन का परिवर्जन करने के साधन स्वरूप कोई ऐसा कार्य कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो, या किसी ऐसे कार्य को करने का लोप कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह आपराधिक अभित्रास करता है।

120. आपराधिक ड़यंत्र का दंड–(1) जो कोई मॄत्यु, 2[आजीवन कारावास] या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास से दंडनीय अपराध करने के आपराधिक षड़यंत्र में शरीक होगा, यदि ऐसे षड़यंत्र के दंड के लिए इस संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं है, तो वह उसी प्रकार दंडित किया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था ।

(2) जो कोई पूर्वोक्त रूप से दंडनीय अपराध को करने के आपराधिक षड़यंत्र से भिन्न किसी आपराधिक षड़यंत्र में शरीक होगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से अधिक की नहीं होगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।]

प को चाहिए कि आप पत्नी, ससुर और साले के विरुद्ध उक्त धाराओं में संबंधित थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराएँ। पुलिस कार्यवाही न करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उस के अन्वेषण के लिए पुलिस को भिजवाएँ। यही दस्तावेज आप के विरुद्ध प्रस्तुत की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट में आप के पक्ष में अन्तिम प्रतिवेदन प्रस्तुत करने पुलिस की सहायता करेंगे। यदि पुलिस फिर भी आप के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो न्यायालय में आप के बचाव में मजबूत साक्ष्य बनेंगे।

यौन उत्पीड़न के अपराध में फँसाने की धमकी देकर उद्दापन का अपराध आजीवन कारावास तक से दंडनीय है।

Havel handcuffसमस्या –
दिल्ली से दीपक कुमार ने पूछा है-

मेरी मौसी और उस की पुत्री उत्तराधिकार वाली संपत्ति के मामले में मुझ पर यौन प्रताड़ना का मिथ्या आरोप लगा कर फँसाने की धमकियाँ देती हैं। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति को किसी प्रकार की क्षति पहुँचाने के भय में डाल कर कोई किसी व्यक्ति की संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई वस्तु देने के लिए बेईमानी से प्रेरित करता है तो वह उद्दापन (Extortion) का अपराध करता है। यदि यह भय आजीवन कारावास या मृत्युदंड से दंडनीय अपराध का मिथ्या आरोप लगाने का हो तो उद्दापन का यह अपराध भारतीय दंड संहिता की धारा 388 के अंतर्गत आजीवन कारावास या दस वर्ष तक के कारावास से दंडनीय है।

स तरह आप की मौसी और उस की लड़की आप को धमकी दे कर उक्त अपराध कर रही हैं। यह एक अजमानतीय तथा संज्ञेय अपराध है जिस में पुलिस बिना न्यायालय के वारण्ट के अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकती है तथा उन के विरुद्ध अपराधिक मुकदमा चलाने के लिए आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती है।

मस्या यह है कि मौसी और उस की लड़की ने आप को ऐसी धमकी दे कर अपराध किया है यह साबित कैसे किया जाए। इस के लिए यह आवश्यक है कि ऐसी कोई संपत्ति हो जिसे छोड़ देने के लिए आप की मौसी और उस की लड़की आप पर दबाव डाल रही हों। दूसरे उन्हों ने जो धमकी या धमकियाँ  आप को दी हैं उस का कोई दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य हो। ये साक्ष्य आप को जुटानी होंगी। आज कल ऑडियो वीडियो माध्यम मोबाइल फोन में उपलब्ध होते हैं। आप ऐसी धमकी को मोबाइल फोन में सुरक्षित कर सकते हैं और उस फोन की मूल रिकार्डिंग सुरक्षित रखते हुए उस की अन्य प्रतियाँ बना सकते हैं। ये सबूत के बतौर काम आ सकती हैं। ध्यान रहे फोन पर की गई मूल रिकार्डिंग आप को न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए सुरक्षित रखनी होगी। फोन ही न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। इस के अलावा ऐसी धमकी के आप कोई गवाह भी बना सकते हैं। जब ऐसा मौका हो कि वे दोनों आप को धमकी दे रहे हों कोई सुन रहा हो तो वह गवाह बन सकता है। ऐसा अवसर आप को देखना होगा। यदि आप ये सब कर सके और कुछ प्राथमिक साक्ष्य जुटा सकें तो शेष काम पुलिस का अन्वेषण अधिकारी कर लेगा।

प के बचाव का यही एक मात्र मार्ग हो सकता है कि आप के विरुद्ध ऐसा आरोप लगे उस के पहले आप स्वयं उन के द्वारा किए जा रहे इस अपराध की शिकायत पुलिस को प्रस्तुत कर उन के विरुद्ध कार्यवाही आरंभ कराएँ।

काम की रसीद और मोबाइल वापस न लौटाने पर पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराएँ।

समस्या-

कोरिया छत्तीसगढ़ से सत्या ने पूछा है-

मैंने गुप्ता मोबाइल केयर में नोकिया 6300 का हेंडसेट को रिपेयर कराने के लिए दिया था जिसमे सिर्फ नेटवर्क प्रॉब्लम और स्विच का प्रॉब्लम और डिस्प्ले का प्रॉब्लम था।  जिसका रिपेयर चार्ज 1000 रूपये लिया जा रहा है जो कि बाजार के अन्य दुकानों में (महज 100 से 200 रूपये तक, पूर्व में मैंने इस तरह का काम कराया था। जिसकी लागत महज 150 रु थी।) की अपेक्षा दुगुने से भी अधिक है, रसीद मांगने पर रसीद भी नहीं दी जा रही है और न ही मेरा मोबाइल फोन! मोबाइल न देने की धमकी दी जा रही है। इस घटना को हुए 3 महीने हो चुके हैं ,मुझे क्या करना चाहिए कृपया विस्तार से बताएं?

समाधान-mobile repair

हो सकता है कि जो खराबी दुरुस्त की है उस में इतना ही खर्च आया हो और केयर सेंटर वालों ने सही पैसा मांगा हो। लेकिन उन्हें रसीद देनी चाहिए। यदि यह केयर सेंटर कंपनी का है तो आप को कंपनी की वेबसाइट पर जा कर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। केयर सेंटर वालों को कहना चाहिए कि वे जो पैसा लेना चाहते हैं उस की रसीद दें। यदि वे फिर भी रसीद नहीं देते हैं तो आप पुलिस में रिपोर्ट लिखाएँ कि केयर सेंटर वाले रसीद नहीं दे रहे हैं और उन्हों ने आपका मोबाइल भी रख लिया है। इस तरह आप के साथ धोखाधड़ी की है। पुलिस वाले रिपोर्ट नहीं लिखते हैं तो उस की शिकायत आप एस.पी. को कर सकते हैं औरे पुलिस वेबसाइट पर जा कर एसपी का मेल पता तलाश कर उन्हें ई-मेल भी कर सकते हैं।

 यदि केयरसेंटर आप को रसीद व मोबाइल दे देता है तो आप नोकिया कंपनी को शिकायत कर सकते हैं कि आप से पैसे अधिक ले लिए हैं। यदि आप साबित कर सकते हैं कि केयर सेंटर ने आपसे अधिक पैसा लिया है तो आप जिला उपभोक्ता समस्या प्रतितोष मंच के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।

किसी तथ्य को स्वीकार करने के लिए फौजदारी मुकदमा करने की धमकी देना उद्दापन का अपराध है।

समस्या-

भिलाई, छत्तीसगढ़ से अनुतोष मजूमदार ने पूछा है-

मेरी समस्या के बारे में मैं आप से पहले सलाह ले चुका हूँ। आप की सलाह से मैं ने अपने वकील साहब को अवगत करा दिया है।  एक समस्या और आ गई है कि पिछले 9 वर्षों से एक मुस्लिम महिला के साथ निवास कर रहा था।  हमारी शादी कभी नहीं हुई। हमारे बीच विवाद होने पर दिनांक 17.10.2011 से हतम अलग रह रहे थे। अब उस ने मुझे पर एवं मेरे माता पिता पर धारा 498अ, 506, 294, 323, 34 भा.दं.संहिता तथा धारा 125 दं.प्र.संहिता के मुकदमे किए हैं।  धारा 125 का मुकदमा निर्णय की स्थिति में है और उस महिला का व्यवहार उग्र होता जा रहा है।  उस ने मुझे धमकी दी है कि अगर मैं ने उसे पत्नी नहीं स्वीकारा या न्यायालय द्वारा पत्नी साबित न होने की स्थिति में वह मुझ पर एवं मेरे पिता व भाई पर धारा 376 का मुकदमा दायर करवाएगी।  क्या ऐसा किया जा सकता है? ये लांछन तो सहन नहीं हो पाएगा। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान

Code of Criminal Procedureस तरह किसी महत्वपूर्ण तथ्य की संस्वीकृति प्राप्त करने के लिए फर्जी फौजदारी मुकदमा दायर करने की धमकी देना धारा 388  भा.दंड संहिता के अंतर्गत संज्ञेय अपराध है। धारा 388 भा.दं.संहिता निम्न प्रकार है-

388. मॄत्यु या आजीवन कारावास, आदि से दंडनीय अपराध का अभियोग लगाने की धमकी देकर उद्दापन–जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने के भय में डालकर कि उसने कोई ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है, जो मॄत्यु से या 1[आजीवन कारावास] से या ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय है, अथवा यह कि उसने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा अपराध करने के लिए उत्प्रेरित करने का प्रयत्न किया है, उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा, तथा यदि वह अपराध ऐसा हो जो इस संहिता की धारा 377 के अधीन दंडनीय है, तो वह 1[आजीवन कारावास] से दंडित किया जा सकेगा ।

प को तुरंत पुलिस को इस की सूचना दे कर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहिए। यदि पुलिस ऐसी सूचना दर्ज करने से इन्कार करे तो तुरंत इस मामले में मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर मामला दर्ज कराना चाहिए।

सा परिवाद धारा 156 (3) के अंतर्गत न्यायालय पुलिस को कार्यवाही के लेय़ भेज सकता है या फिर स्वयं जाँच कर के उस पर प्रसंज्ञान ले सकता है। इस कार्यवाही से धमकी देने वाले पर फौजदारी मुकदमा दर्ज हो जाएगा। वैसी स्थिति में वह कोई मुकदमा आप के या आप के पिता व भाई के विरुद्ध दर्ज भी करवाती है तो आप के पास उसे फर्जी कह कर रद्द करवाने का पूरा अवसर रहेगा और आप मिथ्या बदनामी से बचेंगे।

अवयस्क लड़की को बहका कर विवाह करने का शपथ पत्र लिखाना अपराध है, पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराएँ या न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत करें।

समस्या-

बिहार शरीफ, बिहार से गौतम शुक्ला पूछते हैं-

मेरी छोटी बहन अपने ही स्कूल के शिक्षक के प्यार के जाल में फंस कर 6 महीने पूर्व 24 मार्च 2012 को हिन्दू रीति रिवाज से बिना किसी को अवगत कराये शिक्षक के साथ नोटरी पब्लिक के मार्फत शादी कर ली।  छह महीने बाद दिनांक 24 दिसंबर को इस बारे में हमलोग और समाज को बताया गया | मेरी बहन की उम्र 25 फरवरी को 18 वर्ष की होगी मगर नोटरी पब्लिक के हलफनामा में शिक्षक की उम्र २५ वर्ष और मेरी बहन की उम्र १९ वर्ष अंकित है।  घटना की जानकारी के बाद हम परिवार वालों की समाज में काफी किरकिरी हुई।  हम लोगों को ये समझ में नहीं आ रहा हैं कि आखिर झूठी उम्र को अंकित करके मेरी बहन ने कैसे शादी कर ली?  मेरी बहन की 10वीं के सर्टिफिकेट की अनुसार जन्म तिथि 25.02.1995 है और नोटरी पब्लिक के हलफ़नामा में 19 वर्ष अंकित है।  शिक्षक दुसरे जाति का हैं और धूर्त किस्म का भी है, जो पहले भी दुसरी कमसिन लड़की को प्रभावित करने का प्रयास करते आया है।  हमलोग इस शादी के खिलाफ हैं और अपनी बहन को अच्छी तरह से समझा बुझा कर किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट कर दिए हैं ताकि वो शिक्षक मेरी बहन से संपर्क ना करे और आगे कोई अनहोनी ना हो।   मैं उस शिक्षक पर कोर्ट के माध्यम से क़ानूनी करवाई करना चाहता हूँ ताकि आगे भविष्य में मेरी बहन की शादी में नोटरी पब्लिक का हलफनामा बाधक ना बने।  मेरी बहन की सारी अकेडमिक सर्टिफिकेट उस शिक्षक के पास हैं।  जिन्हें वो लौटाने से इनकार कर रहा है।   मेरे पास सिर्फ मेरी बहन का 10वीं की मार्क्स शीट की इन्टरनेट कॉपी हैं जिसमें उसकी जन्म तिथि 25.02.1995 है।  घटना की जानकारी वाले दिन (दिनांक – 24.12.2012 को मेरी बहन उस लड़के के किराये के मकान पर गयी थी और उसी दिन हमलोगों को बुला कर नोटरी पब्लिक का हलफनामा दिखलाया गया और सामाजिक रीति-रिवाज से शादी करने के लिए एक पचास रुपये वालें नॉन-जुडिशियल स्टाम्प पेपर पर दिनांक 17.01.2013 की मुक़र्रर करके हमारे पिता जी और पांच गवाह के दस्तख़त करवाया गया।  उस समय हमलोग दस्तख़त करने को मजबूर थे,  क्योकि मेरी बहन अपने घर जाने से इनकार कर रही थी। | घर आकर हमलोग को काफी निराशा हो रही थी और अपने सहयोगियों से सलाह मशविरा करके अपनी बहन को समझा बुझा कर किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट कर दिए ताकि वो शिक्षक मेरी बहन से संपर्क न करें और आगे कोई गलत कदम ना उठा लें।  मेरी बहन ठीक ठाक से है और अपनी गलती के लिए शर्मिंदा भी हैं।  उसने वादा भी किया है शादी जैसे अहम फैसले अपनी माता – पिता की रजामंदी से ही करेंगी।  वकील साहब, कृपया करके आप हमें मार्गदर्शन करें और जरुरी क़ानूनी प्रक्रिया से अवगत कराएँ।  ताकि भविष्य में वो शिक्षक मेरी बहन की शादी में खलल ना दे सकें।

 समाधान-

भा.दं.संहिता

भारतीय दंड संहिता में किसी 18 वर्ष से कम आयु की नारी के साथ किए जाने वाले कुछ अपराध निम्न प्रकार हैं …

     361. विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण–जो कोई किसी अप्राप्तव्य को, यदि वह नर हो, तो [सोलह] वर्ष से कम आयु वाले को, या यदि वह नारी हो तो [अठारह] वर्ष से कम आयु वाली को या किसी विकॄतचित्त व्यक्ति को, ऐसे अप्राप्तवय या विकॄतचित्त व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षकता में से ऐसे संरक्षक की सम्मति के बिना ले जाता है या बहका ले जाता है, वह ऐसे अप्राप्तवय या ऐसे व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण–इस धारा में “विधिपूर्ण संरक्षक” शब्दों के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति आता है जिस पर ऐसे अप्राप्तवय या अन्य व्यक्ति की देखरेख या अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक न्यस्त किया गया है।

अपवाद–इस धारा का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति के कार्य पर नहीं है, जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह किसी अधर्मज शिशु का पिता है, या जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह ऐसे शिशु की विधिपूर्ण अभिरक्षा का हकदार है, जब तक कि ऐसा कार्य दुराचारिक या विधिविरुद्ध प्रयोजन के लिए न किया जाए।

362. अपहरण–जो कोई किसी व्यक्ति को किसी स्थान से जाने के लिए बल द्वारा विवश करता है, या किन्हीं प्रवंचनापूर्ण उपायों द्वारा उत्प्रेरित करता है, वह उस व्यक्ति का अपहरण करता है, यह कहा जाता है।

    363. व्यपहरण के लिए दण्ड–जो कोई [भारत] में से या विधिपूर्ण संरक्षकता में से किसी व्यक्ति का व्यपहरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

366. विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री को व्यपहृत करना, अपहृत करना या उत्प्रेरित करना–जो कोई किसी स्त्री का व्यपहरण या अपहरण उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए उस स्त्री को विवश करने के आशय से या वह विवश की जाएगी यह सम्भाव्य जानते हुए अथवा अयुक्त संभोग करने के लिए उस स्त्री को विवश या विलुब्ध करने के लिए या वह स्त्री अयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध की जाएगी यह संभाव्य जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ; [और जो कोई किसी स्त्री को किसी अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से यी वह विवश या विलुब्ध की जाएगी यह संभाव्य जानते हुए इस संहिता में यथा परिभाषित आपराधिक अभित्रास द्वारा अथवा प्राधिकार के दुरुपयोग या विवश करने के अन्य साधन द्वारा उस स्त्री को किसी स्थान से जाने को उत्प्रेरित करेगा, वह भी पूर्वोक्त प्रकार से दण्डित किया जाएगा।]

366क. अप्राप्तवय लड़की का उपापन–जो कोई अठारह वर्ष से कम आयु की अप्राप्तवय लड़की को अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिएविवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा विवश या विलुब्ध किया जाएगा यह सम्भाव्य जानते हुए ऐसी लड़की को किसी स्थान से जाने को या कोई कार्य करने को किसी भी साधन द्वारा उत्प्रेरित करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

प ने जो विवरण बताए हैं उन के अनुसार उक्त शिक्षक ने उक्त अपराधों में से एकाधिक किए हैं।  इस के अतिरिक्त आप की बहिन से विवाह का शपथ पत्र लिखवा कर आप के परिजनों पर दबाव डाल कर उन से स्टाम्प पर लिखवाना भी धारा 383 भा.दं.संहिता में उद्दापन का अपराध है।  आप को चाहिए कि आप तुरन्त पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाएँ और पुलिस पर कार्यवाही करने को दबाव डालें। यदि पुलिस थाना कार्यवाही करने से इन्कार या देरी करता है तो पुलिस अधीक्षक को शिकायत लिख कर दें। यदि फिर भी कार्यवाही नहीं होती है तो आप सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत करें और आग्रह करें कि इसे अन्वेषण हेतु धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस को भेजा जाए।  इस रिपोर्ट व परिवाद में यह भी बताएँ कि आप की बहिन के शैक्षणिक दस्तावेज उस शिक्षक ने अपने कब्जे में लिए हुए हैं। जिस से पुलिस उन्हें भी शिक्षक से बरामद कर सके। इस काम में आप स्थानीय वकील की मदद लेंगे तो उत्तम रहेगा।

डरा धमका कर कोई बिल वसूल नहीं किया जा सकता, आप पुलिस को शिकायत कर मुकदमा दर्ज कराएँ

समस्या-

लखनऊ, उत्तर प्रदेश से नागेश्वर ने पूछा है-

कुछ दिनों पहले मेरे चाचा जो कि लखनऊ में ही स्कूल टीचर हैं, ने मुझे टाटा फोटॉन का इंटरनेट कनेक्शन लेकर दिया था। जिसमें दो महीने तक का यूजर डाटा फ्री था। तथा कनेक्शन देने वाले ने बताया था कि दो महीने बाद इसमें नया प्लान एक्टिवेट करवाना होगा अन्यथा ये बंद हो जायेगा।  मेरे पास लखनऊ का कोई आवासीय पहचान पत्र न होने के कारण उसने मेरे चाचा के स्कूल के पैड पर उनकी फोटो, स्कूल की मोहर लगवाकर ले ली थी और तथा कनेक्शन चालू कर दिया था।  तकरीबन एक महीने बाद वो डिवाइस खराब हो गयी तो मैने कंपनी के टोल फ्री नम्बर पर कॉल करके डिवाइस के बारे में सूचना दे दी। तब दूसरी ओर से मुझे बताया गया कि आपकी डिवाइस बंद कर दी गयी है।  अब तकरीबन 4 महीने बाद कंपनी मेरे चाचा के पास 1499 रुपए का बिल भेजा तथा वसूली करने के लिए जो व्यक्ति आते है वे धमकाते है तथा बिल न जमा करने पर चाचा के ऊपर कानूनी कार्यवाही की धमकी देते है।  जब कि मैंने न तो कोई प्लान एक्टिवेट कराया था और दो महीने डाटा फ्री होने पर भी डिवाइस खराब हो जाने पर पूरा इस्तेमाल नहीं कर सका था।  क्या हमारे चाचा पर कोई कानूनी कार्यवाही बनती है तथा जब मैने कोई प्लान एक्टिवेट नहीं करवाया फिर भी मुझे बिल जमा करना पड़ेगा?

समाधान-

प की इस समस्या में कुछ तथ्य छूटे हुए प्रतीत होते हैं।  आप ने यह नहीं बताया कि आप ने जो कनेक्शन लिया था व प्री-पेड था या पोस्ट पेड। चूंकि कंपनी ने आप को बिल भेजा है इस कारण से ऐसा लगता है कि यह क्नेक्शन पोस्ट-पेड था। आप ने आरंभ में इस कनेक्शन के लिए क्या भुगतान किया था? यह भी नहीं बताया। दो माह का यूजर डाटा मुफ्त तभी हो सकता था जब कि आपने कम से किसी एक न्यूनतम अवधि के लिए कुछ भुगतान किया हो।  मुझे लगता है कि आप से उक्त योजना को समझने में कोई त्रुटि हुई है। आप को उक्त योजना को पूरी तरह समझना चाहिए था। आप ने अपने प्रश्न में यह भी नहीं बताया कि आप ने कौन सी योजना के तहत अपना कनेक्शन प्राप्त किया था?

कंपनी से आप को दो माह यूजर डाटा मुफ्त मिला भी था तो एक माह में योजना को डी-एक्टीवेट कर देने पर उस कि शिकायत करनी चाहिए थी और यह पूछना चाहिए था कि आप की योजना डीएक्टीवेट क्यों की गई है? कोई भी कंपनी लाभ के लिए व्यवसाय करती है। ऐसी योजना कभी बाजार में नहीं डालती जिस में बिना कुछ लिए दिए दो माह तक इंटरनेट कनेक्शन को मुफ्त उपयोग करने दे और बाद में उपभोक्ता की मर्जी पर छोड़ दे कि वह चाहे तो उस कनेक्शन को जारी रखे या न रखे। मुझे लगता है कि आप की योजना में ही एक्टीवेशन कराना था और उस पर ही आप को दो माह का यूजर डाटा मुफ्त प्राप्त होता। आप के द्वारा एक्टीवेशन नहीं कराए जाने के कारण उन्हों ने योजना को बंद कर दिया और आप के द्वारा उपयोग किए गए डाटा का बिल आप को भेज दिया गया। इस तरह आप को जो क बिल दिया गया है वह सही प्रतीत होता है।

फिर भी किसी बिल का भुगतान प्राप्त करने का तरीका यह नहीं हो सकता है कि किसी व्यक्ति को आप के पास भेजा जाए और वह धमकियाँ दे। अधिक से अधिक एक व्यवसाई बिल के भुगतान के लिए उपभोक्ता के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकता है। इस तरह बिल वसूल करने के लिए धमकाना अपराधिक है।

स मामले में हमारी सलाह है कि आप पहले पूरी योजना को ठीक से जाँच लें। यदि आप को दिया गया बिल सही प्रतीत होता है तो आप उस का भुगतान कर दें। आप ने डाटा उपयोग किया है तो उस का भुगतान आप को करना चाहिए। यदि आप को लगता है कि बिल गलत है तो आप अब की बार वसूल करने आने वाले को साफ कह दें कि आप का कोई बकाया नहीं है और कंपनी चाहे तो मुकदमा कर सकती है। यदि वह धमकाता है तो आप उस के विरुद्ध पुलिस थाने में शिकायत कर के मुकदमा दर्ज करवाएँ।

अस्पतालों और चिकित्सकों की लूट के विरुद्ध कानूनी उपाय

 बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से कमल शुक्ला ने पूछा है –

मेरे पिता की उम्र 81 वर्ष है। हाल में उनको ह्रदय की समस्या के कारण बिलासपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया तो उन्होंने पेसमेकर लगाने की सलाह देते हुए एक अन्य निजी चिकित्सालय कीम्स{kims } में जाने की सलाह दी।  कीम्स के प्रबंधन ने हमें पेसमेकर लगाने के लिए एक लाख पचास हजार का खर्च बताया, और यह राशि एडवांस में जमा करा ली गई। 03.06.2011 को मरीज को भर्ती करने के दूसरे दिन आपरेशन किया गया। आपरेशन करने के दौरान हमसे पचास हजार की और मांग की गई। मज़बूरी में हमें जमा करना पड़ा। इस बीच हमें बताया गया की पिता जी का वाल्व ब्लॉक होने के कारण पहले एंजियोप्लास्टी की गई है।  इसके दो दिन बाद हमें बताया गया की मरीज के उम्रदराज होने की वजह से आपरेशन सफल नहीं हुआ अतः एक लाख तीस हजार और जमा करना होगा जिसमें पेसमेकर लगाया जायेगा। हम लोगों को पता चला की इस अस्पताल में ह्रदय का यह पहला आपरेशन है।  हमने किसी अन्य अस्पताल जाना चाहा तो उन्होंने इसमें  पिता जी की जान को खतरा बताया। मेरे मना करने के बाद भी मेरे बड़े भाई ने पैसे जमा करा दिए। 11.06.2011 को पेसमेकर लगाया गया | इसके दो दिन बाद ही हालत ख़राब होने के और हमारे निवेदन के बाद भी उनकी छुट्टी कर दी गयी।  पता चला की इस अस्पताल के ह्रदय रोग विशेषज्ञ डॉ खडसे को बम्बई जाना था, इसलिए मेरे पिता और एक अन्य मरीज की जबरन छुट्टी कर दी गयी है। बिल भी मनमाने ढंग से बनाया गया है।  आईसीयू का चार्ज प्रति दिन 2500 के लावा बेड चार्ज 1250 ,नर्सिंग चार्ज 550, आक्सीजन चार्ज 1200 {जबकि केवल दस घंटे से ज्यादा नहीं लगाया गया }, मानिटर चार्ज 550, डाक्टर विजिट चार्ज 400 के हिसाब से एक-एक दिन का 4000 तक जोड़ा गया है। इन सबके अलावा आपरेशन चार्ज 65000 व 30000 रुपये जोड़ा गया है | निजी अस्पतालों के इस प्रकार लूट-खसोट के खिलाफ क्या कोई कानून नहीं है? हमें बताइए की अस्पताल की इस मनमानी के खिलाफ हम क्या कर सकते है?

 उत्तर –

कमल जी,

स तरह की लूट सरे आम लगभग सभी नगरों के बड़े अस्पतालों द्वारा की जा रही है। इस पर अंकुश के लिए कानून में उपाय हैं। लेकिन हमारी नौकरशाही जो कि इन अस्पतालों के संचालकों और चिकित्सकों के साथ खड़ी होती है, इन उपायों की धार को भोंथरा कर देती है। इन के विरुद्ध कार्रवाई (Action) की जा सकती है। करनी भी चाहिए। लेकिन वर्तमान में कार्रवाई की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को पूरी तरह कमर कस लेनी चाहिए कि वह अंतिम दम तक इस कार्रवाई में पीछे नहीं हटेगा। आधे मन से इस तरह की कार्रवाई चाहने वाला व्यक्ति बीच मार्ग से ही पीछे हट लेता है। इस से इन अस्पतालों के संचालकों और चिकित्सकों की हिम्मत और बढ़ जाती है और यह लूट बढ़ती जाती है। यदि आप पक्के मन से कार्रवाई चाहते हों तो ही इस मार्ग पर आगे बढ़ें। अन्यथा कार्यवाही न करें तो अच्छा है। 

प के साथ जो कुछ हुआ वह सब से पहले तो सीधे सीधे उद्दापन (Extortion)  है। उद्दापन को समझने के लिए आप को इस ब्लाग की पोस्ट  किसी भी प्रकार का भय दिखा कर रुपया वसूल करना उद्दापन, फिरौती (Extortion) का अपराध हैपढ़ लेन

किसी भी प्रकार का भय दिखा कर रुपया वसूल करना उद्दापन, फिरौती (Extortion) का अपराध है

 दीपक जी ने पूछा है –
शासन द्वारा लागू किये गये सूचना के अधिकार अधिनियम के अन्‍तर्गत कुछ छोटे मोटे साप्‍ताहिक पत्रकारों द्वारा कर्मचारियों से संबंधित जानकारी चाही जाती है, जैसे उसकी नियुक्ति कैसे की गई? वेतन कितना है? समाचार पत्र में विज्ञप्ति प्रकाशित हुई कि नहीं?  इस प्रकार की जानकारी चाह कर कर्मचारियों को परेशान किया जाता है, साथ ही उनसे दूरभाष अथवा किसी अन्‍य व्‍यक्ति के जरिये इस प्रकार का आवेदन कार्यालय से वापस लेने निरस्‍त करने हेतु रूपये 10000 तक मांगे जाते हैं। मेरे साथ भी कुछ इसी प्रकार की घटना हुई। चूंकि आज से 15 से 20 वर्ष पहले कलेक्‍टर दैनिक वेतन पर या निश्चित वेतन पर कर्मचारी को रखकर उसे नियमित कर दिया जाता था। जिसके संबंध में कोई विज्ञप्ति आदि प्रकाशित भी नहीं की जाती है। जैसा की वर्तमान में किया जाता है ये पत्रकार ऐसे कर्मचारियों को ब्‍लेकमेल कर रूपया वसूल करते हैं।  हाल ही में मेरी नियुक्ति के बारे में  जानकारी एक पत्रकार द्वारा चाही गई।  साथ ही उसे वि‍भिन्‍न पत्रों में मेरे नाम के साथ प्रकाशित भी करा दिया गया। मैं जानना चाहता हूँ कि ऐसे पत्रकारों पर क्‍या कार्यवाही और कैसे की जा सकती है क्‍योंकि जिस समाचार पत्र में मेरे संबंध में खबर छपी, उसने मेरी जानकारी कभी मांगी ही नहीं। मेरे द्वारा तंग आकर एक दो पत्रकारों का स्टिंग आपरेशन भी किया तथा आडियो एवं वीडियो क्लिप भी उपलब्‍ध है। जिसमें सूचना के अधिकार के अन्‍तर्गत अपील न करने के संबंध में रूपये 10000 की मांग की जा रही है। चूँकि मै पत्रकार का स्टिंग करना चाहता था अंत मैं ने अपने सेलेरी खाता से रूपये 5000 निकाल कर दे भी दिये। उक्‍त प्रकरण में मैं किस प्रकार की कार्यवाही कर सकता हूँ जिससे संबंधित को सजा हो सके। मैं और अन्‍य पाठक आपकी इस सलाह के लिए आपके आभारी रहेंगे।
 उत्तर –
दीपक जी,
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 383 में उद्दापन अर्थात् फिरौती को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

धारा 383. उद्दापन, फिरौती (Extortion)

जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उस व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को कोई क्षति करने के भय में साशय डालता है, और तद्वारा इस प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके, किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, वह ‘उद्दापन’ करता है।  

  • धारा 384 के अंतर्गत उद्दापन का यह अपराध तीन वर्ष तक के सश्रम या साधारण कारावास व जुर्माने से दंडनीय है। 
  • धारा 385 के अंतर्गत उद्दापन करने के उद्देश्य से कोई व्यक्ति किसी को भय में डालेगा या डालने का प्रयास करेगा तो उस का अपराध दो वर्ष के सश्रम या साधारण कारावास  या जुर्माने से दंडनीय है। 
  • धारा 386 के अंतर्गत मृत्यु या घोर उपहति के भय में डाल कर उद्दापन करने वाले का अपराध दस वर्ष तक के सश्रम या साधारण कारावास से दंडनीय है।
  • धारा 387 के अंतर्गत उद्दापन के उद्देश्य से मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालने का अपराध सात वर्ष तक के सश्रम या साधारण कारावास से दंडनीय है।
  • धारा 388 के अंतर्गत मृत्यु या आजीवन कारावास या दस वर्ष तक दंड से दंडनीय अपराध के अभियोजन की धमकी देकर उद्दापन करने का अपराध दस वर्ष तक के सश्रम या साधारण कारावास से दंडनीय है। यदि जिस अपराध के अभियोजन का भय दिखाया गया है वह धारा 377 के अधीन दंडनीय है तो वह आजीवन कारावास से दंडनीय होगा।  
  • धारा 389 के अंतर्गत धारा 388 के अंतर्गत वर्णित अपराध करने के लिए भय दिखलाने का प्रयत्न करने पर भी दंड धारा 388 के अनुरूप ही होगा। 

क्त अपराधों में से धारा 386 व 387 के अंतर्गत वर्णित अपराध अजमानतीय हैं। अर्थात उन में पुलिस किसी अभियुक्त को जमानत पर नहीं छोड़ सकती, केवल न्यायालय ही अभियुक्त को जमानत पर छोड़े जाने के लिए विचार कर सकता है। लेकिन अन्य अपराधों के मामले में पुलिस को अभियुक्त द्वारा जमानत प्रस्तुत करने पर उसे रिहा करना होगा क्यों कि अन्य सभी अपराध जमानतीय हैं।

परोक्त विवरण से स्पष्ट हो गया होगा कि आप को धमकी दे कर और आप का उद्दापन कर के कथित पत्रकारों ने  क्या अपराध किया है। ये सभी अपराध संज्ञेय अपराध हैं, जिस के कारण पुलिस को सूचना देने पर पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण कर सकती है और अपराध होना पाया जाने पर अभियुक्त के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती है। यदि पुलिस आप की सूचना पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है तो आप ये सूचना रजिस्टर्ड ए.डी. डाक के माध्यम से संबंधित पुलिस अधीक्षक को प्रेषित कर सकते हैं। उस पर भी कार्यवाही न होने पर आप सीधे न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

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