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क्या मुझे मृतक आश्रित के रूप में नौकरी मिल सकती है?

 गाजीपुर (उ.प्र.) से प्रशान्त वर्मा पूछते हैं –
मेरी माँ सरकारी जूनियर हाईस्कूल में प्रिन्सिपल के पद पर कार्यरत थी और वो 30.06.2012 को अवकाश प्राप्त होने वाली थी।  मेरी माँ पिछले करीब दो सालों से कैन्सर से पीड़ित थी। उनके इलाज़ में काफी पैसा खर्च हुआ।  माँ कैन्सर से पीड़ित थी और उनका इलाज करने के दौरान दिनांक 08.08.2011 को निधन हो गया।  मैं इंटर तक ही पढ़ सका।  क्या मुझे क्लर्क की नौकरी मिल सकती है।  नौकरी मिलने के बाद अगर मैं बी.ए. कर लेता हूँ तो क्या मुझे अध्यापक की नौकरी मिल सकती है।  मेरी उम्र इस समय 40 वर्ष है। मैं इस समय बेरोजगार हूँ और पूर्णतया माँ पर ही आश्रित था।  कृपया मुझे उचित सलाह दें। 
 उत्तर –
प्रशान्त जी,
भी राज्य सरकारों ने अपने कर्मचारी के सेवा में रहते हुए मृत्यु हो जाने पर उस के आश्रितों में से किसी एक को राज्य सेवा में नियोजन प्रदान करने के लिए नियम बनाए हुए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इस के लिए  U. P. Recruitment of Dependants of Government Servants (Dying-in-Harness) Rules, 1974 बनाए हैं, तथा इन में समय समय पर संशोधन भी हुए हैं। आप ने इन नियमों के अन्तर्गत आप की माता जी के नियुक्ति अधिकारी को आवेदन प्रस्तुत कर दिया होगा। यदि नहीं किया है तो तुरन्त आवेदन प्रस्तुत कर दें। इस काम में देरी करने से कोई लाभ नहीं है। 
जो विवरण आप ने अपने बारे में दिया है उस के अनुसार आप को उक्त नियमों के अंतर्गत नियुक्ति प्रदान करने में कोई बाधा प्रतीत नहीं होती है। लेकिन आप को आप की वर्तमान योग्यता के आधार पर नियुक्ति प्राप्त होगी। किसी किसी पद के लिए यदि प्रशिक्षण अनिवार्य है तो उस की छूट मिल सकती है। वर्तमान योग्यता के अनुसार आप को एक लिपिक के पद पर नियुक्ति प्राप्त हो सकती है। लेकिन आप का पद बाद में बदला नहीं जा सकता है। यदि आप शिक्षक के पद पर नियुक्ति चाहते हैं और प्राथमिक शाला के पद पर नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता यदि हायर सैकंडरी है तो आप को प्रशिक्षण से छूट प्राप्त हो सकती है। आप को यह प्रशिक्षण नौकरी प्राप्त होने के उपरान्त निर्धारित अवधि में पूर्ण करना होगा।  इस संबंध में आप को अपनी माता जी के नियोक्ता के कार्यालय से संपूर्ण जानकारी कर लेनी चाहिए।  इन नियमों में पद रिक्त होने पर ही नियुक्ति दी जा सकती है इस कारण से आप को जिस पद पर नियुक्ति मिलने की शीघ्र संभावना हो उस पर नियुक्ति प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

सब को दिखाई देता है, सिर्फ सरकार अन्धी है

च्चतम न्यायालय का कहना है कि यदि कोई अधिकार औद्योगिक विवाद अधिनियम तथा आनुषंगिक विधि से उत्पन्न हुआ है तो उस से संबंधित विवादों के हल के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम में प्रदत्त उपाय ही किए जाने चाहिए। इस का यह अर्थ हुआ कि औद्योगिक विवादों के लिए सिर्फ और सिर्फ औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत ही मामला ले जाया जा सकता है, उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार और सिविल न्यायालय के सामान्य दीवानी क्षेत्राधिकार के अंतर्गत इन मामलों को नहीं उठाया जा सकता। 
द्योगिक विवाद अधिनियम में उपाय यह है कि कोई भी औद्योगिक विवाद उत्पन्न होने पर उचित सरकार के श्रम विभाग में शिकायत प्रस्तुत की जाए। श्रम विभाग उस पर विपक्षी की टिप्पणी आमंत्रित करेगा। तत्पश्चात यदि श्रम विभाग को प्रतीत होता है कि मामला वास्तव में एक औद्योगिक विवाद है तो उस पर समझौता वार्ता आरंभ की जाएगी। यदि समझौता वार्ता में पक्षकारों में कोई समझौता संपन्न नहीं होता है तो फिर रिपोर्ट उचित सरकार को प्रेषित कर दी जाती है। उचित सरकार उस रिपोर्ट के आधार पर मामले पर विचार कर के श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण को संप्रेषित कर देता है। 
औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में अस्तित्व में आया था। तब औद्योगिक विवादों की संख्या कम थी और राज्य सरकार की मशीनरी सही रीति से काम करती थी। तीन से छह माह की अवधि में कोई भी ओद्योगिक विवाद न्यायालय में पहुँच जाता था। न्यायालय भी ऐसे मामलों में एक-दो वर्ष में निर्णय प्रदान कर देता था। धीरे-धीरे औद्योगिक विवाद बढ़ते गए। श्रम विभागों के पास भी दूसरे कामों का आधिक्य हो चला। ऐसे में औद्योगिक विवादों को हल करने की मशीनरी अपर्याप्त होती चली गई। अब यह स्थिति है कि एक औद्योगिक विवाद को शिकायत प्रस्तुत करने के उपरांत न्यायालय तक पहुँचने में एक वर्ष से ले कर तीन-चार वर्ष का समय तो व्यतीत हो ही जाता है।
धर औद्योगिक न्यायाधिकरणों और श्रम न्यायालयों की स्थिति यह है कि जिन क्षेत्रों में औद्योगिक विवाद अधिक हैं वहाँ के न्यायालयों में तीन-चार हजार विवाद हमेशा लंबित रहते हैं। अनेक विवाद ऐसे हैं जो पच्चीस तीस वर्ष की अवधि से उन में लंबित हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम में प्रावधान है कि धारा 33 सी (2) के मामले तथा सेवा समाप्ति से संबंधित मामलों में तीन माह में अधिनिर्णय पारित कर दिया जाना चाहिए। लेकिन कार्याधिक्य के कारण यह संभव नहीं है। धरातल की वास्तविकता यह है कि ऐसे मामलों में दो तारीखों के बीच का फासला ही तीन से छह माह तक का होता है। इस तरह कानून की पालना के लिए सरकार पर्याप्त मशीनरी उपलब्ध नहीं करा रही है।
दूसरी ओर स्थिति यह भी है कि अनेक औद्योगिक न्यायाधिकरण व श्रम न्यायालय केवल क्षेत्रीय आधार पर स्थापित किए गए हैं। लेकिन वहाँ तीन सौ से पाँच सौ तक ही मुकदमे लंबित हैं। एक न्यायालय में पदस्थापित न्यायाधीश का कथन था कि यदि वे अपनी पूरी क्षमता से काम करने लगें तो एक वर्ष में अदालत में मुकदमों की संख्या दस भी न रह जाएगी। अदालत की स्थापना का औचित्य समाप्त हो जाएगा। राजस्थान में इन दोनों तरह की अदालतों की संख्या लगभग बराबर सी है। श्रम विभाग के ही एक उच्च स्तरीय अधिकारी ने बातचीत को दौरान इस स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति को सुधारा जा सकता है इस तरह तीन सौ से पाँच सौ मुकदमे वाली दो अदालतों में से एक को दूसरी का काम भी करने को दिया जाए। अदालत 15-15
दिन दोनों स्थानों पर बैठ कर कार्य करे तो भी उसी गति से कार्य हो सकता है जिस से हो रहा है। इस तरह एक न्यायालय बिलकुल खाली हो लेगा। उसे उस स्थान पर स्थानान्तरित किया जा सकता है जहाँ के न्यायालय के पास तीन से चार हजार मुकदमे लंबित हैं। एक के स्थान पर दो अदालतें हो जाने पर मुकदमों के निपटारे की गति कम से कम आधी की जा सकती है। 
ह उपाय श्रम विभाग के उच्चाधिकारियों के ज्ञान में है। राज्य के सभी श्रम न्यायालयों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों के ज्ञान में भी है। लेकिन केवल राज्य सरकार ही इस से अनभिज्ञ है। राज्य सरकार को भिज्ञ बनाने के लिए श्रम संगठन लगातार ज्ञापन आदि भी प्रेषित कर रहे हैं। लेकिन लगता है ऐसे मामलों में सरकारें जानबूझ कर ही अनभिज्ञ बनी रहना चाहती हैं। यदि वे एक सुव्यवस्था स्थापित कर देंगी तो फिर जिन क्षेत्रों में अधिक विवाद हैं उन क्षेत्रों के उद्योगपतियों का हित साधन कैसे हो सकेगा? वे अपने कर्मचारियों को बरसों विवाद लंबित रहने का भय दिखा कर उन के साथ मनमानी कैसे कर सकेंगे?

नियमितिकरण के लिए आप को उच्च न्यायालय में याचिका करनी चाहिए

 प्रकाश महाले पूछते हैं – 
मैं एक दैनिक वेतन भोगी/मस्‍टररोल कर्मचारी हूँ, मेरी प्रथम नियुक्ति दिनांक वर्ष 1997 की है, मप्र शासन ने वर्ष 2000 में समस्‍त दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को सेवा से पृथक कर दिया था, लेकिन बाद में सुश्री उमा भारती के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद पुन: उन्‍हें सेवा में लेने का निर्णय लिया गया। इसके बाद वर्ष 2004-05 में समस्‍त विभागों द्वारा उन कर्मचारियों को पुन: काम पर रख लिया गया। लेकिन कुछ विभागों द्वारा ऐसा नहीं किया गया, मैं भी उन्‍हीं कर्मचारियों में शामिल हूँ। मेरे द्वारा लगातार पुन: सेवा में बहाली के आदेश का हवाला देते हुए नियोक्‍ता को लगातार आवेदन किये गये, 2006 में मुझे पुन: सेवा में ले लिया गया और अभी भी निरंतर सेवारत हूँ।
प्र शासन द्वारा 10 वर्ष की सेवा पूर्ण कर चुके कर्मचारियों को नियमित करने का निर्णय लिया गया है, इसके लिए वर्ष 2000 से 2004 तक के सेवा ब्रेक को शिथिल करने का निर्णय भी लिया गया है, चूंकि मेरी पुन:नियुक्ति 2006 में हुई है, तो क्‍या मेरे प्रकरण में नियमितीकरण की कार्यवाही संभव है, हालांकि मेरे द्वारा अब तक किसी प्रकार का वाद दायर नहीं किया गया है। मेरी पुन: बहाली में नियोक्‍ता के स्‍तर से ही विलम्‍ब हुआ है…. कृपया आवश्‍यक सुझाव देते हुए सहायता करें। 
 उत्तर – 
महाले जी,
प के मामले में राज्य सरकार द्वारा कर्मचारियों को नियमित करने के लिए 2000 से 2004 तक के सेवा ब्रेक को शिथिल करने के लिए जो निर्णय लिया गया है, उस का जो परिपत्र राज्य सरकार द्वारा जारी किया गया है वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उसे हम ने नहीं देखा है। उस में केवल 2000 से 2004 तक का सेवा ब्रेक शिथिल करने का ही निर्णय लिया गया है तो उस से आप को कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। लेकिन यदि उस में यह उल्लेख है कि 2004 के आदेश से जिन लोगों को पुनर्नियुक्ति दी गई है उन के सेवा ब्रेक के काल को सेवा में मानते हुए नियमितिकरण के लिए उन्हें निरंतर सेवा में माना जाएगा, तो आप उस का लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अन्यथा आप को न्यायालय की शरण लेना होगा। 
स के लिए आप को वर्ष 2004 में की गई आप की सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए यह विवाद उठाना पड़ेगा कि आप की सेवा समाप्ति अनुचित और अवैध थी जिसके कारण आप को निरंतरता के साथ पुनः सेवा में लिए जाने का अधिकार प्राप्त था। राज्य सरकार के आदेश के अनुसार आप को 2004 में ही सेवा में पुनः वापस ले लिया जाना चाहिए था। आप को सेवा में पुनः नहीं लिया गया यह आप के विभाग और राज्य सरकार की त्रुटि थी, आप की नहीं। इस कारण से आप की सेवा में न रहने की अवधि को भी सेवा में निरंतरता मानते हुए आप की प्रथम नियुक्ति से सेवा के वर्षों की गणना की जा कर दस वर्ष पूर्ण होने की तिथि से आप को नियमितिकरण का लाभ दिया जाए। 
प को इस के
लिए तुरंत एक नोटिस न्याय प्राप्ति के लिए राज्य सरकार आप के विभाग के प्रमुख और आप के नियुक्ति अधिकारी को वकील के माध्यम से तुरंत प्रेषित करना चाहिए। यदि आप का विभाग उद्योग की श्रेणी में आता है और आप श्रमिक की श्रेणी में तो आप इस संबंध में अपने विभाग की ट्रेड यूनियन के माध्यम से यह विवाद श्रम विभाग में उठा सकते हैं। वहाँ से असफल वार्ता प्रतिवेदन राज्य सरकार को भेजा जाएगा। राज्य सरकार यदि आप के विवाद को किसी श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण को न्याय निर्णयन के लिए संप्रेषित करती है तो वह न्यायालय आप के मामले में निर्णय दे सकता है। यदि आप ट्रेड यूनियन का सहयोग प्राप्त न कर सकते हों तो। यूनियन के समर्थन के अभाव में आप का विवाद एक औद्योगिक विवाद नहीं बन पाएगा। लेकिन वैसी अवस्था में आप अपना विवाद सीधे एक रिट याचिका द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष उठा सकते हैं, वहाँ आप अपनी ओर से यह तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि आप को किसी भी यूनियन का समर्थन प्राप्त न होने के कारण आप का विवाद औद्योगिक विवाद की श्रेणी में नहीं आता है और उच्चन्यायालय को इस मामले पर क्षेत्राधिकार प्राप्त है। मेरे विचार में आप के लिए दूसरा उपाय अधिक बेहतर होगा। आप को इस संबंध में नोटिस देने के लिए उच्च न्यायालय में सेवा संबंधी मामलों की प्रेक्टिस करने वाले वकील से संपर्क करना चाहिए जिस से बाद में रिट याचिका करने के लिए भी उन का ही सहयोग प्राप्त किया जा सके। 

प्रणव दा! सिंह साहब! और सोनिया जी! न्याय के लिए कुछ नहीं, मतलब अन्याय जारी रहेंगे ?

तीसरा खंबा में 26 जनवरी, 2009 की पोस्ट थी, न्याय रोटी से पहले की जरूरत है, ….
जीवन के लिए जितना हवा और पानी आवश्यक है उतना ही न्यायपूर्ण जीवन और समाज भी।  यदि परिवार में खाने को पूरा न हो तो भी परिवार आधे पेट भी प्रेम से जीवन बिता सकता है।  बस लोगों को विश्वास होना चाहिए कि जितनी रोटियाँ हैं, उन का बंटवारा न्यायपूर्ण हो रहा है।   यदि यह विश्वास टूट गया तो परिवार बिखऱ जाएगा।   परिवार के बिखरने का अंजाम सब जानते हैं।  गट्ठर को कोई नहीं तोड़ सकता लेकिन एक एक लकड़ी को हर कोई तोड़ सकता है।  इस लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था परिवार के एकजुट रहने की पहली शर्त है। इसीलिए न्याय रोटी से पहले की जरूरत है।  कम रोटी से काम चलाया जा सकता है, लेकिन न्याय के बिना नहीं।   लेकिन हमारी न्याय प्रणाली अपंग है।   वह हमारी जरूरत का चौथाई भी पूरा नहीं करती।  एक न्यायार्थी को उस के जीवन में न्याय मिलना असंभव होता जा रहा है।  यदि इस स्थिति से युद्ध स्तर पर नहीं निपटा गया तो।  समझ लीजिए कि परिवार खतरे में है।  गणतंत्र खतरे में है।
र्तमान में देश में लगभग16000 अदालतें हैं उन में भी 2000 से अधिक अदालतों में  जज नहीं हैं।  स्वयं संसद  में सरकार  द्वारा निर्धारित  क्षमता  के अनुसार प्रत्येक दस लाख जनसंख्या पर पचास अधीनस्थ न्यायालय  होने चाहिए। भारत की  वर्तमान आबादी लगभग एक  अरब बीस करोड़ के लगभग है, इस आबादी की न्याय की जरूरतों को पूरा करने को अदालतों की  संख्या 60 हजार होनी चाहिए। यही हमारी वास्तविक आवश्यकता है।  अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना का  काम राज्य सरकारों का है। लेकिन किसी  भी राज्य सरकार में इस बात पर चिंता और हलचल तक नहीं दिखाई पड़ती  है कि उन के यहाँ न्याय और न्यायालयों की क्या स्थिति है और  वे घोषित लक्ष्य की  प्राप्ति  के लिए क्या कदम  उठाने जा रहे हैं।
भारत का 2011-12 का संघीय बजट संसद में प्रस्तुत किया जा चुका है। देश और समाज में न्याय की स्थापना के लिए सरकार और संसद कितनी चिंतित है इस का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हों ने इस के लिए क्या प्रावधान अपने बजट में किए हैं। विभिन्न संघीय मंत्रालयों और विभागों का कुल खर्च  इस वर्ष 1216575.73 करोड़ रुपए था। जो आगामी वर्ष के लिए 1257728.83 करोड़ रुपयों का रखा गया है। इस तरह इन मंत्रालयों और विभागों के कुल खर्च में चालीस हजार करोड़ की वृद्धि की गई है। लेकिन वस्तुओं के महंगा हो जाने से  यह वृद्धि न केवल बराबर हो जाती है अपितु बजट में बढ़ाई गई इस राशि में पहले जितनी वस्तुएँ और सेवाएँ नहीं खरीदी जा सकेंगी। 
न्याय के लिए इस वर्ष के लिए 944 करोड़ का प्रावधान किया गया था, अब अगले वर्ष के लिए 1432 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस तरह करीब 488 करोड़ रुपयों की वृद्धि की गई है। इस वर्ष योजना खर्च में रुपए 280 करोड़ रुपए रखे गए थे जिन्हें अगले वर्ष के लिए बढ़ा कर 1000 करोड़ कर दिया गया है। इस में से अधिकांश धनराशि कंप्यूटराइजेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण न्यायालय स्थापित करने के लिए राज्यों की सहायता के लिए रखी गई है। लेकिन गै

क्या मुझे मेरे पिता जी के सेवा में रहते हुए दिवंगत होने के कारण अनुकंपा नियुक्ति मिल सकती है?

 कमलेश सोनी ने पूछा है-
मेरे पापा कलेक्टर कार्यालय में 1980 से नियमित कर्मचारी थे। सेवा में रहते हुए उन का दिनांक 11.02.2005 में देहान्त हो गया। लेकिन मेरी मम्मी 1999 से शिक्षाकर्मी-3 के पद पर कार्यरत है। मध्यप्रदेश शासन की अनुकंपा नियमों के अय़नुसार मैं अनुकंपा नियुक्ति के लिए अधिकार नहीं रखता। क्या मेरी मध्यप्रदेश में अनुकंपा नियुक्ति हो सकती है?
 उत्तर – 

कमलेश जी,

च्चतम न्यायालय का निर्णय है कि अनुकंपा नियुक्ति मृत कर्मचारी का अधिकार नहीं है। अपितु यह कर्मचारियों के परिवारों को दी गई एक सुविधा है। यदि किसी कर्मचारी की सेवा में रहते हुए मृत्यु हो जाती है, और उस का परिवार अचानक संकट में आ जाता है तो वैसी स्थिति में नियमों के अनुसार मृत राजकीय कर्मचारी के आश्रितों में से किसी एक को सरकारी सेवा में नियुक्ति दी जा सकती है। आप की माताजी पहले से ही सरकारी सेवा में हैं, वैसी स्थिति में आप का परिवार उस तरह के संकट में नहीं कहा जा सकता जैसा कि यदि परिवार में कोई भी व्यक्ति सरकारी सेवा में न हो तो संकट में होता। 
प्रत्येक राज्य सरकार के अनुकंपा नियुक्ति के नियम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, मध्यप्रदेश के राजकीय कर्मचारियों पर प्रभावी अनुकंपा नियुक्ति के नियमों की जानकारी हम नहीं कर सके हैं, लेकिन यह निश्चित है कि यदि परिवार में आश्रितों में से कोई एक पहले से सरकारी सेवा में है तो उस परिवार में मृत कर्मचारी के अन्य आश्रितों को इन नियमों के अंतर्गत नियुक्ति प्राप्त होना दुष्कर है। वैसे भी अनुकंपा नियुक्ति के मामले में मध्यप्रदेश में कोई अच्छी स्थिति नहीं है। अनेक मृत कर्मचारियों को आश्रितों को पिछले दस वर्ष से नौकरियाँ नहीं दी जा सकी हैं, जब कि वे नियमों के अंतर्गत नौकरी के लिए हकदार हैं। 
मुझे नहीं लगता कि आप को अनुकंपा नियुक्ति मिल सकती है। आप चाहें तो यहाँ क्लिक कर के अनुकंपा नियुक्ति के संबंध में उच्चतम न्यायालय का छत्तीसगढ़ सरकार बनाम धीरजो कुमार सेंगर के मुकदमें में दिया गया निर्णय पढ़ सकते हैं। इस मामले में आप को सेवा संबंधी मामलों को देखने वाले किसी उच्चन्यायालय के वकील से सलाह करनी चाहिए।

कानून की नजरों में सब समान क्यों नहीं हैं?

 अश्विनी कुमार ने पूछा है – – –
हा जाता है  कि कानून की नजर में हम सब समान हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता। एक बार हम बाइक से जा रहे थे, हम तीन सवारी थे, हमारा चालान कर दिया गया। उस के बाद एक और बाइक को रोका जिस पर तीन सवारी थीं, लेकिन उस का चालान नहीं कर के उसे छोड़ दिया गया। ऐसा क्यों होता है? कई बार ऐसे मामले भी देखने में आते हैं कि एक ही जुर्म साबित होने पर सजा किसी को कम तो किसी को अधिक होती है।  
 उत्तर – – – 
अश्विनी जी,
प ने बहुत दिलचस्प और उपयोगी प्रश्न पूछा है। कानून की नजर में सब को समान समझा जाना चाहिए। हम इस बात को यूँ भी कह सकते हैं कि कानून सब के लिए समान होना चाहिए, वह हो भी सकता है। लेकिन यह तभी संभव है, जब कि देश में कानून का शासन हो। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो समझिए देश में कानून का शासन नहीं है। यह कहा जाता है कि भारत में कानून का शासन है, भारत के संविधान में ऐसा ही विहित भी है। लेकिन व्यवहार में यह सही नहीं ठहरता है। तब हमें यह मानना चाहिए कि भारत में भी पूरी तरह कानून का शासन नहीं है। अपितु ऐसी ताकत का शासन है जो कानून को अपने मन मुताबिक बरतती है। हम सांसदों को चुन कर भेजते हैं उन से संसद बनती है। वहाँ जिसे बहुमत का समर्थन प्राप्त है उस की सरकार बन जाती है। प्राथमिक रूप से उस सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून के अनुसार शासन चलाए। लेकिन वह जहाँ चाहती है वहाँ कानून का उपयोग करती है। जहाँ नहीं चाहती है वहाँ आँख मूंद लेती है। उसी तरह की उस की पुलिस है, उस का प्रशासन है। वह जहाँ चाहती है वहाँ कानून का उपयोग करती है, जहाँ चाहती है वहाँ आँख मूंद लेती है।  
रकार की इस बात पर नजर रखने के लिए संविधान ने न्यायपालिका को सरकार से स्वतंत्र बनाया है। लेकिन न्याय पालिका की नब्ज सरकार के हाथ में है। न्यायपालिका को चलाने के लिए वित्तीय व्यवस्था करना सरकार का काम है। सरकार क्यों चाहेगी कि उस पर नकेल रखने वाली न्यायपालिका मजबूत हो? वह न्यायपालिका के लिए पर्याप्त राशन-पानी की व्यवस्था ही नहीं करती। नतीजे में न्यायपालिका का विकास अवरुद्ध हो जाता है। अब अविकसित न्यायपालिका सरकार का कुछ बिगाड़े भी तो कितना बिगाड़ लेगी? भारत में संसद द्वारा पारित संकल्प के अनुसार 10 लाख की आबादी पर पचास अधीनस्थ न्यायालय होने चाहिए। इस तरह भारत में लगभग 60000 अधीनस्थ न्यायालय होने चाहिए लेकिन हैं लगभग 15 हजार। उन में भी लगभग तीन हजार न्यायाधीशों की नियुक्ति में विलम्ब के कारण काम नहीं कर पाती हैं। लगभग 12  हजार अदालतें 60000 अदालतों का काम जिस तरह कर सकती हैं वैसे ही कर रही हैं। एक विद्युत ट्रांसफोर्मर चार हजार मकानों को बिजली सप्लाई कर सकता है लेकिन उसे बीस हजार मकानों को बिजली सप्लाई करनी पड़े तो ऐसे ही करेगा कि हर स्थान पर केवल चार-चार घंटे बिजली मिलती रहे। इस व्यवस्था में कुछ लोग जुगाड़ कर के इस से अधिक बिजली भी हासिल कर सकते हैं और कर लेते हैं। वही हालत न्याय की भी हो गई है। न्याय सीमित है। उस में भी कुछ लोग इस बात का जुगाड़ कर लेते हैं कि उन्हें तो न्य

क्या मुझे संतान के लिए दूसरा विवाह करना चाहिए ?

ज़िनी पूछते हैं —-
मस्कार, मैं एक मुस्लिम हूँ ऒर केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी हूँ।  मैं ने मेरी बीबी का हर सम्भव ईलाज कराया पर हमारे कोई औलाद नही हुई। रिश्तेदारो से बच्चा गोद लेना चाहा पर किसी ने नहीं दिया। मेरी उम्र ४४ साल है। क्या मै दूसरी शादी कर सकता हूँ। मेरी बीबी ने पहले तो रजामन्दी दे दी। लेकिन जब मैं ने किसी और से शादी के लिए बात की तो उस के बाद उस का व्यवहार कुछ परेशान करने वाला हो गया है। मुझे अब क्या करना चाहिये?  जिस से  मैं ने शादी के लिए बात की है उन्हें क्या जवाब दूँ। उसे मेरी पहली बीबी के बारे में पता है कि वो मेरे साथ ही रहती है और मै उस को तलाक नहीं देना चाहता। मुझे मेरे ऑफिस में किस प्रकार आवेदन करना चाहिए।
उत्तर – – –
ज़िनी भाई,
प मुस्लिम हैं और अपने व्यक्तिगत कानून के अनुसार दूसरा विवाह कर सकते हैं यदि आप उस की शर्तों की पालना कर सकते हों जिस में सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करना महत्वपूर्ण है। लेकिन व्यवहारिक रूप से यह सब संभव नहीं हो सकता। आप संतान के लिए दूसरा विवाह करना चाहते हैं लेकिन यह कतई आवश्यक नहीं है कि दूसरा विवाह करने पर भी संतान प्राप्ति हो ही जाए। आप की पहली पत्नी ने दूसरी शादी के लिए रजामंदी प्रकट कर दी। पर मुझे लगता है कि उन की यह रजामंदी इस विश्वास के साथ थी कि आप ऐसा नहीं करेंगे। लेकिन जब उन्हें लगा कि आप वास्तव में ऐसा करने जा रहे हैं तो उन का व्यवहार बदल गया है। वास्तव में पहले दी गई रजामंदी का कोई महत्व इस लिए नहीं है कि वह रजामंदी एक गलत विश्वास के अंतर्गत आप को दी गई थी। 
प केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी हैं तो पहले यह जानकारी कर लें कि वहाँ किसी भी कर्मचारी को दूसरे विवाह पर क्या क्या प्रतिबंध हैं। क्यों कि यदि दूसरे विवाह पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध है तो फिर दूसरा विवाह किया जाना सेवा नियमों का उल्लंघन और दुराचरण होगा। जिस के लिए आप को आरोप पत्र दिया जा सकता है और सेवाच्युति का दंड दिया जा सकता है। राजस्थान में पुलिस विभाग के एक कर्मचारी को दूसरा विवाह कर लेने पर आरोप पत्र दे कर सेवाच्युति का दंड दिया गया था और इस मामलें में सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी 2010 में निर्णय दिया है कि ऐसी सेवाच्युति उचित है। यह सही है कि शरीयत दूसरे विवाह के लिए अनुमति देती है लेकिन जब आप एक नौकरी करते हैं जिस की एक शर्त यह हो कि आप एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकते तो सेवा नियमो के तहत यह दूसरी शादी वैध होते हुए भी एक दुराचरण होगी। इस से शादी तो अवैध नहीं होगी लेकिन नियोजक आप को सेवा से पृथक कर सकता है। इस संबंध में आप अपने नियुक्ति अधिकारी को सारी परिस्थियों से अवगत करवाते हुए दूसरे विवाह की अनुमति के लिए आवेदन कर दें। यदि अनुमति मिल जाए तो फिर यह दूसरा विवाह दुराचरण नही होगा। तब आप विवाह कर सकते हैं। अन्यथा स्थिति में आप को दूसरा विवाह करने के लिए वर्तमान पत्नी को तलाक देना होगा। इस संबंध में आप तीसरा खंबा की पोस्ट क्या कोई मुस्लिम सरकारी कर्मचारी पहली बीवी के रहते दूसरी शादी कर सकता है? पढ़ सकते हैं।

 
सूचना – खेद है कि कुछ दिन अंतर्जाल संपर्क बंद रहने के कारण तीसरा खंबा और अनवरत पर पोस्टों का प्रकाशन नहीं हो सकेगा।

पर्याप्त संख्या में अदालतें स्थापित करने को धन की आवश्यकता है, इस बात को सरकार औऱ संसद के सामने रखने से कानून मंत्रालय को कौन रोक रहा है।

दालतों की कमी अब सर चढ़ कर बोलने लगी है और कानून मंत्रालय सीधे-सीधे नहीं तो गर्दन के पीछे से हाथ निकाल कर कान पकड़ने की कोशिश कर रहा है। कानून मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि कोई भी नया कानून बनाने से पहले संसद को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इससे अदालतों पर कितना अतिरिक्त भार पडेगा और इस मकसद के लिए आवश्यक धन के लिए प्रावधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। हालाँकि इस सुझाव से लगता है कि जैसे संसद ही अभी तक पर्याप्त मात्रा में अदालतों की स्थापना को रोके हुए थी। कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को लिखे एक पत्र में कहा है कि किसी भी नए विधेयक या कानून से अदालतों पर पडने वाले अतिरिक्त भार तथा इस उद्देश्य के लिए जरूरी खर्च का आकलन किया जाना चाहिए।  
र्तमान में स्थिति यह है कि देशभर में निचली और उच्च अदालतों में लगभग तीन करोड मामले लंबित हैं और इनकी संख्या धीरे धीरे बढ रही है। वर्ष 2009 के आंकडों पर आधारित सरकार के आकलन के अनुसार भारत में औसतन किसी मुकदमे के अंतिम फ़ैसले में 15 साल का वक्त लगता है। ज्यूडिशल इंपैक्ट असेसमेंट टास्क फ़ोर्स की सिफ़ारिशों पर आधारित मोइली के पत्र में कहा गया है कि सरकार न्यायिक प्रभाव आकलन के जरिए अदालतों द्वारा किसी कानून के कार्यान्वयन में संभावित खर्च का पूर्वानुमान लगा सकती है। टास्क फ़ोर्स ने पूर्व कानून सचिव टीके विश्वनाथन के अनुसंधान कार्य पर आधारित अपनी सिफ़ारिशों में कहा था कि संसद या राज्य विधानसभाओं में पारित होने वाले प्रत्येक विधेयक से अदालतों पर पडने वाले भार का अनुमान मुहैया कराया जाना आवश्यक कर दिया जाना चाहिए। 
कानून मंत्रालय वित्त मंत्रालय को यह बताना तो चाहता है कि नयी अदालतें खोलने के लिए धन की आवश्यकता है। एक बात यह समझ में नहीं आ रही है कि वह यह बात खुल कर सरकारों के सामने क्यों नहीं रखना चाहता। इस बात को खुल कर सरकार और संसद के सामने रखने से कानून मंत्रालय को कौन रोक रहा है।

जब जनता प्रश्न पूछने लगेगी तब सरकारें क्या करेंगी?

भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देने के स्थान पर उसे गरीबों को मुफ्त वितरित कर देने के आदेश से उत्पन्न विवाद की गूंज समाप्त नहीं हुई है। सरकार की ओर से कितने ही लोग सामने आए हैं जिन्हों ने इस बात की वकालत की है कि न्यायालय सरकार के नीति निर्धारण में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। किन्तु सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी रहें और न्यायालय मौन साधे रहें तो उस का नतीजा केवल और केवल जन-असंतोष ही हो सकता है। सरकार संसद के हर सत्र में कानून बनवाती है और फिर शायद भूल जाती है। राज्य सरकारों की तो हालत और भी बुरी है, उन्हें अपने रोजमर्रा के कामों को करने में ही समय पूरा नहीं पड़ता है।

हाल ही में एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की निर्माण उद्योग से जुड़े श्रमिकों के कल्याण और उनके हालात पर बने 15 वर्ष पुराने कानून को लागू नहीं कर पाने के कारण आलोचना की है। संसद द्वारा निर्मित भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार एवं सेवा शर्त नियमन) अधिनियम-1996 तथा भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम-1996 के क्रियान्वयन में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की पूर्ण विफलता पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम-1996 के तहत सभी राज्यों में निर्माण एजेंसी से निर्माण योजना का एक प्रतिशत उपकर के रूप में वसूलने के लिए एक कल्याण बोर्ड गठित किया जाना था। इस तरह प्राप्त धन का उपयोग भवन एवं निर्माण उद्योग से जुड़े श्रमिकों के स्वास्थ्य, चिकित्सा देखभाल, पेंशन, गृह ऋण और बच्चों की शिक्षा जैसी कल्याण योजनाओं में खर्च किया जाना था।
प्रधान न्यायाधीश एस.एच.कपाड़िया, न्यायमूर्ति के.एस.राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की खण्डपीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पूछा कि यदि राज्य सरकार तथा केंद्र शासित क्षेत्र श्रमिकों के कल्याण के लिए बने इस कानून को लागू नहीं कर रहे हैं, तो केंद्र सरकार क्या कर रही है? महाराष्ट्र में 30 लाख निर्माण श्रमिक हैं और वहां कोई कल्याण बोर्ड गठित नहीं है। अदालत ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा, “हमें नहीं पता कि केंद्र सरकार इस तरह के राज्यों को निर्देश क्यों जारी नहीं की है।” सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार को  राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों से, निर्माण श्रमिकों के कल्याण के लिए बने कानून को लागू करने और जनवरी 2010 में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन की दिशा में उठाए गए कदमों के बारे में आवश्यक विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। 
रोज यही हो रहा है कि न्यायालय सरकार से पूछते हैं कि वे कानूनों और अपनी बनाई नीतियों की पालना क्यों नहीं करती है? सरकार इस का कोई न कोई उत्तर दे ही देगी। लेकिन जब यही प्रश्न किसी दिन जनता पूछने लगेगी तब सरकारें क्या करेंगी? 

देश के सभी कानून अंग्रेजी, हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में इंटरनेट पर उपलब्ध क्यों नहीं?

दि कोई व्यक्ति सहज भाव से कोई ऐसा काम कर दे जो कि कानून की निगाह में जुर्म हो, और दुर्भाग्य से वह पकड़ा जाए। फिर उस के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय के समक्ष आए। वहाँ जब वह यह कहे कि उस से गलती हो गई, उसे पता नहीं था कि यह काम करना अपराध है, उसे माफ किया जाए, तो उस की यह प्रतिरक्षा उस के किसी काम न आएगी। क्यों कि सर्वोपरि नियम यह है कि कोई भी न्यायालय के सामने यह प्रतिरक्षा नहीं ले सकता कि उसे इस विधि की जानकारी नहीं थी। अब इस परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए। देश की संसद, विधानसभाएँ, नगर पालिकाएँ, पंचायतें आदि सभी संस्थाएँ नित्य कानून का सृजन करती हैं। क्या उन का यह कर्तव्य नहीं है कि उस कानून की प्रति नागरिकों को सुलभ हो? मेरी सोच यह है कि यह सरकारों का कर्तव्य है कि वे प्रत्येक कानून को जनसाधारण के लिए जनसाधारण की भाषा में सुलभ कराएँ। अब तो यह सूचना के अधिकार के अंतर्गत जनता का अधिकार भी है। 
लेकिन क्या सरकारें अपने इस कर्तव्य का निर्वाह सही तरीके से कर रही हैं? यदि आप इस की तलाश में जाएंगे तो पाएंगे कि सभी सरकारें इस ओर से उदासीन हैं। वे केवल गजट में कानूनों और कायदों को प्रकाशित कर निश्चिंत हो जाती हैं। यह गजट जिले के सब से बड़े अधिकारी जिला कलेक्टर के कार्यालय में स्वयं कलेक्टर के मांगने पर भी मिल जाए तो बहुत है। मैं ने जिला जजों और जिला कलेक्टरों को गजट की अनुपलब्धता की शिकायत करते देखा है। इस से बड़ी सरकार की लापरवाही दूसरी नहीं हो सकती।
ब तो लगभग पूरे देश में इंटरनेट सेवाएँ उपलब्ध हैं। किसानों को उन की कृषि भूमि के अभिलेख इंटरनेट से प्राप्त हो रहे हैं। कोई भी व्यक्ति इस बात की अनुज्ञा प्राप्त कर सकता है कि वह लोगों को अपने यहाँ से इन अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियाँ जारी कर सके। वैसी अवस्था में देश भर के कानूनों को जनता की भाषा में इंटरनेट पर उपलब्ध कराया जाना कठिन नहीं है। लेकिन अभी तक इस मामले में अधिक कुछ नहीं किया गया है। यह सही है कि संसद द्वारा निर्मित सभी कानून इंडिया कोड पर उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय 1950 से अद्यतन निर्णय सूचना प्रणाली पर उपलब्ध हैं। लेकिन वहाँ भी कानून केवल अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं। राजभाषा हिन्दी में पाँच-छह वर्षों के कानूनों की गजट में प्रकाशित पन्नों के चित्रों को पीडीएफ प्रारूप में प्रस्तुत कर कर्तव्य की इति-श्री समझ ली गई है। आज हमारे पास हिन्दी का यूनिकोड फोन्ट उपलब्ध है। जिस के माध्यम से कितनी ही जानकारियाँ हिन्दी में उपलब्ध हैं लेकिन भारत सरकार आज तक केन्द्रीय कानूनों और कायदों को इंटरनेट पर हिन्दी देवनागरी लिपि में उपलब्ध नहीं करा पाई है। अभी तक उस की इस तरह की कोई योजना भी स्पष्ट नहीं है। 
राज्यों की स्थिति तो बिलकुल बेहाल है। राज्यों के कानून तो उन की अपनी वेबसाइटों पर अंग्रेजी में भी उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध कराया जाना तो बहुत दूर की बात है। यह स्थिति उन राज्यों की भी है जो भाषाई आधार पर निर्मित हुए हैं। तमिलना़डु में तमिल, केरल में मलयालम, कर्नाटक में कन्नड़, आंध्र में तेलुगू, बंगाल में बंगाली, महाराष्ट्र में मराठी और गुजरात में गुजराती भाषा में उन के राज्यों के कानून भी उपलब्ध नहीं हैं। यही स्थिति पूर्वो

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