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अमरीका की तुलना में भारत में न्याय की संभावना मात्र 10 प्रतिशत

विगत आलेख क्या हम न्यायपूर्ण समाज की स्थापना से पलायन का मार्ग नहीं तलाश रहे हैं ? पर तीन महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएँ आईँ।संगीता पुरी जी ने कहा कि ‘सजा गल्‍ती की निरंतरता को रोकने के लिए दी जाती है .. न्‍याय के क्षेत्र में होनेवाली देरी और खर्च के कारण तो उतने दिनों तनाव में रहने से तो अच्‍छा है .. एक दो बार हुए किसी की गल्‍ती को कुछ लोगों के हस्‍तक्षेप से सुलह करवाकर माफी वगैरह मांग मंगवाकर समस्‍या को हल कर लिया जाए !!’ काजल कुमार ने कहा ‘जब न्यायव्यवस्था बढ़ते मुक़दमों को नहीं निपटा पा रही है तो हमें वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचना होगा. मसलन ओम्बडसमैन व राजीनामा जैसी संस्थाओं को मज़बूत करना होगा ताकि ये न्यायालयों के स्थानापन्न का रूप ले सकें.’ उन्हों ने यह भी कहा कि ‘आज हालत ये है कि निचले न्यायालयों को एक मिनट के लिए छोड़ भी दिया जाए तो उच्च-न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय के सम्मुख अधिकांश मामले ऐसे आते हैं जिनमें कानून की व्याख्या को कोई सवाल नहीं होता किन्तु उन्हें यही जामा पहना कर पेश किया जाता है. जबकि, इन न्यायालयों को इस तरह के मुक़दमों को सरसरी नज़र में खारिज कर देना चाहिये.’ इस के अलावा ताऊ रामपुरिया जी की राय थी कि ‘असल में कानून में जो झौल है उसे खत्म करने की जरुरत है, ये मेरा अपना निजी सोच है जिससे न्यायिक प्रक्रिया उलझे नही और त्वरित न्याय मिल सके.’
संगीता जी ने जो राय रखी वह एक आम व्यक्ति की सोच है जो अपर्याप्त और न्याय प्राप्त करने के कष्टप्रद न्यायप्रणाली के प्रभाव से उत्पन्न हुई है। न्याय के क्षेत्र में केवल अपराध ही नहीं आते हैं। आज जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिस में न्याय प्राप्ति की आवश्यकता नहीं हो। वस्तुत स्थिति यह है कि देश के तमाम सक्षम लोग कानून का उल्लंघन करते हैं और सोचते हैं जो वे करेंगे वही न्यायपूर्ण है। लेकिन साधारण लोगों के पास इस अन्याय से उबरने का एक मात्र उपाय न्यायिक संस्थाओँ के पास जाना है। यदि वहाँ भी न्याय न मिले और समझौते की राह दिखाई जाए जहाँ फिर उसी अन्याय का सामना करना पड़े तो इस वैकल्पिक न्याय व्यवस्था से क्या लाभ है। सही और उचित न्याय तो वही है जो न्यायालय में सबूतों, सचाई और कानून के आधार पर प्राप्त हो। इस तरह वैकल्पिक व्यवस्थाएँ वास्तविक न्याय से पलायन करने की एक तदर्थ व्यवस्था है। अमरीका में दस लाख की आबादी के लिए 110 जज नियुक्त हैं जब कि हम भारत में केवल 11 से काम चला रहे हैं। इस तरह अमरीका की तुलना में भारत में न्याय की संभावना मात्र 10 प्रतिशत है। क्या भारत जैसा देश दस प्रतिशत न्याय से काम चला सकता है? और यह कहा जा सकता है कि हम न्याय कर रहे हैं। वैकल्पिक प्रणालियों का लाभ भी तभी मिल सकता है जब मूल न्यायिक व्यवस्था पर्याप्त हो। तब समझौते से निकाले गए हल अधिक न्यायपूर्ण हो सकेंगे। क्यों कि तब उन के पीछे सोच यह नहीं होगी कि वह न्याय की लंबी, उबाऊ, थकेलू और मारक व्यवस्था से पिंड छुड़ाने के लिए समझौता कर लेना बेहतर है।
ताऊ जी की सोच हमेशा यथार्थ होती है। उन्हों ने कानून के झोल की बात कही है। जब रस्सी पूरी तनी हुई नहीं बंधी होती है तो उस में झोल आ जाना स्वाभाविक है। आज भारतीय अदालतों के पास अमरीका की अदालतों स

क्या हम न्यायपूर्ण समाज की स्थापना से पलायन का मार्ग नहीं तलाश रहे हैं ?

म भारत में जरूरत की केवल 20 प्रतिशत अदालतों से देश में न्यायालयों की कमी ने अनेक समस्याएँ खड़ी की हैं और लगातार हो रही हैं। अदालतों की इस कमी ने सब से बड़ी समस्या खड़ी की है कि मुकदमों के निर्णय में असीमित देरी होती है जिस के कारण न्याय का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जा रहा है। कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं जिन का निर्णय जल्दी हो जाता है, कुछ ऐसे जिन का निर्णय होने की कोई समय सीमा ही नहीं है। न्यायार्थी के जीवन में यदि निर्णय हो भी जाए तो वह खुद को खुशकिस्मत समझता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.के. गांगुली ने न्यायपालिका को कम धन आंवटन पर सवाल उठाया है कि नौवीं योजना में सरकार ने न्यायिक प्रणाली के लिए सिर्फ 385 करोड़ रुपये आवंटित किए जो खर्च योजना का सिर्फ 0.071 फीसदी था। दसवीं योजना में स्थिति में आंशिक रूप से सुधार आया जब सरकार ने 700 करोड़ या खर्च योजना का 0.078 फीसदी खर्च किया। इस सवाल से स्पष्ट है कि हमारी सरकार का ध्यान न्यायव्यवस्था को आवश्यकता के अनुसार विकसित करने पर नहीं है, अपितु इसे वह अनावश्यक बोझ समझती है। वह देश और समाज में न्याय स्थापित करने के स्थान पर अन्य इतर उपायों से काम चलाना चाहती है।
ये इतर उपाय एक ओर तो लोक अदालतों में समझाइश से समझौते के माध्यम से मुकदमों का निपटारा करने के रूप में सामने आ रहे हैं, दूसरी ओर अर्ध न्यायिक संस्थानों की स्थापना कर उन्हें सीधे सरकार के अधीन कर देने के रूप में। लेकिन दोनों ही मार्ग वास्तविक न्याय से पलायन को प्रदर्शित करते हैं। हम फिलहाल लोक अदालतों और समझौतों की बात करें। लोक अदालतों में जज अपने निर्धारित स्थान से नीचे उतर कर एक हॉल में बैठता है। वहाँ पक्षकार भी समान स्तर पर बात करता है। लेकिन हमेशा कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर न्याय मांगने वाले पक्ष को समझाया जाता है कि मुकदमा लड़ने  में कोई लाभ नहीं है, बहुतेरा पैसा और समय जाया होगा, आपसी वैमनस्यता बढ़ेगी। इस लिए अपने अधिकारों को छोड़ कर वह समझौता क्यों न कर ले। पूरी नहीं तो चौथाई रोटी तो मिल ही रही है। लोक अदालत में ऐसा माहौल पैदा किया जाता है कि न्यायार्थी को लगने लगता है कि उस ने न्याय के लिए अदालत आ कर गलती कर दी। वैसी अवस्था में या तो वह अपने अधिकारों को छो़ड़ कर समझौता कर लेता है या फिर अपनी लड़ाई को छोड़ बैठता है।
लेकिन क्या एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए समझौतों और लोक अदालतों की यह प्रक्रिया उचित है? मेरी राय में नहीं। इस से हम एक न्यापूर्ण समाज की ओर नहीं जा रहे हैं, अपितु अन्याय करने वालों को एक सुविधा प्रदान कर रहे हैं। वैसी ही जैसे किसी को एक झापड़ कस दिया जाए और फिर माफी मांग ली जाए। फिर भी नाराजगी दूर न होने पर कहा जाए कि बेचारे ने माफी तो मांग ली अब क्या एक झापड़ के लिए उस की जान लोगे क्या।

न्यायिक सुधार – ऊँट के मुहँ में जीरे के समान भी नहीं



बार एंड बैंच, एक भारतीय अंग्रेजी  वेबसाइट है जो भारत में विधि और न्यायिक पत्रकारिता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने में जुटी है। इसी ने कल अपनी वेबसाइट पर भारतीय न्यायिक प्रणाली के गंभीर संकट को प्रकट करते आँकड़े जारी किए हैं। आप भी अवलोकन कीजिए कि हमारे यहाँ न्याय प्रणाली की स्थिति क्या है? ……

भारतीय न्यायालयों में लंबित मुकदमों की स्थिति का त्रिवर्षीय आकलन …
स सारणी से स्प्ष्ट है कि लंबित मुकदमों की संख्या प्रतिवर्ष 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। लंबित मुकदमों की संख्या जजों की कमी की संख्या की समानुपाती है।  इस से स्पष्ट है कि न्यायालयों की संख्या बढ़ाया जाना आवश्यक है। जरा हम यह भी देखें कि हमारे यहाँ के न्यायालयों में न्यायाधीशों के कितने पद रिक्त पड़े हैं? ……
न्यायाधीशों के स्वीकृत और रिक्त पद
च्चतम न्यायालय में रिक्त प

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की कुछ विशेष शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-101

भारत के संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को कुछ विशेष शक्तियाँ भी दी हैं। वह अनुच्छेद 71 के अंतर्गत  राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के संबंध में उत्पन्न विवाद का निपटारा कर सकता है और ऐसे मामले में उस का निर्णय अंतिम माना जाएगा। अनुच्छेद 317 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या उस के किसी सदस्य के दुराचरण का मामला  सर्वोच्च न्यायालय को निर्दिष्ट किया जाता है और सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुँचता है कि संबंधित सदस्य या अध्यक्ष को उस के पद से हटा दिया जाना चाहिए तो उसे पद से हटा दिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के पास मामला लंबित रहने के दौरान राष्ट्रपति ऐसे सदस्य को निलंबित रख सकते हैं।
र्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि को संविधान के अनुच्छेद 141 के द्वारा भारत के सभी न्यायालयों के लिए आबद्धकर घोषित किया गया है। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय को विधि के एक स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को अपने स्वयं के निर्णय को उलटने की शक्ति प्रदान की गई है। लेकिन किसी निर्णय को उलट दिए जाने तक वह निर्णय अन्य न्यायालयों पर आबद्धकर रहेगा। 
र्वोच्च न्यायालय संसद या राज्य की विधानसभाओं द्वारा निर्मित की गई विधियों को यदि वे उन की सूची के नहीं हैं तो असंवैधानिक घोषित कर सकता है। दांडिक विधि प्रशासन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपराधिक मामलों की अपीलों को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है। न्याय प्रशासन की संपूर्णता के लिए सर्वोच्च न्यायालय वह कोई डिक्री या आदेश जारी कर सकता है। वह ऐसी डिक्री और आदेशों के संबन्ध में नियम भी बना सकता है। वह किसी भी व्यक्ति को स्वयं के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-100

संविधान के अनुच्छेद 145 ने सर्वोच्च न्यायालय को न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के सामान्य विनियमन के संबंध में नियम बनाने की शक्ति प्रदान की है जिस के अंतर्गत वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति के अनुमोदन से नियम बना सकता है। इस शक्ति के अंतर्गत (1) सर्वोच्च न्यायालय अपने यहाँ विधि-व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के संबंध में, (2) अपीलें सुनने की प्रक्रिया और उन्हें ग्रहण किए जाने की अवधि के संबंध में, (3) संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों में से किसी का प्रवर्तन कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में, (4) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या आदेश के पुनार्विलोकन की शर्तों, उस की प्रक्रिया और अवधि जिसके भीतर ऐसे पुनार्विलोकन के लिए आवेदन उस न्यायालय में ग्रहण किए जाने हैं के संबंध में, (5) उस न्यायालय में अन्य कार्यवाहियों और उनके आनुषंगिक खर्चों के बारे में, तथा उस की कार्यवाहियों के संबंध में प्रभारित की जाने वाली फीसों के बारे में (6) जमानत मंजूर करने के बारे में (7) कार्यवाहियों को रोकने के बारे में (8) तुच्छ या तंग करने वाली प्रतीत होने वाली या विलंब करने के प्रयोजन से की गई अपीलों के संक्षिप्त अवधारण के लिए उपबंध करने वाले नियम बना सकता है।

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए नियमों के द्वारा किसी प्रयोजन के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या तथा एकल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शाक्तियों के सम्बंध में नियम बना सकता है।

उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) एक अंतिम न्यायिक उपाय : भारत में विधि का इतिहास-99

न दिनों यह बात चर्चा में है कि जब भोपाल त्रासदी के अभियुक्तों के विरुद्ध लगाए गए धारा 304 भाग दो दं.प्र.सं. के आरोपों को भारत का सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय से धारा 304-ए के साधारण अपराध के आरोप में परिवर्तित कर चुका था और उस के बाद उस निर्णय के पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत याचिका निरस्त कर दी गई थी तो अब क्या कोई ऐसा उपाय है जिस से उस निर्णय पर फिर से विचार किया जा सके? वास्तविकता यह है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध अपील का उपाय उपलब्ध नहीं है। यह सही भी है। आखिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय प्रदान कर देने पर कोई उपाय नहीं है। वह निर्णय अंतिम ही होना चाहिए। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में कोई दोष छूट जाने पर उस पर पुनर्विचार किया जा सकता है। लेकिन कभी अपवाद स्वरूप कोई परिस्थिति ऐसी भी उत्पन्न हो सकती है जहाँ न्याय का गला ही घुट रहा हो, या किन्हीं परिस्थितियों के कारण किसी निर्णय से विपरीत रूप से प्रभावित होने वाला किसी पक्ष की यह धारणा बन रही हो कि न्यायाधीशों ने पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर निर्णय दिया है तब कुछ तो उपाय होना चाहिए।
 
र्ष 2002 में ऐसी ही परिस्थिति का सामना भारत के सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़ा जब रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा व अन्य के मामले के साथ कुछ अन्य रिट याचिकाएँ उस के सामने प्रस्तुत हुईं। ये सभी याचिकाएँ इस न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष तब प्रेषित की गई थीं, जब उसे रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा व अन्य के मामले में एक तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा भेजा गया यह प्रश्न निर्णयार्थ उपस्थित हुआ था कि क्या किसी रिट याचिका की सुनवाई की जा कर यह न्यायालय अपने ही किसी निर्णय को शून्य और अकृत घोषित कर सकता है?
स प्रश्न पर विचार के बाद इस विस्तारित पीठ ने पाया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में न्यायालय द्वारा पुनर्विचार याचिका निरस्त कर दिए जाने के उपरांत भी उपचारात्मक याचिका प्रस्तुत की जा सकती है और उस पर विचार किया जा सकता है। इस मामले में निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि …….
यह अदालत, अपनी प्रक्रिया का दुरुपयोग और न्याय का गला घोंटे जाने से रोकने के लिए, अपनी निहित शक्ति (Inherent Power) का प्रयोग करते हुए फिर से अपने निर्णय पर विचार कर सकता है।
इस न्यायालय की निहित शक्ति के तहत एक ऐसी उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई करने के लिए क्या क्या आवश्यकताएँ हो सकती हैं? जिस से कि एक उपचारात्मक याचिका की आड़ में निहित शक्ति के अंतर्गत एक दूसरी पुनर्विचार याचिका के लिए सुप्रीम कोर्ट के द्वार न खुल जाएँ और उन की बाढ़ न आ जाए। यह एक सामान्य बात है कि बहुत ही मजबूत कारण मौजूद नहीं होने पर सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही एक आदेश पर पुनर्विचार के लिए एक उपचारात्मक याचिका स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए जब कि पुनर्विचार याचिका के निरस्त हो जाने पर निर्णय पहले ही अंतिम हो चुका हो। यह न तो उचित है और न ही संभव है कि एक एक कर के वे सभी कारण बताए जाएँ जिन के आधार पर एक उपचारात्मक याचिका को स्वीकार किया जा सकता हो।
फिर भी, हमें लगता है कि एक याचिकाकर्ता राहत के लिए हकदार हो सकता है यदि वह (1) उस प्रकरण में पक्षकार नहीं था और निर्णय उस के हितों को प्रतिकूल रीति से प्रभावित कर रहा है। यदि वह पक्षकार होता तो उसे प्रकरण की सूचना दी जाती और उसे सु

सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के लिए दंडित करने व नियम बनाने की शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-98

अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति
र्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 129 के अंतर्गत एक अभिलेख न्यायालय है। इसी कारण से इस न्यायालय को अपनी ही अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। अवमानना के लिए दंडित करने की इस शक्ति का प्रयोग केवल न्यायालय के न्याय प्रशासन के संबंध में ही किया जा सकता है, किसी न्यायाधीश के व्यक्तिगत अपमान के संबंध में इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
इस शक्ति के अधीन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही कर सकता है जो अवांछित उपायों से न्यायाधीशों को प्रभावित करने और न्याय की प्रक्रिया में प्रतिकूल प्रभाव डालने का प्रयत्न करता है। 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 121 में यह उपबंध किया गया है कि किसी भी न्यायाधीश के आचरण और निर्णय के संबंध में संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। लेकिन किसी समाचार पत्र में या अन्यथा प्रकाशित किसी आलोचनात्मक आलेख या कथन से स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रशासन के प्रति समुदाय के विश्वास को क्षति पहुँची हो या उस कथन या आलोचना से न्यायिक प्रशासन में अवरोध उत्पन्न हुआ हो तो उक्त कथन अथवा आलोचना को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। 
सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
संविधान के अनुच्छेद 145 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की यह शक्ति संसद द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है। वह केवल वे ही नियम बना सकता है जो कि संसद द्वारा नहीं बनाए गए हों। इस तरह संसद द्वारा निर्मित विधि और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में किसी भी तरह के संघर्ष की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय की अपने ही निर्णयों और आदेशों के पुनर्विलोकन की अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-97

र्वोच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 137 के अंतर्गत शक्ति प्रदान की गई है कि वह अपने ही निर्णयों और आदेशों का पुनर्विलोकन कर सकेगा। लेकिन उस की यह शक्ति संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों और संविधान के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन रहेगी।
स सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में कहा गया है कि किसी भी दीवानी मामले में पुनर्विलोकन आवेदन दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 के आधारों के अतिरिक्त आधारों पर स्वीकार नहीं किया जाएगा तथा किसी भी दांडिक मामले में अभिलेखमुख पर दृष्टिगोचर त्रुटि के अतिरिक्त आधार पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। पुनर्विलोकन हेतु कोई भी आवेदन आलोच्य निर्णय या आदेश के तीस दिनों की अवधि में ही प्रस्तुत किया जा सकेगा तथा इस में पुनर्विलोकन किए जाने के आधारों को स्पष्ट रूप से अंकित किया जाएगा। यदि स्वयं न्यायालय कोई आदेश नहीं दे देता है तो यह आवेदन निर्णय प्रदान करने वाले न्यायाधीशों को वितरित कर, बिना मौखिक बहस सुने ही निर्णीत किया जाएगा, लेकिन आवेदक चाहे तो साथ में लिखित बहस संलग्न कर सकता है। 
न्यायालय उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए पुनर्विलोकन आवेदन को निरस्त कर सकता है या विपक्षी पक्षकारों को नोटिस जारी कर सकता है। यदि किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध न्यायालय के समक्ष कोई पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत किया जाता है और न्यायालय द्वारा निर्णीत कर दिया जाता है तो उस मामले में कोई भी अन्य पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा।

सर्वोच्च न्यायालय की परामर्श प्रदान करने की अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-96

संविधान के अनुच्छेद 143 से सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने की अधिकारिता प्रदान की गई है। इस उपबंध के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति उन के समक्ष कुछ विशिष्ठ परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने के लिए निर्देश दे सकते हैं।
नुच्छेद 143 (1) में कहा गया है कि किसी भी समय जब राष्ट्रपति के सन्मुख यह प्रकट होता है कि कोई विधि या तथ्य का प्रश्न उपस्थित हो गया है या होने की संभावना है, जो जनमहत्व का है और जिस में सर्वोच्च न्यायालय का परामर्श प्राप्त किया जाना आवश्यक है तो वह ऐसे प्रश्न को सर्वोच्च न्यायालय को विचार करने और परामर्श देने के लिए संप्रेषित कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ऐसे प्रश्न पर ऐसी सुनवाई करने के उपरांत, जिसे वह उचित समझता है, राष्ट्रपति को अपने परामर्श से अवगत करा सकता है। लेकिन इस उपबंध के अंतर्गत प्रेषित किए गए प्रश्न के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय पर परामर्श  देने की बाध्यता नहीं है।
नुच्छेद 143 (2) में यह उपबंध किया गया है कि राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा कोई भी मामला परामर्श के लिए संप्रेषित कर सकते हैं जो कि अनुच्छेद 131 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता में नहीं आता। ऐसे मामले में सर्वोच्च न्यायालय ऐसी सुनवाई के उपरांत जिसे वह आवश्यक समझता है, अपना परामर्श राष्ट्रपति प्रदान करेगा। इस उपबंध के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय परामर्श देने के लिए आबद्ध है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की ऐसी राय किसी भी न्यायालय पर आबद्धकारी नहीं होगी। इस मामले में दिल्ली लॉज एक्ट और केरल एजुकेशन बिल के मामले उदाहरण हैं, जिन में सर्वोच्च न्यायालय दिए गए परामर्श को न्यायालयों द्वारा आबद्धकर नहीं माना गया था।

सर्वोच्च न्यायालय की रिटें जारी करने की अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-95

भारत के सर्वोच्च न्यायालय को उस की अपीलीय और आरंभिक अधिकारिता के अतिरिक्त संविधान में नागरिकों को प्रदत्त मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उचित कार्यवाहियाँ करने की अधिकारिता संविधान के अनुच्छेद 32 द्वारा प्रदत्त की गई है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि संविधान के खंड (3) में प्रदत्त अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उचित कार्यवाहियाँ संस्थित करने के अधिकार की गारंटी दी जाती है। इसी अनुच्छेद के दूसरे चरण में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के भाग-3 में उपबंधित अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए निर्देश और आदेश जारी करने का अधिकार है और वह बंदीप्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा में से जो भी उचित हो उसी प्रकृति की रिट जारी कर सकता है। 
नुच्छेद 32 के द्वारा मूल अधिकारों का प्रवर्तन कराने के अधिकार संविधान द्वारा जो गारंटी दी गई है उसे इस संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार के अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रकार से निलंबित नहीं किया जा सकता है।
नुच्छेद 139 के  में संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 में वर्णित प्रयोजनों से भिन्न किसी अन्य प्रयोजनों के लिए भी रिटें जारी करने की अधिकारिता प्रदान कर सकती है।