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श्रमिक वर्ग को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी

Strikeसमस्या-

हरीश शर्मा ने अलवर, राजस्थान से पूछा है-

मैं एक निजी कंपनी में पिछले छह वर्ष से काम कर रहा हूँ। कंपनी में मेरा काम अच्छा है। मै ने न्यूनतम वेतन के लिए श्रम आयुक्त के यहाँ शिकायत लगा रखी है। क्या मेरी कंपनी छंटनी के नाम पर हमें हटा सकती है या सीधे बाहर कर सकती है।

समाधान-

प की नियोजक कंपनी आप को छंटनी के नाम पर भी हटा सकती है और अन्यथा भी काम पर लेने से मना कर सकती है। यह सब कंपनी के निर्णय पर निर्भर करता है। हालांकि कंपनी के यह दोनों ही कृत्य गैर कानूनी होंगे जिन्हें अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

इस का मुख्य कारण यह है कि किसी श्रमिक को श्रम विभाग के अलावा दीवानी न्यायालय में जाने के अधिकार कम मिले हैं। जितने अधिकार हैं उन में भी सिविल न्यायालय को श्रमिक को राहत देने के सीमित अधिकार हैं। जिस के कारण इस तरह के विक्टीमाइजेशन को रोके जाने के लिए स्टे अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने में कठिनाई आती है।

श्रम विभाग और श्रम न्यायालय में किसी भी विवाद के न्याय निर्णयन में बहुत समय लगता है। राजस्थान में तो 30-30 वर्ष से अधिक के मुकदमे भी अभी श्रम न्यायालयों में अनिर्णीत हैं। इस से नियोजकों का हौंसला बढ़ता है और वे श्रमिक को अवैध रूप से भी सेवा से हटा देते हैं। मुकदमा लंबा चलने के कारण श्रमिक भी हताश हो जाता है। यही कारण है कि नियोजक निरंकुश हो गये हैं। श्रमिक अपने अधिकारों के लिए लड़ता ही नहीं है और बड़े पैमाने पर श्रमिकों का शोषण जारी रहता है।

श्रमिकों को उन के विवादों का हल एक वर्ष में मिलना चाहिए। इस के लिए श्रम न्यायालय बढाने पड़ेंगे। यह काम राजस्थान सरकार एक बड़ी लड़ाई के बिना नहीं करने वाली है। श्रमिक वर्ग को अपनी यह राजनैतिक लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी।

सेवा प्रदाता के विरुद्ध सेवा समाप्ति का विवाद श्रम विभाग में उठाएँ।

THE_INDUSTRIAL_DISPUTES_ACTसमस्या-

पंकज कुमार ने पूसा, समस्तीपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैं राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार के एक विभाग में कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर संविदा के रूप में जनवरी 2014 से काम करना शुरू किया था। विश्वविद्यालय मुझे सर्विस प्रदाता द्वारा वेतन देता था जिसका नाम VANISYSTEM P. Ltd, 16 Vidhan Sabha Marg above Andhra Bank, Lucknow (U.P.) है। जनवरी से अक्टूबर 2014 तक मेरा वेतन मिला था. उसके बाद नवंबर का वेतन विभाग द्वारा 13 दिसंबर को VANI SYSTEM के खाता पर RTGS के द्वारा भेज दिया गया। (विभाग मेरा सैलरी कंपनी को RTGS के द्वारा भेजता उसके बाद कंपनी मेरे बैंक खाता पर भेजता था) 16 दिसंबर को मैंने फ़ोन से वेतन भेजने की बात कंपनी से की तो कम्पनी का अकाउंटेंट मीनू यादव मुझे फ़ोन पर कहा की ये तुम्हारे बाप का कंपनी नहीं जो तुम कहो और मैं भेज दूँ। मैंने उनसे कहा की मैं विश्वविद्यालय के कुलपति से शिकायत करूँगा तो उन्हें इस बात का बुरा लगा। उन्होंने मुझे मेल किया कि तुम्हारा टर्मिनेशन लेटर भेज रही हूँ तुम्हारे ऑफिसर को। मैंने उनको मेल के द्वारा कहा कि अगर आप की मर्जी यही है तो मैं काम छोड़ दूंगा लेकिन आप मेरा वेतन तो दे दीजिये। लेकिन उन्होंने मेरा वेतन नहीं दिया और काम से भी हटा दिया। अब किसी लड़की को उस जगह पर रखा जा रहा है। मेरे साथ गेम खेला गया है। कंपनी बहाना बना रही है कि इस ने मुझे गाली दिया इसलिए इसको हटाया। जब कि मैंने कोई गाली नहीं दी। मुझे जो अनुबंध पत्र दिया गया था जिस में लिखा हुआ है की विभाग से शिकायत मिलने पर बिना सूचना के हटा दिया जाएग़I परन्तु विभाग से कोई शिकायत नहीं गया है। मैं बहुत गरीब और बाल बच्चेदार हूँ मेरी पारिवारिक स्थिति काफी ख़राब है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूँ जिस से मुझे वही काम भी मिल जाये और वेतन भी मिल जाये। मैं बहुत तनाव में हूँ और लगता है कि गरीबी से तंग आकर मैं कोई गलत काम ना कर बैठूँ। कृपया मेरी मदद करें।

समाधान-

प को यह साफ समझ लेना चाहिए कि आप किसी भी तरह से विश्वविद्यालय के कर्मचारी नहीं थे। विश्वविद्यालय तो सेवा प्रदाता से सेवाएँ प्राप्त करता है जिस के लिए वह सेवा प्रदाता को उन की आपसी संविदा के आधार पर भुगतान करता है। आप का नियोजक सेवा प्रदाता था, वह आप को वेतन का भुगतान करता था तथा आप के नियोजक की ओर से प्रदान की गई सेवाओँ के अन्तर्गत आप विश्वविद्यालय में काम करते थे। आप का विश्वविद्यालय से और कोई लेना देना नहीं था।

प गरीब हैं इस से किसी को कोई लेना देना नहीं है। विश्वविद्यालय यदि खुद कर्मचारी रखता है तो उन्हें वेतनमान में वेतन देना होता है, ऐसे कर्मचारियों को संविधान के अन्तर्गत सुरक्षा प्राप्त होती है तथा अनेक सुविधाएँ देनी होती हैं जो विश्वविद्यालय को बहुत महंगी पड़ती हैं। इतना बजट सरकार उन्हें उपलब्ध नहीं कराती, न ही स्थाई पद उपलब्ध कराती है। वैसी स्थिति में किसी सेवा प्रदाता से इस तरह सेवाएँ प्राप्त करना उन्हें बहुत सस्ता पड़ता है।

प सेवा प्रदाता के कर्मचारी थे। विश्वविद्यालय और आप के सेवा प्रदाता दोनों के कार्य उद्योग के रूप में परिभाषित हैं। इस कारण आप के सेवा प्रदाता को आप को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 एफ की पालना में सेवा से पृथक करने के पूर्व नोटिस या नोटिस वेतन देना चाहिए था तथा मुआवजा भी देना चाहिए था। आप से कनिष्ट कर्मचारी भी आप के सेवा प्रदाता के यहाँ काम कर रहे होंगे। उन्हें सेवा में रखते हुए आप को सेवा से पृथक किया गया है इस तरह धारा 25 जी की भी पालना नहीं हुई है। आप को हटा कर एक नए कर्मचारी को नियोजन दे दिया गया है इस तरह धारा 25 एच की पालना भी नहीं हुई है।

स तरह आप की सेवा समाप्ति आप की छंटनी है जो धारा 25 एफ व जी की अनुपालना के अभाव में अवैध है। साधारणतया आप पिछले पूरे वेतन सहित पुनः सेवा प्रदाता की सेवा में लिए जाने के अधिकारी हैं। 25 एच की पालना न करने के कारण भी आप सेवा में लिए जाने के अधिकारी हैं। इस के लिए आप को स्थानीय श्रम विभाग में अपना विवाद उठाना चाहिए। श्रम विभाग के समझौता अधिकारी आप और आप के सेवा प्रदाता के बीच तुरन्त समझौता वार्ता आरंभ कराएंगे और आप को पुनः सेवा में रखवाने का प्रयास करेंगे। समझौता वार्ता का 45 दिन में कोई परिणाम न निकलने अथवा असफल रहने पर आप सीधे श्रम न्यायालय में अपना विवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के साथ ही बकाया वेतन के लिए भी आप को वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत अपना दावा प्राधिकारी वेतन भुगतान अधिनियम के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

स तरह के विवादों का निर्णय होने में कई वर्ष लग जाते हैं क्यों कि हमारे यहाँ श्रम न्यायालय जरूरत से बहुत कम हैं। श्रम न्यायालय के निर्णय के बाद भी पुनः नौकरी प्राप्त करना इतना आसान नहीं होता। इस कारण आप को अपना जीवन यापन करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। आप अपना विवाद उठाइए और अवश्य लड़िये। एक नौकरी चले जाने से जीवन हार जाना ठीक बात नहीं है। जीवन सदैव अनमोल है, चाहे कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो। कभी कभी ऐसा भी होता है कि ऐसी टटपूंजिया नौकरी छूटने पर प्रयास करने पर व्यक्ति अच्छे अवसर प्राप्त कर लेता है या किसी अच्छे धंधे या प्रोफेशन में चला जाता है और कुछ ही वर्षों में यह टटपूंजिया नौकरी बेकार लगने लगती है।

मजदूरों के लिए कोई न्याय नहीं…

unity400समस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने हनुमानगढ़, राजस्थान से अपनी उत्तराखंड की समस्या भेजी है कि-

कील कोर्ट केस को रसूखदार लोगों (सीएमडी फैक्ट्री) के साथ मिल कर कमजोर कर दे या खुर्द-बुर्द कर दे या केस को लंबा खिंचाता जाए। फिर केस दूसरे राज्य में चल रहा हो तो गरीब आदमी जो एक केस से विक्टिम है दूसरी समस्याओं से कैसे निपटेगा। औद्योगिक विवाद का मामला है कुछ सलाह दें।

समाधान-

प ने अपने मुकदमों के बारे में कोई विवरण नहीं दिया है। जिस से उन का हल प्रस्तुत कर सकना तो संभव नहीं है। लेकिन आप ने अपने वकील पर विपक्षी से मिल कर मुकदमे में देरी करने, कमजोर करने और खुर्दबुर्द करने के आरोप लगाए हैं। आप ने अपने वकील पर जो संदेह व्यक्त किए हैं उन का आधार ठोस सबूत हैं या यह मुकदमे में देरी होने और वकील द्वारा उस के कमजोर होते जाने का उल्लेख करने के आधार पर ही कहा जा रहा है यह स्पष्ट नहीं है। किसी भी वकील पर केवल अनुमान के आधार पर कोई आरोप लगाया जाना उचित नहीं है। यदि आप वकील पर लगाए गए आरोपों को साबित कर सकते हैं तो फिर आप को उस की शिकायत बार कौंसिल को करनी चाहिए जिस से आप के वकील को ऐसा दुराचरण करने का दंड मिले।

लेकिन पूरे देश में श्रम न्यायालयों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों की दशा बहुत खराब है। वहाँ बरसों तक जज नियुक्त नहीं किए जाते। पर्याप्त अदालतें न होने से अदालतों में मुकदमों का अम्बार लगा है। एक-एक पेशी छह छह माह में पड़ती है। ऐसी स्थिति में मुकदमे में देरी के लिए वकील नहीं बल्कि राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं जो पर्याप्त मात्रा में अदालतें स्थापित नहीं करतीं और स्थापित अदालतों में समय से जज नियुक्त नहीं करती। नई अदालतों की स्थापना और समय से जजों की नियुक्ति के लिए श्रमिक यूनियनों की ओर से कोई दबाव नहीं है, कोई आंदोलन नहीं है। इस नतीजा ये हुआ है कि औद्योगिक विवादों का निर्णय करने वाली ये अदालतें अब श्रमिकों को न्याय प्रदान नहीं कर रही हैं। उन का काम सिर्फ इतना रह गया है कि वह प्रबंधन के फैसलों के शिकार मजदूरों को अदालती प्रक्रिया में बरसों तक उलझाए रखे। तब तक या तो मजदूर मजबूर हो कर खुद ही अदालत का मैदान छोड़ भागे या फिर मर खप जाए।

द्योगों और उन को चलाने वाली कंपनियों की उम्र सीमित होती है। उदयोग या तो बाजार या पिछड़ती टेक्नोलोजी का शिकार हो कर बंद हो जाते हैं कंपनियाँ खुद को घाटे बता कर खुद बीमार हो कर इलाज के लिए बीआईएफआर के पास चली जाती हैं। कंपनियों के ऐसेट्स खुर्द बुर्द कर दिए जाते हैं। जो नहीं किए जाते वे बैंकों के कर्ज चुकाने को भी पर्याप्त नहीं होते। बैंकों का उधार सीक्योर्ड होता है इस कारण संपत्ति से कर्जा वसूलने का अधिकार उन का पहला है। स्थिति यहाँ पहुंच जाती है कि कोई मजदूर मैदान में डटा रह कर मुकदमा जीत भी ले तो आगे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लटका दिया जाता है। वहाँ से भी उस के जीवनकाल में कोई निर्णय हो जाए तो वह अपना पैसा वसूल करने की स्थिति में नहीं होता। क्यों कि तब तक कंपनी के पास कुछ नहीं रहता सब कुछ पर बैंक कब्जा कर लेते हैं।

जदूरों के लिए इस देश में फिलहाल कोई न्याय नहीं है। यह बात मजदूरों को समझनी होगी। वे अपने लिए न्याय व्यवस्था की मांग को ले कर सामुहिक रूप से लड़ेंगे नहीं तब तक सरकारें कंपनियों और उद्योगपतियों को कोई कष्ट पहुँचे ऐसा काम नहीं करेंगी। मौजूदा व्यवस्था में जब तक मजदूर संगठित रहते हैं और सरकारों पर राजनैतिक दबाव बनाने की स्थिति में होते हैं तब तक ही कानून, सरकारें और अदालतें उन के लिए कुछ राहत प्रदान करने वाली बनी रहती हैं। जैसे ही आंदोलन कमजोर होता है ये थोड़ा बहुत न्याय भी कपूर की भांति उड़ जाता है।

सेवा समाप्ति की अवैधानिकता को चुनौती दें।

Terminationसमस्या-
ऋषिकेश ने जयपुर राजस्थान से पूछा है-

मैं जयपुर के एक निजी विश्वविद्यालय में पिछले 3 वर्ष से कार्यरत था लेकिन डिपार्टमेंटल द्वेषतावश मुझे लगभग एक माह पूर्व टर्मिनेट कर दिया गया।  टर्मिनेट का कोई ठोस प्रमाण उनके पास नहीं है।
क्या इस परिस्थिति में कोर्ट मुझे लेबर कोर्ट अधिनियम के तहत क्लेम दिल सकती है और अगर दिला सकती है तो लगभग कितना?

समाधान-

प की समस्या स्पष्ट नहीं है आप को स्पष्ट करना चाहिए था कि आप किस पद पर कार्य करते थे  और आप को किस प्रकार सेवामुक्त किया गया है। टर्मिनेट का सबूत उन के पास नहीं है, वाक्य से कुछ भी स्पष्ट नहीं होता है।

श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण में केवल कर्मकारों के ही विवादों का हल हो सकता है। अध्यापक कर्मकार नहीं होते। यदि आप अध्यापक हैं तो आप को वहाँ कोई राहत नहीं मिल सकेगी। लेकिन आप अन्य स्टाफ हैं और प्रबंधकीय व सुपरवाइजरी कार्य नहीं करते थे तो आप कर्मकार हैं और श्रम कानून के अन्तर्गत कार्यवाही कर सकते हैं।

प को गलत रूप से सेवा से पृथक किया गया है तो आप को सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए सेवा से पृथक करने का विवाद उठाना चाहिए और पुनः सेवा में लिए जाने व पिछले संपूर्ण वेतन व अन्य लाभों की मांग करनी चाहिए। आप जयपुर में श्री सुरेश कश्यप एडवोकेट इस मामले में आप की मदद कर सकते हैं। आप उन से 9460142114 नंबर पर संपर्क कर के समय ले कर मिल सकते हैं।

केंटोनमेंट बोर्ड एक स्थानीय निकाय और उद्योग है।

समस्या-

प्रशान्त चौहान, ने महू, जिला इन्दौर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मैं केन्टोंमेंट बोर्ड, महू केंट में विगत १९९९ से कनिष्ठ लिपिक पद पर कार्यरत हूँ।  विगत वर्ष नवम्बर २०११ में मेरी हर्निया सर्जरी केंद्रीय चिकित्सा परिचर्या नियम अंतर्गत पालन करते हुए सम्पादित की गई थी।   जिसका वास्तविक चिकित्सा व्यय लगभग १९५००/- के भुगतान हेतु मैं ने  निर्धारित चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा प्रपत्र में योग्य संलग्नको के साथ विगत फरवरी २०१२ को कार्यालय में जमा कराया।  महीनों तक कोई कार्यवाही न होने पर मैं ने इस दौरान स्मरण पत्र भी कार्यालय को दिए।  एक दिन अचानक विगत सितम्बर २०१२ में कार्यालय द्वारा मेरा दावा तकनीकी कारण दर्शाते हुए निरस्त कर दिया गया।  मैं ने उक्त निरस्त दावे की अपील हमारे वरिष्ठ कार्यालय मध्य कमान, लखनऊ को विगत माह अक्तूबर २०१२ में प्रेषित कर दी। वहां से तत्काल मेरे प्रकरण में अपील का बिन्दुवार प्रतिउत्तर प्रेषित किये जाने हेतु महू कार्यालय को पत्र माय अपील भेजा गया। किन्तु कार्यालय द्वारा आज दिनांक तक उसका प्रतिउत्तर वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को प्रेषित नहीं किया गया है।  इस सम्बन्ध में मेरे प्रकरण हेतु मैने माह दिसंबर में वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को स्मरण पत्र भी प्रेषित किया है।

ब मैं यह विधिक सलाह चाहता हूँ कि आगामी पंद्रह दिन और मैं वरिष्ठ कार्यालय की कार्यवाही या मुझे सम्बंधित सुचना प्राप्ति का इंतज़ार कर लेता हूँ, तत्पश्चात सक्षम न्यायलय में परिवाद दायर करता हूँ। कृपया सलाह देवें की क्या मैं उपभोक्ता फोरम, इंदौर में अपने चिकित्सा दावा व्यय क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में वाद दायर कर सकता हूँ?  या यह प्रकरण कर्मचारी-नियोक्ता से सम्बंधित होने के कारण वहां दायर नहीं किया जा सकता है?  अतः इस हेतु किस सक्षम न्यायलय में वाद दायर किया जाना उचित होगा जहाँ न्यूनतम व्यय में त्वरित न्याय प्राप्ति हो सके।  चूँकि मैं एक नौकरीपेशा कर्मचारी हूँ अतः यह बात ध्यान में रखते हुए कृपया उक्त विधिक सलाह प्रदान करें।

समाधान-

malicious prosecutionकेंटोनमेंट बोर्ड, एक तरह का स्थानीय निकाय है जो नगर निगम, ग्राम पंचायत आदि की तरह है। इस बोर्ड का भी उसी तरह एक प्रशानिक क्षेत्र होता है, जिस पर सेना का नियंत्रण रहता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2 की उपधारा (ए) में इस के लिए केन्द्र सरकार को समुचित सरकार बताया गया है। इस से यह स्पष्ट है कि यह औद्योगिक विवाद अधिनियम में परिभाषित उद्योग की श्रेणी में भी है। यदि इस अधिनियम में आप कर्मकार के रूप में परिभाषित हैं तो आप के संबंध में औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

द्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 की उपधारा (के) में ओद्योगिक विवाद को परिभाषित किया गया है। इस के अनुसार नियोजको और कर्मचारियों के मध्य नियोजन, अनियोजन, कर्मचारियों की नियोजन की स्थितियों व शर्तों के संबंध में कोई भी विवाद या मतभेद औद्योगिक विवाद है। लेकिन एक कर्मचारी द्वारा उस के किसी मामले में उठाया गया विवाद औद्योगिक विवाद नहीं हो सकता। वह ओद्योगिक विवाद का रूप उसी स्थिति में धारण करता है जब कि उसे कर्मचारियों के किसी समूह या उन की ट्रेड यूनियन द्वारा समर्थित हो। लेकिन धारा 2-ए में किसी कर्मकार और उस के नियोजक के मध्य, सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को किसी कर्मचारी अथवा ट्रेड युनियन के समर्थन के बिना भी औद्योगिक विवाद माना गया है।  जिस का अर्थ यही है कि अकेला कर्मचारी केवल उस की सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को तो समाधान के लिए औद्योगिक विवाद के रूप में प्रस्तुत कर सकता है किन्तु उस के अन्य विवाद इस अधिनियम में औद्योगिक विवाद के रूप में बिना कर्मचारियो के समूह या यूनियन के समर्थन के बिना औद्योगिक विवाद नहीं होंगे जिस से उन्हें व्यक्तिगत रूप से उठाने का कर्मचारी को कोई अधिकार नहीं है।

प का विवाद आप के चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के निरस्त होने से संबंधित है। यदि इसे किसी कर्मकार समूह या यूनियन का समर्थन प्राप्त नहीं है तो यह भी एक औद्योगिक विवाद नहीं है और आप इसे अधिकार के रूप में समाधान हेतु औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित समझौता कार्यवाही के लिए प्रस्तुत नहीं कर सकते और इस का समाधान औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित प्रक्रिया से नहीं हो सकता। यदि आप के मामले को किसी यूनियन या कर्मकारों के समूह का समर्थन प्राप्त नहीं है तो आप इस मामले में औद्योगिक विवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।

किन्तु केंटोनमेंट बोर्ड के कर्मचारियों की सेवाएँ और सेवा शर्तें वैधानिक नियमों से शासित होती हैं। जिस के कारण उन के अंतर्गत उत्पन्न अधिकारों या उन नियमों के उल्लंघन से अधिकारों में कमी होने के मामले दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। आप के मामले में आप दीवानी वाद प्रस्तुत कर उक्त चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के नियम विरुद्ध निरस्त किए जाने की घोषणा और चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के अनुरूप राशि दिलाने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। दीवानी न्यायालय आप को राहत प्रदान कर सकता है। इस के साथ ही आप इस मामले में केंटोनमेंट बोर्ड के राज्य के रूप में परिभाषित होने के कारण रिट याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

न दोनों ही उपायों के लिए आप को किसी वकील की मदद लेनी पड़ेगी जिस में कुछ तो खर्च होगा ही क्यों कि जो वकील मुकदमा लड़ेगा अपनी फीस तो लेगा ही। जहाँ तक शीघ्र न्याय का प्रश्न है तो भारत में ऐसे न्यायालय उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जिन के पास उस की क्षमता से पाँच से दस गुना मुकदमे न हों।  उच्च न्यायालयों में तो मुकदमों का अंबार है। दीवानी न्यायालयों के पास भी काम की कमी नहीं है। इस कारण आप के मुकदमें के निर्णय में कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

बोनस का समझौता केवल एक वर्ष का ही हो सकता है …

समस्या-

खरगौन, मध्यप्रदेश से हरि यादव पूछते हैं –

 कारखाने में अगर मजदूरों को बोनस जो कि 15 सालों से एक जैसा दिया जा रहा है तो क्या बोनस की बढ़ोतरी को लेकर की गई अहिंसात्मक शांतिपूर्ण ह्ड़ताल सही है।  हमारे समझौते की अवधि अगस्त 2012 में समाप्त हो चुकी है।  हमें 15 सालों से 3000/- रुपए से से भी कम बोनस दिया जाता रहा है।  इस दीपावली पर बोनस बढ़ोतरी की माँग की तो कंपनी ने कहा कि आपके समझौते में बोनस तीन हज़ार है जो 5 सालों का है और इस साल भी समझौते के अनुसार 3000/- हज़ार ही मिलेगा। जब कि समझौते की अवधि 2007-2012 है।  इसके बाद मजदूरों ने बोनस वृद्धि लिए ह्ड़ताल कर दी।   पहले हमने हड़ताल की सूचना दी जिसे कंपनी ने नहीं लिया।  हमें क़ानूनी सलाह दीजिए कि क्या मजदूर सही है?

 समाधान-

बोनस कानून के अंतर्गत बोनस कम से कम 8.33 प्रतिशत और अधिक से अधिक 20 प्रतिशत दिया जा सकता है। इस का अर्थ यह है कि किसी मजदूर ने वर्ष भर में मूल वेतन और महंगाई भत्ते की जितनी राशि अर्जित की है उस का 8.33 से 20 प्रतिशत तक बोनस मजदूर प्राप्त कर सकता है। हर वर्ष मजदूरों की वेतन वृद्धि होती है, महंगाई भी बढ़ती है और आम तौर पर हर तीन वर्ष में वेतन पुनरीक्षण भी हो जाता है। इसलिए बोनस की राशि में तो अंतर आना चाहिए। ऐसा संभव नहीं है कि पिछले 15 वर्ष से 3000/- रुपए या उस के आसपास ही बोनस मिल रहा हो।  बोनस का आधार पिछले वर्ष की कारखाने की बैलेस शीट पर निर्भर करता है।  बैलेंस शीट केवल पिछले वर्ष की हो सकती है। आगामी वर्ष की नहीं। इस कारण बोनस का समझौता पिछले एक वर्ष की अवधि के लिए ही हो सकता है, इस से अधिक का नहीं। बोनस का कोई भी समझौता 5 वर्ष का नहीं हो सकता।

 आप ने यह कहा है कि मजदूरों ने नोटिस दिया था जिसे प्रबंधक ने नहीं लिया। इस का अर्थ यह है कि आप के कारखाने में या तो मजदूरों की कोई यूनियन है जिस ने नोटिस दिया होगा। यदि यूनियन नहीं है तो कारखाने के बहुसंख्यक मजदूरों की आमसभा में आठ-दस मजदूरों की कमेटी बनाई गई होगी और उस ने नोटिस दिया होगा।  यह कहना भी उचित नहीं है कि प्रबंधक ने नोटिस नहीं लिया। यदि प्रबंधक ने नोटिस नहीं लिया है तो नोटिस रजिस्टर्ड डाक से उसे भेजा जा सकता था। यदि वह नहीं ले कर डाक को वापस कर देता तो भी यही माना जाता कि नोटिस दे दिया गया था। एक रीति और है कि यूनियन श्रम विभाग को नोटिस देती जिसे श्रम विभाग प्रबंधन को भेज देता।

मारा अनुमान है कि आप के कारखाने में मजदूरों की यूनियन और प्रबंधन के बीच पाँच वर्ष का वेतन पुनरीक्षण का समझौता हुआ होगा और उस की अवधि पाँच वर्ष की रही होगी। अवधि समाप्त हो जाने के कारण फिर से वेतन पुनरीक्षण की मांग उठाई गई होगी। चूँकि वार्षिक बोनस का समय भी है इस कारण से बोनस की मांग भी उसी मांग पत्र में सम्मिलित कर दी गई होगी।  इसी कारण से आप इसे बोनस का ही विवाद समझ रहे हैं।

 हमें लगता है आप अपनी समस्या को ठीक से समझ नहीं सके हैं और इस कारण से यहाँ ठीक से हमें भी नहीं बता पा रहे हैं।  आप को चाहिए कि आप मजदूरों की यूनियन के नेता से पूरी जानकारी हासिल करें कि वास्तविक समस्या क्या है।  यदि यूनियन को कोई समस्या है तो आप यूनियन के अध्यक्ष या मंत्री को कहें कि वे उचित कानूनी सहायता प्राप्त करें और जो कुछ भी हो चुका है उसे दुरुस्त करने का प्रयत्न करें।

औद्योगिक नियोजक और श्रमिक/कर्मकार

म संक्षेप में औद्योगिक विवाद अधिनियम और उस में परिभाषित ‘उद्योग’ शब्द के बारे में बात कर चुके हैं। हम यह जानने की और आगे बढ़ें कि औद्योगिक विवाद क्या हैं इस से पहले हमें ‘नियोजक’ और ‘श्रमिक’ शब्दों के बारे में जानना आवश्यक है। नियोजक को इस अधिनियम में निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

(g) “Employer” means-

 (i) In relation to any industry carried on by or under the authority of any department of the Central Government or a State Government, the authority prescribed in this behalf, or where no authority is prescribed, the head of the department;

 (ii) In relation to an industry carried on by or on behalf of a local authority, the chief executive officer of that authority;

नियोजक का अर्थ-

(i) केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार द्वारा अथवा उन के किसी विभाग की प्राधिकारिता के अंतर्गत संचालित उद्योग के लिए इस संबंध में विहित प्राधिकारी और जहाँ कोई प्राधिकारी विहित नहीं किया गया हो वहाँ उस विभाग का प्रधान;

(ii) स्थानीय प्राधिकरण द्वारा और उन के लिए संचालित किसी उद्योग के संबंध में उस स्थानीय प्राधिकरण का मुख्य कार्यकारी अधिकारी है।

 इस प्रकार हम देखते हैं कि नियोजक शब्द की परिभाषा निदर्शी है न कि संपूर्ण। यहाँ केन्द्र व राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकारणों द्वारा या उन के लिए संचालित उद्योगों  के लिए तो नियोजक को परिभाषित किया गया है लेकिन अन्य उद्योगों के लिए नहीं। इस का सामान्य अर्थ यही है कि अन्य उद्योगों के लिए नियोजक का निर्धारण करने के लिए हमें नियोजक शब्द के शब्दकोषीय अर्थ को ही मानना होगा। जिस के अनुसार किसी व्यक्ति के लिए नियोजक वही होगा जो उसे नियोजन में नियुक्त करता है, वेतन आदि का भुगतान करता है। जैसे किसी एकल स्वामित्व वाले उद्योग के लिए नियोजक उस उद्योग का स्वामी होगा। यदि उद्योग भागीदारी फर्म द्वारा संचालित किया जा रहा है तो उस के भागीदार नियोजक होंगे और उद्योग किसी जोइंट स्टॉक कंपनी द्वारा संचालित किया जा रहा है तो उस का निदेशक मंडल उस के कर्मचारियों का नियोजक होगा।

इस अधिनियम में ‘श्रमिक’ अथवा ‘कर्मकार’ शब्द को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

(s) “Workman” means any person (including an apprentice) employed in any industry to do any manual, unskilled, skilled, technical, operational, clerical or supervisory work for hire or reward, whether the terms of employment be express or implied, and for the purposes of any proceeding under this Act in relation to an industrial dispute, includes any such person who has been dismissed, discharged or retrenched in connection with, or as a consequence of, that dispute, or whose dismissal, discharge or retrenchment has led to that dispute, but does not include any such person-

 (i) Who is subject to the Air Force Act, 1950 (45of l950),or the Army Act, 1950 (46 of 1950), or the Navy Act, 1957 (62 of 1957); or

 (ii) Who is employed in the police service or as an officer or other employee of a prison; or

 (iii) Who is employed mainly in a managerial or administrative capacity; or

 (iv) Who, being employed in a supervisory capacity, draws wages exceeding ten thousand rupees per mensem or exercises, either by the nature of the duties attached to the office or by reason of the powers vested in him, functions mainly of a managerial nature.

‘श्रमिक’ या ‘कर्मकार’ का अर्थ है किसी भी उद्योग में वेतन या इनाम के लिए शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, या पर्यवेक्षीय कार्य करने हेतु नियोजित कोई व्यक्ति (जिस में एक प्रशिक्षु भी सम्मिलित है), जिस के नियोजन की शर्तें व्यक्त या निहित हों सकती हैं, और इस अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के संबंध में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित हैं और उस औद्योगिक  विवाद के कारण सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी कर दिया गया है या उसे सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी किए जाने से उत्पन्न हुआ है, लेकिन उस में निम्न लिखित सम्मिलित नहीं है-

 (i)  जो वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45oवाँ, या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46वाँ), या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का62वां) के अधीन है, या

(ii) जो पुलिस सेवा में या जेल के एक कर्मचारी या अधिकारी के रूप में कार्यरत है, या

(iii) जो मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय या प्रशासनिक क्षमता में कार्यरत है, या

(iv) जो पर्यवेक्षीय क्षमता में नियोजित है और दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक मजदूरी प्राप्त करता है, या कार्यालय से जुड़ी कर्तव्यों की प्रकृति द्वारा या उस में निहित शक्तियों के कारण, मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय प्रकृति के कार्य के लिए नियोजित है।

 

र्मकार की परिभाषा में आप यहाँ देख सकते हैं कि यह निदर्शी होने के स्थान पर संपूर्ण है। लेकिन इस तरह की परिभाषा अक्सर ही पक्षकारों के बीच विवाद उत्पन्न करती है जिस की व्याख्या न्यायालयों द्वारा की जाती है। किसी भी औद्योगिक विवाद में अक्सर ही यह आपत्ति नियोजक द्वारा उठाई जाती है कि उस औद्योगिक विवाद से संबंधित व्यक्ति अधिनियम में परिभाषित कर्मकार नहीं है। ऐसी आपत्ति का निराकरण साक्ष्य और उक्त परिभाषा की व्याख्या के आधार पर ही किया जा सकता है। परिभाषा की व्याख्या सदैव ही एक विधिक विवाद-बिंदु होता है और जिस के लिए रिट याचिका आसानी से अनुमत हो जाती है। इसी आधार को ले कर अक्सर नियोजक किसी भी औद्योगिक विवाद को सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाते हैं और समय निकालते हैं। एक साधारण कर्मकार में इतनी क्षमता नहीं होती है कि वह सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमे को लड़ सके। वह अपनी लड़ाई को बीच में छोड़ देता है। न्याय से वंचित होने पर उस में संपूर्ण व्यवस्था के प्रति रोष और वितृष्णा उत्पन्न होती है जो जीवन भर उस के साथ तो रहती ही है। उस का परिवार भी यह धारणा बना लेता है कि इस व्यवस्था में कमजोर लोगों के लिए कोई न्याय नहीं है।

अगले शनिवार हम ‘कर्मकार’ शब्द की की गई व्याख्याओं की चर्चा करेंगे।

औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 क्या है ?

ज जब किसी उद्योग के कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया जाए, उसे उस की नौकरी का लाभ न दिया जाए, या कर्मचारी अपनी सेवा शर्तों को गैरवाजिब मान कर हड़ताल कर दें या फिर स्वयं उद्योग के प्रबंधक ही उद्योग में तालाबंदी, छंटनी या ले-ऑफ कर दें तो हमें तुरंत औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की याद आती है। मौजूदा औद्योगिक विवाद अधिनियम आजादी के तुरंत पहले 1 अप्रेल 1947 को अस्तित्व में आया था। इस के लिए केन्द्रीय असेम्बली में विधेयक 8 अक्टूबर 1946 को प्रस्तुत हुआ था तथा दिनांक 31 मार्च 1947 को पारित कर दिया गया था। तब से अब तक 1956, 1964, 1965, 1971, 1972, 1976, 1982, 1984,1996 तथा 2010 में इस अधिनियम में संशोधन किए गये हैं। इस के अतिरिक्त अन्य विधेयकों के द्वारा भी इस में 28 बार संशोधित किया गया है। इस तरह इस अधिनियम को कुल 38 बार संशोधित किया गया है।

ब्रिटिश भारत में सर्वप्रथम 1929 में ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल लाया गया था। इस बिल के द्वारा जनउपयोगिता के उद्य़ोगों में हड़ताल और तालाबंदी को प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन उन औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए कोई विकल्प प्रदान नहीं किया गया था और इसे दमनकारी माना गया था। युद्ध के दौरान इस अधिनियम के इस अभाव को दूर करने के लिए डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के नियम 81-ए में प्रावधान किया गया था कि केन्द्र सरकार किसी भी ओद्योगिक विवाद को न्यायाधिकरण को सौंप सकती है और उस के द्वारा प्रदान किए गए अधिनिर्णय को लागू करवा सकती है। ये नियम युद्ध की समाप्ति के साथ ही दिनाक 1 अक्टूबर 1946 को समाप्त हो गये लेकिन नियम 81-ए को इमर्जेंसी पावर्स (कंटीन्यूएंस) ऑर्डीनेंस 1946 से इसे जारी रखा गया। इसी ऑरडीनेंस के स्थान पर बाद में औद्योगिक विवाद अधिनियम अस्तित्व में आया।

द्योगिक विवादों का अन्वेषण तथा उन का समाधान करना औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 का प्रमुख उद्देश्य है। इस अधिनियम के अंतर्गत दो तरह की संस्थाएँ बनाई गईं। बड़े उद्योगों में जहाँ 100 या उस से अधिक श्रमिक नियोजित हों श्रमिकों और नियोजकों के प्रतिनिधियों की संयुक्त वर्क्स कमेटी बनाने का उपबंध किया गया। वहीं औद्योगिक विवादों के समाधान केलिए समझौता अधिकारियों की नियुक्ति और बोर्डों का गठन करने के उपबंध किये गए। समझौता संपन्न न होने पर औद्योगिक विवादों के न्याय निर्णयन के लिए श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण की व्यवस्था की गई तथा हड़तालों व तालाबंदियों को रोकने के लिए भी उपबंध किए गए हैं।

ब तक आप यह सोचने लगे होंगे कि ये औद्योगिक विवाद क्या हैं? इस का समाधान कैसे संभव होता है? क्या किसी एक श्रमिक के साथ उस के नियोजक द्वारा की गई हर नाइंसाफी का कोई इलाज इस अधिनियम में है? यदि नहीं तो फिर उन के लिए क्या मार्ग हैं? ऐसे ही अनेक और भी प्रश्न आपके जेहन में उभर रहे होंगे। हम तीसरा खंबा पर सप्ताह में एक बार इन्ही प्रश्नों से रूबरू होने का प्रयत्न करेंगे। संभवतः प्रत्येक शनिवार को। औद्योगिक विवादों की जानकारी में लेने वाले पाठक हर शनिवार को इस की प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि इस कानून से संबंधित कोई भी जिज्ञासा किसी पाठक को हो तो वह अपने प्रश्न हमें टिप्पणियों के माध्यम से रख सकता है। हर जिज्ञासा का उत्तर देने का प्रयत्न किया जाएगा।

औद्योगिक विवाद को स्थानान्तरित करवाने के लिए रिट याचिका प्रस्तुत की जा सकती है

सभी पाठकों और मित्रों का विधि और न्याय प्रणाली पर प्रथम हिन्दी जालस्थल तीसरा खंबा पर स्वागत है

सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ !

नया वर्ष सभी के लिए नयी खुशियाँ लाए !!

समस्या-

मैं एक समाचार पत्र में सीनियर एकजीक्यूटिव के पद पर सेवारत हूँ। मेरा कार्य विज्ञापन विभाग में आने वाले विज्ञापन आदेशों को प्राप्त करना आदि है। मुख्यतः मेरा काम लिपिकीय है। मुझे मेरी ट्रेड यूनियन गतिविधियों के कारण मेरे नियोजक ने मेरठ से पटना स्थानान्तरित कर दिया है। इस का विवाद मेरी यूनियन ने श्रम विभाग उत्तर प्रदेश के मेरठ कार्यालय में उठाया था। समझौता कार्यवाही असफल हो जाने पर रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रेषित की गई थी। इस पर राज्य सरकार ने मेरे स्थानान्तरण का विवाद श्रम न्यायालय लखनऊ को न्याय निर्णयन के लिए संप्रेषित कर दिया। जब कि मेरठ में भी उत्तर प्रदेश सरकार का श्रम न्यायालय मौजूद है। मेरी यूनियन राज्य सरकार को उक्त विवाद को श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करने के लिए आवेदन कर दिया है, तथा तीन बार उस का स्मरण पत्र लिख चुकी है। लेकिन राज्य सरकार कोई निर्णय नहीं कर रही है। मुझे अपना विवाद श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करवाने के लिए क्या करना चाहिए?

-दिनेश कुमार, मेरठ उत्तर प्रदेश

सलाह-

राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह राज्य में उत्पन्न ऐसे औद्योगिक विवाद को जिस पर उसे क्षेत्राधिकार प्राप्त है। राज्य के किसी भी श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण को न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित कर सकती है। लेकिन राज्य सरकार का यह अधिकार न्यायोचित होना चाहिए। आप विवाद के पूर्व मेरठ में नियोजित थे तथा मेरठ में आप के नियोजक का कार्यालय है। विवाद को मेरठ के श्रम विभाग के मेरठ कार्यालय में ही उठाया गया था और समझौता कार्यवाही भी वहीं संपन्न हुई थी। मेरठ में राज्य सरकार का श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण होने के कारण राज्य सरकार के लिए न्यायोचित यही होता कि वह आप के औद्योगिक विवाद को मेरठ के श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण को ही न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित करती। इस संदर्भ में राज्य सरकार के इस निर्णय को न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह आप की यूनियन के आवेदन पर उक्त विवाद को लखनऊ के न्यायालय से श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ को स्थानान्तरित कर दे।

मेरी राय में आप को राज्य के सचिव श्रम विभाग को व्यक्तिगत रूप से मिल कर अपनी बात कहनी चाहिए और उन्हें इस बात से संतुष्ट करना चाहिए कि आप का विवाद मेरठ स्थानान्तरित कर दिया जाए। व्यक्तिगत रूप से मिलने से यह काम हो जाएगा। यदि इस पर भी राज्य सरकार आप के विवाद को मेरठ स्थानान्तरित नहीं करती है तो आप न्याय प्राप्ति के लिए एक पंजीकृत नोटिस सचिव श्रम विभाग राज्य सरकार उत्तर प्रदेश को भिजवाएँ जिस में आप के स्थानान्तरण आवेदन पर निर्धारित समय (15 दिन) में निर्णय करने की बात कहें और यह अंकित करें कि इस अवधि में आप के आवेदन पर मामले को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ स्थानान्तरित नहीं किया गया तो आप उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करेंगे।

दि आप के इस नोटिस की अवधि के समाप्त होने तक भी आप का विवाद स्थानान्तरित नहीं किया जाता है तो आप को उच्च न्यायालय लखनऊ बैंच में अथवा उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए। उच्च न्यायालय आप के विवाद को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण में स्थानान्तरित करने का आदेश राज्य सरकार को दे सकता है।

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