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सामान्य आशय और धारा-34 भारतीय दंड संहिता

rp_Lady-Justice.jpgसमस्या-

धर्मेन्द्र बट्ट ने दमोह, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३४ क्या है? इस के अंतर्गत दर्ज अपराध में क्या सजा और क्या जुर्माने का प्रावधान है?

समाधान-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 का मूल पाठ निम्न प्रकार है-

34. सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य–जबकि कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो।

धारा-34 भारतीय दण्ड संहिता के मूल पाठ को पढ़ने के उपरान्त आप को यह तो समझ आ गया होगा कि इस धारा में किसी विशिष्ट अपराध का वर्णन नहीं है और किसी विशेष दण्ड का प्रावधान भी नहीं है। यह धारा सामान्य आशय से एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा संपन्न किए गए अपराधों के संबंध में है। यदि दो या दो से अधिक व्यक्ति कोई कार्य संयुक्त रूप से करते हैं तो विधि के अंतर्गत स्थिति वही होगी कि मानो उन में से प्रत्येक के द्वारा वह कार्य स्वयं व्यक्तिगत रूप से किया गया है।

दाहरण के रूप में चार व्यक्ति मिल कर किसी को चोट पहुँचाना चाहते हैं और इस के लिए वे अपने स्थान से रवाना हो कर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ वह व्यक्ति मौजूद है, जैसे ही वह व्यक्ति दिखाई पड़ता है उन चारों में एक व्यक्ति लाठी से उस के सिर पर हमला करता है, वह व्यक्ति लाठी को सिर पर पड़ने से बचाने के लिए हाथ पर झेल लेता है और चार व्यक्तियों को सामने देख कर चिल्लाते हुए भाग लेता है। जब तक हमलावर उसे पकड़ पाएँ आस पास के लोग इकट्ठे हो जाते हैं जिन्हें देख कर चारों हमलावर भाग लेते हैं। यहाँ चोटिल व्यक्ति को चोट पहुँचाने का कार्य एक व्यक्ति ने ही किया है इस कारण केवल उसी ने धारा 323 आईपीसी का अपराध किया है, लेकिन अन्य तीन व्यक्ति उस व्यक्ति को चोट पहुँचाने के उददेश्य से साथ थे इस कारण वे तीनों भी लाठी से हमला करने वाले के समान ही अपराधी हैं क्यों कि उन का सामान्य आशय एक ही था। उन पर जब अभियोग चलाया जाएगा तो धारा 323 के साथ धारा 34 भी आरोपित की जाएगी। यदि उस अभियोग में सभी को दंडित किया गया तो सभी को उसी व्यक्ति के समान दंड मिलेगा जैसा कि लाठी से हमला करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा।

किसी तथ्य को स्वीकार करने के लिए फौजदारी मुकदमा करने की धमकी देना उद्दापन का अपराध है।

समस्या-

भिलाई, छत्तीसगढ़ से अनुतोष मजूमदार ने पूछा है-

मेरी समस्या के बारे में मैं आप से पहले सलाह ले चुका हूँ। आप की सलाह से मैं ने अपने वकील साहब को अवगत करा दिया है।  एक समस्या और आ गई है कि पिछले 9 वर्षों से एक मुस्लिम महिला के साथ निवास कर रहा था।  हमारी शादी कभी नहीं हुई। हमारे बीच विवाद होने पर दिनांक 17.10.2011 से हतम अलग रह रहे थे। अब उस ने मुझे पर एवं मेरे माता पिता पर धारा 498अ, 506, 294, 323, 34 भा.दं.संहिता तथा धारा 125 दं.प्र.संहिता के मुकदमे किए हैं।  धारा 125 का मुकदमा निर्णय की स्थिति में है और उस महिला का व्यवहार उग्र होता जा रहा है।  उस ने मुझे धमकी दी है कि अगर मैं ने उसे पत्नी नहीं स्वीकारा या न्यायालय द्वारा पत्नी साबित न होने की स्थिति में वह मुझ पर एवं मेरे पिता व भाई पर धारा 376 का मुकदमा दायर करवाएगी।  क्या ऐसा किया जा सकता है? ये लांछन तो सहन नहीं हो पाएगा। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान

Code of Criminal Procedureस तरह किसी महत्वपूर्ण तथ्य की संस्वीकृति प्राप्त करने के लिए फर्जी फौजदारी मुकदमा दायर करने की धमकी देना धारा 388  भा.दंड संहिता के अंतर्गत संज्ञेय अपराध है। धारा 388 भा.दं.संहिता निम्न प्रकार है-

388. मॄत्यु या आजीवन कारावास, आदि से दंडनीय अपराध का अभियोग लगाने की धमकी देकर उद्दापन–जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने के भय में डालकर कि उसने कोई ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है, जो मॄत्यु से या 1[आजीवन कारावास] से या ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय है, अथवा यह कि उसने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा अपराध करने के लिए उत्प्रेरित करने का प्रयत्न किया है, उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा, तथा यदि वह अपराध ऐसा हो जो इस संहिता की धारा 377 के अधीन दंडनीय है, तो वह 1[आजीवन कारावास] से दंडित किया जा सकेगा ।

प को तुरंत पुलिस को इस की सूचना दे कर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहिए। यदि पुलिस ऐसी सूचना दर्ज करने से इन्कार करे तो तुरंत इस मामले में मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर मामला दर्ज कराना चाहिए।

सा परिवाद धारा 156 (3) के अंतर्गत न्यायालय पुलिस को कार्यवाही के लेय़ भेज सकता है या फिर स्वयं जाँच कर के उस पर प्रसंज्ञान ले सकता है। इस कार्यवाही से धमकी देने वाले पर फौजदारी मुकदमा दर्ज हो जाएगा। वैसी स्थिति में वह कोई मुकदमा आप के या आप के पिता व भाई के विरुद्ध दर्ज भी करवाती है तो आप के पास उसे फर्जी कह कर रद्द करवाने का पूरा अवसर रहेगा और आप मिथ्या बदनामी से बचेंगे।

मुकदमों में गुणावगुण के आधार पर बचाव करना होगा, अच्छा हो मध्यस्थता से राह निकले।

समस्या-

छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से आसिफ ने पूछा है –

मेरा विवाह 2009 में हुआ था।  पत्नी विवाह के लगभग 7-8  माह तक अच्छे से रही।  परंतु फिर वह अपनी बहन की गलत सलाह में आकर घर में विवाद करने लगी।  इस संबंध में उनके परिवार के लोगों से बैठक करके बातचीत की गई।  उसके परिजनों से समझाया।  परंतु हर बार कुछ दिन ठीक से रहने के बाद वह फिर पहले जैसे मोबाईल पर गलत सलाह पाकर झगड़ा करने लगती।  फिर उसका भाई दहेज के केस में अंदर कराने की धमकी देने लगा।  तब हमने पुनः उसके घरवालों के साथ बैठक की और फिर लिखित समझौता करके उसे लेकर आए।  लेकिन कुछ समय ठीक रहने के बाद वह फिर विवाद करने लगी।  उस मध्य वह गर्भवती हो गई थी तब मैं उसे मायके पहुँचाकर आया तथा मैं उसका स्वास्थ्य देखने एवं उससे मिलने के लिये उसके घर जाता रहा।  लेकिन उसका भाई मेरे साथ बदतमीजी करता और जान से मारने की धमकी देता था।  फिर हमने पुत्र के जन्म के बाद परिवार परामर्श केन्द्र में आवेदन दिया।  वहाँ पर भी उसने स्वीकार किया कि हमने कभी दहेज नहीं मांगा तथा कभी उसके साथ मार-पीट नहीं की।  लेकिन इस मध्य उसके पिता ने अनेकों जगह मेरे विरुद्ध झूठी शिकायत की जिससे मैं मानसिक रुप से परेशान हो गया।  मैं परिवार का इकलौता पुत्र हूँ।  पत्नी मुझे मेरी माँ से अलग रहने के लिये विवश करने लगी।  तब मैं ने उसे मुस्लिम रीति से तलाक दे दिया।  तब उसने धारा 498-ए दंड प्रक्रिया संहिता का झूठा प्रकरण दर्ज करवा दिया जो कि न्यायालय में चल रहा है।  साथ ही पत्नी द्वारा भरण-पोषण का धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता का प्रकरण भी न्यायालय में चलाया जा रहा है।  मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

Counsellingप के विरुद्ध दो मुकदमे चल रहे हैं।  इन मुकदमों में आप के समक्ष अधिक विकल्प नहीं हैं। आप ने स्वयं ही यह अभिवचन किया है कि आपने मुस्लिम रीति से अपनी पत्नी से तलाक ले लिया है।  लेकिन वर्तमान में न्यायालय तलाक को तभी स्वीकार करते हैं जब कि वह Shamim Ara v. State of U.P. के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप हो तथा आप उसे न्यायालय में साबित कर सकें।  इस मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम विधि की विवेचना करते हुए यह निर्धारित किया है कि पुरुष को उस की पत्नी को तलाक देने का अधिकार है लेकिन वह केवल तभी तलाक दे सकता है जब कि तलाक के लिए कोई वैधानिक कारण उपलब्ध रहा हो और तलाक देने के पूर्व मध्यस्थों द्वारा पवित्र कुऱआन की सूरा 4 की आयत 35 के मुताबिक मध्यस्थता की कोशिश की गई हो।  इस तरह आप को तलाक को साबित करने के लिए उक्त दोनों तथ्य न्यायालय के समक्ष दस्तावेजों और गवाहों के माध्यम से साबित करने होंगे।

दि न्यायालय ने तलाक को वैध नहीं माना हो तो भी और वैध मान लेने पर भी धारा 498-ए की शिकायत तलाक की तिथि के पूर्व की होने पर भी आप को तलाक का कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा।  आप को मुकदमे के गुणावगुण के आधार पर ही अपना बचाव करना होगा।

र्वोच्च न्यायालय ने Danial Latifi and Anr. v. Union of India के मामले में यह निर्धारित किया है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला जब तक पुनर्विवाह नहीं कर लेती है तब तक वह धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता प्राप्त कर सकती है।

प के मामले में यह हो सकता है कि आप द्वारा दिए गए तलाक को मुस्लिम विधि के अनुरूप वैध न माना जाए। आप को दोनों ही मुकदमों में गुणावगुण के आधार पर अपना बचाव करना होगा। इस के लिए आप को किसी अच्छे वकील की मदद लेनी होगी। सब से अच्छी बात तो यह है कि दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता से कोई राह निकल आए।

498ए भा.दं.संहिता के मामले में अपील के स्तर पर राजीनामे आधार पर दंड समाप्त किया जा सकता है

समस्या-

मेरे सरकारी सेवारत मित्र को 498-क में सज़ा हुई है।  निचली अदालत में लड़की वाले दहेज का सामान और पैसा वापिस करने की शर्त पर राज़ीनामा करने हेतु मान गये थे।  किंतु उस समय मेरे मित्र नहीं माने।  अब सज़ा के बाद मामला सत्र न्यायालय में है।  अब मेरे मित्र लड़की वालों की शर्तों को मानकर राज़ीनामा करना चाहता है, ये विधि द्वारा कैसे संभव है?  क्या राज़ीनामा ना होने की दशा में सत्र न्यायालय से सज़ा की पुष्टि होने पर मेरे मित्र को जेल जाना पड़ेगा?  और क्या सत्र न्यायालय से सज़ा की पुष्टि के बाद मेरे मित्र की सरकारी नौकरी सदा के लिए जा सकती है?

-के.पी. सिंह, सतना, मध्यप्रदेश

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि राजीनामे की शर्तें क्या होंगी? फिर भी अपील के स्तर पर धारा 498ए भा. दं. संहिताके मामले में राजीनामा संभव है।  लेकिन राजीनामा प्रस्तुत करने के साथ ही यह तय करना होगा कि पति-पत्नी जिन के बीच में विवाद है क्या साथ रहने को सहमत हैं या अलग होने पर सहमत हो गए हैं और उन्हों ने सहमति से तलाक के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है।

दोनों ही स्थितियों में दोनों पक्षों के मध्य कोई लिखित अनुबंध गवाहों के सामने लिखा जाना चाहिए और उसे कम से कम नोटेरी पब्लिक से तस्दीक करा लेना चाहिए।  एक बार उक्त अनुबंध तस्दीक करवा लेने पर उस के अनुसार साथ रहना आरंभ करना चाहिए या फिर तलाक के लिए न्यायालय में आवेदन कर देना चाहिए। इस के उपरान्त दोनों को अपने अपने शपथ पत्र के साथ न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत कर देना चाहिए कि इन परिस्थितियों में अपीलार्थियों को दंडादेश निरस्त कर दिया जाए। इस मामले में आप मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का मातादीन एवं अन्य बनाम राज्य के मामले में दिया गया निर्णय न्यायालय को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं। यह निर्णय यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है।

न्यायालय द्वारा दोषमुक्त घोषित होने तक अभियुक्त कदापि यह न सोचे कि वह दोषमुक्त हो जाएगा

तीसरा खंबा के पाठकों और मित्रों¡

मैं ने कभी सोचा भी न था कि मुझे कानूनी सलाह के लिए ऐसा भी पत्र मिलेगा।  लेकिन मुझे मिला।  हर किसी को, संगीन से संगीन अपराध के अभियुक्त को भी जनतंत्र में बचाव का हक है।  इस के लिए उसे कानूनी सलाह और सहायता प्राप्त करने का अधिकार भी।  एक विधिज्ञ को भी ऐसी सहायता के लिए कभी इन्कार नहीं करना चाहिए।  मैं भी नहीं कर रहा हूँ।  तो पत्र और पत्र लेखक को दी गई सलाह यहाँ प्रस्तुत है-

समस्या-

मेरा नाम आशीष राज है! दिनांक: 15.02.2012 को समस्तीपुर नगर थाना में मेरे विरुद्ध केस दर्ज हुआ था!  इस मामले में प्राथमिकी इस प्रकार है …

मैं नेहा कुमारी पुत्री रमेश कुमार बेर्गिनिया सीतामढ़ी की रहने वाली हूँ।  मैं एक एनजीओ में काम करती हूँ।  उसी एनजीओ में विनय कुमार शर्मा भी काम करते थे।  हम दोनों ने अंतरजातीय विवाह किया था।  जो कि समस्तीपुर के थानेश्वर मंदिर में संपन्न हुआ था।  शादी के २ महीने बाद मैं अपने माँ बाप के साथ अपने मायके आगयी।  जहाँ 18.08.2010 को आशीष राज का फ़ोन आया कि तुम्हारे पति की मृत्यु हो गयी है जल्द से जल्द समस्तीपुर आ जाओ।  सूचना मिलते ही मैं अपने भाई गौरव के साथ समस्तीपुर आ गई।  जहाँ आशीष मेरा इंतजार करते हुए समस्तीपुर स्टेशन पर पहले से मौजूद थे।  उन्हों ने मुझे एकान्त मैं ले जा कर कहा कि तुम ससुराल मत जाओ।  तुमने अंतरजातीय विवाह किया है वे लोग तुम्हारे पति के मौत का कारण तुमको मानते हैं।  अगर तुम गयी तो तुम्हें मार देंगे।  आशीष मुझे अपने घर ले गया और मेरे भाई को वापस भेज दिया।   आशीष ने मुझे अपने घर पर रखा व् रा धमका कर और मुझ से शादी का प्रलोभन देकर मेरे साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर लिया और मुझे अपने माँ बाप के पास छोड़ आये।  मेरे द्वारा शादी करने की कहे जाने पर कहते कि अपनी बहिन की शादी के बाद शादी करूँगा।  इसी बीच मेरे गर्भ में उनका बच्चा ठहर गया।  29 जनवरी को उनकी बहन की शादी भी हो गयी।  जिसमे उन्होंने दो भर सोने का चैन, एक भर की दो सोने की अंगूठी, एक भर की कान की बाली। तीनों की कीमत लगभग 1,50,000/- रुपए तथा 20,000/- रुपए नकद यह कह कर लिए की अभी शादी में तंगी है बाद में हम सब कुछ तुम्हें दे देंगे।  अपनी बहन की शादी के बाद भी उन्होंने मेरा सामान बापस नहीं किया और मुझ से शादी भी नहीं की। मुझ पर अपना गर्भ गिराने के लिए दबाब बनाते रहे।  मेरे इनकार करने पर उन्हों ने मुझे 05.02.2012 को विटामिन का दवा कह कर 2 टेबलेट खिलाकर मुजफ्फरपुर पहुँचा दिया।  वहाँ पर मेरी तबियत धीरे धीरे खराब होने लगी।  दिनांक 14.02.2012 को जब मेरी तबियत काफी खराब हो गई तो मैं समस्तीपुर आकर उनसे मिली तो। उन्हों ने मुझे पहचाने से इंकार करते हुये मुझे अपने डेरा से भगा दिया।  मैं डॉ. आर. के. मिश्रा काशीपुर के यहाँ भरती हुई।  जहाँ मेरा इलाज चला।  इसी दौरान मैं ने अपनी माँ को फ़ोन कर के अपने पास बुलाया।  मेरी माँ मेरे पास आई तो मुझे पता चला कि मेरे दो महीने के बच्चे का गर्भपात इलाज के दौरान हो चुका है। अपनी हालत में सुधार होने के बाद आज दिनांक 16.05.2012 को उक्त घटना की जानकारी महिला थाना को देने गयी मगर उन्हों ने मेरी बात को अनसुनी कर दिया।  तब मैं उपरोक्त घटना की सूचना श्रीमान को अपने माँ के साथ दे रही हूँ!”

आपने ऊपर लिखी सारी बातों को पढ़ा इस मामले में मैंने 19.04.2012 को कोर्ट में समर्पण किया।  13.07.2012 को हाईकोर्ट द्वारा जमानत पर रिहा हुआ।  इस केस की डायरी जमा हो चुकी है और धारा 176, 313 आईपीसी का केस भी खुल चुका है।  साथ में अल्ट्रासाउंड डाक्टर का पुर्जा व स्टेट बैंक में जमा किए गये पैसे की रसीद संलग्न है।  जिस में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट की तारीख 14.05.2012 है जब कि डाक्टर के यहाँ 15.02.2012 भर्ती हुई है।  पुलिस द्वारा मोबाइल की कॉल रेकॉर्ड्स निकलवाया जिस से पता चला कि 29 जनवरी से लगातार 18 अप्रेल तक बातचीत हुई है।  सर कृपा कर यह बताएँ कि क्या इस मामले में मुझे सजा हो सकती है?  इस से पूर्व उस ने जिस से शादी की थी।  उस पर भी रेप केस कर के शादी की थी।  इस लड़की का चाल चलन ठीक नहीं है।  मेरे जेल जाने के बाद 20.04.2012 को मुझ से मिलने जेल आई थी।  उस के बाद भी कई दिन आई।  मुझ पर बार बार शादी करने का दवाब बना रही है।  घटना 18.08.2010 की है केस 16.02.2012 को हो रहा है।  क्या रेप केस 2 साल बाद भी हो सकता है।  विटामिन की दवा 05.02.2012 को खिलाई गई जब कि प्राथमिकी में लिखा है की इलाज के दौरान गर्भपात हो गया है।  इस मुसीबत से कैसे निकला जाए?  बताने की कृपा करें!

-आशीष राज, समस्तीपुर, बिहार

समाधान-

प ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने वाली महिला के बारे में दो बातें कही हैं।  एक तो यह कि उस का चाल चलन ठीक नहीं है।  दूसरा यह कि उस ने अपने पति पर बलात्कार का आरोप लगा कर उस से शादी की थी।  हो सकता है कि आप की दोनों बातें सही हों।  हो सकता है उस के पति ने भी उस के साथ विवाह पूर्व संबंध विवाह का विश्वास दिला कर यौन संबंध कायम किया हो बाद में मना कर देने पर उस को बलात्कार का आरोप लगाना पड़ा हो।  ऐसी स्थिति में तो उस के चाल-चलन के खराब होने का आरोप उस पर नहीं लगाया जा सकता।

प ने जो कुछ प्राथमिकी में लिखा है उस के बारे में एक भी शब्द नहीं कहा है।  आप का मौन यह बताता है कि प्राथमिकी का एक एक शब्द सही है। यदि ऐसा है तो फिर आप ने निश्चय ही वे दोनों अपराध किए हैं जिन का आरोप आप पर लगाए गए हैं।  आज केवल यह कह देने से कि लड़की का चाल-चलन अच्छा नहीं है और उस ने पहले पति से भी बलात्कार का आरोप लगा कर विवाह किया था आप का अपराध क्षमा नहीं किया जा सकता।  फिर किसी लड़की के चाल चलन को खराब कब कहा जाएगा यह निश्चित नहीं है। हो सकता है कि उस लड़की ने जब वह अविवाहित थी तो उस ने विनय के साथ यौन संबंध रखे हों। पर यह अपराध कहाँ है।  विनय के साथ विवाह करने के बाद तो उस ने किसी के साथ यौन संबंध नहीं रखे।  उस की मृत्यु के उपरान्त आप ने उस के साथ विवाह का विश्वास पैदा कर यौन संबंध बनाया तो यह भी अपराध नहीं है।  यदि उस ने विनय के साथ और आप के साथ विवाह पूर्व यौन संबंध बनाए भी हैं तो भी यह गैरकानूनी तो नहीं था।  फिर विनय और आपने भी तो बिना विवाह किए उस के साथ यौन संबंध बनाए।  तो इस तरह आप दोनों का भी चाल-चलन खराब हुआ।  इस तरह आप उस के चाल-चलन को खराब बता कर अपराध के परिणाम से नहीं बच सकते।

प का बचाव यही हो सकता है कि जिन अपराधों का आरोप आप के विरुद्ध लगाए गए हैं वे न्यायालय में साबित नहीं हो सकें।  वैसे तो बलात्संग और किसी महिला का गर्भपात उस की सहमति के बिना करा देना ऐसे अपराध हैं जिन में कोई समझौता भी न्यायालय द्वारा मान्य नहीं हो सकता।  अपराध साबित हो जाने पर दंड मिलना स्वाभाविक है।  यह भारत की दांडिक न्याय प्रणाली है जो पीड़ित महिला से अपराधी द्वारा विवाह कर लिए जाने पर महिला के अच्छे जीवन की आशा में उस के निवेदन पर ऐसे अपराधों में क्षमा कर देती है और मामूली दंड पर छोड़ देती हैं।  यदि यही अपराध किसी पश्चिमी देश में हुआ होता तो आप को दंड होना पूरी तरह निश्चित हो गया होता।

प इस मामले में मुगालते में न रहें कि आप इस मुसीबत से आसानी से बच जाएंगे अपितु यह मान कर चलें कि सजा से आप को कोई नहीं बचा सकता, केवल सजा कम हो सकती है।  यदि कोई वकील आप को यह कहे कि आप को इस मामले में दंड नहीं मिलेगा तो वह मिथ्या भाषण करेगा। इस मुकदमे में सब कुछ न्यायालय के समक्ष आई साक्ष्य पर निर्भर करेगा कि आप पर लगाए गए आरोप साबित होते हैं या नहीं।  इस कारण से आप ऐसे सक्षम वकील की सहायता प्राप्त करें जो ईमानदारी से आप की मदद करे,  न कि ऐसा वकील करें जो यह कहे कि मैं तुम्हें बरी करवा दूंगा या कि तुम्हें इस मामले में सजा नहीं हो सकती।

अपराधिक मुकदमे में गवाह उपस्थित न होने पर क्या होगा ?

समस्या-

क लड़की से मेरी केवल बातचीत होती थी।  17 जनवरी 2010 को मेरी अनुपस्थिति में वह अचानक मेरे घर पर आई और कहा कि मैं ने उस के साथ शादी की है।  मेरी पत्नी में और उस के बीच झगड़ा हुआ और आपस में मारपीट हो गई। उस लड़की ने थाने में जा कर मामला दर्ज कराया तो पुलिस ने 498-ए का मुकदमा बना दिया जिस में घर के सभी लोगों का नाम लिखा दिया।  किसी तरह उस से समझौता किया तो उस आधार पर हमारी गिरफ्तारी पूर्व जमानत हुई।  पुलिस ने मेरे और मेरी पत्नी के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया लेकिन घऱ के अन्य लोगों के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं पाना लिखा।  हमारे वकील ने आरोप विरचित होने के समय आरोप मुक्ति के लिए बहस की।  लेकिन न्यायालय ने कहा कि समझौते के आधार पर जमानत हुई है इस कारण से आरोप मुक्ति नहीं हो सकती।  अब गवाही के लिए उस लड़की का समन निकला है।  उस ने मेरे घर का पता दे रखा था इस कारण से वह मेरे घर पर आया।  हम ने मना कर दिया कि वह यहाँ नहीं रहती है और न कभी यहाँ रही है।  बाकी सभी गवाह मेरे मोहल्ले के हैं जो सच बोलेंगे।  वह लड़की गवाही देने नहीं आ रही है।  तो ऐसे में क्या हमारी जमानत खारिज हो जाएगी? इस मामले में न्यायालय का क्या निर्णय होना चाहिए?

-महाबली, सासाराम, बिहार

समाधान-

प ने अपने मुकदमे में वकील किया हुआ है।  आप को अपने मुकदमे के बारे में जो भी शंकाएँ हों  उन के बारे में अपने वकील से जानकारी करना चाहिए।  वे अधिक बेहतर तरीके से बता सकते हैं क्यों कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी होती है।

प के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र राज्य सरकार के लिए पुलिस द्वारा प्रस्तुत किया गया है।  उस मामले को साबित करने का दायित्व राज्य सरकार का है।  आप पर लगाए गए आरोप को बिना किसी युक्तियुक्त संदेह के साबित करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है।  यदि अभियोजन पक्ष किसी भी कारण से आप पर आरोप साबित नहीं कर पाता है तो आप निर्दोष करार दिए जाएंगे और मुकदमा समाप्त हो जाएगा।  उस लड़की को गवाही के लिए प्रस्तुत करना भी पुलिस की जिम्मेदारी है आप की नहीं।  यदि पुलिस उस लड़की को गवाही में नहीं ला पाती है तो गवाही के अभाव में कोई भी बात आप के विरुद्ध साबित नहीं की जा सकती।  आप बेफिक्र रहें।  आप की जमानत केवल जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने पर रद्द की जा सकती है।  यदि आप प्रत्येक पेशी पर अदालत में उपस्थित होते रहें तो आप की जमानत भी खारिज नहीं की जा सकती है।  इतना हो सकता है कि मुकदमे में सुनवाई में देरी हो जाए।

स मामले में आरोप 498-ए भा.दंड संहिता का है जिस में प्राथमिक रूप से यह साबित किया जाना आवश्यक है कि परिवादी आप की पत्नी है।   यह साबित करने के लिए क्या सबूत पुलिस प्रस्तुत करेगी यह तथ्य मेरे सामने नहीं है।  मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि जो विवाह हुआ ही नहीं उसे पुलिस ने साबित कैसे मान लिया।  इस के लिए भी पुलिस ने कुछ गवाह अवश्य नकली बनाए होंगे।  यदि उस लड़की के साथ आप का विवाह ही साबित नहीं होगा तो इस मामले में आप को दोषी साबित किया जान संभव नहीं है।  जो तथ्य आप ने मेरे सामने रखे हैं उन के आधार पर मुकदमा झूठा सिद्ध होगा और न्यायालय को चाहिए कि वह उस लड़की के विरुद्ध धारा 182 भा. दंड संहिता में मुकदमा चलाए कि उस ने मिथ्या रिपोर्ट कर के पुलिस को आप को क्षति पहुँचाने के लिए गुमराह किया।  इस मुकदमे में उस लड़की को दंडित किया जा सकता है।

पति के विरुद्ध 498-ए का मुकदमा दर्ज करवा दिया है, मेरा दो साल का बच्चा किस के पास रहेगा?

समस्या-

मेरे ससुराल वाले मुझे बहुत तकलीफ देते थे।  बाद में पति ने भी मारना और घर से निकालना शुरु कर दिया। मैं मायके आई तो वहाँ भी शराब पी कर आने लगा और झगड़ा करने लगा। मेरे पिता को जान से खत्म करने की धमकी भी दी। मैं ने पुलिस स्टेशन में धारा 498-ए में रिपोर्ट करवा दी है। मेरे एक दो साल का बच्चा भी है। मैं क्या कर सकती हूँ? मेरा बच्चा दो वर्ष का है वह मेरे पास रहेगा या फिर उस के पिता के पास रहेगा।

-रानी, लातूर, महाराष्ट्र

प के साथ ससुराल में क्रूरतापूर्ण व्यवहार हुआ और मारपीट भी। इस मामले में आप का कहना है कि आप ने धारा 498-ए का प्रकरण पुलिस ने दर्ज कर लिया है। यदि ऐसा है तो आप के पति और ससुराल वालों के विरुद्ध एक अपराधिक मुकदमा तो दर्ज हो ही गया है। पुलिस इस मुकदमे में गवाहों के बयान ले कर और अन्य सबूत जुटा कर न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत कर देगी। अभियुक्तों को आरोप सुनाने के उपरान्त न्यायालय में सुनवाई आरंभ होगी जहाँ आप के और गवाहों के बयानों पर निर्भर करेगा कि आप के पति और अन्य अभियुक्तों को उक्त प्रकरण में दंड मिलेगा अथवा नहीं।

ब आप अपने मायके में रह रही हैं। 498-ए के प्रकरण के दर्ज हो जाने के उपरान्त आप के पति ने आप के मायके आ कर परेशान करना बंद कर दिया होगा। यदि यह बदस्तूर जारी है तो आप महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। इस आवेदन पर आप के पति को पाबंद किया जा सकता है कि वह आप के मायके न आए और आप को तंग करना बंद करे। इसी आवेदन में आप अपने पति से अपने बच्चे और स्वयं अपने लिए प्रतिमाह भरण पोषण के लिए आवश्यक राशि दिलाने की प्रार्थना भी कर सकती हैं। न्यायालय ये सभी राहतें आप को दिला सकता है।

दि आप अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती हैं तो आप उस से विवाह विच्छेद के लिए परिवार न्यायालय में और आप के जिले में परिवार न्यायालय स्थापित न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष आवेदन कर सकती हैं। साथ ही साथ धारा-125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रतिमाह अपने और अपने बच्चे  के लिए भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए अलग से आवेदन कर सकती हैं।

हाँ तक बच्चे की अभिरक्षा/ कस्टडी का प्रश्न है, बच्चा आप के पास ही होगा और उसे आप के पास ही रहना चाहिए। उसे आप का पति जबरन आप से नहीं छीन सकता। यदि वह बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन करता है तो आप उस का प्रतिरोध कर सकती हैं। जिस उम्र का बालक है उस उम्र में उसे उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। इस तरह बालक भी आप के पास ही रहेगा। यदि आप दोनों के बीच विवाह विच्छेद होता है तो आप यह तय कर सकती हैं कि आप बच्चे को अपने पास रखना चाहती हैं या नहीं। यदि आप बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहती हैं और बच्चे का पिता उसे अपने पास रखना चाहता है तो आप इस विकल्प को चुन सकती हैं।

पति पत्नी व बच्चों को छोड़ कर दूसरा विवाह कर ले तो पत्नी क्या-क्या कर सकती है?

समस्या – 

मारी शादी को 7 साल हुए हैं। मेरा पति दो साल से भागा हुआ है और अलग रह रहा है,  उस ने तलाक का केस फाइल कर रखा है। लेकिन मैं उस से किसी भी कीमत पर तलाक नहीं देना चाहती हूँ। क्यों कि मेरे दो बच्चे हैं एक लड़का और एक लड़की। मैं अभी मायके में रह रही हूँ और हमारा सारा खर्चा मेरा और मेरे बच्चों का मेरे माता पिता ही उठा रहे हैं। मुझे अब पता चला है कि उस ने (पति ने) दूसरी शादी कर ली है, जिस में उस के माता-पिता का हाथ भी है। लेकिन बिना तलाक दिए कोई दूसतरी शादी कैसे कर सकता है? क्या उस की दूसरी पत्नी उस की जायज पत्नी हो सकती है? मैं उसे और उस के घरवालों को कानून के द्वारा सजा दिलाना चाहती हूँ और अपने बच्चों का हक लेना चाहती हूँ। इस के लिए मुझे क्या करना होगा?

-राखी उनियाल, देहरादून, उत्तराखंड

समाधान-

कोई भी व्यक्ति स्त्री या पुरुष अपने विवाहित पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकता। ऐसा विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत एक अवैधानिक विवाह है। ऐसा करना धारा 494 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध भी है जिस के लिए ऐसा विवाह करने वाले व्यक्ति को सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने के दण्ड से दण्डित किया जा सकता है। इस धारा के अंतर्गत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है और पुलिस अन्वेषण कर के ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर सकती है। ऐसे मामले में पुलिस द्वारा रिपोर्ट दर्ज न किए जाने पर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है जिसे न्यायालय पुलिस को अन्वेषण के लिए प्रेषित कर सकता है या स्वयं भी जाँच कर के ऐसे व्यक्ति को अभियुक्त मानते हुए उस के विरुद्ध समन या गिरफ्तारी वारण्ट जारी कर सकता है। लेकिन इस मामले में आप को या पुलिस को न्यायालय के समक्ष यह प्रमाणित करना होगा कि आप के पति ने वास्तव में विधिपूर्वक दूसरा विवाह किया है इस संबंध में आप को दूसरे विवाह का प्रमाण पत्र तथा उसे जारी करने वाले अधिकारी की गवाही करानी होगी अथवा ऐसे प्रत्यक्षदर्शी गवाह प्रस्तुत करने होंगे जिन के सामने विवाह संपन्न हुआ हो।

प दो वर्ष से अपने माता पिता के साथ रह रही हैं। आप को चाहिए था कि आप अपने पति के विरुद्ध धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की प्रत्यास्थापना के लिए अथवा उस के दूसरा विवाह करने की सूचना मिल जाने पर धारा 10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत न्यायिक पृथ्थकरण के लिए आवेदन करतीं। आप अब भी इन दोनों धाराओँ में से किसी एक के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं।  आप अपने लिए और अपने बच्चों के भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन कर सकती हैं। आप इस के साथ ही महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत भी अपने लिए और अपने बच्चों के लिए भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। आप के पति ने आप के विरुद्ध तलाक का जो मुकदमा चलाया है उस मुकदमें में भी आप हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत मुकदमे पर आने जाने और वकील की फीस व मुकदमे के खर्चे और अपने व अपने बच्चों के भरण पोषण के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस धारा के अंतर्गत आप के पति से मुकदमे के लंबित रहने के दौरान उक्त राहत दिलाई जा सकती है, लेकिन यह राहत मुकदमा समाप्त होने के बाद जारी नहीं रहेगी।
प के पति ने जिस महिला के साथ दूसरा विवाह किया है वह विवाह अवैधानिक है और वह स्त्री वैध रूप से आप के पति की पत्नी नहीं है, वह किसी भी रूप में आप के पति की जायज पत्नी नहीं है। इस मामले में हो सकता है आप के पति के माता पिता ने आप के पति का सहयोग किया हो आप उन के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सकती। यदि आप के पति के माता पिता व अन्य संबंधियों ने आप के प्रति कोई क्रूरता की हो तो उन के विरुद्ध आप पुलिस में धारा 498-ए भा.दं. संहिता के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करवा सकती हैं। इसी के साथ यदि आप का कोई स्त्री धन आप के पति या उस के किसी रिश्तेदार के पास हो और वह आप को वापस नहीं लौटा रहा हो तो धारा 406 अमानत में खयानत का आरोप भी जोड़ सकती हैं। इस मामले में पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने पर आप न्यायालय में भी शिकायत कर सकती हैं। इस मामले में आप के पति के रिश्तेदारों को सजा हो सकती है।

पत्नी के साथ आपसी समझौता ही आप की समस्या का अंत कर सकता है

समस्या-

मेरी उम्र 42 वर्ष है। मेरी पत्नी द्वारा किए गए अनेक मुकदमे से मैं पूरी तरह परेशान हो चुका हूँ। मैं अपनी पत्नी कोअपने साथ रखना चाहता हूँ लेकिन वह मेरे साथ रहने को तैयार नहीं है। न ही वह मुझे तलाक देने के लिए तैयार है। मेरे ऊपर उस ने 498-क, 494 भा. दं.सं. तथा धारा 125 दं.प्र.सं.के अंतर्गत मुकदमा कर रखा है। मुझे आज मेरी माँ की मृत्यु के बाद अनु्कम्पा नियुक्ति मिली है लेकिन मैं मुकदमों के तनाव के कारण सरकारी नौकरी ठीक से नहीं कर पा रहा हूँ। मैंने कभी भी अपनी पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित नहीं किया। मैं ने दूसरा विवाह भी नहीं किया। लेकिन एक औरत पिछले नौ वर्षों से मेरे साथ रह रही है। मैं ठीक से जीवन नहीं जी पा रहा हूँ। कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बताएँ जिस से मैं मुकदमों से मुक्ति पा सकूँ और शेष जीवन तनाव रहित रीति से जी सकूँ।

-प्रशान्त वर्मा, गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश

समाधान-

प ने अपनी समस्या में यह नहीं बताया है कि आप की पत्नी ने आप के साथ रहना कब से त्याग दिया है और उक्त मुकदमें कब से आरंभ हुए हैं। लेकिन इन तथ्यों से अब कोई भी अंतर नहीं पड़ता है। आप ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि पिछले नौ वर्षों से एक महिला आप के साथ निवास कर रही है। आप ने दूसरा विवाह नहीं किया है। हो सकता है आप के उस महिला के साथ लिव-इन-रिलेशन न हों, लेकिन एक पुरुष जिस की पत्नी उस के साथ निवास नहीं कर रही है लेकिन एक अन्य महिला उस के साथ निवास कर रही है तो सामान्य समझ यही बनती है कि उन दोनों के बीच लिव-इन-रिलेशन हैं। कोई भी पत्नी अपने पति के साथ किसी दूसरी स्त्री के संबंध को स्वीकार नहीं कर पाती है तब भी जब वह दूसरी स्त्री उस के पति के साथ न रहती हो। यहाँ तो अन्य स्त्री पति के साथ निवास कर रही है ऐसी अवस्था में उसे बर्दाश्त करना संभव ही नहीं है। यही कारण है कि आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है। आप के विरुद्ध उस ने तमाम मुकदमे इसी कारण किए हैं।

प के साथ एक अन्य स्त्री निवास कर रही है। यह एक प्रधान और मजबूत कारण है जिस से आप की पत्नी को आप के साथ निवास करने से इन्कार करने का अधिकार उत्पन्न हो गया है। यदि उस ने अलग रहते हुए आप से भरण पोषण के खर्चे के लिए धारा 125 दं.प्र.सं. का मुकदमा किया है तो सही ही किया है। धारा-494 तथा 498-क के मुकदमे भी उस ने इसी लिए किए हैं। हो सकता है कि उसके इन दोनों मुकदमों में उसे सफलता प्राप्त न हो। पर उन्हें चलाने का आधार तो आप ने उस के लिए स्वयं ही उत्पन्न किया है। इस से यह स्पष्ट है कि आप की परेशानियाँ स्वयं आप की खड़ी की हुई हैं। यदि इन का आरंभ भले ही आप की इच्छा से न हुआ हो पर अब तो सब को यही लगेगा कि इन सब के लिए आप ही जिम्मेदार हैं।

प की समस्या का हल कानून और न्यायालय के पास नहीं है। आप की समस्या का हल आप की पत्नी के पास है। आप यदि अपनी समस्या का हल चाहते हैं तो इस के लिए आप को अपनी पत्नी की शरण में ही जाना पड़ेगा। किसी भी स्तर पर जा कर उस से समझौता करना पड़ेगा। यह समझौता कैसा भी हो सकता है। हो सकता है वह सहमति से तलाक के लिए तैयार हो जाए लेकिन उस के साथ आप को उसे एक मुश्त भरणपोषण भत्ता देना पड़ेगा। दूसरा हल यह है कि वह दूसरी महिला से आप के द्वारा सभी संबंध त्याग देने का वायदा करने पर आप के साथ निवास करने को तैयार हो जाए। लेकिन दूसरा हल मुझे संभव नहीं लगता है। पहला हल ही आप के मामले में सही हल हो सकता है। इसलिए आप को अपना हल तलाशने के लिए अपनी पत्नी से बात करना चाहिए। इस के लिए बीच के लोगों और काउंसलर की मदद भी आप ले सकते हैं। आप की समस्या का हल केवल आपसी समझौते से ही निकल सकता है।

'अपराध' क्या है?

किसी भी देश में यदि अपराध अधिक हों तो समझा जाएगा कि उस देश की कानून और व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है और वहाँ सामान्य जन जीवन सुरक्षित नहीं है। इस कारण से यह आवश्यक है कि अपराधों की रोकथाम के लिए देश में स्पष्ट विधि हो जिस के द्वारा यह परिभाषित हो कि क्या क्या कृत्य (कामों का किया जाना) या अकृत्य (कामों का न किया जाना) अपराध हैं। फिर यह भी आवश्यक है कि उन अपराधों के घटित होने पर उन का संज्ञान करने के लिए अधिकारी नियुक्त् किए गए हों। अपराध की सूचना प्राप्त करने का तंत्र हो, सूचना प्राप्त हो जाने पर उस के अन्वेषण (यह पता लगाने का कार्य लिए कि किस व्यक्ति ने यह अपराध किया है और उस के क्या क्या सबूत हैं? और उन्हें एकत्र करना) की पर्याप्त व्यवस्था हो। ऐसी न्याय पालिका हो जो इन अपराधों के आरोपों का विचारण कर के उस के लिए विधि द्वारा निर्धारित दंड दे सके। सभी व्यवस्थाओं में इस के लिए एक सुस्पष्ट दंड विधि और दंड प्रक्रिया की विधि का होना अनिवार्य है। भारत में दंड विधान के लिए भारतीय दंड संहिता-1860 है तथा अन्य अनेक अधिनियमों के द्वारा अनेक कृत्यों और अकृत्यों को अपराध घोषित किया गया है। इन सभी अपराधों के विचारण औरअपराधियों को विधि द्वारा निर्धारित किए गए दंड देने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता-1973 है।

ब प्रश्न है कि हम अपराध को किस तरह परिभाषित कर सकते हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा-40 में अपराध को परिभाषित किया गया है-

धारा-40 “अपराध”- इस धारा के खंड 2 और 3 में वर्णित अध्यायों और धाराओं में के सिवाय ‘अपराध’ शब्द इस संहिता द्वारा दण्डनीय की गई किसी बात का द्योतक है।

खंड-2 अध्याय 4, अध्याय 5क और निम्नलिखित धाराएँ, अर्थात् धारा 64, 65, 67, 71, 109, 110, 112, 114, 115 ,116, 117, 187, 194, 195, 203, 211, 213, 214, 221, 222, 203, 211, 213, 214, 221, 222, 223, 224, 225, 327, 328, 329, 329, 330, 331, 347, 348, 388, 389, और 445 में “अपराध” शब्द इस संहिता के अधीन या एतस्मिन पश्चात् यथापरिभाषित विशेष या स्थानीय विधि के अधीन दण्डनीय बात का द्योतक है।

खंड-3 और धारा 141, 176, 177, 201, 202, 212, 216 और 441 में “अपराध” शब्द का अर्थ उस दशा में वही है जिस में कि विशेष या स्थानीय विधि के अधीन दण्डनीय बात ऐसी विधि के अधीन छह मास या उस से अधिक अवधि के कारावास से, चाहे जुर्माने सहित हो या रहित, दण्डनीय हो।

 भारतीय दंड संहिता की उक्त खंड-3 में वर्णित उक्त धाराओं में जो कुछ कहा गया है उसे हम छोड़ दें तो हम पाते हैं कि वे कृत्य या अकृत्य “अपराध” हैं जिन्हें भारतीय दंड संहिता या किसी विशेष विधि तथा स्थानीय विधि के द्वारा दंडनीय बनाया गया है। यहाँ भारतीय दंड संहिता के अतिरिक्त अन्य सभी केन्द्रीय विधियाँ विशेष अधिनियम कही जाएंगी तथा राज्यों के लिए राज्यों द्वारा निर्मित विधियाँ स्थानीय विधियाँ कही जाएंगी। हम सामान्य रूप से “अपराध” उसे समझ सकते हैं जिसे देश या उस के किसी भी भाग में प्रचलित किसी भी विधि द्वारा दंडनीय बनाया गया हो।

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